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उद्योग पर्व · अध्याय 156

भीष्म का कौरव-सेनापति पद पर अभिषेक

दुर्योधन हाथ जोड़कर भीष्म से अपनी सेना का नेतृत्व करने की प्रार्थना करता है। वह उन ब्राह्मणों की कथा सुनाता है जो हैहय क्षत्रियों को तब तक न हरा सके जब तक उन्होंने एक सेनापति नहीं चुना, और भीष्म की तुलना हर वर्ग के श्रेष्ठतम से करता है। भीष्म शर्तों के साथ स्वीकार करते हैं: पाण्डव उन्हें कौरवों जितने ही प्रिय हैं, वे उनका नाश नहीं करेंगे पर प्रतिदिन उनके दस हज़ार योद्धाओं को मारेंगे, और कर्ण या तो उनसे पहले लड़े या उनके बाद। कर्ण कहता है कि भीष्म के जीवित रहते वह नहीं लड़ेगा। भेरी-शंखों की ध्वनि और भयानक अपशकुनों के बीच भीष्म का अभिषेक होता है, और दुर्योधन उनके तथा अपने भाइयों के साथ कुरुक्षेत्र जाकर हस्तिनापुर जैसी शोभा वाला शिविर बसाता है।

अध्याय 155अध्याय-सूचीअध्याय 157

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.156.1)

ततः शान्तनवं भीष्मं प्राञ्जलिर्धृतराष्ट्रजः । सह सर्वैर्महीपालैरिदं वचनमब्रवीत् ॥

tataḥ śāntanavaṃ bhīṣmaṃ prāñjalirdhṛtarāṣṭrajaḥ | saha sarvairmahīpālairidaṃ vacanamabravīt

तब धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन ने सब राजाओं के साथ हाथ जोड़कर शान्तनुनन्दन भीष्म से यह कहा—

दुर्योधन उवाच

श्लोक 2 (5.156.2)

ऋते सेनाप्रणेतारं पृतना सुमहत्यपि । दीर्यते युद्धमासाद्य पिपीलिकपुटं यथा ॥

ṛte senāpraṇetāraṃ pṛtanā sumahatyapi | dīryate yuddhamāsādya pipīlikapuṭaṃ yathā

"सेनापति के बिना बहुत बड़ी सेना भी युद्ध में पहुँचकर चींटियों की बाँबी की तरह बिखर जाती है।

श्लोक 3 (5.156.3)

नहि जातु द्वयोर्बुद्धिः समा भवति कर्हिचित् । शौर्यं च बलनेतॄणां स्पर्धते च परस्परम् ॥

nahi jātu dvayorbuddhiḥ samā bhavati karhicit | śauryaṃ ca balanetṝṇāṃ spardhate ca parasparam

"दो व्यक्तियों की बुद्धि कभी एक-सी नहीं होती, और सेना के नायकों का पराक्रम आपस में होड़ करने लगता है।

श्लोक 4 (5.156.4)

श्रूयते च महाप्राज्ञ हैहयानमितौजसः । अभ्ययुर्ब्राह्मणाः सर्वे समुच्छ्रितकुशध्वजाः ॥

śrūyate ca mahāprājña haihayānamitaujasaḥ | abhyayurbrāhmaṇāḥ sarve samucchritakuśadhvajāḥ

"हे महाप्राज्ञ, सुना जाता है कि एक बार सब ब्राह्मणों ने कुश की ध्वजाएँ ऊँची उठाकर अपार तेजस्वी हैहयों पर चढ़ाई की थी।

श्लोक 5 (5.156.5)

तानभ्ययुस्तदा वैश्याः शूद्राश्चैव पितामह । एकतस्तु त्रयो वर्णा एकतः क्षत्रियर्षभाः ॥

tānabhyayustadā vaiśyāḥ śūdrāścaiva pitāmaha | ekatastu trayo varṇā ekataḥ kṣatriyarṣabhāḥ

"हे पितामह, तब वैश्य और शूद्र भी उनके साथ गए; एक ओर तीनों वर्ण थे और दूसरी ओर श्रेष्ठ क्षत्रिय।

श्लोक 6 (5.156.6)

ते स्म युद्धे प्रभज्यन्ते त्रयो वर्णाः पुनः पुनः । क्षत्रियाश्च जयन्त्येव बहुलं चैकतो बलम् ॥

te sma yuddhe prabhajyante trayo varṇāḥ punaḥ punaḥ | kṣatriyāśca jayantyeva bahulaṃ caikato balam

"युद्ध में वे तीनों वर्ण बार-बार पराजित होते रहे और क्षत्रिय ही जीतते रहे, यद्यपि दूसरे पक्ष की सेना बड़ी थी।

श्लोक 7 (5.156.7)

ततस्ते क्षत्रियानेव पप्रच्छुर्द्विजसत्तमाः । तेभ्यः शशंसुर्धर्मज्ञा याथातथ्यं पितामह ॥

tataste kṣatriyāneva papracchurdvijasattamāḥ | tebhyaḥ śaśaṃsurdharmajñā yāthātathyaṃ pitāmaha

"तब उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने क्षत्रियों से ही इसका कारण पूछा, और हे पितामह, धर्म को जानने वाले क्षत्रियों ने उन्हें सच्ची बात बता दी—

श्लोक 8 (5.156.8)

वयमेकस्य शृणुमो महाबुद्धिमतो रणे । भवन्तस्तु पृथक्सर्वे स्वबुद्धिवशवर्तिनः ॥

vayamekasya śṛṇumo mahābuddhimato raṇe | bhavantastu pṛthaksarve svabuddhivaśavartinaḥ

"'युद्ध में हम एक ही महाबुद्धिमान पुरुष की आज्ञा मानते हैं, जबकि आप सब अलग-अलग अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार चलते हैं।'

श्लोक 9 (5.156.9)

ततस्ते ब्राह्मणाश्चक्रुरेकं सेनापतिं द्विजम् । नये सुकुशलं शूरमजयन्क्षत्रियांस्ततः ॥

tataste brāhmaṇāścakrurekaṃ senāpatiṃ dvijam | naye sukuśalaṃ śūramajayankṣatriyāṃstataḥ

"तब ब्राह्मणों ने नीति में कुशल एक शूरवीर ब्राह्मण को अपना सेनापति बनाया और क्षत्रियों को जीत लिया।

श्लोक 10 (5.156.10)

एवं ये कुशलं शूरं हितेप्सितमकल्मषम् । सेनापतिं प्रकुर्वन्ति ते जयन्ति रणे रिपून् ॥

evaṃ ye kuśalaṃ śūraṃ hitepsitamakalmaṣam | senāpatiṃ prakurvanti te jayanti raṇe ripūn

"इस प्रकार जो लोग कुशल, शूरवीर, हितैषी और निष्कलंक पुरुष को सेनापति बनाते हैं, वे युद्ध में शत्रुओं को जीत लेते हैं।

श्लोक 11 (5.156.11)

भवानुशनसा तुल्यो हितैषी च सदा मम । असंहार्यः स्थितो धर्मे स नः सेनापतिर्भव ॥

bhavānuśanasā tulyo hitaiṣī ca sadā mama | asaṃhāryaḥ sthito dharme sa naḥ senāpatirbhava

"आप शुक्राचार्य के समान हैं और सदा मेरे हितैषी रहे हैं; आपको कोई डिगा नहीं सकता और आप धर्म में स्थित हैं। आप हमारे सेनापति बनिए।

श्लोक 12 (5.156.12)

रश्मीवतामिवादित्यो वीरुधामिव चन्द्रमाः । कुबेर इव यक्षाणां देवानामिव वासवः ॥

raśmīvatāmivādityo vīrudhāmiva candramāḥ | kubera iva yakṣāṇāṃ devānāmiva vāsavaḥ

"जैसे तेजस्वियों में सूर्य, औषधियों में चन्द्रमा, यक्षों में कुबेर और देवताओं में इन्द्र हैं,

श्लोक 13 (5.156.13)

पर्वतानां यथा मेरुः सुपर्णः पक्षिणां यथा । कुमार इव देवानां वसूनामिव हव्यवाट् ॥

parvatānāṃ yathā meruḥ suparṇaḥ pakṣiṇāṃ yathā | kumāra iva devānāṃ vasūnāmiva havyavāṭ

"जैसे पर्वतों में मेरु, पक्षियों में गरुड़, देवताओं में कुमार कार्तिकेय और वसुओं में अग्नि हैं,

श्लोक 14 (5.156.14)

भवता हि वयं गुप्ताः शक्रेणेव दिवौकसः । अनाधृष्या भविष्यामस्त्रिदशानामपि ध्रुवम् ॥

bhavatā hi vayaṃ guptāḥ śakreṇeva divaukasaḥ | anādhṛṣyā bhaviṣyāmastridaśānāmapi dhruvam

"वैसे ही आपसे सुरक्षित होकर, जैसे इन्द्र से देवता सुरक्षित रहते हैं, हम निश्चय ही देवताओं के लिए भी अजेय हो जाएँगे।

श्लोक 15 (5.156.15)

प्रयातु नो भवानग्रे देवानामिव पावकिः । वयं त्वामनुयास्यामः सौरभेया इवर्षभम् ॥

prayātu no bhavānagre devānāmiva pāvakiḥ | vayaṃ tvāmanuyāsyāmaḥ saurabheyā ivarṣabham

"जैसे अग्निपुत्र कार्तिकेय देवताओं के आगे चलते हैं, वैसे ही आप हमारे आगे चलिए; जैसे गौएँ साँड के पीछे चलती हैं, वैसे ही हम आपके पीछे चलेंगे।"

भीष्म उवाच

श्लोक 16 (5.156.16)

एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत । यथैव हि भवन्तो मे तथैव मम पाण्डवाः ॥

evametanmahābāho yathā vadasi bhārata | yathaiva hi bhavanto me tathaiva mama pāṇḍavāḥ

"हे महाबाहु भारत, तुम जैसा कहते हो, वैसा ही है। परन्तु जैसे तुम मुझे प्रिय हो, वैसे ही पाण्डव भी मुझे प्रिय हैं।

श्लोक 17 (5.156.17)

अपि चैव मया श्रेयो वाच्यं तेषां नराधिप । संयोद्धव्यं तवार्थाय यथा मे समयः कृतः ॥

api caiva mayā śreyo vācyaṃ teṣāṃ narādhipa | saṃyoddhavyaṃ tavārthāya yathā me samayaḥ kṛtaḥ

"इसके अतिरिक्त, हे नरेश्वर, मुझे उनके हित की बात भी कहनी होगी; फिर भी जैसी मैंने प्रतिज्ञा की है, मैं तुम्हारे लिए युद्ध करूँगा।

श्लोक 18 (5.156.18)

न तु पश्यामि योद्धारमात्मनः सदृशं भुवि । ऋते तस्मान्नरव्याघ्रात्कुन्तीपुत्राद्धनञ्जयात् ॥

na tu paśyāmi yoddhāramātmanaḥ sadṛśaṃ bhuvi | ṛte tasmānnaravyāghrātkuntīputrāddhanañjayāt

"पृथ्वी पर मुझे अपने समान कोई योद्धा नहीं दिखता, सिवाय उस नरश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र धनंजय के।

श्लोक 19 (5.156.19)

स हि वेद महाबुद्धिर्दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः । न तु मां विवृतो युद्धे जातु युध्येत पाण्डवः ॥

sa hi veda mahābuddhirdivyānyastrāṇyanekaśaḥ | na tu māṃ vivṛto yuddhe jātu yudhyeta pāṇḍavaḥ

"वह महाबुद्धिमान अनेक दिव्यास्त्रों को जानता है; परन्तु वह पाण्डुपुत्र युद्ध में खुलकर मुझसे कभी नहीं लड़ेगा।

श्लोक 20 (5.156.20)

अहं स च क्षणेनैव निर्मनुष्यमिदं जगत् । कुर्यावास्त्रबलेनैव ससुरासुरराक्षसम् ॥

ahaṃ sa ca kṣaṇenaiva nirmanuṣyamidaṃ jagat | kuryāvāstrabalenaiva sasurāsurarākṣasam

"वह और मैं, अपने अस्त्रों के बल से, क्षण भर में इस जगत को देवताओं, असुरों और राक्षसों सहित मनुष्यों से रहित कर सकते हैं।

श्लोक 21 (5.156.21)

न त्वेवोत्सादनीया मे पाण्डोः पुत्रा जनाधिप । तस्माद्योधान्हनिष्यामि प्रयोगेणायुतं सदा ॥

na tvevotsādanīyā me pāṇḍoḥ putrā janādhipa | tasmādyodhānhaniṣyāmi prayogeṇāyutaṃ sadā

"किन्तु हे जनाधिप, पाण्डु के पुत्रों का नाश मुझे नहीं करना है। इसलिए मैं अपने युद्ध-कौशल से प्रतिदिन उनके दस हज़ार योद्धाओं को मारूँगा।

श्लोक 22 (5.156.22)

एवमेषां करिष्यामि निधनं कुरुनन्दन । न चेत्ते मां हनिष्यन्ति पूर्वमेव समागमे ॥

evameṣāṃ kariṣyāmi nidhanaṃ kurunandana | na cette māṃ haniṣyanti pūrvameva samāgame

"हे कुरुनन्दन, इस प्रकार मैं उनका संहार करूँगा— यदि वे भिड़ंत में पहले ही मुझे न मार डालें।

श्लोक 23 (5.156.23)

सेनापतिस्त्वहं राजन्समयेनापरेण ते । भविष्यामि यथाकामं तन्मे श्रोतुमिहार्हसि ॥

senāpatistvahaṃ rājansamayenāpareṇa te | bhaviṣyāmi yathākāmaṃ tanme śrotumihārhasi

"हे राजन्, मैं तुम्हारी इच्छा के अनुसार सेनापति बनूँगा, पर एक और शर्त पर; उसे यहाँ मुझसे सुन लो।

श्लोक 24 (5.156.24)

कर्णो वा युध्यतां पूर्वमहं वा पृथिवीपते । स्पर्धते हि सदात्यर्थं सूतपुत्रो मया रणे ॥

karṇo vā yudhyatāṃ pūrvamahaṃ vā pṛthivīpate | spardhate hi sadātyarthaṃ sūtaputro mayā raṇe

"हे पृथ्वीपति, या तो पहले कर्ण युद्ध करे या मैं; क्योंकि वह सूतपुत्र युद्ध में सदा मुझसे बहुत होड़ करता है।"

कर्ण उवाच

श्लोक 25 (5.156.25)

नाहं जीवति गाङ्गेये राजन्योत्स्ये कथंचन । हते भीष्मे तु योत्स्यामि सह गाण्डीवधन्वना ॥

nāhaṃ jīvati gāṅgeye rājanyotsye kathaṃcana | hate bhīṣme tu yotsyāmi saha gāṇḍīvadhanvanā

"हे राजन्, गंगानन्दन भीष्म के जीवित रहते मैं किसी भी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा। भीष्म के मारे जाने पर ही मैं गाण्डीवधारी अर्जुन से लड़ूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (5.156.26)

ततः सेनापतिं चक्रे विधिवद्भूरिदक्षिणम् । धृतराष्ट्रात्मजो भीष्मं सोऽभिषिक्तो व्यरोचत ॥

tataḥ senāpatiṃ cakre vidhivadbhūridakṣiṇam | dhṛtarāṣṭrātmajo bhīṣmaṃ so'bhiṣikto vyarocata

तब धृतराष्ट्रपुत्र ने विधिपूर्वक, प्रचुर दक्षिणा देने वाले भीष्म को सेनापति बनाया; अभिषिक्त होकर वे अत्यन्त शोभायमान हुए।

श्लोक 27 (5.156.27)

ततो भेरीश्च शङ्खांश्च शतशोऽथ सहस्रशः । वादयामासुरव्यग्रा वादका राजशासनात् ॥

tato bherīśca śaṅkhāṃśca śataśo'tha sahasraśaḥ | vādayāmāsuravyagrā vādakā rājaśāsanāt

तब राजा की आज्ञा से बजाने वालों ने शान्त भाव से सैकड़ों-हज़ारों भेरियाँ और शंख बजाए।

श्लोक 28 (5.156.28)

सिंहनादाश्च विविधा वाहनानां च निःस्वनाः । प्रादुरासन्ननभ्रे च वर्षं रुधिरकर्दमम् ॥

siṃhanādāśca vividhā vāhanānāṃ ca niḥsvanāḥ | prādurāsannanabhre ca varṣaṃ rudhirakardamam

भाँति-भाँति के सिंहनाद और वाहनों के स्वर गूँज उठे, और बिना बादलों के आकाश से रक्त और कीचड़ की वर्षा होने लगी।

श्लोक 29 (5.156.29)

निर्घाताः पृथिवीकम्पा गजबृंहितनिःस्वनाः । आसंश्च सर्वयोधानां पातयन्तो मनांस्युत ॥

nirghātāḥ pṛthivīkampā gajabṛṃhitaniḥsvanāḥ | āsaṃśca sarvayodhānāṃ pātayanto manāṃsyuta

बिजली की कड़क, भूकम्प और हाथियों की चिंघाड़ होने लगी, जिनसे सब योद्धाओं के मन बैठ गए।

श्लोक 30 (5.156.30)

वाचश्चाप्यशरीरिण्यो दिवश्चोल्काः प्रपेदिरे । शिवाश्च भयवेदिन्यो नेदुर्दीप्ततरा भृशम् ॥

vācaścāpyaśarīriṇyo divaścolkāḥ prapedire | śivāśca bhayavedinyo nedurdīptatarā bhṛśam

बिना शरीर की वाणियाँ सुनाई दीं, आकाश से उल्काएँ गिरीं और भय की सूचना देने वाली सियारिनें अत्यन्त भयंकर स्वर में चिल्लाने लगीं।

श्लोक 31 (5.156.31)

सैनापत्ये यदा राजा गाङ्गेयमभिषिक्तवान् । तदैतान्युग्ररूपाणि बभूवुः शतशो नृप ॥

saināpatye yadā rājā gāṅgeyamabhiṣiktavān | tadaitānyugrarūpāṇi babhūvuḥ śataśo nṛpa

हे नरेश, जब राजा ने गंगानन्दन को सेनापति पद पर अभिषिक्त किया, तब ये भयानक अपशकुन सैकड़ों की संख्या में प्रकट हुए।

श्लोक 32 (5.156.32)

ततः सेनापतिं कृत्वा भीष्मं परबलार्दनम् । वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठान्गोभिर्निष्कैश्च भूरिशः ॥

tataḥ senāpatiṃ kṛtvā bhīṣmaṃ parabalārdanam | vācayitvā dvijaśreṣṭhāngobhirniṣkaiśca bhūriśaḥ

तब शत्रु-सेना का संहार करने वाले भीष्म को सेनापति बनाकर, और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बहुत-सी गौएँ और स्वर्ण-मुद्राएँ देकर उनसे स्वस्तिवाचन कराकर,

श्लोक 33 (5.156.33)

वर्धमानो जयाशीर्भिर्निर्ययौ सैनिकैर्वृतः । आपगेयं पुरस्कृत्य भ्रातृभिः सहितस्तदा ॥

vardhamāno jayāśīrbhirniryayau sainikairvṛtaḥ | āpageyaṃ puraskṛtya bhrātṛbhiḥ sahitastadā

विजय के आशीर्वादों से उत्साहित दुर्योधन अपने भाइयों के साथ, गंगानन्दन भीष्म को आगे करके, सैनिकों से घिरा हुआ निकल पड़ा।

श्लोक 34 (5.156.34)

स्कन्धावारेण महता कुरुक्षेत्रं जगाम ह ॥

skandhāvāreṇa mahatā kurukṣetraṃ jagāma ha

वह विशाल सेना के साथ कुरुक्षेत्र पहुँचा।

श्लोक 35 (5.156.35)

परिक्रम्य कुरुक्षेत्रं कर्णेन सह कौरवः । शिबिरं मापयामास समे देशे जनाधिप ॥

parikramya kurukṣetraṃ karṇena saha kauravaḥ | śibiraṃ māpayāmāsa same deśe janādhipa

हे जनाधिप, कर्ण के साथ कुरुक्षेत्र की परिक्रमा करके कौरव ने समतल भूमि पर शिविर नपवाया।

श्लोक 36 (5.156.36)

मधुरानूषरे देशे प्रभूतयवसेन्धने । यथैव हास्तिनपुरं तद्वच्छिबिरमाबभौ ॥

madhurānūṣare deśe prabhūtayavasendhane | yathaiva hāstinapuraṃ tadvacchibiramābabhau

मनोहर, ऊसर-रहित और घास तथा ईंधन से भरपूर स्थान पर बसा वह शिविर हस्तिनापुर के समान ही शोभायमान हुआ।

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