उद्योग पर्व · अध्याय 9
इन्द्र द्वारा त्रिशिरा का वध और त्वष्टा द्वारा वृत्र की उत्पत्ति
युधिष्ठिर पूछते हैं कि इन्द्र और उनकी पत्नी को दुःख कैसे भोगना पड़ा, और शल्य कथा आरम्भ करते हैं। त्वष्टा का तीन सिरों वाला पुत्र विश्वरूप (त्रिशिरा) तप से इतना प्रबल हो जाता है कि अपने पद के लिए डरे इन्द्र उसे लुभाने के लिए अप्सराएँ भेजते हैं; उनके विफल होने पर इन्द्र उसे वज्र से मार गिराते हैं और पास से गुज़रते एक बढ़ई से उसके सिर कटवाते हैं, जो अब भी जीवित-से लगते हैं और जिनसे पक्षी उड़ निकलते हैं। इन्द्र ब्रह्महत्या को पृथ्वी, जल, वृक्षों और स्त्रियों में बाँटकर उससे छुटकारा पाते हैं, पर क्रुद्ध त्वष्टा वृत्र को उत्पन्न करते हैं, जो इन्द्र को निगल जाता है। देवताओं की रची जम्हाई से इन्द्र बाहर निकल आते हैं, फिर भी उन्हें पीछे हटना पड़ता है, और देवता मन ही मन विष्णु की शरण में जाते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (5.9.1)
कथमिन्द्रेण राजेन्द्र सभार्येण महात्मना । दुःखं प्राप्तं परं घोरमेतदिच्छामि वेदितुम् ॥
kathamindreṇa rājendra sabhāryeṇa mahātmanā | duḥkhaṃ prāptaṃ paraṃ ghorametadicchāmi veditum
हे राजेन्द्र, महात्मा इन्द्र ने अपनी पत्नी के साथ ऐसा घोर और भयानक दुःख कैसे पाया? यह मैं जानना चाहता हूँ।
शल्य उवाच
श्लोक 2 (5.9.2)
शृणु राजन्पुरावृत्तमितिहासं पुरातनम् । सभार्येण यथा प्राप्तं दुःखमिन्द्रेण भारत ॥
śṛṇu rājanpurāvṛttamitihāsaṃ purātanam | sabhāryeṇa yathā prāptaṃ duḥkhamindreṇa bhārata
हे राजन्, प्राचीन काल में घटित यह पुराना इतिहास सुनो, हे भारत, कि किस प्रकार इन्द्र ने अपनी पत्नी के साथ दुःख पाया।
श्लोक 3 (5.9.3)
त्वष्टा प्रजापतिर्ह्यासीद्देवश्रेष्ठो महातपाः । स पुत्रं वै त्रिशिरसमिन्द्रद्रोहात्किलासृजत् ॥
tvaṣṭā prajāpatirhyāsīddevaśreṣṭho mahātapāḥ | sa putraṃ vai triśirasamindradrohātkilāsṛjat
त्वष्टा एक प्रजापति थे, देवताओं में श्रेष्ठ और महान तपस्वी। कहते हैं, इन्द्र से द्रोह के कारण उन्होंने तीन सिरों वाले एक पुत्र को उत्पन्न किया।
श्लोक 4 (5.9.4)
ऐन्द्रं स प्रार्थयत्स्थानं विश्वरूपो महाद्युतिः । तैस्त्रिभिर्वदनैर्घोरैः सूर्येन्दुज्वलनोपमैः ॥
aindraṃ sa prārthayatsthānaṃ viśvarūpo mahādyutiḥ | taistribhirvadanairghoraiḥ sūryendujvalanopamaiḥ
वह महातेजस्वी पुत्र विश्वरूप इन्द्र के पद की कामना करने लगा। उसके तीन भयंकर मुख थे, जो सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि के समान दमकते थे।
श्लोक 5 (5.9.5)
वेदानेकेन सोऽधीते सुरामेकेन चापिबत् । एकेन च दिशः सर्वाः पिबन्निव निरीक्षते ॥
vedānekena so'dhīte surāmekena cāpibat | ekena ca diśaḥ sarvāḥ pibanniva nirīkṣate
एक मुख से वह वेदों का पाठ करता था, दूसरे से सुरा पीता था, और तीसरे से सब दिशाओं को ऐसे निहारता था मानो उन्हें पी जाएगा।
श्लोक 6 (5.9.6)
स तपस्वी मृदुर्दान्तो धर्मे तपसि चोद्यतः । तपस्तस्य महत्तीव्रं सुदुश्चरमरिन्दम ॥
sa tapasvī mṛdurdānto dharme tapasi codyataḥ | tapastasya mahattīvraṃ suduścaramarindama
वह तपस्वी, कोमल स्वभाव वाला और संयमी था, धर्म और तप में लगा रहता था। हे शत्रुदमन, उसका तप महान, तीव्र और अत्यन्त कठिन था।
श्लोक 7 (5.9.7)
तस्य दृष्ट्वा तपोवीर्यं सत्यं चामिततेजसः । विषादमगमच्छक्र इन्द्रोऽयं मा भवेदिति ॥
tasya dṛṣṭvā tapovīryaṃ satyaṃ cāmitatejasaḥ | viṣādamagamacchakra indro'yaṃ mā bhavediti
अपार तेज वाले उस विश्वरूप के तप का बल और उसकी सत्यनिष्ठा देखकर इन्द्र उदास हो गए और सोचने लगे, "कहीं यह इन्द्र न बन जाए।"
श्लोक 8 (5.9.8)
कथं सज्जेच्च भोगेषु न च तप्येन्महत्तपः । विवर्धमानस्त्रिशिराः सर्वं हि भुवनं ग्रसेत् ॥
kathaṃ sajjecca bhogeṣu na ca tapyenmahattapaḥ | vivardhamānastriśirāḥ sarvaṃ hi bhuvanaṃ graset
"यह भोगों में कैसे आसक्त हो, और अपना महान तप करना कैसे छोड़े? क्योंकि यदि त्रिशिरा इसी प्रकार बढ़ता रहा तो सारे संसार को निगल जाएगा।"
श्लोक 9 (5.9.9)
इति संचिन्त्य बहुधा बुद्धिमान्भरतर्षभ । आज्ञापयत्सोऽप्सरसस्त्वष्टृपुत्रप्रलोभने ॥
iti saṃcintya bahudhā buddhimānbharatarṣabha | ājñāpayatso'psarasastvaṣṭṛputrapralobhane
हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार बहुत तरह से सोच-विचार करके बुद्धिमान इन्द्र ने अप्सराओं को त्वष्टा के पुत्र को लुभाने की आज्ञा दी।
इन्द्र उवाच
श्लोक 10 (5.9.10)
यथा स सज्जेत्त्रिशिराः कामभोगेषु वै भृशम् । क्षिप्रं कुरुत गच्छध्वं प्रलोभयत माचिरम् ॥
yathā sa sajjettriśirāḥ kāmabhogeṣu vai bhṛśam | kṣipraṃ kuruta gacchadhvaṃ pralobhayata māciram
शीघ्र ऐसा करो कि त्रिशिरा काम-भोगों में गहराई से आसक्त हो जाए। जाओ, और बिना देर किए उसे लुभाओ।
श्लोक 11 (5.9.11)
शृङ्गारवेषाः सुश्रोण्यो हारैर्युक्ता मनोहरैः । हावभावसमायुक्ताः सर्वाः सौन्दर्यशोभिताः ॥
śṛṅgāraveṣāḥ suśroṇyo hārairyuktā manoharaiḥ | hāvabhāvasamāyuktāḥ sarvāḥ saundaryaśobhitāḥ
शृंगार के वेश में सजी, सुन्दर नितम्बों वाली, मनोहर हारों से युक्त, हाव-भाव से भरी और सौन्दर्य से सुशोभित तुम सब,
श्लोक 12 (5.9.12)
प्रलोभयत भद्रं वः शमयध्वं भयं मम । अस्वस्थं ह्यात्मनात्मानं लक्षयामि वराङ्गनाः ॥
pralobhayata bhadraṃ vaḥ śamayadhvaṃ bhayaṃ mama | asvasthaṃ hyātmanātmānaṃ lakṣayāmi varāṅganāḥ
उसे लुभाओ, तुम्हारा कल्याण हो, और मेरा भय शान्त करो। हे सुन्दरियो, मैं अपने भीतर बेचैनी अनुभव कर रहा हूँ।
श्लोक 13 (5.9.13)
भयं तन्मे महाघोरं क्षिप्रं नाशयताबलाः ॥
bhayaṃ tanme mahāghoraṃ kṣipraṃ nāśayatābalāḥ
हे अबलाओ, मेरे उस घोर भय को शीघ्र नष्ट करो।
अप्सरस ऊचुः
श्लोक 14 (5.9.14)
तथा यत्नं करिष्यामः शक्र तस्य प्रलोभने । यथा नावाप्स्यसि भयं तस्माद्बलनिषूदन ॥
tathā yatnaṃ kariṣyāmaḥ śakra tasya pralobhane | yathā nāvāpsyasi bhayaṃ tasmādbalaniṣūdana
हे शक्र, हम उसे लुभाने का ऐसा प्रयत्न करेंगी कि हे बलनिषूदन, आपको उससे कोई भय न रहे।
श्लोक 15 (5.9.15)
निर्दहन्निव चक्षुर्भ्यां योऽसावास्ते तपोनिधिः । तं प्रलोभयितुं देव गच्छामः सहिता वयम् ॥
nirdahanniva cakṣurbhyāṃ yo'sāvāste taponidhiḥ | taṃ pralobhayituṃ deva gacchāmaḥ sahitā vayam
हे देव, तप का भंडार जो वहाँ अपनी आँखों से मानो सब कुछ भस्म करता हुआ बैठा है, उसे लुभाने के लिए हम सब मिलकर जाती हैं।
श्लोक 16 (5.9.16)
यतिष्यामो वशे कर्तुं व्यपनेतुं च ते भयम् ॥
yatiṣyāmo vaśe kartuṃ vyapanetuṃ ca te bhayam
हम उसे वश में करने और आपका भय दूर करने का यत्न करेंगी।
शल्य उवाच
श्लोक 17 (5.9.17)
इन्द्रेण तास्त्वनुज्ञाता जग्मुस्त्रिशिरसोऽन्तिकम् । तत्र ता विविधैर्भावैर्लोभयन्त्यो वराङ्गनाः ॥
indreṇa tāstvanujñātā jagmustriśiraso'ntikam | tatra tā vividhairbhāvairlobhayantyo varāṅganāḥ
इन्द्र की अनुमति पाकर वे सुन्दरियाँ त्रिशिरा के पास गईं। वहाँ वे तरह-तरह के भावों से उसे लुभाने लगीं।
श्लोक 18 (5.9.18)
नृत्तं संदर्शयामासुस्तथैवाङ्गेषु सौष्ठवम् । नाभ्यगच्छत्प्रहर्षं ताः स पश्यन्सुमहातपाः ॥
nṛttaṃ saṃdarśayāmāsustathaivāṅgeṣu sauṣṭhavam | nābhyagacchatpraharṣaṃ tāḥ sa paśyansumahātapāḥ
उन्होंने अपना नृत्य दिखाया और अंगों का लावण्य भी, परन्तु वह महातपस्वी उन्हें देखता हुआ भी हर्षित नहीं हुआ।
श्लोक 19 (5.9.19)
इन्द्रियाणि वशे कृत्वा पूर्णसागरसन्निभः । तास्तु यत्नं परं कृत्वा पुनः शक्रमुपस्थिताः ॥
indriyāṇi vaśe kṛtvā pūrṇasāgarasannibhaḥ | tāstu yatnaṃ paraṃ kṛtvā punaḥ śakramupasthitāḥ
इन्द्रियों को वश में किए वह भरे हुए समुद्र के समान अचल रहा। अपना पूरा प्रयत्न करके अप्सराएँ फिर इन्द्र के पास लौट आईं।
श्लोक 20 (5.9.20)
कृताञ्जलिपुटाः सर्वा देवराजमथाब्रुवन् । न स शक्यः सुदुर्धर्षो धैर्याच्चालयितुं प्रभो ॥
kṛtāñjalipuṭāḥ sarvā devarājamathābruvan | na sa śakyaḥ sudurdharṣo dhairyāccālayituṃ prabho
सबने हाथ जोड़कर देवराज से कहा, "प्रभो, उस दुर्धर्ष को उसके धैर्य से डिगाया नहीं जा सकता।
श्लोक 21 (5.9.21)
यत्ते कार्यं महाभाग क्रियतां तदनन्तरम् । संपूज्याप्सरसः शक्रो विसृज्य च महामतिः ॥
yatte kāryaṃ mahābhāga kriyatāṃ tadanantaram | saṃpūjyāpsarasaḥ śakro visṛjya ca mahāmatiḥ
हे महाभाग, अब आगे जो करना हो, वह कीजिए।" बुद्धिमान इन्द्र ने अप्सराओं का सम्मान करके उन्हें विदा किया,
श्लोक 22 (5.9.22)
चिन्तयामास तस्यैव वधोपायं युधिष्ठिर । स तूष्णीं चिन्तयन्वीरो देवराजः प्रतापवान् ॥
cintayāmāsa tasyaiva vadhopāyaṃ yudhiṣṭhira | sa tūṣṇīṃ cintayanvīro devarājaḥ pratāpavān
और हे युधिष्ठिर, वे केवल उसके वध का उपाय सोचने लगे। चुपचाप विचार करते हुए वीर और प्रतापी देवराज ने,
श्लोक 23 (5.9.23)
विनिश्चितमतिर्धीमान्वधे त्रिशिरसोऽभवत् । वज्रमस्य क्षिपाम्यद्य स क्षिप्रं न भविष्यति ॥
viniścitamatirdhīmānvadhe triśiraso'bhavat | vajramasya kṣipāmyadya sa kṣipraṃ na bhaviṣyati
बुद्धिमान होने के कारण, त्रिशिरा के वध का निश्चय कर लिया। "आज मैं इस पर वज्र चलाऊँगा, और यह शीघ्र ही नहीं रहेगा।
श्लोक 24 (5.9.24)
शत्रुः प्रवृद्धो नोपेक्ष्यो दुर्बलोऽपि बलीयसा । शास्त्रबुद्ध्या विनिश्चित्य कृत्वा बुद्धिं वधे दृढाम् ॥
śatruḥ pravṛddho nopekṣyo durbalo'pi balīyasā | śāstrabuddhyā viniścitya kṛtvā buddhiṃ vadhe dṛḍhām
बढ़ते हुए शत्रु की, चाहे वह दुर्बल ही क्यों न हो, बलवान को उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।" शास्त्र की बुद्धि से यह निश्चय करके और वध का दृढ़ संकल्प लेकर,
श्लोक 25 (5.9.25)
अथ वैश्वानरनिभं घोररूपं भयावहम् । मुमोच वज्रं संक्रुद्धः शक्रस्त्रिशिरसं प्रति ॥
atha vaiśvānaranibhaṃ ghorarūpaṃ bhayāvaham | mumoca vajraṃ saṃkruddhaḥ śakrastriśirasaṃ prati
क्रोध से भरे इन्द्र ने त्रिशिरा पर वैश्वानर अग्नि के समान दहकता, भयंकर रूप वाला और भय उपजाने वाला वज्र छोड़ा।
श्लोक 26 (5.9.26)
स पपात हतस्तेन वज्रेण दृढमाहतः । पर्वतस्येव शिखरं प्रणुन्नं मेदिनीतले ॥
sa papāta hatastena vajreṇa dṛḍhamāhataḥ | parvatasyeva śikharaṃ praṇunnaṃ medinītale
उस वज्र की कठोर चोट से मारा गया वह धरती पर ऐसे गिर पड़ा, जैसे पर्वत की कोई चोटी टूटकर भूमि पर आ गिरी हो।
श्लोक 27 (5.9.27)
तं तु वज्रहतं दृष्ट्वा शयानमचलोपमम् । न शर्म लेभे देवेन्द्रो दीपितस्तस्य तेजसा ॥
taṃ tu vajrahataṃ dṛṣṭvā śayānamacalopamam | na śarma lebhe devendro dīpitastasya tejasā
परन्तु वज्र से मारे गए उसे पर्वत के समान पड़ा देखकर भी देवेन्द्र को चैन न मिला; वे उसके तेज से तप रहे थे।
श्लोक 28 (5.9.28)
हतोऽपि दीप्ततेजाः स जीवन्निव हि दृश्यते । घातितस्य शिरांस्याजौ जीवन्तीवाद्भुतानि वै ॥
hato'pi dīptatejāḥ sa jīvanniva hi dṛśyate | ghātitasya śirāṃsyājau jīvantīvādbhutāni vai
मारा जाकर भी वह तेज से दमकता हुआ जीवित-सा दिखाई देता था; युद्ध में मारे गए उसके सिर अद्भुत रूप से मानो अब भी जीवित थे।
श्लोक 29 (5.9.29)
शिरांसि तस्याजायन्त त्रीण्येव शकुनास्त्रयः । तित्तिरिः कलविङ्कश्च तथैव च कपिञ्जलः । विश्वरूपशिरांस्येव जायन्ते तानि भारत ॥
śirāṃsi tasyājāyanta trīṇyeva śakunāstrayaḥ | tittiriḥ kalaviṅkaśca tathaiva ca kapiñjalaḥ | viśvarūpaśirāṃsyeva jāyante tāni bhārata
उसके तीनों सिर तीन पक्षी बन गए: तीतर, गौरैया और कपिंजल। हे भारत, विश्वरूप के सिर ही इन पक्षियों के रूप में जन्म लेते हैं।
श्लोक 30 (5.9.30)
ततोऽतिभीतगात्रस्तु शक्र आस्ते विचारयन् । अथाजगाम परशुं स्कन्धेनादाय वर्धकिः ॥
tato'tibhītagātrastu śakra āste vicārayan | athājagāma paraśuṃ skandhenādāya vardhakiḥ
तब भय से काँपते शरीर वाले इन्द्र बैठे विचार करने लगे। उसी समय एक बढ़ई कंधे पर कुल्हाड़ी रखे
श्लोक 31 (5.9.31)
तदरण्यं महाराज यत्रास्तेऽसौ निपातितः । स भीतस्तत्र तक्षाणं घटमानं शचीपतिः ॥
tadaraṇyaṃ mahārāja yatrāste'sau nipātitaḥ | sa bhītastatra takṣāṇaṃ ghaṭamānaṃ śacīpatiḥ
हे महाराज, उस वन में आया जहाँ त्रिशिरा मरा पड़ा था। वहाँ भयभीत शचीपति ने उस बढ़ई को काम में लगे देखा,
श्लोक 32 (5.9.32)
अपश्यदब्रवीच्चैनं सत्वरं पाकशासनः । क्षिप्रं छिन्धि शिरांस्यस्य कुरुष्व वचनं मम ॥
apaśyadabravīccainaṃ satvaraṃ pākaśāsanaḥ | kṣipraṃ chindhi śirāṃsyasya kuruṣva vacanaṃ mama
और पाकशासन इन्द्र ने तुरन्त उससे कहा, "शीघ्र इसके सिर काट डालो; मेरी बात मानो।"
तक्षोवाच
श्लोक 33 (5.9.33)
महास्कन्धो भृशं ह्येष परशुर्न भविष्यति । कर्तुं चाहं न शक्ष्यामि कर्म सद्भिर्विगर्हितम् ॥
mahāskandho bhṛśaṃ hyeṣa paraśurna bhaviṣyati | kartuṃ cāhaṃ na śakṣyāmi karma sadbhirvigarhitam
इसके कंधे बहुत विशाल हैं; यह कुल्हाड़ी इसे झेल न पाएगी। और फिर, जिस कर्म की सज्जन निन्दा करते हैं, वह मैं नहीं कर सकूँगा।
इन्द्र उवाच
श्लोक 34 (5.9.34)
मा भैस्त्वं शीघ्रमेतद्वै कुरुष्व वचनं मम । मत्प्रसादाद्धि ते शस्त्रं वज्रकल्पं भविष्यति ॥
mā bhaistvaṃ śīghrametadvai kuruṣva vacanaṃ mama | matprasādāddhi te śastraṃ vajrakalpaṃ bhaviṣyati
डरो मत। मेरी बात मानकर यह काम शीघ्र करो। मेरी कृपा से तुम्हारा शस्त्र वज्र के समान हो जाएगा।
तक्षोवाच
श्लोक 35 (5.9.35)
कं भवन्तमहं विद्यां घोरकर्माणमद्य वै । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वेन कथयस्व मे ॥
kaṃ bhavantamahaṃ vidyāṃ ghorakarmāṇamadya vai | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ tattvena kathayasva me
आज ऐसा घोर कर्म करने वाले आपको मैं कौन समझूँ? यह मैं सुनना चाहता हूँ; मुझे सच-सच बताइए।
इन्द्र उवाच
श्लोक 36 (5.9.36)
अहमिन्द्रो देवराजस्तक्षन्विदितमस्तु ते । कुरुष्वैतद्यथोक्तं मे तक्षन्माऽत्र विचारय ॥
ahamindro devarājastakṣanviditamastu te | kuruṣvaitadyathoktaṃ me takṣanmā'tra vicāraya
हे बढ़ई, जान लो कि मैं देवराज इन्द्र हूँ। हे बढ़ई, जैसा मैंने कहा है वैसा करो, इसमें सोच-विचार मत करो।
श्लोक 37 (5.9.37)
मया हि निहतः शेते त्रिशिरास्त्वं च विद्वि वै ॥
mayā hi nihataḥ śete triśirāstvaṃ ca vidvi vai
क्योंकि त्रिशिरा मेरे हाथों मारा जाकर वहाँ पड़ा है, यह भी जान लो।
शल्य उवाच
श्लोक 38 (5.9.38)
स प्रह्वः प्राञ्जलिर्भूत्वा इदं वचनमब्रवीत् ॥
sa prahvaḥ prāñjalirbhūtvā idaṃ vacanamabravīt
तब वह बढ़ई विनम्र होकर हाथ जोड़े यह वचन बोला:
तक्षोवाच
श्लोक 39 (5.9.39)
क्रूरेण नापत्रपसे कथं शक्रेह कर्मणा । ऋषिपुत्रमिमं हत्वा ब्रह्महत्याभयं न ते ॥
krūreṇa nāpatrapase kathaṃ śakreha karmaṇā | ṛṣiputramimaṃ hatvā brahmahatyābhayaṃ na te
हे शक्र, इस क्रूर कर्म पर आपको लज्जा क्यों नहीं आती? इस ऋषिपुत्र को मारकर क्या आपको ब्रह्महत्या का भय नहीं है?
शक्र उवाच
श्लोक 40 (5.9.40)
पश्चाद्धर्मं चरिष्यामि पावनार्थं सुदुश्चरम् । शत्रुरेष महावीर्यो वज्रेण निहतो मया ॥
paścāddharmaṃ cariṣyāmi pāvanārthaṃ suduścaram | śatrureṣa mahāvīryo vajreṇa nihato mayā
बाद में मैं अपनी शुद्धि के लिए कोई अत्यन्त कठिन धर्म-अनुष्ठान करूँगा। यह महाबली शत्रु था, जिसे मैंने वज्र से मार डाला है।
श्लोक 41 (5.9.41)
अद्यापि चाहमुद्विग्नस्तक्षन्नस्माद्बिभेमि वै । क्षिप्रं छिन्धि शिरांसि त्वं करिष्येऽनुग्रहं तव ॥
adyāpi cāhamudvignastakṣannasmādbibhemi vai | kṣipraṃ chindhi śirāṃsi tvaṃ kariṣye'nugrahaṃ tava
हे बढ़ई, मैं अब भी उद्विग्न हूँ और इससे डरता हूँ। तुम शीघ्र इसके सिर काट दो, मैं तुम पर अनुग्रह करूँगा।
श्लोक 42 (5.9.42)
शिरः पशोस्ते दास्यन्ति भागं यज्ञेषु मानवाः । एष तेऽनुग्रहस्तक्षन्क्षिप्रं कुरु मम प्रियम् ॥
śiraḥ paśoste dāsyanti bhāgaṃ yajñeṣu mānavāḥ | eṣa te'nugrahastakṣankṣipraṃ kuru mama priyam
यज्ञों में मनुष्य पशु का सिर तुम्हें भाग के रूप में देंगे। हे बढ़ई, यही तुम पर मेरा अनुग्रह है; अब शीघ्र मेरा प्रिय कार्य करो।
शल्य उवाच
श्लोक 43 (5.9.43)
एतच्छ्रुत्वा तु तक्षा स महेन्द्रवचनात्तदा । शिरांस्यथ त्रिशिरसः कुठारेणाच्छिनत्तदा ॥
etacchrutvā tu takṣā sa mahendravacanāttadā | śirāṃsyatha triśirasaḥ kuṭhāreṇācchinattadā
यह सुनकर उस बढ़ई ने महेन्द्र के कहने पर तब अपनी कुल्हाड़ी से त्रिशिरा के सिर काट डाले।
श्लोक 44 (5.9.44)
निकृत्तेषु ततस्तेषु निष्क्रामन्नण्डजास्त्वथ । कपिञ्जलास्तित्तिराश्च कलविङ्काश्च सर्वशः ॥
nikṛtteṣu tatasteṣu niṣkrāmannaṇḍajāstvatha | kapiñjalāstittirāśca kalaviṅkāśca sarvaśaḥ
उनके कटते ही उनमें से पक्षी निकल पड़े: चारों ओर कपिंजल, तीतर और गौरैया।
श्लोक 45 (5.9.45)
येन वेदानधीते स्म पिबते सोममेव च । तस्माद्वक्त्राद्विनिश्चेरुः क्षिप्रं तस्य कपिञ्जलाः ॥
yena vedānadhīte sma pibate somameva ca | tasmādvaktrādviniśceruḥ kṣipraṃ tasya kapiñjalāḥ
जिस मुख से वह वेदों का पाठ करता और सोम पीता था, उससे शीघ्र ही कपिंजल पक्षी निकल पड़े।
श्लोक 46 (5.9.46)
येन सर्वा दिशो राजन्पिबन्निव निरीक्षते । तस्माद्वक्त्राद्विनिश्चेरुस्तित्तिरास्तस्य पाण्डव ॥
yena sarvā diśo rājanpibanniva nirīkṣate | tasmādvaktrādviniścerustittirāstasya pāṇḍava
हे राजन्, जिस मुख से वह सब दिशाओं को मानो पीता हुआ निहारता था, हे पाण्डुनन्दन, उससे तीतर निकल पड़े।
श्लोक 47 (5.9.47)
यत्सुरापं तु तस्यासीद्वक्त्रं त्रिशिरसस्तदा । कलविङ्काः समुत्पेतुः श्येनाश्च भरतर्षभ ॥
yatsurāpaṃ tu tasyāsīdvaktraṃ triśirasastadā | kalaviṅkāḥ samutpetuḥ śyenāśca bharatarṣabha
और हे भरतश्रेष्ठ, त्रिशिरा का जो मुख सुरा पीता था, उससे गौरैया और बाज़ उड़ निकले।
श्लोक 48 (5.9.48)
ततस्तेषु निकृत्तेषु विज्वरो मघवानथ । तक्ष्णे तथा वरं दत्त्वा प्रहृष्टस्त्रिदशेश्वरः ॥
tatasteṣu nikṛtteṣu vijvaro maghavānatha | takṣṇe tathā varaṃ dattvā prahṛṣṭastridaśeśvaraḥ
उन सिरों के कट जाने पर इन्द्र की व्याकुलता दूर हो गई। प्रसन्न हुए देवेश्वर ने उस बढ़ई को वैसा ही वर दिया,
श्लोक 49 (5.9.49)
जगाम त्रिदिवं देवस्तक्षाऽपि स्वगृहान्ययौ । मेने कृतार्थमात्मानं हत्वा शत्रुं सुरारिहा ॥
jagāma tridivaṃ devastakṣā'pi svagṛhānyayau | mene kṛtārthamātmānaṃ hatvā śatruṃ surārihā
और वे स्वर्ग चले गए; बढ़ई भी अपने घर चला गया। देवशत्रुओं का संहार करने वाले इन्द्र शत्रु को मारकर स्वयं को कृतार्थ मानने लगे।
श्लोक 50 (5.9.50)
तक्षापि स्वगृहं गत्वा नैव शंसति कस्यचित् । अथैनं नाभिजानन्ति वर्षमेकं तथागतम् ॥
takṣāpi svagṛhaṃ gatvā naiva śaṃsati kasyacit | athainaṃ nābhijānanti varṣamekaṃ tathāgatam
बढ़ई ने घर जाकर किसी से कुछ नहीं कहा। अतः एक वर्ष तक कोई नहीं जान पाया कि इन्द्र किस दशा में हैं।
श्लोक 51 (5.9.51)
अथ संवत्सरे पूर्णे भूताः पशुपतेः प्रभो । तमाक्रोशन्त मघवान्नः प्रभुर्ब्रह्महा इति ॥
atha saṃvatsare pūrṇe bhūtāḥ paśupateḥ prabho | tamākrośanta maghavānnaḥ prabhurbrahmahā iti
फिर हे प्रभो, वर्ष पूरा होने पर पशुपति (शिव) के भूतगण उनके विरुद्ध पुकार उठे, "हमारे स्वामी मघवा ब्रह्महत्यारे हैं!"
श्लोक 52 (5.9.52)
तत इन्द्रो व्रतं घोरमाचरत्पाकशासनः । तपसा च सुसंयुक्तः सह देवैर्मरुद्गणैः ॥
tata indro vrataṃ ghoramācaratpākaśāsanaḥ | tapasā ca susaṃyuktaḥ saha devairmarudgaṇaiḥ
तब पाकशासन इन्द्र ने कठोर व्रत किया और देवताओं तथा मरुद्गणों के साथ तप में लग गए।
श्लोक 53 (5.9.53)
समुद्रेषु पृथिव्यां च वनस्पतिषु स्त्रीषु च । विभज्य ब्रह्महत्यां च तान्वरैरप्ययोजयत् ॥
samudreṣu pṛthivyāṃ ca vanaspatiṣu strīṣu ca | vibhajya brahmahatyāṃ ca tānvarairapyayojayat
उन्होंने ब्रह्महत्या को समुद्रों, पृथ्वी, वृक्षों और स्त्रियों में बाँट दिया, और उन्हें वरदान भी दिए।
श्लोक 54 (5.9.54)
वरदस्तु वरं दत्त्वा पृथिव्यै सागराय च । वनस्पतिभ्यः स्त्रीभ्यश्च ब्रह्महत्यां नुनोद ताम् ॥
varadastu varaṃ dattvā pṛthivyai sāgarāya ca | vanaspatibhyaḥ strībhyaśca brahmahatyāṃ nunoda tām
वर देने वाले इन्द्र ने पृथ्वी, समुद्र, वृक्षों और स्त्रियों को वर देकर उस ब्रह्महत्या को अपने से दूर कर दिया।
श्लोक 55 (5.9.55)
ततस्तु शुद्धो भगवान्देवैर्लोकैश्च पूजितः । इन्द्रस्थानमुपातिष्ठत्पूज्यमानो महर्षिभिः ॥
tatastu śuddho bhagavāndevairlokaiśca pūjitaḥ | indrasthānamupātiṣṭhatpūjyamāno maharṣibhiḥ
तब शुद्ध हुए भगवान इन्द्र, देवताओं और लोकों से पूजित तथा महर्षियों से सम्मानित होकर, फिर से इन्द्र-पद पर आसीन हुए।
श्लोक 56 (5.9.56)
त्वष्टा प्रजापतिः श्रुत्वा शक्रेणाथ हतं सुतम् । क्रोधसंरक्तनयन इदं वचनमब्रवीत् ॥
tvaṣṭā prajāpatiḥ śrutvā śakreṇātha hataṃ sutam | krodhasaṃraktanayana idaṃ vacanamabravīt
जब प्रजापति त्वष्टा ने सुना कि इन्द्र ने उनके पुत्र को मार डाला है, तो क्रोध से उनकी आँखें लाल हो गईं और वे यह वचन बोले:
त्वष्टोवाच
श्लोक 57 (5.9.57)
तप्यमानं तपो नित्यं क्षान्तं दान्तं जितेन्द्रियम् । विनाऽपराधेन यतः पुत्रं हिंसितवान्मम ॥
tapyamānaṃ tapo nityaṃ kṣāntaṃ dāntaṃ jitendriyam | vinā'parādhena yataḥ putraṃ hiṃsitavānmama
मेरा पुत्र सदा तप में लगा रहता था, क्षमाशील, संयमी और जितेन्द्रिय था; चूँकि इन्द्र ने बिना किसी अपराध के मेरे पुत्र की हत्या की है,
श्लोक 58 (5.9.58)
तस्माच्छक्रविनाशाय वृत्रमुत्पादयाम्यहम् । लोकाः पश्यन्तु मे वीर्यं तपसश्च बलं महत् । स च पश्यतु देवेन्द्रो दुरात्मा पापचेतनः ॥
tasmācchakravināśāya vṛtramutpādayāmyaham | lokāḥ paśyantu me vīryaṃ tapasaśca balaṃ mahat | sa ca paśyatu devendro durātmā pāpacetanaḥ
इसलिए इन्द्र के विनाश के लिए मैं वृत्र को उत्पन्न करूँगा। संसार मेरा पराक्रम और मेरे तप का महान बल देखे, और वह दुष्टात्मा, पापबुद्धि देवेन्द्र भी इसे देखे।
शल्य उवाच
श्लोक 59 (5.9.59)
उपस्पृश्य ततः क्रुद्धस्तपस्वी सुमहायशाः । अग्नौ हुत्वा समुत्पाद्य घोरं वृत्रमुवाच ह ॥
upaspṛśya tataḥ kruddhastapasvī sumahāyaśāḥ | agnau hutvā samutpādya ghoraṃ vṛtramuvāca ha
तब उस क्रोधित, महायशस्वी तपस्वी ने आचमन करके अग्नि में आहुति दी, भयंकर वृत्र को उत्पन्न किया और उससे कहा:
श्लोक 60 (5.9.60)
इन्द्रशत्रो विवर्धस्व प्रभावात्तपसो मम । सोऽवर्धत दिवं स्तब्ध्वा सूर्यवैश्वानरोपमः ॥
indraśatro vivardhasva prabhāvāttapaso mama | so'vardhata divaṃ stabdhvā sūryavaiśvānaropamaḥ
"हे इन्द्रशत्रु, मेरे तप के प्रभाव से बढ़ो!" और वह सूर्य तथा वैश्वानर अग्नि के समान तेजस्वी होकर आकाश को थामे हुए बढ़ने लगा।
श्लोक 61 (5.9.61)
किं करोमीति चोवाच कालसूर्य इवोदितः । शक्रं जहीति चाप्युक्तो जगाम त्रिदिवं ततः ॥
kiṃ karomīti covāca kālasūrya ivoditaḥ | śakraṃ jahīti cāpyukto jagāma tridivaṃ tataḥ
प्रलयकाल के सूर्य के समान उदित होकर उसने पूछा, "मैं क्या करूँ?" उससे कहा गया, "इन्द्र को मार डालो", और वह स्वर्ग की ओर चल पड़ा।
श्लोक 62 (5.9.62)
ततो युद्धं समभवद्वृत्रवासवयोर्महत् । संक्रुद्धयोर्महाघोरं प्रसक्तं कुरुसत्तम ॥
tato yuddhaṃ samabhavadvṛtravāsavayormahat | saṃkruddhayormahāghoraṃ prasaktaṃ kurusattama
तब हे कुरुश्रेष्ठ, क्रोध से भरे वृत्र और इन्द्र के बीच महाभयंकर और लगातार चलने वाला महान युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 63 (5.9.63)
ततो जग्राह देवेन्द्रं वृत्रो वीरः शतक्रतुम् । अपावृत्याक्षिपद्वक्त्रे शक्रं कोपसमन्वितः ॥
tato jagrāha devendraṃ vṛtro vīraḥ śatakratum | apāvṛtyākṣipadvaktre śakraṃ kopasamanvitaḥ
तब वीर वृत्र ने देवराज शतक्रतु को पकड़ लिया और क्रोध में भरकर मुँह फैलाकर इन्द्र को उसमें डाल लिया।
श्लोक 64 (5.9.64)
ग्रस्ते वृत्रेण शक्रे तु संभ्रान्तास्त्रिदिवेश्वराः । असृजंस्ते महासत्त्वा जृम्भिकां वृत्रनाशिनीम् ॥
graste vṛtreṇa śakre tu saṃbhrāntāstridiveśvarāḥ | asṛjaṃste mahāsattvā jṛmbhikāṃ vṛtranāśinīm
वृत्र द्वारा इन्द्र के निगल लिए जाने पर स्वर्ग के अधिपति घबरा उठे; उन महाबली देवताओं ने वृत्र का नाश करने वाली जम्हाई की रचना की।
श्लोक 65 (5.9.65)
विजृम्भमाणस्य ततो वृत्रस्यास्यादपावृतात् । स्वान्यङ्गान्यभिसंक्षिप्य निष्क्रान्तो बलनाशनः ॥
vijṛmbhamāṇasya tato vṛtrasyāsyādapāvṛtāt | svānyaṅgānyabhisaṃkṣipya niṣkrānto balanāśanaḥ
जब वृत्र जम्हाई लेने लगा, तब बल का संहार करने वाले इन्द्र अपने अंगों को सिकोड़कर उसके खुले मुख से बाहर निकल आए।
श्लोक 66 (5.9.66)
ततः प्रभृति लोकस्य जृम्भिका प्राणिसंश्रिता । जहृषुश्च सुराः सर्वे शक्रं दृष्ट्वा विनिःसृतम् ॥
tataḥ prabhṛti lokasya jṛmbhikā prāṇisaṃśritā | jahṛṣuśca surāḥ sarve śakraṃ dṛṣṭvā viniḥsṛtam
तभी से जम्हाई संसार के प्राणियों में बसती है। इन्द्र को बाहर निकला देखकर सभी देवता हर्षित हुए।
श्लोक 67 (5.9.67)
ततः प्रववृते युद्धं वृत्रवासवयोः पुनः । संरब्धयोस्तदा घोरं सुचिरं भरतर्षभ ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ vṛtravāsavayoḥ punaḥ | saṃrabdhayostadā ghoraṃ suciraṃ bharatarṣabha
तब हे भरतश्रेष्ठ, क्रोध से भरे वृत्र और इन्द्र के बीच फिर से भयंकर और लंबा युद्ध होने लगा।
श्लोक 68 (5.9.68)
यदा व्यवर्धत रणे वृत्रो बलसमन्वितः । त्वष्टुस्तेजोबलाविद्धस्तदा शक्रो न्यवर्तत ॥
yadā vyavardhata raṇe vṛtro balasamanvitaḥ | tvaṣṭustejobalāviddhastadā śakro nyavartata
जब त्वष्टा के तेज और बल से भरा, शक्तिशाली वृत्र रण में बढ़ने लगा, तब इन्द्र पीछे हट गए।
श्लोक 69 (5.9.69)
निवृत्ते च तदा देवा विषादमगमन्परम् । समेत्य सह शक्रेण त्वष्टुस्तेजोविमोहिताः ॥
nivṛtte ca tadā devā viṣādamagamanparam | sametya saha śakreṇa tvaṣṭustejovimohitāḥ
उनके पीछे हटने पर देवता घोर विषाद में डूब गए। त्वष्टा के तेज से मोहित वे सब इन्द्र के साथ इकट्ठे हुए,
श्लोक 70 (5.9.70)
अमन्त्रयन्त ते सर्वे मुनिभिः सह भारत । किं कार्यमिति वै राजन्विचिन्त्य भयमोहिताः ॥
amantrayanta te sarve munibhiḥ saha bhārata | kiṃ kāryamiti vai rājanvicintya bhayamohitāḥ
और हे भारत, भय से विमूढ़ होकर उन सबने मुनियों के साथ मन्त्रणा की कि हे राजन्, अब क्या करना चाहिए।
श्लोक 71 (5.9.71)
जग्मुः सर्वे महात्मानं मनोभिर्विष्णुमव्ययम् । उपविष्टा मन्दराग्रे सर्वे वृत्रवधेप्सवः ॥
jagmuḥ sarve mahātmānaṃ manobhirviṣṇumavyayam | upaviṣṭā mandarāgre sarve vṛtravadhepsavaḥ
मन्दराचल के शिखर पर बैठे, वृत्र के वध की इच्छा रखने वाले वे सब मन ही मन महात्मा, अविनाशी विष्णु की शरण में गए।