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उद्योग पर्व · अध्याय 153

दुर्योधन की युद्ध-तैयारी

जनमेजय पूछते हैं कि युधिष्ठिर के कुरुक्षेत्र में पड़ाव डालने का समाचार सुनकर दुर्योधन ने क्या किया। वैशम्पायन बताते हैं कि श्रीकृष्ण के लौट जाने पर दुर्योधन कर्ण, दुःशासन और शकुनि से कहता है कि अब युद्ध निश्चित है, और कुरुक्षेत्र में सुरक्षित, साधन-सम्पन्न शिविर बनाने तथा अगले दिन कूच करने का आदेश देता है। राजा उत्साह से उठकर शस्त्र धारण करते हैं और रथ, घोड़े तथा हाथी सजाते हैं, और योद्धाओं से भरा हस्तिनापुर चन्द्रोदय पर उमड़ते सागर-सा दिखाई देता है।

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जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (5.153.1)

युधिष्ठिरं सहानीकमुपायान्तं युयुत्सया । सन्निविष्टं कुरुक्षेत्रे वासुदेवेन पालितम् ॥

yudhiṣṭhiraṃ sahānīkamupāyāntaṃ yuyutsayā | sanniviṣṭaṃ kurukṣetre vāsudevena pālitam

"युद्ध की इच्छा से सेना सहित बढ़ते हुए, कुरुक्षेत्र में पड़ाव डाले और वासुदेव द्वारा रक्षित युधिष्ठिर —

श्लोक 2 (5.153.2)

विराटद्रुपदाभ्यां च सपुत्राभ्यां समन्वितम् । केकयैर्वृष्णिभिश्चैव पार्थिवैः शतशो वृतम् ॥

virāṭadrupadābhyāṃ ca saputrābhyāṃ samanvitam | kekayairvṛṣṇibhiścaiva pārthivaiḥ śataśo vṛtam

जो पुत्रों सहित विराट और द्रुपद के साथ थे, केकयों, वृष्णियों और सैकड़ों राजाओं से घिरे थे,

श्लोक 3 (5.153.3)

महेन्द्रमिव चादित्यैरभिगुप्तं महारथैः । श्रुत्वा दुर्योधनो राजा किं कार्यं प्रत्यपद्यत ॥

mahendramiva cādityairabhiguptaṃ mahārathaiḥ | śrutvā duryodhano rājā kiṃ kāryaṃ pratyapadyata

और जैसे आदित्य महेन्द्र की रक्षा करते हैं, वैसे ही महारथियों से रक्षित थे — यह सुनकर राजा दुर्योधन ने क्या करना निश्चित किया?

श्लोक 4 (5.153.4)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महामते । संभ्रमे तुमुले तस्मिन्यदासीत्कुरुजाङ्गले ॥

etadicchāmyahaṃ śrotuṃ vistareṇa mahāmate | saṃbhrame tumule tasminyadāsītkurujāṅgale

हे महामते, उस भयंकर हलचल में कुरुजांगल में जो कुछ हुआ, वह मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 5 (5.153.5)

व्यथयेयुरिमे देवान्सेन्द्रानपि समागमे । पाण्डवा वासुदेवश्च विराटद्रुपदौ तथा ॥

vyathayeyurime devānsendrānapi samāgame | pāṇḍavā vāsudevaśca virāṭadrupadau tathā

ये तो युद्ध में इन्द्र सहित देवताओं को भी व्यथित कर सकते थे — पाण्डव, वासुदेव, विराट और द्रुपद,

श्लोक 6 (5.153.6)

धृष्टद्युम्नश्च पाञ्चाल्यः शिखण्डी च महारथः । युधामन्युश्च विक्रान्तो देवैरपि दुरासदः ॥

dhṛṣṭadyumnaśca pāñcālyaḥ śikhaṇḍī ca mahārathaḥ | yudhāmanyuśca vikrānto devairapi durāsadaḥ

पाञ्चाल धृष्टद्युम्न, महारथी शिखण्डी और पराक्रमी युधामन्यु, जिनका सामना देवता भी कठिनाई से कर सकते हैं।

श्लोक 7 (5.153.7)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन । कुरूणां पाण्डवानां च यद्यदासीद्विचेष्टितम् ॥

etadicchāmyahaṃ śrotuṃ vistareṇa tapodhana | kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca yadyadāsīdviceṣṭitam

हे तपोधन, कुरुओं और पाण्डवों ने जो-जो किया, वह सब मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (5.153.8)

प्रतियाते तु दाशार्हे राजा दुर्योधनस्तदा । कर्णं दुःशासनं चैव शकुनिं चाब्रवीदिदम् ॥

pratiyāte tu dāśārhe rājā duryodhanastadā | karṇaṃ duḥśāsanaṃ caiva śakuniṃ cābravīdidam

दाशार्ह श्रीकृष्ण के लौट जाने पर राजा दुर्योधन ने कर्ण, दुःशासन और शकुनि से यह कहा —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 9 (5.153.9)

अकृतेनैव कार्येण गतः पार्थानधोक्षजः । स एनान्मन्युनाविष्टो ध्रुवं धक्ष्यत्यसंशयम् ॥

akṛtenaiva kāryeṇa gataḥ pārthānadhokṣajaḥ | sa enānmanyunāviṣṭo dhruvaṃ dhakṣyatyasaṃśayam

"अधोक्षज अपना काम पूरा किए बिना ही पार्थों के पास लौट गए हैं। क्रोध से भरे हुए वे निश्चय ही उन्हें (युद्ध के लिए) भड़का देंगे, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 10 (5.153.10)

इष्टो हि वासुदेवस्य पाण्डवैर्मम विग्रहः । भीमसेनार्जुनौ चैव दाशार्हस्य मते स्थितौ ॥

iṣṭo hi vāsudevasya pāṇḍavairmama vigrahaḥ | bhīmasenārjunau caiva dāśārhasya mate sthitau

वासुदेव तो पाण्डवों के साथ मेरा युद्ध ही चाहते हैं, और भीमसेन तथा अर्जुन भी दाशार्ह के ही मत पर स्थित हैं।

श्लोक 11 (5.153.11)

अजातशत्रुरत्यर्थं भीमसेनवशानुगः । निकृतश्च मया पूर्वं सह सर्वैः सहोदरैः ॥

ajātaśatruratyarthaṃ bhīmasenavaśānugaḥ | nikṛtaśca mayā pūrvaṃ saha sarvaiḥ sahodaraiḥ

अजातशत्रु पूरी तरह भीमसेन के वश में चलते हैं, और मैंने पहले उनके सब सगे भाइयों सहित उनके साथ छल किया है।

श्लोक 12 (5.153.12)

विराटद्रुपदौ चैव कृतवैरौ मया सह । तौ च सेनाप्रणेतारौ वासुदेववशानुगौ ॥

virāṭadrupadau caiva kṛtavairau mayā saha | tau ca senāpraṇetārau vāsudevavaśānugau

विराट और द्रुपद ने भी मुझसे वैर बाँध रखा है, और वे दोनों सेनानायक वासुदेव के वश में हैं।

श्लोक 13 (5.153.13)

भविता विग्रहः सोयं तुमुलो लोमहर्षणः । तस्मात्साङ्ग्रामिकं सर्वं कारयध्वमतन्द्रिताः ॥

bhavitā vigrahaḥ soyaṃ tumulo lomaharṣaṇaḥ | tasmātsāṅgrāmikaṃ sarvaṃ kārayadhvamatandritāḥ

यह भयंकर, रोंगटे खड़े कर देने वाला युद्ध होकर रहेगा। इसलिए तुम लोग आलस्य छोड़कर युद्ध की सारी सामग्री तैयार कराओ।

श्लोक 14 (5.153.14)

शिबिराणि कुरुक्षेत्रे क्रियन्तां वसुधाधिपाः । स्वपर्याप्तावकाशानि दुरादेयानि शत्रुभिः ॥

śibirāṇi kurukṣetre kriyantāṃ vasudhādhipāḥ | svaparyāptāvakāśāni durādeyāni śatrubhiḥ

हे पृथ्वीपतियो, कुरुक्षेत्र में शिविर बनवाए जाएँ — जिनमें अपने लिए पर्याप्त स्थान हो और जिन्हें शत्रु छीन न सकें,

श्लोक 15 (5.153.15)

आसन्नजलकोष्ठानि शतशोथ सहस्रशः । अच्छेद्याहारमार्गाणि बन्धोच्छ्रयचितानि च ॥

āsannajalakoṣṭhāni śataśotha sahasraśaḥ | acchedyāhāramārgāṇi bandhocchrayacitāni ca

सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में, जिनके पास ही जल और भण्डार-कक्ष हों, जिनके रसद के मार्ग काटे न जा सकें, और जो बाँधों तथा ऊँची रचनाओं से सुदृढ़ हों,

श्लोक 16 (5.153.16)

विविधायुधपूर्णानि पताकाध्वजवन्ति च । समाश्च तेषां पन्थानः क्रियन्तां नगराद्बहिः ॥

vividhāyudhapūrṇāni patākādhvajavanti ca | samāśca teṣāṃ panthānaḥ kriyantāṃ nagarādbahiḥ

जो नाना प्रकार के आयुधों से भरे हों और पताकाओं तथा ध्वजाओं से युक्त हों। नगर के बाहर उन तक जाने वाले मार्ग समतल किए जाएँ।

श्लोक 17 (5.153.17)

प्रयाणं घुष्यतामद्य श्वोभूत इति माचिरम् ॥

prayāṇaṃ ghuṣyatāmadya śvobhūta iti māciram

आज ही प्रस्थान की घोषणा कर दी जाए कि 'कल कूच है' — विलम्ब न हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (5.153.18)

ते तथेति प्रतिज्ञाय श्वोभूते चक्रिरे तथा ॥

te tatheti pratijñāya śvobhūte cakrire tathā

उन्होंने "ऐसा ही होगा" कहकर वचन दिया और अगले दिन वैसा ही किया।

श्लोक 19 (5.153.19)

हृष्टरूपा महात्मानो निवासाय महीक्षिताम् । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे तच्छ्रुत्वा राजशासनम् ॥

hṛṣṭarūpā mahātmāno nivāsāya mahīkṣitām | tataste pārthivāḥ sarve tacchrutvā rājaśāsanam

प्रसन्न रूप वाले उन महात्माओं ने राजाओं के निवास का प्रबन्ध किया। तब वे सब राजा राजाज्ञा सुनकर,

श्लोक 20 (5.153.20)

आसनेभ्यो महार्हेभ्य उदतिष्ठन्नमर्षिताः । बाहून्परिघसङ्काशान्संस्पृशन्तः शनैः शनैः ॥

āsanebhyo mahārhebhya udatiṣṭhannamarṣitāḥ | bāhūnparighasaṅkāśānsaṃspṛśantaḥ śanaiḥ śanaiḥ

युद्ध के लिए अधीर होकर अपने बहुमूल्य आसनों से उठ खड़े हुए और परिघ के समान अपनी भुजाओं को धीरे-धीरे सहलाने लगे,

श्लोक 21 (5.153.21)

काञ्चनाङ्गददीप्तांश्च चन्दनागरुभूषितान् । उष्णीषाणि नियच्छन्तः पुण्डरीकनिभैः करैः । अन्तरीयोत्तरीयाणि भूषणानि च सर्वशः ॥

kāñcanāṅgadadīptāṃśca candanāgarubhūṣitān | uṣṇīṣāṇi niyacchantaḥ puṇḍarīkanibhaiḥ karaiḥ | antarīyottarīyāṇi bhūṣaṇāni ca sarvaśaḥ

जो सोने के बाजूबंदों से दमक रही थीं और चन्दन तथा अगरु से सुशोभित थीं। कमल के समान हाथों से वे पगड़ियाँ, अधोवस्त्र, उत्तरीय और सब आभूषण कसने लगे।

श्लोक 22 (5.153.22)

ते रथान्रथिनः श्रेष्ठा हयांश्च हयकोविदाः । सज्जयन्ति स्म नागांश्च नागशिक्षास्वनुष्ठिताः ॥

te rathānrathinaḥ śreṣṭhā hayāṃśca hayakovidāḥ | sajjayanti sma nāgāṃśca nāgaśikṣāsvanuṣṭhitāḥ

श्रेष्ठ रथियों ने रथ, अश्वविद्या के ज्ञाताओं ने घोड़े और गज-शिक्षा में अभ्यस्त लोगों ने हाथी सजाए।

श्लोक 23 (5.153.23)

अथ वर्माणि चित्राणि काञ्चनानि बहूनि च । विविधानि च शस्त्राणि चक्रुः सर्वाणि सर्वशः ॥

atha varmāṇi citrāṇi kāñcanāni bahūni ca | vividhāni ca śastrāṇi cakruḥ sarvāṇi sarvaśaḥ

फिर उन्होंने बहुत-से चित्र-विचित्र सुनहरे कवच और नाना प्रकार के शस्त्र — सब के सब — हर ओर तैयार किए।

श्लोक 24 (5.153.24)

पदातयश्च पुरुषाः शस्त्राणि विविधानि च । उपाजह्रुः शरीरेषु हेमचित्राण्यनेकशः ॥

padātayaśca puruṣāḥ śastrāṇi vividhāni ca | upājahruḥ śarīreṣu hemacitrāṇyanekaśaḥ

पैदल योद्धाओं ने भी सोने से चित्रित अनेक प्रकार के शस्त्र अपने शरीरों पर धारण किए।

श्लोक 25 (5.153.25)

तदुत्सव इवोदग्रं संप्रहृष्टनरावृतम् । नगरं धार्तराष्ट्रस्य भारतासीत्समाकुलम् ॥

tadutsava ivodagraṃ saṃprahṛṣṭanarāvṛtam | nagaraṃ dhārtarāṣṭrasya bhāratāsītsamākulam

हे भारत, धृतराष्ट्र-पुत्र का नगर किसी उत्सव की भाँति उल्लास से भरा था; वह हर्षित लोगों से घिरा और हलचल से व्याप्त था।

श्लोक 26 (5.153.26)

जनौघसलिलावर्तो रथनागाश्वमीनवान् । शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषः कोशसञ्चयरत्नवान् ॥

janaughasalilāvarto rathanāgāśvamīnavān | śaṅkhadundubhinirghoṣaḥ kośasañcayaratnavān

जनसमूह जिसके जल के भँवर थे, रथ, हाथी और घोड़े जिसकी मछलियाँ थीं, शंखों और दुन्दुभियों का घोष जिसका गर्जन था, कोष में संचित धन जिसके रत्न थे,

श्लोक 27 (5.153.27)

चित्राभरणवर्मोर्मिः शस्त्रनिर्मलफेनवान् । प्रासादमालाद्रिवृतो रथ्यापणमहाह्रदः ॥

citrābharaṇavarmormiḥ śastranirmalaphenavān | prāsādamālādrivṛto rathyāpaṇamahāhradaḥ

चमकीले आभूषण और कवच जिसकी लहरें थीं, निर्मल शस्त्र जिसका फेन था, महलों की पंक्तियाँ जिसे घेरे हुए पर्वत थीं, और गलियाँ तथा बाज़ार जिसके गहरे कुण्ड थे —

श्लोक 28 (5.153.28)

योधचन्द्रोदयोद्भूतः कुरुराजमहार्णवः । व्यदृश्यत तदा राजंश्चन्द्रोदय इवोदधिः ॥

yodhacandrodayodbhūtaḥ kururājamahārṇavaḥ | vyadṛśyata tadā rājaṃścandrodaya ivodadhiḥ

योद्धारूपी चन्द्रमा के उदय से उमड़ता हुआ कुरुराज का वह महासागर, हे राजन्, उस समय चन्द्रोदय पर उमड़ते समुद्र के समान दिखाई दिया।

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