उद्योग पर्व · अध्याय 149
धृतराष्ट्र द्वारा उत्तराधिकार की परम्परा का वर्णन
श्रीकृष्ण बताते हैं कि धृतराष्ट्र ने दुर्योधन से क्या कहा। धृतराष्ट्र ने स्मरण कराया कि ययाति ने अपने घमण्डी ज्येष्ठ पुत्र यदु को शाप देकर आज्ञाकारी छोटे पुत्र पूरु को राज्य दिया, और प्रतीप के गुणवान ज्येष्ठ पुत्र देवापि का अभिषेक त्वचा-रोग के कारण रोक दिया गया, जिससे शान्तनु राजा बने। ज्येष्ठ होते हुए भी अन्धेपन के कारण स्वयं उन्हें राज्य नहीं मिला, इसलिए राज्य पाण्डु के पुत्रों का है। युधिष्ठिर के राजोचित गुणों की प्रशंसा करते हुए उन्होंने दुर्योधन से, जो राजपुत्र नहीं है, कहा कि यदि वह अपना और अपने भाइयों का जीवन चाहता है तो आधा राज्य दे दे।
वासुदेव उवाच
श्लोक 1 (5.149.1)
एवमुक्ते तु गान्धार्या धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । दुर्योधनमुवाचेदं राजमध्ये जनाधिप ॥
evamukte tu gāndhāryā dhṛtarāṣṭro janeśvaraḥ | duryodhanamuvācedaṃ rājamadhye janādhipa
हे जनाधिप! गान्धारी के ऐसा कहने पर नरेश्वर धृतराष्ट्र ने राजाओं के बीच दुर्योधन से यह कहा —
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 2 (5.149.2)
दुर्योधन निबोधेदं यत्त्वां वक्ष्यामि पुत्रक । तथा तत्कुरु भद्रं ते यद्यस्ति पितृगौरवम् ॥
duryodhana nibodhedaṃ yattvāṃ vakṣyāmi putraka | tathā tatkuru bhadraṃ te yadyasti pitṛgauravam
बेटा दुर्योधन! मैं तुमसे जो कहने जा रहा हूँ, उसे समझो, और यदि तुम्हारे मन में पिता के प्रति आदर है तो वैसा ही करो — तुम्हारा कल्याण हो।
श्लोक 3 (5.149.3)
सोमः प्रजापतिः पूर्वं कुरूणां वंशवर्धनः । सोमाद्बभूव षष्ठोऽयं ययातिर्नहुषात्मजः ॥
somaḥ prajāpatiḥ pūrvaṃ kurūṇāṃ vaṃśavardhanaḥ | somādbabhūva ṣaṣṭho'yaṃ yayātirnahuṣātmajaḥ
पूर्वकाल में प्रजापति सोम कुरुवंश के प्रवर्तक थे। सोम से छठी पीढ़ी में ये नहुषपुत्र ययाति हुए।
श्लोक 4 (5.149.4)
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि पञ्च राजर्षिसत्तमाः । तेषां यदुर्महातेजा ज्येष्ठः समभवत्प्रभुः ॥
tasya putrā babhūvurhi pañca rājarṣisattamāḥ | teṣāṃ yadurmahātejā jyeṣṭhaḥ samabhavatprabhuḥ
उनके पाँच पुत्र हुए, जो राजर्षियों में श्रेष्ठ थे। उनमें महातेजस्वी, सामर्थ्यवान यदु सबसे बड़े थे।
श्लोक 5 (5.149.5)
पूरुर्यवीयांश्च ततो योऽस्माकं वंशवर्धनः । शर्मिष्ठया संप्रसूतो दुहित्रा वृषपर्वणः ॥
pūruryavīyāṃśca tato yo'smākaṃ vaṃśavardhanaḥ | śarmiṣṭhayā saṃprasūto duhitrā vṛṣaparvaṇaḥ
और सबसे छोटे पूरु थे, जिन्होंने हमारे वंश को बढ़ाया; वे वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से उत्पन्न हुए थे।
श्लोक 6 (5.149.6)
यदुश्च भरतश्रेष्ठ देवयान्याः सुतोऽभवत् । दौहित्रस्तात शुक्रस्य काव्यस्यामिततेजसः ॥
yaduśca bharataśreṣṭha devayānyāḥ suto'bhavat | dauhitrastāta śukrasya kāvyasyāmitatejasaḥ
हे भरतश्रेष्ठ! यदु देवयानी के पुत्र थे; इसलिए हे तात, वे अमित तेजस्वी कवि-पुत्र शुक्र के दौहित्र थे।
श्लोक 7 (5.149.7)
यादवानां कुलकरो बलवान्वीर्यसंमतः । अवमेने स तु क्षत्रं दर्पपूर्णः सुमन्दधीः ॥
yādavānāṃ kulakaro balavānvīryasaṃmataḥ | avamene sa tu kṣatraṃ darpapūrṇaḥ sumandadhīḥ
यादवों के कुल के प्रवर्तक, बलवान और पराक्रम के लिए सम्मानित यदु दर्प से भरे और अत्यन्त मन्दबुद्धि थे; वे क्षत्रियों का तिरस्कार करते थे।
श्लोक 8 (5.149.8)
न चातिष्ठत्पितुः शास्त्रे बलदर्पविमोहितः । अवमेने च पितरं भ्रातॄंश्चाप्यपराजितः ॥
na cātiṣṭhatpituḥ śāstre baladarpavimohitaḥ | avamene ca pitaraṃ bhrātṝṃścāpyaparājitaḥ
बल के अभिमान से मोहित होकर वे पिता की आज्ञा में नहीं रहे; किसी से पराजित न होने के कारण उन्होंने पिता और भाइयों का भी अनादर किया।
श्लोक 9 (5.149.9)
पृथिव्यां चतुरन्तायां यदुरेवाभवद्बली । वशे कृत्वा स नृपतीन्न्यवसन्नागसाह्वये ॥
pṛthivyāṃ caturantāyāṃ yadurevābhavadbalī | vaśe kṛtvā sa nṛpatīnnyavasannāgasāhvaye
चारों दिशाओं तक फैली पृथ्वी पर यदु ही बलवान थे; राजाओं को वश में करके वे हस्तिनापुर में रहने लगे।
श्लोक 10 (5.149.10)
तं पिता परमक्रुद्धो ययातिर्नहुषात्मजः । शशाप पुत्रं गान्धारे राज्याच्चापि व्यरोपयत् ॥
taṃ pitā paramakruddho yayātirnahuṣātmajaḥ | śaśāpa putraṃ gāndhāre rājyāccāpi vyaropayat
हे गान्धारीनन्दन! तब उनके पिता नहुषपुत्र ययाति ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपने उस पुत्र को शाप दिया और उसे राज्य से भी हटा दिया।
श्लोक 11 (5.149.11)
ये चैनमन्ववर्तन्त भ्रातरो बलदर्पिताः । शशाप तानपि क्रुद्धो ययातिस्तनयानथ ॥
ye cainamanvavartanta bhrātaro baladarpitāḥ | śaśāpa tānapi kruddho yayātistanayānatha
और बल के घमण्ड में चूर जो भाई उसका अनुसरण करते थे, उन पुत्रों को भी क्रुद्ध ययाति ने शाप दे दिया।
श्लोक 12 (5.149.12)
यवीयांसं ततः पुरुं पुत्रं स्ववशवर्तिनम् । राज्ये निवेशयामास विधेयं नृपसत्तमः ॥
yavīyāṃsaṃ tataḥ puruṃ putraṃ svavaśavartinam | rājye niveśayāmāsa vidheyaṃ nṛpasattamaḥ
तब उन नृपश्रेष्ठ ने अपने आज्ञाकारी और वश में रहने वाले सबसे छोटे पुत्र पूरु को राज्य पर बिठाया।
श्लोक 13 (5.149.13)
एवं ज्येष्ठोऽप्यथोत्सिक्तो न राज्यमभिजायते । यवीयांसोऽपि जायन्ते राज्यं वृद्धोपसेवया ॥
evaṃ jyeṣṭho'pyathotsikto na rājyamabhijāyate | yavīyāṃso'pi jāyante rājyaṃ vṛddhopasevayā
इस प्रकार बड़ा पुत्र भी यदि उद्धत हो तो राज्य नहीं पाता, और छोटे पुत्र भी बड़ों की सेवा से राज्य के अधिकारी बन जाते हैं।
श्लोक 14 (5.149.14)
तथैव सर्वधर्मज्ञः पितुर्मम पितामहः । प्रतीपः पृथिवीपालस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥
tathaiva sarvadharmajñaḥ piturmama pitāmahaḥ | pratīpaḥ pṛthivīpālastriṣu lokeṣu viśrutaḥ
इसी प्रकार मेरे पिता के पितामह, सब धर्मों के ज्ञाता, पृथ्वीपालक प्रतीप तीनों लोकों में विख्यात थे।
श्लोक 15 (5.149.15)
तस्य पार्थिवसिंहस्य राज्यं धर्मेण शासतः । त्रयः प्रजज्ञिरे पुत्रा देवकल्पा यशस्विनः ॥
tasya pārthivasiṃhasya rājyaṃ dharmeṇa śāsataḥ | trayaḥ prajajñire putrā devakalpā yaśasvinaḥ
धर्मपूर्वक राज्य करते हुए उन राजसिंह के तीन यशस्वी, देवतुल्य पुत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 16 (5.149.16)
देवापिरभवच्छ्रेष्ठो बाह्लीकस्तदनन्तरम् । तृतीयः शन्तनुस्तात धृतिमान्मे पितामहः ॥
devāpirabhavacchreṣṭho bāhlīkastadanantaram | tṛtīyaḥ śantanustāta dhṛtimānme pitāmahaḥ
उनमें देवापि श्रेष्ठ थे, उनके बाद बाह्लीक, और हे तात, तीसरे धैर्यवान शान्तनु थे, जो मेरे पितामह थे।
श्लोक 17 (5.149.17)
देवापिस्तु महातेजास्त्वग्दोषी राजसत्तमः । धार्मिकः सत्यवादी च पितुः शुश्रूषणे रतः ॥
devāpistu mahātejāstvagdoṣī rājasattamaḥ | dhārmikaḥ satyavādī ca pituḥ śuśrūṣaṇe rataḥ
महातेजस्वी, राजाओं में श्रेष्ठ देवापि को त्वचा का रोग था; वे धार्मिक, सत्यवादी और पिता की सेवा में तत्पर थे।
श्लोक 18 (5.149.18)
पौरजानपदानां च संमतः साधुसत्कृतः । सर्वेषां बालवृद्धानां देवापिर्हृदयङ्गमः ॥
paurajānapadānāṃ ca saṃmataḥ sādhusatkṛtaḥ | sarveṣāṃ bālavṛddhānāṃ devāpirhṛdayaṅgamaḥ
नगर और जनपद के लोग उन्हें मानते थे और सज्जन उनका आदर करते थे; बालक-बूढ़े सबके हृदय में देवापि बसते थे।
श्लोक 19 (5.149.19)
वदान्यः सत्यसन्धश्च सर्वभूतहिते रतः । वर्तमानः पितुः शास्त्रे ब्राह्मणानां तथैव च ॥
vadānyaḥ satyasandhaśca sarvabhūtahite rataḥ | vartamānaḥ pituḥ śāstre brāhmaṇānāṃ tathaiva ca
वे उदार, सत्यप्रतिज्ञ और सब प्राणियों के हित में लगे रहने वाले थे, तथा पिता और ब्राह्मणों की आज्ञा में चलते थे।
श्लोक 20 (5.149.20)
बाह्लीकस्य प्रियो भ्राता शन्तनोश्च महात्मनः । सौभ्रात्रं च परं तेषां सहितानां महात्मनाम् ॥
bāhlīkasya priyo bhrātā śantanośca mahātmanaḥ | saubhrātraṃ ca paraṃ teṣāṃ sahitānāṃ mahātmanām
वे अपने भाई बाह्लीक और महात्मा शान्तनु के प्रिय थे; उन एकजुट महात्मा भाइयों में परम भ्रातृप्रेम था।
श्लोक 21 (5.149.21)
अथ कालस्य पर्याये वृद्धो नृपतिसत्तमः । संभारानभिषेकार्थं कारयामास शास्त्रतः ॥
atha kālasya paryāye vṛddho nṛpatisattamaḥ | saṃbhārānabhiṣekārthaṃ kārayāmāsa śāstrataḥ
फिर समय बीतने पर उन वृद्ध नृपश्रेष्ठ ने शास्त्रविधि के अनुसार अभिषेक की सामग्री तैयार करवाई।
श्लोक 22 (5.149.22)
कारयामास सर्वाणि मङ्गलार्थानि वै विभुः । तं ब्राह्मणाश्च वृद्धाश्च पौरजानपदैः सह ॥
kārayāmāsa sarvāṇi maṅgalārthāni vai vibhuḥ | taṃ brāhmaṇāśca vṛddhāśca paurajānapadaiḥ saha
उन प्रभु ने सारे मंगल-कार्य भी करवाए। पर ब्राह्मणों और वृद्धों ने नगर और जनपद के लोगों के साथ मिलकर
श्लोक 23 (5.149.23)
सर्वे निवारयामासुर्देवापेरभिषेचनम् । स तच्छ्रुत्वा तु नृपतिरभिषेकनिवारणम् । अश्रुकण्ठोऽभवद्राजा पर्यशोचत चात्मजम् ॥
sarve nivārayāmāsurdevāperabhiṣecanam | sa tacchrutvā tu nṛpatirabhiṣekanivāraṇam | aśrukaṇṭho'bhavadrājā paryaśocata cātmajam
सबने देवापि के अभिषेक को रोक दिया। अभिषेक रोके जाने की बात सुनकर राजा का कण्ठ आँसुओं से भर आया, और वे अपने पुत्र के लिए शोक करने लगे।
श्लोक 24 (5.149.24)
एवं वदान्यो धर्मज्ञः सत्यसन्धश्च सोऽभवत् । प्रियः प्रजानामपि संस्त्वग्दोषेण प्रदूषितः ॥
evaṃ vadānyo dharmajñaḥ satyasandhaśca so'bhavat | priyaḥ prajānāmapi saṃstvagdoṣeṇa pradūṣitaḥ
इस प्रकार वे उदार, धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और प्रजा के प्रिय होते हुए भी त्वचा-रोग से दूषित थे।
श्लोक 25 (5.149.25)
हीनाङ्गं पृथिवीपालं नाभिनन्दन्ति देवताः । इति कृत्वा नृपश्रेष्ठं प्रत्यषेधन्द्विजर्षभाः ॥
hīnāṅgaṃ pṛthivīpālaṃ nābhinandanti devatāḥ | iti kṛtvā nṛpaśreṣṭhaṃ pratyaṣedhandvijarṣabhāḥ
"जिस राजा का अंग दोषयुक्त हो, उसका देवता अभिनन्दन नहीं करते" — यह सोचकर श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने उस श्रेष्ठ राजकुमार को रोक दिया।
श्लोक 26 (5.149.26)
ततः प्रव्यथिताङ्गोऽसौ पुत्रशोकसमन्वितः । ममार तं मृतं दृष्ट्वा देवापिः संश्रितो वनम् ॥
tataḥ pravyathitāṅgo'sau putraśokasamanvitaḥ | mamāra taṃ mṛtaṃ dṛṣṭvā devāpiḥ saṃśrito vanam
तब शरीर से व्यथित और पुत्र-शोक से ग्रस्त होकर राजा की मृत्यु हो गई। उन्हें मृत देखकर देवापि ने वन की शरण ली।
श्लोक 27 (5.149.27)
बाह्लीको मातुलकुलं त्यक्त्वा राज्यं समाश्रितः । पितृभ्रातॄन्परित्यज्य प्राप्तवान्परमर्धिमत् ॥
bāhlīko mātulakulaṃ tyaktvā rājyaṃ samāśritaḥ | pitṛbhrātṝnparityajya prāptavānparamardhimat
बाह्लीक ने राज्य छोड़कर अपने ननिहाल का आश्रय लिया; पिता और भाइयों को त्यागकर उन्होंने अत्यन्त समृद्ध राज्य प्राप्त किया।
श्लोक 28 (5.149.28)
बाह्लीकेन त्वनुज्ञातः शन्तनुर्लोकविश्रुतः । पितर्युपरते राजन्राजा राज्यमकारयत् ॥
bāhlīkena tvanujñātaḥ śantanurlokaviśrutaḥ | pitaryuparate rājanrājā rājyamakārayat
हे राजन्! पिता के स्वर्गवासी होने पर बाह्लीक की अनुमति से लोकविख्यात शान्तनु ने राजा बनकर राज्य किया।
श्लोक 29 (5.149.29)
तथैवाहं मतिमता परिचिन्त्येह पाण्डुना । ज्येष्ठः प्रभ्रंशितो राज्याद्धीनाङ्ग इति भारत ॥
tathaivāhaṃ matimatā paricintyeha pāṇḍunā | jyeṣṭhaḥ prabhraṃśito rājyāddhīnāṅga iti bhārata
हे भारत! इसी प्रकार बड़ा होने पर भी मुझे अंगहीन मानकर बुद्धिमान पाण्डु ने सोच-विचार कर राज्य से अलग रखा।
श्लोक 30 (5.149.30)
पाण्डुस्तु राज्यं संप्राप्तः कनीयानपि सन्नृपः । विनाशे तस्य पुत्राणामिदं राज्यमरिन्दम ॥
pāṇḍustu rājyaṃ saṃprāptaḥ kanīyānapi sannṛpaḥ | vināśe tasya putrāṇāmidaṃ rājyamarindama
पाण्डु छोटे होते हुए भी राज्य पाकर राजा हुए। हे शत्रुदमन, उनके न रहने पर यह राज्य उनके पुत्रों का है।
श्लोक 31 (5.149.31)
मय्यभागिनि राज्याय कथं त्वं राज्यमिच्छसि । अराजपुत्रो ह्यस्वामी परस्वं हर्तुमिच्छसि ॥
mayyabhāgini rājyāya kathaṃ tvaṃ rājyamicchasi | arājaputro hyasvāmī parasvaṃ hartumicchasi
जब राज्य में मेरा ही कोई भाग नहीं है, तो तुम राज्य की इच्छा कैसे करते हो? न तुम राजपुत्र हो, न स्वामी, फिर भी पराया धन हड़पना चाहते हो।
श्लोक 32 (5.149.32)
युधिष्ठिरो राजपुत्रो महात्मा । न्यायागतं राज्यमिदं च तस्य । स कौरवस्यास्य कुलस्य भर्ता । प्रशासिता चैव महानुभावः ॥
yudhiṣṭhiro rājaputro mahātmā | nyāyāgataṃ rājyamidaṃ ca tasya | sa kauravasyāsya kulasya bhartā | praśāsitā caiva mahānubhāvaḥ
युधिष्ठिर राजपुत्र और महात्मा हैं; यह राज्य न्यायपूर्वक उन्हें प्राप्त हुआ है। वे महानुभाव इस कौरव कुल के स्वामी और शासक हैं।
श्लोक 33 (5.149.33)
स सत्यसन्धः स तथाऽप्रमत्तः । शास्त्रे स्थितो बन्धुजनस्य साधुः । प्रियः प्रजानां सुहृदानुकम्पी । जितेन्द्रियः साधुजनस्य भर्ता ॥
sa satyasandhaḥ sa tathā'pramattaḥ | śāstre sthito bandhujanasya sādhuḥ | priyaḥ prajānāṃ suhṛdānukampī | jitendriyaḥ sādhujanasya bhartā
वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और उसी प्रकार सदा सावधान रहते हैं; शास्त्र की मर्यादा में स्थित हैं और बन्धु-बान्धवों के प्रति सज्जन हैं। वे प्रजा के प्रिय, मित्रों पर दया करने वाले, जितेन्द्रिय और सज्जनों के पालक हैं।
श्लोक 34 (5.149.34)
क्षमा तितिक्षा दम आर्जवं च । सत्यव्रतत्वं श्रुतमप्रमादः । भूतानुकम्पा ह्यनुशासनं च । युधिष्ठिरे राजगुणाः समस्ताः ॥
kṣamā titikṣā dama ārjavaṃ ca | satyavratatvaṃ śrutamapramādaḥ | bhūtānukampā hyanuśāsanaṃ ca | yudhiṣṭhire rājaguṇāḥ samastāḥ
क्षमा, तितिक्षा, दम और सरलता, सत्यव्रत, शास्त्रज्ञान और अप्रमाद, प्राणियों पर दया और शासन-क्षमता — राजा के ये सारे गुण युधिष्ठिर में हैं।
श्लोक 35 (5.149.35)
अराजपुत्रस्त्वमनार्यवृत्तो । लुब्धः सदा बन्धुषु पापबुद्धिः । क्रमागतं राज्यमिदं परेषां । हर्तुं कथं शक्ष्यसि दुर्विनीत ॥
arājaputrastvamanāryavṛtto | lubdhaḥ sadā bandhuṣu pāpabuddhiḥ | kramāgataṃ rājyamidaṃ pareṣāṃ | hartuṃ kathaṃ śakṣyasi durvinīta
तुम राजपुत्र नहीं हो; तुम्हारा आचरण अनार्यों जैसा है, तुम सदा लोभी हो और बन्धुओं के प्रति पापबुद्धि रखते हो। अरे उद्दण्ड, परम्परा से दूसरों को मिला यह राज्य तुम कैसे छीन सकोगे?
श्लोक 36 (5.149.36)
प्रयच्छ राज्यार्धमपेतमोहः । सवाहनं त्वं सपरिच्छदं च । ततोऽवशेषं तव जीवितस्य । सहानुजस्यैव भवेन्नरेन्द्र ॥
prayaccha rājyārdhamapetamohaḥ | savāhanaṃ tvaṃ saparicchadaṃ ca | tato'vaśeṣaṃ tava jīvitasya | sahānujasyaiva bhavennarendra
मोह त्यागकर वाहनों और साज-सामान सहित आधा राज्य दे दो। हे नरेन्द्र, तभी तुम्हारा और तुम्हारे छोटे भाइयों का शेष जीवन बचा रह सकेगा।