Skip to main content

उद्योग पर्व · अध्याय 144

कुन्ती का कर्ण के पास जाने का निश्चय

श्रीकृष्ण के बिना सन्धि कराए कौरवों के पास से लौट जाने पर विदुर कुन्ती के पास आकर शोक प्रकट करते हैं कि दुर्योधन उनकी बात नहीं सुनता और अब युद्ध तथा वीरों का संहार निश्चित है। कुन्ती स्वजनों के आने वाले विनाश पर व्यथित होकर विचार करती हैं: उन्हें भरोसा है कि द्रोण और भीष्म पाण्डवों से मन लगाकर नहीं लड़ेंगे, पर वे बलवान और पाण्डवों से द्वेष रखने वाले कर्ण से डरती हैं। दुर्वासा के वर का और यह स्मरण करके कि कैसे कौतूहलवश उन्होंने बालपन में सूर्य को बुलाकर कर्ण को जन्म दिया था, वे उसे सच्चाई बताने का निश्चय करती हैं, गंगा के तट पर जाती हैं और जप करते कर्ण के पीछे धूप में खड़ी प्रतीक्षा करती हैं, जब तक वह मुड़कर उन्हें प्रणाम नहीं करता।

अध्याय 143अध्याय-सूचीअध्याय 145

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.144.1)

असिद्धानुनये कृष्णे कुरुभ्यः पाण्डवान्गते । अभिगम्य पृथां क्षत्ता शनैः शोचन्निवाब्रवीत् ॥

asiddhānunaye kṛṣṇe kurubhyaḥ pāṇḍavāngate | abhigamya pṛthāṃ kṣattā śanaiḥ śocannivābravīt

जब श्रीकृष्ण कौरवों को मनाने में असफल होकर पाण्डवों के पास चले गए, तब क्षत्ता (विदुर) पृथा के पास जाकर शोकाकुल-से धीरे-धीरे बोले —

विदुर उवाच

श्लोक 2 (5.144.2)

जानासि मे जीवपुत्रे भावं नित्यमविग्रहे । क्रोशतो न च गृह्णीते वचनं मे सुयोधनः ॥

jānāsi me jīvaputre bhāvaṃ nityamavigrahe | krośato na ca gṛhṇīte vacanaṃ me suyodhanaḥ

"हे जीवित पुत्रों वाली, तुम जानती हो कि मेरा मन सदा कलह के विरुद्ध रहता है; पर मेरे पुकार-पुकारकर कहने पर भी सुयोधन मेरी बात नहीं मानता।

श्लोक 3 (5.144.3)

उपपन्नो ह्यसौ राजा चेदिपाञ्चालकेकयैः । भीमार्जुनाभ्यां कृष्णेन युयुधानयमैरपि ॥

upapanno hyasau rājā cedipāñcālakekayaiḥ | bhīmārjunābhyāṃ kṛṣṇena yuyudhānayamairapi

वह राजा (युधिष्ठिर) चेदि, पांचाल और केकय वीरों से, भीम और अर्जुन से, श्रीकृष्ण से तथा युयुधान और नकुल-सहदेव से सम्पन्न है।

श्लोक 4 (5.144.4)

उपप्लाव्ये निविष्टोऽपि धर्ममेव युधिष्ठिरः । काङ्क्षते ज्ञातिसौहार्दाद्बलवान्दुर्बलो यथा ॥

upaplāvye niviṣṭo'pi dharmameva yudhiṣṭhiraḥ | kāṅkṣate jñātisauhārdādbalavāndurbalo yathā

उपप्लव्य में डेरा डाले हुए भी युधिष्ठिर बन्धुओं के स्नेह के कारण धर्म ही चाहते हैं — बलवान होते हुए भी दुर्बल की भाँति।

श्लोक 5 (5.144.5)

राजा तु धृतराष्ट्रोऽयं वयोवृद्धो न शाम्यति । मत्तः पुत्रमदेनैव विधर्मे पथि वर्तते ॥

rājā tu dhṛtarāṣṭro'yaṃ vayovṛddho na śāmyati | mattaḥ putramadenaiva vidharme pathi vartate

पर यह राजा धृतराष्ट्र, वृद्ध होने पर भी, शान्त नहीं होते; पुत्र के मद में मतवाले होकर अधर्म के मार्ग पर चल रहे हैं।

श्लोक 6 (5.144.6)

जयद्रथस्य कर्णस्य तथा दुःशासनस्य च । सौबलस्य च दुर्बुद्ध्या मिथो भेदः प्रपत्स्यते ॥

jayadrathasya karṇasya tathā duḥśāsanasya ca | saubalasya ca durbuddhyā mitho bhedaḥ prapatsyate

जयद्रथ, कर्ण, दुःशासन और सुबलपुत्र (शकुनि) की दुर्बुद्धि से दोनों पक्षों में परस्पर फूट पड़ जाएगी।

श्लोक 7 (5.144.7)

अधर्मेण हि धर्मिष्ठं ह्रियते राज्यमीदृशम् । येषां तेषामयं धर्मः सानुबन्धो भविष्यति ॥

adharmeṇa hi dharmiṣṭhaṃ hriyate rājyamīdṛśam | yeṣāṃ teṣāmayaṃ dharmaḥ sānubandho bhaviṣyati

क्योंकि परम धर्मात्मा का ऐसा राज्य अधर्म से छीना जा रहा है; जिनका यह "धर्म" है, उन्हें इसका पूरा परिणाम भोगना पड़ेगा।

श्लोक 8 (5.144.8)

क्रियमाणे बलाद्धर्मे कुरुभिः को न संज्वरेत् । असाम्ना केशवे याते समुद्योक्ष्यन्ति पाण्डवाः ॥

kriyamāṇe balāddharme kurubhiḥ ko na saṃjvaret | asāmnā keśave yāte samudyokṣyanti pāṇḍavāḥ

जब कौरव बलपूर्वक धर्म को बिगाड़ रहे हैं, तब कौन सन्तप्त न होगा? केशव के बिना सन्धि किए लौट जाने पर पाण्डव युद्ध की तैयारी करेंगे।

श्लोक 9 (5.144.9)

ततः कुरूणामनयो भविता वीरनाशनः । चिन्तयन्न लभे निद्रामहःसु च निशासु च ॥

tataḥ kurūṇāmanayo bhavitā vīranāśanaḥ | cintayanna labhe nidrāmahaḥsu ca niśāsu ca

तब कौरवों की अनीति वीरों के विनाश का कारण बनेगी। यही सोचते हुए मुझे न दिन में नींद आती है, न रात में।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (5.144.10)

श्रुत्वा तु कुन्ती तद्वाक्यमर्थकामेन भाषितम् । सा निःश्वसन्ती दुःखार्ता मनसा विममर्श ह ॥

śrutvā tu kuntī tadvākyamarthakāmena bhāṣitam | sā niḥśvasantī duḥkhārtā manasā vimamarśa ha

हितैषी विदुर के कहे ये वचन सुनकर कुन्ती दुःख से व्याकुल होकर लम्बी साँसें लेती हुई मन ही मन विचार करने लगीं —

कुन्त्युवाच

श्लोक 11 (5.144.11)

धिगस्त्वर्थं यत्कृतेयं सुमहाञ्ज्ञातिसंक्षयः । वर्त्स्यते सुहृदां चैव युद्धेऽस्मिन्वै पराभवः ॥

dhigastvarthaṃ yatkṛteyaṃ sumahāñjñātisaṃkṣayaḥ | vartsyate suhṛdāṃ caiva yuddhe'sminvai parābhavaḥ

"धिक्कार है उस धन को, जिसके लिए यह स्वजनों का महान संहार होगा! इस युद्ध में मित्रों का भी विनाश होगा।

श्लोक 12 (5.144.12)

पाण्डवाश्चेदिपञ्चाला यादवाश्च समागताः । भारतैः सह योत्स्यन्ति किं नु दुःखमतःपरम् ॥

pāṇḍavāścedipañcālā yādavāśca samāgatāḥ | bhārataiḥ saha yotsyanti kiṃ nu duḥkhamataḥparam

पाण्डव, चेदि, पांचाल और यादव मिलकर भरतवंशियों से युद्ध करेंगे; इससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?

श्लोक 13 (5.144.13)

पश्ये दोषं ध्रुवं युद्धे तथाऽयुद्धे पराभवम् । अधनस्य मृतं श्रेयो न हि ज्ञातिक्षयो जयः । इति मे चिन्तयन्त्या वै हृदि दुःखं प्रवर्तते ॥

paśye doṣaṃ dhruvaṃ yuddhe tathā'yuddhe parābhavam | adhanasya mṛtaṃ śreyo na hi jñātikṣayo jayaḥ | iti me cintayantyā vai hṛdi duḥkhaṃ pravartate

युद्ध में मुझे निश्चित दोष दिखाई देता है और युद्ध न करने में पराभव। निर्धन के लिए मृत्यु ही श्रेयस्कर है, पर स्वजनों के संहार में विजय नहीं होती। यही सोचते-सोचते मेरे हृदय में दुःख उमड़ रहा है।

श्लोक 14 (5.144.14)

पितामहः शान्तनव आचार्यश्च युधां पतिः । कर्णश्च धार्तराष्ट्रार्थं वर्धयन्ति भयं मम ॥

pitāmahaḥ śāntanava ācāryaśca yudhāṃ patiḥ | karṇaśca dhārtarāṣṭrārthaṃ vardhayanti bhayaṃ mama

शान्तनुनन्दन पितामह, योद्धाओं के स्वामी आचार्य और कर्ण — दुर्योधन के पक्ष में रहकर — मेरा भय बढ़ा रहे हैं।

श्लोक 15 (5.144.15)

नाचार्यः कामवाञ्शिष्यैर्द्रोणो युद्ध्येत जातुचित् । पाण्डवेषु कथं हार्दं कुर्यान्न च पितामहः ॥

nācāryaḥ kāmavāñśiṣyairdroṇo yuddhyeta jātucit | pāṇḍaveṣu kathaṃ hārdaṃ kuryānna ca pitāmahaḥ

पर आचार्य द्रोण अपनी इच्छा से अपने शिष्यों से कभी नहीं लड़ेंगे; और पितामह भी पाण्डवों के प्रति स्नेह कैसे न रखेंगे?

श्लोक 16 (5.144.16)

अयं त्वेको वृथादृष्टिर्धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः । मोहानुवर्ती सततं पापो द्वेष्टि च पाण्डवान् ॥

ayaṃ tveko vṛthādṛṣṭirdhārtarāṣṭrasya durmateḥ | mohānuvartī satataṃ pāpo dveṣṭi ca pāṇḍavān

यह अकेला ही मिथ्या दृष्टि वाला है, जो दुर्बुद्धि दुर्योधन के मोह का सदा अनुसरण करता है, और वह पापी पाण्डवों से द्वेष रखता है।

श्लोक 17 (5.144.17)

महत्यनर्थे निर्बन्धी बलवांश्च विशेषतः । कर्णः सदा पाण्डवानां तन्मे दहति संप्रति ॥

mahatyanarthe nirbandhī balavāṃśca viśeṣataḥ | karṇaḥ sadā pāṇḍavānāṃ tanme dahati saṃprati

कर्ण सदा पाण्डवों के बड़े अनर्थ पर अड़ा रहता है और वह विशेष रूप से बलवान भी है; यही बात इस समय मुझे जला रही है।

श्लोक 18 (5.144.18)

आशंसे त्वद्य कर्णस्य मनोऽहं पाण्डवान्प्रति । प्रसादयितुमासाद्य दर्शयन्ती यथातथम् ॥

āśaṃse tvadya karṇasya mano'haṃ pāṇḍavānprati | prasādayitumāsādya darśayantī yathātatham

फिर भी आज मुझे आशा है कि मैं उसके पास जाकर और उसे सच्चाई ज्यों-की-त्यों बताकर कर्ण के मन को पाण्डवों के प्रति प्रसन्न कर सकूँगी।

श्लोक 19 (5.144.19)

तोषितो भगवान्यत्र दुर्वासा मे वरं ददौ । आह्वानं मन्त्रसंयुक्तं वसन्त्याः पितृवेश्मनि ॥

toṣito bhagavānyatra durvāsā me varaṃ dadau | āhvānaṃ mantrasaṃyuktaṃ vasantyāḥ pitṛveśmani

जब मैं पिता के घर में रहती थी, तब भगवान दुर्वासा ने प्रसन्न होकर मुझे एक वर दिया था — मन्त्र से युक्त आवाहन की विद्या।

श्लोक 20 (5.144.20)

साहमन्तःपुरे राज्ञः कुन्तिभोजपुरस्कृता । चिन्तयन्ती बहुविधं हृदयेन विदूयता ॥

sāhamantaḥpure rājñaḥ kuntibhojapuraskṛtā | cintayantī bahuvidhaṃ hṛdayena vidūyatā

राजा कुन्तिभोज से सम्मानित होकर मैं उनके अन्तःपुर में रहती थी और व्याकुल हृदय से अनेक प्रकार की बातें सोचती रहती थी —

श्लोक 21 (5.144.21)

बलाबलं च मन्त्राणां ब्राह्मणस्य च वाग्बलम् । स्त्रीभावाद्बालभावाच्च चिन्तयन्ती पुनः पुनः ॥

balābalaṃ ca mantrāṇāṃ brāhmaṇasya ca vāgbalam | strībhāvādbālabhāvācca cintayantī punaḥ punaḥ

मन्त्रों के बल-अबल और ब्राह्मण की वाणी की शक्ति के विषय में; स्त्री-स्वभाव और बालपन के कारण मैं बार-बार यही सोचती रहती थी।

श्लोक 22 (5.144.22)

धात्र्या विस्रब्धया गुप्ता सखीजनवृता तदा । दोषं परिहरन्ती च पितुश्चारित्र्यरक्षिणी ॥

dhātryā visrabdhayā guptā sakhījanavṛtā tadā | doṣaṃ pariharantī ca pituścāritryarakṣiṇī

तब एक विश्वस्त धाय मेरी रक्षा करती थी और सखियाँ मुझे घेरे रहती थीं; मैं दोषों से बचती हुई पिता के चरित्र की रक्षा करती थी।

श्लोक 23 (5.144.23)

कथं नु सुकृतं मे स्यान्नापराधवती कथम् । भवेयमिति संचिन्त्य ब्राह्मणं तं नमस्य च ॥

kathaṃ nu sukṛtaṃ me syānnāparādhavatī katham | bhaveyamiti saṃcintya brāhmaṇaṃ taṃ namasya ca

'मैं कैसे सत्कर्म करूँ और कैसे अपराध से बचूँ?' — यह सोचकर और उस ब्राह्मण को प्रणाम करके,

श्लोक 24 (5.144.24)

कौतूहलात्तु तं लब्ध्वा बालिश्यादाचरं तदा । कन्या सती देवमर्कमासादयमहं ततः ॥

kautūhalāttu taṃ labdhvā bāliśyādācaraṃ tadā | kanyā satī devamarkamāsādayamahaṃ tataḥ

उस (मन्त्र) को पाकर मैंने कौतूहल और बालबुद्धि से उसका प्रयोग किया; और इस प्रकार कुमारी रहते हुए ही मैंने सूर्यदेव को अपने पास बुला लिया।

श्लोक 25 (5.144.25)

योऽसौ कानीनगर्भो मे पुत्रवत्परिरक्षितः । कस्मान्न कुर्याद्वचनं पथ्यं भ्रातृहितं तथा ॥

yo'sau kānīnagarbho me putravatparirakṣitaḥ | kasmānna kuryādvacanaṃ pathyaṃ bhrātṛhitaṃ tathā

कुमारी अवस्था में जिसे मैंने गर्भ में धारण किया और पुत्र की भाँति जिसकी रक्षा की, वह अपने भाइयों के हित की यह कल्याणकारी बात क्यों न मानेगा?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (5.144.26)

इति कुन्ती विनिश्चित्य कार्यनिश्चयमुत्तमम् । कार्यार्थमभिनिश्चित्य ययौ भागीरथीं प्रति ॥

iti kuntī viniścitya kāryaniścayamuttamam | kāryārthamabhiniścitya yayau bhāgīrathīṃ prati

इस प्रकार उत्तम निश्चय करके और अपने कार्य का दृढ़ संकल्प लेकर कुन्ती भागीरथी (गंगा) की ओर चल पड़ीं।

श्लोक 27 (5.144.27)

आत्मजस्य ततस्तस्य घृणिनः सत्यसङ्गिनः । गङ्गातीरे पृथापश्यज्जपस्थानमनुत्तमम् ॥

ātmajasya tatastasya ghṛṇinaḥ satyasaṅginaḥ | gaṅgātīre pṛthāpaśyajjapasthānamanuttamam

तब गंगा के तट पर पृथा ने अपने उस दयालु और सत्यनिष्ठ पुत्र का उत्तम जप-स्थान देखा।

श्लोक 28 (5.144.28)

प्राङ्मुखस्योर्ध्वबाहोः सा पर्यतिष्ठत पृष्ठतः । जप्यावसानं कार्यार्थं प्रतीक्षन्ती तपस्विनी ॥

prāṅmukhasyordhvabāhoḥ sā paryatiṣṭhata pṛṣṭhataḥ | japyāvasānaṃ kāryārthaṃ pratīkṣantī tapasvinī

पूर्व की ओर मुख करके भुजाएँ ऊपर उठाए खड़े कर्ण के पीछे वह तपस्विनी जा खड़ी हुई और अपने कार्य के लिए जप समाप्त होने की प्रतीक्षा करने लगी।

श्लोक 29 (5.144.29)

अतिष्ठत्सूर्यतापार्ता कर्णस्योत्तरवाससि । कौरव्यपत्नी वार्ष्णेयी पद्ममालेव शुष्यती ॥

atiṣṭhatsūryatāpārtā karṇasyottaravāsasi | kauravyapatnī vārṣṇeyī padmamāleva śuṣyatī

कुरुवंश की पत्नी, वृष्णिवंश की पुत्री कुन्ती धूप से पीड़ित होकर कर्ण के उत्तरीय वस्त्र की छाया में खड़ी रहीं, कमलों की माला की तरह मुरझाती हुई।

श्लोक 30 (5.144.30)

आपृष्ठतापाज्जप्त्वा स परिवृत्य यतव्रतः । दृष्ट्वा कुन्तीमुपातिष्ठदभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥

āpṛṣṭhatāpājjaptvā sa parivṛtya yatavrataḥ | dṛṣṭvā kuntīmupātiṣṭhadabhivādya kṛtāñjaliḥ

व्रतनिष्ठ कर्ण तब तक जप करता रहा जब तक धूप उसकी पीठ पर न आ गई; फिर मुड़कर कुन्ती को देखा और हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए उनके पास आया,

श्लोक 31 (5.144.31)

यथान्यायं महातेजा मानी धर्मभृतां वरः । उत्स्मयन्प्रणतः प्राह कुन्तीं वैकर्तनो वृषः ॥

yathānyāyaṃ mahātejā mānī dharmabhṛtāṃ varaḥ | utsmayanpraṇataḥ prāha kuntīṃ vaikartano vṛṣaḥ

जैसा उचित था; और धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, स्वाभिमानी और महातेजस्वी वैकर्तन वृष (कर्ण) ने विनयपूर्वक झुककर, मुस्कुराते हुए कुन्ती से कहा।

अध्याय 143अध्याय-सूचीअध्याय 145