उद्योग पर्व · अध्याय 154
श्रीकृष्ण की युद्ध-सम्मति और युधिष्ठिर का संशय
युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से, जो दोनों पक्षों के मन को जानते हैं और कुन्ती, विदुर तथा भीष्म की बातें सुन चुके हैं, पूछते हैं कि अब पाण्डवों के लिए उचित मार्ग क्या है। श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि कर्ण के भरोसे रहने वाला दुर्योधन किसी की नहीं सुनता, उसने उन्हें बँधवाने तक का आदेश दिया और सारा पाप उसी में बसा है, इसलिए अब युद्ध ही शेष है। राजा मौन रहकर सहमति देते हैं और युधिष्ठिर युद्ध की तैयारी का आदेश देते हैं, किन्तु फिर भीम और अर्जुन के सामने अवध्य गुरुजनों के वध पर शोक प्रकट करते हैं। अर्जुन उन्हें स्मरण कराते हैं कि कुन्ती और विदुर कभी अधर्म की सलाह नहीं देंगे और बिना लड़े लौट जाना उचित नहीं; श्रीकृष्ण मुस्कराकर सहमति देते हैं और पाण्डव युद्ध का निश्चय करके वह रात सुख से बिताते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.154.1)
वासुदेवस्य तद्वाक्यमनुस्मृत्य युधिष्ठिरः । पुनः पप्रच्छ वार्ष्णेयं कथं मन्दोऽब्रवीदिदम् ॥
vāsudevasya tadvākyamanusmṛtya yudhiṣṭhiraḥ | punaḥ papraccha vārṣṇeyaṃ kathaṃ mando'bravīdidam
वासुदेव की उस बात को स्मरण करके युधिष्ठिर ने वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण से फिर पूछा— "उस मूढ़ ने ऐसी बात कैसे कही?
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (5.154.2)
अस्मिन्नभ्यागते काले किंच नः क्षममच्युत । कथं च वर्तमाना वै स्वधर्मान्न च्यवेमहि ॥
asminnabhyāgate kāle kiṃca naḥ kṣamamacyuta | kathaṃ ca vartamānā vai svadharmānna cyavemahi
"हे अच्युत, यह समय आ पहुँचा है; अब हमारे लिए क्या उचित है? और हम किस प्रकार आचरण करें कि अपने धर्म से न डिगें?
श्लोक 3 (5.154.3)
दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेः सौबलस्य च । वासुदेव मतज्ञोऽसि मम सभ्रातृकस्य च ॥
duryodhanasya karṇasya śakuneḥ saubalasya ca | vāsudeva matajño'si mama sabhrātṛkasya ca
"हे वासुदेव, आप दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि का मत जानते हैं, और भाइयों सहित मेरा भी।
श्लोक 4 (5.154.4)
विदुरस्यापि तद्वाक्यं श्रुतं भीष्मस्य चोभयोः । कुन्त्याश्च विपुलप्रज्ञ प्रज्ञा कार्त्स्न्येन ते श्रुता ॥
vidurasyāpi tadvākyaṃ śrutaṃ bhīṣmasya cobhayoḥ | kuntyāśca vipulaprajña prajñā kārtsnyena te śrutā
"आपने विदुर की बात भी सुनी है और भीष्म की भी, दोनों की; और हे विशाल बुद्धि वाले, कुन्ती की सम्पूर्ण सलाह भी आप सुन चुके हैं।
श्लोक 5 (5.154.5)
सर्वमेतदतिक्रम्य विचार्य च पुनः पुनः । क्षमं यन्नो महाबाहो तद्ब्रवीह्यविचारयन् ॥
sarvametadatikramya vicārya ca punaḥ punaḥ | kṣamaṃ yanno mahābāho tadbravīhyavicārayan
"हे महाबाहु, इन सब बातों से ऊपर उठकर और बार-बार विचार करके, बिना संकोच बताइए कि हमारे लिए क्या उचित है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (5.154.6)
श्रुत्वैतद्धर्मराजस्य धर्मार्थसहितं वचः । मेघदुन्दुभिनिर्घोषः कृष्णो वाक्यमथाब्रवीत् ॥
śrutvaitaddharmarājasya dharmārthasahitaṃ vacaḥ | meghadundubhinirghoṣaḥ kṛṣṇo vākyamathābravīt
धर्मराज के धर्म और अर्थ से युक्त ये वचन सुनकर मेघ और दुन्दुभि के समान गम्भीर स्वर वाले श्रीकृष्ण बोले—
वासुदेव उवाच
श्लोक 7 (5.154.7)
उक्तवानस्मि यद्वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् । न तु तन्निकृतिप्रज्ञे कौरव्ये प्रतितिष्ठति ॥
uktavānasmi yadvākyaṃ dharmārthasahitaṃ hitam | na tu tannikṛtiprajñe kauravye pratitiṣṭhati
"मैंने जो वचन कहे, वे धर्म और अर्थ से युक्त तथा हितकारी थे; परन्तु छल-कपट में बुद्धि रखने वाले उस कौरव में वे टिकते ही नहीं।
श्लोक 8 (5.154.8)
न च भीष्मस्य दुर्मेधाः शृणोति विदुरस्य वा । मम वा भाषितं किंचित्सर्वमेवातिवर्तते ॥
na ca bhīṣmasya durmedhāḥ śṛṇoti vidurasya vā | mama vā bhāṣitaṃ kiṃcitsarvamevātivartate
"वह दुर्बुद्धि न भीष्म की सुनता है, न विदुर की, न मेरी किसी बात की; वह सब कुछ लाँघ जाता है।
श्लोक 9 (5.154.9)
नैष कामयते धर्मं नैष कामयते यशः । जितं स मन्यते सर्वं दुरात्मा कर्णमाश्रितः ॥
naiṣa kāmayate dharmaṃ naiṣa kāmayate yaśaḥ | jitaṃ sa manyate sarvaṃ durātmā karṇamāśritaḥ
"उसे न धर्म की चाह है, न यश की। कर्ण का सहारा लेकर वह दुष्टात्मा समझता है कि उसने सब कुछ जीत लिया है।
श्लोक 10 (5.154.10)
बन्धमाज्ञापयामास मम चापि सुयोधनः । न च तं लब्धवान्कामं दुरात्मा पापनिश्चयः ॥
bandhamājñāpayāmāsa mama cāpi suyodhanaḥ | na ca taṃ labdhavānkāmaṃ durātmā pāpaniścayaḥ
"सुयोधन ने तो मुझे बाँधने का भी आदेश दे दिया था; परन्तु पाप का निश्चय रखने वाला वह दुष्ट अपनी इच्छा पूरी न कर सका।
श्लोक 11 (5.154.11)
न च भीष्मो न च द्रोणो युक्तं तत्राहतुर्वचः । सर्वे तमनुवर्तन्ते ऋते विदुरमच्युत ॥
na ca bhīṣmo na ca droṇo yuktaṃ tatrāhaturvacaḥ | sarve tamanuvartante ṛte viduramacyuta
"वहाँ न भीष्म ने उचित बात कही, न द्रोण ने; हे अच्युत, विदुर को छोड़कर सब उसी का अनुसरण करते हैं।
श्लोक 12 (5.154.12)
शकुनिः सौबलश्चैव कर्णदुःशासनावपि । त्वय्ययुक्तान्यभाषन्त मूढा मूढममर्षणम् ॥
śakuniḥ saubalaścaiva karṇaduḥśāsanāvapi | tvayyayuktānyabhāṣanta mūḍhā mūḍhamamarṣaṇam
"सुबलपुत्र शकुनि, कर्ण और दुःशासन ने भी— वे सब मूढ़— उस असहिष्णु मूढ़ से तुम्हारे विषय में अनुचित बातें कहीं।
श्लोक 13 (5.154.13)
किंच तेन मयोक्तेन यान्यभाषत कौरवः । संक्षेपेण दुरात्मासौ न युक्तं त्वयि वर्तते ॥
kiṃca tena mayoktena yānyabhāṣata kauravaḥ | saṃkṣepeṇa durātmāsau na yuktaṃ tvayi vartate
"कौरव ने जो कुछ कहा, उसे दोहराने से क्या लाभ? संक्षेप में, वह दुष्टात्मा तुम्हारे प्रति उचित व्यवहार नहीं करता।
श्लोक 14 (5.154.14)
पार्थिवेषु न सर्वेषु य इमे तव सैनिकाः । यत्पापं यन्न कल्याणं सर्वं तस्मिन्प्रतिष्ठितम् ॥
pārthiveṣu na sarveṣu ya ime tava sainikāḥ | yatpāpaṃ yanna kalyāṇaṃ sarvaṃ tasminpratiṣṭhitam
"जो पाप है और जो अमंगल है— जो तुम्हारे इन सैनिक राजाओं में से किसी में नहीं— वह सब उसी में बसा हुआ है।
श्लोक 15 (5.154.15)
न चापि वयमत्यर्थं परित्यागेन कर्हिचित् । कौरवैः शममिच्छामस्तत्र युद्धमनन्तरम् ॥
na cāpi vayamatyarthaṃ parityāgena karhicit | kauravaiḥ śamamicchāmastatra yuddhamanantaram
"और हम भी सब कुछ त्यागकर किसी भी मूल्य पर कौरवों से सन्धि नहीं चाहते। इसलिए अब आगे युद्ध ही है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (5.154.16)
तच्छ्रुत्वा पार्थिवाः सर्वे वासुदेवस्य भाषितम् । अब्रुवन्तो मुखं राज्ञः समुदैक्षन्त भारत ॥
tacchrutvā pārthivāḥ sarve vāsudevasya bhāṣitam | abruvanto mukhaṃ rājñaḥ samudaikṣanta bhārata
हे भारत, वासुदेव का यह कथन सुनकर सब राजा कुछ न बोले और राजा युधिष्ठिर के मुख की ओर देखने लगे।
श्लोक 17 (5.154.17)
युधिष्ठिरस्त्वभिप्रायमभिलक्ष्य महीक्षिताम् । योगमाज्ञापयामास भीमार्जुनयमैः सह ॥
yudhiṣṭhirastvabhiprāyamabhilakṣya mahīkṣitām | yogamājñāpayāmāsa bhīmārjunayamaiḥ saha
राजाओं का अभिप्राय समझकर युधिष्ठिर ने भीम, अर्जुन और नकुल-सहदेव के साथ युद्ध की तैयारी का आदेश दिया।
श्लोक 18 (5.154.18)
ततः किलकिलाभूतमनीकं पाण्डवस्य ह । आज्ञापिते तदा योगे समहृष्यन्त सैनिकाः ॥
tataḥ kilakilābhūtamanīkaṃ pāṇḍavasya ha | ājñāpite tadā yoge samahṛṣyanta sainikāḥ
तब पाण्डव की सेना में हर्ष का कोलाहल गूँज उठा; युद्ध की तैयारी का आदेश मिलते ही सैनिक प्रसन्न हो उठे।
श्लोक 19 (5.154.19)
अवध्यानां वधं पश्यन्धर्मराजो युधिष्ठिरः । निश्वसन्भीमसेनं च विजयं चेदमब्रवीत् ॥
avadhyānāṃ vadhaṃ paśyandharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | niśvasanbhīmasenaṃ ca vijayaṃ cedamabravīt
किन्तु अवध्य जनों का वध होता देखकर धर्मराज युधिष्ठिर ने लम्बी साँस ली और भीमसेन तथा अर्जुन से यह कहा—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 20 (5.154.20)
यदर्थं वनवासश्च प्राप्तं दुःखं च यन्मया । सोऽयमस्मानुपैत्येव परोऽनर्थः प्रयत्नतः ॥
yadarthaṃ vanavāsaśca prāptaṃ duḥkhaṃ ca yanmayā | so'yamasmānupaityeva paro'narthaḥ prayatnataḥ
"जिस अनर्थ को टालने के लिए हमने वनवास भोगा और मैंने इतना दुःख सहा, वही महान अनर्थ बलपूर्वक हम पर आ ही पड़ा है।
श्लोक 21 (5.154.21)
यस्मिन्यत्नः कृतोऽस्माभिः स नो हीनः प्रयत्नतः । अकृते तु प्रयत्नेऽस्मानुपावृत्तः कलिर्महान् ॥
yasminyatnaḥ kṛto'smābhiḥ sa no hīnaḥ prayatnataḥ | akṛte tu prayatne'smānupāvṛttaḥ kalirmahān
"जिसके लिए हमने प्रयत्न किया, वह प्रयत्न करने पर भी हमारे हाथ से निकल गया; और जिसके लिए कोई प्रयत्न नहीं किया, वह महान कलह हम पर आ पड़ा है।
श्लोक 22 (5.154.22)
कथं ह्यवध्यैः सङ्ग्रामः कार्यः सह भविष्यति । कथं हत्वा गुरून्वृद्धान्विजयो नो भविष्यति ॥
kathaṃ hyavadhyaiḥ saṅgrāmaḥ kāryaḥ saha bhaviṣyati | kathaṃ hatvā gurūnvṛddhānvijayo no bhaviṣyati
"जो अवध्य हैं, उनके साथ युद्ध कैसे किया जाए? अपने वृद्ध गुरुजनों को मारकर हमारी विजय कैसे होगी?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (5.154.23)
तच्छ्रुत्वा धर्मराजस्य सव्यसाची परन्तपः । यदुक्तं वासुदेवेन श्रावयामास तद्वचः ॥
tacchrutvā dharmarājasya savyasācī parantapaḥ | yaduktaṃ vāsudevena śrāvayāmāsa tadvacaḥ
धर्मराज की यह बात सुनकर शत्रुओं को तपाने वाले सव्यसाची अर्जुन ने उन्हें वासुदेव के कहे हुए वचन फिर सुनाए।
अर्जुन उवाच
श्लोक 24 (5.154.24)
उक्तवान्देवकीपुत्रः कुन्त्याश्च विदुरस्य च । वचनं तत्त्वया राजन्निखिलेनावधारितम् ॥
uktavāndevakīputraḥ kuntyāśca vidurasya ca | vacanaṃ tattvayā rājannikhilenāvadhāritam
"हे राजन्, देवकीनन्दन ने आपको कुन्ती और विदुर की बात बता दी है, और आपने उसे पूरी तरह समझ लिया है।
श्लोक 25 (5.154.25)
न च तौ वक्ष्यतोऽधर्ममिति मे नैष्ठिकी मतिः । नापि युक्तं च कौन्तेय निवर्तितुमयुध्यतः ॥
na ca tau vakṣyato'dharmamiti me naiṣṭhikī matiḥ | nāpi yuktaṃ ca kaunteya nivartitumayudhyataḥ
"मेरा दृढ़ विश्वास है कि वे दोनों कभी अधर्म की बात नहीं कहेंगे। और हे कुन्तीनन्दन, बिना युद्ध किए पीछे हट जाना भी उचित नहीं है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (5.154.26)
तच्छ्रुत्वा वासुदेवोऽपि सव्यसाचिवचस्तदा । स्मयमानोऽब्रवीद्वाक्यं पार्थमेवमिति ब्रुवन् ॥
tacchrutvā vāsudevo'pi savyasācivacastadā | smayamāno'bravīdvākyaṃ pārthamevamiti bruvan
सव्यसाची के ये वचन सुनकर वासुदेव भी मुस्कराए और अर्जुन से बोले— "ऐसा ही है।"
श्लोक 27 (5.154.27)
ततस्ते धृतसंकल्पा युद्धाय सह सैनिकाः । पाण्डवेया महाराज तां रात्रिं सुखमावसन् ॥
tataste dhṛtasaṃkalpā yuddhāya saha sainikāḥ | pāṇḍaveyā mahārāja tāṃ rātriṃ sukhamāvasan
हे महाराज, तब युद्ध का दृढ़ संकल्प कर चुके पाण्डवों ने अपने सैनिकों के साथ वह रात सुखपूर्वक बिताई।