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उद्योग पर्व · अध्याय 5

युद्ध के लिए राजाओं का जमावड़ा

श्रीकृष्ण द्रुपद की योजना का समर्थन करते हैं, पर कहते हैं कि यादवों का कौरवों और पाण्डवों से एक-सा सम्बन्ध है। वे राजाओं में सबसे वृद्ध और आदरणीय द्रुपद से पाण्डवों के हित का सन्देश भेजने को कहते हैं, और यह भी कि यदि दुर्योधन सन्धि न करे, तभी यादवों को बुलाया जाए। सम्मानपूर्वक विदा होकर श्रीकृष्ण द्वारका लौट जाते हैं; पाण्डव, विराट और द्रुपद युद्ध की तैयारी करके राजाओं को सन्देश भेजते हैं, जो सब ओर से आ जुटते हैं, और दुर्योधन भी अपने पक्ष के राजाओं को बुलाता है। तब द्रुपद अपने पुरोहित को कौरवों के पास भेजते हैं।

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.5.1)

द्रुपदेनैवमुक्ते तु वाक्ये वाक्यविदां वरः । वसुदेवसुतस्तत्र वृष्णिसिंहोऽब्रवीदिदम् ॥

drupadenaivamukte tu vākye vākyavidāṃ varaḥ | vasudevasutastatra vṛṣṇisiṃho'bravīdidam

द्रुपद के ऐसा कहने पर वाणी के मर्मज्ञों में श्रेष्ठ, वृष्णिवंश के सिंह वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण ने वहाँ यह कहा —

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (5.5.2)

उपपन्नमिदं वाक्यं सोमकानां धुरंधरे । अर्थसिद्धिकरं राज्ञः पाण्डवस्यामितौजसः ॥

upapannamidaṃ vākyaṃ somakānāṃ dhuraṃdhare | arthasiddhikaraṃ rājñaḥ pāṇḍavasyāmitaujasaḥ

"सोमकों के धुरन्धर का यह कथन उचित है और अपार तेजस्वी पाण्डव राजा का प्रयोजन सिद्ध करने वाला है।

श्लोक 3 (5.5.3)

एतच्च पूर्वं कार्यं नः सुनीतिमभिकाङ्क्षताम् । अन्यथा ह्याचरन्कर्म पुरुषः स्यात्सुबालिशः ॥

etacca pūrvaṃ kāryaṃ naḥ sunītimabhikāṅkṣatām | anyathā hyācarankarma puruṣaḥ syātsubāliśaḥ

अच्छी नीति चाहने वाले हम लोगों को पहले यही करना चाहिए; इसके विपरीत आचरण करने वाला मनुष्य निरा मूर्ख होगा।

श्लोक 4 (5.5.4)

किं तु संबन्धकं तुल्यमस्माकं कुरुपाण्डुषु । यथेष्टं वर्तमानेषु पाण्डवेषु च तेषु च ॥

kiṃ tu saṃbandhakaṃ tulyamasmākaṃ kurupāṇḍuṣu | yatheṣṭaṃ vartamāneṣu pāṇḍaveṣu ca teṣu ca

किन्तु कौरवों और पाण्डवों से हमारा सम्बन्ध एक-सा है, चाहे पाण्डव और वे अपनी इच्छा से जैसा भी व्यवहार करें।

श्लोक 5 (5.5.5)

ते विवाहार्थमानीता वयं सर्वे तथा भवान् । कृते विवाहे मुदिता गमिष्यामो गृहान्प्रति ॥

te vivāhārthamānītā vayaṃ sarve tathā bhavān | kṛte vivāhe muditā gamiṣyāmo gṛhānprati

हम सब विवाह के लिए यहाँ बुलाए गए थे, और आप भी; विवाह सम्पन्न हो जाने पर हम प्रसन्न होकर अपने-अपने घर लौट जाएँगे।

श्लोक 6 (5.5.6)

भवान्वृद्धतमो राज्ञां वयसा च श्रुतेन च । शिष्यवत्ते वयं सर्वे भवामेह न संशयः ॥

bhavānvṛddhatamo rājñāṃ vayasā ca śrutena ca | śiṣyavatte vayaṃ sarve bhavāmeha na saṃśayaḥ

आप आयु और विद्या — दोनों में राजाओं में सबसे बड़े हैं; हम सब यहाँ आपके शिष्य के समान हैं, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 7 (5.5.7)

भवन्तं धृतराष्ट्रश्च सततं बहु मन्यते । आचार्ययोः सखा चासि द्रोणस्य च कृपस्य च ॥

bhavantaṃ dhṛtarāṣṭraśca satataṃ bahu manyate | ācāryayoḥ sakhā cāsi droṇasya ca kṛpasya ca

धृतराष्ट्र सदा आपका बहुत आदर करते हैं, और आप दोनों आचार्यों — द्रोण और कृप — के मित्र हैं।

श्लोक 8 (5.5.8)

स भवान्प्रेषयत्वद्य पाण्डवार्थकरं वचः । सर्वेषां निश्चितं तन्नः प्रेषयिष्यति यद्भवान् ॥

sa bhavānpreṣayatvadya pāṇḍavārthakaraṃ vacaḥ | sarveṣāṃ niścitaṃ tannaḥ preṣayiṣyati yadbhavān

इसलिए आप आज ही पाण्डवों का प्रयोजन सिद्ध करने वाला सन्देश भेजें। आप जो भी सन्देश भेजेंगे, वह हम सबको स्वीकार है।

श्लोक 9 (5.5.9)

यदि तावच्छमं कुर्यान्न्यायेन कुरुपुङ्गवः । न भवेत्कुरुपाण्डूनां सौभ्रात्रेण महान्क्षयः ॥

yadi tāvacchamaṃ kuryānnyāyena kurupuṅgavaḥ | na bhavetkurupāṇḍūnāṃ saubhrātreṇa mahānkṣayaḥ

यदि कुरुश्रेष्ठ दुर्योधन न्यायपूर्वक सन्धि कर ले, तो भाईचारा बना रहेगा और कौरवों तथा पाण्डवों का महाविनाश नहीं होगा।

श्लोक 10 (5.5.10)

अथ दर्पान्वितो मोहान्न कुर्याद्धृतराष्ट्रजः । अन्येषां प्रेषयित्वा च पश्चादस्मान्समाह्वयेः ॥

atha darpānvito mohānna kuryāddhṛtarāṣṭrajaḥ | anyeṣāṃ preṣayitvā ca paścādasmānsamāhvayeḥ

परन्तु यदि धृतराष्ट्र का पुत्र घमण्ड में भरकर मोहवश ऐसा न करे, तो आप दूसरों के पास सन्देश भेजकर फिर हमें बुलाइए।

श्लोक 11 (5.5.11)

ततो दुर्योधनो मन्दः सहामात्यः सबान्धवः । निष्ठामापत्स्यते मूढः क्रुद्धे गाण्डीवधन्वनि ॥

tato duryodhano mandaḥ sahāmātyaḥ sabāndhavaḥ | niṣṭhāmāpatsyate mūḍhaḥ kruddhe gāṇḍīvadhanvani

तब गाण्डीवधारी अर्जुन के क्रुद्ध होने पर वह मन्दबुद्धि मूढ़ दुर्योधन अपने मन्त्रियों और बन्धुओं सहित नष्ट हो जाएगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (5.5.12)

ततः सत्कृत्य वार्ष्णेयं विराटः पृथिवीपतिः । गृहान्प्रस्थापयामास सगणं सहबान्धवम् ॥

tataḥ satkṛtya vārṣṇeyaṃ virāṭaḥ pṛthivīpatiḥ | gṛhānprasthāpayāmāsa sagaṇaṃ sahabāndhavam

तब पृथ्वीपति राजा विराट ने वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण का सत्कार करके उन्हें उनके अनुचरों और बन्धुओं सहित घर के लिए विदा किया।

श्लोक 13 (5.5.13)

द्वारकां तु गते कृष्णे युधिष्ठिरपुरोगमाः । चक्रुः साङ्ग्रामिकं सर्वं विराटश्च महीपतिः ॥

dvārakāṃ tu gate kṛṣṇe yudhiṣṭhirapurogamāḥ | cakruḥ sāṅgrāmikaṃ sarvaṃ virāṭaśca mahīpatiḥ

श्रीकृष्ण के द्वारका चले जाने पर युधिष्ठिर आदि ने और राजा विराट ने युद्ध की सारी तैयारी की।

श्लोक 14 (5.5.14)

ततः संप्रेषयामास विराटः सह बान्धवैः । सर्वेषां भूमिपालानां द्रुपदश्च महीपतिः ॥

tataḥ saṃpreṣayāmāsa virāṭaḥ saha bāndhavaiḥ | sarveṣāṃ bhūmipālānāṃ drupadaśca mahīpatiḥ

फिर विराट ने अपने बन्धुओं सहित, और राजा द्रुपद ने भी, सभी भूपालों के पास सन्देश भेजे।

श्लोक 15 (5.5.15)

वचनात्कुरुसिंहानां मत्स्यपाञ्चालयोश्च ते । समाजग्मुर्महीपालाः संप्रहृष्टा महाबलाः ॥

vacanātkurusiṃhānāṃ matsyapāñcālayośca te | samājagmurmahīpālāḥ saṃprahṛṣṭā mahābalāḥ

कुरुवंश के सिंहों तथा मत्स्य और पाञ्चाल राजाओं के कहने पर वे महाबली राजा बड़े हर्ष के साथ आ जुटे।

श्लोक 16 (5.5.16)

तच्छ्रुत्वा पाण्डुपुत्राणां समागच्छन्महद्बलम् । धृतराष्ट्रसुताश्चापि समानिन्युर्महीपतीन् ॥

tacchrutvā pāṇḍuputrāṇāṃ samāgacchanmahadbalam | dhṛtarāṣṭrasutāścāpi samāninyurmahīpatīn

पाण्डुपुत्रों के लिए विशाल सेना एकत्र हो रही है, यह सुनकर धृतराष्ट्र के पुत्रों ने भी राजाओं को बुला लिया।

श्लोक 17 (5.5.17)

समाकुला मही राजन्कुरुपाण्डवकारणात् । तदा समभवत्कृत्स्ना संप्रयाणे महीक्षिताम् ॥

samākulā mahī rājankurupāṇḍavakāraṇāt | tadā samabhavatkṛtsnā saṃprayāṇe mahīkṣitām

हे राजन्, तब कौरवों और पाण्डवों के कारण कूच करते राजाओं से सारी पृथ्वी भर गई।

श्लोक 18 (5.5.18)

संकुला च तदा भूमिश्चतुरङ्गबलान्विता । बलानि तेषां वीराणामागच्छन्ति ततस्ततः ॥

saṃkulā ca tadā bhūmiścaturaṅgabalānvitā | balāni teṣāṃ vīrāṇāmāgacchanti tatastataḥ

उस समय धरती चतुरंगिणी सेनाओं से भर गई; उन वीरों की सेनाएँ जहाँ-तहाँ से आने लगीं,

श्लोक 19 (5.5.19)

चालयन्तीव गां देवीं सपर्वतवनामिमाम् । ततः प्रज्ञावयोवृद्धं पाञ्चाल्यः स्वपुरोहितम् । कुरुभ्यः प्रेषयामास युधिष्ठिरमते स्थितः ॥

cālayantīva gāṃ devīṃ saparvatavanāmimām | tataḥ prajñāvayovṛddhaṃ pāñcālyaḥ svapurohitam | kurubhyaḥ preṣayāmāsa yudhiṣṭhiramate sthitaḥ

मानो पर्वतों और वनों सहित इस देवी पृथ्वी को कँपा रही हों। तब युधिष्ठिर के मत पर चलते हुए पाञ्चालराज ने बुद्धि और आयु में बढ़े-चढ़े अपने पुरोहित को कौरवों के पास भेजा।

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