उद्योग पर्व · अध्याय 162
पाण्डवों का उलूक को उत्तर
उलूक अर्जुन और अन्य सबके सामने अपना संदेश दोहराता है, और पाण्डव पक्ष के योद्धा क्रोध से उछल पड़ते हैं। श्रीकृष्ण उलूक से कहते हैं कि दुर्योधन को बता दे कि उसकी बात सुन ली गई है; भीम दुर्योधन और उसके भाइयों के वध तथा दुःशासन का रक्त पीने की प्रतिज्ञा करते हैं, और सहदेव शकुनि के सामने उलूक को और फिर स्वयं शकुनि को मारने की प्रतिज्ञा करते हैं। अर्जुन भीम को यह कहकर रोकते हैं कि दूत का कोई दोष नहीं, और गाण्डीव से उत्तर देने का वचन देते हैं; युधिष्ठिर कहला भेजते हैं कि दुर्योधन अपने बल पर लड़े, और श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे भले ही केवल अर्जुन का रथ हाँकें, दुर्योधन उस रथ से बच नहीं पाएगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (5.162.1)
उलूकस्त्वर्जुनं भूयो यथोक्तं वाक्यमब्रवीत् । आशीविषमिव क्रुद्धं तुदन्वाक्यशलाकया ॥
ulūkastvarjunaṃ bhūyo yathoktaṃ vākyamabravīt | āśīviṣamiva kruddhaṃ tudanvākyaśalākayā
तब उलूक ने फिर अर्जुन से वैसे ही वचन कहे जैसे उसे सिखाए गए थे, मानो क्रुद्ध सर्प को वचनरूपी शलाकाओं से कुरेद रहा हो।
श्लोक 2 (5.162.2)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रुषिताः पाण्डवा भृशम् । प्रागेव भृशसंक्रुद्धाः कैतव्येनापि धर्षिताः ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā ruṣitāḥ pāṇḍavā bhṛśam | prāgeva bhṛśasaṃkruddhāḥ kaitavyenāpi dharṣitāḥ
उसके वे वचन सुनकर पाण्डव अत्यन्त रुष्ट हो गए; वे पहले से ही बहुत क्रुद्ध थे, और अब कैतव्य ने भी उनका अपमान कर दिया था।
श्लोक 3 (5.162.3)
आसनेषूदतिष्ठन्त बाहूंश्चैव प्रचिक्षिपुः । आशीविषा इव क्रुद्धा वीक्षाञ्चक्रुः परस्परम् ॥
āsaneṣūdatiṣṭhanta bāhūṃścaiva pracikṣipuḥ | āśīviṣā iva kruddhā vīkṣāñcakruḥ parasparam
वे अपने आसनों से उठ खड़े हुए और भुजाएँ फटकारने लगे, तथा क्रुद्ध सर्पों की भाँति एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
श्लोक 4 (5.162.4)
अवाक्छिरा भीमसेनः समुदैक्षत कैतवम् । नेत्राभ्यां लोहितान्ताभ्यामाशीविष इव श्वसन् ॥
avākchirā bhīmasenaḥ samudaikṣata kaitavam | netrābhyāṃ lohitāntābhyāmāśīviṣa iva śvasan
भीमसेन ने सिर झुकाए हुए, लाल कोरों वाली आँखों से कैतव (उलूक) की ओर देखा और विषधर सर्प की तरह फुफकारने लगे।
श्लोक 5 (5.162.5)
आर्तं वातात्मजं दृष्ट्वा क्रोधेनाभिहतं भृशम् । उत्स्मयन्निव दाशार्हः कैतव्यं प्रत्यभाषत ॥
ārtaṃ vātātmajaṃ dṛṣṭvā krodhenābhihataṃ bhṛśam | utsmayanniva dāśārhaḥ kaitavyaṃ pratyabhāṣata
वायुपुत्र भीम को क्रोध से अत्यन्त पीड़ित और व्याकुल देखकर दाशार्ह (श्रीकृष्ण) ने मुस्कुराते हुए कैतव्य से कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 6 (5.162.6)
प्रयाहि शीघ्रं कैतव्य ब्रूयाश्चैव सुयोधनम् । श्रुतं वाक्यं गृहीतोऽर्थो मतं यत्ते तथास्तु तत् ॥
prayāhi śīghraṃ kaitavya brūyāścaiva suyodhanam | śrutaṃ vākyaṃ gṛhīto'rtho mataṃ yatte tathāstu tat
"कैतव्य, शीघ्र जाओ और सुयोधन से कहना: तुम्हारी बात सुन ली गई और उसका अर्थ समझ लिया गया; जैसा तुम चाहते हो, वैसा ही हो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 7 (5.162.7)
एवमुक्त्वा महाबाहुः केशवो राजसत्तम । पुनरेव महाप्राज्ञं युधिष्ठिरमुदैक्षत ॥
evamuktvā mahābāhuḥ keśavo rājasattama | punareva mahāprājñaṃ yudhiṣṭhiramudaikṣata
हे नृपश्रेष्ठ, ऐसा कहकर महाबाहु केशव ने फिर से परम बुद्धिमान युधिष्ठिर की ओर देखा।
श्लोक 8 (5.162.8)
सृञ्जयानां च सर्वेषां कृष्णस्य च यशस्विनः । द्रुपदस्य सपुत्रस्य विराटस्य च संनिधौ ॥
sṛñjayānāṃ ca sarveṣāṃ kṛṣṇasya ca yaśasvinaḥ | drupadasya saputrasya virāṭasya ca saṃnidhau
सब सृंजयों और यशस्वी कृष्ण के, पुत्रों सहित द्रुपद के और विराट के सामने,
श्लोक 9 (5.162.9)
भूमिपानां च सर्वेषां मध्ये वाक्यं जगाद ह । उलूकोऽप्यर्जुनं भूयो यथोक्तं वाक्यमब्रवीत् ॥
bhūmipānāṃ ca sarveṣāṃ madhye vākyaṃ jagāda ha | ulūko'pyarjunaṃ bhūyo yathoktaṃ vākyamabravīt
तथा सब राजाओं के बीच उसने अपनी बात कही। उलूक ने भी फिर अर्जुन से वैसे ही वचन कहे जैसे उसे सिखाए गए थे,
श्लोक 10 (5.162.10)
आशीविषमिव क्रुद्धं तुदन्वाक्यशलाकया । कृष्णादींश्चैव तान्सर्वान्यथोक्तं वाक्यमब्रवीत् ॥
āśīviṣamiva kruddhaṃ tudanvākyaśalākayā | kṛṣṇādīṃścaiva tānsarvānyathoktaṃ vākyamabravīt
मानो क्रुद्ध सर्प को वचनरूपी शलाकाओं से कुरेद रहा हो; और कृष्ण आदि उन सबसे भी उसने वे ही सिखाए हुए वचन कहे।
श्लोक 11 (5.162.11)
उलूकस्य तु तद्वाक्यं पापं दारुणमीरितम् । श्रुत्वा विचुक्षुभे पार्थो ललाटं चाप्यमार्जयत् ॥
ulūkasya tu tadvākyaṃ pāpaṃ dāruṇamīritam | śrutvā vicukṣubhe pārtho lalāṭaṃ cāpyamārjayat
उलूक के कहे हुए उन पापपूर्ण और कठोर वचनों को सुनकर पार्थ क्षुब्ध हो उठे और अपना ललाट पोंछने लगे।
श्लोक 12 (5.162.12)
तदवस्थं तदा दृष्ट्वा पार्थं सा समितिर्नृप । नामृष्यत महाराज पाण्डवानां महारथाः ॥
tadavasthaṃ tadā dṛṣṭvā pārthaṃ sā samitirnṛpa | nāmṛṣyata mahārāja pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ
हे राजन्, पार्थ को उस दशा में देखकर वह सभा — पाण्डवों के महारथी — हे महाराज, उसे सहन न कर सकी।
श्लोक 13 (5.162.13)
अधिक्षेपेण कृष्णस्य पार्थस्य च महात्मनः । श्रुत्वा ते पुरुषव्याघ्राः क्रोधाञ्जज्वलुरच्युत ॥
adhikṣepeṇa kṛṣṇasya pārthasya ca mahātmanaḥ | śrutvā te puruṣavyāghrāḥ krodhāñjajvaluracyuta
हे अविचल राजन्, कृष्ण और महात्मा पार्थ का अपमान सुनकर वे पुरुषसिंह क्रोध से जल उठे।
श्लोक 14 (5.162.14)
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सात्यकिश्च महारथः । केकया भ्रातरः पञ्च राक्षसश्च घटोत्कचः ॥
dhṛṣṭadyumnaḥ śikhaṇḍī ca sātyakiśca mahārathaḥ | kekayā bhrātaraḥ pañca rākṣasaśca ghaṭotkacaḥ
धृष्टद्युम्न और शिखण्डी, महारथी सात्यकि, पाँचों केकय भाई, राक्षस घटोत्कच,
श्लोक 15 (5.162.15)
द्रौपदेयाभिमन्युश्च धृष्टकेतुश्च पार्थिवः । भीमसेनश्च विक्रान्तो यमजौ च महारथौ ॥
draupadeyābhimanyuśca dhṛṣṭaketuśca pārthivaḥ | bhīmasenaśca vikrānto yamajau ca mahārathau
द्रौपदी के पुत्र और अभिमन्यु, राजा धृष्टकेतु, पराक्रमी भीमसेन और दोनों महारथी जुड़वाँ भाई (नकुल-सहदेव) —
श्लोक 16 (5.162.16)
उत्पेतुरासनात्सर्वे क्रोधसंरक्तलोचनाः । बाहून्प्रगृह्य रुचिरान्रक्तचन्दनरूषितान् । अङ्गदैः पारिहार्यैश्च केयूरैश्च विभूषितान् ॥
utpeturāsanātsarve krodhasaṃraktalocanāḥ | bāhūnpragṛhya rucirānraktacandanarūṣitān | aṅgadaiḥ pārihāryaiśca keyūraiśca vibhūṣitān
सब क्रोध से लाल आँखें किए अपने आसनों से उछल पड़े और लाल चन्दन से चर्चित, अंगदों, कंगनों और केयूरों से सजी अपनी सुन्दर भुजाएँ उठा लीं।
श्लोक 17 (5.162.17)
दन्तान्दन्तेषु निष्पिष्य सृक्किणी परिलेलिहन् । तेषामाकारभावज्ञः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ॥
dantāndanteṣu niṣpiṣya sṛkkiṇī parilelihan | teṣāmākārabhāvajñaḥ kuntīputro vṛkodaraḥ
वे दाँत पीसते हुए होंठों के कोने चाटने लगे। उनकी चेष्टा और मनोभाव को समझकर कुन्तीपुत्र वृकोदर
श्लोक 18 (5.162.18)
उदतिष्ठत्स वेगेन क्रोधेन प्रज्वलन्निव । उद्वृत्य सहसा नेत्रे दन्तान्कटकटाय्य च ॥
udatiṣṭhatsa vegena krodhena prajvalanniva | udvṛtya sahasā netre dantānkaṭakaṭāyya ca
मानो क्रोध से जलते हुए वेग से उठ खड़े हुए। सहसा आँखें तरेरकर और दाँत कटकटाकर,
श्लोक 19 (5.162.19)
हस्तं हस्तेन निष्पिष्य उलूकं वाक्यमब्रवीत् । अशक्तानामिवास्माकं प्रोत्साहननिमित्तकम् ॥
hastaṃ hastena niṣpiṣya ulūkaṃ vākyamabravīt | aśaktānāmivāsmākaṃ protsāhananimittakam
हाथ से हाथ मसलते हुए वे उलूक से बोले — "हमें मानो असमर्थ समझकर उकसाने के लिए कहे गए वचन —
भीम उवाच
श्लोक 20 (5.162.20)
श्रुतं ते वचनं मूर्ख यत्त्वां दुर्योधनोऽब्रवीत् । तन्मे कथयतो मन्द शृणु वाक्यं दुरासदम् ॥
śrutaṃ te vacanaṃ mūrkha yattvāṃ duryodhano'bravīt | tanme kathayato manda śṛṇu vākyaṃ durāsadam
मूर्ख, दुर्योधन ने तुमसे जो कहा, वह हमने सुन लिया। अब मन्दबुद्धि, मैं जो दुःसह वचन कह रहा हूँ, उन्हें सुनो,
श्लोक 21 (5.162.21)
सर्वक्षत्रस्य मध्ये तं यद्वक्ष्यसि सुयोधनम् । शृण्वतः सूतपुत्रस्य पितुश्च त्वं दुरात्मनः ॥
sarvakṣatrasya madhye taṃ yadvakṣyasi suyodhanam | śṛṇvataḥ sūtaputrasya pituśca tvaṃ durātmanaḥ
और उन्हें सब क्षत्रियों के बीच, सूतपुत्र और अपने दुष्ट पिता के सुनते हुए सुयोधन से कहना।
श्लोक 22 (5.162.22)
अस्माभिः प्रीतिकामैस्तु भ्रातुर्ज्येष्ठस्य नित्यशः । मर्षितं ते दुराचार तत्त्वं न बहु मन्यसे ॥
asmābhiḥ prītikāmaistu bhrāturjyeṣṭhasya nityaśaḥ | marṣitaṃ te durācāra tattvaṃ na bahu manyase
दुराचारी, अपने बड़े भाई को प्रसन्न रखने की इच्छा से हम सदा तुम्हें सहते आए हैं, और तुम उसका कोई मूल्य नहीं समझते।
श्लोक 23 (5.162.23)
प्रेषितश्च हृषीकेशः शमाकाङ्क्षी कुरून्प्रति । कुलस्य हितकामेन धर्मराजेन धीमता ॥
preṣitaśca hṛṣīkeśaḥ śamākāṅkṣī kurūnprati | kulasya hitakāmena dharmarājena dhīmatā
कुल का हित चाहने वाले बुद्धिमान धर्मराज ने शान्ति की इच्छा से हृषीकेश को कौरवों के पास भेजा था।
श्लोक 24 (5.162.24)
त्वं कालचोदितो नूनं गन्तुकामो यमक्षयम् । गच्छस्वाहवमस्माभिस्तच्च श्वो भविता ध्रुवम् ॥
tvaṃ kālacodito nūnaṃ gantukāmo yamakṣayam | gacchasvāhavamasmābhistacca śvo bhavitā dhruvam
निश्चय ही काल ने तुम्हें प्रेरित किया है और तुम यमलोक जाना चाहते हो। हमसे युद्ध करने आओ — और वह कल अवश्य होगा।
श्लोक 25 (5.162.25)
मयापि च प्रतिज्ञातो वधः सभ्रातृकस्य ते । स तथा भविता पाप नात्र कार्या विचारणा ॥
mayāpi ca pratijñāto vadhaḥ sabhrātṛkasya te | sa tathā bhavitā pāpa nātra kāryā vicāraṇā
मैंने भी भाइयों सहित तुम्हारे वध की प्रतिज्ञा की है। पापी, वह वैसा ही होगा; इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 26 (5.162.26)
वेलामतिक्रमेत्सद्यः सागरो वरुणालयः । पर्वताश्च विशीर्येयुर्मयोक्तं न मृषा भवेत् ॥
velāmatikrametsadyaḥ sāgaro varuṇālayaḥ | parvatāśca viśīryeyurmayoktaṃ na mṛṣā bhavet
वरुण का निवास सागर सहसा अपनी मर्यादा लाँघ जाए और पर्वत चूर-चूर हो जाएँ, पर मेरा कहा झूठा नहीं होगा।
श्लोक 27 (5.162.27)
सहायस्ते यदि यमः कुबेरो रुद्र एव वा । यथाप्रतिज्ञं दुर्बुद्धे प्रकरिष्यन्ति पाण्डवाः । दुःशासनस्य रुधिरं पाता चास्मि यथेप्सितम् ॥
sahāyaste yadi yamaḥ kubero rudra eva vā | yathāpratijñaṃ durbuddhe prakariṣyanti pāṇḍavāḥ | duḥśāsanasya rudhiraṃ pātā cāsmi yathepsitam
दुर्बुद्धि, चाहे यम, कुबेर या स्वयं रुद्र तुम्हारे सहायक हों, पाण्डव अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार ही करेंगे; और मैं इच्छा भर दुःशासन का रक्त पीऊँगा।
श्लोक 28 (5.162.28)
यश्चेह प्रतिसंरब्धः क्षत्रियो माभियास्यति । अपि भीष्मं पुरस्कृत्य तं नेष्यामि यमक्षयम् ॥
yaśceha pratisaṃrabdhaḥ kṣatriyo mābhiyāsyati | api bhīṣmaṃ puraskṛtya taṃ neṣyāmi yamakṣayam
और जो कोई क्षत्रिय क्रोध में भरकर यहाँ मुझ पर चढ़ आएगा, चाहे भीष्म को आगे करके ही आए, उसे मैं यमलोक पहुँचा दूँगा।
श्लोक 29 (5.162.29)
यच्चैतदुक्तं वचनं मया क्षत्रस्य संसदि । यथैतद्भविता सत्यं तथैवात्मानमालभे ॥
yaccaitaduktaṃ vacanaṃ mayā kṣatrasya saṃsadi | yathaitadbhavitā satyaṃ tathaivātmānamālabhe
क्षत्रियों की सभा में मैंने जो यह वचन कहा है, वह जैसे सत्य होगा, वैसे ही मैं अपनी शपथ लेता हूँ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 30 (5.162.30)
भीमसेनवचः श्रुत्वा सहदेवोऽप्यमर्षणः । क्रोधसंरक्तनयनस्ततो वाक्यमुवाच ह ॥
bhīmasenavacaḥ śrutvā sahadevo'pyamarṣaṇaḥ | krodhasaṃraktanayanastato vākyamuvāca ha
भीमसेन के वचन सुनकर अमर्ष से भरे सहदेव ने भी क्रोध से लाल आँखें करके ये वचन कहे —
सहदेव उवाच
श्लोक 31 (5.162.31)
शौटीरशूरसदृशमनीकजनसंसदि । शृणु पाप वचो मह्यं यद्वाच्यो हि पितात्वया ॥
śauṭīraśūrasadṛśamanīkajanasaṃsadi | śṛṇu pāpa vaco mahyaṃ yadvācyo hi pitātvayā
"पापी, सेना के लोगों की इस सभा में एक गर्वीले वीर के योग्य मेरे वचन सुनो, जो तुम्हें अपने पिता से कहने हैं।
श्लोक 32 (5.162.32)
नास्माकं भविता भेदः कदाचित्कुरुभिः सह । धृतराष्ट्रस्य संबन्धो यदि न स्यात्त्वया सह ॥
nāsmākaṃ bhavitā bhedaḥ kadācitkurubhiḥ saha | dhṛtarāṣṭrasya saṃbandho yadi na syāttvayā saha
यदि धृतराष्ट्र का तुम्हारे साथ सम्बन्ध न होता, तो कौरवों से हमारी फूट कभी न होती।
श्लोक 33 (5.162.33)
त्वं तु लोकविनाशाय धृतराष्ट्रकुलस्य च । उत्पन्नो वैरपुरुषः स्वकुलघ्नश्च पापकृत् ॥
tvaṃ tu lokavināśāya dhṛtarāṣṭrakulasya ca | utpanno vairapuruṣaḥ svakulaghnaśca pāpakṛt
पर तुम संसार और धृतराष्ट्र के कुल के विनाश के लिए उत्पन्न हुए हो — वैर की मूर्ति, अपने ही कुल के घातक और पापकर्मी।
श्लोक 34 (5.162.34)
जन्मप्रभृति चास्माकं पिता ते पापपूरुषः । अहितानि नृशंसानि नित्यशः कर्तुमिच्छति ॥
janmaprabhṛti cāsmākaṃ pitā te pāpapūruṣaḥ | ahitāni nṛśaṃsāni nityaśaḥ kartumicchati
और तुम्हारा पापी पिता हमारे जन्म से ही सदा हमारा क्रूर अहित करना चाहता रहा है।
श्लोक 35 (5.162.35)
तस्य वैरानुषङ्गस्य गन्तास्म्यन्तं सुदुर्गमम् । अहमादौ निहत्य त्वां शकुनेः संप्रपश्यतः ॥
tasya vairānuṣaṅgasya gantāsmyantaṃ sudurgamam | ahamādau nihatya tvāṃ śakuneḥ saṃprapaśyataḥ
उस वैर की लम्बी शृंखला के दुर्गम अन्त तक मैं पहुँचूँगा: पहले शकुनि के देखते-देखते तुम्हें मारूँगा,
श्लोक 36 (5.162.36)
ततोऽस्मि शकुनिं हन्ता मिषतां सर्वधन्विनाम् । भीमस्य वचनं श्रुत्वा सहदेवस्य चोभयोः ॥
tato'smi śakuniṃ hantā miṣatāṃ sarvadhanvinām | bhīmasya vacanaṃ śrutvā sahadevasya cobhayoḥ
और फिर सब धनुर्धरों के देखते-देखते शकुनि का वध करूँगा।" भीम और सहदेव दोनों के वचन सुनकर
सञ्जय उवाच
श्लोक 37 (5.162.37)
उवाच फाल्गुनो वाक्यं भीमसेनं स्मयन्निव । भीमसेन न ते सन्ति येषां वैरं त्वया सह ॥
uvāca phālguno vākyaṃ bhīmasenaṃ smayanniva | bhīmasena na te santi yeṣāṃ vairaṃ tvayā saha
फाल्गुन ने मुस्कुराते हुए भीमसेन से कहा — "भीमसेन, जिनका तुमसे वैर है, वे अब रहे ही नहीं;
अर्जुन उवाच
श्लोक 38 (5.162.38)
मन्दा गृहेषु सुखिनो मृत्युपाशवशं गताः । उलूकश्च न ते वाच्यः परुषं पुरुषोत्तम ॥
mandā gṛheṣu sukhino mṛtyupāśavaśaṃ gatāḥ | ulūkaśca na te vācyaḥ paruṣaṃ puruṣottama
घरों में सुख से बैठे वे मूर्ख मृत्यु के पाश में फँस चुके हैं। और हे पुरुषोत्तम, उलूक से तुम्हें कठोर वचन नहीं कहने चाहिए।
श्लोक 39 (5.162.39)
दूताः किमपराध्यन्ते यथोक्तस्यानुभाषिणः । एवमुक्त्वा महाबाहुर्भीमं भीमपराक्रमम् ॥
dūtāḥ kimaparādhyante yathoktasyānubhāṣiṇaḥ | evamuktvā mahābāhurbhīmaṃ bhīmaparākramam
दूत क्या अपराध करते हैं, वे तो जैसा कहा गया वैसा ही दोहराते हैं?" भयंकर पराक्रमी महाबाहु भीम से ऐसा कहकर
सञ्जय उवाच
श्लोक 40 (5.162.40)
धृष्टद्युम्नमुखान्वीरान्सुहृदः समभाषत । श्रुतं वस्तस्य पापस्य धार्तराष्ट्रस्य भाषितम् ॥
dhṛṣṭadyumnamukhānvīrānsuhṛdaḥ samabhāṣata | śrutaṃ vastasya pāpasya dhārtarāṣṭrasya bhāṣitam
उन्होंने धृष्टद्युम्न आदि अपने वीर मित्रों से कहा — "आप लोगों ने उस पापी धृतराष्ट्रपुत्र की बातें सुनीं —
अर्जुन उवाच
श्लोक 41 (5.162.41)
कुत्सनं वासुदेवस्य मम चैव विशेषतः । श्रुत्वा भवन्तः संरब्धा अस्माकं हितकाम्यया ॥
kutsanaṃ vāsudevasya mama caiva viśeṣataḥ | śrutvā bhavantaḥ saṃrabdhā asmākaṃ hitakāmyayā
वासुदेव की और विशेष रूप से मेरी निन्दा। उसे सुनकर आप हमारे हित की कामना से क्रुद्ध हो उठे हैं।
श्लोक 42 (5.162.42)
प्रभावाद्वासुदेवस्य भवतां च प्रयत्नतः । समग्रं पार्थिवं क्षत्रं सर्वं न गणयाम्यहम् ॥
prabhāvādvāsudevasya bhavatāṃ ca prayatnataḥ | samagraṃ pārthivaṃ kṣatraṃ sarvaṃ na gaṇayāmyaham
वासुदेव के प्रभाव से और आप लोगों के प्रयत्न से मैं पृथ्वी के समस्त क्षत्रिय-समाज को कुछ नहीं गिनता।
श्लोक 43 (5.162.43)
भवद्भिः समनुज्ञातो वाक्यमस्य यदुत्तरम् । उलूके प्रापयिष्यामि यद्वक्ष्यति सुयोधनम् ॥
bhavadbhiḥ samanujñāto vākyamasya yaduttaram | ulūke prāpayiṣyāmi yadvakṣyati suyodhanam
आपकी अनुमति से मैं उसकी बात का जो उत्तर है, वह उलूक के द्वारा भेजूँगा, जिसे वह सुयोधन से कहेगा।
श्लोक 44 (5.162.44)
श्वो भूते कत्थितस्यास्य प्रतिवाक्यं चमूमुखे । गाण्डीवेनाभिधास्यामि क्लीबा हि वचनोत्तराः ॥
śvo bhūte katthitasyāsya prativākyaṃ camūmukhe | gāṇḍīvenābhidhāsyāmi klībā hi vacanottarāḥ
कल सेना के मुहाने पर इसकी डींगों का उत्तर मैं गाण्डीव से दूँगा; केवल वचनों से उत्तर देना तो नपुंसकों का काम है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 45 (5.162.45)
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे प्रशशंसुर्धनञ्जयम् । तेन वाक्योपचारेण विस्मिता राजसत्तमाः ॥
tataste pārthivāḥ sarve praśaśaṃsurdhanañjayam | tena vākyopacāreṇa vismitā rājasattamāḥ
तब वे सब राजा, जो राजाओं में श्रेष्ठ थे, उनके उस वचन-कौशल से चकित होकर धनंजय की प्रशंसा करने लगे।
श्लोक 46 (5.162.46)
अनुनीय च तान्सर्वान्यथामान्यं यथावयः । धर्मराजं तदा वाक्यं तत्प्राप्यं प्रत्यभाषत ॥
anunīya ca tānsarvānyathāmānyaṃ yathāvayaḥ | dharmarājaṃ tadā vākyaṃ tatprāpyaṃ pratyabhāṣata
उन सबको उनके सम्मान और आयु के अनुसार शान्त करके उन्होंने तब धर्मराज से अवसर के योग्य वचन कहे।
श्लोक 47 (5.162.47)
आत्मानमवमन्वानो न हि स्यात्पार्थिवोत्तमः । तत्रोत्तरं प्रवक्ष्यामि तव शुश्रूषणे रतः ॥
ātmānamavamanvāno na hi syātpārthivottamaḥ | tatrottaraṃ pravakṣyāmi tava śuśrūṣaṇe rataḥ
राजाओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर अपने को हीन मानने वाले नहीं थे। आपकी सेवा में तत्पर मैं अब वह उत्तर बताता हूँ जो उन्होंने
श्लोक 48 (5.162.48)
उलूकं भरतश्रेष्ठ सामपूर्वमथोर्जितम् । दुर्योधनस्य तद्वाक्यं निशम्य भरतर्षभः ॥
ulūkaṃ bharataśreṣṭha sāmapūrvamathorjitam | duryodhanasya tadvākyaṃ niśamya bharatarṣabhaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, उलूक को दिया — पहले शान्तिपूर्वक, फिर ओजस्वी ढंग से। दुर्योधन का वह संदेश सुनकर भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर
श्लोक 49 (5.162.49)
अतिलोहितनेत्राभ्यामाशीविष इव श्वसन् । स्मयमान इव क्रोधात्सृक्किणी परिसंलिहन् ॥
atilohitanetrābhyāmāśīviṣa iva śvasan | smayamāna iva krodhātsṛkkiṇī parisaṃlihan
अत्यन्त लाल नेत्रों से विषधर सर्प की भाँति फुफकारते हुए, मानो क्रोध में मुस्कुराते और होंठों के कोने चाटते हुए,
श्लोक 50 (5.162.50)
जनार्दनमभिप्रेक्ष्य भ्रातॄंश्चैवेदमब्रवीत् । अभ्यभाषत कैतव्यं प्रगृह्य विपुलं भुजम् ॥
janārdanamabhiprekṣya bhrātṝṃścaivedamabravīt | abhyabhāṣata kaitavyaṃ pragṛhya vipulaṃ bhujam
जनार्दन और अपने भाइयों की ओर देखकर यह बोले; अपनी विशाल भुजा उठाकर उन्होंने कैतव्य से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 51 (5.162.51)
उलूक गच्छ कैतव्य ब्रूहि तात सुयोधनम् । कृतघ्नं वैरपुरुषं दुर्मतिं कुलपांसनम् ॥
ulūka gaccha kaitavya brūhi tāta suyodhanam | kṛtaghnaṃ vairapuruṣaṃ durmatiṃ kulapāṃsanam
"उलूक, कैतव्य, तात, जाओ और उस कृतघ्न, वैर के पुतले, दुर्बुद्धि और कुलकलंक सुयोधन से कहो:
श्लोक 52 (5.162.52)
पाण्डवेषु सदा पाप नित्यं जिह्मं प्रवर्तते । स्ववीर्याद्यः पराक्रम्य पाप आह्वयते परान् । अभीतः पूरयन्वाक्यमेष वै क्षत्रियः पुमान् ॥
pāṇḍaveṣu sadā pāpa nityaṃ jihmaṃ pravartate | svavīryādyaḥ parākramya pāpa āhvayate parān | abhītaḥ pūrayanvākyameṣa vai kṣatriyaḥ pumān
पापी, पाण्डवों के प्रति तुम्हारा कुटिल आचरण सदा चलता रहता है। जो अपने ही बल के भरोसे पराक्रम करके दूसरों को ललकारता है और निर्भय होकर अपना वचन पूरा करता है, वही क्षत्रिय है, वही पुरुष है।
श्लोक 53 (5.162.53)
स पापः क्षत्रियो भूत्वा अस्मानाहूय संयुगे । मान्यामान्यान्पुरस्कृत्य युद्धं मा गाः कुलाधम ॥
sa pāpaḥ kṣatriyo bhūtvā asmānāhūya saṃyuge | mānyāmānyānpuraskṛtya yuddhaṃ mā gāḥ kulādhama
हे कुलाधम, तुम पापी होकर भी जब क्षत्रिय बनकर हमें युद्ध के लिए ललकार चुके हो, तो माननीय और अमाननीय लोगों को आगे करके युद्ध में मत जाना।
श्लोक 54 (5.162.54)
आत्मवीर्यं समाश्रित्य भृत्यवीर्यं च कौरव । आह्वयस्व रणे पार्थान्सर्वथा क्षत्रियो भव ॥
ātmavīryaṃ samāśritya bhṛtyavīryaṃ ca kaurava | āhvayasva raṇe pārthānsarvathā kṣatriyo bhava
कौरव, अपने बल और अपने सेवकों के बल का भरोसा करके रण में पाण्डवों को ललकारो; हर प्रकार से क्षत्रिय बनो।
श्लोक 55 (5.162.55)
परवीर्यं समाश्रित्य यः समाह्वयते परान् । अशक्तः स्वयमादातुमेतदेव नपुंसकम् ॥
paravīryaṃ samāśritya yaḥ samāhvayate parān | aśaktaḥ svayamādātumetadeva napuṃsakam
जो दूसरों के बल का आश्रय लेकर शत्रुओं को ललकारता है और स्वयं लड़ने में असमर्थ है, वह तो केवल नपुंसकता है।
श्लोक 56 (5.162.56)
स त्वं परेषां वीर्येण आत्मानं बहुमन्यसे । कथमेवमशक्तस्त्वमस्मान्समभिगर्जसि ॥
sa tvaṃ pareṣāṃ vīryeṇa ātmānaṃ bahumanyase | kathamevamaśaktastvamasmānsamabhigarjasi
तुम दूसरों के बल पर अपने को बहुत बड़ा समझते हो। ऐसे असमर्थ होकर तुम हम पर इस तरह कैसे गरजते हो?"
कृष्ण उवाच
श्लोक 57 (5.162.57)
मद्वचश्चापि भूयस्ते वक्तव्यः स सुयोधनः । श्व इदानीं प्रपद्येथाः पुरुषो भव दुर्मते ॥
madvacaścāpi bhūyaste vaktavyaḥ sa suyodhanaḥ | śva idānīṃ prapadyethāḥ puruṣo bhava durmate
"सुयोधन से मेरी बात भी फिर कहना: अब कल सामने आओ; दुर्बुद्धि, पुरुष बनो!
श्लोक 58 (5.162.58)
मन्यसे यच्च मूढ त्वं न योत्स्यति जनार्दनः । सारथ्येन वृतः पार्थैरिति त्वं न बिभेषि च ॥
manyase yacca mūḍha tvaṃ na yotsyati janārdanaḥ | sārathyena vṛtaḥ pārthairiti tvaṃ na bibheṣi ca
मूर्ख, तुम सोचते हो कि पाण्डवों ने जनार्दन को केवल सारथि के रूप में वरण किया है, इसलिए वह युद्ध नहीं करेगा — और इसी से तुम डरते नहीं।
श्लोक 59 (5.162.59)
जघन्यकालमप्येतन्न भवेत्सर्वपार्थिवान् । निर्दहेयमहं क्रोधात्तृणानीव हुताशनः ॥
jaghanyakālamapyetanna bhavetsarvapārthivān | nirdaheyamahaṃ krodhāttṛṇānīva hutāśanaḥ
पर मुझे तो सब राजाओं को अपने क्रोध से वैसे ही भस्म कर देने में, जैसे आग तिनकों को जला देती है, अन्तिम क्षण भर भी न लगे।
श्लोक 60 (5.162.60)
युधिष्ठिरनियोगात्तु फाल्गुनस्य महात्मनः । करिष्ये युध्यमानस्य सारथ्यं विजितात्मनः ॥
yudhiṣṭhiraniyogāttu phālgunasya mahātmanaḥ | kariṣye yudhyamānasya sārathyaṃ vijitātmanaḥ
किन्तु युधिष्ठिर की आज्ञा से मैं युद्ध करते हुए जितेन्द्रिय महात्मा फाल्गुन का सारथ्य करूँगा।
श्लोक 61 (5.162.61)
यद्युत्पतसि लोकांस्त्रीन्यद्याविशसि भूतलम् । तत्रतत्रार्जुनरथं प्रभाते द्रक्ष्यसे पुनः ॥
yadyutpatasi lokāṃstrīnyadyāviśasi bhūtalam | tatratatrārjunarathaṃ prabhāte drakṣyase punaḥ
चाहे तुम तीनों लोकों में उड़ जाओ या पृथ्वी में समा जाओ, वहीं-वहीं प्रभात होते ही तुम फिर अर्जुन का रथ देखोगे।
श्लोक 62 (5.162.62)
यच्चापि भीमसेनस्य मन्यसे मोघभाषितम् । दुःशासनस्य रुधिरं पीतमद्यावधारय ॥
yaccāpi bhīmasenasya manyase moghabhāṣitam | duḥśāsanasya rudhiraṃ pītamadyāvadhāraya
और भीमसेन की जिस बात को तुम व्यर्थ का प्रलाप समझते हो, उसके विषय में यह निश्चित मान लो कि दुःशासन का रक्त आज ही पी लिया गया।
श्लोक 63 (5.162.63)
न त्वां समीक्षते पार्थो नापि राजा युधिष्ठिरः । न भीमसेनो न यमौ प्रतिकूलप्रभाषिणम् ॥
na tvāṃ samīkṣate pārtho nāpi rājā yudhiṣṭhiraḥ | na bhīmaseno na yamau pratikūlaprabhāṣiṇam
न पार्थ, न राजा युधिष्ठिर, न भीमसेन और न दोनों जुड़वाँ भाई तुम जैसे विरोधी बातें करने वाले की कोई परवाह करते हैं।"