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उद्योग पर्व · अध्याय 152

कुरुक्षेत्र में पाण्डवों का शिविर

युधिष्ठिर श्मशानों, देवालयों और आश्रमों को छोड़कर कुरुक्षेत्र की शुद्ध, समतल भूमि पर सेना का पड़ाव डालते हैं। श्रीकृष्ण और अर्जुन कौरवों की चौकियों को खदेड़ते हैं, धृष्टद्युम्न और सात्यकि शिविर की नाप-जोख करते हैं, और श्रीकृष्ण हिरण्वती नदी के पास खाई खुदवाकर सब मित्र राजाओं के लिए वैसे ही शिविर बनवाते हैं। शिविरों में शिल्पी, वैद्य, शस्त्र और रसद भरपूर रखी जाती है, और मित्र राजा पाण्डवों की विजय के लिए आ जुटते हैं।

अध्याय 151अध्याय-सूचीअध्याय 153

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.152.1)

ततो देशे समे स्निग्धे प्रभूतयवसेन्धने । निवेशयामास तदा सेनां राजा युधिष्ठिरः ॥

tato deśe same snigdhe prabhūtayavasendhane | niveśayāmāsa tadā senāṃ rājā yudhiṣṭhiraḥ

तब राजा युधिष्ठिर ने समतल, उपजाऊ और प्रचुर घास तथा ईंधन वाले स्थान पर अपनी सेना का पड़ाव डाला।

श्लोक 2 (5.152.2)

परिहृत्य श्मशानानि देवतायतनानि च । आश्रमांश्च महर्षीणां तीर्थान्यायतनानि च ॥

parihṛtya śmaśānāni devatāyatanāni ca | āśramāṃśca maharṣīṇāṃ tīrthānyāyatanāni ca

श्मशानों, देवमन्दिरों, महर्षियों के आश्रमों, तीर्थों और पवित्र स्थानों को छोड़कर,

श्लोक 3 (5.152.3)

मधुरानूषरे देशे शुचौ पुण्ये महामतिः । निवेशं कारयामास कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

madhurānūṣare deśe śucau puṇye mahāmatiḥ | niveśaṃ kārayāmāsa kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ

महाबुद्धिमान कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने मीठी, ऊसर-रहित, शुद्ध और पवित्र भूमि पर छावनी बनवाई।

श्लोक 4 (5.152.4)

ततश्च पुनरुत्थाय सुखी विश्रान्तवाहनः । प्रययौ पृथिवीपालैर्वृतः शतसहस्रशः ॥

tataśca punarutthāya sukhī viśrāntavāhanaḥ | prayayau pṛthivīpālairvṛtaḥ śatasahasraśaḥ

फिर विश्राम करके और वाहनों को भी विश्राम देकर वे पुनः उठे और लाखों राजाओं से घिरे हुए आगे बढ़े।

श्लोक 5 (5.152.5)

विद्राव्य शतशो गुल्मान्धार्तराष्ट्रस्य सैनिकान् । पर्यक्रामत्समन्ताच्च पार्थेन सह केशवः ॥

vidrāvya śataśo gulmāndhārtarāṣṭrasya sainikān | paryakrāmatsamantācca pārthena saha keśavaḥ

धृतराष्ट्र-पुत्र के सैनिकों की सैकड़ों टुकड़ियों को खदेड़ते हुए केशव ने अर्जुन के साथ चारों ओर चक्कर लगाया।

श्लोक 6 (5.152.6)

शिबिरं मापयामास धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । सात्यकिश्च रथोदारो युयुधानश्च वीर्यवान् ॥

śibiraṃ māpayāmāsa dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | sātyakiśca rathodāro yuyudhānaśca vīryavān

पृषतपुत्र धृष्टद्युम्न ने और रथियों में उदार, पराक्रमी सात्यकि युयुधान ने शिविर की नाप-जोख करवाई।

श्लोक 7 (5.152.7)

आसाद्य सरितं पुण्यां कुरुक्षेत्रे हिरण्वतीम् । सूपतीर्थां शुचिजलां शर्करापङ्कवर्जिताम् ॥

āsādya saritaṃ puṇyāṃ kurukṣetre hiraṇvatīm | sūpatīrthāṃ śucijalāṃ śarkarāpaṅkavarjitām

कुरुक्षेत्र में सुन्दर घाटों वाली, निर्मल जल वाली, कंकड़ और कीचड़ से रहित पवित्र नदी हिरण्वती के पास पहुँचकर,

श्लोक 8 (5.152.8)

खानयामास परिखां केशवस्तत्र भारत । गुप्त्यर्थमपि चादिश्य बलं तत्र न्यवेशयत् ॥

khānayāmāsa parikhāṃ keśavastatra bhārata | guptyarthamapi cādiśya balaṃ tatra nyaveśayat

हे भारत, केशव ने वहाँ खाई खुदवाई और रक्षा के लिए आदेश देकर वहाँ सेना तैनात कर दी।

श्लोक 9 (5.152.9)

विधिर्यः शिबिरस्यासीत्पाण्डवानां महात्मनाम् । तद्विधानि नरेन्द्राणां कारयामास केशवः ॥

vidhiryaḥ śibirasyāsītpāṇḍavānāṃ mahātmanām | tadvidhāni narendrāṇāṃ kārayāmāsa keśavaḥ

महात्मा पाण्डवों के शिविर की जो विधि थी, उसी प्रकार के शिविर केशव ने राजाओं के लिए भी बनवाए।

श्लोक 10 (5.152.10)

प्रभूततरकाष्ठानि दुराधर्षतराणि च । भक्ष्यभोज्यान्नपानानि शतशोऽथ सहस्रशः ॥

prabhūtatarakāṣṭhāni durādharṣatarāṇi ca | bhakṣyabhojyānnapānāni śataśo'tha sahasraśaḥ

उनमें बहुत अधिक लकड़ी थी और वे अत्यन्त दुर्धर्ष थे; उनमें सैकड़ों-हज़ारों की मात्रा में खाने-पीने की वस्तुएँ, अन्न और पेय थे।

श्लोक 11 (5.152.11)

शिबिराणि महार्हाणि राज्ञां तत्र पृथक्पृथक् । विमानानीव राजेन्द्र निविष्टानि महीतले ॥

śibirāṇi mahārhāṇi rājñāṃ tatra pṛthakpṛthak | vimānānīva rājendra niviṣṭāni mahītale

हे राजेन्द्र, वहाँ राजाओं के अलग-अलग बहुमूल्य शिविर पृथ्वी पर उतरे हुए विमानों के समान स्थापित थे।

श्लोक 12 (5.152.12)

तत्रासञ्शिल्पिनः प्राज्ञाः शतशो दत्तवेतनाः । सर्वोपकरणैर्युक्ता वैद्याः शास्त्रविशारदाः ॥

tatrāsañśilpinaḥ prājñāḥ śataśo dattavetanāḥ | sarvopakaraṇairyuktā vaidyāḥ śāstraviśāradāḥ

वहाँ वेतन पाए हुए सैकड़ों कुशल शिल्पी थे, और सब उपकरणों से युक्त, शास्त्र में निपुण वैद्य थे।

श्लोक 13 (5.152.13)

ज्याधनुर्वर्मशस्त्राणां तथैव मधुसर्पिषोः । ससर्जरसपांसूनां राशयः पर्वतोपमाः ॥

jyādhanurvarmaśastrāṇāṃ tathaiva madhusarpiṣoḥ | sasarjarasapāṃsūnāṃ rāśayaḥ parvatopamāḥ

धनुष की डोरियों, धनुषों, कवचों और शस्त्रों के, मधु और घी के, तथा राल और बालू के पर्वत जैसे ढेर लगे थे।

श्लोक 14 (5.152.14)

बहूदकं सुयवसं तुषाङ्गारसमन्वितम् । शिबिरे शिबिरे राजा सञ्चकार युधिष्ठिरः ॥

bahūdakaṃ suyavasaṃ tuṣāṅgārasamanvitam | śibire śibire rājā sañcakāra yudhiṣṭhiraḥ

राजा युधिष्ठिर ने प्रत्येक शिविर में प्रचुर जल, अच्छी घास, भूसी और कोयले का प्रबन्ध किया।

श्लोक 15 (5.152.15)

महायन्त्राणि नाराचास्तोमराणि परश्वधाः । धनूंषि कवचादीनि ऋष्टयस्तूणसंयुताः ॥

mahāyantrāṇi nārācāstomarāṇi paraśvadhāḥ | dhanūṃṣi kavacādīni ṛṣṭayastūṇasaṃyutāḥ

वहाँ बड़े-बड़े यन्त्र, नाराच बाण, तोमर और फरसे, धनुष, कवच आदि, और तरकशों सहित ऋष्टियाँ थीं।

श्लोक 16 (5.152.16)

गजाः कण्टकसन्नाहा लोहवर्मोत्तरच्छदाः । दृश्यन्ते तत्र गिर्याभाः सहस्रशतयोधिनः ॥

gajāḥ kaṇṭakasannāhā lohavarmottaracchadāḥ | dṛśyante tatra giryābhāḥ sahasraśatayodhinaḥ

वहाँ पर्वत के समान विशाल हाथी दिखाई देते थे, जो काँटेदार कवचों से सन्नद्ध थे, जिन पर लोहे के कवच और ऊपर से झूलें थीं, और जो लाखों योद्धाओं से लड़ने में समर्थ थे।

श्लोक 17 (5.152.17)

निविष्टान्पाण्डवांस्तत्र ज्ञात्वा मित्राणि भारत । अभिसस्रुर्यथादेशं सबलाः सहवाहनाः ॥

niviṣṭānpāṇḍavāṃstatra jñātvā mitrāṇi bhārata | abhisasruryathādeśaṃ sabalāḥ sahavāhanāḥ

हे भारत, पाण्डवों को वहाँ पड़ाव डाले जानकर उनके मित्र राजा अपनी सेनाओं और वाहनों सहित अपने-अपने निर्दिष्ट स्थानों पर आ पहुँचे।

श्लोक 18 (5.152.18)

चरितब्रह्मचर्यास्ते सोमपा भूरिदक्षिणाः । जयाय पाण्डुपुत्राणां समाजग्मुर्महीक्षितः ॥

caritabrahmacaryāste somapā bhūridakṣiṇāḥ | jayāya pāṇḍuputrāṇāṃ samājagmurmahīkṣitaḥ

ब्रह्मचर्य का पालन कर चुके, सोमपान करने वाले और यज्ञों में प्रचुर दक्षिणा देने वाले राजा पाण्डुपुत्रों की विजय के लिए वहाँ एकत्र हुए।

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