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उद्योग पर्व · अध्याय 2

बलराम का सन्धि का परामर्श

बलराम श्रीकृष्ण के प्रस्ताव का समर्थन करते हैं और कहते हैं कि कोई दूत हस्तिनापुर जाकर दुर्योधन का मन जाने और भीष्म, धृतराष्ट्र तथा कौरव वृद्धों के सामने विनयपूर्वक युधिष्ठिर का पक्ष रखे। उनका तर्क है कि युधिष्ठिर ने सुहृदों के मना करने पर भी शकुनि से जुआ खेला और अपनी आसक्ति के कारण राज्य हारे, अतः शकुनि का कोई दोष नहीं। वे कहते हैं कि युद्ध अनीति है; सन्धि से प्राप्त वस्तु ही सच्चा लाभ है। यह सुनकर सात्यकि क्रोध से उठ खड़े होते हैं।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

बलदेव उवाच

श्लोक 1 (5.2.1)

श्रुतं भवद्भिर्गदपूर्वजस्य । वाक्यं यथा धर्मवदर्थवच्च । अजातशत्रोश्च हितं च युक्तं । दुर्योधनस्यापि तथैव राज्ञः ॥

śrutaṃ bhavadbhirgadapūrvajasya | vākyaṃ yathā dharmavadarthavacca | ajātaśatrośca hitaṃ ca yuktaṃ | duryodhanasyāpi tathaiva rājñaḥ

"आप लोगों ने गद के बड़े भाई श्रीकृष्ण का वचन सुना, जो धर्म और अर्थ से युक्त है और अजातशत्रु युधिष्ठिर के लिए तथा राजा दुर्योधन के लिए भी हितकर और उचित है।

श्लोक 2 (5.2.2)

अर्धं हि राज्यस्य विसृज्य वीराः । कुन्तीसुतास्तस्य कृते यतन्ते । प्रदाय चार्धं धृतराष्ट्रपुत्रः । सुखी सहास्माभिरतीव मोदेत् ॥

ardhaṃ hi rājyasya visṛjya vīrāḥ | kuntīsutāstasya kṛte yatante | pradāya cārdhaṃ dhṛtarāṣṭraputraḥ | sukhī sahāsmābhiratīva modet

वीर कुन्तीपुत्र राज्य का आधा भाग छोड़कर केवल शेष आधे के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। यदि धृतराष्ट्र का पुत्र वह आधा भाग दे दे, तो वह हमारे साथ सुखपूर्वक रहकर अत्यन्त आनन्दित रहेगा।

श्लोक 3 (5.2.3)

लब्ध्वा हि राज्यं पूरुषप्रवीराः । सम्यक्प्रवृत्तेषु परेषु चैव । ध्रुवं प्रशान्ताः सुखमाविशेयु- । स्तेषां प्रशान्तिश्च हितं प्रजानाम् ॥

labdhvā hi rājyaṃ pūruṣapravīrāḥ | samyakpravṛtteṣu pareṣu caiva | dhruvaṃ praśāntāḥ sukhamāviśeyu- | steṣāṃ praśāntiśca hitaṃ prajānām

राज्य पा लेने पर, और यदि दूसरा पक्ष भी ठीक व्यवहार करे, तो ये वीर निश्चय ही शान्त होकर सुख से रहेंगे; और इनकी शान्ति में ही प्रजा का हित है।

श्लोक 4 (5.2.4)

दुर्योधनस्यापि मतं च वेत्तुं । वक्तुं च वाक्यानि युधिष्ठिरस्य । प्रियं च मे स्याद्यदि तत्र कश्चि- । द्व्रजेच्छमार्थं कुरुपाण्डवानाम् ॥

duryodhanasyāpi mataṃ ca vettuṃ | vaktuṃ ca vākyāni yudhiṣṭhirasya | priyaṃ ca me syādyadi tatra kaści- | dvrajecchamārthaṃ kurupāṇḍavānām

मुझे यह प्रिय होगा कि कोई व्यक्ति दुर्योधन का मन जानने और युधिष्ठिर की बात कहने के लिए वहाँ जाए — कौरवों और पाण्डवों के बीच शान्ति के लिए।

श्लोक 5 (5.2.5)

स भीष्ममामन्त्र्य कुरुप्रवीरं । वैचित्रवीर्यं च महानुभावम् । द्रोणं सपुत्रं विदुरं कृपं च । गान्धारराजं च ससूतपुत्रम् ॥

sa bhīṣmamāmantrya kurupravīraṃ | vaicitravīryaṃ ca mahānubhāvam | droṇaṃ saputraṃ viduraṃ kṛpaṃ ca | gāndhārarājaṃ ca sasūtaputram

वह कुरुवंश के वीर भीष्म को, महानुभाव विचित्रवीर्यपुत्र धृतराष्ट्र को, पुत्र सहित द्रोण को, विदुर और कृप को, तथा सूतपुत्र कर्ण सहित गान्धारराज शकुनि को सम्बोधित करे,

श्लोक 6 (5.2.6)

सर्वे च येऽन्ये धृतराष्ट्रपुत्रा । बलप्रधाना निगमप्रधानाः । स्थिताश्च धर्मेषु यथा स्वकेषु । लोकप्रवीराः श्रुतशीलवृद्धाः ॥

sarve ca ye'nye dhṛtarāṣṭraputrā | balapradhānā nigamapradhānāḥ | sthitāśca dharmeṣu yathā svakeṣu | lokapravīrāḥ śrutaśīlavṛddhāḥ

और धृतराष्ट्र के अन्य सभी पुत्रों को भी, जो चतुरंगिणी सेना और नीतिशास्त्र — दोनों में प्रधान हैं, अपने-अपने धर्म में स्थित हैं, लोक में वीर कहलाते हैं और शास्त्रज्ञान तथा शील में बढ़े-चढ़े हैं;

श्लोक 7 (5.2.7)

एतेषु सर्वेषु समागतेषु । पौरेषु वृद्धेषु च संगतेषु । ब्रवीतु वाक्यं प्रणिपातयुक्तं । कुन्तीसुतस्यार्थकरं यथा स्यात् ॥

eteṣu sarveṣu samāgateṣu | paureṣu vṛddheṣu ca saṃgateṣu | bravītu vākyaṃ praṇipātayuktaṃ | kuntīsutasyārthakaraṃ yathā syāt

और जब ये सब तथा नगर के वृद्धजन एकत्र हों, तब वह विनय से भरे ऐसे वचन कहे, जिनसे कुन्तीपुत्र का प्रयोजन सिद्ध हो।

श्लोक 8 (5.2.8)

सर्वास्ववस्थासु च ते न कोप्या । ग्रस्तो हि सोऽर्थो बलमाश्रितैस्तैः । प्रियाभ्युपेतस्य युधिष्ठिरस्य । द्यूते प्रसक्तस्य हृतं च राज्यम् ॥

sarvāsvavasthāsu ca te na kopyā | grasto hi so'rtho balamāśritaistaiḥ | priyābhyupetasya yudhiṣṭhirasya | dyūte prasaktasya hṛtaṃ ca rājyam

किसी भी दशा में उन्हें क्रुद्ध नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह सम्पत्ति उन्होंने बल के सहारे ली है। युधिष्ठिर अपनी प्रिय वस्तु में लगकर जुए में डूबे हुए थे, तभी उनका राज्य हरा गया।

श्लोक 9 (5.2.9)

निवार्यमाणश्च कुरुप्रवीरः । सर्वैः सुहृद्भिर्ह्ययमप्यतज्ज्ञः । स दीव्यमानः प्रतिदीव्य चैनं । गान्धारराजस्य सुतं मताक्षम् ॥

nivāryamāṇaśca kurupravīraḥ | sarvaiḥ suhṛdbhirhyayamapyatajjñaḥ | sa dīvyamānaḥ pratidīvya cainaṃ | gāndhārarājasya sutaṃ matākṣam

सभी सुहृदों के रोकने पर भी जुए से अनजान यह कुरुवीर दाँव पर दाँव लगाता हुआ गान्धारराज के पुत्र से खेलता रहा, जो पासों का पारंगत था।

श्लोक 10 (5.2.10)

हित्वा हि कर्णं च सुयोधनं च । समाह्वयद्देवितुमाजमीढः । दुरोदरास्तत्र सहस्रशोऽन्ये । युधिष्ठिरो यान्विषहेत जेतुम् ॥

hitvā hi karṇaṃ ca suyodhanaṃ ca | samāhvayaddevitumājamīḍhaḥ | durodarāstatra sahasraśo'nye | yudhiṣṭhiro yānviṣaheta jetum

कर्ण और सुयोधन को छोड़कर अजमीढवंशी युधिष्ठिर ने उसी को खेलने के लिए ललकारा। वहाँ हजारों दूसरे जुआरी थे, जिन्हें युधिष्ठिर जीत सकते थे;

श्लोक 11 (5.2.11)

उत्सृज्य तान्सौबलमेव चायं । समाह्वयत्तेन जितोऽक्षवत्याम् । स दीव्यमानः प्रतिदेवनेन । अक्षेषु नित्यं स्वपराङ्मुखेषु ॥

utsṛjya tānsaubalameva cāyaṃ | samāhvayattena jito'kṣavatyām | sa dīvyamānaḥ pratidevanena | akṣeṣu nityaṃ svaparāṅmukheṣu

फिर भी उन्हें छोड़कर इन्होंने केवल सुबलपुत्र को ललकारा और उसी से पासों में हार गए। उसके दाँव के उत्तर में दाँव लगाते हुए, जब पासे सदा इनके विरुद्ध पड़ते रहे,

श्लोक 12 (5.2.12)

संरम्भमाणो विजितः प्रसह्य । तत्रापराधः शकुनेर्न कश्चित् । तस्मात्प्रणम्यैव वचो ब्रवीतु । वैचित्रवीर्यं बहुसामयुक्तम् ॥

saṃrambhamāṇo vijitaḥ prasahya | tatrāparādhaḥ śakunerna kaścit | tasmātpraṇamyaiva vaco bravītu | vaicitravīryaṃ bahusāmayuktam

तब ये हठ में आकर बुरी तरह हार गए। इसमें शकुनि का कोई दोष नहीं है। इसलिए दूत प्रणाम करके ही विचित्रवीर्य के पुत्र से बहुत सान्त्वनापूर्ण वचन कहे;

श्लोक 13 (5.2.13)

तथा हि शक्यो धृतराष्ट्रपुत्रः । स्वार्थे नियोक्तुं पुरुषेण तेन । अयुद्धमाकाङ्क्षत कौरवाणां । साम्नैव दुर्योधनमाश्वसध्वम् ॥

tathā hi śakyo dhṛtarāṣṭraputraḥ | svārthe niyoktuṃ puruṣeṇa tena | ayuddhamākāṅkṣata kauravāṇāṃ | sāmnaiva duryodhanamāśvasadhvam

क्योंकि इसी प्रकार वह व्यक्ति धृतराष्ट्र के पुत्र को अपने प्रयोजन के अनुकूल कर सकता है। कौरवों से युद्ध की इच्छा मत करो; सान्त्वना से ही दुर्योधन को आश्वस्त करो।

श्लोक 14 (5.2.14)

साम्ना जितोऽर्थोऽर्थकरो भवेत । युद्धेऽनयो भविता नेह सोऽर्थः ॥

sāmnā jito'rtho'rthakaro bhaveta | yuddhe'nayo bhavitā neha so'rthaḥ

सान्त्वना से जीती गई वस्तु ही लाभकारी होती है; युद्ध अनीति है, उसमें यहाँ कोई लाभ नहीं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (5.2.15)

एवं ब्रुवत्येव मधुप्रवीरे । शिनिप्रवीरः सहसोत्पपात । तच्चापि वाक्यं परिनिन्द्य तस्य । समाददे वाक्यमिदं समन्युः ॥

evaṃ bruvatyeva madhupravīre | śinipravīraḥ sahasotpapāta | taccāpi vākyaṃ parinindya tasya | samādade vākyamidaṃ samanyuḥ

मधुवंश के वीर बलराम अभी ऐसा कह ही रहे थे कि शिनिवंश के वीर सात्यकि सहसा उछलकर खड़े हो गए और उनकी बात की निन्दा करते हुए क्रोधपूर्वक यह वचन बोले।

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