उद्योग पर्व · अध्याय 103
नागपुरी भोगवती : मातलि द्वारा सुमुख का चयन
नारद मातलि को वासुकि द्वारा पालित नागनगरी भोगवती दिखाते हैं, जहाँ शेषनाग पृथ्वी को धारण किए हुए हैं, और वहाँ रहने वाले प्रमुख नागों के नाम बताते हैं। कौरव्य और आर्यक के सामने खड़े एक तेजस्वी युवा नाग पर मातलि का मन आ जाता है और वे उसके बारे में पूछते हैं। नारद बताते हैं कि यह ऐरावत कुल का सुमुख है, आर्यक का पौत्र, जिसके पिता चिकुर को हाल ही में गरुड ने मार डाला था; मातलि तुरन्त उसे अपनी पुत्री गुणकेशी के वर के रूप में चुन लेते हैं और नारद से यह सम्बन्ध कराने का आग्रह करते हैं।
नारद उवाच
श्लोक 1 (5.103.1)
इयं भोगवती नाम पुरी वासुकिपालिता । यादृशी देवराजस्य पुरी वर्याऽमरावती ॥
iyaṃ bhogavatī nāma purī vāsukipālitā | yādṛśī devarājasya purī varyā'marāvatī
यह भोगवती नाम की नगरी है, जिसका पालन वासुकि करते हैं; यह देवराज की श्रेष्ठ नगरी अमरावती के समान है।
श्लोक 2 (5.103.2)
एष शेषः स्थितो नागो येनेयं धार्यते सदा । तपसा लोकमुख्येन प्रभावसहिता मही ॥
eṣa śeṣaḥ sthito nāgo yeneyaṃ dhāryate sadā | tapasā lokamukhyena prabhāvasahitā mahī
यहाँ शेषनाग स्थित हैं, जो संसार में सर्वश्रेष्ठ अपनी तपस्या के बल से इस प्रभावशालिनी पृथ्वी को सदा धारण किए रहते हैं।
श्लोक 3 (5.103.3)
श्वेताचलनिभाकारो दिव्याभरणभूषितः । सहस्रं धारयन्मूर्ध्नां ज्वालाजिह्वो महाबलः ॥
śvetācalanibhākāro divyābharaṇabhūṣitaḥ | sahasraṃ dhārayanmūrdhnāṃ jvālājihvo mahābalaḥ
उनका आकार श्वेत पर्वत के समान है और वे दिव्य आभूषणों से सजे हैं; वे सहस्र मस्तक धारण करते हैं, उनकी जिह्वाएँ ज्वाला के समान हैं और वे महाबली हैं।
श्लोक 4 (5.103.4)
इह नानाविधाकारा नानाविधविभूषणाः । सुरसायाः सुता नागा निवसन्ति गतव्यथाः ॥
iha nānāvidhākārā nānāvidhavibhūṣaṇāḥ | surasāyāḥ sutā nāgā nivasanti gatavyathāḥ
यहाँ सुरसा के पुत्र नाग, अनेक आकारों और अनेक प्रकार के आभूषणों वाले, सब कष्टों से मुक्त होकर रहते हैं —
श्लोक 5 (5.103.5)
मणिस्वस्तिकचक्राङ्काः कमण्डलुकलक्षणाः । सहस्रसंख्या बलिनः सर्वे रौद्राः स्वभावतः ॥
maṇisvastikacakrāṅkāḥ kamaṇḍalukalakṣaṇāḥ | sahasrasaṃkhyā balinaḥ sarve raudrāḥ svabhāvataḥ
मणि, स्वस्तिक और चक्र के चिह्नों वाले तथा कमण्डलु के लक्षण वाले; वे हज़ारों की संख्या में हैं, बलवान हैं, और सभी स्वभाव से उग्र हैं।
श्लोक 6 (5.103.6)
सहस्रशिरसः केचित्केचित्पञ्चशताननाः । शतशीर्षास्तथा केचित्केचित्त्रिशिरसोऽपि च ॥
sahasraśirasaḥ kecitkecitpañcaśatānanāḥ | śataśīrṣāstathā kecitkecittriśiraso'pi ca
किसी के सहस्र सिर हैं, किसी के पाँच सौ मुख; किसी के सौ सिर हैं और किसी के तीन।
श्लोक 7 (5.103.7)
द्विपञ्चशिरसः केचित्केचित्सप्तमुखास्तथा । महाभोगा महाकायाः पर्वताभोगभोगिनः ॥
dvipañcaśirasaḥ kecitkecitsaptamukhāstathā | mahābhogā mahākāyāḥ parvatābhogabhoginaḥ
किसी के दस सिर हैं और किसी के सात मुख; वे बड़े फनों और विशाल शरीरों वाले हैं, और उनकी कुण्डलियाँ पर्वतों जितनी विस्तृत हैं।
श्लोक 8 (5.103.8)
बहूनीह सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । नागानामेकवंशानां यथाश्रेष्ठं तु मे शृणु ॥
bahūnīha sahasrāṇi prayutānyarbudāni ca | nāgānāmekavaṃśānāṃ yathāśreṣṭhaṃ tu me śṛṇu
यहाँ एक ही वंश के नाग हज़ारों, लाखों और करोड़ों की संख्या में हैं; उनमें से श्रेष्ठों को क्रम से मुझसे सुनो।
श्लोक 9 (5.103.9)
वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनञ्जयौ । कालीयो नहुषश्चैव कम्बलाश्वतरावुभौ ॥
vāsukistakṣakaścaiva karkoṭakadhanañjayau | kālīyo nahuṣaścaiva kambalāśvatarāvubhau
वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और धनंजय, कालिय, नहुष, तथा दोनों — कम्बल और अश्वतर;
श्लोक 10 (5.103.10)
बाह्यकुण्डो मणिर्नागस्तथैवापूरणः खगः । वामनश्चैलपत्रश्च कुकुरः कुकुणस्तथा ॥
bāhyakuṇḍo maṇirnāgastathaivāpūraṇaḥ khagaḥ | vāmanaścailapatraśca kukuraḥ kukuṇastathā
बाह्यकुण्ड, मणि नाग, आपूरण, खग, वामन, ऐलपत्र, कुकुर और कुकुण;
श्लोक 11 (5.103.11)
आर्यको नन्दकश्चैव तथा कलशपोतकौ । कैलासकः पिञ्जरको नागश्चैरावतस्तथा ॥
āryako nandakaścaiva tathā kalaśapotakau | kailāsakaḥ piñjarako nāgaścairāvatastathā
आर्यक, नन्दक, कलश और पोतक, कैलासक, पिंजरक, और नाग ऐरावत;
श्लोक 12 (5.103.12)
सुमनोमुखो दधिमुखः शङ्खो नन्दोपनन्दकौ । आप्तः कोटरकश्चैव शिखी निष्ठूरिकस्तथा ॥
sumanomukho dadhimukhaḥ śaṅkho nandopanandakau | āptaḥ koṭarakaścaiva śikhī niṣṭhūrikastathā
सुमनोमुख, दधिमुख, शंख, नन्द और उपनन्दक, आप्त, कोटरक, शिखी और निष्ठूरिक;
श्लोक 13 (5.103.13)
तित्तिरिर्हस्तिभद्रश्च कुमुदो माल्यपिण्डकः । द्वौ पद्मौ पुण्डरीकश्च पुष्पो मुद्गरपर्णकः ॥
tittirirhastibhadraśca kumudo mālyapiṇḍakaḥ | dvau padmau puṇḍarīkaśca puṣpo mudgaraparṇakaḥ
तित्तिरि, हस्तिभद्र, कुमुद, माल्यपिण्डक, दो पद्म, पुण्डरीक, पुष्प और मुद्गरपर्णक;
श्लोक 14 (5.103.14)
करवीरः पीठरकः संवृत्तो वृत्त एव च । पिण्डारो बिल्वपत्रश्च मूषिकादः शिरीषकः ॥
karavīraḥ pīṭharakaḥ saṃvṛtto vṛtta eva ca | piṇḍāro bilvapatraśca mūṣikādaḥ śirīṣakaḥ
करवीर, पीठरक, संवृत्त और वृत्त, पिण्डार, बिल्वपत्र, मूषिकाद और शिरीषक;
श्लोक 15 (5.103.15)
दिलीपः शङ्खशीर्षश्च ज्योतिष्कोऽथापराजितः । कौरव्यो धृतराष्ट्रश्च कुहुरः कृशकस्तथा ॥
dilīpaḥ śaṅkhaśīrṣaśca jyotiṣko'thāparājitaḥ | kauravyo dhṛtarāṣṭraśca kuhuraḥ kṛśakastathā
दिलीप, शंखशीर्ष, ज्योतिष्क, अपराजित, कौरव्य, धृतराष्ट्र, कुहुर और कृशक;
श्लोक 16 (5.103.16)
विरजा धारणश्चैव सुबाहुर्मुखरो जयः । बधिरान्धौ विशुण्डिश्च विरसः सुरसस्तथा ॥
virajā dhāraṇaścaiva subāhurmukharo jayaḥ | badhirāndhau viśuṇḍiśca virasaḥ surasastathā
विरजा, धारण, सुबाहु, मुखर, जय, बधिर और अन्ध, विशुण्डि, विरस और सुरस।
श्लोक 17 (5.103.17)
एते चान्ये च बहवः कश्यपस्यात्मजाः स्मृताः । मातले पश्य यद्यत्र कश्चित्ते रोचते वरः ॥
ete cānye ca bahavaḥ kaśyapasyātmajāḥ smṛtāḥ | mātale paśya yadyatra kaścitte rocate varaḥ
ये तथा और भी बहुत-से कश्यप के पुत्र माने जाते हैं। हे मातलि, देखो, यहाँ कोई वर तुम्हें रुचता है या नहीं।
कण्व उवाच
श्लोक 18 (5.103.18)
मातलिस्त्वेकमव्यग्रः सततं संनिरीक्ष्य वै । पप्रच्छ नारदं तत्र प्रीतिमानिव चाभवत् ॥
mātalistvekamavyagraḥ satataṃ saṃnirīkṣya vai | papraccha nāradaṃ tatra prītimāniva cābhavat
मातलि ने उनमें से एक को बड़े ध्यान से देर तक देखा और प्रसन्न-से हो गए; फिर उन्होंने वहाँ नारद से पूछा।
मातलिरुवाच
श्लोक 19 (5.103.19)
स्थितो य एष पुरतः कौरव्यस्यार्यकस्य तु । द्युतिमान्दर्शनीयश्च कस्यैष कुलनन्दनः ॥
sthito ya eṣa purataḥ kauravyasyāryakasya tu | dyutimāndarśanīyaśca kasyaiṣa kulanandanaḥ
यह जो कौरव्य और आर्यक के सामने खड़ा है, तेजस्वी और दर्शनीय — यह किसके कुल को आनन्द देने वाला है?
श्लोक 20 (5.103.20)
कः पिता जननी चास्य कतमस्यैष भोगिनः । वंशस्य कस्यैष महान्केतुभूत इव स्थितः ॥
kaḥ pitā jananī cāsya katamasyaiṣa bhoginaḥ | vaṃśasya kasyaiṣa mahānketubhūta iva sthitaḥ
इसके पिता और माता कौन हैं? यह किस नाग का पुत्र है? यह किस वंश का है, जो उसकी ध्वजा के समान खड़ा दिखता है?
श्लोक 21 (5.103.21)
प्रणिधानेन धैर्येण रूपेण वयसा च मे । मनः प्रविष्टो देवर्षे गुणकेश्याः पतिर्वरः ॥
praṇidhānena dhairyeṇa rūpeṇa vayasā ca me | manaḥ praviṣṭo devarṣe guṇakeśyāḥ patirvaraḥ
अपनी एकाग्रता, धैर्य, रूप और आयु से इसने मेरे मन में स्थान बना लिया है, हे देवर्षि। यह गुणकेशी के लिए उत्तम पति होगा।
कण्व उवाच
श्लोक 22 (5.103.22)
मातलिं प्रीतमनसं दृष्ट्वा सुमुखदर्शनात् । निवेदयामास तदा माहात्म्यं जन्म कर्म च ॥
mātaliṃ prītamanasaṃ dṛṣṭvā sumukhadarśanāt | nivedayāmāsa tadā māhātmyaṃ janma karma ca
सुमुख को देखकर मातलि को इतना प्रसन्न देखकर नारद ने तब उन्हें उस नाग की महिमा, जन्म और कर्मों के बारे में बताया।
नारद उवाच
श्लोक 23 (5.103.23)
ऐरावतकुले जातः सुमुखो नाम नागराट् । आर्यकस्य मतः पौत्रो दौहित्रो वामनस्य च ॥
airāvatakule jātaḥ sumukho nāma nāgarāṭ | āryakasya mataḥ pautro dauhitro vāmanasya ca
ऐरावत के कुल में जन्मा यह सुमुख नाम का नागराज है। यह आर्यक का पौत्र और वामन का दौहित्र माना जाता है।
श्लोक 24 (5.103.24)
एतस्य हि पिता नागश्चिकुरो नाम मातले । नचिराद्वैनतेयेन पञ्चत्वमुपपादितः ॥
etasya hi pitā nāgaścikuro nāma mātale | nacirādvainateyena pañcatvamupapāditaḥ
हे मातलि, इसके पिता चिकुर नाम के नाग थे, जिन्हें विनतानन्दन (गरुड) ने अभी कुछ ही समय पहले मार डाला।
कण्व उवाच
श्लोक 25 (5.103.25)
ततोऽब्रवीत्प्रीतमना मातलिर्नारदं वचः । एष मे रुचितस्तात जामाता भुजगोत्तमः ॥
tato'bravītprītamanā mātalirnāradaṃ vacaḥ | eṣa me rucitastāta jāmātā bhujagottamaḥ
तब प्रसन्नचित्त मातलि ने नारद से कहा — "हे तात, यह श्रेष्ठ नाग मुझे जामाता के रूप में पसंद है।
मातलिरुवाच
श्लोक 26 (5.103.26)
क्रियतामत्र यत्नो वै प्रीतिमानस्म्यनेन वै । अस्मै नागाय वै दातुं प्रियां दुहितरं मुने ॥
kriyatāmatra yatno vai prītimānasmyanena vai | asmai nāgāya vai dātuṃ priyāṃ duhitaraṃ mune
"इसके लिए प्रयत्न किया जाए, क्योंकि मैं इससे प्रसन्न हूँ — हे मुनि, अपनी प्रिय पुत्री इस नाग को देने के लिए।"