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उद्योग पर्व · अध्याय 7

अर्जुन ने कृष्ण को और दुर्योधन ने उनकी सेना को चुना

राजाओं के पास दूत भेजे जाने के बीच अर्जुन और दुर्योधन एक ही दिन द्वारका पहुँचते हैं और कृष्ण को सोते हुए पाते हैं; दुर्योधन उनके सिरहाने बैठता है और अर्जुन पैरों की ओर खड़े रहते हैं। कृष्ण एक ओर नारायण नामक ग्वालों की अपनी सेना और दूसरी ओर शस्त्र त्यागकर युद्ध न करने वाले स्वयं को रखते हैं और पहले चुनने का अवसर अर्जुन को देते हैं; अर्जुन कृष्ण को चुनते हैं और दुर्योधन प्रसन्न होकर सेना ले लेता है। बलराम किसी पक्ष में न रहने की घोषणा करते हैं, कृतवर्मा दुर्योधन को एक अक्षौहिणी सेना देते हैं, और कृष्ण अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार करते हैं।

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.7.1)

पुरोहितं ते प्रस्थाप्य नगरं नागसाह्वयम् । दूतान्प्रस्थापयामासुः पार्थिवेभ्यस्ततस्ततः ॥

purohitaṃ te prasthāpya nagaraṃ nāgasāhvayam | dūtānprasthāpayāmāsuḥ pārthivebhyastatastataḥ

पुरोहित को हस्तिनापुर भेजकर उन्होंने जगह-जगह के राजाओं के पास दूत भेजे।

श्लोक 2 (5.7.2)

प्रस्थाप्य दूतानन्यत्र द्वारकां पुरुषर्षभः । स्वयं जगाम कौरव्यः कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः ॥

prasthāpya dūtānanyatra dvārakāṃ puruṣarṣabhaḥ | svayaṃ jagāma kauravyaḥ kuntīputro dhanañjayaḥ

दूतों को अन्य स्थानों पर भेजकर कुरुवंशी पुरुषश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र धनञ्जय स्वयं द्वारका गए।

श्लोक 3 (5.7.3)

गते द्वारवतीं कृष्णे बलदेवे च माधवे । सह वृष्ण्यन्धकैः सर्वैर्भोजैश्च शतशस्तदा ॥

gate dvāravatīṃ kṛṣṇe baladeve ca mādhave | saha vṛṣṇyandhakaiḥ sarvairbhojaiśca śataśastadā

कृष्ण और बलदेव, दोनों माधव, समस्त वृष्णियों, अन्धकों और सैकड़ों भोजों के साथ द्वारका जा चुके थे।

श्लोक 4 (5.7.4)

सर्वमागमयामास पाण्डवानां विचेष्टितम् । धृतराष्ट्रात्मजो राजा गूढैः प्रणिहितैश्चरैः ॥

sarvamāgamayāmāsa pāṇḍavānāṃ viceṣṭitam | dhṛtarāṣṭrātmajo rājā gūḍhaiḥ praṇihitaiścaraiḥ

धृतराष्ट्र के पुत्र राजा दुर्योधन ने गुप्त रूप से नियुक्त किए गुप्तचरों द्वारा पाण्डवों की सारी गतिविधियों का पता लगा लिया।

श्लोक 5 (5.7.5)

स श्रुत्वा माधवं यान्तं सदश्वैरनिलोपमैः । बलेन नातिमहता द्वारकामभ्ययात्पुरीम् ॥

sa śrutvā mādhavaṃ yāntaṃ sadaśvairanilopamaiḥ | balena nātimahatā dvārakāmabhyayātpurīm

माधव के वहाँ जाने का समाचार सुनकर वह वायु के समान वेगवान उत्तम घोड़ों और छोटी-सी सेना के साथ द्वारकापुरी जा पहुँचा।

श्लोक 6 (5.7.6)

तमेव दिवसं चापि कौन्तेयः पाण्डुनन्दनः । आनर्तनगरीं रम्यां जगामाशु धनञ्जयः ॥

tameva divasaṃ cāpi kaunteyaḥ pāṇḍunandanaḥ | ānartanagarīṃ ramyāṃ jagāmāśu dhanañjayaḥ

उसी दिन कुन्तीपुत्र पाण्डुनन्दन धनञ्जय भी शीघ्रता से आनर्त देश की रमणीय नगरी में जा पहुँचे।

श्लोक 7 (5.7.7)

तौ यात्वा पुरुषव्याघ्रौ द्वारकां कुरुनन्दनौ । सुप्तं ददृशतुः कृष्णं शयानं चाभिजग्मतुः ॥

tau yātvā puruṣavyāghrau dvārakāṃ kurunandanau | suptaṃ dadṛśatuḥ kṛṣṇaṃ śayānaṃ cābhijagmatuḥ

द्वारका पहुँचकर उन दोनों पुरुषसिंह कुरुनन्दनों ने कृष्ण को सोते हुए पाया और लेटे हुए कृष्ण के पास गए।

श्लोक 8 (5.7.8)

दुर्योधनस्तु प्रथमं वासुदेवमुपाश्रयत् । उच्छीर्षतश्च कृष्णस्य निषसाद वरासने ॥

duryodhanastu prathamaṃ vāsudevamupāśrayat | ucchīrṣataśca kṛṣṇasya niṣasāda varāsane

दुर्योधन पहले वासुदेव के पास पहुँचा और कृष्ण के सिरहाने एक श्रेष्ठ आसन पर बैठ गया।

श्लोक 9 (5.7.9)

ततः किरीटी तस्यानु प्रविवेश महामनाः । पश्चार्धे तु स कृष्णस्य प्रह्वोऽतिष्ठत्कृताञ्जलिः ॥

tataḥ kirīṭī tasyānu praviveśa mahāmanāḥ | paścārdhe tu sa kṛṣṇasya prahvo'tiṣṭhatkṛtāñjaliḥ

उसके बाद महामना किरीटी (अर्जुन) भीतर आए और विनम्र भाव से हाथ जोड़कर कृष्ण के पैरों की ओर खड़े हो गए।

श्लोक 10 (5.7.10)

प्रतिबुद्धः स वार्ष्णेयो ददर्शाग्रे किरीटिनम् । सिंहासनगतं पश्चात्परिवृत्य च दृष्टवान् ॥

pratibuddhaḥ sa vārṣṇeyo dadarśāgre kirīṭinam | siṃhāsanagataṃ paścātparivṛtya ca dṛṣṭavān

जागने पर वार्ष्णेय (कृष्ण) ने पहले सामने खड़े किरीटी को देखा; फिर मुड़कर सिंहासन पर बैठे (दुर्योधन) को देखा।

श्लोक 11 (5.7.11)

स तयोः स्वागतं कृत्वा यथावत्प्रतिपूज्य तौ । तदागमनजं हेतुं पप्रच्छ मधुसूदनः ॥

sa tayoḥ svāgataṃ kṛtvā yathāvatpratipūjya tau | tadāgamanajaṃ hetuṃ papraccha madhusūdanaḥ

मधुसूदन ने दोनों का स्वागत किया, उनका यथोचित सत्कार किया और उनके आने का कारण पूछा।

श्लोक 12 (5.7.12)

ततो दुर्योधनः कृष्णमुवाच प्रहसन्निव । विग्रहेऽस्मिन्भवान्साह्यं मम दातुमिहार्हति ॥

tato duryodhanaḥ kṛṣṇamuvāca prahasanniva | vigrahe'sminbhavānsāhyaṃ mama dātumihārhati

तब दुर्योधन ने मानो हँसते हुए कृष्ण से कहा — "इस युद्ध में आपको मेरी सहायता करनी चाहिए।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 13 (5.7.13)

समं हि भवतः सख्यं मम चैवार्जुनेऽपि च । तथा संबन्धकं तुल्यमस्माकं त्वयि माधव ॥

samaṃ hi bhavataḥ sakhyaṃ mama caivārjune'pi ca | tathā saṃbandhakaṃ tulyamasmākaṃ tvayi mādhava

हे माधव, मुझसे और अर्जुन से आपकी मित्रता समान है, और आपके साथ हमारा संबंध भी एक जैसा है।

श्लोक 14 (5.7.14)

अहं चाभिगतः पूर्वं त्वामद्य मधुसूदन । पूर्वं चाभिगतं सन्तो भजन्ते पूर्वसारिणः ॥

ahaṃ cābhigataḥ pūrvaṃ tvāmadya madhusūdana | pūrvaṃ cābhigataṃ santo bhajante pūrvasāriṇaḥ

हे मधुसूदन, आज आपके पास मैं पहले आया हूँ, और सज्जन पुरानी परम्परा का पालन करते हुए पहले आए हुए का ही साथ देते हैं।

श्लोक 15 (5.7.15)

त्वं च श्रेष्ठतमो लोके सतामद्य जनार्दन । सततं संमतश्चैव सद्वृत्तमनुपालय ॥

tvaṃ ca śreṣṭhatamo loke satāmadya janārdana | satataṃ saṃmataścaiva sadvṛttamanupālaya

हे जनार्दन, आज संसार में सज्जनों में आप सर्वश्रेष्ठ हैं और सदा सम्मानित रहे हैं; अतः सज्जनों के आचरण का पालन कीजिए।"

कृष्ण उवाच

श्लोक 16 (5.7.16)

भवानभिगतः पूर्वमत्र मे नास्ति संशयः । दृष्टस्तु प्रथमं राजन्मया पार्थो धनञ्जयः ॥

bhavānabhigataḥ pūrvamatra me nāsti saṃśayaḥ | dṛṣṭastu prathamaṃ rājanmayā pārtho dhanañjayaḥ

आप पहले आए हैं, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं; किंतु हे राजन्, मैंने पहले पार्थ धनञ्जय को देखा।

श्लोक 17 (5.7.17)

तव पूर्वाभिगमनात्पूर्वं चाप्यस्य दर्शनात् । साहाय्यमुभयोरेव करिष्यामि सुयोधन ॥

tava pūrvābhigamanātpūrvaṃ cāpyasya darśanāt | sāhāyyamubhayoreva kariṣyāmi suyodhana

हे सुयोधन, आपके पहले आने के कारण और उनके पहले दिखाई देने के कारण मैं आप दोनों की ही सहायता करूँगा।

श्लोक 18 (5.7.18)

प्रवारणं तु बालानां पूर्वं कार्यमिति श्रुतिः । तस्मात्प्रवारणं पूर्वमर्हः पार्थो धनञ्जयः ॥

pravāraṇaṃ tu bālānāṃ pūrvaṃ kāryamiti śrutiḥ | tasmātpravāraṇaṃ pūrvamarhaḥ pārtho dhanañjayaḥ

परम्परा कहती है कि चुनने का अवसर पहले छोटों को देना चाहिए; इसलिए पहले चुनने का अधिकार पार्थ धनञ्जय का है।

श्लोक 19 (5.7.19)

मत्संहननतुल्यानां गोपानामर्बुदं महत् । नारायणा इति ख्याताः सर्वे संग्रामयोधिनः ॥

matsaṃhananatulyānāṃ gopānāmarbudaṃ mahat | nārāyaṇā iti khyātāḥ sarve saṃgrāmayodhinaḥ

मेरे ही समान बलिष्ठ शरीर वाले ग्वालों की एक अर्बुद संख्या वाली विशाल सेना है। वे नारायण नाम से प्रसिद्ध हैं और सभी युद्ध में लड़ने वाले योद्धा हैं।

श्लोक 20 (5.7.20)

ते वा युधि दुराधर्षा भवन्त्वेकस्य सैनिकाः । अयुध्यमानः संग्रामे न्यस्तशस्त्रोऽहमेकतः ॥

te vā yudhi durādharṣā bhavantvekasya sainikāḥ | ayudhyamānaḥ saṃgrāme nyastaśastro'hamekataḥ

युद्ध में दुर्जय वे सैनिक आप दोनों में से एक के हों; और दूसरी ओर अकेला मैं रहूँगा, युद्ध में न लड़ने वाला और शस्त्र त्यागे हुए।

श्लोक 21 (5.7.21)

आभ्यामन्यतरं पार्थ यत्ते हृद्यतरं मतम् । तद्वृणीतां भवानग्रे प्रवार्यस्त्वं हि धर्मतः ॥

ābhyāmanyataraṃ pārtha yatte hṛdyataraṃ matam | tadvṛṇītāṃ bhavānagre pravāryastvaṃ hi dharmataḥ

हे पार्थ, इन दोनों में से जो तुम्हें अधिक प्रिय लगे, उसे पहले तुम चुन लो, क्योंकि धर्म के अनुसार पहले चुनने का अधिकार तुम्हारा है।

श्लोक 22 (5.7.22)

एतद्विदित्वा कौन्तेय विचार्य च पुनः पुनः । तान्वा वरय साहाय्ये मां साचिव्येऽथवा पुनः ॥

etadviditvā kaunteya vicārya ca punaḥ punaḥ | tānvā varaya sāhāyye māṃ sācivye'thavā punaḥ

हे कुन्तीपुत्र, यह जानकर और बार-बार विचार करके या तो सहायता के लिए उन्हें चुन लो, या फिर मंत्रणा के लिए मुझे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (5.7.23)

एवमुक्तस्तु कृष्णेन कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । अयुध्यमानं संग्रामे वरयामास केशवम् ॥

evamuktastu kṛṣṇena kuntīputro dhanañjayaḥ | ayudhyamānaṃ saṃgrāme varayāmāsa keśavam

कृष्ण के ऐसा कहने पर कुन्तीपुत्र धनञ्जय ने युद्ध में न लड़ने वाले केशव को चुना —

श्लोक 24 (5.7.24)

नारायणममित्रघ्नं कामाज्जातमजं नृषु । सर्वक्षत्रस्य पुरतो देवदानवयोरपि ॥

nārāyaṇamamitraghnaṃ kāmājjātamajaṃ nṛṣu | sarvakṣatrasya purato devadānavayorapi

उन नारायण को, जो शत्रुओं का नाश करने वाले हैं और अजन्मा होकर भी अपनी इच्छा से मनुष्यों में जन्मे हैं — समस्त क्षत्रियों के सामने, और देवताओं तथा दानवों के सामने भी।

श्लोक 25 (5.7.25)

दुर्योधनस्तु तत्सैन्यं सर्वमावरयत्तदा । सहस्राणां सहस्रं तु योधानां प्राप्य भारत ॥

duryodhanastu tatsainyaṃ sarvamāvarayattadā | sahasrāṇāṃ sahasraṃ tu yodhānāṃ prāpya bhārata

हे भारत, तब दुर्योधन ने वह सारी सेना चुन ली; और हज़ारों-हज़ार योद्धाओं को पाकर

श्लोक 26 (5.7.26)

कृष्णं चापहृतं ज्ञात्वा संप्राप परमां मुदम् । दुर्योधनस्तु तत्सैन्यं सर्वमादाय पार्थिवः ॥

kṛṣṇaṃ cāpahṛtaṃ jñātvā saṃprāpa paramāṃ mudam | duryodhanastu tatsainyaṃ sarvamādāya pārthivaḥ

और यह समझकर कि कृष्ण अपनी सेना से अलग हो गए हैं, वह अत्यंत प्रसन्न हुआ। फिर राजा दुर्योधन वह सारी सेना लेकर

श्लोक 27 (5.7.27)

ततोऽभ्ययाद्भीमबलो रौहिणेयं महाबलम् । सर्वं चागमने हेतुं स तस्मै संन्यवेदयत् । प्रत्युवाच ततः शौरिर्धार्तराष्ट्रमिदं वचः ॥

tato'bhyayādbhīmabalo rauhiṇeyaṃ mahābalam | sarvaṃ cāgamane hetuṃ sa tasmai saṃnyavedayat | pratyuvāca tataḥ śaurirdhārtarāṣṭramidaṃ vacaḥ

भयंकर बलशाली वह महाबली रोहिणीनन्दन (बलराम) के पास गया और उन्हें अपने आने का सारा कारण बताया। तब शौरि (बलराम) ने धृतराष्ट्रपुत्र को यह उत्तर दिया —

बलदेव उवाच

श्लोक 28 (5.7.28)

विदितं ते नरव्याघ्र सर्वं भवितुमर्हति । यन्मयोक्तं विराटस्य पुरा वैवाहिके तदा ॥

viditaṃ te naravyāghra sarvaṃ bhavitumarhati | yanmayoktaṃ virāṭasya purā vaivāhike tadā

हे पुरुषसिंह, तुम्हें सब कुछ ज्ञात ही होगा — जो मैंने पहले विराट के यहाँ विवाह के समय कहा था।

श्लोक 29 (5.7.29)

निगृह्योक्तो हृषीकेशस्त्वदर्थं कुरुनन्दन । मया संबन्धकं तुल्यमिति राजन्पुनःपुनः ॥

nigṛhyokto hṛṣīkeśastvadarthaṃ kurunandana | mayā saṃbandhakaṃ tulyamiti rājanpunaḥpunaḥ

हे कुरुनन्दन, तुम्हारे लिए मैंने हृषीकेश को रोककर बार-बार कहा था, हे राजन्, कि दोनों पक्षों से हमारा संबंध समान है।

श्लोक 30 (5.7.30)

न च तद्वाक्यमुक्तं वै केशवं प्रत्यपद्यत । न चाहमुत्सहे कृष्णं विना स्थातुमपि क्षणम् ॥

na ca tadvākyamuktaṃ vai keśavaṃ pratyapadyata | na cāhamutsahe kṛṣṇaṃ vinā sthātumapi kṣaṇam

किंतु मेरी वह बात केशव को स्वीकार नहीं हुई; और मैं कृष्ण के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता।

श्लोक 31 (5.7.31)

नाहं सहायः पार्थस्य नापि दुर्योधनस्य वै । इति मे निश्चिता बुद्धिर्वासुदेवमवेक्ष्य ह ॥

nāhaṃ sahāyaḥ pārthasya nāpi duryodhanasya vai | iti me niścitā buddhirvāsudevamavekṣya ha

वासुदेव की ओर देखकर मैंने निश्चय कर लिया है कि मैं न पार्थ का सहायक बनूँगा, न दुर्योधन का।

श्लोक 32 (5.7.32)

जातोऽसि भारते वंशे सर्वपार्थिवपूजिते । गच्छ युध्यस्व धर्मेण क्षात्रेण पुरुषर्षभ ॥

jāto'si bhārate vaṃśe sarvapārthivapūjite | gaccha yudhyasva dharmeṇa kṣātreṇa puruṣarṣabha

तुम समस्त राजाओं द्वारा पूजित भरतवंश में उत्पन्न हुए हो। हे पुरुषश्रेष्ठ, जाओ और क्षत्रिय-धर्म के अनुसार युद्ध करो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 33 (5.7.33)

इत्येवमुक्तस्तु तदा परिष्वज्य हलायुधम् । कृष्णं चापि महाबाहुमामन्त्र्य भरतर्षभ ॥

ityevamuktastu tadā pariṣvajya halāyudham | kṛṣṇaṃ cāpi mahābāhumāmantrya bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, ऐसा कहे जाने पर उसने हलायुध (बलराम) को गले लगाया और महाबाहु कृष्ण से भी विदा ली;

श्लोक 34 (5.7.34)

सोऽभ्ययात्कृतवर्माणं धृतराष्ट्रसुतो नृपः । कृतवर्मा ददौ तस्य सेनामक्षौहिणीं तदा ॥

so'bhyayātkṛtavarmāṇaṃ dhṛtarāṣṭrasuto nṛpaḥ | kṛtavarmā dadau tasya senāmakṣauhiṇīṃ tadā

फिर धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन कृतवर्मा के पास गया, और कृतवर्मा ने उसे एक अक्षौहिणी सेना दी।

श्लोक 35 (5.7.35)

स तेन सर्वसैन्येन भीमेन कुरुनन्दनः । वृतः परिययौ हृष्टः सुहृदः संप्रहर्षयन् ॥

sa tena sarvasainyena bhīmena kurunandanaḥ | vṛtaḥ pariyayau hṛṣṭaḥ suhṛdaḥ saṃpraharṣayan

उस सारी भयंकर सेना से घिरा हुआ वह कुरुनन्दन हर्षित होकर अपने मित्रों को आनंदित करता हुआ चला गया।

श्लोक 36 (5.7.36)

ततः पीताम्बरधरो जगत्स्रष्टा जनार्दनः । गते दुर्योधने कृष्णः किरीटिनमथाब्रवीत् ॥

tataḥ pītāmbaradharo jagatsraṣṭā janārdanaḥ | gate duryodhane kṛṣṇaḥ kirīṭinamathābravīt

दुर्योधन के चले जाने पर पीताम्बरधारी, जगत् के स्रष्टा जनार्दन कृष्ण ने किरीटी से कहा —

कृष्ण उवाच

श्लोक 37 (5.7.37)

अयुध्यमानः कां बुद्धिमास्थायाहं वृतस्त्वया ॥

ayudhyamānaḥ kāṃ buddhimāsthāyāhaṃ vṛtastvayā

"मैं तो युद्ध नहीं करूँगा। फिर किस विचार से तुमने मुझे चुना है?"

अर्जुन उवाच

श्लोक 38 (5.7.38)

भवान्समर्थस्तान्सर्वान्निहन्तुं नात्र संशयः । निहन्तुमहमप्येकः समर्थः पुरुषर्षभः ॥

bhavānsamarthastānsarvānnihantuṃ nātra saṃśayaḥ | nihantumahamapyekaḥ samarthaḥ puruṣarṣabhaḥ

आप उन सबको मारने में समर्थ हैं, इसमें कोई संदेह नहीं; और पुरुषश्रेष्ठ मैं भी अकेला ही उन्हें मारने में समर्थ हूँ।

श्लोक 39 (5.7.39)

भवांस्तु कीर्तिमाँल्लोके तद्यशस्त्वां गमिष्यति । यशसां चाहमप्यर्थी तस्मादसि मया वृतः ॥

bhavāṃstu kīrtimām̐lloke tadyaśastvāṃ gamiṣyati | yaśasāṃ cāhamapyarthī tasmādasi mayā vṛtaḥ

आप तो संसार में कीर्तिमान हैं, वह यश आपको ही प्राप्त होगा; मैं भी यश का इच्छुक हूँ, इसीलिए मैंने आपको चुना है।

श्लोक 40 (5.7.40)

सारथ्यं तु त्वया कार्यमिति मे मानसं सदा । चिररात्रेप्सितं कामं तद्भवान्कर्तुमर्हति ॥

sārathyaṃ tu tvayā kāryamiti me mānasaṃ sadā | cirarātrepsitaṃ kāmaṃ tadbhavānkartumarhati

मेरे मन में सदा यह भाव रहा है कि आप मेरे सारथी बनें। मेरी इस चिरकाल की अभिलाषा को आप पूरा करें।

वासुदेव उवाच

श्लोक 41 (5.7.41)

उपपन्नमिदं पार्थ यत्स्पर्धसि मया सह । सारथ्यं ते करिष्यामि कामः संपद्यतां तव ॥

upapannamidaṃ pārtha yatspardhasi mayā saha | sārathyaṃ te kariṣyāmi kāmaḥ saṃpadyatāṃ tava

हे पार्थ, यह तुम्हारे योग्य ही है कि तुम मुझसे होड़ करते हो। मैं तुम्हारा सारथ्य करूँगा; तुम्हारी कामना पूरी हो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 42 (5.7.42)

एवं प्रमुदितः पार्थः कृष्णेन सहितस्तदा । वृतो दाशार्हप्रवरैः पुनरायाद्युधिष्ठिरम् ॥

evaṃ pramuditaḥ pārthaḥ kṛṣṇena sahitastadā | vṛto dāśārhapravaraiḥ punarāyādyudhiṣṭhiram

इस प्रकार प्रसन्न होकर पार्थ कृष्ण के साथ और श्रेष्ठ दाशार्हों से घिरे हुए फिर युधिष्ठिर के पास लौट आए।

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