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उद्योग पर्व · अध्याय 147

कृष्ण द्वारा भीष्म के उपदेश का वर्णन

हस्तिनापुर से उपप्लव्य लौटकर श्रीकृष्ण पाण्डवों को संक्षेप में बताते हैं कि दुर्योधन ने उनकी बात नहीं मानी। सन्ध्या के समय युधिष्ठिर पूछते हैं कि भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र, गान्धारी, विदुर और राजाओं ने क्या कहा, और कृष्ण भीष्म के वचनों से आरम्भ करते हैं। भीष्म ने दुर्योधन को स्मरण कराया कि उन्होंने अविवाहित रहने और कभी राजा न बनने की प्रतिज्ञा की थी, अकाल पड़ने पर प्रजा के विनती करने पर भी राज्य स्वीकार नहीं किया, और व्यास ने वंश के लिए तीन पुत्र उत्पन्न किए। भीष्म ने कहा कि अन्धे धृतराष्ट्र के स्थान पर पाण्डु राजा बने थे, इसलिए उनके पुत्र ही उत्तराधिकारी हैं, और उन्होंने दुर्योधन से उन्हें आधा राज्य देने का आग्रह किया।

अध्याय 146अध्याय-सूचीअध्याय 148

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.147.1)

आगम्य हास्तिनपुरादुपप्लाव्यमरिन्दमः । पाण्डवानां यथावृत्तं केशवः सर्वमुक्तवान् ॥

āgamya hāstinapurādupaplāvyamarindamaḥ | pāṇḍavānāṃ yathāvṛttaṃ keśavaḥ sarvamuktavān

हस्तिनापुर से उपप्लव्य लौटकर शत्रुदमन केशव ने पाण्डवों को जो कुछ घटा था, वह सब ज्यों का त्यों कह सुनाया।

श्लोक 2 (5.147.2)

संभाष्य सुचिरं कालं मन्त्रयित्वा पुनः पुनः । स्वमेव भवनं शौरिर्विश्रमार्थं जगाम ह ॥

saṃbhāṣya suciraṃ kālaṃ mantrayitvā punaḥ punaḥ | svameva bhavanaṃ śaurirviśramārthaṃ jagāma ha

बहुत देर तक उनसे बातचीत और बार-बार मन्त्रणा करके शौरि (श्रीकृष्ण) विश्राम के लिए अपने भवन को चले गए।

श्लोक 3 (5.147.3)

विसृज्य सर्वान्नृपतीन्विराटप्रमुखांस्तदा । पाण्डवा भ्रातरः पञ्च भानावस्तंगते सति ॥

visṛjya sarvānnṛpatīnvirāṭapramukhāṃstadā | pāṇḍavā bhrātaraḥ pañca bhānāvastaṃgate sati

सूर्य अस्त होने पर पाँचों पाण्डव भाइयों ने विराट आदि सब राजाओं को विदा किया।

श्लोक 4 (5.147.4)

सन्ध्यामुपास्य ध्यायन्तस्तमेव गतमानसाः । आनाय्य कृष्णं दाशार्हं पुनर्मन्त्रममन्त्रयन् ॥

sandhyāmupāsya dhyāyantastameva gatamānasāḥ | ānāyya kṛṣṇaṃ dāśārhaṃ punarmantramamantrayan

सन्ध्योपासना करके वे उसी विषय में मन लगाए सोचते रहे, और फिर दाशार्ह कृष्ण को बुलवाकर उन्होंने दोबारा मन्त्रणा की।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 5 (5.147.5)

त्वया नागपुरं गत्वा सभायां धृतराष्ट्रजः । किमुक्तः पुण्डरीकाक्ष तन्नः शंसितुमर्हसि ॥

tvayā nāgapuraṃ gatvā sabhāyāṃ dhṛtarāṣṭrajaḥ | kimuktaḥ puṇḍarīkākṣa tannaḥ śaṃsitumarhasi

हे कमलनयन! आपने हस्तिनापुर जाकर सभा में धृतराष्ट्र के पुत्र से क्या कहा? यह हमें बताइए।

वासुदेव उवाच

श्लोक 6 (5.147.6)

मया नागपुरं गत्वा सभायां धृतराष्ट्रजः । तथ्यं पथ्यं हितं चोक्तो न च गृह्णाति दुर्मतिः ॥

mayā nāgapuraṃ gatvā sabhāyāṃ dhṛtarāṣṭrajaḥ | tathyaṃ pathyaṃ hitaṃ cokto na ca gṛhṇāti durmatiḥ

मैंने हस्तिनापुर जाकर सभा में धृतराष्ट्र के पुत्र से सच्ची, हितकर और कल्याणकारी बात कही, पर वह दुर्बुद्धि उसे स्वीकार नहीं करता।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 7 (5.147.7)

तस्मिन्नुत्पथमापन्ने कुरुवृद्धः पितामहः । किमुक्तवान्हृषीकेश दुर्योधनममर्षणम् ॥

tasminnutpathamāpanne kuruvṛddhaḥ pitāmahaḥ | kimuktavānhṛṣīkeśa duryodhanamamarṣaṇam

हे हृषीकेश! जब वह कुमार्ग पर चल पड़ा, तब कुरुकुल के वृद्ध पितामह ने उस असहिष्णु दुर्योधन से क्या कहा?

श्लोक 8 (5.147.8)

आचार्यो वा महाभाग भारद्वाजः किमब्रवीत् । पितरौ धृतराष्ट्रस्तं गान्धारी वा किमब्रवीत् ॥

ācāryo vā mahābhāga bhāradvājaḥ kimabravīt | pitarau dhṛtarāṣṭrastaṃ gāndhārī vā kimabravīt

अथवा महाभाग आचार्य भरद्वाजपुत्र (द्रोण) ने क्या कहा? और उसके माता-पिता — धृतराष्ट्र या गान्धारी ने उससे क्या कहा?

श्लोक 9 (5.147.9)

पिता यवीयानस्माकं क्षत्ता धर्मविदां वरः । पुत्रशोकाभिसन्तप्तः किमाह धृतराष्ट्रजम् ॥

pitā yavīyānasmākaṃ kṣattā dharmavidāṃ varaḥ | putraśokābhisantaptaḥ kimāha dhṛtarāṣṭrajam

हमारे छोटे पिता, धर्मज्ञों में श्रेष्ठ क्षत्ता (विदुर) ने, जो हम पुत्रों के शोक से संतप्त हैं, धृतराष्ट्र के पुत्र से क्या कहा?

श्लोक 10 (5.147.10)

किंच सर्वे नृपतयः सभायां ये समासते । उक्तवन्तो यथातत्त्वं तद्ब्रूहि त्वं जनार्दन ॥

kiṃca sarve nṛpatayaḥ sabhāyāṃ ye samāsate | uktavanto yathātattvaṃ tadbrūhi tvaṃ janārdana

और सभा में बैठने वाले सब राजाओं ने क्या कहा? हे जनार्दन, वह हमें यथार्थ रूप में बताइए।

श्लोक 11 (5.147.11)

उक्तवान्हि भवान्सर्वं वचनं कुरुमुख्ययोः । धार्तराष्ट्रस्य तेषां हि वचनं कुरुसंसदि ॥

uktavānhi bhavānsarvaṃ vacanaṃ kurumukhyayoḥ | dhārtarāṣṭrasya teṣāṃ hi vacanaṃ kurusaṃsadi

आपने दोनों कुरुश्रेष्ठों की बातें तो कुल मिलाकर बता दी हैं; पर कुरुसभा में धृतराष्ट्र के पुत्र और दूसरों ने जो कहा —

श्लोक 12 (5.147.12)

कामलोभाभिभूतस्य मन्दस्य प्राज्ञमानिनः । अप्रियं हृदये मह्यं तन्न तिष्ठति केशव ॥

kāmalobhābhibhūtasya mandasya prājñamāninaḥ | apriyaṃ hṛdaye mahyaṃ tanna tiṣṭhati keśava

काम और लोभ से अभिभूत, अपने को बुद्धिमान समझने वाले उस मूर्ख की वे अप्रिय बातें मेरे हृदय में टिकती नहीं, हे केशव।

श्लोक 13 (5.147.13)

तेषां वाक्यानि गोविन्द श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो । यथा च नाभिपद्येत कालस्तात तथा कुरु । भवान्हि नो गतिः कृष्ण भवान्नाथो भवान्गुरुः ॥

teṣāṃ vākyāni govinda śrotumicchāmyahaṃ vibho | yathā ca nābhipadyeta kālastāta tathā kuru | bhavānhi no gatiḥ kṛṣṇa bhavānnātho bhavānguruḥ

हे गोविन्द, हे प्रभो! मैं उनके वचन सुनना चाहता हूँ। और हे तात, ऐसा कीजिए कि समय हाथ से न निकल जाए; क्योंकि हे कृष्ण, आप ही हमारी गति हैं, आप ही हमारे स्वामी और आप ही हमारे गुरु हैं।

वासुदेव उवाच

श्लोक 14 (5.147.14)

शृणु राजन्यथा वाक्यमुक्तो राजा सुयोधनः । मध्ये कुरूणां राजेन्द्र सभायां तन्निबोध मे ॥

śṛṇu rājanyathā vākyamukto rājā suyodhanaḥ | madhye kurūṇāṃ rājendra sabhāyāṃ tannibodha me

हे राजन्! सुनिए, कुरुओं के बीच सभा में राजा सुयोधन से जो बातें कही गईं; हे राजेन्द्र, उन्हें मुझसे जानिए।

श्लोक 15 (5.147.15)

मया विश्राविते वाक्ये जहास धृतराष्ट्रजः । अथ भीष्मः सुसंक्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् ॥

mayā viśrāvite vākye jahāsa dhṛtarāṣṭrajaḥ | atha bhīṣmaḥ susaṃkruddha idaṃ vacanamabravīt

जब मैंने अपनी बात सुनाई, तब धृतराष्ट्र का पुत्र हँस पड़ा। तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर भीष्म ने यह वचन कहा —

भीष्म उवाच

श्लोक 16 (5.147.16)

दुर्योधन निबोधेदं कुलार्थे यद्ब्रवीमि ते । तच्छ्रुत्वा राजशार्दूल स्वकुलस्य हितं कुरु ॥

duryodhana nibodhedaṃ kulārthe yadbravīmi te | tacchrutvā rājaśārdūla svakulasya hitaṃ kuru

दुर्योधन! कुल के हित के लिए मैं तुमसे जो कहता हूँ, उसे समझो। हे राजसिंह, उसे सुनकर अपने कुल का हित करो।

श्लोक 17 (5.147.17)

मम तात पिता राजञ्शन्तनुर्लोकविश्रुतः । तस्याहमेक एवासं पुत्रः पुत्रवतां वरः ॥

mama tāta pitā rājañśantanurlokaviśrutaḥ | tasyāhameka evāsaṃ putraḥ putravatāṃ varaḥ

हे तात! मेरे पिता लोकविख्यात राजा शान्तनु थे, और पुत्रवानों में श्रेष्ठ उन राजा का मैं एकमात्र पुत्र था।

श्लोक 18 (5.147.18)

तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना द्वितीयः स्यात्कथं सुतः । एकपुत्रमपुत्रं वै प्रवदन्ति मनीषिणः ॥

tasya buddhiḥ samutpannā dvitīyaḥ syātkathaṃ sutaḥ | ekaputramaputraṃ vai pravadanti manīṣiṇaḥ

उनके मन में विचार उठा — "दूसरा पुत्र कैसे हो? क्योंकि मनीषी कहते हैं कि एक पुत्र वाला पुत्रहीन के समान है।

श्लोक 19 (5.147.19)

न चोच्छेदं कुलं यायाद्विस्तीर्येच्च कथं यशः । तस्याहमीप्सितं बुद्ध्वा कालीं मातरमावहम् ॥

na cocchedaṃ kulaṃ yāyādvistīryecca kathaṃ yaśaḥ | tasyāhamīpsitaṃ buddhvā kālīṃ mātaramāvaham

कुल का उच्छेद कैसे न हो, और उसका यश कैसे फैले?" उनकी यह इच्छा जानकर मैं काली (सत्यवती) को माता बनाकर ले आया।

श्लोक 20 (5.147.20)

प्रतिज्ञां दुष्करां कृत्वा पितुरर्थे कुलस्य च । अराजा चोर्ध्वरेताश्च यथा सुविदितं तव । प्रतीतो निवसाम्येष प्रतिज्ञामनुपालयन् ॥

pratijñāṃ duṣkarāṃ kṛtvā piturarthe kulasya ca | arājā cordhvaretāśca yathā suviditaṃ tava | pratīto nivasāmyeṣa pratijñāmanupālayan

पिता और कुल के लिए मैंने कठिन प्रतिज्ञा की — कि मैं राजा नहीं बनूँगा और ऊर्ध्वरेता (आजीवन ब्रह्मचारी) रहूँगा, जैसा तुम भली-भाँति जानते हो। उसी प्रतिज्ञा का पालन करता हुआ मैं संतुष्ट होकर यहाँ रहता हूँ।

श्लोक 21 (5.147.21)

तस्यां जज्ञे महाबाहुः श्रीमान्कुरुकुलोद्वहः । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कनीयान्मम पार्थिव ॥

tasyāṃ jajñe mahābāhuḥ śrīmānkurukulodvahaḥ | vicitravīryo dharmātmā kanīyānmama pārthiva

हे राजन्! उन्हीं से कुरुकुल के धारक, महाबाहु, श्रीमान् और धर्मात्मा विचित्रवीर्य उत्पन्न हुए, जो मेरे छोटे भाई थे।

श्लोक 22 (5.147.22)

स्वर्यातेऽहं पितरि तं स्वराज्ये सन्न्यवेशयम् । विचित्रवीर्यं राजानं भृत्यो भूत्वा ह्यधश्चरः ॥

svaryāte'haṃ pitari taṃ svarājye sannyaveśayam | vicitravīryaṃ rājānaṃ bhṛtyo bhūtvā hyadhaścaraḥ

पिता के स्वर्ग सिधारने पर मैंने विचित्रवीर्य को उनके अपने राज्य पर राजा के रूप में प्रतिष्ठित किया और स्वयं सेवक बनकर उनसे नीचे रहा।

श्लोक 23 (5.147.23)

तस्याहं सदृशान्दारान्राजेन्द्र समुपाहरम् । जित्वा पार्थिवसङ्घातमपि ते बहुशः श्रुतम् ॥

tasyāhaṃ sadṛśāndārānrājendra samupāharam | jitvā pārthivasaṅghātamapi te bahuśaḥ śrutam

हे राजेन्द्र! राजाओं के समूह को जीतकर मैं उनके योग्य पत्नियाँ ले आया — यह तुमने अनेक बार सुना है।

श्लोक 24 (5.147.24)

ततो रामेण समरे द्वन्द्वयुद्धमुपागमम् । स हि रामभयादेभिर्नागरैर्विप्रवासितः ॥

tato rāmeṇa samare dvandvayuddhamupāgamam | sa hi rāmabhayādebhirnāgarairvipravāsitaḥ

इसके बाद मैंने रणभूमि में परशुराम से द्वन्द्वयुद्ध किया। परशुराम के भय से इन नगरवासियों ने विचित्रवीर्य को दूर भेज दिया था।

श्लोक 25 (5.147.25)

दारेष्वप्यतिसक्तश्च यक्ष्माणं समपद्यत । यदा त्वराजके राष्ट्रे न ववर्ष सुरेश्वरः । तदाभ्यधावन्मामेव प्रजाः क्षुद्भयपीडिताः ॥

dāreṣvapyatisaktaśca yakṣmāṇaṃ samapadyata | yadā tvarājake rāṣṭre na vavarṣa sureśvaraḥ | tadābhyadhāvanmāmeva prajāḥ kṣudbhayapīḍitāḥ

पत्नियों में अत्यधिक आसक्ति के कारण उन्हें यक्ष्मा (क्षय) रोग हो गया। और जब राजा से रहित राज्य में देवराज इन्द्र ने वर्षा नहीं की, तब भूख के भय से पीड़ित प्रजा मेरे ही पास दौड़ी आई।

प्रजा ऊचुः

श्लोक 26 (5.147.26)

उपक्षीणाः प्रजाः सर्वा राजा भव भवाय नः । ईतीः प्रणुद भद्रं ते शन्तनोः कुलवर्धन ॥

upakṣīṇāḥ prajāḥ sarvā rājā bhava bhavāya naḥ | ītīḥ praṇuda bhadraṃ te śantanoḥ kulavardhana

सारी प्रजा क्षीण हो रही है। हमारे कल्याण के लिए आप राजा बनिए। हे शान्तनु के कुल को बढ़ाने वाले, आपका कल्याण हो, इन विपत्तियों को दूर कीजिए।

श्लोक 27 (5.147.27)

पीड्यन्ते ते प्रजाः सर्वा व्याधिभिर्भृशदारुणैः । अल्पावशिष्टा गाङ्गेय ताः परित्रातुमर्हसि ॥

pīḍyante te prajāḥ sarvā vyādhibhirbhṛśadāruṇaiḥ | alpāvaśiṣṭā gāṅgeya tāḥ paritrātumarhasi

आपकी यह सारी प्रजा अत्यन्त भयंकर रोगों से पीड़ित है। हे गांगेय, थोड़े ही लोग बचे हैं; आपको उनकी रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 28 (5.147.28)

व्याधीन्प्रणुद्य वीर त्वं प्रजा धर्मेण पालय । त्वयि जीवति मा राष्ट्रं विनाशमुपगच्छतु ॥

vyādhīnpraṇudya vīra tvaṃ prajā dharmeṇa pālaya | tvayi jīvati mā rāṣṭraṃ vināśamupagacchatu

हे वीर, रोगों को दूर करके धर्मपूर्वक प्रजा का पालन कीजिए। आपके जीते जी राज्य का विनाश न हो।

भीष्म उवाच

श्लोक 29 (5.147.29)

प्रजानां क्रोशतीनां वै नैवाक्षुभ्यत मे मनः । प्रतिज्ञां रक्षमाणस्य तद्वृत्तं स्मरतस्तथा । ततः पौरा महाराज माता काली च मे शुभा ॥

prajānāṃ krośatīnāṃ vai naivākṣubhyata me manaḥ | pratijñāṃ rakṣamāṇasya tadvṛttaṃ smaratastathā | tataḥ paurā mahārāja mātā kālī ca me śubhā

प्रजा के इस प्रकार पुकारने पर भी मेरा मन तनिक भी विचलित नहीं हुआ, क्योंकि मैं अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा कर रहा था और पिछली घटना को याद कर रहा था। तब हे महाराज, पुरवासी, मेरी शुभ माता काली,

श्लोक 30 (5.147.30)

भृत्याः पुरोहिताचार्या ब्राह्मणाश्च बहुश्रुताः । मामूचुर्भृशसंतप्ता भव राजेति सन्ततम् ॥

bhṛtyāḥ purohitācāryā brāhmaṇāśca bahuśrutāḥ | māmūcurbhṛśasaṃtaptā bhava rājeti santatam

सेवक, पुरोहित, आचार्य और बहुश्रुत ब्राह्मण — सबने अत्यन्त संतप्त होकर मुझसे बार-बार कहा, "आप राजा बनिए।"

पौरादय ऊचुः

श्लोक 31 (5.147.31)

प्रतीपरक्षितं राष्ट्रं त्वां प्राप्य विनशिष्यति । स त्वमस्मद्धितार्थं वै राजा भव महामते ॥

pratīparakṣitaṃ rāṣṭraṃ tvāṃ prāpya vinaśiṣyati | sa tvamasmaddhitārthaṃ vai rājā bhava mahāmate

प्रतीप द्वारा रक्षित यह राज्य आपके हाथों में आकर नष्ट हो जाएगा। इसलिए हे महामते, हमारे हित के लिए आप राजा बनिए।

भीष्म उवाच

श्लोक 32 (5.147.32)

इत्युक्तः प्राञ्जलिर्भूत्वा दुःखितो भृशमातुरः । तेभ्यो न्यवेदयं तत्र प्रतिज्ञां पितृगौरवात् ॥

ityuktaḥ prāñjalirbhūtvā duḥkhito bhṛśamāturaḥ | tebhyo nyavedayaṃ tatra pratijñāṃ pitṛgauravāt

ऐसा कहे जाने पर मैंने दुःखी और अत्यन्त व्याकुल होकर हाथ जोड़े, और वहाँ पिता के प्रति आदर के कारण उन्हें अपनी प्रतिज्ञा बताई —

श्लोक 33 (5.147.33)

ऊर्ध्वरेता ह्यराजा च कुलस्यार्थे पुनः पुनः । विशेषतस्त्वदर्थं च धुरि मा मां नियोजय ॥

ūrdhvaretā hyarājā ca kulasyārthe punaḥ punaḥ | viśeṣatastvadarthaṃ ca dhuri mā māṃ niyojaya

"कुल के लिए मैं ऊर्ध्वरेता हूँ और राजा नहीं बनूँगा" — यह मैंने बार-बार कहा। "और विशेषकर तुम्हारे लिए भी, मुझे इस भार में मत जोतो।"

श्लोक 34 (5.147.34)

ततोऽहं प्राञ्जलिर्भूत्वा मातरं संप्रसादयम् । नाम्ब शन्तनुना जातः कौरवं वंशमुद्वहन् ॥

tato'haṃ prāñjalirbhūtvā mātaraṃ saṃprasādayam | nāmba śantanunā jātaḥ kauravaṃ vaṃśamudvahan

तब मैंने हाथ जोड़कर माता को मनाने का प्रयत्न किया — "माँ! शान्तनु से उत्पन्न और कौरव वंश का भार उठाने वाला मैं

श्लोक 35 (5.147.35)

प्रतिज्ञां वितथां कुर्यामिति राजन्पुनः पुनः । विशेषतस्त्वदर्थं च प्रतिज्ञां कृतवानहम् ॥

pratijñāṃ vitathāṃ kuryāmiti rājanpunaḥ punaḥ | viśeṣatastvadarthaṃ ca pratijñāṃ kṛtavānaham

अपनी प्रतिज्ञा को झूठी नहीं कर सकता" — हे राजन्, यह मैंने बार-बार कहा — "और विशेषकर तुम्हारे लिए ही तो मैंने वह प्रतिज्ञा की थी।

श्लोक 36 (5.147.36)

अहं प्रेष्यश्च दासश्च तवाद्य सुतवत्सले । एवं तामनुनीयाहं मातरं जनसन्निधौ ॥

ahaṃ preṣyaśca dāsaśca tavādya sutavatsale | evaṃ tāmanunīyāhaṃ mātaraṃ janasannidhau

हे पुत्रवत्सले, आज मैं तुम्हारा सेवक और दास हूँ।" इस प्रकार लोगों के सामने माता को मनाकर

श्लोक 37 (5.147.37)

अयाचं भ्रातृदारेषु तदा व्यासं महामुनिम् । सह मात्रा महाराज प्रसाद्य तमृषिं तदा ॥

ayācaṃ bhrātṛdāreṣu tadā vyāsaṃ mahāmunim | saha mātrā mahārāja prasādya tamṛṣiṃ tadā

तब मैंने भाई की पत्नियों के लिए महामुनि व्यास से याचना की; और हे महाराज, माता के साथ उन ऋषि को प्रसन्न करने पर

श्लोक 38 (5.147.38)

अपत्यार्थं महाराज प्रसादं कृतवांश्च सः । त्रीन्स पुत्रानजनयत्तदा भरतसत्तम ॥

apatyārthaṃ mahārāja prasādaṃ kṛtavāṃśca saḥ | trīnsa putrānajanayattadā bharatasattama

हे महाराज, उन्होंने संतान के लिए कृपा की, और हे भरतश्रेष्ठ, तब उन्होंने तीन पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 39 (5.147.39)

अन्धः करणहीनत्वान्न वै राजा पिता तव । राजा तु पाण्डुरभवन्महात्मा लोकविश्रुतः ॥

andhaḥ karaṇahīnatvānna vai rājā pitā tava | rājā tu pāṇḍurabhavanmahātmā lokaviśrutaḥ

तुम्हारे पिता अन्धे होने से एक इन्द्रिय से हीन थे, इसलिए राजा नहीं बने; राजा तो लोकविख्यात महात्मा पाण्डु हुए।

श्लोक 40 (5.147.40)

स राजा तस्य ते पुत्राः पितुर्दायाद्यहारिणः । मा तात कलहं कार्षी राज्यस्यार्धं प्रदीयताम् ॥

sa rājā tasya te putrāḥ piturdāyādyahāriṇaḥ | mā tāta kalahaṃ kārṣī rājyasyārdhaṃ pradīyatām

वे राजा थे, और उनके पुत्र पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी हैं। हे तात, कलह मत करो; उन्हें आधा राज्य दे दिया जाए।

श्लोक 41 (5.147.41)

मयि जीवति राज्यं कः संप्रशासेत्पुमानिह । मावमंस्था वचो मह्यं शममिच्छामि वः सदा ॥

mayi jīvati rājyaṃ kaḥ saṃpraśāsetpumāniha | māvamaṃsthā vaco mahyaṃ śamamicchāmi vaḥ sadā

मेरे जीते जी यहाँ कौन पुरुष राज्य पर शासन कर सकता है? मेरी बात की अवहेलना मत करो; मैं सदा तुम सबके बीच शान्ति चाहता हूँ।

श्लोक 42 (5.147.42)

न विशेषोऽस्ति मे पुत्र त्वयि तेषु च पार्थिव । मतमेतत्पितुस्तुभ्यं गान्धार्या विदुरस्य च ॥

na viśeṣo'sti me putra tvayi teṣu ca pārthiva | matametatpitustubhyaṃ gāndhāryā vidurasya ca

हे पुत्र, हे राजन्! मेरे लिए तुममें और उनमें कोई भेद नहीं है। यही तुम्हारे पिता का, गान्धारी का और विदुर का भी मत है।

श्लोक 43 (5.147.43)

श्रोतव्यं खलु वृद्धानां नाभिशङ्कीर्वचो मम । नाशयिष्यसि मा सर्वमात्मानं पृथिवीं तथा ॥

śrotavyaṃ khalu vṛddhānāṃ nābhiśaṅkīrvaco mama | nāśayiṣyasi mā sarvamātmānaṃ pṛthivīṃ tathā

वृद्धों की बात अवश्य सुननी चाहिए; मेरे वचनों पर संदेह मत करो। सब कुछ नष्ट मत करो — न अपने को, न पृथ्वी को।

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