उद्योग पर्व · अध्याय 107
गालव का विषाद और गरुड़ का प्रस्ताव
आठ सौ घोड़ों की चिन्ता में गालव न खा पाते हैं, न सो पाते हैं और सूखकर काँटा हो जाते हैं। वे विलाप करते हैं कि ऋण न चुका सकने वाले और वचन न निभा सकने वाले निर्धन का जीवन व्यर्थ है, अन्तिम प्रयत्न के बाद प्राण त्यागने का निश्चय करते हैं और सबकी गति भगवान् विष्णु का ध्यान करते हैं। तभी उनके मित्र गरुड़ प्रकट होकर बताते हैं कि विष्णु ने उनके लिए उनकी प्रार्थना पहले ही स्वीकार कर ली है, और उन्हें जहाँ चाहें वहाँ ले चलने का प्रस्ताव करते हैं।
नारद उवाच
श्लोक 1 (5.107.1)
एवमुक्तस्तदा तेन विश्वामित्रेण धीमता । नास्ते न शेते नाहारं कुरुते गालवस्तदा ॥
evamuktastadā tena viśvāmitreṇa dhīmatā | nāste na śete nāhāraṃ kurute gālavastadā
बुद्धिमान विश्वामित्र के ऐसा कहने पर गालव न बैठ पाते, न सो पाते और न भोजन कर पाते।
श्लोक 2 (5.107.2)
त्वगस्थिभूतो हरिणश्चिन्ताशोकपरायणः । शोचमानोऽतिमात्रं स दह्यमानश्च मन्युना । गालवो दुःखितो दुःखाद्विललाप सुयोधन ॥
tvagasthibhūto hariṇaścintāśokaparāyaṇaḥ | śocamāno'timātraṃ sa dahyamānaśca manyunā | gālavo duḥkhito duḥkhādvilalāpa suyodhana
हे सुयोधन, चिन्ता और शोक में डूबे, सूखकर हड्डियों का ढाँचा रह गए और पीले पड़े गालव अत्यन्त शोक करते और मनस्ताप से जलते हुए दुःख से विलाप करने लगे —
गालव उवाच
श्लोक 3 (5.107.3)
कुतः पुष्टानि मित्राणि कुतोऽर्थाः सञ्चयः कृतः । हयानां चन्द्रशुभ्राणां शतान्यष्टौ कुतो मम ॥
kutaḥ puṣṭāni mitrāṇi kuto'rthāḥ sañcayaḥ kṛtaḥ | hayānāṃ candraśubhrāṇāṃ śatānyaṣṭau kuto mama
"कहाँ हैं मेरे समृद्ध मित्र? कहाँ है धन, कहाँ कोई संचय? चन्द्रमा जैसे श्वेत आठ सौ घोड़े मुझे कहाँ से मिलेंगे?
श्लोक 4 (5.107.4)
कुतो मे भोजने श्रद्धा सुखश्रद्धा कुतश्च मे । श्रद्धा मे जीवितस्यापि छिन्ना किं जीवितेन मे ॥
kuto me bhojane śraddhā sukhaśraddhā kutaśca me | śraddhā me jīvitasyāpi chinnā kiṃ jīvitena me
भोजन में मेरी रुचि कहाँ, सुख की चाह कहाँ? जीने की इच्छा भी मेरी टूट चुकी है; ऐसे जीवन से मुझे क्या?
श्लोक 5 (5.107.5)
अहं पारे समुद्रस्य पृथिव्या वा परं परात् । गत्वाऽऽत्मानं विमुञ्चामि किं फलं जीवितेन मे ॥
ahaṃ pāre samudrasya pṛthivyā vā paraṃ parāt | gatvā''tmānaṃ vimuñcāmi kiṃ phalaṃ jīvitena me
मैं समुद्र के उस पार, या पृथ्वी के दूर से भी दूर छोर पर जाकर इस देह को त्याग दूँगा। मेरे जीने का क्या फल है?
श्लोक 6 (5.107.6)
अधनस्याकृतार्थस्य त्यक्तस्य विविधैः फलैः । ऋणं धारयमाणस्य कुतः सुखमनीहया ॥
adhanasyākṛtārthasya tyaktasya vividhaiḥ phalaiḥ | ṛṇaṃ dhārayamāṇasya kutaḥ sukhamanīhayā
जो निर्धन है, जिसका प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ, जो सब प्रकार के फलों से वंचित है और ऋण का भार ढो रहा है, उसे उद्यम के बिना सुख कहाँ?
श्लोक 7 (5.107.7)
सुहृदां हि धनं भुक्त्वा कृत्वा प्रणयमीप्सितम् । प्रतिकर्तुमशक्तस्य जीवितान्मरणं वरम् ॥
suhṛdāṃ hi dhanaṃ bhuktvā kṛtvā praṇayamīpsitam | pratikartumaśaktasya jīvitānmaraṇaṃ varam
जो मित्रों का धन भोगकर और उन्हें मनचाही वस्तु देने का भरोसा दिलाकर भी उसका प्रतिदान न कर सके, उसके लिए जीने से मरना अच्छा है।
श्लोक 8 (5.107.8)
प्रतिश्रुत्य करिष्येति कर्तव्यं तदकुर्वतः । मिथ्यावचनदग्धस्य इष्टापूर्तं प्रणश्यति ॥
pratiśrutya kariṣyeti kartavyaṃ tadakurvataḥ | mithyāvacanadagdhasya iṣṭāpūrtaṃ praṇaśyati
"मैं करूँगा" — ऐसी प्रतिज्ञा करके जो उस कर्तव्य को पूरा नहीं करता, वह असत्य वचन से दग्ध हो जाता है और उसके यज्ञ-याग तथा लोकहित के कर्मों का पुण्य नष्ट हो जाता है।
श्लोक 9 (5.107.9)
न रूपमनृतस्यास्ति नानृतस्यास्ति सन्ततिः । नानृतस्याधिपत्यं च कुत एव गतिः शुभा ॥
na rūpamanṛtasyāsti nānṛtasyāsti santatiḥ | nānṛtasyādhipatyaṃ ca kuta eva gatiḥ śubhā
असत्यवादी के पास न रूप रहता है, न सन्तान, न प्रभुत्व; फिर उसे शुभ गति कैसे मिल सकती है?
श्लोक 10 (5.107.10)
कुतः कृतघ्नस्य यशः कुतः स्थानं कुतः सुखम् । अश्रद्धेयः कृतघ्नो हि कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥
kutaḥ kṛtaghnasya yaśaḥ kutaḥ sthānaṃ kutaḥ sukham | aśraddheyaḥ kṛtaghno hi kṛtaghne nāsti niṣkṛtiḥ
कृतघ्न को यश कहाँ, स्थान कहाँ, सुख कहाँ? कृतघ्न विश्वास के योग्य नहीं होता; कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है।
श्लोक 11 (5.107.11)
न जीवत्यधनः पापः कुतः पापस्य तन्त्रणम् । पापो ध्रुवमवाप्नोति विनाशं नाशयन्कृतम् ॥
na jīvatyadhanaḥ pāpaḥ kutaḥ pāpasya tantraṇam | pāpo dhruvamavāpnoti vināśaṃ nāśayankṛtam
धनहीन पापी वास्तव में जीता नहीं; ऐसा पापी अपने कुटुम्ब का भरण-पोषण कैसे करेगा? किए हुए उपकार को नष्ट करने वाला पापी निश्चय ही विनाश को प्राप्त होता है।
श्लोक 12 (5.107.12)
सोऽहं पापः कृतघ्नश्च कृपणश्चानृतोऽपि च । गुरोर्यः कृतकार्यः संस्तत्करोमि न भाषितम् ॥
so'haṃ pāpaḥ kṛtaghnaśca kṛpaṇaścānṛto'pi ca | guroryaḥ kṛtakāryaḥ saṃstatkaromi na bhāṣitam
मैं ऐसा ही पापी हूँ — कृतघ्न, दीन और असत्यवादी भी — जो गुरु के द्वारा मेरा प्रयोजन सिद्ध कर दिए जाने पर भी उनका कहा पूरा नहीं कर रहा हूँ।
श्लोक 13 (5.107.13)
सोऽहं प्राणान्विमोक्ष्यामि कृत्वा यत्नमनुत्तमम् । अर्थिता न मया काचित्कृतपूर्वा दिवौकसाम् ॥
so'haṃ prāṇānvimokṣyāmi kṛtvā yatnamanuttamam | arthitā na mayā kācitkṛtapūrvā divaukasām
इसलिए मैं पूरा प्रयत्न करके अपने प्राण त्याग दूँगा। मैंने आज तक देवताओं से कभी कोई याचना नहीं की।
श्लोक 14 (5.107.14)
मानयन्ति च मां सर्वे त्रिदशा यज्ञसंस्तरे । अहं तु विबुधश्रेष्ठं देवं त्रिभुवनेश्वरम् । विष्णुं गच्छाम्यहं कृष्णं गतिं गतिमतां वरम् ॥
mānayanti ca māṃ sarve tridaśā yajñasaṃstare | ahaṃ tu vibudhaśreṣṭhaṃ devaṃ tribhuvaneśvaram | viṣṇuṃ gacchāmyahaṃ kṛṣṇaṃ gatiṃ gatimatāṃ varam
यज्ञ-मण्डप में सभी देवता मेरा सम्मान करते हैं। पर मैं तो देवताओं में श्रेष्ठ, त्रिभुवन के स्वामी, गति चाहने वालों की परम गति भगवान् विष्णु — श्रीकृष्ण — के पास जाऊँगा।
श्लोक 15 (5.107.15)
भोगा यस्मात्प्रतिष्ठन्ते व्याप्य सर्वान्सुरासुरान् । प्रणतो द्रष्टुमिच्छामि कृष्णं योगिनमव्ययम् ॥
bhogā yasmātpratiṣṭhante vyāpya sarvānsurāsurān | praṇato draṣṭumicchāmi kṛṣṇaṃ yoginamavyayam
जिनमें सारे भोग प्रतिष्ठित हैं और जो सभी देवताओं और असुरों में व्याप्त हैं, उन अविनाशी योगी श्रीकृष्ण के दर्शन मैं नतमस्तक होकर करना चाहता हूँ।"
नारद उवाच
श्लोक 16 (5.107.16)
एवमुक्ते सखा तस्य गरुडो विनतात्मजः । दर्शयामास तं प्राह संहृष्टः प्रियकाम्यया ॥
evamukte sakhā tasya garuḍo vinatātmajaḥ | darśayāmāsa taṃ prāha saṃhṛṣṭaḥ priyakāmyayā
उनके ऐसा कहने पर उनके मित्र विनतानन्दन गरुड़ उनके सामने प्रकट हुए और प्रसन्न होकर, उनका प्रिय करने की इच्छा से बोले —
सुपर्ण उवाच
श्लोक 17 (5.107.17)
सुहृद्भवान्मम मतः सुहृदां च मतः सुहृत् । ईप्सितेनाभिलाषेण योक्तव्यो विभवे सति ॥
suhṛdbhavānmama mataḥ suhṛdāṃ ca mataḥ suhṛt | īpsitenābhilāṣeṇa yoktavyo vibhave sati
"मैं तुम्हें अपना सुहृद मानता हूँ, और तुम मित्रों के भी मित्र हो। सामर्थ्य हो तो मित्र की मनचाही कामना पूरी करनी चाहिए।
श्लोक 18 (5.107.18)
विभवश्चास्ति मे विप्र वासवावरजो द्विज । पूर्वमुक्तस्त्वदर्थं च कृतः कामश्च तेन मे ॥
vibhavaścāsti me vipra vāsavāvarajo dvija | pūrvamuktastvadarthaṃ ca kṛtaḥ kāmaśca tena me
हे विप्र, मेरे पास सामर्थ्य है। हे द्विज, मैंने पहले ही तुम्हारे लिए इन्द्र के छोटे भाई (भगवान् विष्णु) से निवेदन किया था, और उन्होंने मेरी कामना पूरी कर दी है।
श्लोक 19 (5.107.19)
स भवानेतु गच्छाव नयिष्ये त्वां यथासुखम् । देशं पारं पृथिव्या वा गच्छ गालव मा चिरम् ॥
sa bhavānetu gacchāva nayiṣye tvāṃ yathāsukham | deśaṃ pāraṃ pṛthivyā vā gaccha gālava mā ciram
तो आओ, हम चलें। मैं तुम्हें सुखपूर्वक किसी भी देश में, पृथ्वी के उस पार भी, ले चलूँगा। गालव, चलो, देर मत करो।"