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उद्योग पर्व · अध्याय 148

द्रोण, विदुर और गान्धारी द्वारा दुर्योधन की भर्त्सना

श्रीकृष्ण कुरुसभा का वृत्तान्त आगे सुनाते हैं। द्रोण ने दुर्योधन को स्मरण कराया कि राजा होते हुए भी पाण्डु राज्य धृतराष्ट्र और विदुर को सौंपकर वन चले गए थे, और उससे पाण्डवों को आधा राज्य देने को कहा; उन्होंने यह भी कहा कि वे भीष्म के साथ हैं और विजय वहीं है जहाँ धर्म है। विदुर ने भीष्म से विनती की कि जिस कुल को उन्होंने बचाया था, उसका विनाश वे चुपचाप न देखें। तब गान्धारी ने राजाओं के सामने क्रोधपूर्वक अपने पुत्र की भर्त्सना की और कहा कि राज्य न्यायतः पाण्डु के पुत्रों का है, और धृतराष्ट्र तथा भीष्म के मार्गदर्शन में युधिष्ठिर को ही उस पर शासन करना चाहिए।

अध्याय 147अध्याय-सूचीअध्याय 149

वासुदेव उवाच

श्लोक 1 (5.148.1)

भीष्मेणोक्ते ततो द्रोणो दुर्योधनमभाषत । मध्ये नृपाणां भद्रं ते वचनं वचनक्षमः ॥

bhīṣmeṇokte tato droṇo duryodhanamabhāṣata | madhye nṛpāṇāṃ bhadraṃ te vacanaṃ vacanakṣamaḥ

भीष्म के बोल चुकने पर, बोलने में कुशल द्रोण ने राजाओं के बीच दुर्योधन से कहा — आपका कल्याण हो —

द्रोण उवाच

श्लोक 2 (5.148.2)

प्रातीपः शन्तनुस्तात कुलस्यार्थे यथा स्थितः । यथा देवव्रतो भीष्मः कुलस्यार्थे स्थितोऽभवत् ॥

prātīpaḥ śantanustāta kulasyārthe yathā sthitaḥ | yathā devavrato bhīṣmaḥ kulasyārthe sthito'bhavat

हे तात! जैसे प्रतीपपुत्र शान्तनु कुल के हित के लिए दृढ़ रहे, वैसे ही देवव्रत भीष्म भी कुल के हित के लिए अडिग रहे।

श्लोक 3 (5.148.3)

तथा पाण्डुर्नरपतिः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः । राजा कुरूणां धर्मात्मा सुव्रतः सुसमाहितः ॥

tathā pāṇḍurnarapatiḥ satyasandho jitendriyaḥ | rājā kurūṇāṃ dharmātmā suvrataḥ susamāhitaḥ

उसी प्रकार सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, धर्मात्मा, उत्तम व्रत वाले और संयमी कुरुराज पाण्डु ने भी

श्लोक 4 (5.148.4)

ज्येष्ठाय राज्यमददद्धृतराष्ट्राय धीमते । यवीयसे तथा क्षत्त्रे कुरूणां वंशवर्धनः ॥

jyeṣṭhāya rājyamadadaddhṛtarāṣṭrāya dhīmate | yavīyase tathā kṣattre kurūṇāṃ vaṃśavardhanaḥ

कुरुवंश को बढ़ाने वाले पाण्डु ने राज्य बड़े भाई बुद्धिमान धृतराष्ट्र को सौंप दिया, और वैसे ही छोटे भाई क्षत्ता (विदुर) को भी।

श्लोक 5 (5.148.5)

ततः सिंहासने राजन्स्थापयित्वैनमच्युतम् । वनं जगाम कौरव्यो भार्याभ्यां सहितो नृपः ॥

tataḥ siṃhāsane rājansthāpayitvainamacyutam | vanaṃ jagāma kauravyo bhāryābhyāṃ sahito nṛpaḥ

हे राजन्! फिर इन अच्युत (धृतराष्ट्र) को सिंहासन पर बिठाकर वे कौरव नरेश अपनी दोनों पत्नियों के साथ वन को चले गए।

श्लोक 6 (5.148.6)

नीचैः स्थित्वा तु विदुर उपास्ते स्म विनीतवत् । प्रेष्यवत्पुरुषव्याघ्रो वालव्यजनमुत्क्षिपन् ॥

nīcaiḥ sthitvā tu vidura upāste sma vinītavat | preṣyavatpuruṣavyāghro vālavyajanamutkṣipan

पुरुषसिंह विदुर नीचे खड़े होकर विनीत भाव से सेवक की भाँति चँवर डुलाते हुए उनकी सेवा करते रहे।

श्लोक 7 (5.148.7)

ततः सर्वाः प्रजास्तात धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् । अन्वपद्यन्त विधिवद्यथा पाण्डुं जनाधिपम् ॥

tataḥ sarvāḥ prajāstāta dhṛtarāṣṭraṃ janeśvaram | anvapadyanta vidhivadyathā pāṇḍuṃ janādhipam

हे तात! तब सारी प्रजा ने विधिपूर्वक नरेश्वर धृतराष्ट्र का वैसा ही अनुसरण किया जैसा राजा पाण्डु का करती थी।

श्लोक 8 (5.148.8)

विसृज्य धृतराष्ट्राय राज्यं स विदुराय च । चचार पृथिवीं पाण्डुः सर्वां परपुरञ्जयः ॥

visṛjya dhṛtarāṣṭrāya rājyaṃ sa vidurāya ca | cacāra pṛthivīṃ pāṇḍuḥ sarvāṃ parapurañjayaḥ

राज्य धृतराष्ट्र और विदुर को सौंपकर शत्रुओं के नगर जीतने वाले पाण्डु सारी पृथ्वी पर विचरते रहे।

श्लोक 9 (5.148.9)

कोशसंवनने दाने भृत्यानां चान्ववेक्षणे । भरणे चैव सर्वस्य विदुरः सत्यसङ्गरः ॥

kośasaṃvanane dāne bhṛtyānāṃ cānvavekṣaṇe | bharaṇe caiva sarvasya viduraḥ satyasaṅgaraḥ

सत्यप्रतिज्ञ विदुर कोष की और लोगों को अपना बनाने की, दान की, सेवकों की देखरेख की और सबके भरण-पोषण की व्यवस्था करते थे।

श्लोक 10 (5.148.10)

सन्धिविग्रहसंयुक्तो राज्ञां संवाहनक्रियाः । अवैक्षत महातेजा भीष्मः परपुरञ्जयः ॥

sandhivigrahasaṃyukto rājñāṃ saṃvāhanakriyāḥ | avaikṣata mahātejā bhīṣmaḥ parapurañjayaḥ

महातेजस्वी, शत्रुनगरविजयी भीष्म सन्धि और विग्रह से जुड़े कार्यों तथा राजाओं की सेवा-सम्बन्धी क्रियाओं की देखरेख करते थे।

श्लोक 11 (5.148.11)

सिंहासनस्थो नृपतिर्धृतराष्ट्रो महाबलः । अन्वास्यमानः सततं विदुरेण महात्मना ॥

siṃhāsanastho nṛpatirdhṛtarāṣṭro mahābalaḥ | anvāsyamānaḥ satataṃ vidureṇa mahātmanā

महाबली राजा धृतराष्ट्र सिंहासन पर विराजमान रहे, और महात्मा विदुर निरन्तर उनकी सेवा में लगे रहे।

श्लोक 12 (5.148.12)

कथं तस्य कुले जातः कुलभेदं व्यवस्यसि । संभूय भ्रातृभिः सार्धं भुङ्क्ष्व भोगाञ्जनाधिप ॥

kathaṃ tasya kule jātaḥ kulabhedaṃ vyavasyasi | saṃbhūya bhrātṛbhiḥ sārdhaṃ bhuṅkṣva bhogāñjanādhipa

उनके कुल में जन्म लेकर तुम कुल में फूट डालने का निश्चय कैसे करते हो? हे जनाधिप, भाइयों के साथ मिलकर भोगों का उपभोग करो।

श्लोक 13 (5.148.13)

ब्रवीम्यहं न कार्पण्यान्नार्थहेतोः कथञ्चन । भीष्मेण दत्तमिच्छामि न त्वया राजसत्तम ॥

bravīmyahaṃ na kārpaṇyānnārthahetoḥ kathañcana | bhīṣmeṇa dattamicchāmi na tvayā rājasattama

मैं यह न दीनता से कहता हूँ, न किसी प्रकार धन के लिए। हे राजश्रेष्ठ, मैं भीष्म का दिया चाहता हूँ, तुम्हारा नहीं।

श्लोक 14 (5.148.14)

नाहं त्वत्तोऽभिकाङ्क्षिष्ये वृत्त्युपायं जनाधिप । यतो भीष्मस्ततो द्रोणो यद्भीष्मस्त्वाह तत्कुरु ॥

nāhaṃ tvatto'bhikāṅkṣiṣye vṛttyupāyaṃ janādhipa | yato bhīṣmastato droṇo yadbhīṣmastvāha tatkuru

हे जनाधिप, मैं तुमसे अपनी जीविका का साधन नहीं चाहूँगा। जहाँ भीष्म हैं, वहीं द्रोण है; भीष्म जो कहते हैं, वही करो।

श्लोक 15 (5.148.15)

दीयतां पाण्डुपुत्रेभ्यो राज्यार्धमरिकर्शन । सममाचार्यकं तात तव तेषां च मे सदा ॥

dīyatāṃ pāṇḍuputrebhyo rājyārdhamarikarśana | samamācāryakaṃ tāta tava teṣāṃ ca me sadā

हे शत्रुनाशक, पाण्डुपुत्रों को आधा राज्य दे दिया जाए। हे तात, आचार्य के रूप में मेरा भाव तुम्हारे और उनके प्रति सदा एक-सा रहा है।

श्लोक 16 (5.148.16)

अश्वत्थामा यथा मह्यं तथा श्वेतहयो मम । बहुना किं प्रलापेन यतो धर्मस्ततो जयः ॥

aśvatthāmā yathā mahyaṃ tathā śvetahayo mama | bahunā kiṃ pralāpena yato dharmastato jayaḥ

जैसे अश्वत्थामा मेरा है, वैसे ही श्वेत घोड़ों वाला अर्जुन भी मेरा है। बहुत कहने से क्या लाभ? जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।

वासुदेव उवाच

श्लोक 17 (5.148.17)

एवमुक्ते महाराज द्रोणेनामिततेजसा । व्याजहार ततो वाक्यं विदुरः सत्यसङ्गरः । पितुर्वदनमन्वीक्ष्य परिवृत्य च धर्मवित् ॥

evamukte mahārāja droṇenāmitatejasā | vyājahāra tato vākyaṃ viduraḥ satyasaṅgaraḥ | piturvadanamanvīkṣya parivṛtya ca dharmavit

हे महाराज! अमित तेजस्वी द्रोण के ऐसा कहने पर सत्यप्रतिज्ञ, धर्मज्ञ विदुर ने मुड़कर अपने पिता (भीष्म) के मुख की ओर देखा और यह वचन कहा —

विदुर उवाच

श्लोक 18 (5.148.18)

देवव्रत निबोधेदं वचनं मम भाषतः । प्रनष्टः कौरवो वंशस्त्वयायं पुनरुद्धृतः ॥

devavrata nibodhedaṃ vacanaṃ mama bhāṣataḥ | pranaṣṭaḥ kauravo vaṃśastvayāyaṃ punaruddhṛtaḥ

हे देवव्रत! मेरी यह बात सुनिए। कौरव वंश नष्ट हो चुका था; आपने ही इसका फिर से उद्धार किया।

श्लोक 19 (5.148.19)

तन्मे विलपमानस्य वचनं समुपेक्षसे । कोऽयं दुर्योधनो नाम कुलेऽस्मिन्कुलपांसनः ॥

tanme vilapamānasya vacanaṃ samupekṣase | ko'yaṃ duryodhano nāma kule'sminkulapāṃsanaḥ

फिर भी आप मेरे विलाप-भरे वचनों की उपेक्षा करते हैं। यह कुलकलंक दुर्योधन है कौन,

श्लोक 20 (5.148.20)

यस्य लोभाभिभूतस्य मतिं समनुवर्तसे । अनार्यस्याकृतज्ञस्य लोभेन हृतचेतसः । अतिक्रामति यः शास्त्रं पितुर्धर्मार्थदर्शिनः ॥

yasya lobhābhibhūtasya matiṃ samanuvartase | anāryasyākṛtajñasya lobhena hṛtacetasaḥ | atikrāmati yaḥ śāstraṃ piturdharmārthadarśinaḥ

जिस लोभ से अभिभूत की इच्छा का आप अनुसरण करते हैं — जो अनार्य है, कृतघ्न है, लोभ ने जिसकी बुद्धि हर ली है, और जो धर्म और अर्थ को देखने वाले अपने पिता की आज्ञा का उल्लंघन करता है?

श्लोक 21 (5.148.21)

एते नश्यन्ति कुरवो दुर्योधनकृतेन वै । यथा ते न प्रणश्येयुर्महाराज तथा कुरु ॥

ete naśyanti kuravo duryodhanakṛtena vai | yathā te na praṇaśyeyurmahārāja tathā kuru

दुर्योधन की करनी से ये कौरव नष्ट हो रहे हैं। हे महाराज, ऐसा कीजिए जिससे वे नष्ट न हों।

श्लोक 22 (5.148.22)

मां चैव धृतराष्ट्रं च पूर्वमेव महामते । चित्रकार इवालेख्यं कृत्वा स्थापितवानसि ॥

māṃ caiva dhṛtarāṣṭraṃ ca pūrvameva mahāmate | citrakāra ivālekhyaṃ kṛtvā sthāpitavānasi

हे महामते! आपने बहुत पहले ही मुझे और धृतराष्ट्र को, जैसे चित्रकार चित्र रचता है, वैसे रचकर प्रतिष्ठित किया था।

श्लोक 23 (5.148.23)

प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा यथा संहरते तथा । नोपेक्षस्व महाबाहो पश्यमानः कुलक्षयम् ॥

prajāpatiḥ prajāḥ sṛṣṭvā yathā saṃharate tathā | nopekṣasva mahābāho paśyamānaḥ kulakṣayam

जैसे प्रजापति प्रजा को रचकर फिर उसका संहार करते हैं, वैसे ही हे महाबाहो, कुल का विनाश देखते हुए आप उसकी उपेक्षा न कीजिए।

श्लोक 24 (5.148.24)

अथ तेऽद्य मतिर्नष्टा विनाशे प्रत्युपस्थिते । वनं गच्छ मया सार्धं धृतराष्ट्रेण चैव ह ॥

atha te'dya matirnaṣṭā vināśe pratyupasthite | vanaṃ gaccha mayā sārdhaṃ dhṛtarāṣṭreṇa caiva ha

और यदि विनाश के निकट आ जाने पर आज आपकी बुद्धि नष्ट हो गई है, तो मेरे और धृतराष्ट्र के साथ वन को चलिए।

श्लोक 25 (5.148.25)

बद्ध्वा वा निकृतिप्रज्ञं धार्तराष्ट्रं सुदुर्मतिम् । शाधीदं राज्यमद्याशु पाण्डवैरभिरक्षितम् ॥

baddhvā vā nikṛtiprajñaṃ dhārtarāṣṭraṃ sudurmatim | śādhīdaṃ rājyamadyāśu pāṇḍavairabhirakṣitam

अथवा छल-कपट को ही बुद्धि मानने वाले इस दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र को बाँधकर, पाण्डवों से सुरक्षित इस राज्य का आज ही शीघ्र शासन कीजिए।

श्लोक 26 (5.148.26)

प्रसीद राजशार्दूल विनाशो दृश्यते महान् । पाण्डवानां कुरूणां च राज्ञाममिततेजसाम् ॥

prasīda rājaśārdūla vināśo dṛśyate mahān | pāṇḍavānāṃ kurūṇāṃ ca rājñāmamitatejasām

हे राजसिंह, प्रसन्न होइए! पाण्डवों, कौरवों और अमित तेजस्वी राजाओं का महाविनाश दिखाई दे रहा है।

वासुदेव उवाच

श्लोक 27 (5.148.27)

विररामैवमुक्त्वा तु विदुरो दीनमानसः । प्रध्यायमानः स तदा निःश्वसंश्च पुनः पुनः ॥

virarāmaivamuktvā tu viduro dīnamānasaḥ | pradhyāyamānaḥ sa tadā niḥśvasaṃśca punaḥ punaḥ

यह कहकर दुःखी मन वाले विदुर चुप हो गए; वे उस समय चिन्ता में डूबे बार-बार लम्बी साँसें लेते रहे।

श्लोक 28 (5.148.28)

ततोऽस्य राज्ञः सुबलस्य पुत्री । धर्मार्थयुक्तं कुलनाशभीता । दुर्योधनं पापमतिं नृशंसं । राज्ञां समक्षं सुतमाह कोपात् ॥

tato'sya rājñaḥ subalasya putrī | dharmārthayuktaṃ kulanāśabhītā | duryodhanaṃ pāpamatiṃ nṛśaṃsaṃ | rājñāṃ samakṣaṃ sutamāha kopāt

तब राजा सुबल की पुत्री (गान्धारी) ने कुल के विनाश से भयभीत होकर, राजाओं के सामने, अपने पापबुद्धि और क्रूर पुत्र दुर्योधन से क्रोधपूर्वक धर्म और अर्थ से युक्त वचन कहे।

गान्धार्युवाच

श्लोक 29 (5.148.29)

ये पार्थिवा राजसभां प्रविष्टा । ब्रह्मर्षयो ये च सभासदोऽन्ये । शृण्वन्तु वक्ष्यामि तवापराधं । पापस्य सामात्यपरिच्छदस्य ॥

ye pārthivā rājasabhāṃ praviṣṭā | brahmarṣayo ye ca sabhāsado'nye | śṛṇvantu vakṣyāmi tavāparādhaṃ | pāpasya sāmātyaparicchadasya

इस राजसभा में आए हुए राजा, ब्रह्मर्षि और अन्य सभासद सुनें — मैं तेरा अपराध बताती हूँ, तुझ पापी का और तेरे मन्त्रियों तथा अनुचरों का।

श्लोक 30 (5.148.30)

राज्यं कुरूणामनुरूपभोज्यं । क्रमागतो नः कुलधर्म एषः । त्वं पापबुद्धेऽतिनृशंसकर्मन् । राज्यं कुरूणामनयाद्विहंसि ॥

rājyaṃ kurūṇāmanurūpabhojyaṃ | kramāgato naḥ kuladharma eṣaḥ | tvaṃ pāpabuddhe'tinṛśaṃsakarman | rājyaṃ kurūṇāmanayādvihaṃsi

कुरुओं का राज्य योग्य उत्तराधिकारी के भोगने के लिए है — यही परम्परा से चला आया हमारा कुलधर्म है। अरे पापबुद्धि, अत्यन्त क्रूर कर्म करने वाले, तू अपनी अनीति से कुरुओं के राज्य का नाश कर रहा है।

श्लोक 31 (5.148.31)

राज्ये स्थितो धृतराष्ट्रो मनीषी । तस्यानुजो विदुरो दीर्घदर्शी । एतावतिक्रम्य कथं नृपत्वं । दुर्योधन प्रार्थयसेऽद्य मोहात् ॥

rājye sthito dhṛtarāṣṭro manīṣī | tasyānujo viduro dīrghadarśī | etāvatikramya kathaṃ nṛpatvaṃ | duryodhana prārthayase'dya mohāt

राज्य पर बुद्धिमान धृतराष्ट्र स्थित हैं, और उनके बाद उनके छोटे भाई दूरदर्शी विदुर हैं। हे दुर्योधन, इन दोनों को लाँघकर तू आज मोहवश राजपद की कामना कैसे करता है?

श्लोक 32 (5.148.32)

राजा च क्षत्ता च महानुभावौ । भीष्मे स्थिते परवन्तौ भवेताम् । अयं तु धर्मज्ञतया महात्मा । न राज्यकामो नृवरो नदीजः ॥

rājā ca kṣattā ca mahānubhāvau | bhīṣme sthite paravantau bhavetām | ayaṃ tu dharmajñatayā mahātmā | na rājyakāmo nṛvaro nadījaḥ

भीष्म के रहते राजा (धृतराष्ट्र) और क्षत्ता (विदुर) जैसे महानुभाव भी पराधीन ही रहेंगे। पर ये नदीपुत्र, नरश्रेष्ठ महात्मा धर्मज्ञ होने के कारण राज्य की कामना नहीं करते।

श्लोक 33 (5.148.33)

राज्यं तु पाण्डोरिदमप्रधृष्यं । तस्याद्य पुत्राः प्रभवन्ति नान्ये । राज्यं तदेतन्निखिलं पाण्डवानां । पैतामहं पुत्रपौत्रानुगामि ॥

rājyaṃ tu pāṇḍoridamapradhṛṣyaṃ | tasyādya putrāḥ prabhavanti nānye | rājyaṃ tadetannikhilaṃ pāṇḍavānāṃ | paitāmahaṃ putrapautrānugāmi

यह राज्य पाण्डु का है, इसे कोई छीन नहीं सकता। आज उनके पुत्र ही इसके स्वामी हैं, दूसरा कोई नहीं। यह सम्पूर्ण राज्य पाण्डवों का है — पितामहों से आया हुआ और पुत्र-पौत्रों तक जाने वाला।

श्लोक 34 (5.148.34)

यद्वै ब्रूते कुरुमुख्यो महात्मा । देवव्रतः सत्यसन्धो मनीषी । सर्वं तदस्माभिरहत्य कार्यं । राज्यं स्वधर्मान्परिपालयद्भिः ॥

yadvai brūte kurumukhyo mahātmā | devavrataḥ satyasandho manīṣī | sarvaṃ tadasmābhirahatya kāryaṃ | rājyaṃ svadharmānparipālayadbhiḥ

कुरुश्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, बुद्धिमान महात्मा देवव्रत जो कुछ कहते हैं, अपने-अपने धर्मों का पालन करते हुए राज्य करने वाले हम लोगों को वह सब बिना उल्लंघन किए करना चाहिए।

श्लोक 35 (5.148.35)

अनुज्ञया चाथ महाव्रतस्य । ब्रूयान्नृपोऽयं विदुरस्तथैव । कार्यं भवेत्तत्सुहृद्भिर्नियोज्यं । धर्मं पुरस्कृत्य सुदीर्घकालम् ॥

anujñayā cātha mahāvratasya | brūyānnṛpo'yaṃ vidurastathaiva | kāryaṃ bhavettatsuhṛdbhirniyojyaṃ | dharmaṃ puraskṛtya sudīrghakālam

और उन महाव्रती की अनुमति से यह राजा (धृतराष्ट्र) बोलें, और विदुर भी; फिर जो कार्य हो, उसे हितैषी लोग धर्म को आगे रखकर दीर्घकाल तक सम्पन्न करें।

श्लोक 36 (5.148.36)

न्यायागतं राज्यमिदं कुरूणां । युधिष्ठिरः शास्तु वै धर्मपुत्रः । प्रचोदितो धृतराष्ट्रेण राज्ञा । पुरस्कृतः शान्तनवेन चैव ॥

nyāyāgataṃ rājyamidaṃ kurūṇāṃ | yudhiṣṭhiraḥ śāstu vai dharmaputraḥ | pracodito dhṛtarāṣṭreṇa rājñā | puraskṛtaḥ śāntanavena caiva

कुरुओं का यह राज्य न्यायपूर्वक युधिष्ठिर को प्राप्त हुआ है; राजा धृतराष्ट्र की प्रेरणा से और शान्तनुनन्दन भीष्म द्वारा सम्मानित होकर वे धर्मपुत्र ही इस पर शासन करें।

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