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उद्योग पर्व · अध्याय 151

धृष्टद्युम्न का सेनापति-वरण और पाण्डवों का कुरुक्षेत्र-प्रस्थान

श्रीकृष्ण का वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिर अपने भाइयों से पूछते हैं कि भीष्म के विरुद्ध सात अक्षौहिणी सेनाओं का सेनापति कौन हो। सहदेव विराट का, नकुल द्रुपद का, अर्जुन धृष्टद्युम्न का और भीम शिखण्डी का नाम सुझाते हैं; युधिष्ठिर निर्णय श्रीकृष्ण पर छोड़ देते हैं और वे धृष्टद्युम्न को चुनते हैं। सेना बड़े हर्षनाद के साथ कूच करती है, द्रौपदी उपप्लव्य में लौट जाती हैं, और पाण्डव कुरुक्षेत्र पहुँचकर शंख बजाते हैं।

अध्याय 150अध्याय-सूचीअध्याय 152

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.151.1)

जनार्दनवचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । भ्रातॄनुवाच धर्मात्मा समक्षं केशवस्य ह ॥

janārdanavacaḥ śrutvā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | bhrātṝnuvāca dharmātmā samakṣaṃ keśavasya ha

जनार्दन के वचन सुनकर धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिर ने केशव के सामने ही अपने भाइयों से कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (5.151.2)

श्रुतं भवद्भिर्यद्वृत्तं सभायां कुरुसंसदि । केशवस्यापि यद्वाक्यं तत्सर्वमवधारितम् ॥

śrutaṃ bhavadbhiryadvṛttaṃ sabhāyāṃ kurusaṃsadi | keśavasyāpi yadvākyaṃ tatsarvamavadhāritam

"कुरुओं की सभा में जो कुछ हुआ, वह तुम सबने सुन लिया है, और केशव ने जो कहा, वह सब भी तुमने भली-भाँति समझ लिया है।

श्लोक 3 (5.151.3)

तस्मात्सेनाविभागं मे कुरुध्वं नरसत्तमाः । अक्षौहिण्यश्च सप्तैताः समेता विजयाय वै ॥

tasmātsenāvibhāgaṃ me kurudhvaṃ narasattamāḥ | akṣauhiṇyaśca saptaitāḥ sametā vijayāya vai

इसलिए, हे नरश्रेष्ठो, मेरी सेना का विभाजन करो। ये सात अक्षौहिणी सेनाएँ विजय के लिए एकत्र हुई हैं।

श्लोक 4 (5.151.4)

तासां ये पतयः सप्त विख्यातास्तान्निबोधत । द्रुपदश्च विराटश्च धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ॥

tāsāṃ ye patayaḥ sapta vikhyātāstānnibodhata | drupadaśca virāṭaśca dhṛṣṭadyumnaśikhaṇḍinau

इनके जो सात विख्यात अधिपति हैं, उन्हें जान लो — द्रुपद, विराट, धृष्टद्युम्न और शिखण्डी,

श्लोक 5 (5.151.5)

सात्यकिश्चेकितानश्च भीमसेनश्च वीर्यवान् । एते सेनाप्रणेतारो वीराः सर्वे तनुत्यजः ॥

sātyakiścekitānaśca bhīmasenaśca vīryavān | ete senāpraṇetāro vīrāḥ sarve tanutyajaḥ

सात्यकि, चेकितान और पराक्रमी भीमसेन। ये सेना के नायक हैं — सभी वीर, जो प्राण देने को तत्पर हैं।

श्लोक 6 (5.151.6)

सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः । ह्रीमन्तो नीतिमन्तश्च सर्वे युद्धविशारदाः ॥

sarve vedavidaḥ śūrāḥ sarve sucaritavratāḥ | hrīmanto nītimantaśca sarve yuddhaviśāradāḥ

सभी वेदों के ज्ञाता और शूरवीर हैं, सभी उत्तम व्रतों का पालन करने वाले हैं; वे लज्जाशील और नीतिज्ञ हैं, सभी युद्ध में निपुण हैं,

श्लोक 7 (5.151.7)

इष्वस्त्रकुशलाः सर्वे तथा सर्वास्त्रयोधिनः । सप्तानामपि यो नेता सेनानां प्रविभागवित् ॥

iṣvastrakuśalāḥ sarve tathā sarvāstrayodhinaḥ | saptānāmapi yo netā senānāṃ pravibhāgavit

सभी धनुष-बाण में कुशल हैं और सब प्रकार के अस्त्रों से युद्ध करने वाले हैं। अब जो इन सातों सेनाओं का नेता बन सके, जो सेना के विभाजन की विधि जानता हो,

श्लोक 8 (5.151.8)

यः सहेत रणे भीष्मं शरार्चिःपावकोपमम् । तं तावत्सहदेवात्र प्रब्रूहि कुरुनन्दन । स्वगतं पुरुषव्याघ्र को नः सेनापतिः क्षमः ॥

yaḥ saheta raṇe bhīṣmaṃ śarārciḥpāvakopamam | taṃ tāvatsahadevātra prabrūhi kurunandana | svagataṃ puruṣavyāghra ko naḥ senāpatiḥ kṣamaḥ

और जो युद्ध में बाणरूपी ज्वालाओं वाली अग्नि के समान भीष्म का सामना कर सके — हे कुरुनन्दन सहदेव, पहले तुम ही उस पुरुष का नाम बताओ। हे पुरुषसिंह, अपने मत से कहो, हमारा सेनापति बनने योग्य कौन है?"

सहदेव उवाच

श्लोक 9 (5.151.9)

संयुक्त एकदुःखश्च वीर्यवांश्च महीपतिः । यं समाश्रित्य धर्मज्ञं स्वमंशमनुयुञ्ज्महे ॥

saṃyukta ekaduḥkhaśca vīryavāṃśca mahīpatiḥ | yaṃ samāśritya dharmajñaṃ svamaṃśamanuyuñjmahe

"जो हमसे सम्बन्ध में बँधे हैं, हमारे दुःख को अपना दुःख मानते हैं, जो पराक्रमी राजा और धर्मज्ञ हैं, जिनका आश्रय लेकर हम अपना भाग माँग रहे हैं —

श्लोक 10 (5.151.10)

मत्स्यो विराटो बलवान्कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः । प्रसहिष्यति सङ्‌ग्रामे भीष्मं तांश्च महारथान् ॥

matsyo virāṭo balavānkṛtāstro yuddhadurmadaḥ | prasahiṣyati saṅgrāme bhīṣmaṃ tāṃśca mahārathān

वे बलवान, अस्त्रविद्या में निपुण, युद्ध में दुर्जय मत्स्यराज विराट युद्ध में भीष्म का और उन महारथियों का सामना करेंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (5.151.11)

तथोक्ते सहदेवेन वाक्ये वाक्यविशारदः । नकुलोऽनन्तरं तस्मादिदं वचनमाददे ॥

tathokte sahadevena vākye vākyaviśāradaḥ | nakulo'nantaraṃ tasmādidaṃ vacanamādade

सहदेव के ऐसा कहने पर, वाणी में निपुण नकुल ने उसके बाद यह वचन कहा —

नकुल उवाच

श्लोक 12 (5.151.12)

वयसा शास्त्रतो धैर्यात्कुलेनाभिजनेन च । ह्रीमान्बलान्वितः श्रीमान्सर्वशास्त्रविशारदः ॥

vayasā śāstrato dhairyātkulenābhijanena ca | hrīmānbalānvitaḥ śrīmānsarvaśāstraviśāradaḥ

"जो आयु, शास्त्रज्ञान, धैर्य, कुल और वंश-परम्परा में श्रेष्ठ हैं; जो लज्जाशील, बलवान, श्रीमान और सब शास्त्रों में पारंगत हैं;

श्लोक 13 (5.151.13)

वेद चास्त्रं भारद्वाजाद्दुर्धर्षः सत्यसङ्गरः । यो नित्यं स्पर्धते द्रोणं भीष्मं चैव महाबलम् ॥

veda cāstraṃ bhāradvājāddurdharṣaḥ satyasaṅgaraḥ | yo nityaṃ spardhate droṇaṃ bhīṣmaṃ caiva mahābalam

जिन्होंने भरद्वाज से अस्त्रविद्या पाई है, जो दुर्जय और सत्यप्रतिज्ञ हैं, और जो सदा द्रोण तथा महाबली भीष्म से होड़ लेते आए हैं;

श्लोक 14 (5.151.14)

श्लाघ्यः पार्थिववंशस्य प्रमुखे वाहिनीपतिः । पुत्रपौत्रैः परिवृतः शतशाख इव द्रुमः ॥

ślāghyaḥ pārthivavaṃśasya pramukhe vāhinīpatiḥ | putrapautraiḥ parivṛtaḥ śataśākha iva drumaḥ

जो राजवंश में प्रशंसित हैं, सेना के अग्रभाग में सेनापति हैं, और पुत्र-पौत्रों से घिरे हुए सौ शाखाओं वाले वृक्ष के समान हैं;

श्लोक 15 (5.151.15)

यस्तताप तपो घोरं सदारः पृथिवीपतिः । रोषाद्द्रोणविनाशाय वीरः समितिशोभनः ॥

yastatāpa tapo ghoraṃ sadāraḥ pṛthivīpatiḥ | roṣāddroṇavināśāya vīraḥ samitiśobhanaḥ

जिन पृथ्वीपति ने क्रोधवश द्रोण के विनाश के लिए पत्नी सहित घोर तप किया था, जो युद्ध में शोभा पाने वाले वीर हैं;

श्लोक 16 (5.151.16)

पितेवास्मान्समाधत्ते यः सदा पार्थिवर्षभः । श्वशुरो द्रुपदोऽस्माकं सेनाग्रं स प्रकर्षतु ॥

pitevāsmānsamādhatte yaḥ sadā pārthivarṣabhaḥ | śvaśuro drupado'smākaṃ senāgraṃ sa prakarṣatu

जो राजश्रेष्ठ सदा पिता की भाँति हमारा ध्यान रखते आए हैं — वे हमारे श्वशुर द्रुपद सेना के अग्रभाग का संचालन करें।

श्लोक 17 (5.151.17)

स द्रोणभीष्मावायातौ सहेदिति मतिर्मम । स हि दिव्यास्त्रविद्राजा सखा चाङ्गिरसो नृपः ॥

sa droṇabhīṣmāvāyātau sahediti matirmama | sa hi divyāstravidrājā sakhā cāṅgiraso nṛpaḥ

मेरा विश्वास है कि आक्रमण करते द्रोण और भीष्म का वे सामना कर सकेंगे, क्योंकि वे राजा दिव्यास्त्रों के ज्ञाता हैं और आंगिरस द्रोण के सखा रहे हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (5.151.18)

माद्रीसुताभ्यामुक्ते तु स्वमते कुरुनन्दनः । वासविर्वासवसमः सव्यसाच्यब्रवीद्वचः ॥

mādrīsutābhyāmukte tu svamate kurunandanaḥ | vāsavirvāsavasamaḥ savyasācyabravīdvacaḥ

माद्री के दोनों पुत्रों के अपना मत कह चुकने पर इन्द्रपुत्र, इन्द्र के समान पराक्रमी, कुरुनन्दन सव्यसाची अर्जुन ने यह वचन कहा —

अर्जुन उवाच

श्लोक 19 (5.151.19)

योयं तपःप्रभावेन ऋषिसन्तोषणेन च । दिव्यः पुरुष उत्पन्नो ज्वालावर्णो महाभुजः ॥

yoyaṃ tapaḥprabhāvena ṛṣisantoṣaṇena ca | divyaḥ puruṣa utpanno jvālāvarṇo mahābhujaḥ

"जो यह दिव्य पुरुष तप के प्रभाव और ऋषियों को संतुष्ट करने से उत्पन्न हुआ, जो अग्नि की ज्वाला के वर्ण का और विशाल भुजाओं वाला है,

श्लोक 20 (5.151.20)

धनुष्मान्कवची खड्गी रथमारुह्य दंशितः । दिव्यैर्हयवरैर्युक्तमग्निकुण्डात्समुत्थितः ॥

dhanuṣmānkavacī khaḍgī rathamāruhya daṃśitaḥ | divyairhayavarairyuktamagnikuṇḍātsamutthitaḥ

जो धनुष, कवच और खड्ग धारण किए, दिव्य उत्तम घोड़ों से जुते रथ पर सवार, सन्नद्ध होकर अग्निकुण्ड से प्रकट हुआ,

श्लोक 21 (5.151.21)

गर्जन्निव महामेघो रथघोषेण वीर्यवान् । सिंहसंहननो वीरः सिंहतुल्यपराक्रमः ॥

garjanniva mahāmegho rathaghoṣeṇa vīryavān | siṃhasaṃhanano vīraḥ siṃhatulyaparākramaḥ

जो रथ के घोष से महामेघ की भाँति गरजता है, जो पराक्रमी, सिंह के समान सुगठित शरीर वाला और सिंह के समान पराक्रमी वीर है,

श्लोक 22 (5.151.22)

सिंहोरस्कः सिंहभुजः सिंहवक्षा महाबलः । सिंहप्रगर्जनो वीरः सिंहस्कन्धो महाद्युतिः ॥

siṃhoraskaḥ siṃhabhujaḥ siṃhavakṣā mahābalaḥ | siṃhapragarjano vīraḥ siṃhaskandho mahādyutiḥ

सिंह जैसी छाती, सिंह जैसी भुजाओं और सिंह जैसे वक्षःस्थल वाला महाबली, सिंह की भाँति गर्जना करने वाला, सिंह जैसे कंधों वाला महातेजस्वी वीर,

श्लोक 23 (5.151.23)

सुभ्रूः सुदंष्ट्रः सुहनुः सुबाहुः सुमुखोऽकृशः । सुजत्रुः सुविशालाक्षः सुपादः सुप्रतिष्ठितः ॥

subhrūḥ sudaṃṣṭraḥ suhanuḥ subāhuḥ sumukho'kṛśaḥ | sujatruḥ suviśālākṣaḥ supādaḥ supratiṣṭhitaḥ

सुन्दर भौंहों, सुन्दर दाँतों, सुन्दर ठोड़ी, सुन्दर भुजाओं और सुन्दर मुख वाला, पुष्ट शरीर का, सुन्दर हँसलियों, बड़े सुन्दर नेत्रों और सुन्दर चरणों वाला, दृढ़ता से स्थित,

श्लोक 24 (5.151.24)

अभेद्यः सर्वशस्त्राणां प्रभिन्न इव वारणः । जज्ञे द्रोणविनाशाय सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥

abhedyaḥ sarvaśastrāṇāṃ prabhinna iva vāraṇaḥ | jajñe droṇavināśāya satyavādī jitendriyaḥ

जिसे कोई शस्त्र भेद नहीं सकता, जो मदमत्त हाथी के समान है — वह सत्यवादी, जितेन्द्रिय वीर द्रोण के विनाश के लिए जन्मा है।

श्लोक 25 (5.151.25)

धृष्टद्युम्नमहं मन्ये सहेद्भीष्मस्य सायकान् । वज्राशनिसमस्पर्शान्दीप्तास्यानुरगानिव ॥

dhṛṣṭadyumnamahaṃ manye sahedbhīṣmasya sāyakān | vajrāśanisamasparśāndīptāsyānuragāniva

मैं मानता हूँ कि धृष्टद्युम्न ही भीष्म के बाणों को सह सकता है — वे बाण जिनका स्पर्श वज्र और बिजली के समान है, जो प्रज्वलित मुख वाले सर्पों जैसे हैं,

श्लोक 26 (5.151.26)

यमदूतसमान्वेगे निपाते पावकोपमान् । रामेणाजौ विषहितान्वज्रनिष्पेषदारुणान् ॥

yamadūtasamānvege nipāte pāvakopamān | rāmeṇājau viṣahitānvajraniṣpeṣadāruṇān

जो वेग में यमदूतों के समान, गिरने पर अग्नि के समान और वज्र के प्रहार जैसे भयंकर हैं, और जिन्हें युद्ध में परशुराम ने सहा था।

श्लोक 27 (5.151.27)

पुरुषं तं न पश्यामि यः सहेत महाव्रतम् । धृष्टद्युम्नमृते राजन्निति मे धीयते मतिः ॥

puruṣaṃ taṃ na paśyāmi yaḥ saheta mahāvratam | dhṛṣṭadyumnamṛte rājanniti me dhīyate matiḥ

हे राजन्, धृष्टद्युम्न के सिवा मैं किसी ऐसे पुरुष को नहीं देखता जो उन महाव्रती भीष्म का सामना कर सके — यही मेरी निश्चित धारणा है।

श्लोक 28 (5.151.28)

क्षिप्रहस्तश्चित्रयोधी मतः सेनापतिर्मम । अभेद्यकवचः श्रीमान्मातङ्ग इव यूथपः ॥

kṣiprahastaścitrayodhī mataḥ senāpatirmama | abhedyakavacaḥ śrīmānmātaṅga iva yūthapaḥ

फुर्तीले हाथों वाला, अनेक प्रकार से युद्ध करने वाला, अभेद्य कवचधारी, यूथपति हाथी के समान श्रीमान — वही मेरी दृष्टि में सेनापति है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 29 (5.151.29)

अर्जुनेनैवमुक्ते तु भीमो वाक्यं समाददे ॥

arjunenaivamukte tu bhīmo vākyaṃ samādade

अर्जुन के ऐसा कहने पर भीम ने अपनी बात कही।

भीम उवाच

श्लोक 30 (5.151.30)

वधार्थं यः समुत्पन्नः शिखण्डी द्रुपदात्मजः । वदन्ति सिद्धा राजेन्द्र ऋषयश्च समागताः ॥

vadhārthaṃ yaḥ samutpannaḥ śikhaṇḍī drupadātmajaḥ | vadanti siddhā rājendra ṛṣayaśca samāgatāḥ

"हे राजेन्द्र, सिद्ध और एकत्र हुए ऋषि कहते हैं कि द्रुपदपुत्र शिखण्डी (भीष्म के) वध के लिए ही उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 31 (5.151.31)

यस्य सङ्ग्राममध्ये तु दिव्यमस्त्रं प्रकुर्वतः । रूपं द्रक्ष्यन्ति पुरुषा रामस्येव महात्मनः ॥

yasya saṅgrāmamadhye tu divyamastraṃ prakurvataḥ | rūpaṃ drakṣyanti puruṣā rāmasyeva mahātmanaḥ

युद्ध के बीच दिव्य अस्त्र का प्रयोग करते समय लोग उसका रूप महात्मा परशुराम के समान देखेंगे।

श्लोक 32 (5.151.32)

न तं युद्धे प्रपश्यामि यो भिन्द्यात्तु शिखण्डिनम् । शस्त्रेण समरे राजन्सन्नद्धं स्यन्दने स्थितम् ॥

na taṃ yuddhe prapaśyāmi yo bhindyāttu śikhaṇḍinam | śastreṇa samare rājansannaddhaṃ syandane sthitam

हे राजन्, मैं युद्ध में किसी को नहीं देखता जो रथ पर कवच पहनकर खड़े शिखण्डी को समर में शस्त्र से भेद सके।

श्लोक 33 (5.151.33)

द्वैरथे समरे नान्यो भीष्मं हन्यान्महाव्रतम् । शिखण्डिनमृते वीरं स मे सेनापतिर्मतः ॥

dvairathe samare nānyo bhīṣmaṃ hanyānmahāvratam | śikhaṇḍinamṛte vīraṃ sa me senāpatirmataḥ

द्वैरथ युद्ध में वीर शिखण्डी के सिवा और कोई महाव्रती भीष्म को नहीं मार सकता। वही मेरी दृष्टि में सेनापति है।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 34 (5.151.34)

सर्वस्य जगतस्तात सारासारं बलाबलम् । सर्वं जानाति धर्मात्मा मतमेषां च केशवः ॥

sarvasya jagatastāta sārāsāraṃ balābalam | sarvaṃ jānāti dharmātmā matameṣāṃ ca keśavaḥ

"हे तात, धर्मात्मा केशव सम्पूर्ण जगत् का सार-असार और बल-अबल सब जानते हैं, और इन सबके मत भी जानते हैं।

श्लोक 35 (5.151.35)

यमाह कृष्णो दाशार्हः सोऽस्तु सेनापतिर्मम । कृतास्त्रोप्यकृतास्त्रो वा वृद्धो वा यदि वा युवा ॥

yamāha kṛṣṇo dāśārhaḥ so'stu senāpatirmama | kṛtāstropyakṛtāstro vā vṛddho vā yadi vā yuvā

दाशार्ह कृष्ण जिसका नाम लें, वही मेरा सेनापति हो — चाहे वह अस्त्रविद्या में निपुण हो या न हो, वृद्ध हो या युवा।

श्लोक 36 (5.151.36)

एष नो विजये मूलमेष तात विपर्यये । अत्र प्राणाश्च राज्यं च भावाभावौ सुखासुखे ॥

eṣa no vijaye mūlameṣa tāta viparyaye | atra prāṇāśca rājyaṃ ca bhāvābhāvau sukhāsukhe

हे तात, वही हमारी विजय का मूल हैं और वही पराजय का भी; हमारे प्राण और राज्य, हमारा होना और न होना, सुख और दुःख — सब उन्हीं पर टिके हैं।

श्लोक 37 (5.151.37)

एष धाता विधाता च सिद्धिरत्र प्रतिष्ठिता । यमाह कृष्णो दाशार्हः सोस्तु नो वाहिनीपतिः ॥

eṣa dhātā vidhātā ca siddhiratra pratiṣṭhitā | yamāha kṛṣṇo dāśārhaḥ sostu no vāhinīpatiḥ

वही धाता और विधाता हैं, सिद्धि उन्हीं में प्रतिष्ठित है। दाशार्ह कृष्ण जिसका नाम लें, वही हमारी सेना का स्वामी हो।

श्लोक 38 (5.151.38)

ब्रवीतु वदतां श्रेष्ठो निशा समभिवर्तते । ततः सेनापतिं कृत्वा कृष्णस्य वशवर्तिनः ॥

bravītu vadatāṃ śreṣṭho niśā samabhivartate | tataḥ senāpatiṃ kṛtvā kṛṣṇasya vaśavartinaḥ

वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीकृष्ण ही बताएँ, क्योंकि रात बीती जा रही है। तब सेनापति नियुक्त करके, श्रीकृष्ण के अधीन रहते हुए,

श्लोक 39 (5.151.39)

रात्रेः शेषे व्यतिक्रान्ते प्रयास्यामो रणाजिरम् । अधिवासितशस्त्राश्च कृतकौतुकमङ्गलाः ॥

rātreḥ śeṣe vyatikrānte prayāsyāmo raṇājiram | adhivāsitaśastrāśca kṛtakautukamaṅgalāḥ

रात्रि का शेष भाग बीत जाने पर हम अपने शस्त्रों का पूजन करके और मंगल-कृत्य सम्पन्न करके युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करेंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 40 (5.151.40)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः । अब्रवीत्पुण्डरीकाक्षो धनञ्जयमवेक्ष्य ह ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā dharmarājasya dhīmataḥ | abravītpuṇḍarīkākṣo dhanañjayamavekṣya ha

बुद्धिमान धर्मराज के ये वचन सुनकर कमलनयन श्रीकृष्ण ने धनञ्जय की ओर देखकर कहा —

वासुदेव उवाच

श्लोक 41 (5.151.41)

ममाप्येते महाराज भवद्भिर्य उदाहृताः । नेतारस्तव सेनाया मता विक्रान्तयोधिनः ॥

mamāpyete mahārāja bhavadbhirya udāhṛtāḥ | netārastava senāyā matā vikrāntayodhinaḥ

"हे महाराज, आप लोगों ने जिनके नाम लिए हैं, वे मेरी दृष्टि में भी आपकी सेना के नायक होने योग्य पराक्रमी योद्धा हैं।

श्लोक 42 (5.151.42)

सर्व एव समर्था हि तव शत्रुं प्रबाधितुम् । इन्द्रस्यापि भयं ह्येते जनयेयुर्महाहवे ॥

sarva eva samarthā hi tava śatruṃ prabādhitum | indrasyāpi bhayaṃ hyete janayeyurmahāhave

वे सभी आपके शत्रु को कुचलने में समर्थ हैं; महायुद्ध में ये इन्द्र को भी भयभीत कर सकते हैं,

श्लोक 43 (5.151.43)

किं पुनर्धार्तराष्ट्राणां लुब्धानां पापचेतसाम् । मयापि हि महाबाहो त्वत्प्रियार्थं महाहवे ॥

kiṃ punardhārtarāṣṭrāṇāṃ lubdhānāṃ pāpacetasām | mayāpi hi mahābāho tvatpriyārthaṃ mahāhave

फिर लोभी और पापबुद्धि धृतराष्ट्र-पुत्रों की तो बात ही क्या! हे महाबाहो, मैंने भी आपके हित के लिए, इस महायुद्ध को देखते हुए,

श्लोक 44 (5.151.44)

कृतो यत्नो महांस्तत्र शमः स्यादिति भारत । धर्मस्य गतमानृण्यं न स्म वाच्या विवक्षताम् ॥

kṛto yatno mahāṃstatra śamaḥ syāditi bhārata | dharmasya gatamānṛṇyaṃ na sma vācyā vivakṣatām

हे भारत, वहाँ बड़ा प्रयत्न किया कि शान्ति हो जाए। धर्म का ऋण चुक गया है; अब दोष ढूँढ़ने वाले भी हमें कुछ नहीं कह सकते।

श्लोक 45 (5.151.45)

कृतार्थं मन्यते बाल आत्मानमविचक्षणः । धार्तराष्ट्रो बलस्थं च पश्यत्यात्मानमातुरः ॥

kṛtārthaṃ manyate bāla ātmānamavicakṣaṇaḥ | dhārtarāṣṭro balasthaṃ ca paśyatyātmānamāturaḥ

वह नासमझ, विवेकहीन धृतराष्ट्र-पुत्र अपने को कृतार्थ मान बैठा है; मानो रोग से ग्रस्त वह अपने को बल में स्थित देखता है।

श्लोक 46 (5.151.46)

युज्यतां वाहिनी साधु वधसाध्या हि मे मताः । न धार्तराष्ट्राः शक्ष्यन्ति स्थातुं दृष्ट्वा धनञ्जयम् ॥

yujyatāṃ vāhinī sādhu vadhasādhyā hi me matāḥ | na dhārtarāṣṭrāḥ śakṣyanti sthātuṃ dṛṣṭvā dhanañjayam

सेना को भली-भाँति युद्ध के लिए सज्जित किया जाए, क्योंकि मेरी दृष्टि में वे वध के ही योग्य हैं। धनञ्जय को देखकर धृतराष्ट्र-पुत्र टिक नहीं पाएँगे,

श्लोक 47 (5.151.47)

भीमसेनं च सङ्क्रुद्धं यमौ चापि यमोपमौ । युयुधानं द्वितीयं च धृष्टद्युम्नममर्षणम् ॥

bhīmasenaṃ ca saṅkruddhaṃ yamau cāpi yamopamau | yuyudhānaṃ dvitīyaṃ ca dhṛṣṭadyumnamamarṣaṇam

और न ही क्रुद्ध भीमसेन, यमराज के समान दोनों जुड़वाँ भाइयों तथा युयुधान को साथ लिए असहिष्णु धृष्टद्युम्न को,

श्लोक 48 (5.151.48)

अभिमन्युं द्रौपदेयान्विराटद्रुपदावपि । अक्षौहिणीपतींश्चान्यान्नरेन्द्रान्भीमविक्रमान् ॥

abhimanyuṃ draupadeyānvirāṭadrupadāvapi | akṣauhiṇīpatīṃścānyānnarendrānbhīmavikramān

अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्रों, विराट और द्रुपद, तथा अक्षौहिणियों के स्वामी अन्य भयंकर पराक्रमी राजाओं को देखकर।

श्लोक 49 (5.151.49)

सारवद्बलमस्माकं दुष्प्रधर्षं दुरासदम् । धार्तराष्ट्रबलं सङ्ख्ये हनिष्यति न संशयः ॥

sāravadbalamasmākaṃ duṣpradharṣaṃ durāsadam | dhārtarāṣṭrabalaṃ saṅkhye haniṣyati na saṃśayaḥ

हमारी सेना सारवान, दुर्धर्ष और दुर्जय है; यह युद्ध में धृतराष्ट्र-पुत्र की सेना का निःसन्देह संहार करेगी।

श्लोक 50 (5.151.50)

धृष्टद्युम्नमहं मन्ये सेनापतिमरिन्दम ॥

dhṛṣṭadyumnamahaṃ manye senāpatimarindama

हे शत्रुदमन, मेरी सम्मति में धृष्टद्युम्न ही सेनापति हों।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 51 (5.151.51)

एवमुक्ते तु कृष्णेन संप्राहृष्यन्नरोत्तमाः ॥

evamukte tu kṛṣṇena saṃprāhṛṣyannarottamāḥ

श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर वे नरश्रेष्ठ अत्यन्त हर्षित हुए।

श्लोक 52 (5.151.52)

तेषां प्रहृष्टमनसां नादः समभवन्महान् । योग इत्यथ सैन्यानां त्वरतां संप्रधावताम् ॥

teṣāṃ prahṛṣṭamanasāṃ nādaḥ samabhavanmahān | yoga ityatha sainyānāṃ tvaratāṃ saṃpradhāvatām

उन प्रसन्नचित्त वीरों का बड़ा भारी नाद हुआ, और फिर "तैयार हो जाओ!" की पुकार के साथ सेनाएँ उतावली में इधर-उधर दौड़ने लगीं।

श्लोक 53 (5.151.53)

हयवारणशब्दाश्च नेमिघोषाश्च सर्वतः । शङ्खदुन्दुभिघोषाश्च तुमुलाः सर्वतोऽभवन् ॥

hayavāraṇaśabdāśca nemighoṣāśca sarvataḥ | śaṅkhadundubhighoṣāśca tumulāḥ sarvato'bhavan

चारों ओर घोड़ों और हाथियों के शब्द और रथ-चक्रों की घरघराहट होने लगी, तथा सब ओर शंखों और दुन्दुभियों का तुमुल घोष गूँज उठा।

श्लोक 54 (5.151.54)

तदुग्रं सागरनिभं क्षुब्धं बलसमागमम् । रथपत्तिगजोदग्रं महोर्मिभिरिवाकुलम् ॥

tadugraṃ sāgaranibhaṃ kṣubdhaṃ balasamāgamam | rathapattigajodagraṃ mahormibhirivākulam

सेनाओं का वह भयंकर समागम क्षुब्ध सागर के समान था — रथों, पैदलों और हाथियों से ऊँचा उठा हुआ, मानो बड़ी-बड़ी लहरों से आलोड़ित।

श्लोक 55 (5.151.55)

धावतामाह्वयानानां तनुत्राणि च बध्नताम् । प्रयास्यतां पाण्डवानां ससैन्यानां समन्ततः ॥

dhāvatāmāhvayānānāṃ tanutrāṇi ca badhnatām | prayāsyatāṃ pāṇḍavānāṃ sasainyānāṃ samantataḥ

जब पाण्डव और उनकी सेनाएँ चारों ओर दौड़ रही थीं, एक-दूसरे को पुकार रही थीं, कवच बाँध रही थीं और प्रस्थान की तैयारी कर रही थीं,

श्लोक 56 (5.151.56)

गङ्गेव पूर्णा दुर्धर्षा समदृश्यत वाहिनी । अग्रानीके भीमसेनो माद्रीपुत्रौ च दंशितौ ॥

gaṅgeva pūrṇā durdharṣā samadṛśyata vāhinī | agrānīke bhīmaseno mādrīputrau ca daṃśitau

तब वह सेना जल से भरी गंगा के समान दुर्धर्ष दिखाई दी। सबसे आगे की टुकड़ी में भीमसेन और कवचधारी दोनों माद्रीपुत्र थे,

श्लोक 57 (5.151.57)

सौभद्रो द्रौपदेयाश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । प्रभद्रकाश्च पञ्चाला भीमसेनमुखा ययुः ॥

saubhadro draupadeyāśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | prabhadrakāśca pañcālā bhīmasenamukhā yayuḥ

सुभद्रापुत्र अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्र, पृषतवंशी धृष्टद्युम्न, तथा प्रभद्रक और पाञ्चाल — ये सब भीमसेन को आगे करके चले।

श्लोक 58 (5.151.58)

ततः शब्दः समभवत्समुद्रस्येव पर्वणि । हृष्टानां संप्रयातानां घोषो दिवमिवास्पृशत् ॥

tataḥ śabdaḥ samabhavatsamudrasyeva parvaṇi | hṛṣṭānāṃ saṃprayātānāṃ ghoṣo divamivāspṛśat

तब पर्व के दिन उमड़ते समुद्र जैसा शब्द हुआ; हर्ष से प्रस्थान करते योद्धाओं का घोष मानो आकाश को छूने लगा।

श्लोक 59 (5.151.59)

प्रहृष्टा दंशिता योधाः परानीकविदारणाः । तेषां मध्ये ययौ राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

prahṛṣṭā daṃśitā yodhāḥ parānīkavidāraṇāḥ | teṣāṃ madhye yayau rājā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ

हर्ष से भरे, कवचधारी, शत्रु-सेना को विदीर्ण करने वाले योद्धा चल रहे थे; उनके बीच कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर चल रहे थे।

श्लोक 60 (5.151.60)

शकटापणवेशाश्च यानयुग्यं च सर्वशः । कोशयन्त्रायुधं चैव ये च वैद्याश्चिकित्सकाः ॥

śakaṭāpaṇaveśāśca yānayugyaṃ ca sarvaśaḥ | kośayantrāyudhaṃ caiva ye ca vaidyāścikitsakāḥ

छकड़े, हाट-बाज़ार और डेरे, सब प्रकार के वाहन और भारवाही पशु, कोष, युद्ध-यन्त्र और आयुध, तथा वैद्य और चिकित्सक —

श्लोक 61 (5.151.61)

फल्गु यच्च बलं किंचिद्यच्चापि कृशदुर्बलम् । तत्सङ्गृह्य ययौ राजा ये चापि परिचारकाः ॥

phalgu yacca balaṃ kiṃcidyaccāpi kṛśadurbalam | tatsaṅgṛhya yayau rājā ye cāpi paricārakāḥ

सेना का जो भी भाग निर्बल था, जो दुबला और कमज़ोर था, और जो सेवक थे — उन सबको समेटकर राजा साथ ले चले।

श्लोक 62 (5.151.62)

उपप्लाव्ये तु पाञ्चाली द्रौपदी सत्यवादिनी । सह स्त्रीभिर्निववृते दासीदाससमावृता ॥

upaplāvye tu pāñcālī draupadī satyavādinī | saha strībhirnivavṛte dāsīdāsasamāvṛtā

सत्यवादिनी पाञ्चाली द्रौपदी स्त्रियों के साथ, दास-दासियों से घिरी हुई, उपप्लव्य में ही लौट गईं।

श्लोक 63 (5.151.63)

कृत्वा मूलप्रतीकारं गुल्मैः स्थावरजङ्गमैः । स्कन्धावारेण महता प्रययुः पाण्डुनन्दनाः ॥

kṛtvā mūlapratīkāraṃ gulmaiḥ sthāvarajaṅgamaiḥ | skandhāvāreṇa mahatā prayayuḥ pāṇḍunandanāḥ

स्थिर चौकियों और घूमते रक्षक-दलों द्वारा पीछे छूटे धन और परिजनों की रक्षा का प्रबन्ध करके पाण्डुपुत्र विशाल सेना के साथ चल पड़े।

श्लोक 64 (5.151.64)

ददतो गां हिरण्यं च ब्राह्मणैरभिसंवृताः । स्तूयमाना ययू राजन्रथैर्मणिविभूषितैः ॥

dadato gāṃ hiraṇyaṃ ca brāhmaṇairabhisaṃvṛtāḥ | stūyamānā yayū rājanrathairmaṇivibhūṣitaiḥ

हे राजन्, गौएँ और सोना दान करते हुए, ब्राह्मणों से घिरे और उनसे स्तुति पाते हुए वे मणिजटित रथों पर सवार होकर चले।

श्लोक 65 (5.151.65)

केकया धृष्टकेतुश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः । श्रेणिमान्वसुदानश्च शिखण्डी चापराजितः ॥

kekayā dhṛṣṭaketuśca putraḥ kāśyasya cābhibhūḥ | śreṇimānvasudānaśca śikhaṇḍī cāparājitaḥ

केकय, धृष्टकेतु, काशिराज के पुत्र अभिभू, श्रेणिमान्, वसुदान और अपराजित शिखण्डी —

श्लोक 66 (5.151.66)

हृष्टास्तुष्टाः कवचिनः सशस्त्राः समलङ्कृताः । राजानमन्वयुः सर्वे परिवार्य युधिष्ठिरम् ॥

hṛṣṭāstuṣṭāḥ kavacinaḥ saśastrāḥ samalaṅkṛtāḥ | rājānamanvayuḥ sarve parivārya yudhiṣṭhiram

ये सब हर्षित और संतुष्ट, कवच पहने, शस्त्रों से सज्जित और अलंकृत होकर युधिष्ठिर को घेरे हुए राजा के पीछे चले।

श्लोक 67 (5.151.67)

जघनार्धे विराटश्च याज्ञसेनिश्च सौमकिः । सुधर्मा कुन्तिभोजश्च धृष्टद्युम्नस्य चात्मजाः ॥

jaghanārdhe virāṭaśca yājñaseniśca saumakiḥ | sudharmā kuntibhojaśca dhṛṣṭadyumnasya cātmajāḥ

पिछले भाग में विराट, यज्ञसेन के सोमकवंशी पुत्र, सुधर्मा, कुन्तिभोज और धृष्टद्युम्न के पुत्र चल रहे थे,

श्लोक 68 (5.151.68)

रथायुतानि चत्वारि हयाः पञ्चगुणास्तथा । पत्तिसैन्यं दशगुणं गजानामयुतानि षट् ॥

rathāyutāni catvāri hayāḥ pañcaguṇāstathā | pattisainyaṃ daśaguṇaṃ gajānāmayutāni ṣaṭ

साथ में चालीस हज़ार रथ, उनसे पाँच गुने घोड़े, दस गुने पैदल सैनिक और साठ हज़ार हाथी थे।

श्लोक 69 (5.151.69)

अनाधृष्टिश्चेकितानो धृष्टकेतुश्च सात्यकिः । परिवार्य ययुः सर्वे वासुदेवधनञ्जयौ ॥

anādhṛṣṭiścekitāno dhṛṣṭaketuśca sātyakiḥ | parivārya yayuḥ sarve vāsudevadhanañjayau

अनाधृष्टि, चेकितान, धृष्टकेतु और सात्यकि — ये सब वासुदेव और धनञ्जय को घेरकर चले।

श्लोक 70 (5.151.70)

आसाद्य तु कुरुक्षेत्रं व्यूढानीकाः प्रहारिणः । पाण्डवाः समदृश्यन्त नर्दन्तो वृषभा इव ॥

āsādya tu kurukṣetraṃ vyūḍhānīkāḥ prahāriṇaḥ | pāṇḍavāḥ samadṛśyanta nardanto vṛṣabhā iva

व्यूहबद्ध सेनाओं के साथ कुरुक्षेत्र पहुँचकर प्रहार को उद्यत पाण्डव गरजते हुए साँड़ों के समान दिखाई दिए।

श्लोक 71 (5.151.71)

तेऽवगाह्य कुरुक्षेत्रं शङ्खान्दध्मुररिन्दमाः । तथैव दध्मतुः शङ्खं वासुदेवधनञ्जयौ ॥

te'vagāhya kurukṣetraṃ śaṅkhāndadhmurarindamāḥ | tathaiva dadhmatuḥ śaṅkhaṃ vāsudevadhanañjayau

कुरुक्षेत्र में प्रवेश करके उन शत्रुदमन वीरों ने शंख बजाए, और उसी प्रकार वासुदेव और धनञ्जय ने भी अपने शंख बजाए।

श्लोक 72 (5.151.72)

पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । निशम्य सर्वसैन्यानि समहृष्यन्त सर्वशः ॥

pāñcajanyasya nirghoṣaṃ visphūrjitamivāśaneḥ | niśamya sarvasainyāni samahṛṣyanta sarvaśaḥ

वज्र की कड़क के समान पाञ्चजन्य का निर्घोष सुनकर सारी सेनाएँ सब ओर रोमांचित हो उठीं।

श्लोक 73 (5.151.73)

शङ्खदुन्दुभिसंहृष्टः सिंहनादस्तरस्विनाम् । पृथिवीं चान्तरिक्षं च सागरांश्चान्वनादयत् ॥

śaṅkhadundubhisaṃhṛṣṭaḥ siṃhanādastarasvinām | pṛthivīṃ cāntarikṣaṃ ca sāgarāṃścānvanādayat

शंखों और दुन्दुभियों से उत्तेजित उन वेगशाली वीरों के सिंहनाद ने पृथ्वी, आकाश और समुद्रों को गुँजा दिया।

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