उद्योग पर्व · अध्याय 6
द्रुपद के पुरोहित का हस्तिनापुर-प्रस्थान
द्रुपद अपने पुरोहित को निर्देश देते हैं और उन्हें ज्ञानियों में अग्रणी तथा शुक्राचार्य और बृहस्पति के समान बताकर उनकी प्रशंसा करते हैं। वे स्मरण कराते हैं कि धृतराष्ट्र की जानकारी में पाण्डवों को जुए में ठगा गया, और अपना उद्देश्य बताते हैं: कौरव सभा में कहे गए धर्मयुक्त वचन, विदुर के समर्थन से, भीष्म, द्रोण, कृप और योद्धाओं में फूट डाल देंगे, जिससे कौरव उलझे रहेंगे और पाण्डव अपनी सेना तैयार कर लेंगे। यह आश्वासन पाकर कि विद्वान ब्राह्मण दूत को कोई भय नहीं, पुरोहित अपने शिष्यों के साथ हस्तिनापुर के लिए चल पड़ते हैं।
द्रुपद उवाच
श्लोक 1 (5.6.1)
भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः । बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेष्वपि द्विजातयः ॥
bhūtānāṃ prāṇinaḥ śreṣṭhāḥ prāṇināṃ buddhijīvinaḥ | buddhimatsu narāḥ śreṣṭhā nareṣvapi dvijātayaḥ
"भूतों में प्राणधारी श्रेष्ठ हैं, प्राणियों में बुद्धि से जीने वाले, बुद्धिमानों में मनुष्य श्रेष्ठ हैं और मनुष्यों में भी द्विज।
श्लोक 2 (5.6.2)
द्विजेषु वैद्याः श्रेयांसो वैद्येषु कृतबुद्धयः । कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः ॥
dvijeṣu vaidyāḥ śreyāṃso vaidyeṣu kṛtabuddhayaḥ | kṛtabuddhiṣu kartāraḥ kartṛṣu brahmavādinaḥ
द्विजों में विद्वान श्रेष्ठ हैं, विद्वानों में सिद्धान्त को जानने वाले, सिद्धान्त जानने वालों में उसे आचरण में लाने वाले, और आचरण करने वालों में ब्रह्मवादी।
श्लोक 3 (5.6.3)
स भवान्कृतबुद्धीनां प्रधान इति मे मतिः । कुलेन च विशिष्टोऽसि वयसा च श्रुतेन च । प्रज्ञया सदृशश्चासि शुक्रेणाङ्गिरसेन च ॥
sa bhavānkṛtabuddhīnāṃ pradhāna iti me matiḥ | kulena ca viśiṣṭo'si vayasā ca śrutena ca | prajñayā sadṛśaścāsi śukreṇāṅgirasena ca
मेरे मत में आप सिद्धान्तज्ञों में प्रधान हैं। आप कुल, आयु और विद्या में विशिष्ट हैं, और बुद्धि में शुक्राचार्य तथा अंगिरा के पुत्र बृहस्पति के समान हैं।
श्लोक 4 (5.6.4)
विदितं चापि ते सर्वं यथावृत्तः स कौरवः । पाण्डवश्च यथावृत्तः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
viditaṃ cāpi te sarvaṃ yathāvṛttaḥ sa kauravaḥ | pāṇḍavaśca yathāvṛttaḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ
आप सब कुछ जानते हैं — उस कौरव ने कैसा आचरण किया है और कुन्तीपुत्र पाण्डव युधिष्ठिर ने कैसा।
श्लोक 5 (5.6.5)
धृतराष्ट्रस्य विदिते वञ्चिताः पाण्डवाः परैः । विदुरेणानुनीतोऽपि पुत्रमेवानुवर्तते ॥
dhṛtarāṣṭrasya vidite vañcitāḥ pāṇḍavāḥ paraiḥ | vidureṇānunīto'pi putramevānuvartate
धृतराष्ट्र की जानकारी में ही शत्रुओं ने पाण्डवों को ठगा; और विदुर के समझाने पर भी वे अपने पुत्र का ही अनुसरण करते हैं।
श्लोक 6 (5.6.6)
शकुनिर्बुद्धिपूर्वं हि कुन्तीपुत्रं समाह्वयत् । अनक्षज्ञं मताक्षः सन्क्षत्रवृत्ते स्थितं शुचिम् ॥
śakunirbuddhipūrvaṃ hi kuntīputraṃ samāhvayat | anakṣajñaṃ matākṣaḥ sankṣatravṛtte sthitaṃ śucim
जुए में निपुण शकुनि ने जान-बूझकर कुन्तीपुत्र को खेलने के लिए ललकारा, जो जुआ नहीं जानते थे और पवित्र भाव से क्षत्रिय के आचरण पर स्थित थे।
श्लोक 7 (5.6.7)
ते तथा वञ्चयित्वा तु धर्मराजं युधिष्ठिरम् । न कस्यांचिदवस्थायां राज्यं दास्यन्ति वै स्वयम् ॥
te tathā vañcayitvā tu dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | na kasyāṃcidavasthāyāṃ rājyaṃ dāsyanti vai svayam
धर्मराज युधिष्ठिर को इस प्रकार ठग लेने के बाद वे किसी भी दशा में स्वयं राज्य नहीं लौटाएँगे।
श्लोक 8 (5.6.8)
भवांस्तु धर्मसंयुक्तं धृतराष्ट्रं ब्रुवन्वचः । मनांसि तस्य योधानां ध्रुवमावर्तयिष्यति ॥
bhavāṃstu dharmasaṃyuktaṃ dhṛtarāṣṭraṃ bruvanvacaḥ | manāṃsi tasya yodhānāṃ dhruvamāvartayiṣyati
परन्तु जब आप धृतराष्ट्र से धर्मयुक्त वचन कहेंगे, तो निश्चय ही उनके योद्धाओं के मन फेर देंगे।
श्लोक 9 (5.6.9)
विदुरश्चापि तद्वाक्यं साधयिष्यति तावकम् । भीष्मद्रोणकृपादीनां भेदं संजनयिष्यति ॥
viduraścāpi tadvākyaṃ sādhayiṣyati tāvakam | bhīṣmadroṇakṛpādīnāṃ bhedaṃ saṃjanayiṣyati
विदुर भी आपकी बात का समर्थन करेंगे, और भीष्म, द्रोण, कृप आदि में फूट डाल देंगे।
श्लोक 10 (5.6.10)
अमात्येषु च भिन्नेषु योधेषु विमुखेषु च । पुनरेकत्र करणं तेषां कर्म भविष्यति ॥
amātyeṣu ca bhinneṣu yodheṣu vimukheṣu ca | punarekatra karaṇaṃ teṣāṃ karma bhaviṣyati
जब मन्त्री आपस में बँट जाएँगे और योद्धा विमुख हो जाएँगे, तब उन्हें फिर से एकजुट करना ही उनका काम रह जाएगा।
श्लोक 11 (5.6.11)
एतस्मिन्नन्तरे पार्थाः सुखमेकाग्रबुद्धयः । सेनाकर्म करिष्यन्ति द्रव्याणां चैव सञ्चयम् ॥
etasminnantare pārthāḥ sukhamekāgrabuddhayaḥ | senākarma kariṣyanti dravyāṇāṃ caiva sañcayam
इस बीच पृथा के पुत्र निश्चिन्त होकर, एकाग्र बुद्धि से सेना का संगठन करेंगे और सामग्री का संग्रह करेंगे।
श्लोक 12 (5.6.12)
भिद्यमानेषु च स्वेषु लम्बमाने तथा त्वयि । न तथा ते करिष्यन्ति सेनाकर्म न संशयः ॥
bhidyamāneṣu ca sveṣu lambamāne tathā tvayi | na tathā te kariṣyanti senākarma na saṃśayaḥ
जब उनके अपने लोग फूट रहे होंगे और आप वहाँ ठहरे रहेंगे, तब वे उतनी अच्छी तरह सेना का संगठन नहीं कर पाएँगे — इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 13 (5.6.13)
एतत्प्रयोजनं चात्र प्राधान्येनोपलभ्यते । संगत्या धृतराष्ट्रश्च कुर्याद्धर्म्यं वचस्तव ॥
etatprayojanaṃ cātra prādhānyenopalabhyate | saṃgatyā dhṛtarāṣṭraśca kuryāddharmyaṃ vacastava
यहाँ मुख्य प्रयोजन यही दिखाई देता है। और यह भी सम्भव है कि आपसे मिलकर धृतराष्ट्र आपकी धर्मसम्मत बात मान लें।
श्लोक 14 (5.6.14)
स भवान्धर्मयुक्तश्च धर्म्यं तेषु समाचरन् । कृपालुषु परिक्लेशान्पाण्डवीयान्प्रकीर्तयन् ॥
sa bhavāndharmayuktaśca dharmyaṃ teṣu samācaran | kṛpāluṣu parikleśānpāṇḍavīyānprakīrtayan
आप स्वयं धर्मात्मा हैं; उनके बीच धर्म के अनुसार आचरण करते हुए, दयालु लोगों के सामने पाण्डवों के कष्टों का वर्णन करते हुए,
श्लोक 15 (5.6.15)
वृद्धेषु कुलधर्मं च ब्रुवन्पूर्वैरनुष्ठितम् । विभेत्स्यति मनांस्येषामिति मे नात्र संशयः ॥
vṛddheṣu kuladharmaṃ ca bruvanpūrvairanuṣṭhitam | vibhetsyati manāṃsyeṣāmiti me nātra saṃśayaḥ
और वृद्धों के सामने पूर्वजों द्वारा पालित कुलधर्म की बात कहते हुए आप उनके मन में भेद डाल देंगे — इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 16 (5.6.16)
न च तेभ्यो भयं तेऽस्ति ब्राह्मणो ह्यसि वेदवित् । दूतकर्मणि युक्तश्च स्थविरश्च विशेषतः ॥
na ca tebhyo bhayaṃ te'sti brāhmaṇo hyasi vedavit | dūtakarmaṇi yuktaśca sthaviraśca viśeṣataḥ
आपको उनसे कोई भय भी नहीं है, क्योंकि आप वेदज्ञ ब्राह्मण हैं, दूत के कार्य में नियुक्त हैं और विशेषकर वयोवृद्ध हैं।
श्लोक 17 (5.6.17)
स भवान्पुष्ययोगेन मुहूर्तेन जयेन च । कौरवेयान्प्रयात्वाशु कौन्तेयस्यार्थसिद्धये ॥
sa bhavānpuṣyayogena muhūrtena jayena ca | kauraveyānprayātvāśu kaunteyasyārthasiddhaye
इसलिए आप पुष्य नक्षत्र के योग में और 'जय' नामक मुहूर्त में कुन्तीपुत्र का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए शीघ्र कौरवों के पास जाइए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (5.6.18)
तथाऽनुशिष्टः प्रययौ द्रुपदेन महात्मना । पुरोधा वृत्तसंपन्नो नगरं नागसाह्वयम् ॥
tathā'nuśiṣṭaḥ prayayau drupadena mahātmanā | purodhā vṛttasaṃpanno nagaraṃ nāgasāhvayam
महात्मा द्रुपद से इस प्रकार निर्देश पाकर सदाचार से सम्पन्न वे पुरोहित हाथी के नाम वाले नगर हस्तिनापुर की ओर चल पड़े।
श्लोक 19 (5.6.19)
शिष्यैः परिवृतो विद्वान्नीतिशास्त्रार्थकोविदः । पाण्डवानां हितार्थाय कौरवान्प्रतिजग्मिवान् ॥
śiṣyaiḥ parivṛto vidvānnītiśāstrārthakovidaḥ | pāṇḍavānāṃ hitārthāya kauravānpratijagmivān
शिष्यों से घिरे, नीतिशास्त्र के अर्थ में निपुण वे विद्वान पाण्डवों के हित के लिए कौरवों के पास गए।