उद्योग पर्व · अध्याय 159
धृतराष्ट्र का संजय से वृत्तान्त पूछना
जनमेजय पूछते हैं कि कुरुक्षेत्र में सेनाओं के व्यूह में खड़ी होने के बाद कौरवों ने क्या किया। धृतराष्ट्र संजय से सब कुछ बताने को कहते हैं और विलाप करते हैं कि भाग्य ही प्रबल है — वे युद्ध के दोष देखते हैं, फिर भी दुर्योधन को रोक नहीं पाते। संजय उनसे कहते हैं कि सारा दोष दुर्योधन पर न डालें, जुए में पाण्डवों द्वारा सहे गए अपमान याद दिलाते हैं, और आग्रह करते हैं कि वे स्थिर होकर संहार का वृत्तान्त सुनें, क्योंकि मनुष्य ईश्वर, संयोग या पूर्वकर्म से चलाई जाने वाली कठपुतली के समान है। इसी के साथ सैन्यनिर्याण पर्व समाप्त होता है।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (5.159.1)
तथा व्यूढेष्वनीकेषु कुरुक्षेत्रे द्विजर्षभ । किमकुर्वंश्च कुरवः कालेनाभिप्रचोदिताः ॥
tathā vyūḍheṣvanīkeṣu kurukṣetre dvijarṣabha | kimakurvaṃśca kuravaḥ kālenābhipracoditāḥ
हे द्विजश्रेष्ठ, जब कुरुक्षेत्र में इस प्रकार सेनाएँ व्यूह में खड़ी हो गईं, तब काल से प्रेरित कौरवों ने क्या किया?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (5.159.2)
तथा व्यूढेष्वनीकेषु यत्तेषु भरतर्षभ । धृतराष्ट्रो महाराज सञ्जयं वाक्यमब्रवीत् ॥
tathā vyūḍheṣvanīkeṣu yatteṣu bharatarṣabha | dhṛtarāṣṭro mahārāja sañjayaṃ vākyamabravīt
हे भरतश्रेष्ठ महाराज, जब सेनाएँ व्यूह में सजकर तैयार खड़ी थीं, तब धृतराष्ट्र ने संजय से यह कहा —
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 3 (5.159.3)
एहि सञ्जय सर्वं मे आचक्ष्वानवशेषतः । सेनानिवेशे यद्वृत्तं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥
ehi sañjaya sarvaṃ me ācakṣvānavaśeṣataḥ | senāniveśe yadvṛttaṃ kurupāṇḍavasenayoḥ
"आओ संजय, कौरव और पाण्डव सेनाओं के पड़ावों में जो कुछ हुआ है, वह सब मुझे बिना कुछ छोड़े बताओ।
श्लोक 4 (5.159.4)
दिष्टमेव परं मन्ये पौरुषं चाप्यनर्थकम् । यदहं बुद्ध्यमानोऽपि युद्धदोषान्क्षयोदयान् ॥
diṣṭameva paraṃ manye pauruṣaṃ cāpyanarthakam | yadahaṃ buddhyamāno'pi yuddhadoṣānkṣayodayān
मैं तो भाग्य को ही सबसे बड़ा मानता हूँ और पुरुषार्थ को व्यर्थ; क्योंकि विनाश को जन्म देने वाले युद्ध के दोषों को समझते हुए भी
श्लोक 5 (5.159.5)
तथापि निकृतिप्रज्ञं पुत्रं दुर्द्यूतदेविनम् । न शक्नोमि नियन्तुं वा कर्तुं वा हितमात्मनः ॥
tathāpi nikṛtiprajñaṃ putraṃ durdyūtadevinam | na śaknomi niyantuṃ vā kartuṃ vā hitamātmanaḥ
मैं अपने उस पुत्र को, जिसकी बुद्धि केवल छल-कपट में चलती है और जो कपट का जुआ खेलता है, न रोक पाता हूँ और न अपना हित ही कर पाता हूँ।
श्लोक 6 (5.159.6)
भवत्येव हि मे सूत बुद्धिर्दोषानुदर्शिनी । दुर्योधनं समासाद्य पुनः सा परिवर्तते ॥
bhavatyeva hi me sūta buddhirdoṣānudarśinī | duryodhanaṃ samāsādya punaḥ sā parivartate
हे सूत, मेरी बुद्धि दोषों को देखती तो है, पर दुर्योधन के पास पहुँचते ही वह फिर बदल जाती है।
श्लोक 7 (5.159.7)
एवं गते वै यद्भावि तद्भविष्यति सञ्जय । क्षत्रधर्मः किल रणे तनुत्यागे हि पूजितः ॥
evaṃ gate vai yadbhāvi tadbhaviṣyati sañjaya | kṣatradharmaḥ kila raṇe tanutyāge hi pūjitaḥ
संजय, अब ऐसी स्थिति में जो होना है, वही होगा। कहते हैं कि युद्ध में शरीर त्यागना ही क्षत्रिय-धर्म में सम्मानित माना गया है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 8 (5.159.8)
त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो महाराज यथेच्छसि । न तु दुर्योधने दोषमिममाधातुमर्हसि ॥
tvadyukto'yamanupraśno mahārāja yathecchasi | na tu duryodhane doṣamimamādhātumarhasi
"हे महाराज, आपका यह प्रश्न आपके योग्य है और आप जैसा चाहें पूछें; परन्तु यह दोष आपको दुर्योधन पर नहीं डालना चाहिए।
श्लोक 9 (5.159.9)
शृणुष्वानवशेषेण वदतो मम पार्थिव । य आत्मनो दुश्चरितादशुभं प्राप्नुयान्नरः । न स कालं न वा देवानेनसा गन्तुमर्हति ॥
śṛṇuṣvānavaśeṣeṇa vadato mama pārthiva | ya ātmano duścaritādaśubhaṃ prāpnuyānnaraḥ | na sa kālaṃ na vā devānenasā gantumarhati
हे राजन्, मैं जो कहता हूँ उसे पूरा सुनिए। जो मनुष्य अपने ही दुराचार से अनिष्ट पाता है, वह अपने पाप का दोष काल या देवताओं पर नहीं डाल सकता।
श्लोक 10 (5.159.10)
महाराज मनुष्येषु निन्द्यं यः सर्वमाचरेत् । स वध्यः सर्वलोकस्य निन्दितानि समाचरन् ॥
mahārāja manuṣyeṣu nindyaṃ yaḥ sarvamācaret | sa vadhyaḥ sarvalokasya ninditāni samācaran
महाराज, जो मनुष्य लोगों में निन्दनीय सब कर्म करता है, वह निन्दित आचरण करने के कारण सारे संसार द्वारा वध के योग्य होता है।
श्लोक 11 (5.159.11)
निकारा मनुजश्रेष्ठ पाण्डवैस्त्वत्प्रतीक्षया । अनुभूताः सहामात्यैर्निकृतैरधिदेवने ॥
nikārā manujaśreṣṭha pāṇḍavaistvatpratīkṣayā | anubhūtāḥ sahāmātyairnikṛtairadhidevane
हे मनुष्यों में श्रेष्ठ, आपकी ओर देखकर ही पाण्डवों ने अपने मन्त्रियों सहित जुए में छले जाने पर अपमान सहे।
श्लोक 12 (5.159.12)
हयानां च गजानां च राज्ञां चामिततेजसाम् । वैशसं समरे वृत्तं यत्तन्मे शृणु सर्वशः ॥
hayānāṃ ca gajānāṃ ca rājñāṃ cāmitatejasām | vaiśasaṃ samare vṛttaṃ yattanme śṛṇu sarvaśaḥ
युद्ध में घोड़ों, हाथियों और अपार तेजस्वी राजाओं का जो संहार हुआ, वह सब मुझसे पूरा सुनिए।
श्लोक 13 (5.159.13)
स्थिरो भूत्वा महाप्राज्ञ सर्वलोकक्षयोदयम् । यथाभूतं महायुद्धे श्रुत्वा मा विमना भव ॥
sthiro bhūtvā mahāprājña sarvalokakṣayodayam | yathābhūtaṃ mahāyuddhe śrutvā mā vimanā bhava
हे महाप्राज्ञ, स्थिर होकर उस महायुद्ध में सारे जगत् के विनाश का यथार्थ वृत्तान्त सुनिए, और सुनकर मन उदास न कीजिए।
श्लोक 14 (5.159.14)
न ह्येव कर्ता पुरुषः कर्मणोः शुभपापयोः । अस्वतन्त्रो हि पुरुषः कार्यते दारुयन्त्रवत् ॥
na hyeva kartā puruṣaḥ karmaṇoḥ śubhapāpayoḥ | asvatantro hi puruṣaḥ kāryate dāruyantravat
क्योंकि मनुष्य अपने शुभ और पाप कर्मों का कर्ता नहीं है। वह स्वतन्त्र नहीं है; कठपुतली की तरह उससे कर्म कराए जाते हैं।
श्लोक 15 (5.159.15)
केचिदीश्वरनिर्दिष्टाः केचिदेव यदृच्छया । पूर्वकर्मभिरप्यन्ये त्रैधमेतत्प्रदृश्यते । तस्मादनर्थमापन्नः स्थिरो भूत्वा निशामय ॥
kecidīśvaranirdiṣṭāḥ kecideva yadṛcchayā | pūrvakarmabhirapyanye traidhametatpradṛśyate | tasmādanarthamāpannaḥ sthiro bhūtvā niśāmaya
कुछ लोग ईश्वर की प्रेरणा से कर्म करते हैं, कुछ संयोगवश, और कुछ अपने पूर्वकर्मों से — इस प्रकार यह तीन प्रकार का दिखाई देता है। इसलिए विपत्ति आ पड़ने पर स्थिर होकर सुनिए।"