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उद्योग पर्व · अध्याय 3

सात्यकि की फटकार

सात्यकि क्रोधपूर्वक बलराम के परामर्श को अस्वीकार करते हैं और उसे सुनने वालों को दोष देते हैं। वे कहते हैं कि जुए की जीत धर्मसम्मत नहीं थी, क्योंकि जुए में निपुण लोगों ने जुआ न जानने वाले राजा को ललकारा था; और अपना व्रत पूरा कर चुके युधिष्ठिर को शत्रुओं से याचना कभी नहीं करनी चाहिए। वे गर्जना करते हैं कि उन्हें, अर्जुन, श्रीकृष्ण, भीम और अन्य मित्र वीरों को कोई नहीं सह सकता, और घोषणा करते हैं कि कौरवों को या तो राज्य लौटाना होगा या मरना होगा, क्योंकि आततायियों को मारने में कोई पाप नहीं।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

सात्यकिरुवाच

श्लोक 1 (5.3.1)

यादृशः पुरुषस्यात्मा तादृशं संप्रभाषते । यथारूपोऽन्तरात्मा ते तथारूपं प्रभाषते ॥

yādṛśaḥ puruṣasyātmā tādṛśaṃ saṃprabhāṣate | yathārūpo'ntarātmā te tathārūpaṃ prabhāṣate

"मनुष्य का अन्तःकरण जैसा होता है, वह वैसा ही बोलता है; तुम्हारा अन्तःकरण जैसा है, वैसा ही वह तुम्हारे मुख से बोल रहा है।

श्लोक 2 (5.3.2)

सन्ति वै पुरुषाः शूराः सन्ति कापुरुषास्तथा । उभावेतौ दृढौ पक्षौ दृश्येते पुरुषान्प्रति ॥

santi vai puruṣāḥ śūrāḥ santi kāpuruṣāstathā | ubhāvetau dṛḍhau pakṣau dṛśyete puruṣānprati

संसार में शूरवीर पुरुष भी होते हैं और कायर भी; मनुष्यों में ये दोनों अलग-अलग पक्ष स्पष्ट दिखाई देते हैं।

श्लोक 3 (5.3.3)

एकस्मिन्नेव जायेते कुले क्लीबमहाबलौ । फलाफलवती शाखे यथैकस्मिन्वनस्पतौ ॥

ekasminneva jāyete kule klībamahābalau | phalāphalavatī śākhe yathaikasminvanaspatau

एक ही कुल में नपुंसक-सा दुर्बल और महाबली दोनों जन्म लेते हैं, जैसे एक ही वृक्ष की एक शाखा फल देती है और दूसरी फलहीन रहती है।

श्लोक 4 (5.3.4)

नाभ्यसूयामि ते वाक्यं ब्रुवतो लाङ्गलध्वज । ये तु शृण्वन्ति ते वाक्यं तानसूयामि माधव ॥

nābhyasūyāmi te vākyaṃ bruvato lāṅgaladhvaja | ye tu śṛṇvanti te vākyaṃ tānasūyāmi mādhava

हे हलध्वज, मैं तुम्हारे कहे वचन में दोष नहीं निकालता; हे माधव, दोष तो मैं उनमें देखता हूँ जो तुम्हारी बात सुन रहे हैं।

श्लोक 5 (5.3.5)

कथं हि धर्मराजस्य दोषमल्पमपि ब्रुवन् । लभते परिषन्मध्ये व्याहर्तुमकुतोभयः ॥

kathaṃ hi dharmarājasya doṣamalpamapi bruvan | labhate pariṣanmadhye vyāhartumakutobhayaḥ

भला इस सभा के बीच धर्मराज का थोड़ा-सा भी दोष बताने वाला निर्भय होकर बोलने का अवसर कैसे पा सकता है?

श्लोक 6 (5.3.6)

समाहूय महात्मानं जितवन्तोऽक्षकोविदाः । अनक्षज्ञं यथाऽश्रद्धं तेषु धर्मजयः कुतः ॥

samāhūya mahātmānaṃ jitavanto'kṣakovidāḥ | anakṣajñaṃ yathā'śraddhaṃ teṣu dharmajayaḥ kutaḥ

जुए में निपुण लोगों ने उस महात्मा को, जो जुआ नहीं जानता था और उन पर विश्वास करता था, बुलाकर हरा दिया। उनकी वह जीत धर्म की जीत कैसे हो सकती है?

श्लोक 7 (5.3.7)

यदि कुन्तीसुतं गेहे क्रीडन्तं भ्रातृभिः सह । अभिगम्य जयेयुस्ते तत्तेषां धर्मतो भवेत् ॥

yadi kuntīsutaṃ gehe krīḍantaṃ bhrātṛbhiḥ saha | abhigamya jayeyuste tatteṣāṃ dharmato bhavet

यदि वे कुन्तीपुत्र को घर पर भाइयों के साथ खेलते हुए पाकर जीत लेते, तो वह उनकी धर्मसम्मत जीत होती।

श्लोक 8 (5.3.8)

समाहूय तु राजानं क्षत्रधर्मरतं सदा । निकृत्या जितवन्तस्ते किं नु तेषां परं शुभम् ॥

samāhūya tu rājānaṃ kṣatradharmarataṃ sadā | nikṛtyā jitavantaste kiṃ nu teṣāṃ paraṃ śubham

परन्तु उन्होंने सदा क्षत्रियधर्म में लगे रहने वाले राजा को बुलाकर छल से जीता। इसमें उनका कौन-सा परम कल्याण है?

श्लोक 9 (5.3.9)

कथं प्रणिपतेच्चायमिह कृत्वा पणं परम् । वनवासाद्विमुक्तस्तु प्राप्तः पैतामहं पदम् ॥

kathaṃ praṇipateccāyamiha kṛtvā paṇaṃ param | vanavāsādvimuktastu prāptaḥ paitāmahaṃ padam

उस बड़ी शर्त को पूरा कर चुकने के बाद यह यहाँ किसी के आगे क्यों झुके? वनवास से मुक्त होकर यह अपने पितामहों के पद का अधिकारी हो चुका है।

श्लोक 10 (5.3.10)

यद्ययं परवित्तानि कामयेत युधिष्ठिरः । एवमप्ययमत्यन्तं परान्नार्हति याचितुम् ॥

yadyayaṃ paravittāni kāmayeta yudhiṣṭhiraḥ | evamapyayamatyantaṃ parānnārhati yācitum

यदि ये युधिष्ठिर दूसरों के धन की कामना भी करते, तब भी इन्हें शत्रुओं से याचना करना कदापि उचित न होता।

श्लोक 11 (5.3.11)

कथं च धर्मयुक्तास्ते न च राज्यं जिहीर्षवः । निवृत्तवनवासांस्तान्य आहुर्विदिता इति ॥

kathaṃ ca dharmayuktāste na ca rājyaṃ jihīrṣavaḥ | nivṛttavanavāsāṃstānya āhurviditā iti

और वे धर्मात्मा तथा राज्य हड़पने की इच्छा से रहित कैसे हैं, जो वनवास पूरा करके लौटे पाण्डवों के विषय में कहते हैं कि वे पहचान लिए गए थे?

श्लोक 12 (5.3.12)

अनुनीता हि भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च । न व्यवस्यन्ति पाण्डूनां प्रदातुं पैतृकं वसु ॥

anunītā hi bhīṣmeṇa droṇena vidureṇa ca | na vyavasyanti pāṇḍūnāṃ pradātuṃ paitṛkaṃ vasu

भीष्म, द्रोण और विदुर के समझाने पर भी वे पाण्डवों को उनकी पैतृक सम्पत्ति देने का निश्चय नहीं करते।

श्लोक 13 (5.3.13)

अहं तु ताञ्छितैर्बाणैरनुनीय रणे बलात् । पादयोः पातयिष्यामि कौन्तेयस्य महात्मनः ॥

ahaṃ tu tāñchitairbāṇairanunīya raṇe balāt | pādayoḥ pātayiṣyāmi kaunteyasya mahātmanaḥ

परन्तु मैं युद्ध में तीखे बाणों से बलपूर्वक उन्हें मनाऊँगा और महात्मा कुन्तीपुत्र के चरणों में गिरा दूँगा।

श्लोक 14 (5.3.14)

अथ ते न व्यवस्यन्ति प्रणिपाताय धीमतः । गमिष्यन्ति सहामात्या यमस्य सदनं प्रति ॥

atha te na vyavasyanti praṇipātāya dhīmataḥ | gamiṣyanti sahāmātyā yamasya sadanaṃ prati

और यदि वे उस बुद्धिमान राजा के आगे झुकने का निश्चय नहीं करेंगे, तो अपने मन्त्रियों सहित यमलोक को जाएँगे।

श्लोक 15 (5.3.15)

न हि ते युयुधानस्य संरब्धस्य युयुत्सतः । वेगं समर्थाः संसोढुं वज्रस्येव महीधराः ॥

na hi te yuyudhānasya saṃrabdhasya yuyutsataḥ | vegaṃ samarthāḥ saṃsoḍhuṃ vajrasyeva mahīdharāḥ

क्रुद्ध और युद्ध के लिए उतावले युयुधान का वेग वे वैसे ही नहीं सह सकते, जैसे पर्वत वज्र का वेग नहीं सह सकते।

श्लोक 16 (5.3.16)

को हि गाण्डीवधन्वानं कश्च चक्रायुधं युधि । मां चापि विषहेत्क्रुद्धं कश्च भीमं दुरासदम् ॥

ko hi gāṇḍīvadhanvānaṃ kaśca cakrāyudhaṃ yudhi | māṃ cāpi viṣahetkruddhaṃ kaśca bhīmaṃ durāsadam

युद्ध में गाण्डीवधारी अर्जुन को, चक्रधारी श्रीकृष्ण को और क्रुद्ध होने पर मुझको कौन सह सकता है? और दुर्जय भीम का सामना कौन कर सकता है?

श्लोक 17 (5.3.17)

यमौ च दृढधन्वानौ यमकल्पौ महाद्युती । विराटद्रुपदौ वीरौ यमकालोपमद्युती ॥

yamau ca dṛḍhadhanvānau yamakalpau mahādyutī | virāṭadrupadau vīrau yamakālopamadyutī

या दृढ़ धनुष वाले, यम के समान महातेजस्वी दोनों जुड़वाँ भाइयों का, और यम तथा काल के समान दीप्तिमान वीर विराट और द्रुपद का?

श्लोक 18 (5.3.18)

को जिजीविषुरासीदेद्धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् । पञ्चैतान्पाण्डवेयांस्तु द्रौपद्याः कीर्तिवर्धनान् ॥

ko jijīviṣurāsīdeddhṛṣṭadyumnaṃ ca pārṣatam | pañcaitānpāṇḍaveyāṃstu draupadyāḥ kīrtivardhanān

जीवित रहना चाहने वाला कौन पृषतवंशी धृष्टद्युम्न से भिड़ेगा, या द्रौपदी का यश बढ़ाने वाले पाण्डवों के इन पाँच पुत्रों से,

श्लोक 19 (5.3.19)

समप्रमाणान्पाण्डूनां समवीर्यान्मदोत्कटान् । सौभद्रं च महेष्वासममरैरपि दुःसहम् ॥

samapramāṇānpāṇḍūnāṃ samavīryānmadotkaṭān | saubhadraṃ ca maheṣvāsamamarairapi duḥsaham

जो डील-डौल और पराक्रम में पाण्डवों के समान हैं और मद से उत्कट हैं; या सुभद्रा के पुत्र महाधनुर्धर अभिमन्यु से, जिसे देवता भी कठिनाई से सह पाते हैं;

श्लोक 20 (5.3.20)

गदप्रद्युम्नसाम्बांश्च कालसूर्यानलोपमान् । ते वयं धृतराष्ट्रस्य पुत्रं शकुनिना सह ॥

gadapradyumnasāmbāṃśca kālasūryānalopamān | te vayaṃ dhṛtarāṣṭrasya putraṃ śakuninā saha

या काल, सूर्य और अग्नि के समान गद, प्रद्युम्न और साम्ब से? हम धृतराष्ट्र के पुत्र को शकुनि सहित

श्लोक 21 (5.3.21)

कर्णं चैव निहत्याजावभिषेक्ष्याम पाण्डवम् । नाधर्मो विद्यते कश्चिच्छत्रून्हत्वाऽऽततायिनः ॥

karṇaṃ caiva nihatyājāvabhiṣekṣyāma pāṇḍavam | nādharmo vidyate kaścicchatrūnhatvā''tatāyinaḥ

और कर्ण को भी युद्ध में मारकर पाण्डुपुत्र का राज्याभिषेक करेंगे। आततायी शत्रुओं को मारने में कोई अधर्म नहीं है।

श्लोक 22 (5.3.22)

अधर्म्यमयशस्यं च शात्रवाणां प्रयाचनम् । हृद्गतस्तस्य यः कामस्तं कुरुध्वमतन्द्रिताः ॥

adharmyamayaśasyaṃ ca śātravāṇāṃ prayācanam | hṛdgatastasya yaḥ kāmastaṃ kurudhvamatandritāḥ

शत्रुओं से याचना करना अधर्म है और अपयश देने वाला है। उनके हृदय में जो कामना है, उसे आप लोग आलस्य छोड़कर पूरा करें।

श्लोक 23 (5.3.23)

धार्तराष्ट्रो ह्ययुद्धेन न राज्यं दातुमिच्छति । अद्य पाण्डुसुतो राज्यं लभतां वा युधिष्ठिरः । निहता वा रणे सर्वे स्वप्स्यन्ति वसुधातले ॥

dhārtarāṣṭro hyayuddhena na rājyaṃ dātumicchati | adya pāṇḍusuto rājyaṃ labhatāṃ vā yudhiṣṭhiraḥ | nihatā vā raṇe sarve svapsyanti vasudhātale

धृतराष्ट्र का पुत्र बिना युद्ध के राज्य नहीं देना चाहता। इसलिए या तो आज ही पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर राज्य प्राप्त करें, या वे सब युद्ध में मारे जाकर धरती पर सो जाएँ।"

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