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उद्योग पर्व · अध्याय 141

कर्ण का अस्वीकार और युद्ध-यज्ञ का दर्शन

कर्ण स्वीकार करता है कि धर्मतः वह पाण्डु का पुत्र है, पर कहता है कि वह उन अधिरथ और राधा को नहीं छोड़ सकता जिन्होंने उसे पाला, न उनके द्वारा मिली पत्नियों और पुत्रों को, और न उस दुर्योधन को जिसने उसी के भरोसे युद्ध ठाना है। वह श्रीकृष्ण से अपने जन्म का रहस्य गुप्त रखने को कहता है, क्योंकि जानने पर युधिष्ठिर राज्य त्याग देंगे और कर्ण उसे दुर्योधन को सौंप देगा। फिर वह आने वाले युद्ध को दुर्योधन के महान शस्त्र-यज्ञ के रूप में वर्णित करता है, जिसमें हर पाण्डव योद्धा किसी ऋत्विज का कार्य करेगा; अपनी, दुःशासन की और दुर्योधन की मृत्यु तथा विधवाओं के विलाप तक उसके चरणों को देखता है, और प्रार्थना करता है कि क्षत्रिय कुरुक्षेत्र में वीरगति पाकर स्वर्ग और अमर कीर्ति प्राप्त करें।

अध्याय 140अध्याय-सूचीअध्याय 142

कर्ण उवाच

श्लोक 1 (5.141.1)

असंशयं सौहृदान्मे प्रणयाच्चात्थ केशव । सख्येन चैव वार्ष्णेय श्रेयस्कामतयैव च ॥

asaṃśayaṃ sauhṛdānme praṇayāccāttha keśava | sakhyena caiva vārṣṇeya śreyaskāmatayaiva ca

"केशव, निःसन्देह तुमने यह सब मेरे प्रति सौहार्द, प्रेम और मित्रता से, और हे वार्ष्णेय, मेरा कल्याण चाहकर ही कहा है।

श्लोक 2 (5.141.2)

सर्वं चैवाभिजानामि पाण्डोः पुत्रोऽस्मि धर्मतः । निश्चयाद्धर्मशास्त्राणां यथा त्वं कृष्ण मन्यसे ॥

sarvaṃ caivābhijānāmi pāṇḍoḥ putro'smi dharmataḥ | niścayāddharmaśāstrāṇāṃ yathā tvaṃ kṛṣṇa manyase

मैं यह सब जानता हूँ; हे कृष्ण, जैसा तुम मानते हो, धर्मशास्त्रों के निर्णय से मैं धर्मतः पाण्डु का पुत्र हूँ।

श्लोक 3 (5.141.3)

कन्या गर्भं समाधत्त भास्करान्मां जनार्दन । आदित्यवचनाच्चैव जातं मां सा व्यसर्जयत् ॥

kanyā garbhaṃ samādhatta bhāskarānmāṃ janārdana | ādityavacanāccaiva jātaṃ māṃ sā vyasarjayat

जनार्दन, एक कुमारी कन्या ने सूर्य से मुझे गर्भ में धारण किया था, और सूर्य के ही कहने पर जन्म लेते ही उसने मुझे त्याग दिया।

श्लोक 4 (5.141.4)

सोऽस्मि कृष्ण तथाजातः पाण्डोः पुत्रोऽस्मि धर्मतः । कुन्त्या त्वहमपाकीर्णो यथा न कुशलं तथा ॥

so'smi kṛṣṇa tathājātaḥ pāṇḍoḥ putro'smi dharmataḥ | kuntyā tvahamapākīrṇo yathā na kuśalaṃ tathā

कृष्ण, इस प्रकार जन्मा मैं धर्मानुसार पाण्डु का पुत्र हूँ; फिर भी कुन्ती ने मेरी भलाई की चिन्ता किए बिना मुझे त्याग दिया।

श्लोक 5 (5.141.5)

सूतो हि मामधिरथो दृष्ट्वैवाभ्यानयद्गृहान् । राधायाश्चैव मां प्रादात्सौहार्दान्मधुसूदन ॥

sūto hi māmadhiratho dṛṣṭvaivābhyānayadgṛhān | rādhāyāścaiva māṃ prādātsauhārdānmadhusūdana

सूत अधिरथ ने मुझे देखते ही अपने घर ले आया, और हे मधुसूदन, स्नेहवश मुझे राधा को सौंप दिया।

श्लोक 6 (5.141.6)

मत्स्नेहाच्चैव राधायां सद्यः क्षीरमवातरत् । सा मे मूत्रं पुरीषं च प्रतिजग्राह माधव ॥

matsnehāccaiva rādhāyāṃ sadyaḥ kṣīramavātarat | sā me mūtraṃ purīṣaṃ ca pratijagrāha mādhava

मेरे प्रति स्नेह से राधा के स्तनों में तुरन्त दूध उतर आया, और माधव, उसी ने मेरे मल-मूत्र साफ़ किए।

श्लोक 7 (5.141.7)

तस्याः पिण्डव्यपनयं कुर्यादस्मद्विधः कथम् । धर्मविद्धर्मशास्त्राणां श्रवणे सततं रतः ॥

tasyāḥ piṇḍavyapanayaṃ kuryādasmadvidhaḥ katham | dharmaviddharmaśāstrāṇāṃ śravaṇe satataṃ rataḥ

धर्म को जानने वाला और धर्मशास्त्रों के श्रवण में सदा लगा रहने वाला मेरे जैसा व्यक्ति उसे पिण्डदान से कैसे वंचित कर सकता है?

श्लोक 8 (5.141.8)

तथा मामभिजानाति सूतश्चाधिरथः सुतम् । पितरं चाभिजानामि तमहं सौहृदात्सदा ॥

tathā māmabhijānāti sūtaścādhirathaḥ sutam | pitaraṃ cābhijānāmi tamahaṃ sauhṛdātsadā

उसी प्रकार सूत अधिरथ मुझे अपना पुत्र मानते हैं, और मैं भी स्नेहवश सदा उन्हें अपना पिता मानता आया हूँ।

श्लोक 9 (5.141.9)

स हि मे जातकर्मादि कारयामास माधव । शास्त्रदृष्टेन विधिना पुत्रप्रीत्या जनार्दन ॥

sa hi me jātakarmādi kārayāmāsa mādhava | śāstradṛṣṭena vidhinā putraprītyā janārdana

माधव, पुत्र-प्रेम से उन्होंने शास्त्रोक्त विधि से मेरे जातकर्म आदि संस्कार करवाए, हे जनार्दन।

श्लोक 10 (5.141.10)

नाम वै वसुषेणेति कारयामास वै द्विजैः । भार्याश्चोढा मम प्राप्ते यौवने तत्परिग्रहात् ॥

nāma vai vasuṣeṇeti kārayāmāsa vai dvijaiḥ | bhāryāścoḍhā mama prāpte yauvane tatparigrahāt

उन्होंने ब्राह्मणों से मेरा नाम वसुषेण रखवाया, और युवावस्था आने पर उन्हीं के प्रबन्ध से मेरे विवाह हुए।

श्लोक 11 (5.141.11)

तासु पुत्राश्च पौत्राश्च मम जाता जनार्दन । तासु मे हृदयं कृष्ण संजातं कामबन्धनम् ॥

tāsu putrāśca pautrāśca mama jātā janārdana | tāsu me hṛdayaṃ kṛṣṇa saṃjātaṃ kāmabandhanam

जनार्दन, उन पत्नियों से मेरे पुत्र और पौत्र उत्पन्न हुए हैं, और कृष्ण, उनमें मेरा हृदय प्रेम के बन्धन से बँधा है।

श्लोक 12 (5.141.12)

न पृथिव्या सकलया न सुवर्णस्य राशिभिः । हर्षाद्भयाद्वा गोविन्द मिथ्या कर्तुं तदुत्सहे ॥

na pṛthivyā sakalayā na suvarṇasya rāśibhiḥ | harṣādbhayādvā govinda mithyā kartuṃ tadutsahe

गोविन्द, न सारी पृथ्वी के लिए, न सोने के ढेरों के लिए, न हर्ष से और न भय से — मैं उस सम्बन्ध को झूठा नहीं कर सकता।

श्लोक 13 (5.141.13)

धृतराष्ट्रकुले कृष्ण दुर्योधनसमाश्रयात् । मया त्रयोदशसमा भुक्तं राज्यमकण्टकम् ॥

dhṛtarāṣṭrakule kṛṣṇa duryodhanasamāśrayāt | mayā trayodaśasamā bhuktaṃ rājyamakaṇṭakam

कृष्ण, धृतराष्ट्र के कुल में दुर्योधन के आश्रय से मैंने तेरह वर्षों तक निष्कण्टक राज्य भोगा है।

श्लोक 14 (5.141.14)

इष्टं च बहुभिर्यज्ञैः सहसूतैर्मयाऽसकृत् । आवाहाश्च विवाहाश्च सहसूतैर्मया कृताः ॥

iṣṭaṃ ca bahubhiryajñaiḥ sahasūtairmayā'sakṛt | āvāhāśca vivāhāśca sahasūtairmayā kṛtāḥ

सूतों के साथ मिलकर मैंने अनेक बार बहुत-से यज्ञ किए हैं, और सूतों के साथ ही मैंने अपने कुल के विवाह — कन्याएँ लाने और कन्याएँ देने — सम्पन्न किए हैं।

श्लोक 15 (5.141.15)

मां च कृष्ण समासाद्य कृतः शस्त्रसमुद्यमः । दुर्योधनेन वार्ष्णेय विग्रहश्चापि पाण्डवैः ॥

māṃ ca kṛṣṇa samāsādya kṛtaḥ śastrasamudyamaḥ | duryodhanena vārṣṇeya vigrahaścāpi pāṇḍavaiḥ

कृष्ण, मेरे ही भरोसे दुर्योधन ने शस्त्र उठाए हैं, और हे वार्ष्णेय, पाण्डवों से विरोध भी ठाना है।

श्लोक 16 (5.141.16)

तस्माद्रणे द्वैरथे मां प्रत्युद्यातारमच्युत । वृतवान्परमं कृष्ण प्रतीपं सव्यसाचिनः ॥

tasmādraṇe dvairathe māṃ pratyudyātāramacyuta | vṛtavānparamaṃ kṛṣṇa pratīpaṃ savyasācinaḥ

इसीलिए, हे अच्युत, उसने रण में सव्यसाची के विरुद्ध द्वैरथ युद्ध के लिए मुझे ही चुना है, कृष्ण।

श्लोक 17 (5.141.17)

वधाद्बन्धाद्भयाद्वापि लोभाद्वापि जनार्दन । अनृतं नोत्सहे कर्तुं धार्तराष्ट्रस्य धीमतः ॥

vadhādbandhādbhayādvāpi lobhādvāpi janārdana | anṛtaṃ notsahe kartuṃ dhārtarāṣṭrasya dhīmataḥ

जनार्दन, न वध के भय से, न बन्धन के भय से, न लोभ से — मैं बुद्धिमान धृतराष्ट्रपुत्र के साथ असत्य नहीं कर सकता।

श्लोक 18 (5.141.18)

यदि ह्यद्य न गच्छेयं द्वैरथं सव्यसाचिना । अकीर्तिः स्याद्धृषीकेश मम पार्थस्य चोभयोः ॥

yadi hyadya na gaccheyaṃ dvairathaṃ savyasācinā | akīrtiḥ syāddhṛṣīkeśa mama pārthasya cobhayoḥ

हृषीकेश, यदि अब मैं सव्यसाची से द्वैरथ युद्ध करने न जाऊँ, तो मेरी और पार्थ की — दोनों की — अपकीर्ति होगी।

श्लोक 19 (5.141.19)

असंशयं हितार्थाय ब्रूयास्त्वं मधुसूदन । सर्वं च पाण्डवाः कुर्युस्त्वद्वशित्वान्न संशयः ॥

asaṃśayaṃ hitārthāya brūyāstvaṃ madhusūdana | sarvaṃ ca pāṇḍavāḥ kuryustvadvaśitvānna saṃśayaḥ

मधुसूदन, निःसन्देह तुम यह मेरे हित के लिए कह रहे हो, और पाण्डव तुम्हारे वश में होने से सब कुछ करेंगे, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 20 (5.141.20)

मन्त्रस्य नियमं कुर्यास्त्वमत्र मधुसूदन । एतदत्र हितं मन्ये सर्वं यादवनन्दन ॥

mantrasya niyamaṃ kuryāstvamatra madhusūdana | etadatra hitaṃ manye sarvaṃ yādavanandana

पर मधुसूदन, इस मन्त्रणा को गुप्त रखना; हे यादवनन्दन, मैं इसी में सबका हित मानता हूँ।

श्लोक 21 (5.141.21)

यदि जानाति मां राजा धर्मात्मा संयतेन्द्रियः । कुन्त्याः प्रथमजं पुत्रं न स राज्यं ग्रहीष्यति ॥

yadi jānāti māṃ rājā dharmātmā saṃyatendriyaḥ | kuntyāḥ prathamajaṃ putraṃ na sa rājyaṃ grahīṣyati

यदि जितेन्द्रिय धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर यह जान लें कि मैं कुन्ती का पहला पुत्र हूँ, तो वे राज्य स्वीकार नहीं करेंगे।

श्लोक 22 (5.141.22)

प्राप्य चापि महद्राज्यं तदहं मधुसूदन । स्फीतं दुर्योधनायैव संप्रदद्यामरिन्दम ॥

prāpya cāpi mahadrājyaṃ tadahaṃ madhusūdana | sphītaṃ duryodhanāyaiva saṃpradadyāmarindama

और मधुसूदन, यदि वह विशाल और समृद्ध राज्य मुझे मिल भी जाए, तो हे शत्रुदमन, मैं उसे दुर्योधन को ही सौंप दूँगा।

श्लोक 23 (5.141.23)

स एव राजा धर्मात्मा शाश्वतोऽस्तु युधिष्ठिरः । नेता यस्य हृषीकेशो योद्धा यस्य धनञ्जयः ॥

sa eva rājā dharmātmā śāśvato'stu yudhiṣṭhiraḥ | netā yasya hṛṣīkeśo yoddhā yasya dhanañjayaḥ

वे धर्मात्मा युधिष्ठिर ही सदा के लिए राजा हों, जिनके नेता हृषीकेश हैं और योद्धा धनंजय।

श्लोक 24 (5.141.24)

पृथिवी तस्य राष्ट्रं च यस्य भीमो महारथः । नकुलः सहदेवश्च द्रौपदेयाश्च माधव ॥

pṛthivī tasya rāṣṭraṃ ca yasya bhīmo mahārathaḥ | nakulaḥ sahadevaśca draupadeyāśca mādhava

माधव, पृथ्वी और राष्ट्र उसी के हैं जिसके पक्ष में महारथी भीम, नकुल और सहदेव, और द्रौपदी के पुत्र हैं,

श्लोक 25 (5.141.25)

धृष्टद्युम्नश्च पाञ्चाल्यः सात्यकिश्च महारथः । उत्तमौजा युधामन्युः सत्यधर्मा च सौमकिः ॥

dhṛṣṭadyumnaśca pāñcālyaḥ sātyakiśca mahārathaḥ | uttamaujā yudhāmanyuḥ satyadharmā ca saumakiḥ

पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, महारथी सात्यकि, उत्तमौजा, युधामन्यु, सोमकवंशी सत्यधर्मा,

श्लोक 26 (5.141.26)

चैद्यश्च चेकितानश्च शिखण्डी चापराजितः । इन्द्रगोपकवर्णाश्च केकया भ्रातरस्तथा । इन्द्रायुधसवर्णश्च कुन्तिभोजो महामनाः ॥

caidyaśca cekitānaśca śikhaṇḍī cāparājitaḥ | indragopakavarṇāśca kekayā bhrātarastathā | indrāyudhasavarṇaśca kuntibhojo mahāmanāḥ

चेदिराज और चेकितान, अपराजित शिखण्डी, इन्द्रगोप (बीरबहूटी) के समान लाल वर्ण वाले केकय भाई, और इन्द्रधनुष के समान वर्ण वाले महामना कुन्तिभोज,

श्लोक 27 (5.141.27)

मातुलो भीमसेनस्य श्येनजिच्च महारथः । शङ्खः पुत्रो विराटस्य निधिस्त्वं च जनार्दन ॥

mātulo bhīmasenasya śyenajicca mahārathaḥ | śaṅkhaḥ putro virāṭasya nidhistvaṃ ca janārdana

भीमसेन के मामा, महारथी श्येनजित्, विराटपुत्र शंख, और हे जनार्दन, निधि-स्वरूप तुम स्वयं।

श्लोक 28 (5.141.28)

महानयं कृष्ण कृतः क्षत्रस्य समुदानयः । राज्यं प्राप्तमिदं दीप्तं प्रथितं सर्वराजसु ॥

mahānayaṃ kṛṣṇa kṛtaḥ kṣatrasya samudānayaḥ | rājyaṃ prāptamidaṃ dīptaṃ prathitaṃ sarvarājasu

कृष्ण, क्षत्रियों का यह विशाल समुदाय एकत्र किया जा चुका है; सब राजाओं में प्रसिद्ध यह दीप्तिमान राज्य मानो प्राप्त हो ही गया है।

श्लोक 29 (5.141.29)

धार्तराष्ट्रस्य वार्ष्णेय शस्त्रयज्ञो भविष्यति । अस्य यज्ञस्य वेत्ता त्वं भविष्यसि जनार्दन ॥

dhārtarāṣṭrasya vārṣṇeya śastrayajño bhaviṣyati | asya yajñasya vettā tvaṃ bhaviṣyasi janārdana

वार्ष्णेय, धृतराष्ट्रपुत्र का एक शस्त्र-यज्ञ होगा, और हे जनार्दन, इस यज्ञ के ज्ञाता (अधिष्ठाता) तुम होगे।

श्लोक 30 (5.141.30)

आध्वर्यवं च ते कृष्ण क्रतावस्मिन्भविष्यति । होता चैवात्र बीभत्सुः सन्नद्धः स कपिध्वजः ॥

ādhvaryavaṃ ca te kṛṣṇa kratāvasminbhaviṣyati | hotā caivātra bībhatsuḥ sannaddhaḥ sa kapidhvajaḥ

कृष्ण, इस यज्ञ में अध्वर्यु का कार्य तुम्हारा होगा, और कवचधारी कपिध्वज बीभत्सु इसके होता होंगे।

श्लोक 31 (5.141.31)

गाण्डीवं स्रुक् तथा चाज्यं वीर्यं पुंसां भविष्यति । ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं स्थूणाकर्णं च माधव । मन्त्रास्तत्र भविष्यन्ति प्रयुक्ताः सव्यसाचिना ॥

gāṇḍīvaṃ sruk tathā cājyaṃ vīryaṃ puṃsāṃ bhaviṣyati | aindraṃ pāśupataṃ brāhmaṃ sthūṇākarṇaṃ ca mādhava | mantrāstatra bhaviṣyanti prayuktāḥ savyasācinā

गाण्डीव स्रुवा होगा और पुरुषों का पराक्रम घृत। माधव, सव्यसाची द्वारा प्रयुक्त ऐन्द्र, पाशुपत, ब्राह्म और स्थूणाकर्ण अस्त्र उसमें मन्त्र होंगे।

श्लोक 32 (5.141.32)

अनुयातश्च पितरमधिको वा पराक्रमे । गीतं स्तोत्रं स सौभद्रः सम्यक् तत्र भविष्यति ॥

anuyātaśca pitaramadhiko vā parākrame | gītaṃ stotraṃ sa saubhadraḥ samyak tatra bhaviṣyati

अपने पिता का अनुगामी, या पराक्रम में उनसे भी बढ़कर सौभद्र (अभिमन्यु) वहाँ विधिपूर्वक स्तोत्र-गान करेगा।

श्लोक 33 (5.141.33)

उद्गातात्र पुनर्भीमः प्रस्तोता सुमहाबलः । विनदन्स नरव्याघ्रो नागानीकान्तकृद्रणे ॥

udgātātra punarbhīmaḥ prastotā sumahābalaḥ | vinadansa naravyāghro nāgānīkāntakṛdraṇe

महाबली भीम यहाँ उद्गाता और प्रस्तोता होंगे — रण में गर्जना करने वाले, हाथियों की सेनाओं का अन्त करने वाले वे नरव्याघ्र।

श्लोक 34 (5.141.34)

स चैव तत्र धर्मात्मा शश्वद्राजा युधिष्ठिरः । जपैर्होमैश्च संयुक्तो ब्रह्मत्वं कारयिष्यति ॥

sa caiva tatra dharmātmā śaśvadrājā yudhiṣṭhiraḥ | japairhomaiśca saṃyukto brahmatvaṃ kārayiṣyati

और सदा स्थिर रहने वाले धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर जप और होम में लगे रहकर ब्रह्मा का कार्य करेंगे।

श्लोक 35 (5.141.35)

शङ्खशब्दाः समुरजा भेर्यश्च मधुसूदन । उत्कृष्टः सिंहनादश्च सुब्रह्मण्यो भविष्यति ॥

śaṅkhaśabdāḥ samurajā bheryaśca madhusūdana | utkṛṣṭaḥ siṃhanādaśca subrahmaṇyo bhaviṣyati

मधुसूदन, मृदंगों और भेरियों के साथ शंखों की ध्वनि और ऊँचे सिंहनाद उसमें सुब्रह्मण्य-आह्वान होंगे।

श्लोक 36 (5.141.36)

नकुलः सहदेवश्च माद्रीपुत्रौ यशस्विनौ । शामित्रं तौ महावीर्यौ सम्यक् तत्र भविष्यतः । तौ मैत्रावरुणाग्नीध्रौ महावीर्यौ भविष्यतः ॥

nakulaḥ sahadevaśca mādrīputrau yaśasvinau | śāmitraṃ tau mahāvīryau samyak tatra bhaviṣyataḥ | tau maitrāvaruṇāgnīdhrau mahāvīryau bhaviṣyataḥ

माद्री के यशस्वी पुत्र, महापराक्रमी नकुल और सहदेव वहाँ भली-भाँति शामित्र (पशु-संज्ञपन) का कार्य करेंगे; वे दोनों महावीर मैत्रावरुण और आग्नीध्र भी होंगे।

श्लोक 37 (5.141.37)

कल्माषदण्डा गोविन्द विमला रथपङ्क्तयः । यूपाः समुपकल्पन्तामस्मिन्यज्ञे जनार्दन ॥

kalmāṣadaṇḍā govinda vimalā rathapaṅktayaḥ | yūpāḥ samupakalpantāmasminyajñe janārdana

गोविन्द, चितकबरे दण्डों वाली निर्मल रथ-पंक्तियाँ इस यज्ञ में यूप बनें, हे जनार्दन।

श्लोक 38 (5.141.38)

कर्णिनालीकनाराचा वत्सदन्तोपबृंहणाः । तोमराः सोमकलशाः पवित्राणि धनूंषि च ॥

karṇinālīkanārācā vatsadantopabṛṃhaṇāḥ | tomarāḥ somakalaśāḥ pavitrāṇi dhanūṃṣi ca

कर्णी, नालीक और नाराच बाण, वत्सदन्त बाणों सहित, उसके उपकरण होंगे; तोमर सोम-कलश होंगे और धनुष पवित्र (छलनी)।

श्लोक 39 (5.141.39)

असयोऽत्र कपालानि पुरोडाशाः शिरांसि च । हविस्तु रुधिरं कृष्ण तस्मिन्यज्ञे भविष्यति ॥

asayo'tra kapālāni puroḍāśāḥ śirāṃsi ca | havistu rudhiraṃ kṛṣṇa tasminyajñe bhaviṣyati

कृष्ण, उस यज्ञ में तलवारें कपाल (पात्र) होंगी, सिर पुरोडाश होंगे, और रक्त हवि होगा।

श्लोक 40 (5.141.40)

इध्माः परिधयश्चैव शक्तयो विमला गदाः । सदस्या द्रोणशिष्याश्च कृपस्य च शरद्वतः ॥

idhmāḥ paridhayaścaiva śaktayo vimalā gadāḥ | sadasyā droṇaśiṣyāśca kṛpasya ca śaradvataḥ

शक्तियाँ और निर्मल गदाएँ समिधा और परिधि होंगी; द्रोण के और शरद्वान् के पुत्र कृप के शिष्य सदस्य होंगे।

श्लोक 41 (5.141.41)

इषवोऽत्र परिस्तोमा मुक्ता गाण्डीवधन्वना । महारथप्रयुक्ताश्च द्रोणद्रौणिप्रचोदिताः ॥

iṣavo'tra paristomā muktā gāṇḍīvadhanvanā | mahārathaprayuktāśca droṇadrauṇipracoditāḥ

गाण्डीवधारी के छोड़े हुए, महारथियों द्वारा चलाए गए, और द्रोण तथा अश्वत्थामा द्वारा प्रेरित बाण इसके परिस्तोम (सोम-चमस) होंगे।

श्लोक 42 (5.141.42)

प्रतिप्रास्थानिकं कर्म सात्यकिस्तु करिष्यति । दीक्षितो धार्तराष्ट्रोऽत्र पत्नी चास्य महाचमूः ॥

pratiprāsthānikaṃ karma sātyakistu kariṣyati | dīkṣito dhārtarāṣṭro'tra patnī cāsya mahācamūḥ

सात्यकि प्रतिप्रस्थाता का कार्य करेंगे। धृतराष्ट्रपुत्र यहाँ दीक्षित यजमान होगा, और उसकी विशाल सेना उसकी पत्नी।

श्लोक 43 (5.141.43)

घटोत्कचोऽत्र शामित्रं करिष्यति महाबलः । अतिरात्रे महाबाहो वितते यज्ञकर्मणि ॥

ghaṭotkaco'tra śāmitraṃ kariṣyati mahābalaḥ | atirātre mahābāho vitate yajñakarmaṇi

महाबाहो, जब अतिरात्र का यज्ञ-कर्म फैला होगा, तब महाबली घटोत्कच यहाँ शामित्र का कार्य करेगा।

श्लोक 44 (5.141.44)

दक्षिणा त्वस्य यज्ञस्य धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् । वैतानिके कर्ममुखे जातो यत्कृष्ण पावकात् ॥

dakṣiṇā tvasya yajñasya dhṛṣṭadyumnaḥ pratāpavān | vaitānike karmamukhe jāto yatkṛṣṇa pāvakāt

कृष्ण, इस यज्ञ की दक्षिणा प्रतापी धृष्टद्युम्न होंगे, जो वैतानिक कर्म के आरम्भ में अग्नि से उत्पन्न हुए थे।

श्लोक 45 (5.141.45)

यदब्रुवमहं कृष्ण कटुकानि स्म पाण्डवान् । प्रियार्थं धार्तराष्ट्रस्य तेन तप्ये ह्यकर्मणा ॥

yadabruvamahaṃ kṛṣṇa kaṭukāni sma pāṇḍavān | priyārthaṃ dhārtarāṣṭrasya tena tapye hyakarmaṇā

कृष्ण, धृतराष्ट्रपुत्र को प्रसन्न करने के लिए मैंने पाण्डवों से जो कटु वचन कहे थे, उस दुष्कर्म के कारण मैं पछतावे से जलता हूँ।

श्लोक 46 (5.141.46)

यदा द्रक्ष्यसि मां कृष्ण निहतं सव्यसाचिना । पुनश्चितिस्तदा चास्य यज्ञस्याथ भविष्यति ॥

yadā drakṣyasi māṃ kṛṣṇa nihataṃ savyasācinā | punaścitistadā cāsya yajñasyātha bhaviṣyati

कृष्ण, जब तुम मुझे सव्यसाची के हाथों मारा गया देखोगे, तब इस यज्ञ की पुनश्चिति (वेदी का पुनः चयन) होगी।

श्लोक 47 (5.141.47)

दुःशासनस्य रुधिरं यदा पास्यति पाण्डवः । आनर्दं नर्दतः सम्यक् तदा सूयं भविष्यति ॥

duḥśāsanasya rudhiraṃ yadā pāsyati pāṇḍavaḥ | ānardaṃ nardataḥ samyak tadā sūyaṃ bhaviṣyati

जब पाण्डव भीम महानाद करते हुए दुःशासन का रक्त पीएँगे, तब सोम का अभिषव होगा।

श्लोक 48 (5.141.48)

यदा द्रोणं च भीष्मं च पाञ्चाल्यौ पातयिष्यतः । तदा यज्ञावसानं तद्भविष्यति जनार्दन ॥

yadā droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca pāñcālyau pātayiṣyataḥ | tadā yajñāvasānaṃ tadbhaviṣyati janārdana

जनार्दन, जब दोनों पांचाल वीर द्रोण और भीष्म को गिरा देंगे, तब उस यज्ञ का विराम होगा।

श्लोक 49 (5.141.49)

दुर्योधनं यदा हन्ता भीमसेनो महाबलः । तदा समाप्स्यते यज्ञो धार्तराष्ट्रस्य माधव ॥

duryodhanaṃ yadā hantā bhīmaseno mahābalaḥ | tadā samāpsyate yajño dhārtarāṣṭrasya mādhava

माधव, जब महाबली भीमसेन दुर्योधन का वध करेंगे, तब धृतराष्ट्रपुत्र का यज्ञ समाप्त होगा।

श्लोक 50 (5.141.50)

स्नुषाश्च प्रस्नुषाश्चैव धृतराष्ट्रस्य सङ्गताः । हतेश्वरा नष्टपुत्रा हतनाथाश्च केशव ॥

snuṣāśca prasnuṣāścaiva dhṛtarāṣṭrasya saṅgatāḥ | hateśvarā naṣṭaputrā hatanāthāśca keśava

केशव, धृतराष्ट्र की बहुएँ और पौत्र-वधुएँ, एकत्र होकर — जिनके स्वामी मारे गए, पुत्र नष्ट हो गए और रक्षक मारे गए —

श्लोक 51 (5.141.51)

रुदन्त्यः सहगान्धार्या श्वगृध्रकुरराकुले । स यज्ञेऽस्मिन्नवभृथो भविष्यति जनार्दन ॥

rudantyaḥ sahagāndhāryā śvagṛdhrakurarākule | sa yajñe'sminnavabhṛtho bhaviṣyati janārdana

कुत्तों, गिद्धों और कुररों से भरी रणभूमि में गान्धारी के साथ रोती होंगी — जनार्दन, वही इस यज्ञ का अवभृथ-स्नान होगा।

श्लोक 52 (5.141.52)

विद्यावृद्धा वयोवृद्धाः क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ । वृथा मृत्युं न कुर्वीरंस्त्वत्कृते मधुसूदन ॥

vidyāvṛddhā vayovṛddhāḥ kṣatriyāḥ kṣatriyarṣabha | vṛthā mṛtyuṃ na kurvīraṃstvatkṛte madhusūdana

हे क्षत्रियश्रेष्ठ मधुसूदन, विद्या में वृद्ध और आयु में वृद्ध ये क्षत्रिय तुम्हारे कारण व्यर्थ मृत्यु न पाएँ।

श्लोक 53 (5.141.53)

शस्त्रेण निधनं गच्छेत्समृद्धं क्षत्रमण्डलम् । कुरुक्षेत्रे पुण्यतमे त्रैलोक्यस्यापि केशव ॥

śastreṇa nidhanaṃ gacchetsamṛddhaṃ kṣatramaṇḍalam | kurukṣetre puṇyatame trailokyasyāpi keśava

केशव, क्षत्रियों का यह समृद्ध समुदाय तीनों लोकों में सबसे पवित्र कुरुक्षेत्र में शस्त्रों से मृत्यु प्राप्त करे।

श्लोक 54 (5.141.54)

तदत्र पुण्डरीकाक्ष विधत्स्व यदभीप्सितम् । यथा कार्त्स्न्येन वार्ष्णेय क्षत्रं स्वर्गमवाप्नुयात् ॥

tadatra puṇḍarīkākṣa vidhatsva yadabhīpsitam | yathā kārtsnyena vārṣṇeya kṣatraṃ svargamavāpnuyāt

हे कमलनयन, यहाँ जो तुम्हें अभीष्ट हो वैसा प्रबन्ध करो, जिससे हे वार्ष्णेय, सम्पूर्ण क्षत्रिय-समाज स्वर्ग प्राप्त करे।

श्लोक 55 (5.141.55)

यावत्स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च जनार्दन । तावत्कीर्तिभवः शब्दः शाश्वतोऽयं भविष्यति ॥

yāvatsthāsyanti girayaḥ saritaśca janārdana | tāvatkīrtibhavaḥ śabdaḥ śāśvato'yaṃ bhaviṣyati

जनार्दन, जब तक पर्वत खड़े रहेंगे और नदियाँ बहेंगी, तब तक उनकी कीर्ति का यह शब्द शाश्वत बना रहेगा।

श्लोक 56 (5.141.56)

ब्राह्मणाः कथयिष्यन्ति महाभारतमाहवम् । समागमेषु वार्ष्णेय क्षत्रियाणां यशोधनम् ॥

brāhmaṇāḥ kathayiṣyanti mahābhāratamāhavam | samāgameṣu vārṣṇeya kṣatriyāṇāṃ yaśodhanam

वार्ष्णेय, ब्राह्मण अपनी सभाओं में भरतवंशियों के इस महायुद्ध की कथा कहेंगे, जो क्षत्रियों की कीर्ति का धन है।

श्लोक 57 (5.141.57)

समुपानय कौन्तेयं युद्धाय मम केशव । मन्त्रसंवरणं कुर्वन्नित्यमेव परन्तप ॥

samupānaya kaunteyaṃ yuddhāya mama keśava | mantrasaṃvaraṇaṃ kurvannityameva parantapa

केशव, कुन्तीपुत्र अर्जुन को मुझसे युद्ध करने के लिए ले आओ, और हे परन्तप, इस मन्त्रणा को सदा गुप्त रखना।"

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