उद्योग पर्व · अध्याय 104
सुमुख को दीर्घायु का वरदान
नारद नाग आर्यक से आग्रह करते हैं कि वे मातलि की पुत्री गुणकेशी को अपने पौत्र सुमुख की पत्नी के रूप में स्वीकार करें। आर्यक प्रसन्न भी हैं और चिन्तित भी, क्योंकि सुमुख के पिता को खा जाने वाले गरुड ने एक महीने के भीतर सुमुख को भी खाने की प्रतिज्ञा की है। मातलि सुमुख को नारद के साथ इन्द्र के पास ले जाते हैं, जहाँ विष्णु उस नाग को अमृत देने को कहते हैं; गरुड से सावधान इन्द्र उसे अमृत के बदले दीर्घ आयु देते हैं, और सुमुख का गुणकेशी से विवाह हो जाता है।
कण्व उवाच
श्लोक 1 (5.104.1)
मातलेर्वचनं श्रुत्वा नारदो मुनिसत्तमः । अब्रवीद्देवराजं तमार्यकं कुरुनन्दन ॥
mātalervacanaṃ śrutvā nārado munisattamaḥ | abravīddevarājaṃ tamāryakaṃ kurunandana
हे कुरुनन्दन, मातलि की बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद ने उस देवतुल्य राजा आर्यक से कहा।
नारद उवाच
श्लोक 2 (5.104.2)
सूतोऽयं मातलिर्नाम शक्रस्य दयितः सुहृत् । शुचिः शीलगुणोपेतस्तेजस्वी वीर्यवान्बली ॥
sūto'yaṃ mātalirnāma śakrasya dayitaḥ suhṛt | śuciḥ śīlaguṇopetastejasvī vīryavānbalī
यह मातलि नाम का सारथि है, इन्द्र का प्रिय सुहृद् — पवित्र, शील और गुणों से युक्त, तेजस्वी, पराक्रमी और बलवान।
श्लोक 3 (5.104.3)
शक्रस्यायं सखा चैव मन्त्री सारथिरेव च । अल्पान्तरप्रभावश्च वासवेन रणे रणे ॥
śakrasyāyaṃ sakhā caiva mantrī sārathireva ca | alpāntaraprabhāvaśca vāsavena raṇe raṇe
यह इन्द्र का सखा, मन्त्री और सारथि है; हर युद्ध में इसका प्रभाव इन्द्र से थोड़ा ही कम रहता है।
श्लोक 4 (5.104.4)
अयं हरिसहस्रेण युक्तं जैत्रं रथोत्तमम् । देवासुरेषु युद्धेषु मनसैव नियच्छति ॥
ayaṃ harisahasreṇa yuktaṃ jaitraṃ rathottamam | devāsureṣu yuddheṣu manasaiva niyacchati
देवासुर संग्रामों में यह हज़ार घोड़ों से जुते इन्द्र के उत्तम विजयी रथ को केवल मन से ही चलाता है।
श्लोक 5 (5.104.5)
अनेन विजितानश्वैर्दोर्भ्यां जयति वासवः । अनेन बलभित्पूर्वं प्रहृते प्रहरत्युत ॥
anena vijitānaśvairdorbhyāṃ jayati vāsavaḥ | anena balabhitpūrvaṃ prahṛte praharatyuta
जिन्हें यह पहले अपने घोड़ों से पराजित कर देता है, उन्हें फिर इन्द्र अपनी भुजाओं से जीतते हैं; जब यह पहले प्रहार कर लेता है, तभी बल-संहारक इन्द्र प्रहार करते हैं।
श्लोक 6 (5.104.6)
अस्य कन्या वरारोहा रूपेणासदृशी भुवि । सत्यशीलगुणोपेता गुणकेशीति विश्रुता ॥
asya kanyā varārohā rūpeṇāsadṛśī bhuvi | satyaśīlaguṇopetā guṇakeśīti viśrutā
इसकी एक सुन्दर कटि वाली कन्या है, जो रूप में पृथ्वी पर अनुपम है, सत्य, शील और गुणों से युक्त है, और गुणकेशी नाम से विख्यात है।
श्लोक 7 (5.104.7)
तस्यास्य यत्नाच्चरतस्त्रैलोक्यममरद्युते । सुमुखो भवतः पौत्रो रोचते दुहितुः पतिः ॥
tasyāsya yatnāccaratastrailokyamamaradyute | sumukho bhavataḥ pautro rocate duhituḥ patiḥ
हे देवतुल्य तेज वाले, तीनों लोकों में यत्नपूर्वक खोजते हुए इसे तुम्हारा पौत्र सुमुख अपनी पुत्री के पति के रूप में पसंद आया है।
श्लोक 8 (5.104.8)
यदि ते रोचते सम्यग्भुजगोत्तम मा चिरम् । क्रियतामार्यक क्षिप्रं बुद्धिः कन्यापरिग्रहे ॥
yadi te rocate samyagbhujagottama mā ciram | kriyatāmāryaka kṣipraṃ buddhiḥ kanyāparigrahe
हे नागश्रेष्ठ आर्यक, यदि यह तुम्हें भली-भाँति रुचता है, तो बिना देर किए शीघ्र कन्या को स्वीकार करने का निश्चय करो।
श्लोक 9 (5.104.9)
यथा विष्णुकुले लक्ष्मीर्यथा स्वाहा विभावसोः । कुले तव तथैवास्तु गुणकेशी सुमध्यमा ॥
yathā viṣṇukule lakṣmīryathā svāhā vibhāvasoḥ | kule tava tathaivāstu guṇakeśī sumadhyamā
जैसे विष्णु के घर में लक्ष्मी हैं और अग्नि के घर में स्वाहा, वैसे ही सुन्दर कटि वाली गुणकेशी तुम्हारे कुल में रहे।
श्लोक 10 (5.104.10)
पौत्रस्यार्थे भवांस्तस्माद्गुणकेशीं प्रतीच्छतु । सदृशीं प्रतिरूपस्य वासवस्य शचीमिव ॥
pautrasyārthe bhavāṃstasmādguṇakeśīṃ pratīcchatu | sadṛśīṃ pratirūpasya vāsavasya śacīmiva
इसलिए अपने पौत्र के लिए गुणकेशी को स्वीकार करो — वह उस सुन्दर युवक के योग्य है, जैसे शची इन्द्र के योग्य हैं।
श्लोक 11 (5.104.11)
पितृहीनमपि ह्येनं गुणतो वरयामहे । बहुमानाच्च भवतस्तथैवैरावतस्य च ॥
pitṛhīnamapi hyenaṃ guṇato varayāmahe | bahumānācca bhavatastathaivairāvatasya ca
यद्यपि इसके पिता नहीं रहे, फिर भी हम इसके गुणों के कारण, और तुम्हारे तथा ऐरावत के प्रति बड़े सम्मान के कारण, इसे वरते हैं,
श्लोक 12 (5.104.12)
सुमुखस्य गुणैश्चैव शीलशौचदमादिभिः । अभिगम्य स्वयं कन्यामयं दातुं समुद्यतः । मातलिस्तस्य संमानं कर्तुमर्हो भवानपि ॥
sumukhasya guṇaiścaiva śīlaśaucadamādibhiḥ | abhigamya svayaṃ kanyāmayaṃ dātuṃ samudyataḥ | mātalistasya saṃmānaṃ kartumarho bhavānapi
और सुमुख के अपने गुणों — शील, शौच, दम आदि — के कारण भी। मातलि स्वयं आकर अपनी कन्या देने को तैयार हैं; तुम्हें भी उनका सम्मान करना चाहिए।
कण्व उवाच
श्लोक 13 (5.104.13)
स तु दीनः प्रहृष्टश्च प्राह नारदमार्यकः । व्रियमाणे तथा पौत्रे पुत्रे च निधनं गते ॥
sa tu dīnaḥ prahṛṣṭaśca prāha nāradamāryakaḥ | vriyamāṇe tathā pautre putre ca nidhanaṃ gate
एक ओर पौत्र का इस प्रकार वरण होने से प्रसन्न और दूसरी ओर पुत्र की मृत्यु से दुःखी आर्यक ने नारद से कहा —
आर्यक उवाच
श्लोक 14 (5.104.14)
मन्ये नैतद्बहुमतं महर्षे वचनं तव । सखा शक्रस्य संयुक्तः कस्यायं नेप्सितो भवेत् । कारणस्य तु दौर्बल्याच्चिन्तयामि महामुने ॥
manye naitadbahumataṃ maharṣe vacanaṃ tava | sakhā śakrasya saṃyuktaḥ kasyāyaṃ nepsito bhavet | kāraṇasya tu daurbalyāccintayāmi mahāmune
हे महर्षि, क्या मैं आपके इस वचन को बड़ा सम्मान नहीं देता? इन्द्र के सखा से सम्बन्ध कौन नहीं चाहेगा? पर हे महामुनि, इस विषय में एक दुर्बलता के कारण मैं चिन्तित हूँ।
श्लोक 15 (5.104.15)
अस्य देहकरस्तात मम पुत्रो महाद्युते । भक्षितो वैनतेयेन दुःखार्तास्तेन वै वयम् ॥
asya dehakarastāta mama putro mahādyute | bhakṣito vainateyena duḥkhārtāstena vai vayam
हे तात, हे महातेजस्वी, इस बालक का जनक, मेरा पुत्र, विनतानन्दन (गरुड) द्वारा खा लिया गया; इसी से हम दुःख से पीड़ित हैं।
श्लोक 16 (5.104.16)
पुनरेव च तेनोक्तं वैनतेयेन गच्छता । मासेनान्येन सुमुखं भक्षयिष्य इति प्रभो ॥
punareva ca tenoktaṃ vainateyena gacchatā | māsenānyena sumukhaṃ bhakṣayiṣya iti prabho
और हे प्रभो, जाते-जाते उस विनतानन्दन ने यह भी कहा था — 'अगले महीने मैं सुमुख को खाऊँगा।'
श्लोक 17 (5.104.17)
ध्रुवं तथा तद्भविता जानीमस्तस्य निश्चयम् । तेन हर्षः प्रनष्टो मे सुपर्णवचनेन वै ॥
dhruvaṃ tathā tadbhavitā jānīmastasya niścayam | tena harṣaḥ pranaṣṭo me suparṇavacanena vai
निश्चय ही ऐसा ही होगा, क्योंकि हम उसके संकल्प को जानते हैं। सुपर्ण के उसी वचन से मेरा हर्ष नष्ट हो गया है।
कण्व उवाच
श्लोक 18 (5.104.18)
मातलिस्त्वब्रवीदेनं बुद्धिरत्र कृता मया । जामातृभावेन वृतः सुमुखस्तव पुत्रजः ॥
mātalistvabravīdenaṃ buddhiratra kṛtā mayā | jāmātṛbhāvena vṛtaḥ sumukhastava putrajaḥ
किन्तु मातलि ने उनसे कहा — "इस विषय में मैंने निश्चय कर लिया है: तुम्हारे पुत्र का पुत्र सुमुख मेरे जामाता के रूप में वर लिया गया है।
मातलिरुवाच
श्लोक 19 (5.104.19)
सोऽयं मया च सहितो नारदेन च पन्नगः । त्रिलोकेशं सुरपतिं गत्वा पश्यतु वासवम् ॥
so'yaṃ mayā ca sahito nāradena ca pannagaḥ | trilokeśaṃ surapatiṃ gatvā paśyatu vāsavam
"यह नाग मेरे और नारद के साथ चलकर त्रिलोकी के स्वामी, देवराज इन्द्र के दर्शन करे।
श्लोक 20 (5.104.20)
शेषेणैवास्य कार्येण प्रज्ञास्याम्यहमायुषः । सुपर्णस्य विघाते च प्रयतिष्यामि सत्तम ॥
śeṣeṇaivāsya kāryeṇa prajñāsyāmyahamāyuṣaḥ | suparṇasya vighāte ca prayatiṣyāmi sattama
"शेष कार्य के साथ मैं इन्द्र को इसकी आयु के विषय में अवगत कराऊँगा, और हे सज्जनश्रेष्ठ, सुपर्ण को रोकने का प्रयत्न करूँगा।
श्लोक 21 (5.104.21)
सुमुखश्च मया सार्धं देवेशमभिगच्छतु । कार्यसंसाधनार्थाय स्वस्ति तेऽस्तु भुजङ्गम ॥
sumukhaśca mayā sārdhaṃ deveśamabhigacchatu | kāryasaṃsādhanārthāya svasti te'stu bhujaṅgama
"कार्य की सिद्धि के लिए सुमुख मेरे साथ देवराज के पास चले। हे नाग, तुम्हारा कल्याण हो।"
कण्व उवाच
श्लोक 22 (5.104.22)
आर्यकेणाभ्यनुज्ञाता गम्यतामिति भारत । ततस्ते सुमुखं गृह्य सर्व एव महौजसः । ददृशुः शक्रमासीनं देवराजं महाद्युतिम् ॥
āryakeṇābhyanujñātā gamyatāmiti bhārata | tataste sumukhaṃ gṛhya sarva eva mahaujasaḥ | dadṛśuḥ śakramāsīnaṃ devarājaṃ mahādyutim
हे भारत, आर्यक से 'जाओ' कहकर अनुमति पाकर वे सब महातेजस्वी सुमुख को साथ लेकर गए और उन्होंने सिंहासन पर विराजमान, परम तेजस्वी देवराज इन्द्र के दर्शन किए।
श्लोक 23 (5.104.23)
सङ्गत्या तत्र भगवान्विष्णुरासीच्चतुर्भुजः । ततस्तत्सर्वमाचख्यौ नारदो मातलिं प्रति ॥
saṅgatyā tatra bhagavānviṣṇurāsīccaturbhujaḥ | tatastatsarvamācakhyau nārado mātaliṃ prati
संयोग से चतुर्भुज भगवान् विष्णु भी वहाँ उपस्थित थे। तब नारद ने मातलि से सम्बन्धित सारा वृत्तान्त कह सुनाया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (5.104.24)
ततः पुरन्दरं विष्णुरुवाच भुवनेश्वरम् । अमृतं दीयतामस्मै क्रियताममरैः समः ॥
tataḥ purandaraṃ viṣṇuruvāca bhuvaneśvaram | amṛtaṃ dīyatāmasmai kriyatāmamaraiḥ samaḥ
तब विष्णु ने लोकेश्वर इन्द्र से कहा — "इसे अमृत दिया जाए; इसे देवताओं के समान अमर बना दिया जाए।
विष्णुरुवाच
श्लोक 25 (5.104.25)
मातलिर्नारदश्चैव सुमुखश्चैव वासव । लभन्तां भवतः कामात्काममेतं यथेप्सितम् ॥
mātalirnāradaścaiva sumukhaścaiva vāsava | labhantāṃ bhavataḥ kāmātkāmametaṃ yathepsitam
"हे इन्द्र, मातलि, नारद और सुमुख तुम्हारी कृपा से अपनी यह मनचाही कामना प्राप्त करें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (5.104.26)
पुरन्दरोऽथ संचिन्त्य वैनतेयपराक्रमम् । विष्णुमेवाब्रवीदेनं भवानेव ददात्विति ॥
purandaro'tha saṃcintya vainateyaparākramam | viṣṇumevābravīdenaṃ bhavāneva dadātviti
विनतानन्दन के पराक्रम का विचार करके इन्द्र ने विष्णु से ही कहा — "आप ही इसे दीजिए।"
विष्णुरुवाच
श्लोक 27 (5.104.27)
ईशस्त्वं सर्वलोकानां चराणामचराश्च ये । त्वया दत्तमदत्तं कः कर्तुमुत्सहते विभो ॥
īśastvaṃ sarvalokānāṃ carāṇāmacarāśca ye | tvayā dattamadattaṃ kaḥ kartumutsahate vibho
तुम सब लोकों के, चर और अचर सबके स्वामी हो। हे प्रभो, तुम्हारे दिए हुए को अनदिया करने का साहस कौन कर सकता है?
कण्व उवाच
श्लोक 28 (5.104.28)
प्रादाच्छक्रस्ततस्तस्मै पन्नगायायुरुत्तमम् । न त्वेनममृतप्राशं चकार बलवृत्रहा ॥
prādācchakrastatastasmai pannagāyāyuruttamam | na tvenamamṛtaprāśaṃ cakāra balavṛtrahā
तब इन्द्र ने उस नाग को उत्तम दीर्घ आयु प्रदान की; पर बल और वृत्र का वध करने वाले इन्द्र ने उसे अमृत नहीं पिलाया।
श्लोक 29 (5.104.29)
लब्ध्वा वरं तु सुमुखः सुमुखः संबभूव ह । कृतदारो यथाकामं जगाम च गृहान्प्रति ॥
labdhvā varaṃ tu sumukhaḥ sumukhaḥ saṃbabhūva ha | kṛtadāro yathākāmaṃ jagāma ca gṛhānprati
वरदान पाकर सुमुख सचमुच 'सुमुख' (प्रसन्न मुख वाला) हो गया; अपनी इच्छा के अनुसार विवाह करके वह घर लौट गया।
श्लोक 30 (5.104.30)
नारदस्त्वार्यकश्चैव कृतकार्यौ मुदा युतौ । अभिजग्मतुरभ्यर्च्य देवराजं महाद्युतिम् ॥
nāradastvāryakaścaiva kṛtakāryau mudā yutau | abhijagmaturabhyarcya devarājaṃ mahādyutim
नारद और आर्यक भी, अपना कार्य सिद्ध हो जाने से हर्षित होकर, परम तेजस्वी देवराज की पूजा करके चले गए।