उद्योग पर्व · अध्याय 155
दुर्योधन द्वारा ग्यारह अक्षौहिणी सेना का संगठन
प्रातःकाल दुर्योधन अपनी सेना को ग्यारह भागों में बाँटता है और पैदल, हाथी, रथ तथा घोड़ों को अग्रिम, मध्यम और पिछली पंक्तियों में व्यवस्थित करता है। इस अध्याय में सेनाओं के युद्ध-उपकरणों, सारथी और चक्ररक्षकों सहित चार घोड़ों वाले रथों, सात योद्धाओं को ढोने वाले हाथियों, घुड़सवारों और पैदल सैनिकों का वर्णन है; साथ ही पत्ति से अक्षौहिणी तक सैन्य-इकाइयों की गणना बताई गई है और कहा गया है कि पाण्डवों की सात अक्षौहिणी के सामने कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना है। फिर दुर्योधन ग्यारह राजाओं और वीरों को सेनापति के पद पर अभिषिक्त करता है और प्रतिदिन उनका सम्मान करता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.155.1)
व्युष्टायां वै रजन्यां हि राजा दुर्योधनस्ततः । व्यभजत्तान्यनीकानि दश चैकं च भारत ॥
vyuṣṭāyāṃ vai rajanyāṃ hi rājā duryodhanastataḥ | vyabhajattānyanīkāni daśa caikaṃ ca bhārata
हे भारत, रात बीतने पर राजा दुर्योधन ने अपनी सेनाओं को ग्यारह भागों में बाँट दिया।
श्लोक 2 (5.155.2)
नरहस्तिरथाश्वानां सारं मध्यं च फल्गु च । सर्वेष्वेतेष्वनीकेषु सन्दिदेश नराधिपः ॥
narahastirathāśvānāṃ sāraṃ madhyaṃ ca phalgu ca | sarveṣveteṣvanīkeṣu sandideśa narādhipaḥ
राजा ने पैदल सैनिकों, हाथियों, रथों और घोड़ों को उत्तम, मध्यम और साधारण— अर्थात् आगे, बीच और पीछे की पंक्तियों— में बाँटा और इन सब सेनाओं को आदेश दिए।
श्लोक 3 (5.155.3)
सानुकर्षाः सतूणीराः सवरूथाः सतोमराः । सोपासङ्गाः सशक्तीकाः सनिषङ्गाः सहर्ष्टयः ॥
sānukarṣāḥ satūṇīrāḥ savarūthāḥ satomarāḥ | sopāsaṅgāḥ saśaktīkāḥ saniṣaṅgāḥ saharṣṭayaḥ
वे रथ के नीचे लगने वाले अतिरिक्त काठ (अनुकर्ष), तूणीर, रथ-रक्षक आवरण और तोमरों से युक्त थे; हाथी-घोड़ों पर रखे जाने वाले तरकश, शक्तियाँ, पैदल सैनिकों के निषंग और ऋष्टियाँ भी उनके पास थीं;
श्लोक 4 (5.155.4)
सध्वजाः सपताकाश्च सशरासनतोमराः । रज्जुभिश्च विचित्राभिः सपाशाः सपरिच्छदाः ॥
sadhvajāḥ sapatākāśca saśarāsanatomarāḥ | rajjubhiśca vicitrābhiḥ sapāśāḥ saparicchadāḥ
ध्वजाएँ और पताकाएँ, धनुष और तोमर, भाँति-भाँति की रस्सियाँ, पाश और आवरण उनके साथ थे;
श्लोक 5 (5.155.5)
सकचग्रहविक्षेपाः सतैलगुडवालुकाः । साशीविषघटाः सर्वे ससर्जरसपांसवः ॥
sakacagrahavikṣepāḥ satailaguḍavālukāḥ | sāśīviṣaghaṭāḥ sarve sasarjarasapāṃsavaḥ
शत्रु के बाल पकड़कर उसे फेंकने के साधन, तेल, गुड़ और बालू; सबके पास विषैले साँपों से भरे घड़े, राल और धूल भी थी;
श्लोक 6 (5.155.6)
सघण्टफलकाः सर्वे सायोगुडजलोपलाः । सशालभिन्दिपालाश्च समधूच्छिष्टमुद्गराः ॥
saghaṇṭaphalakāḥ sarve sāyoguḍajalopalāḥ | saśālabhindipālāśca samadhūcchiṣṭamudgarāḥ
सबके पास घण्टियों से युक्त फलक, लोहे के शस्त्र, खौलता गुड़-जल और फेंके जाने वाले पत्थर थे; सनसनाते भिन्दिपाल, पिघलाकर डालने के लिए मोम और मुद्गर भी थे;
श्लोक 7 (5.155.7)
सकाण्डदण्डकाः सर्वे ससीरविषतोमराः । सशूर्पपिटकाः सर्वे सदात्राङ्कुशतोमराः ॥
sakāṇḍadaṇḍakāḥ sarve sasīraviṣatomarāḥ | saśūrpapiṭakāḥ sarve sadātrāṅkuśatomarāḥ
सबके पास बाण-युक्त दण्ड, हल और विष में बुझे तोमर थे; सबके पास सूप और पिटारे, हँसिए-फरसे और काँटेदार तोमर भी थे;
श्लोक 8 (5.155.8)
सकीलकवचाः सर्वे वाशीवृक्षादनान्विताः । व्याघ्रचर्मपरीवारा द्वीपिचर्मावृताश्च ते ॥
sakīlakavacāḥ sarve vāśīvṛkṣādanānvitāḥ | vyāghracarmaparīvārā dvīpicarmāvṛtāśca te
सबके पास कीलों से जड़े कवच, बसूले और लोहे के काँटेदार उपकरण थे; रथ बाघ की खालों से घिरे और चीते की खालों से ढके थे;
श्लोक 9 (5.155.9)
सहर्ष्टयः सशृङ्गाश्च सप्रासविविधायुधाः । सकुठाराः सकुद्दालाः सतैलक्षौमसर्पिषः ॥
saharṣṭayaḥ saśṛṅgāśca saprāsavividhāyudhāḥ | sakuṭhārāḥ sakuddālāḥ satailakṣaumasarpiṣaḥ
ऋष्टियाँ और सींग, प्रास और नाना प्रकार के आयुध, कुल्हाड़ियाँ और कुदालें, तेल में भीगे वस्त्र और घी भी उनके पास थे।
श्लोक 10 (5.155.10)
रुक्मजालप्रतिच्छन्ना नानामणिविभूषिताः । चित्रानीकाः सुवपुषो ज्वलिता इव पावकाः ॥
rukmajālapraticchannā nānāmaṇivibhūṣitāḥ | citrānīkāḥ suvapuṣo jvalitā iva pāvakāḥ
सोने की जालियों से ढकी और अनेक मणियों से सजी वे रंग-बिरंगी, सुन्दर सेनाएँ प्रज्वलित अग्नियों के समान चमक रही थीं।
श्लोक 11 (5.155.11)
तथा कवचिनः शूराः शस्त्रेषु कृतनिश्चयाः । कुलीना हययोनिज्ञाः सारथ्ये विनिवेशिताः ॥
tathā kavacinaḥ śūrāḥ śastreṣu kṛtaniścayāḥ | kulīnā hayayonijñāḥ sārathye viniveśitāḥ
इसी प्रकार कवचधारी, शस्त्र-विद्या में दृढ़ निश्चय वाले, कुलीन और घोड़ों की जाति के जानकार शूरवीर सारथि के कार्य पर नियुक्त किए गए।
श्लोक 12 (5.155.12)
बद्धारिष्टा बद्धकक्षा बद्धध्वजपताकिनः । बद्धाभरणनिर्यूहा बद्धचर्मासिपट्टिशाः ॥
baddhāriṣṭā baddhakakṣā baddhadhvajapatākinaḥ | baddhābharaṇaniryūhā baddhacarmāsipaṭṭiśāḥ
रथों पर अनिष्ट-निवारक रक्षा-सूत्र बँधे थे, उनकी पेटियाँ कसी थीं, ध्वजाएँ और पताकाएँ बँधी थीं; आभूषण और शिखर लगे थे तथा ढालें, तलवारें और पट्टिश बँधे हुए थे।
श्लोक 13 (5.155.13)
चतुर्युजो रथाः सर्वे सर्वे चोत्तमवाजिनः । सप्रासऋष्टिकाः सर्वे सर्वे शतशरासनाः ॥
caturyujo rathāḥ sarve sarve cottamavājinaḥ | saprāsaṛṣṭikāḥ sarve sarve śataśarāsanāḥ
सब रथ चार घोड़ों वाले थे और सबमें उत्तम घोड़े जुते थे; सबमें प्रास और ऋष्टियाँ थीं और हर रथ में सौ-सौ धनुष थे।
श्लोक 14 (5.155.14)
धुर्ययोर्हययोरेकस्तथान्यौ पार्ष्णिसारथी । तौ चापि रथिनां श्रेष्ठौ रथी च हयवित्तथा ॥
dhuryayorhayayorekastathānyau pārṣṇisārathī | tau cāpi rathināṃ śreṣṭhau rathī ca hayavittathā
धुरे के पास जुते दो घोड़ों को एक सारथि हाँकता था, और बाहर के दो घोड़ों के लिए दो पार्श्व-सारथि चक्ररक्षक थे; वे दोनों भी श्रेष्ठ रथी थे, और रथ पर बैठा योद्धा स्वयं भी अश्व-विद्या का जानकार था।
श्लोक 15 (5.155.15)
नगराणीव गुप्तानि दुराधर्षाणि शत्रुभिः । आसन्रथसहस्राणि हेममालीनि सर्वशः ॥
nagarāṇīva guptāni durādharṣāṇi śatrubhiḥ | āsanrathasahasrāṇi hemamālīni sarvaśaḥ
वहाँ हज़ारों रथ थे, जो चारों ओर सोने की मालाओं से सजे थे और नगरों के समान सुरक्षित होने के कारण शत्रुओं के लिए अजेय थे।
श्लोक 16 (5.155.16)
यथा रथास्तथा नागा बद्धकक्षाः स्वलङ्कृताः । बभूवुः सप्तपुरुषा रत्नवन्त इवाद्रयः ॥
yathā rathāstathā nāgā baddhakakṣāḥ svalaṅkṛtāḥ | babhūvuḥ saptapuruṣā ratnavanta ivādrayaḥ
जैसे रथ थे, वैसे ही हाथी भी थे— कसी हुई पेटियों वाले और भली-भाँति सजे हुए; प्रत्येक पर सात पुरुष थे, और वे रत्नों से भरे पर्वतों के समान लगते थे।
श्लोक 17 (5.155.17)
द्वावङ्कुशधरौ तत्र द्वावुत्तमधनुर्धरौ । द्वौ वरासिधरौ राजन्नेकः शक्तिपिनाकधृत् ॥
dvāvaṅkuśadharau tatra dvāvuttamadhanurdharau | dvau varāsidharau rājannekaḥ śaktipinākadhṛt
हे राजन्, प्रत्येक हाथी पर दो अंकुशधारी, दो उत्तम धनुर्धर, दो श्रेष्ठ खड्गधारी और एक शक्ति तथा त्रिशूल धारण करने वाला योद्धा था।
श्लोक 18 (5.155.18)
गजैर्मत्तैः समाकीर्णं सर्वमायुधकोशकैः । तद्बभूव बलं राजन्कौरव्यस्य महात्मनः ॥
gajairmattaiḥ samākīrṇaṃ sarvamāyudhakośakaiḥ | tadbabhūva balaṃ rājankauravyasya mahātmanaḥ
हे राजन्, महामना कौरव की वह सेना मतवाले हाथियों और सब प्रकार के आयुध-भण्डारों से भरी हुई थी।
श्लोक 19 (5.155.19)
आमुक्तकवचैर्युक्तैः सपताकैः स्वलङ्कृतैः । सादिभिश्चोपपन्नास्तु तथा चायुतशो हयाः ॥
āmuktakavacairyuktaiḥ sapatākaiḥ svalaṅkṛtaiḥ | sādibhiścopapannāstu tathā cāyutaśo hayāḥ
दसियों हज़ार घोड़े भी थे, जिन पर कवचधारी, सुसज्जित, पताकाओं और आभूषणों से युक्त घुड़सवार सवार थे।
श्लोक 20 (5.155.20)
असङ्ग्राहाः सुसंपन्ना हेमभाण्डपरिच्छदाः । अनेकशतसाहस्राः सर्वे सादिवशे स्थिताः ॥
asaṅgrāhāḥ susaṃpannā hemabhāṇḍaparicchadāḥ | anekaśatasāhasrāḥ sarve sādivaśe sthitāḥ
वे घोड़े भली-भाँति सधे हुए थे, उछलते-भड़कते नहीं थे, और सोने के साज़ से सजे थे; ऐसे लाखों घोड़े थे, जो सब अपने सवारों के वश में थे।
श्लोक 21 (5.155.21)
नानारूपविकाराश्च नानाकवचशस्त्रिणः । पदातिनो नरास्तत्र बभूवुर्हेममालिनः ॥
nānārūpavikārāśca nānākavacaśastriṇaḥ | padātino narāstatra babhūvurhemamālinaḥ
वहाँ के पैदल सैनिक अनेक रूप-रंग के थे, नाना प्रकार के कवच और शस्त्र धारण किए हुए थे और सोने की मालाएँ पहने थे।
श्लोक 22 (5.155.22)
रथस्यासन्दश गजा गजस्य दश वाजिनः । नरा दश हयस्यासन्पादरक्षाः समन्ततः ॥
rathasyāsandaśa gajā gajasya daśa vājinaḥ | narā daśa hayasyāsanpādarakṣāḥ samantataḥ
प्रत्येक रथ के साथ दस हाथी, प्रत्येक हाथी के साथ दस घोड़े और प्रत्येक घोड़े के साथ चारों ओर से रक्षा करने वाले दस पैदल सैनिक थे।
श्लोक 23 (5.155.23)
रथस्य नागाः पञ्चाशन्नागस्यासञ्शतं हयाः । हयस्य पुरुषाः सप्त भिन्नसन्धानकारिणः ॥
rathasya nāgāḥ pañcāśannāgasyāsañśataṃ hayāḥ | hayasya puruṣāḥ sapta bhinnasandhānakāriṇaḥ
(दूसरी गणना के अनुसार) प्रत्येक रथ के साथ पचास हाथी, प्रत्येक हाथी के साथ सौ घोड़े और प्रत्येक घोड़े के साथ सात पैदल सैनिक थे, जो टूटी हुई पंक्तियों को फिर से जोड़ते थे।
श्लोक 24 (5.155.24)
सेना पञ्चशतं नागा रथास्तावन्त एव च । दशसेना च पृतना पृतना दश वाहिनी ॥
senā pañcaśataṃ nāgā rathāstāvanta eva ca | daśasenā ca pṛtanā pṛtanā daśa vāhinī
पाँच सौ हाथी और उतने ही रथ एक 'सेना' कहलाते हैं; दस सेनाओं की एक 'पृतना' और दस पृतनाओं की एक 'वाहिनी' होती है।
श्लोक 25 (5.155.25)
सेना च वाहिनी चैव पृतना ध्वजिनी चमूः । अक्षौहिणीति पर्यायैर्निरुक्ता च वरूथिनी ॥
senā ca vāhinī caiva pṛtanā dhvajinī camūḥ | akṣauhiṇīti paryāyairniruktā ca varūthinī
सेना, वाहिनी, पृतना, ध्वजिनी, चमू, अक्षौहिणी और वरूथिनी— ये सब सेना के पर्यायवाची नाम बताए गए हैं।
श्लोक 26 (5.155.26)
एवं व्यूढान्यनीकानि कौरवेयेण धीमता । अक्षौहिण्यो दशैका च सङ्ख्याताः सप्त चैव ह ॥
evaṃ vyūḍhānyanīkāni kauraveyeṇa dhīmatā | akṣauhiṇyo daśaikā ca saṅkhyātāḥ sapta caiva ha
इस प्रकार बुद्धिमान कौरव ने अपनी सेनाओं की व्यूह-रचना की। एक ओर ग्यारह अक्षौहिणी गिनी गईं और दूसरी ओर सात।
श्लोक 27 (5.155.27)
अक्षौहिण्यस्तु सप्तैव पाण्डवानामभूद्बलम् । अक्षौहिण्यो दशैका च कौरवाणामभूद्बलम् ॥
akṣauhiṇyastu saptaiva pāṇḍavānāmabhūdbalam | akṣauhiṇyo daśaikā ca kauravāṇāmabhūdbalam
पाण्डवों की सेना केवल सात अक्षौहिणी थी; कौरवों की सेना ग्यारह अक्षौहिणी थी।
श्लोक 28 (5.155.28)
नराणां पञ्चपञ्चाशदेषा पत्तिर्विधीयते । सेनामुखं च तिस्रस्ता गुल्म इत्यभिशब्दितम् ॥
narāṇāṃ pañcapañcāśadeṣā pattirvidhīyate | senāmukhaṃ ca tisrastā gulma ityabhiśabditam
पचपन पुरुषों की एक 'पत्ति' मानी जाती है; तीन पत्तियों का एक 'सेनामुख' होता है, जिसे 'गुल्म' भी कहते हैं।
श्लोक 29 (5.155.29)
त्रयो गुल्मा गणस्त्वासीद्गणास्त्वयुतशोऽभवन् । दुर्योधनस्य सेनासु योत्स्यमानाः प्रहारिणः ॥
trayo gulmā gaṇastvāsīdgaṇāstvayutaśo'bhavan | duryodhanasya senāsu yotsyamānāḥ prahāriṇaḥ
तीन गुल्मों का एक 'गण' होता था; और दुर्योधन की सेनाओं में युद्ध के लिए उद्यत, प्रहार करने वाले योद्धाओं के ऐसे दसियों हज़ार गण थे।
श्लोक 30 (5.155.30)
तत्र दुर्योधनो राजा शूरान्बुद्धिमतो नरान् । प्रसमीक्ष्य महाबाहुश्चक्रे सेनापतींस्तदा ॥
tatra duryodhano rājā śūrānbuddhimato narān | prasamīkṣya mahābāhuścakre senāpatīṃstadā
तब महाबाहु राजा दुर्योधन ने शूरवीर और बुद्धिमान पुरुषों को भली-भाँति परखकर सेनापति नियुक्त किए।
श्लोक 31 (5.155.31)
पृथगक्षौहिणीनां च प्रणेतॄन्नरसत्तमान् । विधिवत्पूर्वमानीय पार्थिवानभ्यषेचयत् ॥
pṛthagakṣauhiṇīnāṃ ca praṇetṝnnarasattamān | vidhivatpūrvamānīya pārthivānabhyaṣecayat
उसने अलग-अलग अक्षौहिणियों के नायक बनाने के लिए श्रेष्ठ पुरुषों— राजाओं— को विधिपूर्वक बुलाकर उनका अभिषेक किया:
श्लोक 32 (5.155.32)
कृपं द्रोणं च शल्यं च सैन्धवं च जयद्रथम् । सुदक्षिणं च काम्भोजं कृतवर्माणमेव च ॥
kṛpaṃ droṇaṃ ca śalyaṃ ca saindhavaṃ ca jayadratham | sudakṣiṇaṃ ca kāmbhojaṃ kṛtavarmāṇameva ca
कृप, द्रोण, शल्य, सिन्धुराज जयद्रथ, काम्बोजराज सुदक्षिण और कृतवर्मा;
श्लोक 33 (5.155.33)
द्रोणपुत्रं च कर्णं च भूरिश्रवसमेव च । शकुनिं सौबलं चैव बाह्लीकं च महाबलम् ॥
droṇaputraṃ ca karṇaṃ ca bhūriśravasameva ca | śakuniṃ saubalaṃ caiva bāhlīkaṃ ca mahābalam
द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा), कर्ण, भूरिश्रवा, सुबलपुत्र शकुनि और महाबली बाह्लीक।
श्लोक 34 (5.155.34)
दिवसे दिवसे तेषां प्रतिवेलं च भारत । चक्रे स विविधाः पूजाः प्रत्यक्षं च पुनः पुनः ॥
divase divase teṣāṃ prativelaṃ ca bhārata | cakre sa vividhāḥ pūjāḥ pratyakṣaṃ ca punaḥ punaḥ
हे भारत, वह दिन-प्रतिदिन, हर समय, स्वयं उनके सामने बार-बार अनेक प्रकार से उनका सत्कार करता था।
श्लोक 35 (5.155.35)
तथा विनियताः सर्वे ये च तेषां पदानुगाः । बभूवुः सैनिका राज्ञां प्रियं राज्ञश्चिकीर्षवः ॥
tathā viniyatāḥ sarve ye ca teṣāṃ padānugāḥ | babhūvuḥ sainikā rājñāṃ priyaṃ rājñaścikīrṣavaḥ
इसी प्रकार उन राजाओं के सब सैनिक और उनके अनुयायी भी अनुशासन में रहकर राजा का प्रिय करने के लिए उत्सुक हो गए।