उद्योग पर्व · अध्याय 106
गालव का गुरुदक्षिणा के लिए हठ
जनमेजय पूछते हैं कि विनाश के मार्ग पर चलते दुर्योधन को किसी बन्धु या मित्र ने क्यों नहीं रोका; वैशम्पायन बताते हैं कि नारद ने भी उसे समझाया था। नारद दुर्योधन को हठ से सावधान करते हुए गालव की कथा आरम्भ करते हैं — वसिष्ठ के वेष में धर्म विश्वामित्र की परीक्षा लेते हैं, विश्वामित्र सौ वर्ष तक भोजन सिर पर थामे खड़े रहते हैं, शिष्य गालव उनकी सेवा करता है, और अन्त में विश्वामित्र ब्राह्मणत्व पाते हैं। प्रसन्न गुरु गालव को जाने की आज्ञा देते हैं, पर गालव दक्षिणा के लिए बार-बार हठ करता है, तो विश्वामित्र खीझकर एक ओर श्याम कान वाले चन्द्रमा-से श्वेत आठ सौ घोड़े माँग लेते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (5.106.1)
अनर्थे जातनिर्बन्धं परार्थे लोभमोहितम् । अनार्यकेष्वभिरतं मरणे कृतनिश्चयम् ॥
anarthe jātanirbandhaṃ parārthe lobhamohitam | anāryakeṣvabhirataṃ maraṇe kṛtaniścayam
जो अनर्थ में हठपूर्वक लगा है, पराए धन के लोभ से मोहित है, नीच लोगों के संग में रमा रहता है और मृत्यु का निश्चय कर चुका है;
श्लोक 2 (5.106.2)
ज्ञातीनां दुःखकर्तारं बन्धूनां शोकवर्धनम् । सुहृदां क्लेशदातारं द्विषतां हर्षवर्धनम् ॥
jñātīnāṃ duḥkhakartāraṃ bandhūnāṃ śokavardhanam | suhṛdāṃ kleśadātāraṃ dviṣatāṃ harṣavardhanam
जो अपने कुटुम्बियों को दुःख देता है, सम्बन्धियों का शोक बढ़ाता है, मित्रों को क्लेश पहुँचाता है और शत्रुओं का हर्ष बढ़ाता है —
श्लोक 3 (5.106.3)
कथं नैनं विमार्गस्थं वारयन्तीह बान्धवाः । सौहृदाद्वा सुहृत्स्निग्धो भगवान्वा पितामहः ॥
kathaṃ nainaṃ vimārgasthaṃ vārayantīha bāndhavāḥ | sauhṛdādvā suhṛtsnigdho bhagavānvā pitāmahaḥ
ऐसे कुमार्ग पर चलते हुए उसे उसके बान्धव क्यों नहीं रोकते? कोई स्नेही मित्र मैत्री के नाते, या पूज्य पितामह ही उसे क्यों नहीं रोकते?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (5.106.4)
उक्तं भगवता वाक्यमुक्तं भीष्मेण यत्क्षमम् । उक्तं बहुविधं चैव नारदेनापि तच्छृणु ॥
uktaṃ bhagavatā vākyamuktaṃ bhīṣmeṇa yatkṣamam | uktaṃ bahuvidhaṃ caiva nāradenāpi tacchṛṇu
भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी बात कही, और भीष्म ने भी जो उचित था वह कहा। नारद ने भी अनेक प्रकार से विस्तारपूर्वक उसे समझाया; वह सुनो।
नारद उवाच
श्लोक 5 (5.106.5)
दुर्लभो वै सुहृच्छ्रोता दुर्लभश्च हितः सुहृत् । तिष्ठते हि सुहृद्यत्र न बन्धुस्तत्र तिष्ठते ॥
durlabho vai suhṛcchrotā durlabhaśca hitaḥ suhṛt | tiṣṭhate hi suhṛdyatra na bandhustatra tiṣṭhate
बात सुनने वाला मित्र दुर्लभ है, और हित चाहने वाला मित्र भी दुर्लभ है। क्योंकि जहाँ सच्चा मित्र साथ खड़ा रहता है, वहाँ सगे-सम्बन्धी नहीं टिकते।
श्लोक 6 (5.106.6)
श्रोतव्यमपि पश्यामि सुहृदां कुरुनन्दन । न कर्तव्यश्च निर्बन्धो निर्बन्धो हि सुदारुणः ॥
śrotavyamapi paśyāmi suhṛdāṃ kurunandana | na kartavyaśca nirbandho nirbandho hi sudāruṇaḥ
हे कुरुनन्दन, मेरी दृष्टि में मित्रों की बात अवश्य सुननी चाहिए। हठ नहीं करना चाहिए, क्योंकि हठ अत्यन्त भयंकर होता है।
श्लोक 7 (5.106.7)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । यथा निर्बन्धतः प्राप्तो गालवेन पराजयः ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | yathā nirbandhataḥ prāpto gālavena parājayaḥ
इस विषय में एक प्राचीन इतिहास सुनाया जाता है — कि किस प्रकार हठ के कारण गालव को पराजय झेलनी पड़ी।
श्लोक 8 (5.106.8)
विश्वामित्रं तपस्यन्तं धर्मो जिज्ञासया पुरा । अभ्यगच्छत्स्वयं भूत्वा वसिष्ठो भगवानृषिः ॥
viśvāmitraṃ tapasyantaṃ dharmo jijñāsayā purā | abhyagacchatsvayaṃ bhūtvā vasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ
प्राचीन काल में जब विश्वामित्र तप कर रहे थे, तब उनकी परीक्षा लेने के लिए स्वयं धर्म भगवान् वसिष्ठ ऋषि बनकर उनके पास आए।
श्लोक 9 (5.106.9)
सप्तर्षीणामन्यतमं वेषमास्थाय भारत । बुभुक्षुः क्षुधितो राजन्नाश्रमं कौशिकस्य तु ॥
saptarṣīṇāmanyatamaṃ veṣamāsthāya bhārata | bubhukṣuḥ kṣudhito rājannāśramaṃ kauśikasya tu
हे भारत, सप्तर्षियों में से एक का वेष धारण कर, भूखे और भोजन की इच्छा लिए, हे राजन्, वे कौशिक (विश्वामित्र) के आश्रम में पहुँचे।
श्लोक 10 (5.106.10)
विश्वामित्रोऽथ संभ्रान्तः श्रपयामास वै चरुम् । परमान्नस्य यत्नेन न च तं प्रत्यपालयत् ॥
viśvāmitro'tha saṃbhrāntaḥ śrapayāmāsa vai carum | paramānnasya yatnena na ca taṃ pratyapālayat
विश्वामित्र ने हड़बड़ाकर बड़े यत्न से उत्तम अन्न का चरु पकाना आरम्भ किया; किन्तु अतिथि ने उनकी प्रतीक्षा नहीं की।
श्लोक 11 (5.106.11)
अन्नं तेन यदा भुक्तमन्यैर्दत्तं तपस्विभिः । अथ गृह्यान्नमत्युष्णं विश्वामित्रोऽप्युपागमत् ॥
annaṃ tena yadā bhuktamanyairdattaṃ tapasvibhiḥ | atha gṛhyānnamatyuṣṇaṃ viśvāmitro'pyupāgamat
जब वे अन्य तपस्वियों का दिया हुआ अन्न खा चुके, तब विश्वामित्र भी अत्यन्त गरम भोजन लेकर उनके पास पहुँचे।
श्लोक 12 (5.106.12)
भुक्तं मे तिष्ठ तावत्त्वमित्युक्त्वा भगवान्ययौ । विश्वामित्रस्ततो राजन्स्थित एव महाद्युतिः ॥
bhuktaṃ me tiṣṭha tāvattvamityuktvā bhagavānyayau | viśvāmitrastato rājansthita eva mahādyutiḥ
"मैं भोजन कर चुका हूँ; तुम तब तक यहीं ठहरो" — यह कहकर भगवान् चले गए। हे राजन्, तब महातेजस्वी विश्वामित्र वहीं खड़े रह गए,
श्लोक 13 (5.106.13)
भक्तं प्रगृह्य मूर्ध्ना वै बाहुभ्यां संशितव्रतः । स्थितः स्थाणुरिवाभ्याशे निश्चेष्टो मारुताशनः ॥
bhaktaṃ pragṛhya mūrdhnā vai bāhubhyāṃ saṃśitavrataḥ | sthitaḥ sthāṇurivābhyāśe niśceṣṭo mārutāśanaḥ
कठोर व्रत वाले वे दोनों भुजाओं से भोजन को सिर पर थामे, आश्रम के पास खूँटे की तरह निश्चल खड़े रहे, केवल वायु पीकर।
श्लोक 14 (5.106.14)
तस्य शुश्रूषणे यत्नमकरोद्गालवो मुनिः । गौरवाद्बहुमानाच्च हार्देन प्रियकाम्यया ॥
tasya śuśrūṣaṇe yatnamakarodgālavo muniḥ | gauravādbahumānācca hārdena priyakāmyayā
मुनि गालव ने आदर, सम्मान और हार्दिक प्रेम से, उन्हें प्रसन्न करने की इच्छा से, उनकी सेवा में बड़ा यत्न किया।
श्लोक 15 (5.106.15)
अथ वर्षशते पूर्णे धर्मः पुनरुपागमत् । वासिष्ठं वेषमास्थाय कौशिकं भोजनेप्सया ॥
atha varṣaśate pūrṇe dharmaḥ punarupāgamat | vāsiṣṭhaṃ veṣamāsthāya kauśikaṃ bhojanepsayā
फिर पूरे सौ वर्ष बीतने पर धर्म पुनः वसिष्ठ का वेष धारण कर भोजन की इच्छा से कौशिक के पास आए।
श्लोक 16 (5.106.16)
स दृष्ट्वा शिरसा भक्तं ध्रियमाणं महर्षिणा । तिष्ठता वायुभक्षेण विश्वामित्रेण धीमता ॥
sa dṛṣṭvā śirasā bhaktaṃ dhriyamāṇaṃ maharṣiṇā | tiṣṭhatā vāyubhakṣeṇa viśvāmitreṇa dhīmatā
उन्होंने देखा कि बुद्धिमान महर्षि विश्वामित्र केवल वायु पर रहते हुए खड़े हैं और भोजन को सिर पर धारण किए हुए हैं।
श्लोक 17 (5.106.17)
प्रतिगृह्य ततो धर्मस्तथैवोष्णं तथा नवम् । भुक्त्वा प्रीतोऽस्मि विप्रर्षे तमुक्त्वा स मुनिर्गतः ॥
pratigṛhya tato dharmastathaivoṣṇaṃ tathā navam | bhuktvā prīto'smi viprarṣe tamuktvā sa munirgataḥ
तब धर्म ने वह भोजन, जो पहले की तरह ही गरम और ताज़ा था, लेकर खाया और कहा, "हे विप्रर्षि, मैं प्रसन्न हूँ।" यह कहकर वे मुनि चले गए।
श्लोक 18 (5.106.18)
क्षत्रभावादपगतो ब्राह्मणत्वमुपागतः । धर्मस्य वचनात्प्रीतो विश्वामित्रस्तथाऽभवत् ॥
kṣatrabhāvādapagato brāhmaṇatvamupāgataḥ | dharmasya vacanātprīto viśvāmitrastathā'bhavat
धर्म के वचन से विश्वामित्र क्षत्रियभाव से मुक्त होकर ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए, और वे प्रसन्न हो गए।
श्लोक 19 (5.106.19)
विश्वामित्रस्तु शिष्यस्य गालवस्य तपस्विनः । शुश्रूषया च भक्त्या च प्रीतिमानित्युवाच ह ॥
viśvāmitrastu śiṣyasya gālavasya tapasvinaḥ | śuśrūṣayā ca bhaktyā ca prītimānityuvāca ha
तब अपने शिष्य तपस्वी गालव की सेवा और भक्ति से प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने कहा —
श्लोक 20 (5.106.20)
अनुज्ञातो मया वत्स यथेष्टं गच्छ गालव । इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं गालवो मुनिसत्तमम् ॥
anujñāto mayā vatsa yatheṣṭaṃ gaccha gālava | ityuktaḥ pratyuvācedaṃ gālavo munisattamam
"वत्स गालव, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ; जहाँ चाहो जाओ।" ऐसा कहे जाने पर गालव ने उन मुनिश्रेष्ठ को उत्तर दिया।
श्लोक 21 (5.106.21)
प्रीतो मधुरया वाचा विश्वामित्रं महाद्युतिम् । दक्षिणाः काः प्रयच्छामि भवते गुरुकर्मणि ॥
prīto madhurayā vācā viśvāmitraṃ mahādyutim | dakṣiṇāḥ kāḥ prayacchāmi bhavate gurukarmaṇi
प्रसन्न होकर उन्होंने मधुर वाणी में महातेजस्वी विश्वामित्र से कहा — "गुरु के रूप में आपने जो किया, उसके लिए मैं आपको कौन-सी दक्षिणा दूँ?
गालव उवाच
श्लोक 22 (5.106.22)
दक्षिणाभिरुपेतं हि कर्म सिद्ध्यति मानद । दक्षिणानां हि दाता वै अपवर्गेण युज्यते ॥
dakṣiṇābhirupetaṃ hi karma siddhyati mānada | dakṣiṇānāṃ hi dātā vai apavargeṇa yujyate
हे मानद, दक्षिणा से युक्त होने पर ही कर्म सिद्ध होता है; और दक्षिणा देने वाला ही उसके फल से युक्त होता है।
श्लोक 23 (5.106.23)
स्वर्गे क्रतुफलं तद्धि दक्षिणा शान्तिरुच्यते । किमाहरामि गुर्वर्थं ब्रवीतु भगवानिति ॥
svarge kratuphalaṃ taddhi dakṣiṇā śāntirucyate | kimāharāmi gurvarthaṃ bravītu bhagavāniti
स्वर्ग में यज्ञ का यही फल मिलता है; दक्षिणा को शान्ति कहा गया है। मैं गुरु के लिए क्या लाऊँ? भगवन्, आप बताइए।"
नारद उवाच
श्लोक 24 (5.106.24)
स जानानस्तु भगवान्खिन्नं शुश्रूषणेन वै । विश्वामित्रस्तमसकृद्गच्छ गच्छेत्यचोदयत् ॥
sa jānānastu bhagavānkhinnaṃ śuśrūṣaṇena vai | viśvāmitrastamasakṛdgaccha gacchetyacodayat
भगवान् विश्वामित्र, यह जानते हुए कि वह सेवा करते-करते थक गया है, उसे बार-बार "जाओ, जाओ" कहकर विदा करते रहे।
श्लोक 25 (5.106.25)
असकृद्गच्छगच्छेति विश्वामित्रेण भाषितः । किं ददानीति बहुशो गालवः प्रत्यभाषत ॥
asakṛdgacchagaccheti viśvāmitreṇa bhāṣitaḥ | kiṃ dadānīti bahuśo gālavaḥ pratyabhāṣata
विश्वामित्र के बार-बार "जाओ, जाओ" कहने पर भी गालव ने अनेक बार यही कहा, "मैं क्या दूँ?"
श्लोक 26 (5.106.26)
निर्बन्धतस्तु बहुशो गालवस्य तपस्विनः । किंचिदागतसंरम्भो विश्वामित्रोऽब्रवीदिदम् ॥
nirbandhatastu bahuśo gālavasya tapasvinaḥ | kiṃcidāgatasaṃrambho viśvāmitro'bravīdidam
तपस्वी गालव के बार-बार हठ करने पर विश्वामित्र को कुछ क्रोध आ गया और उन्होंने यह कहा —
विश्वामित्र उवाच
श्लोक 27 (5.106.27)
एकतःश्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम् । अष्टौ शतानि मे देहि गच्छ गालव मा चिरम् ॥
ekataḥśyāmakarṇānāṃ hayānāṃ candravarcasām | aṣṭau śatāni me dehi gaccha gālava mā ciram
"मुझे चन्द्रमा जैसी कान्ति वाले ऐसे आठ सौ घोड़े दो, जिनका एक-एक कान श्याम हो। गालव, जाओ, देर मत करो।"