उद्योग पर्व · अध्याय 102
रसातल और गोमाता सुरभि
नारद मातलि को सातवें अधोलोक रसातल में ले जाते हैं, जहाँ गौओं की माता सुरभि रहती हैं, जो ब्रह्मा के मुख से प्रकट हुई थीं। वे बताते हैं कि उनके दूध से क्षीरसागर बना, जिसके तट पर फेन पीने वाले मुनि रहते हैं; फिर चारों दिशाओं को धारण करने वाली चार गौओं के नाम बताते हैं और स्मरण कराते हैं कि उनके दूध के मन्थन से लक्ष्मी, अमृत और अन्य रत्न निकले। अंत में वे रसातल को सबसे सुखद निवास बताने वाली एक प्राचीन गाथा सुनाते हैं।
नारद उवाच
श्लोक 1 (5.102.1)
इदं रसातलं नाम सप्तमं पृथिवीतलम् । यत्रास्ते सुरभिर्माता गवाममृतसंभवा ॥
idaṃ rasātalaṃ nāma saptamaṃ pṛthivītalam | yatrāste surabhirmātā gavāmamṛtasaṃbhavā
यह रसातल है, पृथ्वी के नीचे का सातवाँ तल, जहाँ गौओं की माता सुरभि रहती हैं, जिनका जन्म अमृत से हुआ था।
श्लोक 2 (5.102.2)
क्षरन्ती सततं क्षीरं पृथिवीसारसंभवम् । षण्णां रसानां सारेण रसमेकमनुत्तमम् ॥
kṣarantī satataṃ kṣīraṃ pṛthivīsārasaṃbhavam | ṣaṇṇāṃ rasānāṃ sāreṇa rasamekamanuttamam
वे निरन्तर दूध बहाती रहती हैं, जो पृथ्वी के सार से उत्पन्न है — छहों रसों के सार से बना एक अनुपम रस।
श्लोक 3 (5.102.3)
अमृतेनाभितृप्तस्य सारमुद्गिरतः पुरा । पितामहस्य वदनादुदतिष्ठदनिन्दिता ॥
amṛtenābhitṛptasya sāramudgirataḥ purā | pitāmahasya vadanādudatiṣṭhadaninditā
प्राचीन काल में, जब अमृत से तृप्त पितामह (ब्रह्मा) उसका सार उगल रहे थे, तब यह निर्दोष (गौ) उनके मुख से प्रकट हुई।
श्लोक 4 (5.102.4)
यस्याः क्षीरस्य धाराया निपतन्त्या महीतले । ह्रदः कृतः क्षीरनिधिः पवित्रं परमुच्यते ॥
yasyāḥ kṣīrasya dhārāyā nipatantyā mahītale | hradaḥ kṛtaḥ kṣīranidhiḥ pavitraṃ paramucyate
पृथ्वी पर गिरती उसकी दूध की धारा से एक सरोवर बना — क्षीरसागर, जिसे परम पवित्र कहा जाता है।
श्लोक 5 (5.102.5)
पुष्पितस्येव फेनेन पर्यन्तमनुवेष्टितम् । पिबन्तो निवसन्त्यत्र फेनपा मुनिसत्तमाः ॥
puṣpitasyeva phenena paryantamanuveṣṭitam | pibanto nivasantyatra phenapā munisattamāḥ
उसके किनारे फेन से ऐसे घिरे हैं मानो फूल खिले हों; और यहाँ उसी को पीते हुए फेनप नाम के श्रेष्ठ मुनि निवास करते हैं।
श्लोक 6 (5.102.6)
फेनपा नाम ते ख्याताः फेनाहाराश्च मातले । उग्रे तपसि वर्तन्ते येषां बिभ्यति देवताः ॥
phenapā nāma te khyātāḥ phenāhārāśca mātale | ugre tapasi vartante yeṣāṃ bibhyati devatāḥ
हे मातलि, वे फेनप नाम से विख्यात हैं और फेन ही उनका आहार है। वे उग्र तपस्या में लगे रहते हैं, और देवता भी उनसे डरते हैं।
श्लोक 7 (5.102.7)
अस्याश्चतस्रो धेन्वोऽन्या दिक्षु सर्वासु मातले । निवसन्ति दिशां पाल्यो धारयन्त्यो दिशः स्म ताः ॥
asyāścatasro dhenvo'nyā dikṣu sarvāsu mātale | nivasanti diśāṃ pālyo dhārayantyo diśaḥ sma tāḥ
हे मातलि, इसी से उत्पन्न चार अन्य गौएँ सब दिशाओं में दिशाओं की रक्षिकाओं के रूप में रहती हैं; वे ही दिशाओं को धारण करती हैं।
श्लोक 8 (5.102.8)
पूर्वां दिशं धारयते सुरूपा नाम सौरभी । दक्षिणां हंसिका नाम धारयत्यपरां दिशम् ॥
pūrvāṃ diśaṃ dhārayate surūpā nāma saurabhī | dakṣiṇāṃ haṃsikā nāma dhārayatyaparāṃ diśam
पूर्व दिशा को सुरभि की पुत्री सुरूपा धारण करती है; हंसिका नाम की गौ दूसरी, अर्थात् दक्षिण दिशा को धारण करती है।
श्लोक 9 (5.102.9)
पश्चिमा वारुणी दिक्च धार्यते वै सुभद्रया । महानुभावया नित्यं मातले विश्वरूपया ॥
paścimā vāruṇī dikca dhāryate vai subhadrayā | mahānubhāvayā nityaṃ mātale viśvarūpayā
पश्चिम दिशा, जो वरुण की दिशा है, हे मातलि, सदा महानुभाव और विश्वरूपा सुभद्रा द्वारा धारण की जाती है।
श्लोक 10 (5.102.10)
सर्वकामदुघा नाम धेनुर्धारयते दिशम् । उत्तरां मातले धर्म्यां तथैलविलसंश्रिताम् ॥
sarvakāmadughā nāma dhenurdhārayate diśam | uttarāṃ mātale dharmyāṃ tathailavilasaṃśritām
सर्वकामदुघा नाम की गौ, हे मातलि, उत्तर दिशा को धारण करती है — वह धर्ममयी दिशा, जिसमें ऐलविल (कुबेर) का निवास है।
श्लोक 11 (5.102.11)
आसां तु पयसा मिश्रं पयो निर्मथ्य सागरे । मन्थानं मन्दरं कृत्वा देवैरसुरसंहितैः ॥
āsāṃ tu payasā miśraṃ payo nirmathya sāgare | manthānaṃ mandaraṃ kṛtvā devairasurasaṃhitaiḥ
इन्हीं गौओं के दूध से मिले समुद्र के जल को देवताओं ने असुरों के साथ मिलकर, मन्दर पर्वत को मथानी बनाकर, मथा था;
श्लोक 12 (5.102.12)
उद्धृता वारुणी लक्ष्मीरमृतं चापि मातले । उच्चैःश्रवाश्चाश्वराजो मणिरत्नं च कौस्तुभम् ॥
uddhṛtā vāruṇī lakṣmīramṛtaṃ cāpi mātale | uccaiḥśravāścāśvarājo maṇiratnaṃ ca kaustubham
और उससे वारुणी, लक्ष्मी और अमृत निकाले गए, हे मातलि, तथा अश्वराज उच्चैःश्रवा और मणियों में श्रेष्ठ कौस्तुभ भी।
श्लोक 13 (5.102.13)
सुधाहारेषु च सुधां स्वधाभोजिषु च स्वधाम् । अमृतं चामृताशेषु सुरभी क्षरते पयः ॥
sudhāhāreṣu ca sudhāṃ svadhābhojiṣu ca svadhām | amṛtaṃ cāmṛtāśeṣu surabhī kṣarate payaḥ
सुरभि सुधा पर जीने वालों के लिए सुधा, स्वधा का भोजन करने वालों के लिए स्वधा और अमृत खाने वालों के लिए अमृत के रूप में दूध बहाती हैं।
श्लोक 14 (5.102.14)
अत्र गाथा पुरा गीता रसातलनिवासिभिः । पौराणी श्रूयते लोके गीयते या मनीषिभिः ॥
atra gāthā purā gītā rasātalanivāsibhiḥ | paurāṇī śrūyate loke gīyate yā manīṣibhiḥ
यहाँ प्राचीन काल में रसातल के निवासियों ने एक गाथा गाई थी; वह पुरानी गाथा आज भी संसार में सुनी जाती है और मनीषी उसे गाते हैं —
श्लोक 15 (5.102.15)
न नागलोके न स्वर्गे न विमाने त्रिविष्टपे । परिवासः सुखस्तादृक् रसातलतले यथा ॥
na nāgaloke na svarge na vimāne triviṣṭape | parivāsaḥ sukhastādṛk rasātalatale yathā
'न नागलोक में, न स्वर्ग में, न त्रिविष्टप के विमानों में वैसा सुखद निवास है जैसा रसातल में है।'