उद्योग पर्व · अध्याय 142
श्रीकृष्ण द्वारा पाण्डवों की विजय की भविष्यवाणी
राज्य के प्रति कर्ण की अस्वीकृति पर श्रीकृष्ण मुस्कुराते हैं और अर्जुन के ऊँचे, दिव्य रूप से रचे वानर-ध्वज की ओर संकेत करते हुए पाण्डवों की विजय को निश्चित बताते हैं। एक टेक के साथ वे कहते हैं कि जब कर्ण युद्ध में अर्जुन, युधिष्ठिर, भीम, नकुल-सहदेव को, और अर्जुन द्वारा रोके गए कौरव-नायकों को देखेगा, तब न सत्ययुग रहेगा, न त्रेता, न द्वापर। फिर वे भीष्म, द्रोण, कृप और राजाओं के लिए सन्देश देते हैं — ऋतु सुहावनी और सम्पन्न है, सात दिन बाद अमावस्या है, उसी दिन युद्ध आरम्भ हो, और शस्त्र से मरने वाले उत्तम गति पाएँगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.142.1)
कर्णस्य वचनं श्रुत्वा केशवः परवीरहा । उवाच प्रहसन्वाक्यं स्मितपूर्वमिदं यथा ॥
karṇasya vacanaṃ śrutvā keśavaḥ paravīrahā | uvāca prahasanvākyaṃ smitapūrvamidaṃ yathā
कर्ण की बात सुनकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले केशव हँसे और मुस्कुराते हुए यह वचन बोले —
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 2 (5.142.2)
अपि त्वां न लभेत्कर्ण राज्यलम्भोपपादनम् । मया दत्तां हि पृथिवीं न प्रशासितुमिच्छसि ॥
api tvāṃ na labhetkarṇa rājyalambhopapādanam | mayā dattāṃ hi pṛthivīṃ na praśāsitumicchasi
"कर्ण, क्या राज्य-प्राप्ति का यह प्रस्ताव तुम्हें आकर्षित नहीं करता? मेरे द्वारा दी जा रही पृथ्वी का शासन तुम करना नहीं चाहते।
श्लोक 3 (5.142.3)
ध्रुवो जयः पाण्डवानामितीदं । न संशयः कश्चन विद्यतेऽत्र । जयध्वजो दृश्यते पाण्डवस्य । समुच्छ्रितो वानरराज उग्रः ॥
dhruvo jayaḥ pāṇḍavānāmitīdaṃ | na saṃśayaḥ kaścana vidyate'tra | jayadhvajo dṛśyate pāṇḍavasya | samucchrito vānararāja ugraḥ
पाण्डवों की विजय निश्चित है; इसमें कोई भी संशय नहीं है। पाण्डव का विजय-ध्वज, जिस पर उग्र वानरराज विराजमान है, ऊँचा उठा हुआ दिखाई दे रहा है।
श्लोक 4 (5.142.4)
दिव्या माया विहिता भौमनेन । समुच्छ्रिता इन्द्रकेतुप्रकाशाः । दिव्यानि भूतानि जयावहानि । दृश्यन्ति चैवात्र भयानकानि ॥
divyā māyā vihitā bhaumanena | samucchritā indraketuprakāśāḥ | divyāni bhūtāni jayāvahāni | dṛśyanti caivātra bhayānakāni
भौमन (विश्वकर्मा) ने उसमें दिव्य माया रची है; वह इन्द्रध्वज के समान चमकता हुआ ऊँचा उठा है। उस पर विजय दिलाने वाले और भयानक दिव्य प्राणी दिखाई देते हैं।
श्लोक 5 (5.142.5)
न सञ्जते शैलवनस्पतिभ्य । ऊर्ध्वं तिर्यग्योजनमात्ररूपः । श्रीमान्ध्वजः कर्ण धनञ्जयस्य । समुच्छ्रितः पावकतुल्यरूपः ॥
na sañjate śailavanaspatibhya | ūrdhvaṃ tiryagyojanamātrarūpaḥ | śrīmāndhvajaḥ karṇa dhanañjayasya | samucchritaḥ pāvakatulyarūpaḥ
वह पर्वतों और वृक्षों में नहीं अटकता; ऊपर और चारों ओर एक योजन तक फैला है। कर्ण, धनंजय का वह शोभायमान ध्वज अग्नि के समान रूप वाला होकर ऊँचा उठा है।
श्लोक 6 (5.142.6)
यदा द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् । ऐन्द्रमस्त्रं विकुर्वाणमुभे चाप्यग्निमारुते ॥
yadā drakṣyasi saṅgrāme śvetāśvaṃ kṛṣṇasārathim | aindramastraṃ vikurvāṇamubhe cāpyagnimārute
जब तुम युद्ध में श्वेत घोड़ों वाले, कृष्ण जिसके सारथि हैं, उस अर्जुन को ऐन्द्र अस्त्र और आग्नेय तथा वायव्य अस्त्र भी चलाते देखोगे,
श्लोक 7 (5.142.7)
गाण्डीवस्य च निर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । न तदा भविता त्रेता न कृतं द्वापरं न च ॥
gāṇḍīvasya ca nirghoṣaṃ visphūrjitamivāśaneḥ | na tadā bhavitā tretā na kṛtaṃ dvāparaṃ na ca
और वज्र की कड़क जैसी गाण्डीव की टंकार सुनोगे, तब न त्रेता रहेगा, न सत्ययुग और न द्वापर।
श्लोक 8 (5.142.8)
यदा द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । जपहोमसमायुक्तं स्वां रक्षन्तं महाचमूम् ॥
yadā drakṣyasi saṅgrāme kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | japahomasamāyuktaṃ svāṃ rakṣantaṃ mahācamūm
जब तुम युद्ध में जप और होम में लगे, अपनी विशाल सेना की रक्षा करते हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को देखोगे,
श्लोक 9 (5.142.9)
आदित्यमिव दुर्धर्षं तपन्तं शत्रुवाहिनीम् । न तदा भविता त्रेता न कृतं द्वापरं न च ॥
ādityamiva durdharṣaṃ tapantaṃ śatruvāhinīm | na tadā bhavitā tretā na kṛtaṃ dvāparaṃ na ca
सूर्य के समान दुर्धर्ष, शत्रु-सेना को तपाते हुए — तब न त्रेता रहेगा, न सत्ययुग और न द्वापर।
श्लोक 10 (5.142.10)
यदा द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे भीमसेनं महाबलम् । दुःशासनस्य रुधिरं पीत्वा नृत्यन्तमाहवे ॥
yadā drakṣyasi saṅgrāme bhīmasenaṃ mahābalam | duḥśāsanasya rudhiraṃ pītvā nṛtyantamāhave
जब तुम युद्ध में महाबली भीमसेन को दुःशासन का रक्त पीकर रणभूमि में नाचते हुए देखोगे,
श्लोक 11 (5.142.11)
प्रभिन्नमिव मातङ्गं प्रतिद्विरदघातिनम् । न तदा भविता त्रेता न कृतं द्वापरं न च ॥
prabhinnamiva mātaṅgaṃ pratidviradaghātinam | na tadā bhavitā tretā na kṛtaṃ dvāparaṃ na ca
प्रतिद्वन्द्वी हाथी को मार डालने वाले मदमत्त गजराज के समान — तब न त्रेता रहेगा, न सत्ययुग और न द्वापर।
श्लोक 12 (5.142.12)
यदा द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे द्रोणं शान्तनवं कृपम् । सुयोधनं च राजानं सैन्धवं च जयद्रथम् ॥
yadā drakṣyasi saṅgrāme droṇaṃ śāntanavaṃ kṛpam | suyodhanaṃ ca rājānaṃ saindhavaṃ ca jayadratham
जब तुम युद्ध में द्रोण, शान्तनुनन्दन भीष्म, कृप, राजा सुयोधन और सिन्धुराज जयद्रथ को
श्लोक 13 (5.142.13)
युद्धायापततस्तूर्णं वारितान्सव्यसाचिना । न तदा भविता त्रेता न कृतं द्वापरं न च ॥
yuddhāyāpatatastūrṇaṃ vāritānsavyasācinā | na tadā bhavitā tretā na kṛtaṃ dvāparaṃ na ca
वेग से युद्ध के लिए झपटते और सव्यसाची द्वारा रोके जाते देखोगे, तब न त्रेता रहेगा, न सत्ययुग और न द्वापर।
श्लोक 14 (5.142.14)
यदा द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे माद्रीपुत्रौ महाबलौ । वाहिनीं धार्तराष्ट्राणां क्षोभयन्तौ गजाविव ॥
yadā drakṣyasi saṅgrāme mādrīputrau mahābalau | vāhinīṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ kṣobhayantau gajāviva
जब तुम युद्ध में माद्री के दोनों महाबली पुत्रों को दो हाथियों की भाँति धृतराष्ट्रपुत्रों की सेना को मथते हुए देखोगे,
श्लोक 15 (5.142.15)
विगाढे शस्त्रसंपाते परवीररथारुजौ । न तदा भविता त्रेता न कृतं द्वापरं न च ॥
vigāḍhe śastrasaṃpāte paravīrarathārujau | na tadā bhavitā tretā na kṛtaṃ dvāparaṃ na ca
शस्त्रों की घमासान मार में घुसकर शत्रुवीरों के रथों को तोड़ते हुए — तब न त्रेता रहेगा, न सत्ययुग और न द्वापर।
श्लोक 16 (5.142.16)
ब्रूयाः कर्ण इतो गत्वा द्रोणं शान्तनवं कृपम् । सौम्योऽयं वर्तते मासः सुप्रापयवसेन्धनः ॥
brūyāḥ karṇa ito gatvā droṇaṃ śāntanavaṃ kṛpam | saumyo'yaṃ vartate māsaḥ suprāpayavasendhanaḥ
कर्ण, यहाँ से जाकर द्रोण, शान्तनुनन्दन और कृप से कहना — यह सौम्य मास चल रहा है, जिसमें घास-चारा और ईंधन सुलभ है;
श्लोक 17 (5.142.17)
सर्वौषधिवनस्फीतः फलवानल्पमक्षिकः । निष्पङ्को रसवत्तोयो नात्युष्णशिशिरः सुखः ॥
sarvauṣadhivanasphītaḥ phalavānalpamakṣikaḥ | niṣpaṅko rasavattoyo nātyuṣṇaśiśiraḥ sukhaḥ
सब ओषधियों और वनों से भरपूर, फलों से युक्त, कम मक्खियों वाला; कीचड़ नहीं है, जल स्वादिष्ट है, न अधिक गर्मी है न अधिक ठण्ड — सुखद ऋतु है।
श्लोक 18 (5.142.18)
सप्तमाच्चापि दिवसादमावास्या भविष्यति । सङ्ग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्रदेवताम् ॥
saptamāccāpi divasādamāvāsyā bhaviṣyati | saṅgrāmo yujyatāṃ tasyāṃ tāmāhuḥ śakradevatām
आज से सातवें दिन अमावस्या होगी। उसी दिन युद्ध आरम्भ हो; कहते हैं उस तिथि के देवता इन्द्र हैं।
श्लोक 19 (5.142.19)
तथा राज्ञो वदेः सर्वान्ये युद्धायाभ्युपागताः । यद्वो मनीषितं तद्वै सर्वं संपादयाम्यहम् ॥
tathā rājño vadeḥ sarvānye yuddhāyābhyupāgatāḥ | yadvo manīṣitaṃ tadvai sarvaṃ saṃpādayāmyaham
इसी प्रकार युद्ध के लिए आए सब राजाओं से कहना — तुम्हारे मन में जो अभिलाषा है, वह सब मैं पूरी करूँगा।
श्लोक 20 (5.142.20)
राजानो राजपुत्राश्च दुर्योधनवशानुगाः । प्राप्य शस्त्रेण निधनं प्राप्स्यन्ति गतिमुत्तमाम् ॥
rājāno rājaputrāśca duryodhanavaśānugāḥ | prāpya śastreṇa nidhanaṃ prāpsyanti gatimuttamām
दुर्योधन के वश में चलने वाले राजा और राजकुमार शस्त्र से मृत्यु पाकर उत्तम गति प्राप्त करेंगे।"