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उद्योग पर्व · अध्याय 8

दुर्योधन द्वारा शल्य को अपने पक्ष में करना

मद्रराज शल्य विशाल सेना लेकर पाण्डवों से मिलने चलते हैं। मार्ग में दुर्योधन उनके सत्कार के लिए भव्य सभा-भवन बनवाता है; उन्हें युधिष्ठिर का किया हुआ समझकर प्रसन्न शल्य पुरस्कार देना चाहते हैं, तभी छिपा हुआ दुर्योधन सामने आकर वर माँगता है कि शल्य उसकी सेना के नायक बनें। अपने वचन से बँधे शल्य उपप्लव्य जाकर पाण्डवों से मिलते हैं और युधिष्ठिर को सारी बात बताते हैं। युधिष्ठिर उनसे अनुरोध करते हैं कि अर्जुन के विरुद्ध कर्ण का सारथ्य करते समय वे कर्ण का तेज नष्ट करें; शल्य यह स्वीकार करते हैं और उन्हें सांत्वना देते हैं कि इन्द्र ने भी अपनी पत्नी के साथ महान् दुःख भोगा था।

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.8.1)

शल्यः श्रुत्वा तु दूतानां सैन्येन महता वृतः । अभ्ययात्पाण्डवान्राजन्सह पुत्रैर्महारथैः ॥

śalyaḥ śrutvā tu dūtānāṃ sainyena mahatā vṛtaḥ | abhyayātpāṇḍavānrājansaha putrairmahārathaiḥ

हे राजन्, दूतों का संदेश सुनकर शल्य विशाल सेना से घिरे हुए अपने महारथी पुत्रों के साथ पाण्डवों के पास चल पड़े।

श्लोक 2 (5.8.2)

तस्य सेनानिवेशोऽभूदध्यर्धमिव योजनम् । तथा हि विपुलां सेनां बिभर्ति स नरर्षभः ॥

tasya senāniveśo'bhūdadhyardhamiva yojanam | tathā hi vipulāṃ senāṃ bibharti sa nararṣabhaḥ

उनकी सेना का पड़ाव लगभग डेढ़ योजन तक फैला था; इतनी विशाल सेना वे नरश्रेष्ठ रखते थे।

श्लोक 3 (5.8.3)

अक्षौहिणीपती राजन्महावीर्यपराक्रमाः । विचित्रकवचाः शूरा विचित्रध्वजकार्मुकाः ॥

akṣauhiṇīpatī rājanmahāvīryaparākramāḥ | vicitrakavacāḥ śūrā vicitradhvajakārmukāḥ

हे राजन्, उसमें अक्षौहिणियों के स्वामी, महान् बल और पराक्रम वाले वीर थे — रंग-बिरंगे कवच और रंग-बिरंगी ध्वजाएँ तथा धनुष धारण करने वाले शूरवीर,

श्लोक 4 (5.8.4)

विचित्राभरणाः सर्वे विचित्ररथवाहनाः । विचित्रस्रग्धराः सर्वे विचित्राम्बरभूषणाः ॥

vicitrābharaṇāḥ sarve vicitrarathavāhanāḥ | vicitrasragdharāḥ sarve vicitrāmbarabhūṣaṇāḥ

सभी रंग-बिरंगे आभूषणों और रंग-बिरंगे रथों तथा वाहनों वाले, सभी रंग-बिरंगी मालाएँ पहने और रंग-बिरंगे वस्त्रों से सजे हुए।

श्लोक 5 (5.8.5)

स्वदेशवेषाभरणा वीराः शतसहस्रशः । तस्य सेनाप्रणेतारो बभूवुः क्षत्रियर्षभाः ॥

svadeśaveṣābharaṇā vīrāḥ śatasahasraśaḥ | tasya senāpraṇetāro babhūvuḥ kṣatriyarṣabhāḥ

अपने-अपने देश के वेश और आभूषण धारण किए लाखों वीर, श्रेष्ठ क्षत्रिय, उनकी सेना के नायक थे।

श्लोक 6 (5.8.6)

व्यथयन्निव भूतानि कम्पयन्निव मेदिनीम् । शनैर्विश्रामयन्सेनां स ययौ यत्र पाण्डवः ॥

vyathayanniva bhūtāni kampayanniva medinīm | śanairviśrāmayansenāṃ sa yayau yatra pāṇḍavaḥ

मानो प्राणियों को व्यथित करते और पृथ्वी को कँपाते हुए, अपनी सेना को धीरे-धीरे विश्राम देते हुए वे वहाँ चले जहाँ पाण्डव थे।

श्लोक 7 (5.8.7)

ततो दुर्योधनः श्रुत्वा महात्मानं महारथम् । उपायान्तमभिद्रुत्य स्वयमानर्च भारत ॥

tato duryodhanaḥ śrutvā mahātmānaṃ mahāratham | upāyāntamabhidrutya svayamānarca bhārata

हे भारत, तब दुर्योधन ने उस महात्मा महारथी के आने का समाचार सुनकर स्वयं आगे बढ़कर उनका सत्कार किया।

श्लोक 8 (5.8.8)

कारयामास पूजार्थं तस्य दुर्योधनः सभाः । रमणीयेषु देशेषु रत्नचित्राः स्वलङ्कृताः ॥

kārayāmāsa pūjārthaṃ tasya duryodhanaḥ sabhāḥ | ramaṇīyeṣu deśeṣu ratnacitrāḥ svalaṅkṛtāḥ

दुर्योधन ने उनके सम्मान के लिए रमणीय स्थानों पर रत्नों से जड़े, सुंदर ढंग से सजे सभा-भवन बनवाए।

श्लोक 9 (5.8.9)

शिल्पिभिर्विविधैश्चैव क्रीडास्तत्र प्रयोजिताः । तत्र माल्यानि मांसानि भक्ष्यं पेयं च सत्कृतम् ॥

śilpibhirvividhaiścaiva krīḍāstatra prayojitāḥ | tatra mālyāni māṃsāni bhakṣyaṃ peyaṃ ca satkṛtam

वहाँ भाँति-भाँति के शिल्पियों ने मनोरंजन की व्यवस्था की थी; वहाँ मालाएँ, मांस और खाने-पीने की वस्तुएँ सम्मानपूर्वक सजाई गई थीं।

श्लोक 10 (5.8.10)

कूपाश्च विविधाकारा मनोहर्षविवर्धनाः । वाप्यश्च विविधाकारा औदकानि गृहाणि च ॥

kūpāśca vividhākārā manoharṣavivardhanāḥ | vāpyaśca vividhākārā audakāni gṛhāṇi ca

वहाँ मन का आनंद बढ़ाने वाले अनेक आकारों के कुएँ थे, अनेक आकारों की बावड़ियाँ थीं और जल-भवन भी थे।

श्लोक 11 (5.8.11)

स ताः सभाः समासाद्य पूज्यमानो यथाऽमरः । दुर्योधनस्य सचिवैर्देशे देशे समन्ततः ॥

sa tāḥ sabhāḥ samāsādya pūjyamāno yathā'maraḥ | duryodhanasya sacivairdeśe deśe samantataḥ

उन सभा-भवनों में पहुँचकर, चारों ओर जगह-जगह दुर्योधन के मंत्रियों द्वारा देवता के समान पूजित होते हुए,

श्लोक 12 (5.8.12)

आजगाम सभामन्यां देवावसथवर्चसम् । स तत्र विषयैर्युक्तैः कल्याणैरतिमानुषैः ॥

ājagāma sabhāmanyāṃ devāvasathavarcasam | sa tatra viṣayairyuktaiḥ kalyāṇairatimānuṣaiḥ

वे एक अन्य सभा-भवन में पहुँचे, जो देवताओं के निवास के समान दीप्तिमान था। वहाँ उत्तम और अलौकिक भोग-सामग्रियों से संपन्न होकर

श्लोक 13 (5.8.13)

मेनेऽभ्यधिकमात्मानमवमेने पुरन्दरम् । पप्रच्छ स ततः प्रेष्यान्प्रहृष्टः क्षत्रियर्षभः ॥

mene'bhyadhikamātmānamavamene purandaram | papraccha sa tataḥ preṣyānprahṛṣṭaḥ kṣatriyarṣabhaḥ

उन्होंने स्वयं को पुरन्दर (इन्द्र) से भी बढ़कर माना और इन्द्र को तुच्छ समझा। तब उस क्षत्रियश्रेष्ठ ने प्रसन्न होकर सेवकों से पूछा —

शल्य उवाच

श्लोक 14 (5.8.14)

युधिष्ठिरस्य पुरुषाः केऽत्र चक्रुः सभा इमाः । आनीयन्तां सभाकाराः प्रदेयार्हा हि मे मताः ॥

yudhiṣṭhirasya puruṣāḥ ke'tra cakruḥ sabhā imāḥ | ānīyantāṃ sabhākārāḥ pradeyārhā hi me matāḥ

"युधिष्ठिर के किन लोगों ने यहाँ ये सभा-भवन बनाए हैं? सभा बनाने वालों को यहाँ लाया जाए, क्योंकि मैं उन्हें पुरस्कार के योग्य मानता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (5.8.15)

प्रदेयमेषां दास्यामि कुन्तीपुत्रोऽनुमन्यताम् । ततः प्रहृष्टं राजानं ज्ञात्वा ते सचिवास्तदा । दुर्योधनाय तत्सर्वं कथयन्ति स्म विस्मिताः ॥

pradeyameṣāṃ dāsyāmi kuntīputro'numanyatām | tataḥ prahṛṣṭaṃ rājānaṃ jñātvā te sacivāstadā | duryodhanāya tatsarvaṃ kathayanti sma vismitāḥ

मैं इन्हें पुरस्कार दूँगा; कुन्तीपुत्र इसकी अनुमति दें।" तब राजा को अत्यंत प्रसन्न जानकर उन मंत्रियों ने विस्मित होकर यह सब दुर्योधन को बता दिया।

श्लोक 16 (5.8.16)

संप्रहृष्टो यदा शल्यो दिदित्सुरपि जीवितम् । गूढो दुर्योधनस्तत्र दर्शयामास मातुलम् ॥

saṃprahṛṣṭo yadā śalyo diditsurapi jīvitam | gūḍho duryodhanastatra darśayāmāsa mātulam

जब शल्य इतने प्रसन्न हो गए कि अपने प्राण तक देने को तैयार थे, तब वहाँ छिपे हुए दुर्योधन ने स्वयं को मामा के सामने प्रकट किया।

श्लोक 17 (5.8.17)

तं दृष्ट्वा मद्रराजश्च ज्ञात्वा यत्नं च तस्य तम् । परिष्वज्याब्रवीत्प्रीत इष्टोऽर्थो ध्रियतामिति ॥

taṃ dṛṣṭvā madrarājaśca jñātvā yatnaṃ ca tasya tam | pariṣvajyābravītprīta iṣṭo'rtho dhriyatāmiti

उसे देखकर और उसके इस प्रयत्न को समझकर मद्रराज ने प्रसन्न होकर उसे गले लगाया और कहा — "जो चाहो, वह माँग लो।"

दुर्योधन उवाच

श्लोक 18 (5.8.18)

सत्यवाग्भव कल्याण वरो वै मम दीयताम् । सर्वसेनाप्रणेता वै भवान्भवितुमर्हति ॥

satyavāgbhava kalyāṇa varo vai mama dīyatām | sarvasenāpraṇetā vai bhavānbhavitumarhati

हे कल्याणमय, अपने वचन के सच्चे बनिए और मुझे वर दीजिए — आप मेरी समस्त सेना के नायक बनें।

श्लोक 19 (5.8.19)

यथैव पाण्डवास्तुभ्यं तथैव भवतो ह्यहम् । अनुमान्यं च पाल्यं च भक्तं च भज मां विभो ॥

yathaiva pāṇḍavāstubhyaṃ tathaiva bhavato hyaham | anumānyaṃ ca pālyaṃ ca bhaktaṃ ca bhaja māṃ vibho

जैसे पाण्डव आपके हैं, वैसे ही मैं भी आपका हूँ। हे प्रभो, मैं आदर और रक्षा के योग्य हूँ और आपका भक्त हूँ; मुझे अपनाइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 20 (5.8.20)

कृतमित्यब्रवीच्छल्यः किमन्यत्क्रियतामिति । कृतमित्येव गान्धारिः प्रत्युवाच पुनःपुनः ॥

kṛtamityabravīcchalyaḥ kimanyatkriyatāmiti | kṛtamityeva gāndhāriḥ pratyuvāca punaḥpunaḥ

शल्य ने कहा — "यह स्वीकार है; और क्या किया जाए?" और गान्धारीपुत्र बार-बार यही उत्तर देता रहा — "बस, इतना ही; काम हो गया।"

शल्य उवाच

श्लोक 21 (5.8.21)

गच्छ दुर्योधन पुरं स्वकमेव नरर्षभ । अहं गमिष्ये द्रष्टुं वै युधिष्ठिरमरिंदमम् ॥

gaccha duryodhana puraṃ svakameva nararṣabha | ahaṃ gamiṣye draṣṭuṃ vai yudhiṣṭhiramariṃdamam

हे नरश्रेष्ठ दुर्योधन, तुम अपने नगर को जाओ। मैं शत्रुदमन युधिष्ठिर से मिलने जाऊँगा।

श्लोक 22 (5.8.22)

दृष्ट्वा युधिष्ठिरं राजन्क्षिप्रमेष्ये नराधिप । अवश्यं चापि द्रष्टव्यः पाण्डवः पुरुषर्षभः ॥

dṛṣṭvā yudhiṣṭhiraṃ rājankṣiprameṣye narādhipa | avaśyaṃ cāpi draṣṭavyaḥ pāṇḍavaḥ puruṣarṣabhaḥ

हे राजन्, हे नराधिप, युधिष्ठिर से मिलकर मैं शीघ्र लौट आऊँगा; पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव से मिलना तो आवश्यक ही है।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 23 (5.8.23)

क्षिप्रमागम्यतां राजन्पाण्डवं वीक्ष्य पार्थिव । त्वय्यधीनाः स्म राजेन्द्र वरदानं स्मरस्व नः ॥

kṣipramāgamyatāṃ rājanpāṇḍavaṃ vīkṣya pārthiva | tvayyadhīnāḥ sma rājendra varadānaṃ smarasva naḥ

हे राजन्, हे पृथ्वीपति, पाण्डव से मिलकर शीघ्र लौट आइए। हे राजेन्द्र, हम आपके अधीन हैं; हमें दिए वरदान को स्मरण रखिए।

शल्य उवाच

श्लोक 24 (5.8.24)

क्षिप्रमेष्यामि भद्रं ते गच्छस्व स्वपुरं नृप । दृष्ट्वा तु पाण्डवान्राजन्न मिथ्या कर्तुमुत्सहे ॥

kṣiprameṣyāmi bhadraṃ te gacchasva svapuraṃ nṛpa | dṛṣṭvā tu pāṇḍavānrājanna mithyā kartumutsahe

मैं शीघ्र लौटूँगा; तुम्हारा कल्याण हो। हे नृप, अपने नगर को जाओ। हे राजन्, पाण्डवों से मिल लेने पर भी मैं अपना वचन झूठा नहीं होने दूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (5.8.25)

पर्यष्वजेतामन्योन्यं शल्यदुर्योधनावुभौ ॥

paryaṣvajetāmanyonyaṃ śalyaduryodhanāvubhau

तब शल्य और दुर्योधन दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया।

श्लोक 26 (5.8.26)

स तथा शल्यमामन्त्र्य पुनरायात्स्वकं पुरम् । शल्यो जगाम कौन्तेयानाख्यातुं कर्म तस्य तत् ॥

sa tathā śalyamāmantrya punarāyātsvakaṃ puram | śalyo jagāma kaunteyānākhyātuṃ karma tasya tat

इस प्रकार शल्य से विदा लेकर दुर्योधन अपने नगर लौट गया, और शल्य उसकी वह करतूत बताने के लिए कुन्तीपुत्रों के पास गए।

श्लोक 27 (5.8.27)

उपप्लाव्यं स गत्वा तु स्कन्धावारं प्रविश्य च । पाण्डवानथ तान्सर्वाञ्शल्यस्तत्र ददर्श ह ॥

upaplāvyaṃ sa gatvā tu skandhāvāraṃ praviśya ca | pāṇḍavānatha tānsarvāñśalyastatra dadarśa ha

उपप्लव्य पहुँचकर और छावनी में प्रवेश करके शल्य ने वहाँ सभी पाण्डवों को देखा।

श्लोक 28 (5.8.28)

चिरात्तु दृष्ट्वा राजानं मातुलं समितिञ्जयम् । आसनेभ्यः समुत्पेतुः सर्वे सहयुधिष्ठिराः ॥

cirāttu dṛṣṭvā rājānaṃ mātulaṃ samitiñjayam | āsanebhyaḥ samutpetuḥ sarve sahayudhiṣṭhirāḥ

बहुत समय बाद युद्ध में विजयी अपने मामा राजा शल्य को देखकर युधिष्ठिर सहित सब अपने आसनों से उठ खड़े हुए —

श्लोक 29 (5.8.29)

तथा भीमार्जुनौ हृष्टौ स्वस्रीयौ च यमावुभौ । द्रौपदी च सुभद्रा च अभिमन्युश्च भारत ॥

tathā bhīmārjunau hṛṣṭau svasrīyau ca yamāvubhau | draupadī ca subhadrā ca abhimanyuśca bhārata

हे भारत, प्रसन्न भीम और अर्जुन, उनकी बहन के दोनों जुड़वाँ पुत्र (नकुल और सहदेव), तथा द्रौपदी, सुभद्रा और अभिमन्यु भी।

श्लोक 30 (5.8.30)

समेत्य च महाबाहुं शल्यं पाण्डुसुतस्तदा । पाद्यमर्घ्यं च गां चैव प्रतिग्राह्य पुरोधसा ॥

sametya ca mahābāhuṃ śalyaṃ pāṇḍusutastadā | pādyamarghyaṃ ca gāṃ caiva pratigrāhya purodhasā

तब पाण्डुपुत्र ने महाबाहु शल्य से मिलकर पुरोहित के द्वारा उन्हें पाद्य, अर्घ्य और गौ अर्पित करवाई।

श्लोक 31 (5.8.31)

कृताञ्जलिरदीनात्मा धर्मात्मा शल्यमब्रवीत् । स्वागतं तेऽस्तु वै राजन्नेतदासनमास्यताम् ॥

kṛtāñjaliradīnātmā dharmātmā śalyamabravīt | svāgataṃ te'stu vai rājannetadāsanamāsyatām

हाथ जोड़कर उदारचित्त धर्मात्मा युधिष्ठिर ने शल्य से कहा — "हे राजन्, आपका स्वागत है; यह आसन ग्रहण कीजिए।"

श्लोक 32 (5.8.32)

ततो न्यषीदच्छल्यश्च काञ्चने परमासने । तत्र पाद्यमथार्घ्यं च न्यवेदयत पाण्डवः ॥

tato nyaṣīdacchalyaśca kāñcane paramāsane | tatra pādyamathārghyaṃ ca nyavedayata pāṇḍavaḥ

तब शल्य स्वर्ण के श्रेष्ठ आसन पर बैठ गए, और वहाँ पाण्डव ने उन्हें पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया।

शल्य उवाच

श्लोक 33 (5.8.33)

दुःखस्यैतस्य महतो धार्तराष्ट्रकृतस्य वै । अवाप्स्यसि फलं राजन्हत्वा शत्रून्परन्तप ॥

duḥkhasyaitasya mahato dhārtarāṣṭrakṛtasya vai | avāpsyasi phalaṃ rājanhatvā śatrūnparantapa

हे राजन्, हे परन्तप, धृतराष्ट्रपुत्रों द्वारा दिए गए इस महान् दुःख का फल तुम शत्रुओं को मारकर पाओगे।

श्लोक 34 (5.8.34)

विदितं ते महाराज लोकतन्त्रं नराधिप । तस्माल्लोककृतं किञ्चित्तव तात न विद्यते ॥

viditaṃ te mahārāja lokatantraṃ narādhipa | tasmāllokakṛtaṃ kiñcittava tāta na vidyate

हे महाराज, हे नराधिप, तुम संसार की रीति जानते हो; इसलिए, तात, लोक-व्यवहार की कोई बात तुमसे अनजानी नहीं है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (5.8.35)

निवेद्य चार्घ्यं विधिवन्मद्रराजाय भारत । कुशलं पाण्डवोऽपृच्छच्छल्यं सर्वसुखावहम् ॥

nivedya cārghyaṃ vidhivanmadrarājāya bhārata | kuśalaṃ pāṇḍavo'pṛcchacchalyaṃ sarvasukhāvaham

हे भारत, मद्रराज को विधिपूर्वक अर्घ्य निवेदन करके पाण्डव ने सबको सुख देने वाले शल्य से उनका कुशल-समाचार पूछा।

श्लोक 36 (5.8.36)

स तैः परिवृतः सर्वैः पाण्डवैर्धर्मचारिभिः । आसने चोपविष्टः स शल्यः पार्थमथाब्रवीत् ॥

sa taiḥ parivṛtaḥ sarvaiḥ pāṇḍavairdharmacāribhiḥ | āsane copaviṣṭaḥ sa śalyaḥ pārthamathābravīt

धर्म का आचरण करने वाले सभी पाण्डवों से घिरे हुए, आसन पर बैठे शल्य ने तब पार्थ (युधिष्ठिर) से कहा —

शल्य उवाच

श्लोक 37 (5.8.37)

कुशलं राजशार्दूल सर्वत्र कुरुनन्दन । अरण्यवासाद्दिष्ट्याऽसि विमुक्तो जयतां वर ॥

kuśalaṃ rājaśārdūla sarvatra kurunandana | araṇyavāsāddiṣṭyā'si vimukto jayatāṃ vara

हे राजसिंह, हे कुरुनन्दन, सब ओर कुशल है। सौभाग्य से तुम वनवास से मुक्त हो गए हो, हे विजेताओं में श्रेष्ठ।

श्लोक 38 (5.8.38)

दुष्करं ते कृतं राजन्निर्जने गहने वने । भ्रातृभिः सह कौन्तेय कृष्णया चानयाऽनघ ॥

duṣkaraṃ te kṛtaṃ rājannirjane gahane vane | bhrātṛbhiḥ saha kaunteya kṛṣṇayā cānayā'nagha

हे राजन्, हे निष्पाप कुन्तीपुत्र, तुमने अपने भाइयों और इस कृष्णा (द्रौपदी) के साथ निर्जन, घने वन में रहकर बड़ा कठिन कार्य किया है।

श्लोक 39 (5.8.39)

अज्ञातवासं घोरं च वसता दुष्करं कृतम् । दुःखमेव कुतः सौख्यं राज्यभ्रष्टस्य भारत ॥

ajñātavāsaṃ ghoraṃ ca vasatā duṣkaraṃ kṛtam | duḥkhameva kutaḥ saukhyaṃ rājyabhraṣṭasya bhārata

और भयंकर अज्ञातवास बिताकर भी तुमने कठिन कार्य किया। हे भारत, राज्य से वंचित व्यक्ति को तो दुःख ही मिलता है, सुख कहाँ?

श्लोक 40 (5.8.40)

सत्ये तपसि दाने च तव बुद्धिर्युधिष्ठिर । क्षमा दमश्चाहिंसा च सत्यं चैव युधिष्ठिर ॥

satye tapasi dāne ca tava buddhiryudhiṣṭhira | kṣamā damaścāhiṃsā ca satyaṃ caiva yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, तुम्हारी बुद्धि सत्य, तप और दान में लगी रहती है; क्षमा, इन्द्रियों का संयम, अहिंसा और सत्य — ये सब तुममें हैं।

श्लोक 41 (5.8.41)

अद्भुतश्च पुनर्लोकस्त्वयि राजन्प्रतिष्ठितः । मृदुर्वदान्यो ब्रह्मण्यो दान्तो धर्मपरायणः ॥

adbhutaśca punarlokastvayi rājanpratiṣṭhitaḥ | mṛdurvadānyo brahmaṇyo dānto dharmaparāyaṇaḥ

हे राजन्, यह अद्भुत लोक फिर से तुम पर ही टिका है। तुम कोमल, उदार, ब्राह्मणों के हितैषी, संयमी और धर्मपरायण हो।

श्लोक 42 (5.8.42)

धर्मास्ते विदिता राजन्बहवो लोकसाक्षिकाः । सर्वं जगदिदं तात विदितं ते परन्तप ॥

dharmāste viditā rājanbahavo lokasākṣikāḥ | sarvaṃ jagadidaṃ tāta viditaṃ te parantapa

हे राजन्, लोक जिनका साक्षी है, ऐसे अनेक धर्म तुम्हें ज्ञात हैं; हे तात, हे परन्तप, यह सारा जगत् तुम्हें विदित है।

श्लोक 43 (5.8.43)

मुदितश्च पुनर्लोकस्त्वयि राजन्प्रतिष्ठिते । दिष्ट्या कृच्छ्रमिदं राजन्पारितं भरतर्षभ ॥

muditaśca punarlokastvayi rājanpratiṣṭhite | diṣṭyā kṛcchramidaṃ rājanpāritaṃ bharatarṣabha

हे राजन्, तुम्हारे प्रतिष्ठित होने से लोक फिर आनंदित है। हे भरतश्रेष्ठ, सौभाग्य से तुमने यह संकट पार कर लिया है।

श्लोक 44 (5.8.44)

दिष्ट्या पश्यामि राजेन्द्र धर्मात्मानं सहानुगम् । निस्तीर्णदुष्करं राजंस्त्वां धर्मनिचयं प्रभो ॥

diṣṭyā paśyāmi rājendra dharmātmānaṃ sahānugam | nistīrṇaduṣkaraṃ rājaṃstvāṃ dharmanicayaṃ prabho

हे राजेन्द्र, सौभाग्य से मैं तुम धर्मात्मा को तुम्हारे अनुयायियों सहित देख रहा हूँ — हे प्रभो, धर्म के भंडार तुमको, जो इस दुष्कर संकट को पार कर चुके हो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 45 (5.8.45)

ततोऽस्याकथयद्राजा दुर्योधनसमागमम् । तच्च शुश्रूषितं सर्वं वरदानं च भारत ॥

tato'syākathayadrājā duryodhanasamāgamam | tacca śuśrūṣitaṃ sarvaṃ varadānaṃ ca bhārata

हे भारत, तब राजा शल्य ने युधिष्ठिर को दुर्योधन से अपनी भेंट, उसकी की हुई सारी सेवा-शुश्रूषा और दिए गए वरदान की बात बताई।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 46 (5.8.46)

सुकृतं ते कृतं राजन्प्रहृष्टेनान्तरात्मना । दुर्योधनस्य यद्वीर त्वया वाचा प्रतिश्रुतम् ॥

sukṛtaṃ te kṛtaṃ rājanprahṛṣṭenāntarātmanā | duryodhanasya yadvīra tvayā vācā pratiśrutam

हे राजन्, हे वीर, आपने प्रसन्न मन से दुर्योधन को जो वचन दिया, वह ठीक ही किया।

श्लोक 47 (5.8.47)

एकं त्विच्छामि भद्रं ते क्रियमाणं महीपते । राजन्नकर्तव्यमपि कर्तुमर्हसि सत्तम ॥

ekaṃ tvicchāmi bhadraṃ te kriyamāṇaṃ mahīpate | rājannakartavyamapi kartumarhasi sattama

हे पृथ्वीपति, आपका कल्याण हो; परंतु मैं चाहता हूँ कि आप एक काम करें। हे राजन्, हे सज्जनश्रेष्ठ, वह न करने योग्य होने पर भी आप उसे करें।

श्लोक 48 (5.8.48)

मम त्ववेक्षया वीर शृणु विज्ञापयामि ते । भवानिह महाराज वासुदेवसमो युधि ॥

mama tvavekṣayā vīra śṛṇu vijñāpayāmi te | bhavāniha mahārāja vāsudevasamo yudhi

हे वीर, मेरा ध्यान रखकर सुनिए, मैं आपसे निवेदन करता हूँ। हे महाराज, युद्ध में आप यहाँ वासुदेव के समान हैं।

श्लोक 49 (5.8.49)

कर्णार्जुनाभ्यां संप्राप्ते द्वैरथे राजसत्तम । कर्णस्य भवता कार्यं सारथ्यं नात्र संशयः ॥

karṇārjunābhyāṃ saṃprāpte dvairathe rājasattama | karṇasya bhavatā kāryaṃ sārathyaṃ nātra saṃśayaḥ

हे राजश्रेष्ठ, जब कर्ण और अर्जुन का द्वैरथ युद्ध होगा, तब निःसंदेह आपको कर्ण का सारथ्य करना पड़ेगा।

श्लोक 50 (5.8.50)

तत्र पाल्योऽर्जुनो राजन्यदि मत्प्रियमिच्छसि । तेजोवधश्च ते कार्यः सौतेरस्मज्जयावहः । अकर्तव्यमपि ह्येतत्कर्तुमर्हसि मातुल ॥

tatra pālyo'rjuno rājanyadi matpriyamicchasi | tejovadhaśca te kāryaḥ sauterasmajjayāvahaḥ | akartavyamapi hyetatkartumarhasi mātula

हे राजन्, यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो उस समय अर्जुन की रक्षा कीजिए और सूतपुत्र का तेज नष्ट कीजिए, जो हमें विजय दिलाएगा। हे मामा, यह न करने योग्य होने पर भी आप इसे करें।

शल्य उवाच

श्लोक 51 (5.8.51)

शृणु पाण्डव भद्रं ते यद्ब्रवीषि महात्मनः । तेजोवधनिमित्तं मां सूतपुत्रस्य सङ्गमे ॥

śṛṇu pāṇḍava bhadraṃ te yadbravīṣi mahātmanaḥ | tejovadhanimittaṃ māṃ sūtaputrasya saṅgame

हे पाण्डुपुत्र, सुनो, तुम्हारा कल्याण हो। तुम कहते हो कि युद्ध में आमना-सामना होने पर मैं उस महाबली सूतपुत्र के तेज को नष्ट करने का साधन बनूँ।

श्लोक 52 (5.8.52)

अहं तस्य भविष्यामि सङ्ग्रामे सारथिर्ध्रुवम् । वासुदेवेन हि समं नित्यं मां सोऽभिमन्यते ॥

ahaṃ tasya bhaviṣyāmi saṅgrāme sārathirdhruvam | vāsudevena hi samaṃ nityaṃ māṃ so'bhimanyate

मैं संग्राम में अवश्य उसका सारथी बनूँगा, क्योंकि वह मुझे सदा वासुदेव के समान मानता है।

श्लोक 53 (5.8.53)

तस्याहं कुरुशार्दूल प्रतीपमहितं वचः । ध्रुवं संकथयिष्यामि योद्धुकामस्य संयुगे ॥

tasyāhaṃ kuruśārdūla pratīpamahitaṃ vacaḥ | dhruvaṃ saṃkathayiṣyāmi yoddhukāmasya saṃyuge

हे कुरुसिंह, युद्ध में जब वह लड़ने को उत्सुक होगा, तब मैं निश्चय ही उससे प्रतिकूल और अहितकर बातें कहूँगा,

श्लोक 54 (5.8.54)

यथा स हृतदर्पश्च हृततेजाश्च पाण्डव । भविष्यति सुखं हन्तुं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

yathā sa hṛtadarpaśca hṛtatejāśca pāṇḍava | bhaviṣyati sukhaṃ hantuṃ satyametadbravīmi te

जिससे, हे पाण्डुपुत्र, उसका दर्प और तेज नष्ट हो जाए और उसे मारना सहज हो जाए। यह मैं तुमसे सच कहता हूँ।

श्लोक 55 (5.8.55)

एवमेतत्करिष्यामि यथा तात त्वमात्थ माम् । यच्चान्यदपि शक्ष्यामि तत्करिष्यामि ते प्रियम् ॥

evametatkariṣyāmi yathā tāta tvamāttha mām | yaccānyadapi śakṣyāmi tatkariṣyāmi te priyam

हे तात, जैसा तुम मुझसे कहते हो, मैं ठीक वैसा ही करूँगा; और तुम्हारे प्रिय के लिए जो कुछ और भी कर सकूँगा, वह भी करूँगा।

श्लोक 56 (5.8.56)

यच्च दुःखं त्वया प्राप्तं द्यूते वै कृष्णया सह । परुषाणि च वाक्यानि सूतपुत्रकृतानि वै ॥

yacca duḥkhaṃ tvayā prāptaṃ dyūte vai kṛṣṇayā saha | paruṣāṇi ca vākyāni sūtaputrakṛtāni vai

जुए में कृष्णा (द्रौपदी) के साथ तुमने जो दुःख पाया, और सूतपुत्र के कहे हुए कठोर वचन,

श्लोक 57 (5.8.57)

जटासुरात्परिक्लेशः कीचकाच्च महाद्युते । द्रौपद्याऽधिगतं सर्वं दमयन्त्या यथाऽशुभम् ॥

jaṭāsurātparikleśaḥ kīcakācca mahādyute | draupadyā'dhigataṃ sarvaṃ damayantyā yathā'śubham

हे महातेजस्वी, जटासुर और कीचक से मिला क्लेश — दमयन्ती की भाँति द्रौपदी ने जो-जो कष्ट भोगे —

श्लोक 58 (5.8.58)

सर्वं दुःखमिदं वीर सुखोदर्कं भविष्यति । नात्र मन्युस्त्वया कार्यो विधिर्हि बलवत्तरः ॥

sarvaṃ duḥkhamidaṃ vīra sukhodarkaṃ bhaviṣyati | nātra manyustvayā kāryo vidhirhi balavattaraḥ

हे वीर, यह सारा दुःख अंत में सुख देने वाला होगा। इस पर तुम्हें खेद नहीं करना चाहिए, क्योंकि विधाता अधिक बलवान है।

श्लोक 59 (5.8.59)

दुःखानि हि महात्मानः प्राप्नुवन्ति युधिष्ठिर । देवैरपि हि दुःखानि प्राप्तानि जगतीपते ॥

duḥkhāni hi mahātmānaḥ prāpnuvanti yudhiṣṭhira | devairapi hi duḥkhāni prāptāni jagatīpate

हे युधिष्ठिर, महात्मा भी दुःख पाते हैं; हे जगतीपते, देवताओं ने भी दुःख भोगे हैं।

श्लोक 60 (5.8.60)

इन्द्रेण श्रूयते राजन्सभार्येण महात्मना । अनुभूतं महद्दुःखं देवराजेन भारत ॥

indreṇa śrūyate rājansabhāryeṇa mahātmanā | anubhūtaṃ mahadduḥkhaṃ devarājena bhārata

हे राजन्, हे भारत, सुना जाता है कि महात्मा देवराज इन्द्र ने भी अपनी पत्नी के साथ महान् दुःख भोगा था।

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