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उद्योग पर्व · अध्याय 150

दुर्योधन का कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान

श्रीकृष्ण अपना वृत्तान्त समाप्त करते हैं। भीष्म, द्रोण, विदुर, गान्धारी और धृतराष्ट्र की बातों की अनसुनी करके दुर्योधन क्रोध से सभा छोड़कर उठ गया और उसने राजाओं को कुरुक्षेत्र चलने की आज्ञा दी; भीष्म को सेनापति बनाकर ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ चल पड़ीं। कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि उन्होंने पहले साम का, फिर भेद और भय का, फिर दान का — केवल पाँच गाँवों तक का — प्रयोग किया, पर दुर्योधन ने कुछ नहीं छोड़ा। अब चौथा उपाय, दण्ड, ही शेष है: कौरव बिना युद्ध के राज्य नहीं देंगे।

अध्याय 149अध्याय-सूचीअध्याय 151

भगवानुवाच

श्लोक 1 (5.150.1)

एवमुक्ते तु भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च । गान्धार्या धृतराष्ट्रेण न वै मन्दोऽन्वबुद्ध्यत ॥

evamukte tu bhīṣmeṇa droṇena vidureṇa ca | gāndhāryā dhṛtarāṣṭreṇa na vai mando'nvabuddhyata

भीष्म, द्रोण, विदुर, गान्धारी और धृतराष्ट्र के इस प्रकार समझाने पर भी उस मूर्ख की समझ में कुछ नहीं आया।

श्लोक 2 (5.150.2)

अवधूयोत्थितो मन्दः क्रोधसंरक्तलोचनः । अन्वद्रवन्त तं पश्चाद्राजानस्त्यक्तजीविताः ॥

avadhūyotthito mandaḥ krodhasaṃraktalocanaḥ | anvadravanta taṃ paścādrājānastyaktajīvitāḥ

सबकी बात ठुकराकर वह मूर्ख उठ खड़ा हुआ; क्रोध से उसकी आँखें लाल हो रही थीं। जीवन का मोह छोड़ चुके राजा उसके पीछे-पीछे दौड़े।

श्लोक 3 (5.150.3)

आज्ञापयच्च राज्ञस्तान्पार्थिवान्नष्टचेतसः । प्रयात वै कुरुक्षेत्रं पुष्योऽद्येति पुनः पुनः ॥

ājñāpayacca rājñastānpārthivānnaṣṭacetasaḥ | prayāta vai kurukṣetraṃ puṣyo'dyeti punaḥ punaḥ

उसने बुद्धि खो चुके उन राजाओं को बार-बार आज्ञा दी — "कुरुक्षेत्र की ओर कूच करो; आज पुष्य नक्षत्र है।"

श्लोक 4 (5.150.4)

ततस्ते पृथिवीपालाः प्रययुः सहसैनिकाः । भीष्मं सेनापतिं कृत्वा संहृष्टाः कालचोदिताः ॥

tataste pṛthivīpālāḥ prayayuḥ sahasainikāḥ | bhīṣmaṃ senāpatiṃ kṛtvā saṃhṛṣṭāḥ kālacoditāḥ

तब वे राजा भीष्म को सेनापति बनाकर अपने सैनिकों के साथ प्रसन्न होकर चल पड़े — काल ही उन्हें प्रेरित कर रहा था।

श्लोक 5 (5.150.5)

अक्षौहिण्यो दशैका च कौरवाणां समागताः । तासां प्रमुखतो भीष्मस्तालकेतुर्व्यरोचत ॥

akṣauhiṇyo daśaikā ca kauravāṇāṃ samāgatāḥ | tāsāṃ pramukhato bhīṣmastālaketurvyarocata

कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुई हैं, और उनके आगे ताड़ के चिह्न वाली ध्वजा धारण किए भीष्म शोभा पा रहे हैं।

श्लोक 6 (5.150.6)

यदत्र युक्तं प्राप्तं च तद्विधत्स्व विशांपते । उक्तं भीष्मेण यद्वाक्यं द्रोणेन विदुरेण च ॥

yadatra yuktaṃ prāptaṃ ca tadvidhatsva viśāṃpate | uktaṃ bhīṣmeṇa yadvākyaṃ droṇena vidureṇa ca

हे प्रजानाथ, अब इस स्थिति में जो उचित और समयोचित हो, वह कीजिए। भीष्म ने, द्रोण ने और विदुर ने जो कहा,

श्लोक 7 (5.150.7)

गान्धार्या धृतराष्ट्रेण समक्षं मम भारत । एतत्ते कथितं राजन्यद्वृत्तं कुरुसंसदि ॥

gāndhāryā dhṛtarāṣṭreṇa samakṣaṃ mama bhārata | etatte kathitaṃ rājanyadvṛttaṃ kurusaṃsadi

और गान्धारी तथा धृतराष्ट्र ने मेरे सामने जो कहा — हे भारत, हे राजन्, कुरुसभा में जो कुछ हुआ, वह सब मैंने आपको बता दिया।

श्लोक 8 (5.150.8)

साम चादौ प्रयुक्तं मे राजन्सौभ्रात्रमिच्छता । अभेदायास्य वंशस्य प्रजानां च विवृद्धये ॥

sāma cādau prayuktaṃ me rājansaubhrātramicchatā | abhedāyāsya vaṃśasya prajānāṃ ca vivṛddhaye

हे राजन्! भाइयों में सौहार्द चाहते हुए मैंने पहले साम (समझाने-बुझाने) का प्रयोग किया, जिससे इस वंश में फूट न पड़े और प्रजा की वृद्धि हो।

श्लोक 9 (5.150.9)

पुनर्भेदश्च मे युक्तो यदा साम न गृह्यते । कर्मानुकीर्तनं चैव देवमानुषसंहितम् ॥

punarbhedaśca me yukto yadā sāma na gṛhyate | karmānukīrtanaṃ caiva devamānuṣasaṃhitam

जब साम स्वीकार नहीं हुआ, तब मैंने भेद का प्रयोग किया, और देवताओं तथा मनुष्यों के कर्मों का वर्णन भी किया।

श्लोक 10 (5.150.10)

यदा नाद्रियते वाक्यं सामपूर्वं सुयोधनः । तदा मया समानीय भेदिताः सर्वपार्थिवाः ॥

yadā nādriyate vākyaṃ sāmapūrvaṃ suyodhanaḥ | tadā mayā samānīya bheditāḥ sarvapārthivāḥ

जब सुयोधन ने साम से आरम्भ हुई बातों का आदर नहीं किया, तब मैंने सब राजाओं को एकत्र करके उनमें फूट डाली।

श्लोक 11 (5.150.11)

अद्भुतानि च घोराणि दारुणानि च भारत । अमानुषाणि कर्माणि दर्शितानि मया विभो ॥

adbhutāni ca ghorāṇi dāruṇāni ca bhārata | amānuṣāṇi karmāṇi darśitāni mayā vibho

हे भारत, हे प्रभो! मैंने अद्भुत, घोर, भयंकर और अमानुषी कर्म भी दिखाए।

श्लोक 12 (5.150.12)

निर्भर्त्सयित्वा राज्ञस्तांस्तृणीकृत्य सुयोधनम् । राधेयं भीषयित्वा च सौबलं च पुनः पुनः ॥

nirbhartsayitvā rājñastāṃstṛṇīkṛtya suyodhanam | rādheyaṃ bhīṣayitvā ca saubalaṃ ca punaḥ punaḥ

मैंने उन राजाओं को फटकारा, सुयोधन को तिनके के समान तुच्छ ठहराया, और राधापुत्र (कर्ण) तथा सुबलपुत्र (शकुनि) को बार-बार डराया।

श्लोक 13 (5.150.13)

द्यूततो धार्तराष्ट्राणां निन्दां कृत्वा तथा पुनः । भेदयित्वा नृपान्सर्वान्वाग्भिर्मन्त्रेण चासकृत् ॥

dyūtato dhārtarāṣṭrāṇāṃ nindāṃ kṛtvā tathā punaḥ | bhedayitvā nṛpānsarvānvāgbhirmantreṇa cāsakṛt

फिर मैंने द्यूत को लेकर धृतराष्ट्र के पुत्रों की निन्दा की, और वचनों तथा मन्त्रणा से बार-बार सब राजाओं में फूट डाली।

श्लोक 14 (5.150.14)

पुनः सामाभिसंयुक्तं संप्रदानमथाब्रुवम् । अभेदात्कुरुवंशस्य कार्ययोगात्तथैव च ॥

punaḥ sāmābhisaṃyuktaṃ saṃpradānamathābruvam | abhedātkuruvaṃśasya kāryayogāttathaiva ca

फिर मैंने साम से युक्त दान का प्रस्ताव रखा, जिससे कुरुवंश में फूट न पड़े और कार्य भी सिद्ध हो जाए —

श्लोक 15 (5.150.15)

ते शूरा धृतराष्ट्रस्य भीष्मस्य विदुरस्य च । तिष्ठेयुः पाण्डवाः सर्वे हित्वा मानमधश्चराः ॥

te śūrā dhṛtarāṣṭrasya bhīṣmasya vidurasya ca | tiṣṭheyuḥ pāṇḍavāḥ sarve hitvā mānamadhaścarāḥ

"वे शूरवीर पाण्डव सब अभिमान छोड़कर धृतराष्ट्र, भीष्म और विदुर के अधीन रहें।

श्लोक 16 (5.150.16)

प्रयच्छन्तु च ते राज्यमनीशास्ते भवन्तु च । यथाह राजा गाङ्गेयो विदुरश्च हितं तव ॥

prayacchantu ca te rājyamanīśāste bhavantu ca | yathāha rājā gāṅgeyo viduraśca hitaṃ tava

वे राज्य तुम्हें दे दें और स्वयं उस पर अधिकार न रखें। जैसा राजा धृतराष्ट्र, गंगापुत्र भीष्म और विदुर तुम्हारे हित के लिए कहते हैं, वैसा ही हो।

श्लोक 17 (5.150.17)

सर्वं भवतु ते राज्यं पञ्च ग्रामान्विसर्जय । अवश्यं भरणीया हि पितुस्ते राजसत्तम ॥

sarvaṃ bhavatu te rājyaṃ pañca grāmānvisarjaya | avaśyaṃ bharaṇīyā hi pituste rājasattama

सारा राज्य तुम्हारा ही रहे; केवल पाँच गाँव छोड़ दो। हे राजश्रेष्ठ, उनका भरण-पोषण करना तुम्हारे पिता का कर्तव्य ही है।"

श्लोक 18 (5.150.18)

एवमुक्तोऽपि दुष्टात्मा नैव भागं व्यमुञ्चत । दण्डं चतुर्थं पश्यामि तेषु पापेषु नान्यथा ॥

evamukto'pi duṣṭātmā naiva bhāgaṃ vyamuñcata | daṇḍaṃ caturthaṃ paśyāmi teṣu pāpeṣu nānyathā

ऐसा कहे जाने पर भी उस दुष्टात्मा ने कोई भाग नहीं छोड़ा। उन पापियों के लिए मुझे चौथा उपाय, दण्ड, ही दिखाई देता है — और कोई मार्ग नहीं।

श्लोक 19 (5.150.19)

निर्याताश्च विनाशाय कुरुक्षेत्रं नराधिपाः । एतत्ते कथितं राजन्यद्वृत्तं कुरुसंसदि ॥

niryātāśca vināśāya kurukṣetraṃ narādhipāḥ | etatte kathitaṃ rājanyadvṛttaṃ kurusaṃsadi

वे राजा विनाश के लिए कुरुक्षेत्र की ओर निकल पड़े हैं। हे राजन्, कुरुसभा में जो कुछ हुआ, वह मैंने आपको बता दिया।

श्लोक 20 (5.150.20)

न ते राज्यं प्रयच्छन्ति विना युद्धेन पाण्डव । विनाशहेतवः सर्वे प्रत्युपस्थितमृत्यवः ॥

na te rājyaṃ prayacchanti vinā yuddhena pāṇḍava | vināśahetavaḥ sarve pratyupasthitamṛtyavaḥ

हे पाण्डुनन्दन, वे युद्ध के बिना आपको राज्य नहीं देंगे। वे सब विनाश के कारण बने हुए हैं, और मृत्यु उनके सामने आ खड़ी है।

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