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उद्योग पर्व · अध्याय 105

गरुड का गर्व-भंग और कण्व का दुर्योधन को शाप

इन्द्र द्वारा सुमुख को दीर्घायु दिए जाने का समाचार पाकर गरुड क्रोध में आते हैं, शिकायत करते हैं कि उनका आहार छीन लिया गया, और डींग मारते हैं कि वे इन्द्र से अधिक बलवान हैं, क्योंकि वे इन्द्र और विष्णु दोनों को ढोते हैं। विष्णु गरुड के कंधे पर अपनी एक भुजा रख देते हैं; उसके भार से कुचलकर पक्षी गिर पड़ता है, क्षमा माँगता है और क्षमा पाता है, और विष्णु सुमुख को उसकी छाती पर रख देते हैं। कण्व इससे दुर्योधन को शिक्षा देते हैं: वह तभी तक जीवित है जब तक देवताओं से उत्पन्न पाण्डवों से उसका सामना नहीं होता, अतः उसे श्रीकृष्ण के द्वारा सन्धि कर लेनी चाहिए। दुर्योधन हँसकर अपनी जाँघ ठोकता है और कहता है कि वह वैसा ही करेगा जैसा विधाता ने उसे बनाया है; अन्तिम श्लोक में क्रुद्ध कण्व जाँघ पर ही उसकी मृत्यु की भविष्यवाणी करते हैं।

अध्याय 104अध्याय-सूचीअध्याय 106

कण्व उवाच

श्लोक 1 (5.105.1)

गरुडस्तत्र शुश्राव यथावृत्तं महाबलः । आयुःप्रदानं शक्रेण कृतं नागस्य भारत ॥

garuḍastatra śuśrāva yathāvṛttaṃ mahābalaḥ | āyuḥpradānaṃ śakreṇa kṛtaṃ nāgasya bhārata

हे भारत, महाबली गरुड ने वहाँ जो कुछ हुआ था वह सब सुना — इन्द्र द्वारा उस नाग को आयु का दान।

श्लोक 2 (5.105.2)

पक्षवातेन महता रुद्ध्वा त्रिभुवनं खगः । सुपर्णः परमक्रुद्धो वासवं समुपाद्रवत् ॥

pakṣavātena mahatā ruddhvā tribhuvanaṃ khagaḥ | suparṇaḥ paramakruddho vāsavaṃ samupādravat

अपने पंखों की प्रचण्ड वायु से तीनों लोकों को रोकते हुए पक्षी सुपर्ण अत्यन्त क्रोध में भरकर इन्द्र पर टूट पड़े।

गरुड उवाच

श्लोक 3 (5.105.3)

भगवन्किमवज्ञानाद्वृत्तिः प्रतिहता मम । कामकारवरं दत्त्वा पुनश्चलितवानसि ॥

bhagavankimavajñānādvṛttiḥ pratihatā mama | kāmakāravaraṃ dattvā punaścalitavānasi

भगवन्, आपने मेरी अवहेलना करके मेरी जीविका क्यों छीन ली? मुझे इच्छानुसार आचरण का वर देकर अब आप उससे पीछे हट गए हैं।

श्लोक 4 (5.105.4)

निसर्गात्सर्वभूतानां सर्वभूतेश्वरेण मे । आहारो विहितो धात्रा किमर्थं वार्यते त्वया ॥

nisargātsarvabhūtānāṃ sarvabhūteśvareṇa me | āhāro vihito dhātrā kimarthaṃ vāryate tvayā

सृष्टि के आरम्भ से ही सब प्राणियों के स्वामी विधाता ने सब प्राणियों में से मेरा आहार निश्चित किया है; आप उसे क्यों रोकते हैं?

श्लोक 5 (5.105.5)

वृतश्चैष महानागः स्थापितः समयश्च मे । अनेन च मया देव भर्तव्यः प्रसवो महान् ॥

vṛtaścaiṣa mahānāgaḥ sthāpitaḥ samayaśca me | anena ca mayā deva bhartavyaḥ prasavo mahān

मैंने इस महानाग को चुन लिया था और इसका समय भी निश्चित कर दिया था; हे देव, इसी से मुझे अपनी बड़ी सन्तान का पालन करना था।

श्लोक 6 (5.105.6)

एतस्मिंस्तु तथाभूते नान्यं हिंसितुमुत्सहे । क्रीडसे कामकारेण देवराज यथेच्छकम् ॥

etasmiṃstu tathābhūte nānyaṃ hiṃsitumutsahe | krīḍase kāmakāreṇa devarāja yathecchakam

अब जब ऐसा हो गया है, तो मैं किसी और की हिंसा करने का साहस नहीं कर सकता। हे देवराज, आप मनमाने ढंग से, जैसा चाहते हैं वैसा खेल करते हैं।

श्लोक 7 (5.105.7)

सोऽहं प्राणान्विमोक्ष्यामि तथा परिजनो मम । ये च भृत्या मम गृहे प्रीतिमान्भव वासव ॥

so'haṃ prāṇānvimokṣyāmi tathā parijano mama | ye ca bhṛtyā mama gṛhe prītimānbhava vāsava

इसलिए मैं अपने प्राण त्याग दूँगा, और मेरा परिवार तथा मेरे घर के सेवक भी। हे इन्द्र, आप प्रसन्न रहिए!

कण्व उवाच

श्लोक 8 (5.105.8)

श्रुत्वा सुपर्णवचनं सुमुखो दुर्मुखस्तदा । त्यक्त्वा रूपं विवर्णस्तु सर्परूपधरोऽभवत् । गत्वा विष्णुसमीपं तु पादपीठं समाश्लिषत् ॥

śrutvā suparṇavacanaṃ sumukho durmukhastadā | tyaktvā rūpaṃ vivarṇastu sarparūpadharo'bhavat | gatvā viṣṇusamīpaṃ tu pādapīṭhaṃ samāśliṣat

सुपर्ण के वचन सुनकर सुमुख का मुख उतर गया; वह अपना रूप छोड़कर, विवर्ण होकर सर्प के रूप में आ गया और विष्णु के पास जाकर उनकी पादपीठ से लिपट गया।

इन्द्र उवाच

श्लोक 9 (5.105.9)

न मत्कृतं वैनतेय न मां क्रोद्धुं त्वमर्हसि ॥

na matkṛtaṃ vainateya na māṃ kroddhuṃ tvamarhasi

हे विनतानन्दन, यह मैंने नहीं किया; तुम्हें मुझ पर क्रोध नहीं करना चाहिए।

कण्व उवाच

श्लोक 10 (5.105.10)

दत्ताभयः स सुमुखो विष्णुना प्रभविष्णुना । श्रुत्वा पुरन्दरेणोक्तमुवाच विनतासुतः ॥

dattābhayaḥ sa sumukho viṣṇunā prabhaviṣṇunā | śrutvā purandareṇoktamuvāca vinatāsutaḥ

सर्वसमर्थ विष्णु ने सुमुख को अभय दे दिया। इन्द्र की कही बात सुनकर विनतानन्दन बोले —

गरुड उवाच

श्लोक 11 (5.105.11)

एतच्चैवाहमर्हामि भूयश्च बलवृत्रहन् । त्रैलोक्यस्येश्वरो योऽहं परभृत्यत्वमागतः ॥

etaccaivāhamarhāmi bhūyaśca balavṛtrahan | trailokyasyeśvaro yo'haṃ parabhṛtyatvamāgataḥ

हे बल और वृत्र के संहारक, मैं इसी के योग्य हूँ, बल्कि इससे भी अधिक के — मैं, जो तीनों लोकों का स्वामी हो सकता था, दूसरे का सेवक बन गया हूँ।

श्लोक 12 (5.105.12)

त्वयि तिष्ठति देवेश न विष्णुः कारणं मम । त्रैलोक्यराजराज्यं हि त्वयि वासव शाश्वतम् ॥

tvayi tiṣṭhati deveśa na viṣṇuḥ kāraṇaṃ mama | trailokyarājarājyaṃ hi tvayi vāsava śāśvatam

हे देवेश, आपके रहते मेरी इस दशा का कारण विष्णु नहीं हैं; क्योंकि हे इन्द्र, त्रिलोकी के राजाओं पर राज्य सदा आपमें ही स्थित है।

श्लोक 13 (5.105.13)

ममापि दक्षस्य सुता जननी कश्यपः पिता । अहमत्युत्सहे लोकान्समन्ताद्वोढुमोजसा ॥

mamāpi dakṣasya sutā jananī kaśyapaḥ pitā | ahamatyutsahe lokānsamantādvoḍhumojasā

मेरी माता भी दक्ष की पुत्री हैं और कश्यप मेरे पिता हैं। मैं भी अपने बल से सब लोकों को चारों ओर से उठा ले जाने में पूरी तरह समर्थ हूँ।

श्लोक 14 (5.105.14)

असह्यं सर्वभूतानां ममापि विपुलं बलम् । मयाऽपि सुमहत्कर्म कृतं दैतेयविग्रहे ॥

asahyaṃ sarvabhūtānāṃ mamāpi vipulaṃ balam | mayā'pi sumahatkarma kṛtaṃ daiteyavigrahe

मेरा बल भी विशाल है, जिसे कोई प्राणी सह नहीं सकता; मैंने भी दैत्यों के साथ युद्ध में बड़े-बड़े कर्म किए हैं।

श्लोक 15 (5.105.15)

श्रुतश्रीः श्रुतसेनश्च विवस्वान्रोचनामुखः । प्रस्रुतः कालकाक्षश्च मयाऽपि दितिजा हताः ॥

śrutaśrīḥ śrutasenaśca vivasvānrocanāmukhaḥ | prasrutaḥ kālakākṣaśca mayā'pi ditijā hatāḥ

श्रुतश्री, श्रुतसेन, विवस्वान्, रोचनामुख, प्रस्रुत और कालकाक्ष — इन दिति-पुत्रों को मैंने भी मारा है।

श्लोक 16 (5.105.16)

यत्तु ध्वजस्थानगतो यत्नात्परिचराम्यहम् । वहामि चैवानुजं ते तेन मामवमन्यसे ॥

yattu dhvajasthānagato yatnātparicarāmyaham | vahāmi caivānujaṃ te tena māmavamanyase

पर क्योंकि मैं ध्वजा पर बैठकर यत्नपूर्वक सेवा करता हूँ और आपके छोटे भाई (विष्णु) को ढोता हूँ, इसीलिए आप मेरा तिरस्कार करते हैं।

श्लोक 17 (5.105.17)

कोऽन्यो भारसहो ह्यस्ति कोऽन्योस्ति बलवत्तरः । मया योऽहं विशिष्टः सन्वहामीमं सबान्धवम् ॥

ko'nyo bhārasaho hyasti ko'nyosti balavattaraḥ | mayā yo'haṃ viśiṣṭaḥ sanvahāmīmaṃ sabāndhavam

ऐसा भार उठाने वाला और कौन है? मुझसे अधिक बलवान और कौन है? श्रेष्ठ होते हुए भी मैं इन्हें इनके बन्धुओं सहित ढोता हूँ।

श्लोक 18 (5.105.18)

अवज्ञाय तु यत्तेऽहं भोजनाद्व्यपरोपितः । तेन मे गौरवं नष्टं त्वत्तश्चास्माच्च वासव ॥

avajñāya tu yatte'haṃ bhojanādvyaparopitaḥ | tena me gauravaṃ naṣṭaṃ tvattaścāsmācca vāsava

आपने मेरी अवहेलना करके मुझे मेरे भोजन से वंचित कर दिया है; इससे हे इन्द्र, आपके और इनके कारण मेरा गौरव नष्ट हो गया है।

श्लोक 19 (5.105.19)

अदित्यां य इमे जाता बलविक्रमशालिनः । त्वमेषां किल सर्वेषां बलेन बलवत्तरः ॥

adityāṃ ya ime jātā balavikramaśālinaḥ | tvameṣāṃ kila sarveṣāṃ balena balavattaraḥ

अदिति से जो बल और पराक्रम से सम्पन्न पुत्र उत्पन्न हुए हैं, उन सबमें आप बल में सबसे बढ़कर कहे जाते हैं।

श्लोक 20 (5.105.20)

सोऽहं पक्षैकदेशेन वहामि त्वां गतक्लमः । विमृश त्वं शनैस्तात कोऽन्वत्र बलवानिति ॥

so'haṃ pakṣaikadeśena vahāmi tvāṃ gataklamaḥ | vimṛśa tvaṃ śanaistāta ko'nvatra balavāniti

फिर भी मैं आपको अपने पंख के एक भाग पर बिना थके ढोता हूँ। हे तात, शान्ति से विचार कीजिए कि यहाँ बलवान कौन है।

कण्व उवाच

श्लोक 21 (5.105.21)

स तस्य वचनं श्रुत्वा खगस्योदर्कदारुणम् । अक्षोभ्यं क्षोभयंस्तार्क्ष्यमुवाच रथचक्रभृत् ॥

sa tasya vacanaṃ śrutvā khagasyodarkadāruṇam | akṣobhyaṃ kṣobhayaṃstārkṣyamuvāca rathacakrabhṛt

पक्षी के ये भयंकर परिणाम वाले वचन सुनकर चक्रधारी (विष्णु) ने अडिग गरुड को विचलित करते हुए कहा —

विष्णुरुवाच

श्लोक 22 (5.105.22)

गरुत्मन्मन्यसेऽऽत्मानं बलवन्तं सुदुर्बलम् । अलमस्मत्समक्षं ते स्तोतुमात्मानमण्डज ॥

garutmanmanyase''tmānaṃ balavantaṃ sudurbalam | alamasmatsamakṣaṃ te stotumātmānamaṇḍaja

हे गरुत्मान्, अत्यन्त दुर्बल होकर भी तुम अपने को बलवान मानते हो। हे अण्डज, मेरे सामने अपनी प्रशंसा करना बन्द करो।

श्लोक 23 (5.105.23)

त्रैलोक्यमपि मे कृत्स्नमशक्तं देहधारणे । अहमेवात्मनात्मानं वहामि त्वां च धारये ॥

trailokyamapi me kṛtsnamaśaktaṃ dehadhāraṇe | ahamevātmanātmānaṃ vahāmi tvāṃ ca dhāraye

सारी त्रिलोकी भी मेरे शरीर को धारण करने में असमर्थ है। मैं स्वयं ही अपने को ढोता हूँ, और तुम्हें भी मैं ही धारण करता हूँ।

श्लोक 24 (5.105.24)

न त्वं वहसि मां दोर्भ्यां मोघं तव विकत्थनम् । इमं तावन्ममैकं त्वं बाहुं सव्येतरं वह । यद्येनं धारयस्येकं सफलं ते विकत्थितम् ॥

na tvaṃ vahasi māṃ dorbhyāṃ moghaṃ tava vikatthanam | imaṃ tāvanmamaikaṃ tvaṃ bāhuṃ savyetaraṃ vaha | yadyenaṃ dhārayasyekaṃ saphalaṃ te vikatthitam

तुम मुझे अपनी भुजाओं पर नहीं ढोते; तुम्हारी डींग व्यर्थ है। ज़रा मेरी यह एक दाहिनी भुजा उठाकर देखो। यदि तुम इसे अकेले धारण कर सको, तो तुम्हारी डींग सार्थक होगी।

कण्व उवाच

श्लोक 25 (5.105.25)

इत्युक्त्वा भगवांस्तस्य स्कन्धे बाहुं समासजत् । आरोपितं समुद्वोढुं भारं तं नाशकद्बलात् । निपपात स भारार्तो विह्वलो नष्टचेतनः ॥

ityuktvā bhagavāṃstasya skandhe bāhuṃ samāsajat | āropitaṃ samudvoḍhuṃ bhāraṃ taṃ nāśakadbalāt | nipapāta sa bhārārto vihvalo naṣṭacetanaḥ

यह कहकर भगवान् ने गरुड के कंधे पर अपनी भुजा रख दी। रखे गए उस भार को गरुड अपने बल से भी न उठा सके; भार से पीड़ित होकर वे व्याकुल और अचेत होकर गिर पड़े।

श्लोक 26 (5.105.26)

यावान्हि भारः कृत्स्नायाः पृथिव्याः पर्वतैः सह । एकस्या देहशाखायास्तावद्भारममन्यत ॥

yāvānhi bhāraḥ kṛtsnāyāḥ pṛthivyāḥ parvataiḥ saha | ekasyā dehaśākhāyāstāvadbhāramamanyata

पर्वतों सहित सारी पृथ्वी का जितना भार है, उतना ही भार उन्हें उस एक अंग का लगा।

श्लोक 27 (5.105.27)

न त्वेनं पीडयामास बलेन बलवत्तरः । ततो हि जीवितं तस्य न व्यनीनशदच्युतः ॥

na tvenaṃ pīḍayāmāsa balena balavattaraḥ | tato hi jīvitaṃ tasya na vyanīnaśadacyutaḥ

फिर भी उस अधिक बलवान ने अपने बल से उन्हें पीसा नहीं; इसीलिए अच्युत ने उनके प्राण नहीं लिए।

श्लोक 28 (5.105.28)

व्यात्तास्यः स्रस्तकायश्च विचेता विह्वलः खगः । मुमोच पत्राणि तदा गुरुभारप्रपीडितः ॥

vyāttāsyaḥ srastakāyaśca vicetā vihvalaḥ khagaḥ | mumoca patrāṇi tadā gurubhāraprapīḍitaḥ

चोंच फैलाए, शिथिल शरीर वाले, अचेत और व्याकुल उस पक्षी ने भारी भार से पीड़ित होकर अपने पंख गिरा दिए।

श्लोक 29 (5.105.29)

स विष्णुं शिरसा पक्षी प्रणम्य विनतासुतः । विचेता विह्वलो दीनः किंचिद्वचनमब्रवीत् ॥

sa viṣṇuṃ śirasā pakṣī praṇamya vinatāsutaḥ | vicetā vihvalo dīnaḥ kiṃcidvacanamabravīt

विनतानन्दन उस पक्षी ने सिर झुकाकर विष्णु को प्रणाम किया और अचेत-से, व्याकुल और दीन होकर कुछ शब्द कहे —

गरुड उवाच

श्लोक 30 (5.105.30)

भगवँल्लोकसारस्य सदृशेन वपुष्मता । भुजेन स्वैरमुक्तेन निष्पिष्टोऽस्मि महीतले ॥

bhagavam̐llokasārasya sadṛśena vapuṣmatā | bhujena svairamuktena niṣpiṣṭo'smi mahītale

भगवन्, संसार के सार के समान आपकी विशाल भुजा ने, जिसे आपने सहज ही छोड़ दिया, मुझे धरती पर पीस डाला है।

श्लोक 31 (5.105.31)

क्षन्तुमर्हसि मे देव विह्वलस्याल्पचेतसः । बलदाहविदग्धस्य पक्षिणो ध्वजवासिनः ॥

kṣantumarhasi me deva vihvalasyālpacetasaḥ | baladāhavidagdhasya pakṣiṇo dhvajavāsinaḥ

हे देव, मुझ व्याकुल और अल्पबुद्धि को क्षमा कीजिए — आपकी ध्वजा पर रहने वाले उस पक्षी को, जो आपके बल की आग से झुलस गया है।

श्लोक 32 (5.105.32)

न हि ज्ञातं बलं देव मया ते परम विभो । तेन मन्याम्यहं वीर्यमात्मनो न समं परैः ॥

na hi jñātaṃ balaṃ deva mayā te parama vibho | tena manyāmyahaṃ vīryamātmano na samaṃ paraiḥ

हे देव, हे परम प्रभो, मैं आपके परम बल को नहीं जानता था; इसीलिए मैं अपने पराक्रम को दूसरों से अनुपम मानता था।

कण्व उवाच

श्लोक 33 (5.105.33)

ततश्चक्रे स भगवान्प्रसादं वै गरुत्मतः । मैवं भूय इति स्नेहात्तदा चैनमुवाच ह ॥

tataścakre sa bhagavānprasādaṃ vai garutmataḥ | maivaṃ bhūya iti snehāttadā cainamuvāca ha

तब भगवान् ने गरुत्मान् पर कृपा की और स्नेहपूर्वक उनसे कहा — "फिर ऐसा मत करना।"

श्लोक 34 (5.105.34)

पादाङ्गुष्ठेन चिक्षेप सुमुखं गरुडोरसि । ततः प्रभृति राजेन्द्र सहसर्पेण वर्तते ॥

pādāṅguṣṭhena cikṣepa sumukhaṃ garuḍorasi | tataḥ prabhṛti rājendra sahasarpeṇa vartate

उन्होंने अपने पैर के अँगूठे से सुमुख को गरुड की छाती पर डाल दिया; हे राजेन्द्र, तभी से गरुड उस सर्प के साथ रहते हैं।

श्लोक 35 (5.105.35)

एवं विष्णुबलाक्रान्तो गर्वनाशमुपागतः । गरुडो बलवान्राजन्वैनतेयो महायशाः ॥

evaṃ viṣṇubalākrānto garvanāśamupāgataḥ | garuḍo balavānrājanvainateyo mahāyaśāḥ

हे राजन्, इस प्रकार विष्णु के बल से दबकर महाबली, महायशस्वी विनतानन्दन गरुड का गर्व नष्ट हो गया।

श्लोक 36 (5.105.36)

तथा त्वमपि गान्धारे यावत्पाण्डुसुतान्रणे । नासादयसि तान्वीरांस्तावज्जीवसि पुत्रक ॥

tathā tvamapi gāndhāre yāvatpāṇḍusutānraṇe | nāsādayasi tānvīrāṃstāvajjīvasi putraka

इसी प्रकार हे गान्धारीनन्दन, वत्स, तुम भी तभी तक जीवित हो जब तक युद्ध में उन वीर पाण्डुपुत्रों से तुम्हारा सामना नहीं होता।

श्लोक 37 (5.105.37)

भीमः प्रहरतां श्रेष्ठो वायुपुत्रो महाबलः । धनञ्जयश्चेन्द्रसुतो न हन्यातां तु कं रणे ॥

bhīmaḥ praharatāṃ śreṣṭho vāyuputro mahābalaḥ | dhanañjayaścendrasuto na hanyātāṃ tu kaṃ raṇe

योद्धाओं में श्रेष्ठ, महाबली वायुपुत्र भीम और इन्द्रपुत्र धनंजय — ये दोनों युद्ध में किसे नहीं मार डालेंगे?

श्लोक 38 (5.105.38)

विष्णुर्वायुश्च शक्रश्च धर्मस्तौ चाश्विनावुभौ । एते देवास्त्वया केन हेतुना वीक्षितुं क्षमाः ॥

viṣṇurvāyuśca śakraśca dharmastau cāśvināvubhau | ete devāstvayā kena hetunā vīkṣituṃ kṣamāḥ

विष्णु, वायु, इन्द्र, धर्म और दोनों अश्विनीकुमार — इन देवताओं की ओर तुम किस बल पर आँख उठाकर देख भी सकते हो?

श्लोक 39 (5.105.39)

तदलं ते विरोधेन शमं गच्छ नृपात्मज । वासुदेवेन तीर्थेन कुलं रक्षितुमर्हसि ॥

tadalaṃ te virodhena śamaṃ gaccha nṛpātmaja | vāsudevena tīrthena kulaṃ rakṣitumarhasi

इसलिए हे राजकुमार, यह विरोध छोड़ो और सन्धि कर लो। वासुदेव को अपना सहारा बनाकर तुम्हें अपने कुल की रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 40 (5.105.40)

प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य नारदोऽयं महातपाः । माहात्म्यस्य तदा विष्णोः सोऽयं चक्रगदाधरः ॥

pratyakṣadarśī sarvasya nārado'yaṃ mahātapāḥ | māhātmyasya tadā viṣṇoḥ so'yaṃ cakragadādharaḥ

इस सबके, विष्णु की उस समय की महिमा के, ये महातपस्वी नारद प्रत्यक्षदर्शी हैं; और वही विष्णु ये चक्र और गदा धारण करने वाले (श्रीकृष्ण) हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 41 (5.105.41)

दुर्योधनस्तु तच्छ्रुत्वा निश्वसन्भृकुटीमुखः । राधेयमभिसंप्रेक्ष्य जहास स्वनवत्तदा ॥

duryodhanastu tacchrutvā niśvasanbhṛkuṭīmukhaḥ | rādheyamabhisaṃprekṣya jahāsa svanavattadā

यह सुनकर दुर्योधन ने लम्बी साँस ली और भौंहें तान लीं; फिर राधानन्दन (कर्ण) की ओर देखकर वह ठहाका मारकर हँसा।

श्लोक 42 (5.105.42)

कदर्थीकृत्य तद्वाक्यमृषेः कण्वस्य दुर्मतिः । ऊरुं गजकराकारं ताडयन्निदमब्रवीत् ॥

kadarthīkṛtya tadvākyamṛṣeḥ kaṇvasya durmatiḥ | ūruṃ gajakarākāraṃ tāḍayannidamabravīt

ऋषि कण्व के उस वचन की उपेक्षा करके उस दुर्बुद्धि ने हाथी की सूँड़ जैसी अपनी जाँघ ठोंकी और यह कहा —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 43 (5.105.43)

यथैवेश्वरसृष्टोऽस्मि यद्भावि या च मे गतिः । तथा महर्षे वर्तामि किं प्रलापः करिष्यति ॥

yathaiveśvarasṛṣṭo'smi yadbhāvi yā ca me gatiḥ | tathā maharṣe vartāmi kiṃ pralāpaḥ kariṣyati

हे महर्षि, ईश्वर ने मुझे जैसा बनाया है, जो होना है और जो मेरी गति है, उसी के अनुसार मैं आचरण करता हूँ। यह प्रलाप क्या कर लेगा?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 44 (5.105.44)

ततः कण्वोऽब्रवीत्क्रुद्धो दुर्योधनमपण्डितम् । यस्मादूरुं ताडयसि ऊरौ मृत्युर्भविष्यति ॥

tataḥ kaṇvo'bravītkruddho duryodhanamapaṇḍitam | yasmādūruṃ tāḍayasi ūrau mṛtyurbhaviṣyati

तब क्रुद्ध कण्व ने मूर्ख दुर्योधन से कहा — "क्योंकि तुम अपनी जाँघ ठोंकते हो, इसलिए जाँघ पर ही तुम्हारी मृत्यु होगी।"

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