उद्योग पर्व · अध्याय 101
गरुड के पुत्रों का लोक
मातलि की पुत्री के लिए वर की खोज जारी रखते हुए नारद इन्द्र के सारथि को सुपर्णों के लोक में ले जाते हैं — गरुड के वंश के वे पक्षी जो सर्पों को खाते हैं। वे उनके बल, उनके क्षत्रिय स्वभाव और विष्णु के प्रति उनकी भक्ति का वर्णन करते हैं और गरुड के प्रमुख पुत्रों के नाम गिनाते हैं। वहाँ मातलि को कोई पसंद न आने पर वे उन्हें अन्यत्र ले चलने का प्रस्ताव करते हैं।
नारद उवाच
श्लोक 1 (5.101.1)
अयं लोकः सुपर्णानां पक्षिणां पन्नगाशिनाम् । विक्रमे गमने भारे नैषामस्ति परिश्रमः ॥
ayaṃ lokaḥ suparṇānāṃ pakṣiṇāṃ pannagāśinām | vikrame gamane bhāre naiṣāmasti pariśramaḥ
यह सुपर्णों का लोक है — सर्पों को खाने वाले पक्षियों का। पराक्रम में, उड़ान में और भार ढोने में इन्हें कभी थकान नहीं होती।
श्लोक 2 (5.101.2)
वैनतेयसुतैः सूत षड्भिस्ततमिदं कुलम् । सुमुखेन सुनाम्ना च सुनेत्रेण सुवर्चसा ॥
vainateyasutaiḥ sūta ṣaḍbhistatamidaṃ kulam | sumukhena sunāmnā ca sunetreṇa suvarcasā
हे सारथि, विनतानन्दन (गरुड) के छह पुत्रों ने इस कुल का विस्तार किया है — सुमुख, सुनामा, सुनेत्र, सुवर्चा,
श्लोक 3 (5.101.3)
सुरुचा पक्षिराजेन सुबलेन च मातले । वर्धितानि प्रसृत्या वै विनताकुलकर्तृभिः ॥
surucā pakṣirājena subalena ca mātale | vardhitāni prasṛtyā vai vinatākulakartṛbhiḥ
पक्षिराज सुरुच और सुबल, हे मातलि। विनता के कुल को चलाने वाले इन्हीं ने उसके वंशों को बढ़ाया और दूर-दूर तक फैलाया है।
श्लोक 4 (5.101.4)
पक्षिराजाभिजात्यानां सहस्राणि शतानि च । कश्यपस्य ततो वंशे जातैर्भूतिविवर्धनैः ॥
pakṣirājābhijātyānāṃ sahasrāṇi śatāni ca | kaśyapasya tato vaṃśe jātairbhūtivivardhanaiḥ
कश्यप के वंश में जन्मे, समृद्धि बढ़ाने वाले इन्हीं के द्वारा सैकड़ों और हज़ारों कुलीन पक्षिराज उत्पन्न हुए हैं।
श्लोक 5 (5.101.5)
सर्वे ह्येते श्रिया युक्ताः सर्वे श्रीवत्सलक्षणाः । सर्वे श्रियमभीप्सन्तो धारयन्ति बलान्युत ॥
sarve hyete śriyā yuktāḥ sarve śrīvatsalakṣaṇāḥ | sarve śriyamabhīpsanto dhārayanti balānyuta
ये सभी शोभा से युक्त हैं, सभी श्रीवत्स के चिह्न वाले हैं; सभी समृद्धि की कामना करते हुए अपना बल बनाए रखते हैं।
श्लोक 6 (5.101.6)
कर्मणा क्षत्रियाश्चैते निर्घृणा भोगिभोजिनः । ज्ञातिसङ्क्षयकर्तृत्वाद्ब्राह्मण्यं न लभन्ति वै ॥
karmaṇā kṣatriyāścaite nirghṛṇā bhogibhojinaḥ | jñātisaṅkṣayakartṛtvādbrāhmaṇyaṃ na labhanti vai
कर्म से ये क्षत्रिय हैं — निर्दय और सर्पों को खाने वाले। अपने ही जाति-बन्धुओं का नाश करने के कारण इन्हें ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 7 (5.101.7)
नामानि चैषां वक्ष्यामि यथाप्राधान्यतः शृणु । मातले श्लाघ्यमेतद्धि कुलं विष्णुपरिग्रहम् ॥
nāmāni caiṣāṃ vakṣyāmi yathāprādhānyataḥ śṛṇu | mātale ślāghyametaddhi kulaṃ viṣṇuparigraham
मैं इनके नाम प्रमुखता के क्रम से बताता हूँ, सुनो। हे मातलि, यह कुल प्रशंसनीय है, क्योंकि विष्णु ने इसे अपना बना लिया है।
श्लोक 8 (5.101.8)
दैवतं विष्णुरेतेषां विष्णुरेव परायणम् । हृदि चैषां सदा विष्णुर्विष्णुरेव सदा गतिः ॥
daivataṃ viṣṇureteṣāṃ viṣṇureva parāyaṇam | hṛdi caiṣāṃ sadā viṣṇurviṣṇureva sadā gatiḥ
विष्णु ही इनके देवता हैं, विष्णु ही इनका परम आश्रय हैं; विष्णु सदा इनके हृदय में रहते हैं और विष्णु ही सदा इनकी गति हैं।
श्लोक 9 (5.101.9)
सुवर्णचूडो नागाशी दारुणश्चण्डतुण्डकः । अनिलश्चानलश्चैव विशालाक्षोऽथ कुण्डली ॥
suvarṇacūḍo nāgāśī dāruṇaścaṇḍatuṇḍakaḥ | anilaścānalaścaiva viśālākṣo'tha kuṇḍalī
सुवर्णचूड, नागाशी, दारुण, चण्डतुण्डक, अनिल, अनल, विशालाक्ष, कुण्डली,
श्लोक 10 (5.101.10)
पङ्कजिद्वज्रविष्कम्भो वैनतेयोऽथ वामनः । वातवेगो दिशाचक्षुर्निमेषोऽनिमिषस्तथा ॥
paṅkajidvajraviṣkambho vainateyo'tha vāmanaḥ | vātavego diśācakṣurnimeṣo'nimiṣastathā
पंकजित्, वज्रविष्कम्भ, वैनतेय, वामन, वातवेग, दिशाचक्षु, निमेष, अनिमिष,
श्लोक 11 (5.101.11)
त्रिरावः सप्तरावश्च वाल्मीकिर्दीपकस्तथा । दैत्यद्वीपः सरिद्द्वीपः सारसः पद्मकेतनः ॥
trirāvaḥ saptarāvaśca vālmīkirdīpakastathā | daityadvīpaḥ sariddvīpaḥ sārasaḥ padmaketanaḥ
त्रिराव, सप्तराव, वाल्मीकि, दीपक, दैत्यद्वीप, सरिद्द्वीप, सारस, पद्मकेतन,
श्लोक 12 (5.101.12)
सुमुखश्चित्रकेतुश्च चित्रबर्हस्तथाऽनघः । मेषहृत्कुमुदो दक्षः सर्पान्तः सोमभोजनः ॥
sumukhaścitraketuśca citrabarhastathā'naghaḥ | meṣahṛtkumudo dakṣaḥ sarpāntaḥ somabhojanaḥ
सुमुख, चित्रकेतु, चित्रबर्ह, अनघ, मेषहृत्, कुमुद, दक्ष, सर्पान्त, सोमभोजन,
श्लोक 13 (5.101.13)
गुरुभारः कपोतश्च सूर्यनेत्रश्चिरान्तकः । विष्णुधर्मा कुमारश्च परिबर्हो हरिस्तथा ॥
gurubhāraḥ kapotaśca sūryanetraścirāntakaḥ | viṣṇudharmā kumāraśca paribarho haristathā
गुरुभार, कपोत, सूर्यनेत्र, चिरान्तक, विष्णुधर्मा, कुमार, परिबर्ह, हरि,
श्लोक 14 (5.101.14)
सुस्वरो मधुपर्कश्च हेमवर्णस्तथैव च । मालयो मातरिश्वा च निशाकरदिवाकरौ ॥
susvaro madhuparkaśca hemavarṇastathaiva ca | mālayo mātariśvā ca niśākaradivākarau
सुस्वर, मधुपर्क, हेमवर्ण, मालय, मातरिश्वा, तथा निशाकर और दिवाकर।
श्लोक 15 (5.101.15)
एते प्रदेशमात्रेण मयोक्ता गरुडात्मजाः । प्राधान्यतस्ते यशसा कीर्तिताः प्राणिनश्चये ॥
ete pradeśamātreṇa mayoktā garuḍātmajāḥ | prādhānyataste yaśasā kīrtitāḥ prāṇinaścaye
गरुड के इन पुत्रों का मैंने केवल संक्षेप में उल्लेख किया है — उनमें से वे, जो अपनी प्रधानता और यश के कारण विख्यात हैं।
श्लोक 16 (5.101.16)
यद्यत्र न रुचिः काचिदेहि गच्छाव मातले । तं नयिष्यामि देशं त्वां वरं यत्रोपलप्स्यसे ॥
yadyatra na ruciḥ kācidehi gacchāva mātale | taṃ nayiṣyāmi deśaṃ tvāṃ varaṃ yatropalapsyase
यदि यहाँ तुम्हें कोई न रुचे, तो आओ मातलि, हम चलें। मैं तुम्हें ऐसे स्थान पर ले चलूँगा जहाँ तुम्हें वर मिल जाएगा।