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उद्योग पर्व · अध्याय 158

रुक्मी का सहायता-प्रस्ताव और उसका अस्वीकार

भोजराज भीष्मक का पुत्र रुक्मी, जिसके पास इन्द्र का विजय धनुष है, एक अक्षौहिणी सेना लेकर पाण्डवों के शिविर में आता है। प्रसंग में तीन दिव्य धनुषों का वर्णन है, और यह भी कि रुक्मिणी-हरण के बाद श्रीकृष्ण से पराजित होकर रुक्मी ने भोजकट नगर बसाया था। रुक्मी अर्जुन से कहता है कि "यदि तुम डरे हुए हो" तो वह उनके लिए लड़ेगा; अर्जुन बिना किसी सहायक के जीते गए अपने युद्धों को याद करके हँसते हुए मना कर देते हैं। दुर्योधन भी उसे लौटा देता है, और बलराम की तरह रुक्मी भी युद्ध से अलग रहता है; पाण्डव फिर मन्त्रणा में लग जाते हैं।

अध्याय 157अध्याय-सूचीअध्याय 159

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.158.1)

एतस्मिन्नेव काले तु भीष्मकस्य महात्मनः । हिरण्यरोम्णो नृपतेः साक्षादिन्द्रसखस्य वै ॥

etasminneva kāle tu bhīṣmakasya mahātmanaḥ | hiraṇyaromṇo nṛpateḥ sākṣādindrasakhasya vai

उसी समय महात्मा भीष्मक का पुत्र — वे राजा हिरण्यरोमा, जो साक्षात् इन्द्र के मित्र थे —

श्लोक 2 (5.158.2)

आकूतीनामधिपतिर्भोजस्यातियशस्विनः । दाक्षिणात्यपतेः पुत्रो दिक्षु रुक्मीति विश्रुतः ॥

ākūtīnāmadhipatirbhojasyātiyaśasvinaḥ | dākṣiṇātyapateḥ putro dikṣu rukmīti viśrutaḥ

दक्षिण देश के स्वामी, अत्यन्त यशस्वी भोजराज का वह पुत्र, जो अपने संकल्पों का स्वामी था और सब दिशाओं में रुक्मी नाम से विख्यात था;

श्लोक 3 (5.158.3)

यः किंपुरुषसिंहस्य गन्धमादनवासिनः । कृत्स्नं शिष्यो धनुर्वेदं चतुष्पादमवाप्तवान् ॥

yaḥ kiṃpuruṣasiṃhasya gandhamādanavāsinaḥ | kṛtsnaṃ śiṣyo dhanurvedaṃ catuṣpādamavāptavān

जिसने गन्धमादन पर्वत पर रहने वाले किम्पुरुषों में सिंह-समान (द्रुम) का शिष्य बनकर चारों अंगों सहित सम्पूर्ण धनुर्वेद प्राप्त किया था;

श्लोक 4 (5.158.4)

यो माहेन्द्रं धनुर्लेभे तुल्यं गाण्डीवतेजसा । शार्ङ्गेण च महाबाहुः संमितं दिव्यलक्षणम् ॥

yo māhendraṃ dhanurlebhe tulyaṃ gāṇḍīvatejasā | śārṅgeṇa ca mahābāhuḥ saṃmitaṃ divyalakṣaṇam

और जिस महाबाहु ने इन्द्र का धनुष पाया था, जो तेज में गाण्डीव के समान और शार्ङ्ग के बराबर था तथा दिव्य लक्षणों से युक्त था।

श्लोक 5 (5.158.5)

त्रीण्येवैतानि दिव्यानि धनूंषि दिविचारिणाम् । वारुणं गाण्डिवं तत्र माहेन्द्रं विजयं धनुः । शार्ङ्गं तु वैष्णवं प्राहुर्दिव्यं तेजोमयं धनुः ॥

trīṇyevaitāni divyāni dhanūṃṣi divicāriṇām | vāruṇaṃ gāṇḍivaṃ tatra māhendraṃ vijayaṃ dhanuḥ | śārṅgaṃ tu vaiṣṇavaṃ prāhurdivyaṃ tejomayaṃ dhanuḥ

स्वर्ग में विचरने वालों के ये तीन ही दिव्य धनुष हैं — वरुण का गाण्डीव, इन्द्र का विजय नामक धनुष, और शार्ङ्ग, जिसे विष्णु का कहा जाता है; वह तेजोमय दिव्य धनुष है।

श्लोक 6 (5.158.6)

धारयामास तत्कृष्णः परसेनाभयावहम् । गाण्डीवं पावकाल्लेभे खाण्डवे पाकशासनिः ॥

dhārayāmāsa tatkṛṣṇaḥ parasenābhayāvaham | gāṇḍīvaṃ pāvakāllebhe khāṇḍave pākaśāsaniḥ

शत्रु-सेनाओं को भय देने वाले उस धनुष को श्रीकृष्ण धारण करते थे। इन्द्रपुत्र अर्जुन ने खाण्डव वन में अग्निदेव से गाण्डीव पाया था।

श्लोक 7 (5.158.7)

द्रुमाद्रुक्मी महातेजा विजयं प्रत्यपद्यत । संछिद्य मौरवान्पाशान्निहत्य मुरमोजसा ॥

drumādrukmī mahātejā vijayaṃ pratyapadyata | saṃchidya mauravānpāśānnihatya muramojasā

महातेजस्वी रुक्मी ने द्रुम से विजय धनुष प्राप्त किया। मुर के पाशों को काटकर और अपने पराक्रम से मुर को मारकर,

श्लोक 8 (5.158.8)

निर्जित्य नरकं भौममाहृत्य मणिकुण्डले । षोडश स्त्रीसहस्राणि रत्नानि विविधानि च ॥

nirjitya narakaṃ bhaumamāhṛtya maṇikuṇḍale | ṣoḍaśa strīsahasrāṇi ratnāni vividhāni ca

भूमिपुत्र नरकासुर को जीतकर और मणिमय कुण्डलों के साथ सोलह हज़ार स्त्रियों तथा अनेक प्रकार के रत्नों को लाकर,

श्लोक 9 (5.158.9)

प्रतिपेदे हृषीकेशः शार्ङ्गं च धनुरुत्तमम् । रुक्मी तु विजयं लब्ध्वा धनुर्मेघनिभस्वनम् ॥

pratipede hṛṣīkeśaḥ śārṅgaṃ ca dhanuruttamam | rukmī tu vijayaṃ labdhvā dhanurmeghanibhasvanam

हृषीकेश श्रीकृष्ण ने उत्तम शार्ङ्ग धनुष प्राप्त किया। और रुक्मी मेघ के समान गर्जना करने वाला विजय धनुष पाकर

श्लोक 10 (5.158.10)

विभीषयन्निव जगत्पाण्डवानभ्यवर्तत । नामृष्यत पुरा योऽसौ स्वबाहुबलगर्वितः ॥

vibhīṣayanniva jagatpāṇḍavānabhyavartata | nāmṛṣyata purā yo'sau svabāhubalagarvitaḥ

मानो संसार को भयभीत करता हुआ पाण्डवों के पास आया। यह वही था जिसने अपनी भुजाओं के बल के गर्व में पहले सहन नहीं किया था

श्लोक 11 (5.158.11)

रुक्मिण्या हरणं वीरो वासुदेवेन धीमता । कृत्वा प्रतिज्ञां नाहत्वा निवर्तिष्ये जनार्दनम् ॥

rukmiṇyā haraṇaṃ vīro vāsudevena dhīmatā | kṛtvā pratijñāṃ nāhatvā nivartiṣye janārdanam

बुद्धिमान वासुदेव द्वारा रुक्मिणी का हरण। उस वीर ने प्रतिज्ञा की थी — "जनार्दन को मारे बिना मैं नहीं लौटूँगा।"

श्लोक 12 (5.158.12)

ततोऽन्वधावद्वार्ष्णेयं सर्वशस्त्रभृतां वरः । सेनया चतुरङ्गिण्या महत्या दूरपातया ॥

tato'nvadhāvadvārṣṇeyaṃ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | senayā caturaṅgiṇyā mahatyā dūrapātayā

तब समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ वह रुक्मी दूर तक प्रहार करने वाली विशाल चतुरंगिणी सेना लेकर वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण के पीछे दौड़ा,

श्लोक 13 (5.158.13)

विचित्रायुधवर्मिण्या गङ्गयेव प्रवृद्धया । स समासाद्य वार्ष्णेयं योगानामीश्वरं प्रभुम् ॥

vicitrāyudhavarmiṇyā gaṅgayeva pravṛddhayā | sa samāsādya vārṣṇeyaṃ yogānāmīśvaraṃ prabhum

जो विचित्र आयुधों और कवचों से सजी थी और बाढ़ में उमड़ी गंगा के समान थी। पर योगेश्वर, सर्वसमर्थ वृष्णिवीर के सामने पहुँचकर

श्लोक 14 (5.158.14)

व्यंसितो व्रीडितो राजन्नाजगाम स कुण्डिनम् । यत्रैव कृष्णेन रणे निर्जितः परवीरहा ॥

vyaṃsito vrīḍito rājannājagāma sa kuṇḍinam | yatraiva kṛṣṇena raṇe nirjitaḥ paravīrahā

वह विफल और लज्जित हुआ, हे राजन्, और कुण्डिनपुर नहीं लौटा। जिस स्थान पर श्रीकृष्ण ने शत्रुवीरों के संहारक उस रुक्मी को युद्ध में पराजित किया था,

श्लोक 15 (5.158.15)

तत्र भोजकटं नाम कृतं नगरमुत्तमम् । सैन्येन महता तेन प्रभूतगजवाजिना ॥

tatra bhojakaṭaṃ nāma kṛtaṃ nagaramuttamam | sainyena mahatā tena prabhūtagajavājinā

वहीं भोजकट नाम का उत्तम नगर बसाया गया। हाथियों और घोड़ों से भरी उस विशाल सेना के कारण

श्लोक 16 (5.158.16)

पुरं तद्भुवि विख्यातं नाम्ना भोजकटं नृप । स भोजराजः सैन्येन महता परिवारितः ॥

puraṃ tadbhuvi vikhyātaṃ nāmnā bhojakaṭaṃ nṛpa | sa bhojarājaḥ sainyena mahatā parivāritaḥ

वह नगर पृथ्वी पर भोजकट नाम से प्रसिद्ध हुआ, हे नरेश। वह भोजराज विशाल सेना से घिरा हुआ,

श्लोक 17 (5.158.17)

अक्षौहिण्या महावीर्यः पाण्डवान्क्षिप्रमागमत् । ततः स कवची धन्वी तली खड्गी शरासनी ॥

akṣauhiṇyā mahāvīryaḥ pāṇḍavānkṣipramāgamat | tataḥ sa kavacī dhanvī talī khaḍgī śarāsanī

एक अक्षौहिणी सेना के साथ, वह महापराक्रमी शीघ्र ही पाण्डवों के पास आ पहुँचा। फिर कवच पहने, धनुर्धर, हस्तत्राण बाँधे, खड्ग और धनुष लिए,

श्लोक 18 (5.158.18)

रथेनादित्यवर्णेन प्रविवेश महाचमूम् । विदितः पाण्डवेयानां वासुदेवप्रियेप्सया ॥

rathenādityavarṇena praviveśa mahācamūm | viditaḥ pāṇḍaveyānāṃ vāsudevapriyepsayā

वह सूर्य के समान चमकते रथ पर सवार होकर उस विशाल सेना में प्रविष्ट हुआ। वासुदेव का प्रिय करने की इच्छा से उसने पाण्डवों को अपने आगमन की सूचना दी।

श्लोक 19 (5.158.19)

युधिष्ठिरस्तु तं राजा प्रत्युद्गम्याभ्यपूजयत् । स पूजितः पाण्डुपुत्रैर्यथान्यायं सुसंस्तुतः ॥

yudhiṣṭhirastu taṃ rājā pratyudgamyābhyapūjayat | sa pūjitaḥ pāṇḍuputrairyathānyāyaṃ susaṃstutaḥ

राजा युधिष्ठिर ने आगे बढ़कर उसका स्वागत और सत्कार किया। पाण्डुपुत्रों से यथोचित सम्मान और प्रशंसा पाकर

श्लोक 20 (5.158.20)

प्रतिगृह्य तु तान्सर्वान्विश्रान्तः सहसैनिकः । उवाच मध्ये वीराणां कुन्तीपुत्रं धनञ्जयम् ॥

pratigṛhya tu tānsarvānviśrāntaḥ sahasainikaḥ | uvāca madhye vīrāṇāṃ kuntīputraṃ dhanañjayam

उसने भी सबका प्रतिसत्कार किया और अपने सैनिकों सहित विश्राम करके वीरों के बीच कुन्तीपुत्र धनञ्जय से कहा —

रुक्म्युवाच

श्लोक 21 (5.158.21)

सहायोऽस्मि स्थितो युद्धे यदि भीतोऽसि पाण्डव । करिष्यामि रणे साह्यमसह्यं तव शत्रुभिः ॥

sahāyo'smi sthito yuddhe yadi bhīto'si pāṇḍava | kariṣyāmi raṇe sāhyamasahyaṃ tava śatrubhiḥ

"हे पाण्डुनन्दन, यदि तुम डरे हुए हो, तो मैं युद्ध में तुम्हारा सहायक बनकर खड़ा हूँ। रणभूमि में मैं तुम्हारी ऐसी सहायता करूँगा जिसे तुम्हारे शत्रु सह नहीं सकेंगे।

श्लोक 22 (5.158.22)

न हि मे विक्रमे तुल्यः पुमानस्तीह कश्चन । हनिष्यामि रणे भागं यन्मे दास्यसि पाण्डव ॥

na hi me vikrame tulyaḥ pumānastīha kaścana | haniṣyāmi raṇe bhāgaṃ yanme dāsyasi pāṇḍava

पराक्रम में मेरे समान यहाँ कोई पुरुष नहीं है। हे पाण्डव, युद्ध में तुम शत्रुओं का जो भाग मुझे सौंपोगे, उसे मैं मार डालूँगा —

श्लोक 23 (5.158.23)

अपि द्रोणकृपौ वीरौ भीष्मकर्णावथो पुनः । अथवा सर्व एवैते तिष्ठन्तु वसुधाधिपाः ॥

api droṇakṛpau vīrau bhīṣmakarṇāvatho punaḥ | athavā sarva evaite tiṣṭhantu vasudhādhipāḥ

चाहे वे वीर द्रोण और कृप हों, या फिर भीष्म और कर्ण। अथवा ये सब राजा अलग खड़े रहें —

श्लोक 24 (5.158.24)

निहत्य समरे शत्रूंस्तव दास्यामि मेदिनीम् ॥

nihatya samare śatrūṃstava dāsyāmi medinīm

मैं युद्ध में तुम्हारे शत्रुओं को मारकर तुम्हें पृथ्वी दे दूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (5.158.25)

इत्युक्तो धर्मराजस्य केशवस्य च संनिधौ ॥

ityukto dharmarājasya keśavasya ca saṃnidhau

धर्मराज और केशव की उपस्थिति में इस प्रकार कहे जाने पर,

श्लोक 26 (5.158.26)

शृण्वतां पार्थिवेन्द्राणामन्येषां चैव सर्वशः । वासुदेवमभिप्रेक्ष्य धर्मराजं च पाण्डवम् । उवाच धीमान्कौन्तेयः प्रहस्य सखिपूर्वकम् ॥

śṛṇvatāṃ pārthivendrāṇāmanyeṣāṃ caiva sarvaśaḥ | vāsudevamabhiprekṣya dharmarājaṃ ca pāṇḍavam | uvāca dhīmānkaunteyaḥ prahasya sakhipūrvakam

जब बड़े-बड़े राजा और अन्य सब लोग सुन रहे थे, तब बुद्धिमान कुन्तीपुत्र अर्जुन ने वासुदेव और पाण्डुपुत्र धर्मराज की ओर देखा और हँसकर मित्रभाव से कहा —

अर्जुन उवाच

श्लोक 27 (5.158.27)

युध्यमानस्य मे वीर गन्धर्वैः सुमहाबलैः । सहायो घोषयात्रायां कस्तदासीत्सखा मम ॥

yudhyamānasya me vīra gandharvaiḥ sumahābalaiḥ | sahāyo ghoṣayātrāyāṃ kastadāsītsakhā mama

"हे वीर, घोषयात्रा के समय जब मैं महाबली गन्धर्वों से लड़ रहा था, तब कौन मित्र मेरा सहायक था?

श्लोक 28 (5.158.28)

तथा प्रतिभये तस्मिन्देवदानवसंकुले । खाण्डवे युध्यमानस्य कः सहायस्तदाभवत् ॥

tathā pratibhaye tasmindevadānavasaṃkule | khāṇḍave yudhyamānasya kaḥ sahāyastadābhavat

और देवताओं तथा दानवों से भरे उस भयानक खाण्डव-युद्ध में जब मैं लड़ रहा था, तब मेरा सहायक कौन था?

श्लोक 29 (5.158.29)

निवातकवचैर्युद्धे कालकेयैश्च दानवैः । तत्र मे युध्यमानस्य कः सहायस्तदाभवत् ॥

nivātakavacairyuddhe kālakeyaiśca dānavaiḥ | tatra me yudhyamānasya kaḥ sahāyastadābhavat

निवातकवचों और कालकेय दानवों से जब मैं युद्ध कर रहा था, तब वहाँ मेरा सहायक कौन था?

श्लोक 30 (5.158.30)

तथा विराटनगरे कुरुभिः सह सङ्गरे । युध्यतो बहुभिस्तत्र कः सहायोऽभवन्मम ॥

tathā virāṭanagare kurubhiḥ saha saṅgare | yudhyato bahubhistatra kaḥ sahāyo'bhavanmama

और विराटनगर में कौरवों के साथ हुए संग्राम में जब मैं वहाँ अनेक योद्धाओं से लड़ा, तब मेरा सहायक कौन था?

श्लोक 31 (5.158.31)

उपजीव्य रणे रुद्रं शक्रं वैश्रवणं यमम् । वरुणं पावकं चैव कृपं द्रोणं च माधवम् ॥

upajīvya raṇe rudraṃ śakraṃ vaiśravaṇaṃ yamam | varuṇaṃ pāvakaṃ caiva kṛpaṃ droṇaṃ ca mādhavam

मैंने युद्ध के लिए रुद्र, इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण और अग्नि की, तथा कृप, द्रोण और माधव की आराधना करके उनका आश्रय पाया है;

श्लोक 32 (5.158.32)

धारयन्गाण्डिवं दिव्यं धनुस्तेजोमयं दृढम् । अक्षय्यशरसंयुक्तो दिव्यास्त्रपरिबृंहितः ॥

dhārayangāṇḍivaṃ divyaṃ dhanustejomayaṃ dṛḍham | akṣayyaśarasaṃyukto divyāstraparibṛṃhitaḥ

मैं तेजोमय और दृढ़ दिव्य गाण्डीव धनुष धारण करता हूँ, अक्षय बाणों से युक्त हूँ और दिव्यास्त्रों से सम्पन्न हूँ;

श्लोक 33 (5.158.33)

कौरवाणां कुले जातः पाण्डोः पुत्रो विशेषतः । द्रोणं व्यपदिशञ्छिष्यो वासुदेवसहायवान् ॥

kauravāṇāṃ kule jātaḥ pāṇḍoḥ putro viśeṣataḥ | droṇaṃ vyapadiśañchiṣyo vāsudevasahāyavān

मैं कौरवों के कुल में जन्मा हूँ, और विशेष रूप से पाण्डु का पुत्र हूँ; द्रोण को अपना गुरु बताता हूँ और वासुदेव मेरे सहायक हैं।

श्लोक 34 (5.158.34)

कथमस्मद्विधो ब्रूयाद्भीतोऽस्मीति यशोहरम् । वचनं नरशार्दूल वज्रायुधसमस्वनम् ॥

kathamasmadvidho brūyādbhīto'smīti yaśoharam | vacanaṃ naraśārdūla vajrāyudhasamasvanam

हे नरश्रेष्ठ, मेरे जैसा व्यक्ति "मैं डरा हुआ हूँ" — यह यश का नाश करने वाला और वज्र की गर्जना के समान कठोर वचन कैसे कह सकता है?

श्लोक 35 (5.158.35)

नास्मि भीतो महाबाहो सहायार्थश्च नास्ति मे । यथाकामं यथायोगं गच्छ वात्रैव तिष्ठ वा ॥

nāsmi bhīto mahābāho sahāyārthaśca nāsti me | yathākāmaṃ yathāyogaṃ gaccha vātraiva tiṣṭha vā

हे महाबाहु, मैं डरा हुआ नहीं हूँ और मुझे किसी सहायक की आवश्यकता नहीं है। तुम्हारी जैसी इच्छा हो और जैसा उचित लगे, चले जाओ या यहीं रहो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 36 (5.158.36)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य विजयस्य च धीमतः । विनिवर्त्य ततो रुक्मी सेनां सागरसंनिभाम् । दुर्योधनमुपागच्छत्तथैव भरतर्षभ ॥

tacchrutvā vacanaṃ tasya vijayasya ca dhīmataḥ | vinivartya tato rukmī senāṃ sāgarasaṃnibhām | duryodhanamupāgacchattathaiva bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, बुद्धिमान विजय (अर्जुन) के ये वचन सुनकर रुक्मी अपनी समुद्र-सी विशाल सेना को लौटाकर उसी प्रकार दुर्योधन के पास गया।

श्लोक 37 (5.158.37)

तथैव चाभिगम्यैनमुवाच वसुधाधिपः । प्रत्याख्यातश्च तेनापि स तदा शूरमानिना ॥

tathaiva cābhigamyainamuvāca vasudhādhipaḥ | pratyākhyātaśca tenāpi sa tadā śūramāninā

उसके पास जाकर भी उस राजा ने वैसी ही बात कही, और अपने शौर्य पर गर्व करने वाले दुर्योधन ने भी उसे अस्वीकार कर दिया।

श्लोक 38 (5.158.38)

द्वावेव तु महाराज तस्माद्युद्धादपेयतुः । रौहिणेयश्च वार्ष्णेयो रुक्मी च वसुधाधिप ॥

dvāveva tu mahārāja tasmādyuddhādapeyatuḥ | rauhiṇeyaśca vārṣṇeyo rukmī ca vasudhādhipa

इस प्रकार, हे महाराज, उस युद्ध से केवल दो ही व्यक्ति अलग रहे — वृष्णिवंशी रोहिणीनन्दन बलराम और रुक्मी, हे पृथ्वीपति।

श्लोक 39 (5.158.39)

गते रामे तीर्थयात्रां भीष्मकस्य सुते तथा । उपाविशन्पाण्डवेया मन्त्राय पुनरेव च ॥

gate rāme tīrthayātrāṃ bhīṣmakasya sute tathā | upāviśanpāṇḍaveyā mantrāya punareva ca

जब बलराम तीर्थयात्रा पर चले गए और भीष्मक का पुत्र भी उसी प्रकार लौट गया, तब पाण्डव फिर से मन्त्रणा करने बैठे।

श्लोक 40 (5.158.40)

समितिर्धर्मराजस्य सा पार्थिवसमाकुला । शुशुभे तारकैश्चित्रा द्यौश्चन्द्रेणेव भारत ॥

samitirdharmarājasya sā pārthivasamākulā | śuśubhe tārakaiścitrā dyauścandreṇeva bhārata

हे भारत, राजाओं से भरी धर्मराज की वह सभा ऐसी शोभित हुई, जैसे तारों से चित्रित आकाश चन्द्रमा से शोभा पाता है।

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