उद्योग पर्व · अध्याय 160
उलूक द्वारा दुर्योधन के व्यंग्य-सन्देश: बिल्ली का व्रत
दोनों सेनाओं के हिरण्वती के पास पड़ाव डाल लेने पर दुर्योधन कर्ण, शकुनि और दुःशासन से मन्त्रणा करता है और फिर शकुनि के पुत्र उलूक को व्यंग्य-भरे सन्देश के साथ पाण्डवों के पास भेजता है। वह युधिष्ठिर पर दिखावटी धर्म के "बैडाल-व्रत" का आरोप लगाता है और इसके लिए उस कपटी बिल्ले की कथा सुनाता है जो चूहों का विश्वास जीतकर उन्हें खाता रहा, जब तक एक बूढ़े चूहे ने उसका भेद नहीं खोल दिया। फिर वह बारी-बारी से कृष्ण, भीम, नकुल, सहदेव, विराट, द्रुपद, धृष्टद्युम्न और शिखण्डी का उपहास करता है, और अन्त में अर्जुन को कौरव-सेना रूपी समुद्र को पार करने की चुनौती देता है। इसी अध्याय से उलूकदूतागमन पर्व आरम्भ होता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (5.160.1)
हिरण्वत्यां निविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु । न्यविशन्त महाराज कौरवेया यथाविधि ॥
hiraṇvatyāṃ niviṣṭeṣu pāṇḍaveṣu mahātmasu | nyaviśanta mahārāja kauraveyā yathāvidhi
हे महाराज, जब महात्मा पाण्डव हिरण्वती के तट पर पड़ाव डाल चुके, तब कौरवों ने भी विधिपूर्वक अपना पड़ाव डाला।
श्लोक 2 (5.160.2)
तत्र दुर्योधनो राजा निवेश्य बलमोजसा । संमानयित्वा नृपतीन्न्यस्य गुल्मांस्तथैव च ॥
tatra duryodhano rājā niveśya balamojasā | saṃmānayitvā nṛpatīnnyasya gulmāṃstathaiva ca
वहाँ राजा दुर्योधन ने उत्साह के साथ अपनी सेना को ठहराया, राजाओं का सम्मान किया और सैनिक चौकियाँ भी नियुक्त कीं;
श्लोक 3 (5.160.3)
आरक्षस्य विधिं कृत्वा योधानां तत्र भारत । कर्णं दुःशासनं चैव शकुनिं चापि सौबलम् ॥
ārakṣasya vidhiṃ kṛtvā yodhānāṃ tatra bhārata | karṇaṃ duḥśāsanaṃ caiva śakuniṃ cāpi saubalam
हे भारत, वहाँ योद्धाओं की रक्षा का प्रबन्ध करके उसने कर्ण, दुःशासन और सुबलपुत्र शकुनि को
श्लोक 4 (5.160.4)
आनाय्य नृपतिस्तत्र मन्त्रयामास भारत । तत्र दुर्योधनो राजा कर्णेन सह भारत ॥
ānāyya nṛpatistatra mantrayāmāsa bhārata | tatra duryodhano rājā karṇena saha bhārata
बुलवाया और वहाँ उनके साथ मन्त्रणा की। हे भारत, वहाँ राजा दुर्योधन ने कर्ण
श्लोक 5 (5.160.5)
सौबलेन च राजेन्द्र मन्त्रयित्वा नरर्षभ । आहूयोपह्वरे राजन्नुलूकमिदमब्रवीत् ॥
saubalena ca rājendra mantrayitvā nararṣabha | āhūyopahvare rājannulūkamidamabravīt
और सुबलपुत्र के साथ विचार करके, हे राजेन्द्र, हे नरश्रेष्ठ, उलूक को एकान्त में बुलाया और उससे यह कहा —
दुर्योधन उवाच
श्लोक 6 (5.160.6)
उलूक गच्छ कैतव्य पाण्डवान्सहसोमकान् । गत्वा मम वचो ब्रूहि वासुदेवस्य शृण्वतः ॥
ulūka gaccha kaitavya pāṇḍavānsahasomakān | gatvā mama vaco brūhi vāsudevasya śṛṇvataḥ
"हे उलूक, हे कितवपुत्र, तुम सोमकों सहित पाण्डवों के पास जाओ और वहाँ पहुँचकर वासुदेव के सुनते हुए मेरी यह बात कहो —
श्लोक 7 (5.160.7)
इदं तत्समनुप्राप्तं वर्षपूगाभिचिन्तितम् । पाण्डवानां कुरूणां च युद्धं लोकभयङ्करम् ॥
idaṃ tatsamanuprāptaṃ varṣapūgābhicintitam | pāṇḍavānāṃ kurūṇāṃ ca yuddhaṃ lokabhayaṅkaram
'पाण्डवों और कौरवों का वह युद्ध, जिससे संसार भयभीत है और जिसका विचार वर्षों से होता आ रहा था, अब आ पहुँचा है।
श्लोक 8 (5.160.8)
यदेतत्कत्थनावाक्यं सञ्जयो महदब्रवीत् । वासुदेवसहायस्य गर्जतः सानुजस्य ते ॥
yadetatkatthanāvākyaṃ sañjayo mahadabravīt | vāsudevasahāyasya garjataḥ sānujasya te
हे कुन्तीपुत्र, वासुदेव को सहायक बनाकर अपने छोटे भाइयों के साथ गरजते हुए तुमने जो बड़ी-बड़ी डींग भरी बातें कही थीं और जिन्हें संजय ने
श्लोक 9 (5.160.9)
मध्ये कुरूणां कौन्तेय तस्य कालोऽयमागतः । यथावत्संप्रतिज्ञातं तत्सर्वं क्रियतामिति ॥
madhye kurūṇāṃ kaunteya tasya kālo'yamāgataḥ | yathāvatsaṃpratijñātaṃ tatsarvaṃ kriyatāmiti
कौरवों के बीच सुनाया था, उनका समय अब आ गया है। तुमने जो-जो प्रतिज्ञा की थी, वह सब अब पूरी करो।'
श्लोक 10 (5.160.10)
ज्येष्ठं तथैव कौन्तेयं ब्रूयास्त्वं वचनान्मम ॥
jyeṣṭhaṃ tathaiva kaunteyaṃ brūyāstvaṃ vacanānmama
इसी प्रकार कुन्ती के ज्येष्ठ पुत्र से भी मेरी ओर से कहना —
श्लोक 11 (5.160.11)
भ्रातृभिः सहितः सर्वैः सोमकैश्च सकेकयैः । कथं वा धार्मिको भूत्वा त्वमधर्मे मनः कृथाः । य इच्छसि जगत्सर्वं नश्यमानं नृशंसवत् ॥
bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvaiḥ somakaiśca sakekayaiḥ | kathaṃ vā dhārmiko bhūtvā tvamadharme manaḥ kṛthāḥ | ya icchasi jagatsarvaṃ naśyamānaṃ nṛśaṃsavat
'तुम्हारे साथ तुम्हारे सब भाई, सोमक और केकय हैं — फिर धर्मात्मा होकर भी तुमने अधर्म में मन कैसे लगाया, जो एक क्रूर मनुष्य की भाँति सारे जगत् का नाश चाहते हो?
श्लोक 12 (5.160.12)
अभयं सर्वभूतेभ्यो दाता त्वमिति मे मतिः ॥
abhayaṃ sarvabhūtebhyo dātā tvamiti me matiḥ
मेरा तो विचार था कि तुम सब प्राणियों को अभय देने वाले हो।
श्लोक 13 (5.160.13)
श्रूयते हि पुरा गीतः श्लोकोऽयं भरतर्षभ । प्रह्लादेनाथ भद्रं ते हृते राज्ये तु दैवतैः ॥
śrūyate hi purā gītaḥ śloko'yaṃ bharatarṣabha | prahlādenātha bhadraṃ te hṛte rājye tu daivataiḥ
हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हारा कल्याण हो — सुना जाता है कि प्राचीन काल में देवताओं द्वारा राज्य छीन लिए जाने पर प्रह्लाद ने यह श्लोक गाया था —
श्लोक 14 (5.160.14)
यस्य धर्मध्वजो नित्यं सुरा ध्वज इवोच्छ्रितः । प्रच्छन्नानि च पापानि बैडालं नाम तद्व्रतम् ॥
yasya dharmadhvajo nityaṃ surā dhvaja ivocchritaḥ | pracchannāni ca pāpāni baiḍālaṃ nāma tadvratam
हे देवताओ, जिसकी धर्म की ध्वजा सदा झण्डे की तरह ऊँची फहराती रहे और जिसके पाप छिपे रहें, उसका वह व्रत "बैडाल-व्रत" (बिल्ली का व्रत) कहलाता है।
श्लोक 15 (5.160.15)
अत्र ते वर्तयिष्यामि आख्यानमिदमुत्तमम् । कथितं नारदेनेह पितुर्मम नराधिप ॥
atra te vartayiṣyāmi ākhyānamidamuttamam | kathitaṃ nāradeneha piturmama narādhipa
हे नरेश, इस विषय में मैं तुम्हें यह उत्तम आख्यान सुनाता हूँ, जो नारद ने मेरे पिता को सुनाया था।
श्लोक 16 (5.160.16)
मार्जारः किल दुष्टात्मा निश्चेष्टः सर्वकर्मसु । ऊर्ध्वबाहुः स्थितो राजन् गङ्गातीरे कदाचन ॥
mārjāraḥ kila duṣṭātmā niśceṣṭaḥ sarvakarmasu | ūrdhvabāhuḥ sthito rājan gaṅgātīre kadācana
हे राजन्, कहते हैं कि एक बार एक दुष्टात्मा बिल्ला सब कर्म छोड़कर, भुजाएँ ऊपर उठाए, गङ्गा के तट पर खड़ा हो गया।
श्लोक 17 (5.160.17)
स वै कृत्वा मनःशुद्धिं प्रत्ययार्थं शरीरिणाम् । करोमि धर्ममित्याह सर्वानेव शरीरिणः ॥
sa vai kṛtvā manaḥśuddhiṃ pratyayārthaṃ śarīriṇām | karomi dharmamityāha sarvāneva śarīriṇaḥ
प्राणियों का विश्वास पाने के लिए उसने अपने मन को शुद्ध (हिंसा से विरत) कर लिया और सब प्राणियों से कहा — "मैं धर्म का आचरण कर रहा हूँ।"
श्लोक 18 (5.160.18)
तस्य कालेन महता विस्रम्भं जग्मुरण्डजाः । समेत्य च प्रशंसन्ति मार्जारं तं विशांपते ॥
tasya kālena mahatā visrambhaṃ jagmuraṇḍajāḥ | sametya ca praśaṃsanti mārjāraṃ taṃ viśāṃpate
हे प्रजानाथ, बहुत समय बीतने पर पक्षी उस पर विश्वास करने लगे और इकट्ठे होकर उस बिल्ले की प्रशंसा करने लगे।
श्लोक 19 (5.160.19)
पूज्यमानस्तु तैः सर्वैः पक्षिभिः पक्षिभोजनः । आत्मकार्यं कृतं मेने चर्यायाश्च कृतं फलम् ॥
pūjyamānastu taiḥ sarvaiḥ pakṣibhiḥ pakṣibhojanaḥ | ātmakāryaṃ kṛtaṃ mene caryāyāśca kṛtaṃ phalam
उन सब पक्षियों से सम्मान पाकर उस पक्षीभक्षी ने समझा कि उसका अपना काम बन गया है और उसके आचरण का फल मिल गया है।
श्लोक 20 (5.160.20)
अथ दीर्घस्य कालस्य तं देशं मूषिका ययुः । ददृशुस्तं च ते तत्र धार्मिकं व्रतचारिणम् ॥
atha dīrghasya kālasya taṃ deśaṃ mūṣikā yayuḥ | dadṛśustaṃ ca te tatra dhārmikaṃ vratacāriṇam
फिर बहुत समय बाद कुछ चूहे उस स्थान पर आए और उन्होंने उसे वहाँ धर्मात्मा और व्रतधारी के रूप में देखा,
श्लोक 21 (5.160.21)
कार्येण महता युक्तं दम्भयुक्तेन भारत । तेषां मतिरियं राजन्नासीत्तत्र विनिश्चये ॥
kāryeṇa mahatā yuktaṃ dambhayuktena bhārata | teṣāṃ matiriyaṃ rājannāsīttatra viniścaye
जो एक महान् कार्य में लगा था — पर दम्भ से युक्त कार्य में, हे भारत। हे राजन्, विचार करके उन्होंने यह निश्चय किया —
श्लोक 22 (5.160.22)
बहुमित्रा वयं सर्वे तेषां नो मातुलो ह्ययम् । रक्षां करोतु सततं वृद्धबालस्य सर्वशः ॥
bahumitrā vayaṃ sarve teṣāṃ no mātulo hyayam | rakṣāṃ karotu satataṃ vṛddhabālasya sarvaśaḥ
"हम सबके बहुत-से शत्रु हैं। यह हमारा मामा बने और सदा सब प्रकार से हमारे बूढ़ों और बच्चों की रक्षा करे।"
श्लोक 23 (5.160.23)
उपगम्य तु ते सर्वे बिडालमिदमब्रुवन् । भवत्प्रसादादिच्छामश्चर्तुं चैव यथासुखम् ॥
upagamya tu te sarve biḍālamidamabruvan | bhavatprasādādicchāmaścartuṃ caiva yathāsukham
तब वे सब उस बिल्ले के पास जाकर बोले — "आपकी कृपा से हम सुखपूर्वक विचरना चाहते हैं।
श्लोक 24 (5.160.24)
भवान्नो गतिरव्यग्रा भवान्नः परमः सुहृत् । ते वयं सहिताः सर्वे भवन्तं शरणं गताः ॥
bhavānno gatiravyagrā bhavānnaḥ paramaḥ suhṛt | te vayaṃ sahitāḥ sarve bhavantaṃ śaraṇaṃ gatāḥ
आप ही हमारी निश्चिन्त शरण हैं, आप ही हमारे परम हितैषी हैं; हम सब मिलकर आपकी शरण में आए हैं।
श्लोक 25 (5.160.25)
भवान्धर्मपरो नित्यं भवान्धर्मे व्यवस्थितः । स नो रक्ष महाप्रज्ञ त्रिदशानिव वज्रभृत् ॥
bhavāndharmaparo nityaṃ bhavāndharme vyavasthitaḥ | sa no rakṣa mahāprajña tridaśāniva vajrabhṛt
आप सदा धर्मपरायण हैं, धर्म में स्थित हैं; हे महाप्राज्ञ, जैसे वज्रधारी इन्द्र देवताओं की रक्षा करते हैं, वैसे ही आप हमारी रक्षा कीजिए।"
श्लोक 26 (5.160.26)
एवमुक्तस्तु तैः सर्वैर्मूषिकैः स विशांपते । प्रत्युवाच ततः सर्वान्मूषिकान्मूषिकान्तकृत् ॥
evamuktastu taiḥ sarvairmūṣikaiḥ sa viśāṃpate | pratyuvāca tataḥ sarvānmūṣikānmūṣikāntakṛt
हे प्रजानाथ, सब चूहों के ऐसा कहने पर चूहों का नाश करने वाले उस बिल्ले ने उन सबको उत्तर दिया —
श्लोक 27 (5.160.27)
द्वयोर्योगं न पश्यामि तपसो रक्षणस्य च । अवश्यं तु मया कार्यं वचनं भवतां हितम् ॥
dvayoryogaṃ na paśyāmi tapaso rakṣaṇasya ca | avaśyaṃ tu mayā kāryaṃ vacanaṃ bhavatāṃ hitam
"तप और रक्षा — इन दोनों का मेल मुझे दिखाई नहीं देता। फिर भी तुम्हारे हित की बात मुझे अवश्य करनी है।
श्लोक 28 (5.160.28)
युष्माभिरपि कर्तव्यं वचनं मम नित्यशः । तपसास्मि परिश्रान्तो दृढं नियममास्थितः ॥
yuṣmābhirapi kartavyaṃ vacanaṃ mama nityaśaḥ | tapasāsmi pariśrānto dṛḍhaṃ niyamamāsthitaḥ
तुम्हें भी सदा मेरी बात माननी होगी। कठोर नियम का पालन करते-करते मैं तप से बहुत थक गया हूँ,
श्लोक 29 (5.160.29)
न चापि गमने शक्तिं कांचित्पश्यामि चिन्तयन् । सोऽस्मि नेयः सदा ताता नदीकूलमितः परम् ॥
na cāpi gamane śaktiṃ kāṃcitpaśyāmi cintayan | so'smi neyaḥ sadā tātā nadīkūlamitaḥ param
और सोचकर देखता हूँ तो अपने में चलने की कुछ भी शक्ति नहीं पाता। इसलिए, बच्चो, अब से तुम्हें मुझे सदा यहाँ से नदी के तट तक ले जाना होगा।"
श्लोक 30 (5.160.30)
तथेति तं प्रतिज्ञाय मूषिका भरतर्षभ । वृद्धबालमथो सर्वं मार्जाराय न्यवेदयन् ॥
tatheti taṃ pratijñāya mūṣikā bharatarṣabha | vṛddhabālamatho sarvaṃ mārjārāya nyavedayan
हे भरतश्रेष्ठ, चूहों ने "ऐसा ही होगा" कहकर स्वीकार किया और अपने सब बूढ़े और बच्चे उस बिल्ले को सौंप दिए।
श्लोक 31 (5.160.31)
ततः स पापो दुष्टात्मा मूषिकानथ भक्षयन् । पीवरश्च सुवर्णश्च दृढबन्धश्च जायते ॥
tataḥ sa pāpo duṣṭātmā mūṣikānatha bhakṣayan | pīvaraśca suvarṇaśca dṛḍhabandhaśca jāyate
तब वह पापी दुष्टात्मा चूहों को खाने लगा और मोटा, चमकीली देह वाला तथा हृष्ट-पुष्ट हो गया।
श्लोक 32 (5.160.32)
मूषिकाणां गणश्चात्र भृशं संक्षीयतेऽथ सः । मार्जारो वर्धते चापि तेजोबलसमन्वितः ॥
mūṣikāṇāṃ gaṇaścātra bhṛśaṃ saṃkṣīyate'tha saḥ | mārjāro vardhate cāpi tejobalasamanvitaḥ
चूहों का दल तेज़ी से घटने लगा, और वह बिल्ला तेज और बल से भरपूर होकर बढ़ता गया।
श्लोक 33 (5.160.33)
ततस्ते मूषिकाः सर्वे समेत्यान्योन्यमब्रुवन् । मातुलो वर्धते नित्यं वयं क्षीयामहे भृशम् ॥
tataste mūṣikāḥ sarve sametyānyonyamabruvan | mātulo vardhate nityaṃ vayaṃ kṣīyāmahe bhṛśam
तब सब चूहे इकट्ठे होकर आपस में बोले — "मामा तो रोज़ बढ़ते जा रहे हैं, और हम तेज़ी से घटते जा रहे हैं।"
श्लोक 34 (5.160.34)
ततः प्राज्ञतमः कश्चिड्डिण्डिको नाम मूषिकः । अब्रवीद्वचनं राजन्मूषिकाणां महागणम् ॥
tataḥ prājñatamaḥ kaściḍḍiṇḍiko nāma mūṣikaḥ | abravīdvacanaṃ rājanmūṣikāṇāṃ mahāgaṇam
हे राजन्, तब डिण्डिक नाम के एक अत्यन्त बुद्धिमान् चूहे ने चूहों के उस बड़े दल से कहा —
श्लोक 35 (5.160.35)
गच्छतां वो नदीतीरं सहितानां विशेषतः । पृष्ठतोऽहं गमिष्यामि सहैव मातुलेन तु ॥
gacchatāṃ vo nadītīraṃ sahitānāṃ viśeṣataḥ | pṛṣṭhato'haṃ gamiṣyāmi sahaiva mātulena tu
"जब तुम सब एक साथ नदी के तट पर जाओ, तब मैं मामा के साथ ही तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगा।"
श्लोक 36 (5.160.36)
साधु साध्विति ते सर्वे पूजयाञ्चक्रिरे तदा । चक्रुश्चैव यथान्यायं डिण्डिकस्य वचोऽर्थवत् ॥
sādhu sādhviti te sarve pūjayāñcakrire tadā | cakruścaiva yathānyāyaṃ ḍiṇḍikasya vaco'rthavat
"ठीक है, ठीक है" कहकर सबने उसकी प्रशंसा की और डिण्डिक की उस सार्थक सलाह के अनुसार ही उचित रूप से काम किया।
श्लोक 37 (5.160.37)
अविज्ञानात्ततः सोऽथ डिण्डिकं ह्युपभुक्तवान् । ततस्ते सहिताः सर्वे मन्त्रयामासुरञ्जसा ॥
avijñānāttataḥ so'tha ḍiṇḍikaṃ hyupabhuktavān | tataste sahitāḥ sarve mantrayāmāsurañjasā
तब किसी के जाने बिना उस बिल्ले ने डिण्डिक को खा लिया। इसके बाद वे सब मिलकर तुरन्त मन्त्रणा करने लगे।
श्लोक 38 (5.160.38)
तत्र वृद्धतमः कश्चित्कोलिको नाम मूषिकः । अब्रवीद्वचनं राजञ्ज्ञातिमध्ये यथातथम् ॥
tatra vṛddhatamaḥ kaścitkoliko nāma mūṣikaḥ | abravīdvacanaṃ rājañjñātimadhye yathātatham
हे राजन्, तब उनमें सबसे बूढ़े कोलिक नाम के चूहे ने अपनी जाति वालों के बीच यथार्थ बात कही —
श्लोक 39 (5.160.39)
न मातुलो धर्मकामश्छद्ममात्रं कृता शिखा । न मूलफलभक्षस्य विष्ठा भवति लोमशा ॥
na mātulo dharmakāmaśchadmamātraṃ kṛtā śikhā | na mūlaphalabhakṣasya viṣṭhā bhavati lomaśā
"मामा धर्म नहीं चाहते; उनकी जटा तो केवल छल है। कन्द-मूल-फल खाने वाले की विष्ठा में बाल नहीं होते।
श्लोक 40 (5.160.40)
अस्य गात्राणि वर्धन्ते गणश्च परिहीयते । अद्य सप्ताष्टदिवसान्डिण्डिकोऽपि न दृश्यते ॥
asya gātrāṇi vardhante gaṇaśca parihīyate | adya saptāṣṭadivasānḍiṇḍiko'pi na dṛśyate
उनके अंग बढ़ते जा रहे हैं और हमारा दल घटता जा रहा है; और आज सात-आठ दिन से डिण्डिक भी दिखाई नहीं दे रहा।"
श्लोक 41 (5.160.41)
एतच्छ्रुत्वा वचः सर्वे मूषिका विप्रदुद्रुवुः । बिडालोऽपि स दुष्टात्मा जगामैव यथागतम् ॥
etacchrutvā vacaḥ sarve mūṣikā vipradudruvuḥ | biḍālo'pi sa duṣṭātmā jagāmaiva yathāgatam
यह बात सुनकर सब चूहे इधर-उधर भाग गए, और वह दुष्टात्मा बिल्ला भी जैसे आया था वैसे ही चला गया।
श्लोक 42 (5.160.42)
तथा त्वमपि दुष्टात्मन्बैडालं व्रतमास्थितः । चरसि ज्ञातिषु सदा बिडालो मूषिकेष्विव ॥
tathā tvamapi duṣṭātmanbaiḍālaṃ vratamāsthitaḥ | carasi jñātiṣu sadā biḍālo mūṣikeṣviva
इसी प्रकार हे दुष्टात्मन्, तुमने भी बैडाल-व्रत धारण कर रखा है और अपने कुटुम्बियों के बीच तुम सदा वैसे ही विचरते हो जैसे चूहों के बीच वह बिल्ला।
श्लोक 43 (5.160.43)
अन्यथा किल ते वाक्यमन्यथा कर्म दृश्यते । दम्भनार्थाय लोकस्य वेदाश्चोपशमश्च ते ॥
anyathā kila te vākyamanyathā karma dṛśyate | dambhanārthāya lokasya vedāścopaśamaśca te
स्पष्ट दिखता है कि तुम्हारी बात कुछ और है और करनी कुछ और; तुम्हारा वेद-पाठ और तुम्हारी शान्ति केवल लोगों को ठगने के लिए हैं।
श्लोक 44 (5.160.44)
त्यक्त्वा छद्म त्विदं राजन्क्षत्रधर्मं समाश्रितः । कुरु कार्याणि सर्वाणि धर्मिष्ठोऽसि नरर्षभ ॥
tyaktvā chadma tvidaṃ rājankṣatradharmaṃ samāśritaḥ | kuru kāryāṇi sarvāṇi dharmiṣṭho'si nararṣabha
हे राजन्, यह छल छोड़कर क्षत्रिय-धर्म का आश्रय लो और सब कर्तव्य कर्म करो — हे नरश्रेष्ठ, तुम तो बड़े धर्मात्मा हो ही!
श्लोक 45 (5.160.45)
बाहुवीर्येण पृथिवीं लब्ध्वा भरतसत्तम । देहि दानं द्विजातिभ्यः पितृभ्यश्च यथोचितम् ॥
bāhuvīryeṇa pṛthivīṃ labdhvā bharatasattama | dehi dānaṃ dvijātibhyaḥ pitṛbhyaśca yathocitam
हे भरतसत्तम, अपनी भुजाओं के बल से पृथ्वी जीतकर ब्राह्मणों को दान दो और पितरों को यथोचित श्राद्ध-तर्पण अर्पित करो।
श्लोक 46 (5.160.46)
क्लिष्टाया वर्षपूगांश्च मातुर्मातृहिते स्थितः । प्रमार्जाश्रु रणे जित्वा संमानं परमावह ॥
kliṣṭāyā varṣapūgāṃśca māturmātṛhite sthitaḥ | pramārjāśru raṇe jitvā saṃmānaṃ paramāvaha
माता के हित में तत्पर तुम, वर्षों से कष्ट भोगती अपनी माता के आँसू पोंछो; युद्ध में विजय पाकर उसे परम सम्मान दिलाओ।
श्लोक 47 (5.160.47)
पञ्चग्रामा वृता यत्नान्नास्माभिरपवर्जिताः । युध्यामहे कथं सङ्ख्ये कोपयेम च पाण्डवान् ॥
pañcagrāmā vṛtā yatnānnāsmābhirapavarjitāḥ | yudhyāmahe kathaṃ saṅkhye kopayema ca pāṇḍavān
तुमने बड़े यत्न से पाँच गाँव माँगे थे, पर हमने वे नहीं दिए — क्योंकि और किस प्रकार हम तुमसे युद्ध करते और पाण्डवों को क्रोध दिलाते?
श्लोक 48 (5.160.48)
त्वत्कृते दुष्टभावस्य संत्यागो विदुरस्य च । जातुषे च गृहे दाहं स्मर तं पुरुषो भव ॥
tvatkṛte duṣṭabhāvasya saṃtyāgo vidurasya ca | jātuṣe ca gṛhe dāhaṃ smara taṃ puruṣo bhava
स्मरण करो कि तुम्हारे कारण उस दुर्भावना वाले विदुर का त्याग किया गया, और लाक्षागृह में आग लगाई गई — और पुरुष बनो।
श्लोक 49 (5.160.49)
यच्च कृष्णमवोचस्त्वमायान्तं कुरुसंसदि । अयमस्मि स्थितो राजञ्शमाय समराय च ॥
yacca kṛṣṇamavocastvamāyāntaṃ kurusaṃsadi | ayamasmi sthito rājañśamāya samarāya ca
और कौरवों की सभा में जाते हुए कृष्ण से तुमने जो कहा था — "मैं शान्ति के लिए भी तैयार खड़ा हूँ और युद्ध के लिए भी" —
श्लोक 50 (5.160.50)
तस्यायमागतः कालः समरस्य नराधिप । एतदर्थं मया सर्वं कृतमेतद्युधिष्ठिर ॥
tasyāyamāgataḥ kālaḥ samarasya narādhipa | etadarthaṃ mayā sarvaṃ kṛtametadyudhiṣṭhira
हे राजन्, हे नरेश, उस युद्ध का समय अब आ गया है। युधिष्ठिर, इसी के लिए मैंने यह सब किया है।
श्लोक 51 (5.160.51)
किं नु युद्धात्परं लाभं क्षत्रियो बहु मन्यते । किंच त्वं क्षत्रियकुले जातः संप्रथितो भुवि ॥
kiṃ nu yuddhātparaṃ lābhaṃ kṣatriyo bahu manyate | kiṃca tvaṃ kṣatriyakule jātaḥ saṃprathito bhuvi
क्षत्रिय युद्ध से बढ़कर और किस लाभ को अधिक मूल्यवान मानता है? और तुम तो क्षत्रिय-कुल में जन्मे हो और पृथ्वी पर विख्यात हो;
श्लोक 52 (5.160.52)
द्रोणादस्त्राणि संप्राप्य कृपाच्च भरतर्षभ । तुल्ययोनौ समबले वासुदेवं समाश्रितः ॥
droṇādastrāṇi saṃprāpya kṛpācca bharatarṣabha | tulyayonau samabale vāsudevaṃ samāśritaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, तुमने द्रोण और कृप से अस्त्र पाए हैं — फिर भी अपने समान कुल और समान बल वाले के विरुद्ध तुमने वासुदेव का सहारा लिया है।'
श्लोक 53 (5.160.53)
ब्रूयास्त्वं वासुदेवं च पाण्डवानां समीपतः । आत्मार्थं पाण्डवार्थं च यत्तो मां प्रतियोधय ॥
brūyāstvaṃ vāsudevaṃ ca pāṇḍavānāṃ samīpataḥ | ātmārthaṃ pāṇḍavārthaṃ ca yatto māṃ pratiyodhaya
और पाण्डवों के समीप ही वासुदेव से भी कहना — 'अपने लिए और पाण्डवों के लिए सावधान होकर मुझसे युद्ध करो।
श्लोक 54 (5.160.54)
सभामध्ये च यद्रूपं मायया कृतवानसि । तत्तथैव पुनः कृत्वा सार्जुनो मामभिद्रव ॥
sabhāmadhye ca yadrūpaṃ māyayā kṛtavānasi | tattathaiva punaḥ kṛtvā sārjuno māmabhidrava
सभा के बीच तुमने माया से जो रूप बनाया था, वही रूप फिर से बनाकर अर्जुन के साथ मुझ पर टूट पड़ो।
श्लोक 55 (5.160.55)
इन्द्रजालं च मायां वै कुहका वापि भीषणा । आत्तशस्त्रस्य सङ्ग्रामे वहन्ति प्रतिगर्जनाः ॥
indrajālaṃ ca māyāṃ vai kuhakā vāpi bhīṣaṇā | āttaśastrasya saṅgrāme vahanti pratigarjanāḥ
इन्द्रजाल, माया और भयानक कृत्या (टोना) — ये युद्ध में शस्त्र उठाए हुए वीर को डराते नहीं, केवल उसका क्रोध जगाते हैं।
श्लोक 56 (5.160.56)
वयमप्युत्सहेम द्यां खं च गच्छेम मायया । रसातलं विशामोऽपि ऐन्द्रं वा पुरमेव तु ॥
vayamapyutsahema dyāṃ khaṃ ca gacchema māyayā | rasātalaṃ viśāmo'pi aindraṃ vā purameva tu
हम भी माया से स्वर्ग और आकाश तक जा सकते हैं, रसातल में या इन्द्र की पुरी में प्रवेश कर सकते हैं;
श्लोक 57 (5.160.57)
दर्शयेम च रूपाणि स्वशरीरे बहून्यपि । न तु पर्यायतः सिद्धिर्बुद्धिमाप्नोति मानुषीम् ॥
darśayema ca rūpāṇi svaśarīre bahūnyapi | na tu paryāyataḥ siddhirbuddhimāpnoti mānuṣīm
और अपने शरीर में अनेक रूप भी दिखा सकते हैं। पर ऐसे प्रदर्शनों से सिद्धि नहीं मिलती, न शत्रु उनसे मनुष्य की तरह भयभीत ही होता है।
श्लोक 58 (5.160.58)
मनसैव हि भूतानि धातैव कुरुते वशे । यद्ब्रवीषि च वार्ष्णेय धार्तराष्ट्रानहं रणे ॥
manasaiva hi bhūtāni dhātaiva kurute vaśe | yadbravīṣi ca vārṣṇeya dhārtarāṣṭrānahaṃ raṇe
प्राणियों को तो केवल विधाता ही अपने संकल्प-मात्र से वश में करता है। और हे वार्ष्णेय, तुम जो कहते हो — "मैं युद्ध में धृतराष्ट्र के पुत्रों को
श्लोक 59 (5.160.59)
घातयित्वा प्रदास्यामि पार्थेभ्यो राज्यमुत्तमम् । आचचक्षे च मे सर्वं सञ्जयस्तव भाषितम् । मद्द्वितीयेन पार्थेन वैरं वः सव्यसाचिना ॥
ghātayitvā pradāsyāmi pārthebhyo rājyamuttamam | ācacakṣe ca me sarvaṃ sañjayastava bhāṣitam | maddvitīyena pārthena vairaṃ vaḥ savyasācinā
मारकर पृथा के पुत्रों को उत्तम राज्य दे दूँगा" — तुम्हारी कही यह सब बात संजय ने मुझे बता दी है, कि हमारा वैर उस सव्यसाची पार्थ से है जिसके दूसरे साथी तुम हो।
श्लोक 60 (5.160.60)
स सत्यसङ्गरो भूत्वा पाण्डवार्थे पराक्रमी । युद्ध्यस्वाद्य रणे यत्तः पश्यामः पुरुषो भव ॥
sa satyasaṅgaro bhūtvā pāṇḍavārthe parākramī | yuddhyasvādya raṇe yattaḥ paśyāmaḥ puruṣo bhava
अतः अपने वचन के सच्चे बनकर पाण्डवों के लिए पराक्रम दिखाओ; आज सावधान होकर रण में युद्ध करो — हम देखेंगे; पुरुष बनो।
श्लोक 61 (5.160.61)
यस्तु शत्रुमभिज्ञाय शुद्धं पौरुषमास्थितः । करोति द्विषतां शोकं स जीवति सुजीवितम् ॥
yastu śatrumabhijñāya śuddhaṃ pauruṣamāsthitaḥ | karoti dviṣatāṃ śokaṃ sa jīvati sujīvitam
जो शत्रु को पहचानकर शुद्ध पुरुषार्थ का आश्रय लेता है और शत्रुओं को शोक देता है, वही सचमुच सार्थक जीवन जीता है।
श्लोक 62 (5.160.62)
अकस्माच्चैव ते कृष्ण ख्यातं लोके महद्यशः । अद्येदानीं विजानीमः सन्ति षण्डाः सशृङ्गकाः ॥
akasmāccaiva te kṛṣṇa khyātaṃ loke mahadyaśaḥ | adyedānīṃ vijānīmaḥ santi ṣaṇḍāḥ saśṛṅgakāḥ
हे कृष्ण, संसार में तुम्हारा बड़ा यश अकारण ही फैल गया है। आज हमने जाना कि सींग वाले नपुंसक भी होते हैं — जो पुरुष के चिह्न तो धारण करते हैं, पर उनमें पौरुष नहीं होता।
श्लोक 63 (5.160.63)
मद्विधो नापि नृपतिस्त्वयि युक्तः कथंचन । सन्नाहं संयुगे कर्तुं कंसभृत्ये विशेषतः ॥
madvidho nāpi nṛpatistvayi yuktaḥ kathaṃcana | sannāhaṃ saṃyuge kartuṃ kaṃsabhṛtye viśeṣataḥ
मुझ जैसे राजा के लिए तुम्हारे विरुद्ध युद्ध में कवच बाँधना किसी प्रकार उचित नहीं — विशेषकर कंस के सेवक के विरुद्ध।'
श्लोक 64 (5.160.64)
तं च तूबरकं बालं बह्वाशिनमविद्यकम् । उलूक मद्वचो ब्रूहि असकृद्भीमसेनकम् ॥
taṃ ca tūbarakaṃ bālaṃ bahvāśinamavidyakam | ulūka madvaco brūhi asakṛdbhīmasenakam
और हे उलूक, उस बिना दाढ़ी-मूँछ वाले, बचकाने, पेटू और मूर्ख भीमसेन से बार-बार मेरा यह सन्देश कहना —
श्लोक 65 (5.160.65)
विराटनगरे पार्थ यस्त्वं सूदो ह्यभूः पुरा । बल्लवो नाम विख्यातस्तन्ममैव हि पौरुषम् ॥
virāṭanagare pārtha yastvaṃ sūdo hyabhūḥ purā | ballavo nāma vikhyātastanmamaiva hi pauruṣam
'हे पार्थ, विराटनगर में तुम जो पहले बल्लव नाम से प्रसिद्ध रसोइया बने थे, वह मेरा ही पुरुषार्थ था।
श्लोक 66 (5.160.66)
प्रतिज्ञातं सभामध्ये न तन्मिथ्या त्वया पुरा । दुःशासनस्य रुधिरं पीयतां यदि शक्यते ॥
pratijñātaṃ sabhāmadhye na tanmithyā tvayā purā | duḥśāsanasya rudhiraṃ pīyatāṃ yadi śakyate
तुमने पहले सभा के बीच जो प्रतिज्ञा की थी, वह झूठी न हो — दुःशासन का रक्त पिया जाए, यदि पी सको।
श्लोक 67 (5.160.67)
यद्ब्रवीषि च कौन्तेय धार्तराष्ट्रानहं रणे । निहनिष्यामि तरसा तस्य कालोऽयमागतः ॥
yadbravīṣi ca kaunteya dhārtarāṣṭrānahaṃ raṇe | nihaniṣyāmi tarasā tasya kālo'yamāgataḥ
हे कुन्तीपुत्र, तुम जो कहते हो कि "मैं युद्ध में धृतराष्ट्र के पुत्रों को वेग से मार डालूँगा", उसका समय आ गया है।
श्लोक 68 (5.160.68)
त्वं हि भोज्ये पुरस्कार्यो भक्ष्ये पेये च भारत । क्व युद्धं क्व च भोक्तव्यं युध्यस्व पुरुषो भव ॥
tvaṃ hi bhojye puraskāryo bhakṣye peye ca bhārata | kva yuddhaṃ kva ca bhoktavyaṃ yudhyasva puruṣo bhava
हे भारत, खाने-पीने में तो तुम्हें ही सबसे आगे रखा जाना चाहिए। कहाँ युद्ध और कहाँ भोजन! युद्ध करो, पुरुष बनो।
श्लोक 69 (5.160.69)
शयिष्यसे हतो भूमौ गदामालिङ्ग्य भारत । तद्वृथा च सभामध्ये वल्गितं ते वृकोदर ॥
śayiṣyase hato bhūmau gadāmāliṅgya bhārata | tadvṛthā ca sabhāmadhye valgitaṃ te vṛkodara
हे भारत, तुम मारे जाकर अपनी गदा को छाती से लगाए भूमि पर सोओगे; हे वृकोदर, तब सभा में की गई तुम्हारी उछल-कूद व्यर्थ सिद्ध होगी।'
श्लोक 70 (5.160.70)
उलूक नकुलं ब्रूहि वचनान्मम भारत । युद्ध्यस्वाद्य स्थिरो भूत्वा पश्यामस्तव पौरुषम् ॥
ulūka nakulaṃ brūhi vacanānmama bhārata | yuddhyasvādya sthiro bhūtvā paśyāmastava pauruṣam
हे उलूक, हे भारत, नकुल से मेरी ओर से कहना — 'आज स्थिर होकर युद्ध करो; हम तुम्हारा पुरुषार्थ देखेंगे।
श्लोक 71 (5.160.71)
युधिष्ठिरानुरागं च द्वेषं च मयि भारत । कृष्णायाश्च परिक्लेशं स्मरेदानीं यथातथम् ॥
yudhiṣṭhirānurāgaṃ ca dveṣaṃ ca mayi bhārata | kṛṣṇāyāśca parikleśaṃ smaredānīṃ yathātatham
युधिष्ठिर के प्रति अपना अनुराग, मेरे प्रति अपना द्वेष और कृष्णा (द्रौपदी) का क्लेश — इन सबको अब ठीक-ठीक स्मरण करो।'
श्लोक 72 (5.160.72)
ब्रूयास्त्वं सहदेवं च राजमध्ये वचो मम । युद्ध्येदानीं रणे यत्तः क्लेशान्स्मर च पाण्डव ॥
brūyāstvaṃ sahadevaṃ ca rājamadhye vaco mama | yuddhyedānīṃ raṇe yattaḥ kleśānsmara ca pāṇḍava
और राजाओं के बीच सहदेव से मेरी यह बात कहना — 'हे पाण्डुपुत्र, अब सावधान होकर रण में युद्ध करो और अपने क्लेशों को याद करो।'
श्लोक 73 (5.160.73)
विराटद्रुपदौ चोभौ ब्रूयास्त्वं वचनान्मम । न दृष्टपूर्वा भर्तारो भृत्यैरपि महागुणैः । तथार्थपतिभिर्भृत्या यतः सृष्टाः प्रजास्ततः ॥
virāṭadrupadau cobhau brūyāstvaṃ vacanānmama | na dṛṣṭapūrvā bhartāro bhṛtyairapi mahāguṇaiḥ | tathārthapatibhirbhṛtyā yataḥ sṛṣṭāḥ prajāstataḥ
विराट और द्रुपद दोनों से मेरी ओर से कहना — 'जब से प्रजा की सृष्टि हुई, तब से सेवकों ने अपने स्वामियों को, चाहे वे कितने ही गुणवान् हों, ठीक से नहीं पहचाना, और न राजाओं ने अपने सेवकों को;
श्लोक 74 (5.160.74)
अश्लाघ्योऽयं नरपतिर्युवयोरिति चागतम् ॥
aślāghyo'yaṃ narapatiryuvayoriti cāgatam
इसीलिए तुम दोनों ने इस राजा को — मुझे — प्रशंसा के अयोग्य मान लिया है।
श्लोक 75 (5.160.75)
ते यूयं संहता भूत्वा तद्वधार्थं ममापि च । आत्मार्थं पाण्डवार्थं च प्रयुद्ध्यध्वं मया सह ॥
te yūyaṃ saṃhatā bhūtvā tadvadhārthaṃ mamāpi ca | ātmārthaṃ pāṇḍavārthaṃ ca prayuddhyadhvaṃ mayā saha
अतः तुम दोनों मिलकर, इसी कारण और मेरे वध के लिए, अपने लिए और पाण्डवों के लिए मुझसे युद्ध करो।'
श्लोक 76 (5.160.76)
धृष्टद्युम्नं च पाञ्चाल्यं ब्रूयास्त्वं वचनान्मम । एष ते समयः प्राप्तो लब्धव्यश्च त्वयापि सः ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ ca pāñcālyaṃ brūyāstvaṃ vacanānmama | eṣa te samayaḥ prāpto labdhavyaśca tvayāpi saḥ
पाञ्चाल धृष्टद्युम्न से मेरी ओर से कहना — 'तुम्हारा अवसर आ पहुँचा है, और उसे तुम्हें पाना ही है।
श्लोक 77 (5.160.77)
द्रोणमासाद्य समरे ज्ञास्यसे हितमुत्तमम् । युद्ध्यस्व ससुहृत्पापं कुरु कर्म सुदुष्करम् ॥
droṇamāsādya samare jñāsyase hitamuttamam | yuddhyasva sasuhṛtpāpaṃ kuru karma suduṣkaram
युद्ध में द्रोण से भिड़कर तुम जान लोगे कि तुम्हारे लिए उत्तम हित क्या है। अपने मित्रों के साथ युद्ध करो और वह अत्यन्त दुष्कर पापकर्म (गुरु-वध) कर डालो।'
श्लोक 78 (5.160.78)
शिखण्डिनमथो ब्रूहि उलूक वचनान्मम । स्त्रीति मत्वा महाबाहुर्न हनिष्यति कौरवः ॥
śikhaṇḍinamatho brūhi ulūka vacanānmama | strīti matvā mahābāhurna haniṣyati kauravaḥ
फिर हे उलूक, शिखण्डी से मेरी ओर से कहना — 'तुम्हें स्त्री मानकर महाबाहु कुरुवंशी
श्लोक 79 (5.160.79)
गाङ्गेयो धन्विनां श्रेष्ठो युद्ध्येदानीं सुनिर्भयः । कुरु कर्म रणे यत्तः पश्यामः पौरुषं तव ॥
gāṅgeyo dhanvināṃ śreṣṭho yuddhyedānīṃ sunirbhayaḥ | kuru karma raṇe yattaḥ paśyāmaḥ pauruṣaṃ tava
धनुर्धारियों में श्रेष्ठ गङ्गापुत्र (भीष्म) तुम्हें नहीं मारेंगे। अतः अब पूरी तरह निर्भय होकर युद्ध करो; सावधान होकर रण में पराक्रम करो — हम तुम्हारा पुरुषार्थ देखेंगे।'"
सञ्जय उवाच
श्लोक 80 (5.160.80)
एवमुक्त्वा ततो राजा प्रहस्योलूकमब्रवीत् । धनञ्जयं पुनर्ब्रूहि वासुदेवस्य शृण्वतः ॥
evamuktvā tato rājā prahasyolūkamabravīt | dhanañjayaṃ punarbrūhi vāsudevasya śṛṇvataḥ
ऐसा कहकर राजा हँसा और उलूक से बोला — "वासुदेव के सुनते हुए धनञ्जय से फिर कहना —
दुर्योधन उवाच
श्लोक 81 (5.160.81)
अस्मान्वा त्वं पराजित्य प्रसाधि पृथिवीमिमाम् । अथवा निर्जितोऽस्माभी रणे वीर शयिष्यसि ॥
asmānvā tvaṃ parājitya prasādhi pṛthivīmimām | athavā nirjito'smābhī raṇe vīra śayiṣyasi
'या तो हमें हराकर इस पृथ्वी पर शासन करो, या हे वीर, हमसे पराजित होकर रणभूमि में सो जाओ।
श्लोक 82 (5.160.82)
राष्ट्रान्निर्वासनक्लेशं वनवासं च पाण्डव । कृष्णायाश्च परिक्लेशं संस्मरन्पुरुषो भव ॥
rāṣṭrānnirvāsanakleśaṃ vanavāsaṃ ca pāṇḍava | kṛṣṇāyāśca parikleśaṃ saṃsmaranpuruṣo bhava
हे पाण्डुपुत्र, राज्य से निकाले जाने का कष्ट, वनवास और कृष्णा का क्लेश याद करते हुए पुरुष बनो।
श्लोक 83 (5.160.83)
यदर्थं क्षत्रिया सूते सर्वं तदिदमागतम् । बलं वीर्यं च शौर्यं च परं चाप्यस्त्रलाघवम् ॥
yadarthaṃ kṣatriyā sūte sarvaṃ tadidamāgatam | balaṃ vīryaṃ ca śauryaṃ ca paraṃ cāpyastralāghavam
क्षत्राणी जिस प्रयोजन के लिए पुत्र को जन्म देती है, वह सब अब आ पहुँचा है — बल, वीर्य, शौर्य और अस्त्र चलाने की परम कुशलता।
श्लोक 84 (5.160.84)
पौरुषं दर्शयन्युद्धे कोपस्य कुरु निष्कृतिम् । परिक्लिष्टस्य दीनस्य दीर्घकालोषितस्य च । हृदयं कस्य न स्फोटेदैश्वर्याद्भ्रंशितस्य च ॥
pauruṣaṃ darśayanyuddhe kopasya kuru niṣkṛtim | parikliṣṭasya dīnasya dīrghakāloṣitasya ca | hṛdayaṃ kasya na sphoṭedaiśvaryādbhraṃśitasya ca
युद्ध में पुरुषार्थ दिखाकर अपने क्रोध का बदला चुकाओ। जो क्लेश में पड़ा हो, दीन हो, बहुत समय से परदेस में रहा हो और ऐश्वर्य से गिरा दिया गया हो, उसका हृदय भला क्यों न फट पड़े?
श्लोक 85 (5.160.85)
कुले जातस्य शूरस्य परवित्तेष्वगृध्यतः । आस्थितं राज्यमाक्रम्य कोपं कस्य न दीपयेत् ॥
kule jātasya śūrasya paravitteṣvagṛdhyataḥ | āsthitaṃ rājyamākramya kopaṃ kasya na dīpayet
जो उत्तम कुल में जन्मा हो, शूरवीर हो और पराये धन का लोभ न करता हो — बलपूर्वक उसका राज्य छीन लिए जाने पर किसका क्रोध न भड़क उठे?
श्लोक 86 (5.160.86)
यत्तदुक्तं महद्वाक्यं कर्मणा तद्विभाव्यताम् । अकर्मणा कत्थितेन सन्तः कुपुरुषं विदुः ॥
yattaduktaṃ mahadvākyaṃ karmaṇā tadvibhāvyatām | akarmaṇā katthitena santaḥ kupuruṣaṃ viduḥ
तुमने जो बड़ी बात कही थी, उसे कर्म से सिद्ध करो; जो केवल डींग मारता है और कुछ करता नहीं, सज्जन उसे कापुरुष मानते हैं।
श्लोक 87 (5.160.87)
अमित्राणां वशे स्थानं राज्यं च पुनरुद्धर । द्वावर्थौ युद्धकामस्य तस्मात्तत्कुरु पौरुषम् ॥
amitrāṇāṃ vaśe sthānaṃ rājyaṃ ca punaruddhara | dvāvarthau yuddhakāmasya tasmāttatkuru pauruṣam
शत्रुओं के वश में पड़ी अपनी प्रतिष्ठा और अपने राज्य को फिर से उबारो; युद्ध चाहने वाले के ये ही दो प्रयोजन होते हैं — इसलिए पुरुषार्थ करो।
श्लोक 88 (5.160.88)
पराजितोऽसि द्यूतेन कृष्णा चानायिता सभाम् । शक्योऽमर्षो मनुष्येण कर्तुं पुरुषमानिना ॥
parājito'si dyūtena kṛṣṇā cānāyitā sabhām | śakyo'marṣo manuṣyeṇa kartuṃ puruṣamāninā
तुम जुए में हारे, और कृष्णा सभा में घसीटकर लाई गई — इस पर अपने को पुरुष मानने वाला कोई भी मनुष्य क्रोध कर सकता है।
श्लोक 89 (5.160.89)
द्वादशैव तु वर्षाणि वने धिष्ण्याद्विवासितः । संवत्सरं विराटस्य दास्यमास्थाय चोषितः ॥
dvādaśaiva tu varṣāṇi vane dhiṣṇyādvivāsitaḥ | saṃvatsaraṃ virāṭasya dāsyamāsthāya coṣitaḥ
पूरे बारह वर्ष तुम अपने घर से निकाले जाकर वन में रहे, और एक वर्ष विराट के यहाँ दास बनकर रहे।
श्लोक 90 (5.160.90)
राष्ट्रान्निर्वासनक्लेशं वनवासं च पाण्डव । कृष्णायाश्च परिक्लेशं संस्मरन्पुरुषो भव ॥
rāṣṭrānnirvāsanakleśaṃ vanavāsaṃ ca pāṇḍava | kṛṣṇāyāśca parikleśaṃ saṃsmaranpuruṣo bhava
हे पाण्डुपुत्र, राज्य से निकाले जाने का कष्ट, वनवास और कृष्णा का क्लेश याद करते हुए पुरुष बनो।
श्लोक 91 (5.160.91)
अप्रियाणां च वचनं प्रब्रुवत्सु पुनः पुनः । अमर्षं दर्शयस्व त्वममर्षो ह्येव पौरुषम् ॥
apriyāṇāṃ ca vacanaṃ prabruvatsu punaḥ punaḥ | amarṣaṃ darśayasva tvamamarṣo hyeva pauruṣam
जब शत्रु बार-बार कटु वचन कहें, तब अपना रोष दिखाओ; रोष ही तो पुरुषार्थ है।
श्लोक 92 (5.160.92)
क्रोधो बलं तथा वीर्यं ज्ञानयोगोऽस्त्रलाघवम् । इह ते दृश्यतां पार्थ युद्ध्यस्व पुरुषो भव ॥
krodho balaṃ tathā vīryaṃ jñānayogo'stralāghavam | iha te dṛśyatāṃ pārtha yuddhyasva puruṣo bhava
हे पार्थ, तुम्हारा क्रोध, बल, वीर्य, योग-ज्ञान और अस्त्र-कौशल यहाँ दिखाई दे; युद्ध करो, पुरुष बनो।
श्लोक 93 (5.160.93)
लोहाभिसारो निर्वृत्तः कुरुक्षेत्रमकर्दमम् । पुष्टास्तेऽश्वा भृता योधाः श्वो युद्ध्यस्व सकेशवः ॥
lohābhisāro nirvṛttaḥ kurukṣetramakardamam | puṣṭāste'śvā bhṛtā yodhāḥ śvo yuddhyasva sakeśavaḥ
शस्त्रों का अभिषेक-संस्कार हो चुका है, कुरुक्षेत्र में कीचड़ नहीं है; तुम्हारे घोड़े हृष्ट-पुष्ट हैं और योद्धाओं का भरण-पोषण हो चुका है — कल केशव के साथ युद्ध करो।
श्लोक 94 (5.160.94)
असमागम्य भीष्मेण संयुगे किं विकत्थसे । आरुरुक्षुर्यथा मन्दः पर्वतं गन्धमादनम् ॥
asamāgamya bhīṣmeṇa saṃyuge kiṃ vikatthase | ārurukṣuryathā mandaḥ parvataṃ gandhamādanam
युद्ध में भीष्म से भिड़े बिना ही तुम क्यों डींग मारते हो, जैसे कोई मूर्ख गन्धमादन पर्वत पर चढ़ने की इच्छा करे?
श्लोक 95 (5.160.95)
एवं कत्थसि कौन्तेय अकत्थन्पुरुषो भव । सूतपुत्रं सुदुर्धर्षं शल्यं च बलिनां वरम् ॥
evaṃ katthasi kaunteya akatthanpuruṣo bhava | sūtaputraṃ sudurdharṣaṃ śalyaṃ ca balināṃ varam
हे कुन्तीपुत्र, तुम ऐसे ही डींग मारते हो; डींग छोड़कर पुरुष बनो। अत्यन्त दुर्धर्ष सूतपुत्र (कर्ण), बलवानों में श्रेष्ठ शल्य,
श्लोक 96 (5.160.96)
द्रोणं च बलिनां श्रेष्ठं शचीपतिसमं युधि । अजित्वा संयुगे पार्थ राज्यं कथमिहेच्छसि ॥
droṇaṃ ca balināṃ śreṣṭhaṃ śacīpatisamaṃ yudhi | ajitvā saṃyuge pārtha rājyaṃ kathamihecchasi
और बलवानों में श्रेष्ठ, युद्ध में शचीपति इन्द्र के समान द्रोण — हे पार्थ, इन्हें युद्ध में जीते बिना तुम यहाँ राज्य कैसे चाहते हो?
श्लोक 97 (5.160.97)
ब्राह्मे धनुषि चाचार्यं वेदयोरन्तगं द्वयोः । युधि धुर्यमविक्षोभ्यमनीकचरमच्युतम् ॥
brāhme dhanuṣi cācāryaṃ vedayorantagaṃ dvayoḥ | yudhi dhuryamavikṣobhyamanīkacaramacyutam
ब्राह्म-विद्या और धनुर्विद्या के आचार्य, वेद और धनुर्वेद दोनों के पारगामी, युद्ध का भार उठाने वाले, अडिग, सेना के बीच विचरने वाले और कभी न डिगने वाले
श्लोक 98 (5.160.98)
द्रोणं महाद्युतिं पार्थ जेतुमिच्छसि तन्मृषा । न हि शुश्रुम वातेन मेरुमुन्मथितं गिरिम् ॥
droṇaṃ mahādyutiṃ pārtha jetumicchasi tanmṛṣā | na hi śuśruma vātena merumunmathitaṃ girim
उस महातेजस्वी द्रोण को तुम जीतना चाहते हो, हे पार्थ — यह व्यर्थ है। हमने कभी नहीं सुना कि वायु ने मेरु पर्वत को उखाड़ दिया हो।
श्लोक 99 (5.160.99)
अनिलो वा वहेन्मेरुं द्यौर्वापि निपतेन्महीम् । युगं वा परिवर्तेत यद्येवं स्याद्यथात्थ माम् ॥
anilo vā vahenmeruṃ dyaurvāpi nipatenmahīm | yugaṃ vā parivarteta yadyevaṃ syādyathāttha mām
यदि वैसा हो जैसा तुमने मुझसे कहा है, तो वायु मेरु को उड़ा ले जाए, आकाश पृथ्वी पर गिर पड़े, या युग ही उलट जाए।
श्लोक 100 (5.160.100)
को ह्यस्ति जीविताकाङ्क्षी प्राप्येममरिमर्दनम् । पार्थो वा इतरो वापि कोऽन्यः स्वस्ति गृहान्व्रजेत् ॥
ko hyasti jīvitākāṅkṣī prāpyemamarimardanam | pārtho vā itaro vāpi ko'nyaḥ svasti gṛhānvrajet
जीवित रहने की इच्छा रखने वाला कौन है जो इस शत्रुमर्दन से भिड़कर — चाहे पार्थ हो या कोई और — सकुशल घर लौट सके?
श्लोक 101 (5.160.101)
कथमाभ्यामभिध्यातः संस्पृष्टो दारुणेन वा । रणे जीवन्प्रमुच्येत पदा भूमिमुपस्पृशन् ॥
kathamābhyāmabhidhyātaḥ saṃspṛṣṭo dāruṇena vā | raṇe jīvanpramucyeta padā bhūmimupaspṛśan
जिसे इन दोनों ने मारने का निश्चय कर लिया हो, या जिसे इनके भयंकर अस्त्र ने छू लिया हो, वह जीवित रहकर, पैरों से धरती छूता हुआ, रण से कैसे छूट सकता है?
श्लोक 102 (5.160.102)
किं दर्दुरः कूपशयो यथेमां । न बुध्यसे राजचमूं समेताम् । दुराधर्षां देवचमूप्रकाशां । गुप्तां नरेन्द्रैस्त्रिदशैरिव द्याम् ॥
kiṃ darduraḥ kūpaśayo yathemāṃ | na budhyase rājacamūṃ sametām | durādharṣāṃ devacamūprakāśāṃ | guptāṃ narendraistridaśairiva dyām
कुएँ में रहने वाले मेंढक की भाँति तुम यहाँ एकत्र इस राजसेना को क्यों नहीं समझते — जो दुर्धर्ष है, देवसेना के समान चमकती है, और राजाओं द्वारा वैसे ही रक्षित है जैसे देवताओं द्वारा स्वर्ग;
श्लोक 103 (5.160.103)
प्राच्यैः प्रतीच्यैरथ दाक्षिणात्यै- । रुदीच्यकाम्भोजशकैः खशैश्च । साल्वैः समत्स्यैः कुरुमध्यदेश्यै- । र्म्लेच्छैः पुलिन्दैर्द्रविडान्ध्रकाञ्च्यैः ॥
prācyaiḥ pratīcyairatha dākṣiṇātyai- | rudīcyakāmbhojaśakaiḥ khaśaiśca | sālvaiḥ samatsyaiḥ kurumadhyadeśyai- | rmlecchaiḥ pulindairdraviḍāndhrakāñcyaiḥ
जो पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर के लोगों से, काम्बोजों, शकों और खशों से, मत्स्यों सहित साल्वों से, कुरु-मध्यदेश के लोगों से, म्लेच्छों, पुलिन्दों, द्रविडों, आन्ध्रों और काञ्ची वालों से बनी है —
श्लोक 104 (5.160.104)
नानाजनौघं युधि संप्रवृद्धं । गाङ्गं यथा वेगमपारणीयम् । मां च स्थितं नानाबलस्य मध्ये । युयुत्ससे मन्द किमल्पबुद्धे ॥
nānājanaughaṃ yudhi saṃpravṛddhaṃ | gāṅgaṃ yathā vegamapāraṇīyam | māṃ ca sthitaṃ nānābalasya madhye | yuyutsase manda kimalpabuddhe
अनेक जातियों का यह जन-प्रवाह युद्ध के लिए उमड़ा हुआ है, गङ्गा के वेग की भाँति अपार और अनिवार्य। और अनेक सेनाओं के बीच खड़े मुझसे, अरे अल्पबुद्धि मूर्ख, तुम युद्ध करना चाहते हो?
श्लोक 105 (5.160.105)
अक्षय्याविषुधी चैव अग्निदत्तं च ते रथम् । जानीमो हि रणे पार्थ केतुं दिव्यं च भारत ॥
akṣayyāviṣudhī caiva agnidattaṃ ca te ratham | jānīmo hi raṇe pārtha ketuṃ divyaṃ ca bhārata
हे पार्थ, हे भारत, हम तुम्हारे दोनों अक्षय तूणीरों को, अग्नि के दिए रथ को और युद्ध में तुम्हारी दिव्य ध्वजा को जानते हैं।
श्लोक 106 (5.160.106)
अकत्थमानो युद्ध्यस्व कत्थसेऽर्जुन किं बहु । पर्यायात्सिद्धिरेतस्य नैतत्सिध्यति कत्थनात् ॥
akatthamāno yuddhyasva katthase'rjuna kiṃ bahu | paryāyātsiddhiretasya naitatsidhyati katthanāt
हे अर्जुन, डींग मारे बिना युद्ध करो; इतनी डींग क्यों हाँकते हो? इसकी सिद्धि युद्ध के क्रम से होती है, डींग से यह सिद्ध नहीं होती।
श्लोक 107 (5.160.107)
यदीदं कत्थनाल्लोके सिध्येत्कर्म धनञ्जय । सर्वे भवेयुः सिद्धार्थाः कत्थने को हि दुर्गतः ॥
yadīdaṃ katthanālloke sidhyetkarma dhanañjaya | sarve bhaveyuḥ siddhārthāḥ katthane ko hi durgataḥ
हे धनञ्जय, यदि संसार में डींग मारने से ही काम सिद्ध हो जाते, तो सभी सफल-मनोरथ हो जाते — डींग मारने में भला कौन कंगाल है?
श्लोक 108 (5.160.108)
जानामि ते वासुदेवं सहायं । जानामि ते गाण्डिवं तालमात्रम् । जानाम्यहं त्वादृशो नास्ति योद्धा । जानानस्ते राज्यमेतद्धरामि ॥
jānāmi te vāsudevaṃ sahāyaṃ | jānāmi te gāṇḍivaṃ tālamātram | jānāmyahaṃ tvādṛśo nāsti yoddhā | jānānaste rājyametaddharāmi
मैं जानता हूँ कि वासुदेव तुम्हारे सहायक हैं; मैं जानता हूँ कि तुम्हारा गाण्डीव ताड़ के बराबर ऊँचा है; मैं जानता हूँ कि तुम जैसा कोई योद्धा नहीं — यह सब जानते हुए भी मैं तुम्हारा यह राज्य छीनता हूँ।
श्लोक 109 (5.160.109)
न तु पर्यायधर्मेण सिद्धिं प्राप्नोति मानवः । मनसैवानुकूलानि धातैव कुरुते वशे ॥
na tu paryāyadharmeṇa siddhiṃ prāpnoti mānavaḥ | manasaivānukūlāni dhātaiva kurute vaśe
मनुष्य क्रम से मिले अधिकार या छल-छद्म से सिद्धि नहीं पाता; अनुकूल वस्तुओं को तो विधाता ही अपने संकल्प से वश में करता है।
श्लोक 110 (5.160.110)
त्रयोदशसमा भुक्तं राज्यं विलपतस्तव । भूयश्चैव प्रशासिष्ये त्वां निहत्य सबान्धवम् ॥
trayodaśasamā bhuktaṃ rājyaṃ vilapatastava | bhūyaścaiva praśāsiṣye tvāṃ nihatya sabāndhavam
तेरह वर्ष तक तुम विलाप करते रहे और मैंने राज्य भोगा; और तुम्हें तुम्हारे बन्धुओं सहित मारकर मैं आगे भी शासन करूँगा।
श्लोक 111 (5.160.111)
क्व तदा गाण्डिवं तेऽभूद्यत्त्वं दासपणैर्जितः । क्व तदा भीमसेनस्य बलमासीच्च फाल्गुन ॥
kva tadā gāṇḍivaṃ te'bhūdyattvaṃ dāsapaṇairjitaḥ | kva tadā bhīmasenasya balamāsīcca phālguna
हे फाल्गुन, तब तुम्हारा गाण्डीव कहाँ था, जब तुम दास के रूप में दाँव पर जीत लिए गए थे? तब भीमसेन का बल कहाँ था?
श्लोक 112 (5.160.112)
सगदाद्भीमसेनाद्वा फाल्गुनाद्वा सगाण्डिवात् । न वै मोक्षस्तदा योऽभूद्विना कृष्णामनिन्दिताम् ॥
sagadādbhīmasenādvā phālgunādvā sagāṇḍivāt | na vai mokṣastadā yo'bhūdvinā kṛṣṇāmaninditām
तब न गदाधारी भीमसेन से तुम्हारा छुटकारा हुआ, न गाण्डीवधारी फाल्गुन से; वह केवल अनिन्दिता कृष्णा के कारण हुआ।
श्लोक 113 (5.160.113)
सा वो दास्ये समापन्नान्मोचयामास पार्षती । अमानुष्यं समापन्नान्दासकर्मण्यवस्थितान् ॥
sā vo dāsye samāpannānmocayāmāsa pārṣatī | amānuṣyaṃ samāpannāndāsakarmaṇyavasthitān
जब तुम दासता में पड़ गए थे, हीन दशा को पहुँच गए थे और दासों के काम में लगे थे, तब पृषतवंश की उस पुत्री (द्रौपदी) ने ही तुम्हें छुड़ाया था।
श्लोक 114 (5.160.114)
अवोचं यत्षण्डतिलानहं वस्तथ्यमेव तत् । धृता हि वेणी पार्थेन विराटनगरे तदा ॥
avocaṃ yatṣaṇḍatilānahaṃ vastathyameva tat | dhṛtā hi veṇī pārthena virāṭanagare tadā
मैंने तुम्हें जो "थोथे तिल" (नपुंसक) कहा था, वह बिल्कुल सच था; क्योंकि उन दिनों विराटनगर में पार्थ ने वेणी (चोटी) धारण की थी।
श्लोक 115 (5.160.115)
सूदकर्मणि च श्रान्तं विराटस्य महानसे । भीमसेनेन कौन्तेय यत्तु तन्मम पौरुषम् ॥
sūdakarmaṇi ca śrāntaṃ virāṭasya mahānase | bhīmasenena kaunteya yattu tanmama pauruṣam
और हे कुन्तीपुत्र, विराट की पाकशाला में भीमसेन रसोइये के काम से थक गया — वह मेरा ही पुरुषार्थ है।
श्लोक 116 (5.160.116)
एवमेव सदा दण्डं क्षत्रियाः क्षत्रिये दधुः । वेणीं कृत्वा षण्डवेषः कन्यां नर्तितवानसि ॥
evameva sadā daṇḍaṃ kṣatriyāḥ kṣatriye dadhuḥ | veṇīṃ kṛtvā ṣaṇḍaveṣaḥ kanyāṃ nartitavānasi
क्षत्रिय सदा क्षत्रिय को इसी प्रकार दण्ड देते आए हैं: तुमने चोटी गूँथी, नपुंसक का वेश धारण किया और एक कन्या को नाच सिखाया।
श्लोक 117 (5.160.117)
न भयाद्वासुदेवस्य न चापि तव फल्गुन । राज्यं प्रतिप्रदास्यामि युध्यस्व सहकेशवः ॥
na bhayādvāsudevasya na cāpi tava phalguna | rājyaṃ pratipradāsyāmi yudhyasva sahakeśavaḥ
हे फाल्गुन, न वासुदेव के भय से और न तुम्हारे भय से मैं राज्य लौटाऊँगा; केशव के साथ युद्ध करो।
श्लोक 118 (5.160.118)
न माया हीन्द्रजालं वा कुहका वापि भीषणा । आत्तशस्त्रस्य सङ्ग्रामे वहन्ति प्रतिगर्जनाः ॥
na māyā hīndrajālaṃ vā kuhakā vāpi bhīṣaṇā | āttaśastrasya saṅgrāme vahanti pratigarjanāḥ
माया, इन्द्रजाल या भयानक कृत्या — ये युद्ध में शस्त्र उठाए हुए वीर में केवल क्रोध ही जगाते हैं।
श्लोक 119 (5.160.119)
वासुदेवसहस्रं वा फाल्गुनानां शतानि वा । आसाद्य माममोघेषुं द्रविष्यन्ति दिशो दश ॥
vāsudevasahasraṃ vā phālgunānāṃ śatāni vā | āsādya māmamogheṣuṃ draviṣyanti diśo daśa
हजार वासुदेव या सैकड़ों फाल्गुन भी मुझ अचूक बाणों वाले से भिड़कर दसों दिशाओं में भाग खड़े होंगे।
श्लोक 120 (5.160.120)
संयुगं गच्छ भीष्मेण भिन्धि वा शिरसा गिरिम् । तरस्व वा महागाधं बाहुभ्यां पुरुषोदधिम् ॥
saṃyugaṃ gaccha bhīṣmeṇa bhindhi vā śirasā girim | tarasva vā mahāgādhaṃ bāhubhyāṃ puruṣodadhim
जाओ, भीष्म से युद्ध करो, या सिर से पर्वत फोड़ो, या अपनी भुजाओं से योद्धाओं के उस अथाह समुद्र को तैरकर पार करो,
श्लोक 121 (5.160.121)
शारद्वतमहामीनं विविंशतिमहोरगम् । बृहद्बलमहोद्वेलं सौमदत्तितिमिङ्गिलम् ॥
śāradvatamahāmīnaṃ viviṃśatimahoragam | bṛhadbalamahodvelaṃ saumadattitimiṅgilam
जिसमें शरद्वान् के पुत्र कृप बड़ी मछली हैं, विविंशति बड़ा सर्प है, बृहद्बल ऊँचा ज्वार है और सोमदत्त का पुत्र तिमिंगिल है;
श्लोक 122 (5.160.122)
भीष्मवेगमपर्यन्तं द्रोणग्राहदुरासदम् । कर्णशल्यझषावर्तं काम्भोजबडबामुखम् ॥
bhīṣmavegamaparyantaṃ droṇagrāhadurāsadam | karṇaśalyajhaṣāvartaṃ kāmbhojabaḍabāmukham
भीष्म जिसका अपार वेग है, द्रोणरूपी ग्राह के कारण जो दुर्गम है, कर्ण और शल्य जिसकी मछलियाँ और भँवर हैं, और काम्बोजराज जिसका वडवानल है;
श्लोक 123 (5.160.123)
दुःशासनौघं शलशल्यमत्स्यं । सुषेणचित्रायुधनागनक्रम् । जयद्रथाद्रिं पुरुमित्रगाधं । दुर्मर्षणोदं शकुनिप्रपातम् ॥
duḥśāsanaughaṃ śalaśalyamatsyaṃ | suṣeṇacitrāyudhanāganakram | jayadrathādriṃ purumitragādhaṃ | durmarṣaṇodaṃ śakuniprapātam
दुःशासन जिसकी बाढ़ है, शल और शल्य जिसकी मछलियाँ हैं, सुषेण और चित्रायुध जिसके जलसर्प और मगर हैं, जयद्रथ जिसकी चट्टान है, पुरुमित्र जिसकी गहराई है, दुर्मर्षण जिसका जल है और शकुनि जिसका प्रपात है;
श्लोक 124 (5.160.124)
शस्त्रौघमक्षय्यमभिप्रवृद्धं । यदावगाह्य श्रमनष्टचेताः । भविष्यसि त्वं हतसर्वबान्धव- । स्तदा मनस्ते परितापमेष्यति ॥
śastraughamakṣayyamabhipravṛddhaṃ | yadāvagāhya śramanaṣṭacetāḥ | bhaviṣyasi tvaṃ hatasarvabāndhava- | stadā manaste paritāpameṣyati
और जिसमें शस्त्रों का अक्षय प्रवाह बढ़ता ही जाता है। जब तुम उसमें उतरकर थकान से बेसुध हो जाओगे और तुम्हारे सब बन्धु मारे जा चुके होंगे, तब तुम्हारा मन पछतावे से भर जाएगा।
श्लोक 125 (5.160.125)
तदा मनस्ते त्रिदिवादिवाशुचे- । र्निवर्तिता पार्थ महीप्रशासनात् । प्रशाम्य राज्यं हि सुदुर्लभं त्वया । बुभूषितः स्वर्ग इवातपस्विना ॥
tadā manaste tridivādivāśuce- | rnivartitā pārtha mahīpraśāsanāt | praśāmya rājyaṃ hi sudurlabhaṃ tvayā | bubhūṣitaḥ svarga ivātapasvinā
हे पार्थ, तब तुम्हारा मन पृथ्वी पर शासन करने से वैसे ही लौट आएगा जैसे अपवित्र मनुष्य का मन स्वर्ग से। शान्त हो जाओ — यह राज्य तुम्हारे लिए अत्यन्त दुर्लभ है; तुम इसे वैसे ही चाहते हो जैसे तपहीन मनुष्य स्वर्ग चाहता है।'"