उद्योग पर्व · अध्याय 161
उलूक द्वारा दुर्योधन के कटु संदेश का कथन
संजय बताते हैं कि शकुनि का पुत्र उलूक पाण्डवों के शिविर में पहुँचता है और युधिष्ठिर से अभय पाकर एकत्र राजाओं के सामने दुर्योधन का संदेश सुनाता है। उस संदेश में युधिष्ठिर को जुए, द्रौपदी के अपमान तथा वनवास और दासता के वर्षों की याद दिलाकर ताने दिए गए हैं, और भीष्म, द्रोण, कर्ण तथा शल्य को जीतने की उनकी आशा का उपहास किया गया है। फिर उलूक अर्जुन की ओर मुड़कर उनकी डींगों और विराटनगर के उनके वेश की खिल्ली उड़ाता है, और कौरव सेना को योद्धाओं का ऐसा विशाल सागर बताता है जिसमें वे डूब जाएँगे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (5.161.1)
सेनानिवेशं संप्राप्तः कैतव्यः पाण्डवस्य ह । समागतः पाण्डवेयैर्युधिष्ठिरमभाषत ॥
senāniveśaṃ saṃprāptaḥ kaitavyaḥ pāṇḍavasya ha | samāgataḥ pāṇḍaveyairyudhiṣṭhiramabhāṣata
पाण्डव की सेना के पड़ाव पर पहुँचकर कैतव्य (उलूक) पाण्डवों से मिला और युधिष्ठिर से बोला —
उलूक उवाच
श्लोक 2 (5.161.2)
अभिज्ञो दूतवाक्यानां यथोक्तं ब्रुवतो मम । दुर्योधनसमादेशं श्रुत्वा न क्रोद्धुमर्हसि ॥
abhijño dūtavākyānāṃ yathoktaṃ bruvato mama | duryodhanasamādeśaṃ śrutvā na kroddhumarhasi
"आप दूतों के वचनों की रीति जानते हैं। मैं दुर्योधन का संदेश ज्यों-का-त्यों कह रहा हूँ; उसे सुनकर आपको क्रोध नहीं करना चाहिए।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 3 (5.161.3)
उलूक न भयं तेऽस्ति ब्रूहि त्वं विगतज्वरः । यन्मतं धार्तराष्ट्रस्य लुब्धस्यादीर्घदर्शिनः ॥
ulūka na bhayaṃ te'sti brūhi tvaṃ vigatajvaraḥ | yanmataṃ dhārtarāṣṭrasya lubdhasyādīrghadarśinaḥ
"उलूक, तुम्हें कोई भय नहीं है। निश्चिन्त होकर कहो कि उस लोभी और अदूरदर्शी धृतराष्ट्रपुत्र का क्या विचार है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 4 (5.161.4)
ततो द्युतिमतां मध्ये पाण्डवानां महात्मनाम् । सृञ्जयानां च मत्स्यानां कृष्णस्य च यशस्विनः ॥
tato dyutimatāṃ madhye pāṇḍavānāṃ mahātmanām | sṛñjayānāṃ ca matsyānāṃ kṛṣṇasya ca yaśasvinaḥ
तब तेजस्वी महात्मा पाण्डवों, सृंजयों, मत्स्यों और यशस्वी श्रीकृष्ण के बीच,
श्लोक 5 (5.161.5)
द्रुपदस्य सपुत्रस्य विराटस्य च संनिधौ । भूमिपानां च सर्वेषां मध्ये वाक्यं जगाद ह ॥
drupadasya saputrasya virāṭasya ca saṃnidhau | bhūmipānāṃ ca sarveṣāṃ madhye vākyaṃ jagāda ha
पुत्रों सहित द्रुपद और विराट की उपस्थिति में तथा सब राजाओं के बीच उसने यह वचन कहा —
उलूक उवाच
श्लोक 6 (5.161.6)
इदं त्वामब्रवीद्राजा धार्तराष्ट्रो महामनाः । शृण्वतां कुरुवीराणां तन्निबोध युधिष्ठिर ॥
idaṃ tvāmabravīdrājā dhārtarāṣṭro mahāmanāḥ | śṛṇvatāṃ kuruvīrāṇāṃ tannibodha yudhiṣṭhira
"महामना राजा दुर्योधन ने कौरव वीरों के सुनते हुए तुमसे यह कहा है। युधिष्ठिर, इसे ध्यान से सुनो।
श्लोक 7 (5.161.7)
पराजितोऽसि द्यूतेन कृष्णा चानायिता सभाम् । शक्योऽमर्षो मनुष्येण कर्तुं पुरुषमानिना ॥
parājito'si dyūtena kṛṣṇā cānāyitā sabhām | śakyo'marṣo manuṣyeṇa kartuṃ puruṣamāninā
तुम जुए में हार गए और कृष्णा (द्रौपदी) को सभा में घसीटकर लाया गया। जो अपने को पुरुष मानता है, उसे इस पर क्रोध होना ही चाहिए।
श्लोक 8 (5.161.8)
द्वादशैव तु वर्षाणि वने धिष्ण्याद्विवासितः । संवत्सरं विराटस्य दास्यमास्थाय चोषितः ॥
dvādaśaiva tu varṣāṇi vane dhiṣṇyādvivāsitaḥ | saṃvatsaraṃ virāṭasya dāsyamāsthāya coṣitaḥ
पूरे बारह वर्ष तुम घर से निकालकर वन में भेजे गए, और एक वर्ष तुमने विराट के यहाँ दास बनकर बिताया।
श्लोक 9 (5.161.9)
अमर्षं राज्यहरणं वनवासं च पाण्डव । द्रौपद्याश्च परिक्लेशं संस्मरन्पुरुषो भव ॥
amarṣaṃ rājyaharaṇaṃ vanavāsaṃ ca pāṇḍava | draupadyāśca parikleśaṃ saṃsmaranpuruṣo bhava
हे पाण्डुपुत्र, अपने क्रोध को, राज्य के छिन जाने को, वनवास को और द्रौपदी के कष्टों को याद करो और पुरुष बनो!
श्लोक 10 (5.161.10)
अशक्तेन च यच्छप्तं भीमसेनेन पाण्डव । दुःशासनस्य रुधिरं पीयतां यदि शक्यते ॥
aśaktena ca yacchaptaṃ bhīmasenena pāṇḍava | duḥśāsanasya rudhiraṃ pīyatāṃ yadi śakyate
हे पाण्डव, भीमसेन ने असमर्थ होकर जो शपथ ली थी — वह दुःशासन का रक्त पी ले, यदि पी सके।
श्लोक 11 (5.161.11)
लोहाभिसारो निर्वृत्तः कुरुक्षेत्रमकर्दमम् । समः पन्था भृतास्तेऽश्वाः श्वो युध्यस्व सकेशवः ॥
lohābhisāro nirvṛttaḥ kurukṣetramakardamam | samaḥ panthā bhṛtāste'śvāḥ śvo yudhyasva sakeśavaḥ
शस्त्रों का नीराजन-संस्कार हो चुका है, कुरुक्षेत्र कीचड़ से रहित है, मार्ग समतल है और तुम्हारे घोड़े भली-भाँति पुष्ट हैं। कल केशव को साथ लेकर युद्ध करो!
श्लोक 12 (5.161.12)
असमागम्य भीष्मेण संयुगे किं विकत्थसे । आरुरुक्षुर्यथा पङ्गुः पर्वतं गन्धमादनम् ॥
asamāgamya bhīṣmeṇa saṃyuge kiṃ vikatthase | ārurukṣuryathā paṅguḥ parvataṃ gandhamādanam
युद्ध में भीष्म से भिड़े बिना ही तुम क्यों डींग मारते हो? तुम उस लंगड़े के समान हो जो गन्धमादन पर्वत पर चढ़ना चाहता है।
श्लोक 13 (5.161.13)
एवं कत्थसि कौन्तेय अकत्थन्पुरुषो भव । सूतपुत्रं सुदुर्धर्षं शल्यं च बलिनां वरम् ॥
evaṃ katthasi kaunteya akatthanpuruṣo bhava | sūtaputraṃ sudurdharṣaṃ śalyaṃ ca balināṃ varam
हे कुन्तीपुत्र, तुम इसी प्रकार डींग मारते हो; डींग छोड़कर पुरुष बनो। अत्यन्त दुर्धर्ष सूतपुत्र को और बलवानों में श्रेष्ठ शल्य को,
श्लोक 14 (5.161.14)
द्रोणं च बलिनां श्रेष्ठं शचीपतिसमं युधि । अजित्वा संयुगे पार्थ राज्यं कथमिहेच्छसि ॥
droṇaṃ ca balināṃ śreṣṭhaṃ śacīpatisamaṃ yudhi | ajitvā saṃyuge pārtha rājyaṃ kathamihecchasi
और बलवानों में श्रेष्ठ, युद्ध में शचीपति इन्द्र के समान द्रोण को युद्ध में जीते बिना, हे पार्थ, तुम यहाँ राज्य की इच्छा कैसे करते हो?
श्लोक 15 (5.161.15)
ब्राह्मे धनुषि चाचार्यं वेदयोरन्तगं द्वयोः । युधि धुर्यमविक्षोभ्यमनीकचरमच्युतम् ॥
brāhme dhanuṣi cācāryaṃ vedayorantagaṃ dvayoḥ | yudhi dhuryamavikṣobhyamanīkacaramacyutam
द्रोण ब्राह्म धनुर्विद्या के आचार्य हैं और दोनों वेदों के पारंगत हैं; युद्ध में वे धुरी सँभालने वाले, अविचल, सेना के बीच विचरने वाले और कभी न डिगने वाले हैं।
श्लोक 16 (5.161.16)
द्रोणं महाद्युतिं पार्थ जेतुमिच्छसि तन्मृषा । न हि शुश्रुम वातेन मेरुमुन्मथितं गिरिम् ॥
droṇaṃ mahādyutiṃ pārtha jetumicchasi tanmṛṣā | na hi śuśruma vātena merumunmathitaṃ girim
हे पार्थ, तुम उन महातेजस्वी द्रोण को जीतना चाहते हो — यह व्यर्थ है। हमने कभी नहीं सुना कि वायु ने मेरु पर्वत को उखाड़ दिया हो।
श्लोक 17 (5.161.17)
अनिलो वा वहेन्मेरुं द्यौर्वापि निपतेन्महीम् । युगं वा परिवर्तेत यद्येवं स्याद्यथात्थ माम् ॥
anilo vā vahenmeruṃ dyaurvāpi nipatenmahīm | yugaṃ vā parivarteta yadyevaṃ syādyathāttha mām
यदि बात वैसी ही हो जैसी तुम मुझसे कहते हो, तो वायु मेरु को उड़ा ले जाए, आकाश पृथ्वी पर गिर पड़े या युग ही पलट जाए।
श्लोक 18 (5.161.18)
को ह्यस्ति जीविताकाङ्क्षी प्राप्येममरिमर्दनम् । गजो वाजी रथो वापि पुनः स्वस्ति गृहान्व्रजेत् ॥
ko hyasti jīvitākāṅkṣī prāpyemamarimardanam | gajo vājī ratho vāpi punaḥ svasti gṛhānvrajet
जीने की इच्छा रखने वाला कौन — हाथी हो, घोड़ा हो या रथ — इस शत्रुमर्दन से भिड़कर फिर सकुशल घर लौट सकता है?
श्लोक 19 (5.161.19)
कथमाभ्यामभिध्यातः संसृष्टो दारुणेन वा । रणे जीवन्विमुच्येत पदा भूमिमुपस्पृशन् ॥
kathamābhyāmabhidhyātaḥ saṃsṛṣṭo dāruṇena vā | raṇe jīvanvimucyeta padā bhūmimupaspṛśan
इन दोनों की दृष्टि जिस पर पड़ जाए, या जो इनमें से किसी भयंकर योद्धा से उलझ जाए, वह रण से जीवित, पैरों से भूमि छूता हुआ, कैसे बच निकलेगा?
श्लोक 20 (5.161.20)
किं दर्दुरः कूपशयो यथेमां । न बुध्यसे राजचमूं समेताम् । दुराधर्षां देवचमूप्रकाशां । गुप्तां नरेन्द्रैस्त्रिदशैरिव द्याम् ॥
kiṃ darduraḥ kūpaśayo yathemāṃ | na budhyase rājacamūṃ sametām | durādharṣāṃ devacamūprakāśāṃ | guptāṃ narendraistridaśairiva dyām
कुएँ में पड़े मेंढक की भाँति तुम इस एकत्र राजसेना को क्यों नहीं समझते — जो दुर्धर्ष है, देवसेना के समान दीप्त है, और राजाओं से वैसे ही सुरक्षित है जैसे देवताओं से स्वर्ग?
श्लोक 21 (5.161.21)
प्राच्यैः प्रतीच्यैरथ दाक्षिणात्यै- । रुदीच्यकाम्भोजशकैः खशैश्च । साल्वैः समत्स्यैः कुरुमुख्यदेश्यै- । र्म्लेच्छैः पुलिन्दैर्द्रविडान्ध्रकाञ्च्यैः ॥
prācyaiḥ pratīcyairatha dākṣiṇātyai- | rudīcyakāmbhojaśakaiḥ khaśaiśca | sālvaiḥ samatsyaiḥ kurumukhyadeśyai- | rmlecchaiḥ pulindairdraviḍāndhrakāñcyaiḥ
उसकी रक्षा पूर्व और पश्चिम के, दक्षिण और उत्तर के योद्धा करते हैं; काम्बोज, शक और खश; शाल्व और मत्स्य; कुरु के प्रमुख प्रदेशों के लोग; म्लेच्छ, पुलिन्द, द्रविड़, आन्ध्र और काञ्ची के वीर।
श्लोक 22 (5.161.22)
नानाजनौघं युधि संप्रवृद्धं । गाङ्गं यथा वेगमपारणीयम् । मां च स्थितं नागबलस्य मध्ये । युयुत्ससे मन्द किमल्पबुद्धे ॥
nānājanaughaṃ yudhi saṃpravṛddhaṃ | gāṅgaṃ yathā vegamapāraṇīyam | māṃ ca sthitaṃ nāgabalasya madhye | yuyutsase manda kimalpabuddhe
अनेक जातियों का यह जनसमूह युद्ध के लिए गंगा के अजेय वेग की भाँति उमड़ रहा है, और मैं हाथियों की सेना के बीच खड़ा हूँ — हे मन्दबुद्धि मूर्ख, क्या तुम इनसे युद्ध करना चाहते हो?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 23 (5.161.23)
इत्येवमुक्त्वा राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । अभ्यावृत्य पुनर्जिष्णुमुलूकः प्रत्यभाषत ॥
ityevamuktvā rājānaṃ dharmaputraṃ yudhiṣṭhiram | abhyāvṛtya punarjiṣṇumulūkaḥ pratyabhāṣata
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर से ऐसा कहकर उलूक फिर अर्जुन की ओर मुड़ा और बोला —
उलूक उवाच
श्लोक 24 (5.161.24)
अकत्थमानो युध्यस्व कत्थसेऽर्जुन किं बहु । पर्यायात्सिद्धिरेतस्य नैतत्सिध्यति कत्थनात् ॥
akatthamāno yudhyasva katthase'rjuna kiṃ bahu | paryāyātsiddhiretasya naitatsidhyati katthanāt
"डींग मारे बिना युद्ध करो। अर्जुन, तुम इतनी डींग क्यों मारते हो? इसमें सफलता अपने क्रम से मिलती है; डींग मारने से यह सिद्ध नहीं होती।
श्लोक 25 (5.161.25)
यदीदं कत्थनाल्लोके सिध्येत्कर्म धनञ्जय । सर्वे भवेयुः सिद्धार्थाः कत्थने को हि दुर्गतः ॥
yadīdaṃ katthanālloke sidhyetkarma dhanañjaya | sarve bhaveyuḥ siddhārthāḥ katthane ko hi durgataḥ
हे धनंजय, यदि संसार में डींग मारने से ही कार्य सिद्ध होते, तो सब सफल हो जाते — डींग मारने में भला कौन दरिद्र है?
श्लोक 26 (5.161.26)
जानामि ते वासुदेवं सहायं । जानामि ते गाण्डिवं तालमात्रम् । जानाम्येतत्त्वादृशो नास्ति योद्धा । जानानस्ते राज्यमेतद्धरामि ॥
jānāmi te vāsudevaṃ sahāyaṃ | jānāmi te gāṇḍivaṃ tālamātram | jānāmyetattvādṛśo nāsti yoddhā | jānānaste rājyametaddharāmi
मैं जानता हूँ कि वासुदेव तुम्हारे सहायक हैं। मैं जानता हूँ कि तुम्हारा गाण्डीव ताड़ के पेड़ जितना बड़ा है। मैं जानता हूँ कि तुम्हारे समान कोई योद्धा नहीं है। यह सब जानते हुए भी मैं तुम्हारा यह राज्य छीन रहा हूँ।
श्लोक 27 (5.161.27)
न तु पर्यायधर्मेण राज्यं प्राप्नोति मानुषः । मनसैवानुकूलानि विधाता कुरुते वशे ॥
na tu paryāyadharmeṇa rājyaṃ prāpnoti mānuṣaḥ | manasaivānukūlāni vidhātā kurute vaśe
मनुष्य क्रम-धर्म से राज्य नहीं पाता; विधाता अपने संकल्प-मात्र से ही अनुकूल वस्तुओं को किसी के वश में कर देता है।
श्लोक 28 (5.161.28)
त्रयोदश समा भुक्तं राज्यं विलपतस्तव । भूयश्चैव प्रशासिष्ये निहत्य त्वां सबान्धवम् ॥
trayodaśa samā bhuktaṃ rājyaṃ vilapatastava | bhūyaścaiva praśāsiṣye nihatya tvāṃ sabāndhavam
तेरह वर्ष तक तुम विलाप करते रहे और मैंने राज्य भोगा; तुम्हें बन्धु-बान्धवों सहित मारकर मैं फिर इस पर शासन करूँगा।
श्लोक 29 (5.161.29)
क्व तदा गाण्डिवं तेऽभूद्यत्त्वं दासपणैर्जितः । क्व तदा भीमसेनस्य बलमासीच्च फाल्गुन ॥
kva tadā gāṇḍivaṃ te'bhūdyattvaṃ dāsapaṇairjitaḥ | kva tadā bhīmasenasya balamāsīcca phālguna
जब तुम दासों के दाँव में जीत लिए गए थे, तब तुम्हारा गाण्डीव कहाँ था? फाल्गुन, तब भीमसेन का बल कहाँ था?
श्लोक 30 (5.161.30)
सगदाद्भीमसेनाद्वा पार्थाद्वापि सगाण्डिवात् । न वै मोक्षस्तदा वोऽभूद्विना कृष्णामनिन्दिताम् ॥
sagadādbhīmasenādvā pārthādvāpi sagāṇḍivāt | na vai mokṣastadā vo'bhūdvinā kṛṣṇāmaninditām
तब न गदाधारी भीमसेन से तुम्हारा छुटकारा हुआ, न गाण्डीवधारी पार्थ से; निर्दोष कृष्णा के बिना तुम्हारा उद्धार नहीं हुआ।
श्लोक 31 (5.161.31)
सा वो दास्ये समापन्नान्मोचयामास पार्षती । अमानुष्यं समापन्नान्दासकर्मण्यवस्थितान् ॥
sā vo dāsye samāpannānmocayāmāsa pārṣatī | amānuṣyaṃ samāpannāndāsakarmaṇyavasthitān
जब तुम दासता में पड़ गए थे, मनुष्योचित स्थिति खो बैठे थे और दासों के काम में लगे थे, तब उस पार्षती (द्रौपदी) ने ही तुम्हें छुड़ाया।
श्लोक 32 (5.161.32)
अवोचं यत्षण्डतिलानहं वस्तथ्यमेव तत् । धृता हि वेणी पार्थेन विराटनगरे तदा ॥
avocaṃ yatṣaṇḍatilānahaṃ vastathyameva tat | dhṛtā hi veṇī pārthena virāṭanagare tadā
मैंने तुम्हें जो थोथे तिल कहा था, वह सच ही निकला; क्योंकि तब विराटनगर में पार्थ ने वेणी धारण की थी।
श्लोक 33 (5.161.33)
सूदकर्मणि च श्रान्तं विराटस्य महानसे । भीमसेनेन कौन्तेय यच्च तन्मम पौरुषम् ॥
sūdakarmaṇi ca śrāntaṃ virāṭasya mahānase | bhīmasenena kaunteya yacca tanmama pauruṣam
और हे कुन्तीपुत्र, भीमसेन विराट की पाकशाला में रसोइये का काम करते-करते थक गए — यह मेरा ही पौरुष था।
श्लोक 34 (5.161.34)
एवमेतत्सदा दण्डं क्षत्रियाः क्षत्रिये दधुः । वेणीं कृत्वा षण्डवेषः कन्यां नर्तितवानसि ॥
evametatsadā daṇḍaṃ kṣatriyāḥ kṣatriye dadhuḥ | veṇīṃ kṛtvā ṣaṇḍaveṣaḥ kanyāṃ nartitavānasi
क्षत्रिय क्षत्रिय को सदा इसी प्रकार दण्ड देते आए हैं: तुमने वेणी गूँथी, नपुंसक का वेश धरा और एक कन्या को नाचना सिखाया।
श्लोक 35 (5.161.35)
न भयाद्वासुदेवस्य न चापि तव फाल्गुन । राज्यं प्रतिप्रदास्यामि युध्यस्व सहकेशवः ॥
na bhayādvāsudevasya na cāpi tava phālguna | rājyaṃ pratipradāsyāmi yudhyasva sahakeśavaḥ
फाल्गुन, न वासुदेव के भय से और न तुम्हारे भय से मैं राज्य लौटाऊँगा। केशव को साथ लेकर युद्ध करो!
श्लोक 36 (5.161.36)
न माया हीन्द्रजालं वा कुहका वापि भीषणा । आत्तशस्त्रस्य मे युद्धे वहन्ति प्रतिगर्जनाः ॥
na māyā hīndrajālaṃ vā kuhakā vāpi bhīṣaṇā | āttaśastrasya me yuddhe vahanti pratigarjanāḥ
जब मैं युद्ध में शस्त्र उठा लेता हूँ, तब कोई माया, कोई इन्द्रजाल, कोई भयानक छल मुझ पर काम नहीं करता; उनसे केवल मेरी प्रतिगर्जना ही उठती है।
श्लोक 37 (5.161.37)
वासुदेवसहस्रं वा फाल्गुनानां शतानि वा । आसाद्य माममोघेषुं द्रविष्यन्ति दिशो दश ॥
vāsudevasahasraṃ vā phālgunānāṃ śatāni vā | āsādya māmamogheṣuṃ draviṣyanti diśo daśa
हजार वासुदेव या सैकड़ों फाल्गुन भी अचूक बाणों वाले मुझसे भिड़कर दसों दिशाओं में भाग खड़े होंगे।
श्लोक 38 (5.161.38)
संयुगं गच्छ भीष्मेण भिन्धि वा शिरसा गिरिम् । तरेमं वा महागाधं बाहुभ्यां पुरुषोदधिम् ॥
saṃyugaṃ gaccha bhīṣmeṇa bhindhi vā śirasā girim | taremaṃ vā mahāgādhaṃ bāhubhyāṃ puruṣodadhim
जाओ, युद्ध में भीष्म से भिड़ो, या सिर से पर्वत को फोड़ो, या अपनी भुजाओं से इस अथाह विशाल मानव-सागर को तैरकर पार करो —
श्लोक 39 (5.161.39)
शारद्वतमहामीनं विविंशतिमहोरगम् । बृहद्बलमहोद्वेलं सौमदत्तितिमिङ्गिलम् ॥
śāradvatamahāmīnaṃ viviṃśatimahoragam | bṛhadbalamahodvelaṃ saumadattitimiṅgilam
जिसमें शारद्वत (कृपाचार्य) बड़ी मछली हैं, विविंशति महासर्प हैं, बृहद्बल ऊँचा ज्वार हैं और सोमदत्त का पुत्र तिमिंगिल है;
श्लोक 40 (5.161.40)
भीष्मवेगमपर्यन्तं द्रोणग्राहदुरासदम् । कर्णशल्यझषावर्तं काम्भोजबडबामुखम् ॥
bhīṣmavegamaparyantaṃ droṇagrāhadurāsadam | karṇaśalyajhaṣāvartaṃ kāmbhojabaḍabāmukham
जिसका असीम वेग भीष्म हैं, जो द्रोणरूपी ग्राह के कारण दुर्गम है, कर्ण और शल्य जिसकी मछलियों से भरी भँवरें हैं, और काम्बोजराज जिसकी बडवाग्नि है;
श्लोक 41 (5.161.41)
दुःशासनौघं शलशल्यमत्स्यं । सुषेणचित्रायुधनागनक्रम् । जयद्रथाद्रिं पुरुमित्रगाधं । दुर्मर्षणोदं शकुनिप्रपातम् ॥
duḥśāsanaughaṃ śalaśalyamatsyaṃ | suṣeṇacitrāyudhanāganakram | jayadrathādriṃ purumitragādhaṃ | durmarṣaṇodaṃ śakuniprapātam
जिसकी बाढ़ दुःशासन है, शल और शल्य मछलियाँ हैं, सुषेण और चित्रायुध नाग और नक्र हैं, जयद्रथ चट्टान है, पुरुमित्र गहराई है, दुर्मर्षण जल है और शकुनि प्रपात है —
श्लोक 42 (5.161.42)
शस्त्रौघमक्षय्यमतिप्रवृद्धं । यदावगाह्य श्रमनष्टचेताः । भविष्यसि त्वं हतसर्वबान्धव- । स्तदा मनस्ते परितापमेष्यति ॥
śastraughamakṣayyamatipravṛddhaṃ | yadāvagāhya śramanaṣṭacetāḥ | bhaviṣyasi tvaṃ hatasarvabāndhava- | stadā manaste paritāpameṣyati
शस्त्रों के इस अक्षय और अत्यन्त उमड़ते सागर में जब तुम उतरोगे, थकान से तुम्हारी चेतना नष्ट हो जाएगी और तुम्हारे सब बन्धु मारे जाएँगे, तब तुम्हारा मन पश्चात्ताप से भर जाएगा।
श्लोक 43 (5.161.43)
तदा मनस्ते त्रिदिवादिवाशुचे- । र्निवर्तिता पार्थ महीप्रशासनात् । प्रशाम्य राज्यं हि सुदुर्लभं त्वया । बुभूषितः स्वर्ग इवातपस्विना ॥
tadā manaste tridivādivāśuce- | rnivartitā pārtha mahīpraśāsanāt | praśāmya rājyaṃ hi sudurlabhaṃ tvayā | bubhūṣitaḥ svarga ivātapasvinā
हे पार्थ, तब तुम्हारा मन पृथ्वी पर शासन करने से वैसे ही लौट आएगा जैसे अपवित्र मनुष्य स्वर्ग से लौटा दिया जाता है। इसलिए शान्त हो जाओ; जिस राज्य की तुम कामना करते हो, वह तुम्हारे लिए वैसा ही दुर्लभ है जैसा तपस्या-रहित मनुष्य के लिए स्वर्ग।"