उद्योग पर्व · अध्याय 157
पाण्डव-सेनापतियों का अभिषेक और बलराम की तीर्थयात्रा
जनमेजय पूछते हैं कि भीष्म के युद्ध-यज्ञ में दीक्षित होने की बात सुनकर युधिष्ठिर ने क्या कहा। युधिष्ठिर अपने भाइयों और वासुदेव से कहते हैं कि सबसे पहले पितामह से युद्ध होगा, और सात सेनाओं के नायक चुनने को कहते हैं; श्रीकृष्ण की सहमति से वे द्रुपद, विराट, सात्यकि, धृष्टद्युम्न, धृष्टकेतु, शिखण्डी और मगधराज सहदेव का अभिषेक करते हैं, धृष्टद्युम्न को प्रधान सेनापति और अर्जुन को सबका अधिपति बनाते हैं, तथा श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथि बनते हैं। तब बलराम वृष्णि-प्रमुखों के साथ आते हैं, भयंकर संहार की भविष्यवाणी करते हैं और बताते हैं कि कृष्ण पूरी तरह अर्जुन के पक्ष में हैं और भीम तथा दुर्योधन दोनों उनके समान प्रिय शिष्य हैं, इसलिए वे कुरुवंशियों का नाश नहीं देखेंगे और सरस्वती के तीर्थों की यात्रा पर जाएँगे।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (5.157.1)
आपगेयं महात्मानं भीष्मं शस्त्रभृतां वरम् । पितामहं भारतानां ध्वजं सर्वमहीक्षिताम् ॥
āpageyaṃ mahātmānaṃ bhīṣmaṃ śastrabhṛtāṃ varam | pitāmahaṃ bhāratānāṃ dhvajaṃ sarvamahīkṣitām
"गंगानन्दन, महात्मा, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, भरतवंशियों के पितामह और समस्त राजाओं के ध्वज-स्वरूप भीष्म —
श्लोक 2 (5.157.2)
बृहस्पतिसमं बुद्ध्या क्षमया पृथिवीसमम् । समुद्रमिव गाम्भीर्ये हिमवन्तमिव स्थिरम् ॥
bṛhaspatisamaṃ buddhyā kṣamayā pṛthivīsamam | samudramiva gāmbhīrye himavantamiva sthiram
"जो बुद्धि में बृहस्पति के समान, क्षमा में पृथ्वी के समान, गम्भीरता में समुद्र के समान और स्थिरता में हिमालय के समान हैं,
श्लोक 3 (5.157.3)
प्रजापतिमिवौदार्ये तेजसा भास्करोपमम् । महेन्द्रमिव शत्रूणां ध्वंसनं शरवृष्टिभिः ॥
prajāpatimivaudārye tejasā bhāskaropamam | mahendramiva śatrūṇāṃ dhvaṃsanaṃ śaravṛṣṭibhiḥ
"जो उदारता में प्रजापति के समान, तेज में सूर्य के समान और बाण-वर्षा से शत्रुओं का संहार करने में महेन्द्र के समान हैं —
श्लोक 4 (5.157.4)
रणयज्ञे प्रवितते सुभीमे लोमहर्षणे । दीक्षितं चिररात्राय श्रुत्वा तत्र युधिष्ठिरः ॥
raṇayajñe pravitate subhīme lomaharṣaṇe | dīkṣitaṃ cirarātrāya śrutvā tatra yudhiṣṭhiraḥ
"वे भीष्म युद्धरूपी विस्तृत, अत्यन्त भयंकर और रोमांचकारी यज्ञ में दीर्घकाल के लिए दीक्षित हो गए हैं, यह सुनकर वहाँ युधिष्ठिर ने
श्लोक 5 (5.157.5)
किमब्रवीन्महाबाहुः सर्वशस्त्रभृतां वरः । भीमसेनार्जुनौ वापि कृष्णो वा प्रत्यभाषत ॥
kimabravīnmahābāhuḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | bhīmasenārjunau vāpi kṛṣṇo vā pratyabhāṣata
"— उन महाबाहु, सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राजा ने क्या कहा? और भीमसेन तथा अर्जुन ने, अथवा श्रीकृष्ण ने क्या उत्तर दिया?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (5.157.6)
आपद्धर्मार्थकुशलो महाबुद्धिर्युधिष्ठिरः । सर्वान्भ्रातॄन्समानीय वासुदेवं च शाश्वतम् ॥
āpaddharmārthakuśalo mahābuddhiryudhiṣṭhiraḥ | sarvānbhrātṝnsamānīya vāsudevaṃ ca śāśvatam
आपद्धर्म के मर्म को जानने वाले, महाबुद्धिमान युधिष्ठिर ने अपने सब भाइयों और सनातन वासुदेव को बुलाया,
श्लोक 7 (5.157.7)
उवाच वदतां श्रेष्ठः सान्त्वपूर्वमिदं वचः । पर्याक्रामत सैन्यानि यत्तास्तिष्ठत दंशिताः ॥
uvāca vadatāṃ śreṣṭhaḥ sāntvapūrvamidaṃ vacaḥ | paryākrāmata sainyāni yattāstiṣṭhata daṃśitāḥ
और बोलने वालों में श्रेष्ठ उन्होंने सान्त्वनापूर्वक यह वचन कहा— "सेनाओं को मोर्चों पर ले चलो; कवच पहनकर सावधान रहो।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 8 (5.157.8)
पितामहेन वो युद्धं पूर्वमेव भविष्यति । तस्मात्सप्तसु सेनासु प्रणेतॄन्मम पश्यत ॥
pitāmahena vo yuddhaṃ pūrvameva bhaviṣyati | tasmātsaptasu senāsu praṇetṝnmama paśyata
"तुम्हारा युद्ध सबसे पहले पितामह से ही होगा। इसलिए मेरी सातों सेनाओं के लिए नायक चुन लो।"
कृष्ण उवाच
श्लोक 9 (5.157.9)
यथार्हति भवान्वक्तुमस्मिन्काले ह्युपस्थिते । तथेदमर्थवद्वाक्यमुक्तं ते भरतर्षभ ॥
yathārhati bhavānvaktumasminkāle hyupasthite | tathedamarthavadvākyamuktaṃ te bharatarṣabha
"हे भरतश्रेष्ठ, इस समय के आ पहुँचने पर आपको जैसा कहना चाहिए, वैसा ही यह सार्थक वचन आपने कहा है।
श्लोक 10 (5.157.10)
रोचते मे महाबाहो क्रियतां यदनन्तरम् । नायकास्तव सेनायां क्रियन्तामिह सप्त वै ॥
rocate me mahābāho kriyatāṃ yadanantaram | nāyakāstava senāyāṃ kriyantāmiha sapta vai
"हे महाबाहु, यह मुझे अच्छा लगता है; अब आगे का कार्य किया जाए। यहाँ आपकी सेना के सात नायक नियुक्त किए जाएँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (5.157.11)
ततो द्रुपदमानाय्य विराटं शिनिपुङ्गवम् । धृष्टद्युम्नं च पाञ्चाल्यं धृष्टकेतुं च पार्थिव । शिखण्डिनं च पाञ्चाल्यं सहदेवं च मागधम् ॥
tato drupadamānāyya virāṭaṃ śinipuṅgavam | dhṛṣṭadyumnaṃ ca pāñcālyaṃ dhṛṣṭaketuṃ ca pārthiva | śikhaṇḍinaṃ ca pāñcālyaṃ sahadevaṃ ca māgadham
तब हे राजन्, उन्होंने द्रुपद, विराट, शिनिवंश में श्रेष्ठ सात्यकि, पाञ्चालकुमार धृष्टद्युम्न, धृष्टकेतु, पाञ्चालकुमार शिखण्डी और मगधराज सहदेव को बुलवाया।
श्लोक 12 (5.157.12)
एतान्सप्त महाभागान्वीरान्युद्धाभिकाङ्क्षिणः । सेनाप्रणेतॄन्विधिवदभ्यषिञ्चद्युधिष्ठिरः ॥
etānsapta mahābhāgānvīrānyuddhābhikāṅkṣiṇaḥ | senāpraṇetṝnvidhivadabhyaṣiñcadyudhiṣṭhiraḥ
युधिष्ठिर ने युद्ध की इच्छा रखने वाले इन सात महाभाग वीरों का विधिपूर्वक सेनानायकों के पद पर अभिषेक किया।
श्लोक 13 (5.157.13)
सर्वसेनापतिं चात्र धृष्टद्युम्नं चकार ह । द्रोणान्तहेतोरुत्पन्नो य इद्धाञ्जातवेदसः ॥
sarvasenāpatiṃ cātra dhṛṣṭadyumnaṃ cakāra ha | droṇāntahetorutpanno ya iddhāñjātavedasaḥ
और वहाँ उन्होंने धृष्टद्युम्न को समस्त सेनाओं का सेनापति बनाया, जो द्रोण के अन्त के लिए प्रज्वलित अग्नि से उत्पन्न हुए थे।
श्लोक 14 (5.157.14)
सर्वेषामेव तेषां तु समस्तानां महात्मनाम् । सेनापतिपतिं चक्रे गुडाकेशं धनञ्जयम् ॥
sarveṣāmeva teṣāṃ tu samastānāṃ mahātmanām | senāpatipatiṃ cakre guḍākeśaṃ dhanañjayam
उन सब महात्माओं के ऊपर उन्होंने गुडाकेश धनंजय (अर्जुन) को सेनापतियों का भी अधिपति बनाया।
श्लोक 15 (5.157.15)
अर्जुनस्यापि नेता च संयन्ता चैव वाजिनाम् । सङ्कर्षणानुजः श्रीमान्महाबुद्धिर्जनार्दनः ॥
arjunasyāpi netā ca saṃyantā caiva vājinām | saṅkarṣaṇānujaḥ śrīmānmahābuddhirjanārdanaḥ
और अर्जुन के भी पथप्रदर्शक तथा उनके घोड़ों के नियन्ता संकर्षण के छोटे भाई, महाबुद्धिमान श्रीमान् जनार्दन थे।
श्लोक 16 (5.157.16)
तद्दृष्ट्वोपस्थितं युद्धं समासन्नं महात्ययम् । प्राविशद्भवनं राज्ञः पाण्डवानां हलायुधः ॥
taddṛṣṭvopasthitaṃ yuddhaṃ samāsannaṃ mahātyayam | prāviśadbhavanaṃ rājñaḥ pāṇḍavānāṃ halāyudhaḥ
यह देखकर कि महाविनाशकारी युद्ध उपस्थित है और निकट आ पहुँचा है, हलधर बलराम पाण्डवों के राजा युधिष्ठिर के भवन में आए।
श्लोक 17 (5.157.17)
सहाक्रूरप्रभृतिभिर्गदसाम्बोद्धवादिभिः । रौक्मिणेयाहुकसुतैश्चारुदेष्णपुरोगमैः ॥
sahākrūraprabhṛtibhirgadasāmboddhavādibhiḥ | raukmiṇeyāhukasutaiścārudeṣṇapurogamaiḥ
उनके साथ अक्रूर आदि, गद, साम्ब, उद्धव आदि, रुक्मिणी के पुत्र और आहुक के पुत्र थे, जिनमें चारुदेष्ण अग्रणी थे;
श्लोक 18 (5.157.18)
वृष्णिमुख्यैरधिगतैर्व्याघ्रैरिव बलोत्कटैः । अभिगुप्तो महाबाहुर्मरुद्भिरिव वासवः ॥
vṛṣṇimukhyairadhigatairvyāghrairiva balotkaṭaiḥ | abhigupto mahābāhurmarudbhiriva vāsavaḥ
बाघों के समान बलशाली, साथ आए हुए उन वृष्णि-प्रमुखों से रक्षित वे महाबाहु मरुद्गणों से घिरे इन्द्र के समान लगते थे।
श्लोक 19 (5.157.19)
नीलकौशेयवसनः कैलासशिखरोपमः । सिंहखेलगतिः श्रीमान्मदरक्तान्तलोचनः ॥
nīlakauśeyavasanaḥ kailāsaśikharopamaḥ | siṃhakhelagatiḥ śrīmānmadaraktāntalocanaḥ
वे नीले रेशमी वस्त्र पहने थे, कैलास के शिखर के समान थे, सिंह की-सी लीलामयी चाल वाले थे, श्रीमान् थे और उनकी आँखों के कोने मद से लाल थे।
श्लोक 20 (5.157.20)
तं दृष्ट्वा धर्मराजश्च केशवश्च महाद्युतिः । उदतिष्ठत्ततः पार्थो भीमकर्मा वृकोदरः ॥
taṃ dṛṣṭvā dharmarājaśca keśavaśca mahādyutiḥ | udatiṣṭhattataḥ pārtho bhīmakarmā vṛkodaraḥ
उन्हें देखकर धर्मराज युधिष्ठिर और महातेजस्वी केशव उठ खड़े हुए; फिर भयंकर कर्म करने वाले कुन्तीपुत्र भीमसेन भी उठे,
श्लोक 21 (5.157.21)
गाण्डीवधन्वा ये चान्ये राजानस्तत्र केचन । पूजयाञ्चक्रिरे ते वै समायान्तं हलायुधम् ॥
gāṇḍīvadhanvā ye cānye rājānastatra kecana | pūjayāñcakrire te vai samāyāntaṃ halāyudham
गाण्डीवधारी अर्जुन और वहाँ जो अन्य राजा थे, वे भी उठे; उन सबने आते हुए हलधर का सत्कार किया।
श्लोक 22 (5.157.22)
ततस्तं पाण्डवो राजा करे पस्पर्श पाणिना । वासुदेवपुरोगास्तं सर्व एवाभ्यवादयन् ॥
tatastaṃ pāṇḍavo rājā kare pasparśa pāṇinā | vāsudevapurogāstaṃ sarva evābhyavādayan
तब पाण्डव राजा युधिष्ठिर ने अपने हाथ से उनका हाथ छुआ, और वासुदेव आदि सबने उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 23 (5.157.23)
विराटद्रुपदौ वृद्धावभिवाद्य हलायुधः । युधिष्ठिरेण सहित उपाविशदरिन्दमः ॥
virāṭadrupadau vṛddhāvabhivādya halāyudhaḥ | yudhiṣṭhireṇa sahita upāviśadarindamaḥ
शत्रुओं का दमन करने वाले हलधर ने वृद्ध विराट और द्रुपद को प्रणाम किया और युधिष्ठिर के साथ बैठ गए।
श्लोक 24 (5.157.24)
ततस्तेषूपविष्टेषु पार्थिवेषु समन्ततः । वासुदेवमभिप्रेक्ष्य रौहिणेयोऽभ्यभाषत ॥
tatasteṣūpaviṣṭeṣu pārthiveṣu samantataḥ | vāsudevamabhiprekṣya rauhiṇeyo'bhyabhāṣata
जब सब राजा चारों ओर बैठ गए, तब रोहिणीनन्दन बलराम ने वासुदेव की ओर देखकर कहा—
बलदेव उवाच
श्लोक 25 (5.157.25)
भवितायं महारौद्रो दारुणः पुरुषक्षयः । दिष्टमेतद्ध्रुवं मन्ये न शक्यमतिवर्तितुम् ॥
bhavitāyaṃ mahāraudro dāruṇaḥ puruṣakṣayaḥ | diṣṭametaddhruvaṃ manye na śakyamativartitum
"यह अत्यन्त भयंकर और क्रूर नरसंहार होगा। मैं मानता हूँ कि यह निश्चित दैव-विधान है, जिसे टाला नहीं जा सकता।
श्लोक 26 (5.157.26)
तस्माद्युद्धात्समुत्तीर्णानपि वः ससुहृज्जनान् । अरोगानक्षतैर्देहैर्द्रष्टास्मीति मतिर्मम ॥
tasmādyuddhātsamuttīrṇānapi vaḥ sasuhṛjjanān | arogānakṣatairdehairdraṣṭāsmīti matirmama
"फिर भी मेरी यह कामना है कि मैं तुम सबको तुम्हारे सुहृदों सहित उस युद्ध से पार हुआ, निरोग और अक्षत शरीर वाला देखूँ।
श्लोक 27 (5.157.27)
समेतं पार्थिवं क्षत्रं कालपक्वमसंशयम् । विमर्दश्च महान्भावी मांसशोणितकर्दमः ॥
sametaṃ pārthivaṃ kṣatraṃ kālapakvamasaṃśayam | vimardaśca mahānbhāvī māṃsaśoṇitakardamaḥ
"यहाँ एकत्र हुआ पृथ्वी का क्षत्रिय-समुदाय निःसन्देह काल से पक चुका है; मांस और रक्त के कीचड़ वाला महान संग्राम होगा।
श्लोक 28 (5.157.28)
उक्तो मया वासुदेवः पुनः पुनरुपह्वरे । संबन्धिषु समां वृत्तिं वर्तस्व मधुसूदन ॥
ukto mayā vāsudevaḥ punaḥ punarupahvare | saṃbandhiṣu samāṃ vṛttiṃ vartasva madhusūdana
"मैंने एकान्त में वासुदेव से बार-बार कहा— 'हे मधुसूदन, सम्बन्धियों के प्रति समान व्यवहार करो।
श्लोक 29 (5.157.29)
पाण्डवा हि यथास्माकं तथा दुर्योधनो नृपः । तस्यापि क्रियतां साह्यं स पर्येति पुनःपुनः ॥
pāṇḍavā hi yathāsmākaṃ tathā duryodhano nṛpaḥ | tasyāpi kriyatāṃ sāhyaṃ sa paryeti punaḥpunaḥ
"'क्योंकि जैसे पाण्डव हमारे हैं, वैसे ही राजा दुर्योधन भी है। उसकी भी सहायता की जाए; वह बार-बार हमारे पास आता है।'
श्लोक 30 (5.157.30)
तच्च मे नाकरोद्वाक्यं त्वदर्थे मधुसूदनः । निर्विष्टः सर्वभावेन धनञ्जयमवेक्ष्य ह ॥
tacca me nākarodvākyaṃ tvadarthe madhusūdanaḥ | nirviṣṭaḥ sarvabhāvena dhanañjayamavekṣya ha
"परन्तु तुम्हारे कारण मधुसूदन ने मेरी बात नहीं मानी; धनंजय की ओर देखकर वे सम्पूर्ण भाव से तुम्हारे पक्ष में लगे हुए हैं।
श्लोक 31 (5.157.31)
ध्रुवो जयः पाण्डवानामिति मे निश्चिता मतिः । तथा ह्यभिनिवेशोऽयं वासुदेवस्य भारत ॥
dhruvo jayaḥ pāṇḍavānāmiti me niścitā matiḥ | tathā hyabhiniveśo'yaṃ vāsudevasya bhārata
"हे भारत, मेरा निश्चित मत है कि पाण्डवों की विजय ध्रुव है, क्योंकि वासुदेव का ऐसा ही आग्रह है।
श्लोक 32 (5.157.32)
न चाहमुत्सहे कृष्णमृते लोकमुदीक्षितुम् । ततोऽहमनुवर्तामि केशवस्य चिकीर्षितम् ॥
na cāhamutsahe kṛṣṇamṛte lokamudīkṣitum | tato'hamanuvartāmi keśavasya cikīrṣitam
"और मैं कृष्ण के बिना संसार की ओर देख भी नहीं सकता; इसलिए मैं केशव की इच्छा का अनुसरण करता हूँ।
श्लोक 33 (5.157.33)
उभौ शिष्यौ हि मे वीरौ गदायुद्धविशारदौ । तुल्यस्नेहोऽस्म्यतो भीमे तथा दुर्योधने नृपे ॥
ubhau śiṣyau hi me vīrau gadāyuddhaviśāradau | tulyasneho'smyato bhīme tathā duryodhane nṛpe
"ये दोनों वीर, जो गदायुद्ध में निपुण हैं, मेरे शिष्य हैं; इसलिए भीम और राजा दुर्योधन दोनों के प्रति मेरा समान स्नेह है।
श्लोक 34 (5.157.34)
तस्माद्यास्यामि तीर्थानि सरस्वत्या निषेवितुम् । न हि शक्ष्यामि कौरव्यान्नश्यमानानवेक्षितुम् ॥
tasmādyāsyāmi tīrthāni sarasvatyā niṣevitum | na hi śakṣyāmi kauravyānnaśyamānānavekṣitum
"इसलिए मैं सरस्वती के तीर्थों का सेवन करने जाऊँगा; क्योंकि मैं कौरवों को नष्ट होते हुए नहीं देख सकूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 35 (5.157.35)
एवमुक्त्वा महाबाहुरनुज्ञातश्च पाण्डवैः । तीर्थयात्रां ययौ रामो निवर्त्य मधुसूदनम् ॥
evamuktvā mahābāhuranujñātaśca pāṇḍavaiḥ | tīrthayātrāṃ yayau rāmo nivartya madhusūdanam
ऐसा कहकर महाबाहु बलराम पाण्डवों से अनुमति लेकर और मधुसूदन को लौटाकर तीर्थयात्रा पर चले गए।