उद्योग पर्व · अध्याय 163
उलूक को पाण्डवों के उत्तर
क्रोध से लाल आँखों वाले अर्जुन उलूक के माध्यम से दुर्योधन के तानों का उत्तर देते हैं — जो दूसरे के बल पर डींग मारता है वह अधम है, और वे सब धनुर्धरों के सामने सबसे पहले भीष्म को मारेंगे तथा भीम की प्रतिज्ञाएँ पूरी होती देखेंगे। युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव, विराट और द्रुपद, शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न भी अपने-अपने संदेश भेजते हैं — भीम दुःशासन का रक्त पीने और दुर्योधन की जाँघें तोड़ने की शपथ लेते हैं, शिखण्डी और धृष्टद्युम्न भीष्म और द्रोण के वध का संकल्प करते हैं। उलूक सब कुछ दुर्योधन को सुनाता है, और दुर्योधन कर्ण के द्वारा सारी सेना में दूत भेजकर सूर्योदय से पहले तैयार रहने का आदेश दिलवाता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (5.163.1)
दुर्योधनस्य तद्वाक्यं निशम्य भरतर्षभ । नेत्राभ्यामतिताम्राभ्यां कैतव्यं समुदैक्षत ॥
duryodhanasya tadvākyaṃ niśamya bharatarṣabha | netrābhyāmatitāmrābhyāṃ kaitavyaṃ samudaikṣata
हे भरतश्रेष्ठ, दुर्योधन की वह बात सुनकर अर्जुन ने अत्यन्त लाल हो उठी आँखों से कितव-पुत्र उलूक की ओर देखा।
श्लोक 2 (5.163.2)
स केशवमभिप्रेक्ष्य गुडाकेशो महायशाः । अभ्यभाषत कैतव्यं प्रगृह्य विपुलं भुजम् ॥
sa keśavamabhiprekṣya guḍākeśo mahāyaśāḥ | abhyabhāṣata kaitavyaṃ pragṛhya vipulaṃ bhujam
केशव की ओर देखकर महायशस्वी गुडाकेश (अर्जुन) ने अपनी विशाल भुजा उठाई और उलूक से कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 3 (5.163.3)
स्ववीर्यं यः समाश्रित्य समाह्वयति वै परान् । अभीतो युध्यते शत्रून्स वै पुरुष उच्यते ॥
svavīryaṃ yaḥ samāśritya samāhvayati vai parān | abhīto yudhyate śatrūnsa vai puruṣa ucyate
"जो अपने ही पराक्रम के भरोसे दूसरों को ललकारता है और निर्भय होकर शत्रुओं से लड़ता है, वही पुरुष कहलाता है।
श्लोक 4 (5.163.4)
परवीर्यं समाश्रित्य यः समाह्वयते परान् । क्षत्रबन्धुरशक्तत्वाल्लोके स पुरुषाधमः ॥
paravīryaṃ samāśritya yaḥ samāhvayate parān | kṣatrabandhuraśaktatvālloke sa puruṣādhamaḥ
जो दूसरे के पराक्रम के भरोसे दूसरों को ललकारता है, वह स्वयं असमर्थ होने के कारण नाम मात्र का क्षत्रिय है और संसार में अधम पुरुष है।
श्लोक 5 (5.163.5)
स त्वं परेषां वीर्येण मन्यसे वीर्यमात्मनः । स्वयं कापुरुषो मूढ परांश्च क्षेप्तुमिच्छसि ॥
sa tvaṃ pareṣāṃ vīryeṇa manyase vīryamātmanaḥ | svayaṃ kāpuruṣo mūḍha parāṃśca kṣeptumicchasi
तुम दूसरों के बल को ही अपना बल मानते हो; मूर्ख, स्वयं कायर होकर तुम दूसरों पर ताने कसना चाहते हो।
श्लोक 6 (5.163.6)
यस्त्वं वृद्धं सर्वराज्ञां हितबुद्धिं जितेन्द्रियम् । मरणाय महाप्रज्ञं दीक्षयित्वा विकत्थसे ॥
yastvaṃ vṛddhaṃ sarvarājñāṃ hitabuddhiṃ jitendriyam | maraṇāya mahāprajñaṃ dīkṣayitvā vikatthase
तुम सब राजाओं में सबसे वृद्ध, उनके हितैषी, जितेन्द्रिय और महाज्ञानी पुरुष को मृत्यु के लिए दीक्षित करके डींग मार रहे हो।
श्लोक 7 (5.163.7)
भावस्ते विदितोऽस्माभिर्दुर्बुद्धे कुलपांसन । न हनिष्यन्ति गाङ्गेयं पाण्डवा घृणयेति हि ॥
bhāvaste vidito'smābhirdurbuddhe kulapāṃsana | na haniṣyanti gāṅgeyaṃ pāṇḍavā ghṛṇayeti hi
हे दुर्बुद्धि, कुलकलंक, तुम्हारा मनोभाव हम जानते हैं — "पाण्डव करुणावश गंगापुत्र को नहीं मारेंगे।"
श्लोक 8 (5.163.8)
यस्य वीर्यं समाश्रित्य धार्तराष्ट्र विकत्थसे । हन्तास्मि प्रथमं भीष्मं मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥
yasya vīryaṃ samāśritya dhārtarāṣṭra vikatthase | hantāsmi prathamaṃ bhīṣmaṃ miṣatāṃ sarvadhanvinām
हे धृतराष्ट्रपुत्र, जिनके पराक्रम के भरोसे तुम डींग मारते हो, उन्हीं भीष्म को मैं सब धनुर्धरों के देखते-देखते सबसे पहले मारूँगा।
श्लोक 9 (5.163.9)
कैतव्य गत्वा भरतान्समेत्य । सुयोधनं धार्तराष्ट्रं वदस्व । तथेत्युवाचार्जुनः सव्यसाची । निशाव्यपाये भविता विमर्दः ॥
kaitavya gatvā bharatānsametya | suyodhanaṃ dhārtarāṣṭraṃ vadasva | tathetyuvācārjunaḥ savyasācī | niśāvyapāye bhavitā vimardaḥ
उलूक, भरतवंशियों के पास लौटकर धृतराष्ट्रपुत्र सुयोधन से मिलो और उससे कहो — "सव्यसाची अर्जुन ने कहा है, 'ऐसा ही हो; रात बीतते ही युद्ध होगा।'"
श्लोक 10 (5.163.10)
यद्वोऽब्रवीद्वाक्यमदीनसत्त्वो । मध्ये कुरूणां हर्षयन्सत्यसन्धः । अहं हन्ता पाण्डवानामनीकं । शाल्वेयकांश्चेति ममैष भारः । सुयोधनं धार्तराष्ट्रं वदस्व ॥
yadvo'bravīdvākyamadīnasattvo | madhye kurūṇāṃ harṣayansatyasandhaḥ | ahaṃ hantā pāṇḍavānāmanīkaṃ | śālveyakāṃśceti mamaiṣa bhāraḥ | suyodhanaṃ dhārtarāṣṭraṃ vadasva
और उस अदीन, सत्यप्रतिज्ञ पुरुष ने कौरवों के बीच तुम सबको हर्षित करते हुए जो कहा था — "मैं पाण्डवों की सेना को और शाल्वेयकों को भी मार डालूँगा; यह भार मेरा है" — उसके विषय में भी धृतराष्ट्रपुत्र सुयोधन से यह कहो —
श्लोक 11 (5.163.11)
हन्यामहं द्रोणमृतेऽपि लोकं । न ते भयं विद्यते पाण्डवेभ्यः । ततो हि ते लब्धमतं च राज्य- । मापद्गताः पाण्डवाश्चेति भावः ॥
hanyāmahaṃ droṇamṛte'pi lokaṃ | na te bhayaṃ vidyate pāṇḍavebhyaḥ | tato hi te labdhamataṃ ca rājya- | māpadgatāḥ pāṇḍavāśceti bhāvaḥ
"मैं द्रोण के बिना भी सारे लोक को मार सकता हूँ" — उनके यह कहने से तुम्हें पाण्डवों से कोई भय नहीं रहा; इसी से तुम्हारा यह भाव बना है कि राज्य मिल ही गया और पाण्डव संकट में पड़ गए।
श्लोक 12 (5.163.12)
स दर्पपूर्णो न समीक्षसे त्व- । मनर्थमात्मन्यपि वर्तमानम् । तस्मादहं ते प्रथमं समूहे । हन्ता समक्षं कुरुवृद्धमेव ॥
sa darpapūrṇo na samīkṣase tva- | manarthamātmanyapi vartamānam | tasmādahaṃ te prathamaṃ samūhe | hantā samakṣaṃ kuruvṛddhameva
घमण्ड से भरे हुए तुम अपने ही भीतर बसे अनर्थ को नहीं देखते। इसलिए मैं युद्ध की भीड़ में तुम्हारी आँखों के सामने सबसे पहले उसी कुरुवृद्ध को मारूँगा।
श्लोक 13 (5.163.13)
सूर्योदये युक्तसेनः प्रतीक्ष्य । ध्वजी रथी रक्षत सत्यसन्धम् । अहं हि वः पश्यतां द्विपमेनं । भीष्मं रथात्पातयिष्यामि बाणैः ॥
sūryodaye yuktasenaḥ pratīkṣya | dhvajī rathī rakṣata satyasandham | ahaṃ hi vaḥ paśyatāṃ dvipamenaṃ | bhīṣmaṃ rathātpātayiṣyāmi bāṇaiḥ
सूर्योदय होते ही अपनी सेना जोतकर तैयार रहो और ध्वजा तथा रथ से युक्त उस सत्यप्रतिज्ञ की रक्षा करो; क्योंकि तुम सबके देखते-देखते मैं इस गजराज-से भीष्म को अपने बाणों से रथ से गिरा दूँगा।
श्लोक 14 (5.163.14)
श्वोभूते कत्थनावाक्यं विज्ञास्यति सुयोधनः । आचितं शरजालेन मया दृष्ट्वा पितामहम् ॥
śvobhūte katthanāvākyaṃ vijñāsyati suyodhanaḥ | ācitaṃ śarajālena mayā dṛṣṭvā pitāmaham
कल सवेरा होने पर जब सुयोधन पितामह को मेरे बाणों के जाल से ढका हुआ देखेगा, तब उसे अपनी डींग भरी बातों का मोल पता चलेगा।
श्लोक 15 (5.163.15)
यदुक्तश्च सभामध्ये पुरुषो ह्रस्वदर्शनः । क्रुद्धेन भीमसेनेन भ्राता दुःशासनस्तव ॥
yaduktaśca sabhāmadhye puruṣo hrasvadarśanaḥ | kruddhena bhīmasenena bhrātā duḥśāsanastava
और भरी सभा में क्रोधित भीमसेन ने तुम्हारे भाई दुःशासन से, जो एक अदूरदर्शी पुरुष है,
श्लोक 16 (5.163.16)
अधर्मज्ञो नित्यवैरी पापबुद्धिर्नृशंसकृत् । सत्यां प्रतिज्ञामचिराद्द्रक्ष्यसे तां सुयोधन ॥
adharmajño nityavairī pāpabuddhirnṛśaṃsakṛt | satyāṃ pratijñāmacirāddrakṣyase tāṃ suyodhana
जो धर्म को नहीं जानता, सदा वैर रखता है, पापबुद्धि है और क्रूर कर्म करता है — जो प्रतिज्ञा की थी, सुयोधन, उसे तुम शीघ्र ही सत्य होते देखोगे।
श्लोक 17 (5.163.17)
अभिमानस्य दर्पस्य क्रोधपारुष्ययोस्तथा । नैष्ठुर्यस्यावलेपस्य आत्मसंभावनस्य च ॥
abhimānasya darpasya krodhapāruṣyayostathā | naiṣṭhuryasyāvalepasya ātmasaṃbhāvanasya ca
तुम्हारे अभिमान और दर्प का, क्रोध और कठोर वाणी का, निष्ठुरता, उद्दण्डता और आत्मप्रशंसा का;
श्लोक 18 (5.163.18)
नृशंसतायास्तैक्ष्ण्यस्य धर्मविद्वेषणस्य च । अधर्मस्यातिवादस्य वृद्धातिक्रमणस्य च ॥
nṛśaṃsatāyāstaikṣṇyasya dharmavidveṣaṇasya ca | adharmasyātivādasya vṛddhātikramaṇasya ca
तुम्हारी क्रूरता और तीखेपन का, धर्म से द्वेष का, अधर्म का, दूसरों की निन्दा का और बड़ों के अपमान का;
श्लोक 19 (5.163.19)
दर्शनस्य च चक्रस्य कृत्स्नस्यापनयस्य च । द्रक्ष्यसि त्वं फलं तीव्रमचिरेण सुयोधन ॥
darśanasya ca cakrasya kṛtsnasyāpanayasya ca | drakṣyasi tvaṃ phalaṃ tīvramacireṇa suyodhana
अपनी विजय के भरोसे का, अपनी विशाल सेना का और अपने समस्त अन्याय का कड़वा फल, सुयोधन, तुम शीघ्र ही देखोगे।
श्लोक 20 (5.163.20)
वासुदेवद्वितीये हि मयि क्रुद्धे नराधम । आशा ते जीविते मूढ राज्ये वा केन हेतुना ॥
vāsudevadvitīye hi mayi kruddhe narādhama | āśā te jīvite mūḍha rājye vā kena hetunā
हे नराधम मूढ़, जब वासुदेव को साथ लिए हुए मैं क्रोध में भरूँगा, तब तुम्हें अपने जीवन या राज्य की आशा किस आधार पर रहेगी?
श्लोक 21 (5.163.21)
शान्ते भीष्मे तथा द्रोणे सूतपुत्रे च पातिते । निराशो जीविते राज्ये पुत्रेषु च भविष्यसि ॥
śānte bhīṣme tathā droṇe sūtaputre ca pātite | nirāśo jīvite rājye putreṣu ca bhaviṣyasi
जब भीष्म शान्त हो जाएँगे, द्रोण भी, और सूतपुत्र गिरा दिया जाएगा, तब तुम अपने जीवन, राज्य और पुत्रों से निराश हो जाओगे।
श्लोक 22 (5.163.22)
भ्रातॄणां निधनं श्रुत्वा पुत्राणां च सुयोधन । भीमसेनेन निहतो दुष्कृतानि स्मरिष्यसि ॥
bhrātṝṇāṃ nidhanaṃ śrutvā putrāṇāṃ ca suyodhana | bhīmasenena nihato duṣkṛtāni smariṣyasi
सुयोधन, अपने भाइयों और पुत्रों की मृत्यु का समाचार सुनकर और स्वयं भीमसेन के हाथों मारे जाते समय तुम अपने दुष्कर्मों को याद करोगे।
श्लोक 23 (5.163.23)
न द्वितीयां प्रतिज्ञां हि प्रतिजानामि कैतव । सत्यं ब्रवीम्यहं ह्येतत्सर्वं सत्यं भविष्यति ॥
na dvitīyāṃ pratijñāṃ hi pratijānāmi kaitava | satyaṃ bravīmyahaṃ hyetatsarvaṃ satyaṃ bhaviṣyati
उलूक, मैं दूसरी प्रतिज्ञा नहीं करता। मैं सच कहता हूँ — यह सब सच होकर रहेगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 24 (5.163.24)
युधिष्ठिरोऽपि कैतव्यमुलूकमिदमब्रवीत् । उलूक मद्वचो ब्रूहि गत्वा तात सुयोधनम् ॥
yudhiṣṭhiro'pi kaitavyamulūkamidamabravīt | ulūka madvaco brūhi gatvā tāta suyodhanam
युधिष्ठिर ने भी कितव-पुत्र उलूक से यह कहा — "तात उलूक, सुयोधन के पास जाकर मेरा यह संदेश कहना —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 25 (5.163.25)
स्वेन वृत्तेन मे वृत्तं नाधिगन्तुं त्वमर्हसि । उभयोरन्तरं वेद सूनृतानृतयोरपि ॥
svena vṛttena me vṛttaṃ nādhigantuṃ tvamarhasi | ubhayorantaraṃ veda sūnṛtānṛtayorapi
तुम्हें अपने आचरण से मेरे आचरण को नहीं आँकना चाहिए। मैं सत्य और असत्य दोनों का अन्तर जानता हूँ।
श्लोक 26 (5.163.26)
न चाहं कामये पापमपि कीटपिपीलकयोः । किं पुनर्ज्ञातिषु वधं कामयेयं कथंचन ॥
na cāhaṃ kāmaye pāpamapi kīṭapipīlakayoḥ | kiṃ punarjñātiṣu vadhaṃ kāmayeyaṃ kathaṃcana
मैं तो कीड़े और चींटी का भी अनिष्ट नहीं चाहता; फिर अपने ही कुटुम्बियों का वध भला कैसे चाह सकता हूँ?
श्लोक 27 (5.163.27)
एतदर्थं मया तात पञ्च ग्रामा वृताः पुरा । कथं तव सुदुर्बुद्धे न प्रेक्ष्ये व्यसनं महत् ॥
etadarthaṃ mayā tāta pañca grāmā vṛtāḥ purā | kathaṃ tava sudurbuddhe na prekṣye vyasanaṃ mahat
तात, इसी कारण मैंने पहले केवल पाँच गाँव माँगे थे; हे दुर्बुद्धि, मैं तुम पर बड़ी विपत्ति आती कैसे देख सकता था?
श्लोक 28 (5.163.28)
स त्वं कामपरीतात्मा मूढभावाच्च कत्थसे । तथैव वासुदेवस्य न गृह्णासि हितं वचः ॥
sa tvaṃ kāmaparītātmā mūḍhabhāvācca katthase | tathaiva vāsudevasya na gṛhṇāsi hitaṃ vacaḥ
पर तुम्हारा मन कामना से घिरा है; मूढ़ता के कारण तुम डींग मारते हो, और इसी प्रकार वासुदेव की हितकारी बात भी नहीं मानते।
श्लोक 29 (5.163.29)
किंचेदानीं बहूक्तेन युध्यस्व सह बान्धवैः । मम विप्रियकर्तारं कैतव्य ब्रूहि कौरवम् ॥
kiṃcedānīṃ bahūktena yudhyasva saha bāndhavaiḥ | mama vipriyakartāraṃ kaitavya brūhi kauravam
अब अधिक कहने से क्या लाभ? अपने बन्धुओं के साथ युद्ध करो।" उलूक, मेरा अप्रिय करने वाले उस कौरव से यही कहना।
सञ्जय उवाच
श्लोक 30 (5.163.30)
श्रुतं वाक्यं गृहीतोऽर्थो मतं यत्ते तथास्तु तत् । भीमसेनस्ततो वाक्यं भूय आह नृपात्मजम् ॥
śrutaṃ vākyaṃ gṛhīto'rtho mataṃ yatte tathāstu tat | bhīmasenastato vākyaṃ bhūya āha nṛpātmajam
"तुम्हारी बात सुन ली, उसका अर्थ भी समझ लिया; जो तुमने ठाना है, वैसा ही हो।" तब भीमसेन ने उस राजकुमार से फिर कहा —
भीमसेन उवाच
श्लोक 31 (5.163.31)
उलूक मद्वचो ब्रूहि दुर्मतिं पापपूरुषम् । शठं नैकृतिकं पापं दुराचारं सुयोधनम् ॥
ulūka madvaco brūhi durmatiṃ pāpapūruṣam | śaṭhaṃ naikṛtikaṃ pāpaṃ durācāraṃ suyodhanam
"उलूक, उस दुर्बुद्धि पापी पुरुष से, उस शठ, कपटी, पापी और दुराचारी सुयोधन से मेरी यह बात कहना —
श्लोक 32 (5.163.32)
गृध्रोदरे वा वस्तव्यं पुरे वा नागसाह्वये । प्रतिज्ञातं मया यच्च सभामध्ये नराधम ॥
gṛdhrodare vā vastavyaṃ pure vā nāgasāhvaye | pratijñātaṃ mayā yacca sabhāmadhye narādhama
तुम्हें या तो गिद्ध के पेट में रहना होगा या हस्तिनापुर में। और हे नराधम, भरी सभा में मैंने जो प्रतिज्ञा की थी —
श्लोक 33 (5.163.33)
कर्ताहं तद्वचः सत्यं सत्येनैव शपामि ते । दुःशासनस्य रुधिरं हत्वा पास्याम्यहं मृधे ॥
kartāhaṃ tadvacaḥ satyaṃ satyenaiva śapāmi te | duḥśāsanasya rudhiraṃ hatvā pāsyāmyahaṃ mṛdhe
उस वचन को मैं सत्य करके दिखाऊँगा; सत्य की ही शपथ खाकर तुमसे कहता हूँ। युद्ध में दुःशासन को मारकर मैं उसका रक्त पीऊँगा।
श्लोक 34 (5.163.34)
सक्थिनी तव भंक्त्वैव हत्वा हि तव सोदरान् । सर्वेषां धार्तराष्ट्राणामहं मृत्युः सुयोधन ॥
sakthinī tava bhaṃktvaiva hatvā hi tava sodarān | sarveṣāṃ dhārtarāṣṭrāṇāmahaṃ mṛtyuḥ suyodhana
मैं तुम्हारी दोनों जाँघें तोड़ दूँगा और तुम्हारे सगे भाइयों को मार डालूँगा; सुयोधन, मैं सभी धृतराष्ट्रपुत्रों की मृत्यु हूँ।
श्लोक 35 (5.163.35)
सर्वेषां राजपुत्राणामभिमन्युरसंशयम् । कर्मणा तोषयिष्यामि भूयश्चैव वचः शृणु ॥
sarveṣāṃ rājaputrāṇāmabhimanyurasaṃśayam | karmaṇā toṣayiṣyāmi bhūyaścaiva vacaḥ śṛṇu
और सभी राजकुमारों की मृत्यु निःसंदेह अभिमन्यु होगा। मैं अपने कर्मों से तुम्हें संतुष्ट करूँगा; मेरी एक बात और सुनो —
श्लोक 36 (5.163.36)
हत्वा सुयोधन त्वां वै सहितं सर्वसोदरैः । आक्रमिष्ये पदा मूर्ध्नि धर्मराजस्य पश्यतः ॥
hatvā suyodhana tvāṃ vai sahitaṃ sarvasodaraiḥ | ākramiṣye padā mūrdhni dharmarājasya paśyataḥ
सुयोधन, सब भाइयों सहित तुम्हें मारकर मैं धर्मराज के देखते-देखते तुम्हारे सिर पर पैर रखूँगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 37 (5.163.37)
नकुलस्तु ततो वाक्यमिदमाह महीपते । उलूक ब्रूहि कौरव्यं धार्तराष्ट्रं सुयोधनम् ॥
nakulastu tato vākyamidamāha mahīpate | ulūka brūhi kauravyaṃ dhārtarāṣṭraṃ suyodhanam
हे पृथ्वीपति, तब नकुल ने यह कहा — "उलूक, कुरुवंशी धृतराष्ट्रपुत्र सुयोधन से कहना —
नकुल उवाच
श्लोक 38 (5.163.38)
श्रुतं ते गदतो वाक्यं सर्वमेव यथातथम् । तथा कर्तास्मि कौरव्य यथा त्वमनुशासि माम् ॥
śrutaṃ te gadato vākyaṃ sarvameva yathātatham | tathā kartāsmi kauravya yathā tvamanuśāsi mām
तुमने जो कुछ कहा, वह सब मैंने ज्यों का त्यों सुन लिया। कौरव, तुम मुझे जैसा आदेश देते हो, मैं वैसा ही करूँगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 39 (5.163.39)
सहदेवोऽपि नृपते इदमाह वचोऽर्थवत् । सुयोधन मतिर्या ते वृथैषा ते भविष्यति ॥
sahadevo'pi nṛpate idamāha vaco'rthavat | suyodhana matiryā te vṛthaiṣā te bhaviṣyati
हे राजन्, सहदेव ने भी यह अर्थभरी बात कही — "सुयोधन, तुम्हारी जो सोच है, वह व्यर्थ हो जाएगी।
सहदेव उवाच
श्लोक 40 (5.163.40)
शोचिष्यसे महाराज सपुत्रज्ञातिबान्धवः । इमं च क्लेशमस्माकं हृष्टो यत्त्वं विकत्थसे ॥
śociṣyase mahārāja saputrajñātibāndhavaḥ | imaṃ ca kleśamasmākaṃ hṛṣṭo yattvaṃ vikatthase
महाराज, हमारे जिस क्लेश पर तुम आज प्रसन्न होकर डींग मार रहे हो, उसके लिए तुम्हें पुत्रों, कुटुम्बियों और बन्धुओं सहित शोक करना पड़ेगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 41 (5.163.41)
विराटद्रुपदौ वृद्धावुलूकमिदमूचतुः । दासभावं नियच्छेव साधोरिति मतिः सदा । तौ च दासावदासौ वा पौरुषं यस्य यादृशम् ॥
virāṭadrupadau vṛddhāvulūkamidamūcatuḥ | dāsabhāvaṃ niyaccheva sādhoriti matiḥ sadā | tau ca dāsāvadāsau vā pauruṣaṃ yasya yādṛśam
वृद्ध विराट और द्रुपद ने उलूक से यह कहा — "हमारी सदा यही इच्छा रही है कि हम किसी सज्जन के दास बनें। हम दोनों दास हैं या नहीं, यह तो किसका कैसा पौरुष है, उसी से प्रकट होगा।"
श्लोक 42 (5.163.42)
शिखण्डी तु ततो वाक्यमुलूकमिदमब्रवीत् । वक्तव्यो भवता राजा पापेष्वभिरतः सदा ॥
śikhaṇḍī tu tato vākyamulūkamidamabravīt | vaktavyo bhavatā rājā pāpeṣvabhirataḥ sadā
तब शिखण्डी ने उलूक से यह कहा — "तुम सदा पाप में रत रहने वाले राजा से कहना —
शिखण्ड्युवाच
श्लोक 43 (5.163.43)
पश्य त्वं मां रणे राजन्कुर्वाणं कर्म दारुणम् । यस्य वीर्यं समासाद्य मन्यसे विजयं युधि ॥
paśya tvaṃ māṃ raṇe rājankurvāṇaṃ karma dāruṇam | yasya vīryaṃ samāsādya manyase vijayaṃ yudhi
राजन्, युद्ध में मुझे भयानक कर्म करते देखना। जिसके पराक्रम के भरोसे तुम युद्ध में विजय मान बैठे हो,
श्लोक 44 (5.163.44)
तमहं पातयिष्यामि रथात्तव पितामहम् । अहं भीष्मवधात्सृष्टो नूनं धात्रा महात्मना ॥
tamahaṃ pātayiṣyāmi rathāttava pitāmaham | ahaṃ bhīṣmavadhātsṛṣṭo nūnaṃ dhātrā mahātmanā
तुम्हारे उन पितामह को मैं रथ से गिरा दूँगा। निश्चय ही महात्मा विधाता ने मुझे भीष्म के वध के लिए ही रचा है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 45 (5.163.45)
सोऽहं भीष्मं हनिष्यामि मिषतां सर्वधन्विनाम् । धृष्टद्युम्नोऽपि कैतव्यमुलूकमिदमब्रवीत् ॥
so'haṃ bhīṣmaṃ haniṣyāmi miṣatāṃ sarvadhanvinām | dhṛṣṭadyumno'pi kaitavyamulūkamidamabravīt
मैं सब धनुर्धरों के देखते-देखते भीष्म को मारूँगा।" धृष्टद्युम्न ने भी कितव-पुत्र उलूक से यह कहा —
धृष्टद्युम्न उवाच
श्लोक 46 (5.163.46)
सुयोधनो मम वचो वक्तव्यो नृपतेः सुतः । अहं द्रोणं हनिष्यामि सगणं सहबान्धवम् ॥
suyodhano mama vaco vaktavyo nṛpateḥ sutaḥ | ahaṃ droṇaṃ haniṣyāmi sagaṇaṃ sahabāndhavam
"राजपुत्र सुयोधन से मेरी यह बात कहना — मैं द्रोण को उनके अनुयायियों और बन्धुओं सहित मार डालूँगा।
श्लोक 47 (5.163.47)
अवश्यं च मया कार्यं पूर्वेषां चरितं महत् । कर्ता चाहं तथा कर्म यथा नान्यः करिष्यति ॥
avaśyaṃ ca mayā kāryaṃ pūrveṣāṃ caritaṃ mahat | kartā cāhaṃ tathā karma yathā nānyaḥ kariṣyati
अपने पूर्वजों का महान् संकल्प मुझे अवश्य पूरा करना है; और मैं ऐसा कर्म करूँगा जैसा कोई दूसरा नहीं करेगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 48 (5.163.48)
तमब्रवीद्धर्मराजः कारुण्यार्थं वचो महत् । नाहं ज्ञातिवधं राजन्कामयेयं कथंचन ॥
tamabravīddharmarājaḥ kāruṇyārthaṃ vaco mahat | nāhaṃ jñātivadhaṃ rājankāmayeyaṃ kathaṃcana
धर्मराज ने करुणावश उससे यह गम्भीर बात कही — "राजन्, मैं किसी भी प्रकार अपने कुटुम्बियों का वध नहीं चाहता।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 49 (5.163.49)
तवैव दोषाद्दुर्बुद्धे सर्वमेतत्त्वनावृतम् । स गच्छ माचिरं तात उलूक यदि मन्यसे ॥
tavaiva doṣāddurbuddhe sarvametattvanāvṛtam | sa gaccha māciraṃ tāta ulūka yadi manyase
हे दुर्बुद्धि, यह सब स्पष्ट ही तुम्हारे अपने दोष से हुआ है। तात उलूक, यदि तुम्हें ठीक लगे तो अब बिना विलम्ब चले जाओ,
सञ्जय उवाच
श्लोक 50 (5.163.50)
इह वा तिष्ठ भद्रं ते वयं हि तव बान्धवाः । उलूकस्तु ततो राजन्धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥
iha vā tiṣṭha bhadraṃ te vayaṃ hi tava bāndhavāḥ | ulūkastu tato rājandharmaputraṃ yudhiṣṭhiram
या यहीं ठहरो — तुम्हारा कल्याण हो, हम तो तुम्हारे बन्धु हैं।" हे राजन्, तब उलूक धर्मपुत्र युधिष्ठिर से विदा लेकर
श्लोक 51 (5.163.51)
आमन्त्र्य प्रययौ तत्र यत्र राजा सुयोधनः । उलूकस्तत आगम्य दुर्योधनममर्षणम् ॥
āmantrya prayayau tatra yatra rājā suyodhanaḥ | ulūkastata āgamya duryodhanamamarṣaṇam
वहाँ गया जहाँ राजा सुयोधन था। वहाँ पहुँचकर उलूक ने असहिष्णु दुर्योधन को
श्लोक 52 (5.163.52)
अर्जुनस्य समादेशं यथोक्तं सर्वमब्रवीत् । वासुदेवस्य भीमस्य धर्मराजस्य पौरुषम् ॥
arjunasya samādeśaṃ yathoktaṃ sarvamabravīt | vāsudevasya bhīmasya dharmarājasya pauruṣam
अर्जुन का संदेश ज्यों का त्यों पूरा सुना दिया; और वासुदेव, भीम तथा धर्मराज के पौरुष भरे वचन,
श्लोक 53 (5.163.53)
नकुलस्य विराटस्य द्रुपदस्य च भारत । सहदेवस्य च वचो धृष्टद्युम्नशिखण्डिनोः । केशवार्जुनयोर्वाक्यं यथोक्तं सर्वमब्रवीत् ॥
nakulasya virāṭasya drupadasya ca bhārata | sahadevasya ca vaco dhṛṣṭadyumnaśikhaṇḍinoḥ | keśavārjunayorvākyaṃ yathoktaṃ sarvamabravīt
हे भारत, नकुल, विराट और द्रुपद के, सहदेव के, धृष्टद्युम्न और शिखण्डी के वचन — केशव और अर्जुन की सारी बातें — उसने ज्यों की त्यों कह सुनाईं।
श्लोक 54 (5.163.54)
कैतव्यस्य तु तद्वाक्यं निशम्य भरतर्षभः । दुःशासनं च कर्णं च शकुनिं चापि भारत ॥
kaitavyasya tu tadvākyaṃ niśamya bharatarṣabhaḥ | duḥśāsanaṃ ca karṇaṃ ca śakuniṃ cāpi bhārata
हे भारत, उलूक की वह बात सुनकर भरतश्रेष्ठ दुर्योधन ने दुःशासन, कर्ण और शकुनि को,
श्लोक 55 (5.163.55)
आज्ञापयत राज्ञश्च बलं मित्रबलं तथा । यथा प्रागुदयात्सर्वे युक्तास्तिष्ठन्त्यनीकिनः ॥
ājñāpayata rājñaśca balaṃ mitrabalaṃ tathā | yathā prāgudayātsarve yuktāstiṣṭhantyanīkinaḥ
तथा राजाओं की सेना और मित्रों की सेना को भी आदेश दिया कि सूर्योदय से पहले ही सारी सेनाएँ जुतकर तैयार खड़ी रहें।
श्लोक 56 (5.163.56)
ततः कर्णसमादिष्टा दूताः सन्त्वरिता रथैः । उष्ट्रवामीभिरप्यन्ये सदश्वैश्च महाजवैः ॥
tataḥ karṇasamādiṣṭā dūtāḥ santvaritā rathaiḥ | uṣṭravāmībhirapyanye sadaśvaiśca mahājavaiḥ
तब कर्ण के भेजे हुए दूत बड़ी उतावली से चल पड़े — कोई रथों पर, तो कोई ऊँटों, खच्चरियों और अत्यन्त वेगवान् उत्तम घोड़ों पर;
श्लोक 57 (5.163.57)
तूर्णं परिययुः सेनां कृत्स्नां कर्णस्य शासनात् । आज्ञापयन्तो राज्ञश्च योगः प्रागुदयादिति ॥
tūrṇaṃ pariyayuḥ senāṃ kṛtsnāṃ karṇasya śāsanāt | ājñāpayanto rājñaśca yogaḥ prāgudayāditi
कर्ण की आज्ञा से वे शीघ्र ही सारी सेना में घूम गए और राजाओं को आदेश देते गए — "सूर्योदय से पहले ही तैयार हो जाओ!"