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उद्योग पर्व · अध्याय 4

द्रुपद का मित्र राजाओं को बुलाने का परामर्श

द्रुपद सात्यकि से सहमत होकर कहते हैं कि दुर्योधन मीठी बातों से राज्य कभी नहीं देगा, क्योंकि धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोण, कर्ण और शकुनि सब उसी का साथ देंगे, और दुष्ट लोग नम्रता को दुर्बलता समझते हैं। वे आग्रह करते हैं कि दुर्योधन से पहले ही मित्र राजाओं को अपने पक्ष में करने के लिए तुरन्त दूत भेजे जाएँ, और बुलाए जाने वाले राजाओं तथा जातियों की लम्बी सूची गिनाते हैं। साथ ही वे प्रस्ताव रखते हैं कि उनके विद्वान पुरोहित धृतराष्ट्र और कौरव वृद्धों के लिए सन्देश लेकर हस्तिनापुर जाएँ।

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

द्रुपद उवाच

श्लोक 1 (5.4.1)

एवमेतन्महाबाहो भविष्यति न संशयः । न हि दुर्योधनो राज्यं मधुरेण प्रदास्यति ॥

evametanmahābāho bhaviṣyati na saṃśayaḥ | na hi duryodhano rājyaṃ madhureṇa pradāsyati

"हे महाबाहु, निःसन्देह ऐसा ही होगा। दुर्योधन मीठी बातों से राज्य नहीं देगा।

श्लोक 2 (5.4.2)

अनुवर्त्स्यति तं चापि धृतराष्ट्रः सुतप्रियः । भीष्मद्रोणौ च कार्पण्यान्मौर्ख्याद्राधेयसौबलौ ॥

anuvartsyati taṃ cāpi dhṛtarāṣṭraḥ sutapriyaḥ | bhīṣmadroṇau ca kārpaṇyānmaurkhyādrādheyasaubalau

पुत्र-प्रेमी धृतराष्ट्र भी उसी का साथ देंगे; भीष्म और द्रोण विवशता के कारण, और राधापुत्र कर्ण तथा शकुनि मूर्खता के कारण उसका अनुसरण करेंगे।

श्लोक 3 (5.4.3)

बलदेवस्य वाक्यं तु मम ज्ञाने न युज्यते । एतद्धि पुरुषेणाग्रे कार्यं सुनयमिच्छता ॥

baladevasya vākyaṃ tu mama jñāne na yujyate | etaddhi puruṣeṇāgre kāryaṃ sunayamicchatā

मेरी समझ में बलदेव की बात उचित नहीं है; अच्छी नीति चाहने वाले पुरुष को पहले वही करना चाहिए जो मैं कह रहा हूँ।

श्लोक 4 (5.4.4)

न तु वाच्यो मृदुवचो धार्तराष्ट्रः कथंचन । नहि मार्दवसाध्योऽसौ पापबुद्धिर्मतो मम ॥

na tu vācyo mṛduvaco dhārtarāṣṭraḥ kathaṃcana | nahi mārdavasādhyo'sau pāpabuddhirmato mama

धृतराष्ट्र के पुत्र से किसी भी प्रकार कोमल वचन नहीं कहने चाहिए। मेरे मत में वह पापबुद्धि नम्रता से वश में आने वाला नहीं है।

श्लोक 5 (5.4.5)

गर्दभे मार्दवं कुर्याद्गोषु तीक्ष्णं समाचरेत् । मृदु दुर्योधने वाक्यं यो ब्रूयात्पापचेतसि ॥

gardabhe mārdavaṃ kuryādgoṣu tīkṣṇaṃ samācaret | mṛdu duryodhane vākyaṃ yo brūyātpāpacetasi

जो पापी दुर्योधन से कोमल वाणी बोलता है, वह मानो गधे के साथ नरमी और गायों के साथ कठोरता का व्यवहार करता है।

श्लोक 6 (5.4.6)

मृदुं वै मन्यते पापो भाषमाणमशक्तिकम् । हितमर्थं न जानीयादबुद्धिर्मार्दवे सति ॥

mṛduṃ vai manyate pāpo bhāṣamāṇamaśaktikam | hitamarthaṃ na jānīyādabuddhirmārdave sati

दुष्ट व्यक्ति नम्रता से बोलने वाले को दुर्बल और शक्तिहीन समझता है; नरमी देखकर वह मूर्ख अपना हित भी नहीं पहचानता।

श्लोक 7 (5.4.7)

एतच्चैव करिष्यामो यत्नश्च क्रियतामिह । प्रस्थापयाम मित्रेभ्यो बलान्युद्योजयन्तु नः ॥

etaccaiva kariṣyāmo yatnaśca kriyatāmiha | prasthāpayāma mitrebhyo balānyudyojayantu naḥ

हम यही करेंगे, और इसका प्रयत्न यहीं से आरम्भ हो; हम अपने मित्रों के पास सन्देश भेजें कि वे हमारे लिए सेनाएँ तैयार करें।

श्लोक 8 (5.4.8)

शल्यस्य धृष्टकेतोश्च जयत्सेनस्य वा विभो । केकयानां च सर्वेषां दूता गच्छन्तु शीघ्रगाः ॥

śalyasya dhṛṣṭaketośca jayatsenasya vā vibho | kekayānāṃ ca sarveṣāṃ dūtā gacchantu śīghragāḥ

हे विभो, शल्य, धृष्टकेतु, जयत्सेन और सभी केकयों के पास शीघ्रगामी दूत जाएँ।

श्लोक 9 (5.4.9)

स च दुर्योधनो नूनं प्रेषयिष्यति सर्वशः । पूर्वाभिपन्नाः सन्तश्च भजन्ते पूर्वचोदनम् ॥

sa ca duryodhano nūnaṃ preṣayiṣyati sarvaśaḥ | pūrvābhipannāḥ santaśca bhajante pūrvacodanam

दुर्योधन भी निश्चय ही सब ओर सन्देश भेजेगा; और सज्जन जिसके द्वारा पहले आमन्त्रित किए जाते हैं, उसी का साथ देते हैं।

श्लोक 10 (5.4.10)

तत्त्वरध्वं नरेन्द्राणां पूर्वमेव प्रचोदने । महद्धि कार्यं वोढव्यमिति मे वर्तते मतिः ॥

tattvaradhvaṃ narendrāṇāṃ pūrvameva pracodane | mahaddhi kāryaṃ voḍhavyamiti me vartate matiḥ

इसलिए राजाओं को सबसे पहले आमन्त्रित करने में शीघ्रता करो; मेरा विचार है कि हमें एक बहुत बड़ा कार्य निभाना है।

श्लोक 11 (5.4.11)

शल्यस्य प्रेष्यतां शीघ्रं ये च तस्यानुगा नृपाः । भगदत्ताय राज्ञे च पूर्वसागरवासिने ॥

śalyasya preṣyatāṃ śīghraṃ ye ca tasyānugā nṛpāḥ | bhagadattāya rājñe ca pūrvasāgaravāsine

शल्य और उनके अनुयायी राजाओं के पास शीघ्र सन्देश भेजा जाए, और पूर्वी सागर के तट पर रहने वाले राजा भगदत्त के पास भी;

श्लोक 12 (5.4.12)

अमितौजसे तथोग्राय हार्दिक्यायान्धकाय च । दीर्घप्रज्ञाय शूराय रोचमानाय वा विभो ॥

amitaujase tathogrāya hārdikyāyāndhakāya ca | dīrghaprajñāya śūrāya rocamānāya vā vibho

अमितौजा, उग्र, हार्दिक्य और अन्धक के पास; हे विभो, दीर्घप्रज्ञ, शूर और रोचमान के पास भी।

श्लोक 13 (5.4.13)

आनीयतां बृहन्तश्च सेनाबिन्दुश्च पार्थिवः । सेनजित्प्रतिबिन्ध्यश्च चित्रवर्मा सुवास्तुकः ॥

ānīyatāṃ bṛhantaśca senābinduśca pārthivaḥ | senajitpratibindhyaśca citravarmā suvāstukaḥ

बृहन्त और राजा सेनाबिन्दु को बुलाया जाए; सेनजित्, प्रतिविन्ध्य, चित्रवर्मा और सुवास्तुक को भी;

श्लोक 14 (5.4.14)

बाह्लीको मुञ्जकेशश्च चैद्याधिपतिरेव च । सुपार्श्वश्च सुबाहुश्च पौरवश्च महारथः ॥

bāhlīko muñjakeśaśca caidyādhipatireva ca | supārśvaśca subāhuśca pauravaśca mahārathaḥ

बाह्लीक, मुञ्जकेश और चेदिराज को; सुपार्श्व, सुबाहु और महारथी पौरव को;

श्लोक 15 (5.4.15)

शकानां पह्लवानां च दरदानां च ये नृपाः । सुरारिश्च नदीजश्च कर्णवेष्टश्च पार्थिवः ॥

śakānāṃ pahlavānāṃ ca daradānāṃ ca ye nṛpāḥ | surāriśca nadījaśca karṇaveṣṭaśca pārthivaḥ

शकों, पह्लवों और दरदों के राजाओं को; सुरारि, नदीज और राजा कर्णवेष्ट को;

श्लोक 16 (5.4.16)

नीलश्च वीरधर्मा च भूमिपालश्च वीर्यवान् । दुर्जयो दन्तवक्रश्च रुक्मी च जनमेजयः ॥

nīlaśca vīradharmā ca bhūmipālaśca vīryavān | durjayo dantavakraśca rukmī ca janamejayaḥ

नील, वीरधर्मा और पराक्रमी भूमिपाल को; दुर्जय, दन्तवक्र, रुक्मी और जनमेजय को;

श्लोक 17 (5.4.17)

आषाढो वायुवेगश्च पूर्वपाली च पार्थिवः । भूरितेजा देवकश्च एकलव्यः सहात्मजैः ॥

āṣāḍho vāyuvegaśca pūrvapālī ca pārthivaḥ | bhūritejā devakaśca ekalavyaḥ sahātmajaiḥ

आषाढ, वायुवेग और राजा पूर्वपाली को; भूरितेजा, देवक और पुत्रों सहित एकलव्य को;

श्लोक 18 (5.4.18)

कारूषकाश्च राजानः क्षेमधूर्तिश्च वीर्यवान् । काम्भोजा ऋषिका ये च पश्चिमानूपकाश्च ये ॥

kārūṣakāśca rājānaḥ kṣemadhūrtiśca vīryavān | kāmbhojā ṛṣikā ye ca paścimānūpakāśca ye

करूष देश के राजाओं और पराक्रमी क्षेमधूर्ति को; काम्बोजों, ऋषिकों और पश्चिमी अनूपकों को;

श्लोक 19 (5.4.19)

जयत्सेनश्च काश्यश्च तथा पञ्चनदा नृपाः । क्राथपुत्रश्च दुर्धर्षः पार्वतीयाश्च ये नृपाः ॥

jayatsenaśca kāśyaśca tathā pañcanadā nṛpāḥ | krāthaputraśca durdharṣaḥ pārvatīyāśca ye nṛpāḥ

जयत्सेन, काशिराज और पञ्चनद के राजाओं को; दुर्धर्ष क्राथपुत्र को और पर्वतीय राजाओं को;

श्लोक 20 (5.4.20)

जानकिश्च सुशर्मा च मणिमान्पौतिमत्स्यकः । पांशुराष्ट्राधिपश्चैव धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् ॥

jānakiśca suśarmā ca maṇimānpautimatsyakaḥ | pāṃśurāṣṭrādhipaścaiva dhṛṣṭaketuśca vīryavān

जानकि, सुशर्मा, मणिमान् और पौतिमत्स्यक को; पांशुराष्ट्र के अधिपति और पराक्रमी धृष्टकेतु को;

श्लोक 21 (5.4.21)

तुण्डश्च दण्डधारश्च बृहत्सेनश्च वीर्यवान् । अपराजितो निषादश्च श्रेणिमान्वसुमानपि ॥

tuṇḍaśca daṇḍadhāraśca bṛhatsenaśca vīryavān | aparājito niṣādaśca śreṇimānvasumānapi

तुण्ड, दण्डधार और पराक्रमी बृहत्सेन को; अपराजित, निषाद, श्रेणिमान् और वसुमान् को भी;

श्लोक 22 (5.4.22)

बृहद्बलो महौजाश्च बाहुः परपुरंजयः । समुद्रसेनो राजा च सह पुत्रेण वीर्यवान् ॥

bṛhadbalo mahaujāśca bāhuḥ parapuraṃjayaḥ | samudraseno rājā ca saha putreṇa vīryavān

बृहद्बल, महौजा और शत्रुओं के नगर जीतने वाले बाहु को; अपने पराक्रमी पुत्र सहित राजा समुद्रसेन को;

श्लोक 23 (5.4.23)

उद्भवः क्षेमकश्चैव वाटधानश्च पार्थिवः । श्रुतायुश्च दृढायुश्च साल्वपुत्रश्च वीर्यवान् ॥

udbhavaḥ kṣemakaścaiva vāṭadhānaśca pārthivaḥ | śrutāyuśca dṛḍhāyuśca sālvaputraśca vīryavān

उद्भव, क्षेमक और राजा वाटधान को; श्रुतायु, दृढायु और शाल्व के पराक्रमी पुत्र को;

श्लोक 24 (5.4.24)

कुमारश्च कलिङ्गानामीश्वरो युद्धदुर्मदः । एतेषां प्रेष्यतां शीघ्रमेतद्धि मम रोचते ॥

kumāraśca kaliṅgānāmīśvaro yuddhadurmadaḥ | eteṣāṃ preṣyatāṃ śīghrametaddhi mama rocate

और युद्ध में उन्मत्त कलिंगराज कुमार को। इन सबके पास शीघ्र सन्देश भेजा जाए — मुझे यही उचित लगता है।

श्लोक 25 (5.4.25)

अयं च ब्राह्मणो विद्वान्मम राजन्पुरोहितः । प्रेष्यतां धृतराष्ट्राय वाक्यमस्मै प्रदीयताम् ॥

ayaṃ ca brāhmaṇo vidvānmama rājanpurohitaḥ | preṣyatāṃ dhṛtarāṣṭrāya vākyamasmai pradīyatām

हे राजन्, मेरे ये विद्वान ब्राह्मण पुरोहित धृतराष्ट्र के पास भेजे जाएँ, और इन्हें वह सन्देश दिया जाए जो वहाँ कहना है —

श्लोक 26 (5.4.26)

यथा दुर्योधनो वाच्यो यथा शान्तनवो नृपः । धृतराष्ट्रो यथा वाच्यो द्रोणश्च रथिनां वरः ॥

yathā duryodhano vācyo yathā śāntanavo nṛpaḥ | dhṛtarāṣṭro yathā vācyo droṇaśca rathināṃ varaḥ

कि दुर्योधन से क्या कहना है, शान्तनुपुत्र राजा भीष्म से क्या, धृतराष्ट्र से क्या और रथियों में श्रेष्ठ द्रोण से क्या।"

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