उद्योग पर्व · अध्याय 140
श्रीकृष्ण का कर्ण को उसके जन्म का रहस्य बताना
जनमेजय पूछते हैं कि हस्तिनापुर से विदा होते समय कर्ण को रथ पर बिठाकर श्रीकृष्ण ने उससे क्या कहा। श्रीकृष्ण कर्ण को स्मरण कराते हैं कि धर्मशास्त्रों के अनुसार कुमारी कन्या का पुत्र उसी का होता है जो उस कन्या से विवाह करता है; अतः विवाह से पहले कुन्ती से जन्मा कर्ण धर्मतः पाण्डु का ज्येष्ठ पुत्र है। वे उसे राजपद का प्रस्ताव देते हैं — पाण्डव, उनके पुत्र, वृष्णि और सहयोगी राजा उसका सम्मान करेंगे, धौम्य उसका अभिषेक करेंगे, युधिष्ठिर युवराज होंगे, भीम उस पर छत्र धारण करेंगे, अर्जुन उसका रथ हाँकेंगे और द्रौपदी भी अपने क्रम में उसके पास आएगी।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (5.140.1)
राजपुत्रैः परिवृतस्तथा भृत्यैश्च सत्तम । उपारोप्य रथे कर्णं निर्यातो मधुसूदनः ॥
rājaputraiḥ parivṛtastathā bhṛtyaiśca sattama | upāropya rathe karṇaṃ niryāto madhusūdanaḥ
"हे श्रेष्ठ, राजकुमारों और सेवकों से घिरे मधुसूदन कर्ण को अपने रथ पर चढ़ाकर नगर से बाहर निकले।
श्लोक 2 (5.140.2)
किमब्रवीद्रथोपस्थे राधेयं परवीरहा । कानि सान्त्वानि गोविन्दः सूतपुत्रे प्रयुक्तवान् ॥
kimabravīdrathopasthe rādheyaṃ paravīrahā | kāni sāntvāni govindaḥ sūtaputre prayuktavān
शत्रुवीरों का संहार करने वाले उन्होंने रथ पर राधापुत्र से क्या कहा? गोविन्द ने सूतपुत्र के प्रति कौन-से सान्त्वना भरे वचन कहे?
श्लोक 3 (5.140.3)
उद्यन्मेघस्वनः काले यत्कृष्णः कर्णमब्रवीत् । मृदु वा यदि वा तीक्ष्णं तन्ममाचक्ष्व सर्वशः ॥
udyanmeghasvanaḥ kāle yatkṛṣṇaḥ karṇamabravīt | mṛdu vā yadi vā tīkṣṇaṃ tanmamācakṣva sarvaśaḥ
उठते हुए मेघ के समान गम्भीर स्वर वाले श्रीकृष्ण ने उस समय कर्ण से जो कुछ कहा — कोमल हो या कठोर — वह सब मुझे बताइए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (5.140.4)
आनुपूर्व्येण वाक्यानि तीक्ष्णानि च मृदूनि च । प्रियाणि धर्मयुक्तानि सत्यानि च हितानि च ॥
ānupūrvyeṇa vākyāni tīkṣṇāni ca mṛdūni ca | priyāṇi dharmayuktāni satyāni ca hitāni ca
क्रम से कहे गए वचन — तीखे भी और कोमल भी, प्रिय, धर्मसम्मत, सत्य और हितकारी,
श्लोक 5 (5.140.5)
हृदयग्रहणीयानि राधेयं मधुसूदनः । यान्यब्रवीदमेयात्मा तानि मे शृणु भारत ॥
hṛdayagrahaṇīyāni rādheyaṃ madhusūdanaḥ | yānyabravīdameyātmā tāni me śṛṇu bhārata
हृदय को छू लेने वाले — जो वचन अप्रमेयात्मा मधुसूदन ने राधापुत्र से कहे, उन्हें हे भारत, मुझसे सुनो।
वासुदेव उवाच
श्लोक 6 (5.140.6)
उपासितास्ते राधेय ब्राह्मणा वेदपारगाः । तत्त्वार्थं परिपृष्टाश्च नियतेनानसूयया ॥
upāsitāste rādheya brāhmaṇā vedapāragāḥ | tattvārthaṃ paripṛṣṭāśca niyatenānasūyayā
"राधेय, तुमने वेदों के पारंगत ब्राह्मणों की उपासना की है और संयमपूर्वक, बिना ईर्ष्या के, उनसे तत्त्व के विषय में प्रश्न किए हैं।
श्लोक 7 (5.140.7)
त्वमेव कर्ण जानासि वेदवादान्सनातनान् । त्वमेव धर्मशास्त्रेषु सूक्ष्मेषु परिनिष्ठितः ॥
tvameva karṇa jānāsi vedavādānsanātanān | tvameva dharmaśāstreṣu sūkṣmeṣu pariniṣṭhitaḥ
कर्ण, तुम स्वयं सनातन वेद-वचनों को जानते हो; धर्मशास्त्रों की सूक्ष्म बातों में भी तुम भली-भाँति निष्णात हो।
श्लोक 8 (5.140.8)
कानीनश्च सहोढश्च कन्यायां यश्च जायते । वोढारं पितरं तस्य प्राहुः शास्त्रविदो जनाः ॥
kānīnaśca sahoḍhaśca kanyāyāṃ yaśca jāyate | voḍhāraṃ pitaraṃ tasya prāhuḥ śāstravido janāḥ
शास्त्रों के ज्ञाता कहते हैं कि कुमारी कन्या से जो पुत्र जन्म लेता है — चाहे वह कानीन हो या सहोढ — उसका पिता वही माना जाता है जो उस कन्या से विवाह करता है।
श्लोक 9 (5.140.9)
सोऽसि कर्ण तथाजातः पाण्डोः पुत्रोऽसि धर्मतः । निश्चयाद्धर्मशास्त्राणामेहि राजा भविष्यसि ॥
so'si karṇa tathājātaḥ pāṇḍoḥ putro'si dharmataḥ | niścayāddharmaśāstrāṇāmehi rājā bhaviṣyasi
कर्ण, तुम्हारा जन्म ठीक इसी प्रकार हुआ है; धर्मानुसार तुम पाण्डु के पुत्र हो। आओ, धर्मशास्त्रों के निर्णय से तुम राजा बनोगे।
श्लोक 10 (5.140.10)
पितृपक्षे च ते पार्था मातृपक्षे च वृष्णयः । द्वौ पक्षावभिजानीहि त्वमेतौ पुरुषर्षभ ॥
pitṛpakṣe ca te pārthā mātṛpakṣe ca vṛṣṇayaḥ | dvau pakṣāvabhijānīhi tvametau puruṣarṣabha
पिता के पक्ष में तुम्हारे पार्थ हैं और माता के पक्ष में वृष्णि। हे पुरुषश्रेष्ठ, इन दोनों पक्षों को अपना जानो।
श्लोक 11 (5.140.11)
मया सार्धमितो यातमद्य त्वां तात पाण्डवाः । अभिजानन्तु कौन्तेयं पूर्वजातं युधिष्ठिरात् ॥
mayā sārdhamito yātamadya tvāṃ tāta pāṇḍavāḥ | abhijānantu kaunteyaṃ pūrvajātaṃ yudhiṣṭhirāt
तात, आज मेरे साथ यहाँ से चलो, और पाण्डव तुम्हें युधिष्ठिर से पहले जन्मे कुन्तीपुत्र के रूप में पहचानें।
श्लोक 12 (5.140.12)
पादौ तव ग्रहीष्यन्ति भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः । द्रौपदेयास्तथा पञ्च सौभद्रश्चापराजितः ॥
pādau tava grahīṣyanti bhrātaraḥ pañca pāṇḍavāḥ | draupadeyāstathā pañca saubhadraścāparājitaḥ
पाँचों पाण्डव भाई तुम्हारे चरण पकड़ेंगे, और उसी प्रकार द्रौपदी के पाँचों पुत्र और अपराजित सुभद्रानन्दन भी।
श्लोक 13 (5.140.13)
राजानो राजपुत्राश्च पाण्डवार्थे समागताः । पादौ तव ग्रहीष्यन्ति सर्वे चान्धकवृष्णयः ॥
rājāno rājaputrāśca pāṇḍavārthe samāgatāḥ | pādau tava grahīṣyanti sarve cāndhakavṛṣṇayaḥ
पाण्डवों के लिए एकत्र हुए राजा और राजकुमार तथा सभी अन्धक और वृष्णि तुम्हारे चरण पकड़ेंगे।
श्लोक 14 (5.140.14)
हिरण्मयांश्च ते कुम्भान्राजतान्पार्थिवांस्तथा । ओषध्यः सर्वबीजानि सर्वरत्नानि वीरुधः ॥
hiraṇmayāṃśca te kumbhānrājatānpārthivāṃstathā | oṣadhyaḥ sarvabījāni sarvaratnāni vīrudhaḥ
सोने, चाँदी और मिट्टी के कलश, ओषधियाँ, सब प्रकार के बीज, सब प्रकार के रत्न और लताएँ —
श्लोक 15 (5.140.15)
राजन्या राजकन्याश्चाप्यानयन्त्वाभिषेचनम् । षष्ठे त्वां च तथा काले द्रौपद्युपगमिष्यति ॥
rājanyā rājakanyāścāpyānayantvābhiṣecanam | ṣaṣṭhe tvāṃ ca tathā kāle draupadyupagamiṣyati
ये सब क्षत्रिय पुरुष और राजकन्याएँ तुम्हारे अभिषेक के लिए लाएँ। और छठे समय-क्रम में द्रौपदी भी तुम्हारे पास आएगी।
श्लोक 16 (5.140.16)
अग्निं जुहोतु वै धौम्यः संशितात्मा द्विजोत्तमः । अद्य त्वामभिषिञ्चन्तु चातुर्वैद्या द्विजातयः ॥
agniṃ juhotu vai dhaumyaḥ saṃśitātmā dvijottamaḥ | adya tvāmabhiṣiñcantu cāturvaidyā dvijātayaḥ
संयमी आत्मा वाले द्विजश्रेष्ठ धौम्य अग्नि में आहुति दें, और आज चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण तुम्हारा अभिषेक करें —
श्लोक 17 (5.140.17)
पुरोहितः पाण्डवानां ब्रह्मकर्मण्यवस्थितः । तथैव भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः पुरुषर्षभाः ॥
purohitaḥ pāṇḍavānāṃ brahmakarmaṇyavasthitaḥ | tathaiva bhrātaraḥ pañca pāṇḍavāḥ puruṣarṣabhāḥ
ब्राह्मणोचित कर्मों में स्थित पाण्डवों के पुरोहित, और उसी प्रकार पुरुषश्रेष्ठ पाँचों पाण्डव भाई,
श्लोक 18 (5.140.18)
द्रौपदेयास्तथा पञ्च पाञ्चालाश्चेदयस्तथा । अहं च त्वाऽभिषेक्ष्यामि राजानं पृथिवीपतिम् ॥
draupadeyāstathā pañca pāñcālāścedayastathā | ahaṃ ca tvā'bhiṣekṣyāmi rājānaṃ pṛthivīpatim
द्रौपदी के पाँचों पुत्र, पांचाल और चेदि। मैं स्वयं भी तुम्हारा राजा और पृथ्वीपति के रूप में अभिषेक करूँगा।
श्लोक 19 (5.140.19)
युवराजोऽस्तु ते राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । गृहीत्वा व्यजनं श्वेतं धर्मात्मा संशितव्रतः ॥
yuvarājo'stu te rājā dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | gṛhītvā vyajanaṃ śvetaṃ dharmātmā saṃśitavrataḥ
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर तुम्हारे युवराज हों। श्वेत चँवर लेकर वे धर्मात्मा, दृढ़ व्रत वाले
श्लोक 20 (5.140.20)
उपान्वारोहतु रथं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । छत्रं च ते महाश्वेतं भीमसेनो महाबलः ॥
upānvārohatu rathaṃ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | chatraṃ ca te mahāśvetaṃ bhīmaseno mahābalaḥ
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर तुम्हारे पीछे रथ पर चढ़ेंगे। और महाबली भीमसेन
श्लोक 21 (5.140.21)
अभिषिक्तस्य कौन्तेयो धारयिष्यति मूर्धनि । किङ्किणीशतनिर्घोषं वैयाघ्रपरिवारणम् ॥
abhiṣiktasya kaunteyo dhārayiṣyati mūrdhani | kiṅkiṇīśatanirghoṣaṃ vaiyāghraparivāraṇam
अभिषेक हो जाने पर तुम्हारे सिर पर विशाल श्वेत छत्र धारण करेंगे, हे कौन्तेय। सैकड़ों घुँघरुओं से गूँजता, बाघम्बर से मढ़ा,
श्लोक 22 (5.140.22)
रथं श्वेतहयैर्युक्तमर्जुनो वाहयिष्यति । अभिमन्युश्च ते नित्यं प्रत्यासन्नो भविष्यति ॥
rathaṃ śvetahayairyuktamarjuno vāhayiṣyati | abhimanyuśca te nityaṃ pratyāsanno bhaviṣyati
श्वेत घोड़ों से जुता तुम्हारा रथ अर्जुन हाँकेंगे। अभिमन्यु सदा तुम्हारे निकट रहेगा।
श्लोक 23 (5.140.23)
नकुलः सहदेवश्च द्रौपदेयाश्च पञ्च ये । पञ्चालाश्चानुयास्यन्ति शिखण्डी च महारथः ॥
nakulaḥ sahadevaśca draupadeyāśca pañca ye | pañcālāścānuyāsyanti śikhaṇḍī ca mahārathaḥ
नकुल और सहदेव, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, पांचाल और महारथी शिखण्डी तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे।
श्लोक 24 (5.140.24)
अहं च त्वाऽनुयास्यामि सर्वे चान्धकवृष्णयः । दाशार्हाः परिवारास्ते दाशार्णाश्च विशांपते ॥
ahaṃ ca tvā'nuyāsyāmi sarve cāndhakavṛṣṇayaḥ | dāśārhāḥ parivārāste dāśārṇāśca viśāṃpate
मैं भी तुम्हारे पीछे चलूँगा, और सभी अन्धक तथा वृष्णि भी; हे प्रजापालक, दाशार्ह और दाशार्ण तुम्हारे परिचारक होंगे।
श्लोक 25 (5.140.25)
भुङ्क्ष्व राज्यं महाबाहो भ्रातृभिः सह पाण्डवैः । जपैर्होमैश्च संयुक्तो मङ्गलैश्च पृथग्विधैः ॥
bhuṅkṣva rājyaṃ mahābāho bhrātṛbhiḥ saha pāṇḍavaiḥ | japairhomaiśca saṃyukto maṅgalaiśca pṛthagvidhaiḥ
महाबाहो, अपने भाई पाण्डवों के साथ जप, होम और अनेक प्रकार के मंगल-कर्मों से युक्त होकर राज्य का भोग करो।
श्लोक 26 (5.140.26)
पुरोगमाश्च ते सन्तु द्रविडाः सहकुन्तलैः । आन्ध्रास्तालचराश्चैव चूचुपा वेणुपास्तथा ॥
purogamāśca te santu draviḍāḥ sahakuntalaiḥ | āndhrāstālacarāścaiva cūcupā veṇupāstathā
द्रविड़ और कुन्तल, आन्ध्र, तालचर, चूचुप और वेणुप तुम्हारे आगे-आगे चलें।
श्लोक 27 (5.140.27)
स्तुवन्तु त्वां च बहुभिः स्तुतिभिः सूतमागधाः । विजयं वसुषेणस्य घोषयन्तु च पाण्डवाः ॥
stuvantu tvāṃ ca bahubhiḥ stutibhiḥ sūtamāgadhāḥ | vijayaṃ vasuṣeṇasya ghoṣayantu ca pāṇḍavāḥ
सूत और मागध अनेक स्तुतियों से तुम्हारा गुणगान करें, और पाण्डव वसुषेण की विजय की घोषणा करें।
श्लोक 28 (5.140.28)
स त्वं परिवृतः पार्थैर्नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः । प्रशाधि राज्यं कौन्तेय कुन्तीं च प्रतिनन्दय ॥
sa tvaṃ parivṛtaḥ pārthairnakṣatrairiva candramāḥ | praśādhi rājyaṃ kaunteya kuntīṃ ca pratinandaya
नक्षत्रों से घिरे चन्द्रमा की भाँति पार्थों से घिरे रहकर, हे कौन्तेय, राज्य का शासन करो और कुन्ती को आनन्दित करो।
श्लोक 29 (5.140.29)
मित्राणि ते प्रहृष्यन्तु व्यथन्तु रिपवस्तथा । सौभ्रात्रं चैव तेऽद्यास्तु भ्रातृभिः सह पाण्डवैः ॥
mitrāṇi te prahṛṣyantu vyathantu ripavastathā | saubhrātraṃ caiva te'dyāstu bhrātṛbhiḥ saha pāṇḍavaiḥ
तुम्हारे मित्र हर्षित हों और शत्रु व्यथित हों; और आज से अपने भाई पाण्डवों के साथ तुम्हारा भ्रातृभाव बना रहे।"