उद्योग पर्व · अध्याय 33
निद्राहीन राजा और पण्डित के लक्षण
विदुर नीति, अध्याय 1 / 8
पाण्डवों के पास से संजय के लौटने के बाद नींद न आने पर धृतराष्ट्र रात में विदुर को बुलाकर उनसे परामर्श माँगते हैं। विदुर उन्हें युधिष्ठिर के न्यायसंगत अधिकार का स्मरण कराते हैं, फिर पण्डित और मूर्ख के लक्षण बताते हैं, और आगे एक से दस तक की संख्याओं में बँधी शिक्षाएँ देते हैं — क्षमा, सत्य, राजा के त्यागने योग्य व्यसन और जीवन के सुख। अंत में वे राजा से पाण्डवों को उनका राज्य-भाग लौटाने का आग्रह करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.33.1)
द्वाःस्थं प्राह महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो महीपतिः । विदुरं द्रष्टुमिच्छामि तमिहानय मा चिरम् ॥
dvāḥsthaṃ prāha mahāprājño dhṛtarāṣṭro mahīpatiḥ | viduraṃ draṣṭumicchāmi tamihānaya mā ciram
परम बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र ने द्वारपाल से कहा — "मैं विदुर से मिलना चाहता हूँ। उन्हें बिना देर किए यहाँ ले आओ।"
श्लोक 2 (5.33.2)
प्रहितो धृतराष्ट्रेण दूतः क्षत्तारमब्रवीत् । ईश्वरस्त्वां महाराजो महाप्राज्ञ दिदृक्षति ॥
prahito dhṛtarāṣṭreṇa dūtaḥ kṣattāramabravīt | īśvarastvāṃ mahārājo mahāprājña didṛkṣati
धृतराष्ट्र के भेजे हुए दूत ने विदुर से कहा — "हे महाबुद्धिमान, हमारे स्वामी महाराज आपसे मिलना चाहते हैं।"
श्लोक 3 (5.33.3)
एवमुक्तस्तु विदुरः प्राप्य राजनिवेशनम् । अब्रवीद्धृतराष्ट्राय द्वाःस्थं मां प्रतिवेदय ॥
evamuktastu viduraḥ prāpya rājaniveśanam | abravīddhṛtarāṣṭrāya dvāḥsthaṃ māṃ prativedaya
यह सुनकर विदुर राजभवन पहुँचे और द्वारपाल से बोले — "धृतराष्ट्र को मेरे आने की सूचना दो।"
द्वाःस्थ उवाच
श्लोक 4 (5.33.4)
विदुरोऽयमनुप्राप्तो राजेन्द्र तव शासनात् । द्रष्टुमिच्छति ते पादौ किं करोतु प्रशाधि माम् ॥
viduro'yamanuprāpto rājendra tava śāsanāt | draṣṭumicchati te pādau kiṃ karotu praśādhi mām
"हे राजेन्द्र, आपकी आज्ञा से विदुर आ गए हैं और आपके चरणों के दर्शन करना चाहते हैं। आज्ञा दीजिए, वे क्या करें?"
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 5 (5.33.5)
प्रवेशय महाप्रज्ञं विदुरं दीर्घदर्शिनम् । अहं हि विदुरस्यास्य नाकल्पो जातु दर्शने ॥
praveśaya mahāprajñaṃ viduraṃ dīrghadarśinam | ahaṃ hi vidurasyāsya nākalpo jātu darśane
"महाबुद्धिमान और दूरदर्शी विदुर को भीतर ले आओ। विदुर से मिलने में मुझे कभी कोई संकोच नहीं होता।"
द्वाःस्थ उवाच
श्लोक 6 (5.33.6)
प्रविशान्तःपुरं क्षत्तर्महाराजस्य धीमतः । न हि ते दर्शनेऽकल्पो जातु राजाऽब्रवीद्धि माम् ॥
praviśāntaḥpuraṃ kṣattarmahārājasya dhīmataḥ | na hi te darśane'kalpo jātu rājā'bravīddhi mām
"हे क्षत्ता, बुद्धिमान महाराज के अंतःपुर में प्रवेश कीजिए। राजा ने मुझसे कहा है कि आपसे मिलने में उन्हें कभी कोई संकोच नहीं होता।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (5.33.7)
ततः प्रविश्य विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम् । अब्रवीत्प्राञ्जलिर्वाक्यं चिन्तयानं नराधिपम् ॥
tataḥ praviśya viduro dhṛtarāṣṭraniveśanam | abravītprāñjalirvākyaṃ cintayānaṃ narādhipam
तब विदुर ने धृतराष्ट्र के भवन में प्रवेश किया और चिंता में डूबे राजा से हाथ जोड़कर कहा —
श्लोक 8 (5.33.8)
विदुरोऽहं महाप्राज्ञ संप्राप्तस्तव शासनात् । यदि किंचन कर्तव्यमयमस्मि प्रशाधि माम् ॥
viduro'haṃ mahāprājña saṃprāptastava śāsanāt | yadi kiṃcana kartavyamayamasmi praśādhi mām
"हे महाप्राज्ञ, मैं विदुर आपकी आज्ञा से आया हूँ। यदि कुछ करना हो तो मैं उपस्थित हूँ, मुझे आज्ञा दीजिए।"
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 9 (5.33.9)
सञ्जयो विदुर प्राप्तो गर्हयित्वा च मां गतः । अजातशत्रोः श्वो वाक्यं सभामध्ये स वक्ष्यति ॥
sañjayo vidura prāpto garhayitvā ca māṃ gataḥ | ajātaśatroḥ śvo vākyaṃ sabhāmadhye sa vakṣyati
"विदुर, संजय आया था और मेरी निंदा करके चला गया। कल वह भरी सभा में अजातशत्रु का संदेश सुनाएगा।"
श्लोक 10 (5.33.10)
तस्याद्य कुरुवीरस्य न विज्ञातं वचो मया । तन्मे दहति गात्राणि तदकार्षीत्प्रजागरम् ॥
tasyādya kuruvīrasya na vijñātaṃ vaco mayā | tanme dahati gātrāṇi tadakārṣītprajāgaram
"उस कुरुवीर का संदेश आज मैं जान नहीं पाया। यही बात मेरे अंगों को जला रही है और इसी ने मुझे जगाए रखा है।"
श्लोक 11 (5.33.11)
जाग्रतो दह्यमानस्य श्रेयो यदनुपश्यसि । तद्ब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलो ह्यसि ॥
jāgrato dahyamānasya śreyo yadanupaśyasi | tadbrūhi tvaṃ hi nastāta dharmārthakuśalo hyasi
"मैं जागता हुआ जल रहा हूँ। तुम्हें मेरे लिए जो कल्याणकारी दिखता हो, वह बताओ, तात; तुम धर्म और अर्थ दोनों में निपुण हो।"
श्लोक 12 (5.33.12)
यतः प्राप्तः सञ्जयः पाण्डवेभ्यो । न मे यथावन्मनसः प्रशान्तिः । सर्वेन्द्रियाण्यप्रकृतिं गतानि । किं वक्ष्यतीत्येव मेऽद्य प्रचिन्ता ॥
yataḥ prāptaḥ sañjayaḥ pāṇḍavebhyo | na me yathāvanmanasaḥ praśāntiḥ | sarvendriyāṇyaprakṛtiṃ gatāni | kiṃ vakṣyatītyeva me'dya pracintā
"जब से संजय पाण्डवों के पास से लौटा है, मेरे मन को ठीक से शांति नहीं मिली। मेरी सारी इन्द्रियाँ अपनी स्वाभाविक दशा खो बैठी हैं। आज मुझे बस यही चिंता है कि वह क्या कहेगा।"
श्लोक 13 (5.33.13)
तन्मे ब्रूहि विदुर त्वं यथाव- । न्मनीषितं सर्वमजातशत्रोः । यथा च नस्तात हितं भवेच्च । प्रजाश्च सर्वाः सुखिता भवेयुः ॥
tanme brūhi vidura tvaṃ yathāva- | nmanīṣitaṃ sarvamajātaśatroḥ | yathā ca nastāta hitaṃ bhavecca | prajāśca sarvāḥ sukhitā bhaveyuḥ
"इसलिए विदुर, मुझे ठीक-ठीक बताओ कि अजातशत्रु के मन में क्या है, और तात, किस प्रकार हमारा भला हो और सारी प्रजा सुखी रहे।"
विदुर उवाच
श्लोक 14 (5.33.14)
अभियुक्तं बलवता दुर्बलं हीनसाधनम् । हृतस्वं कामिनं चोरमाविशन्ति प्रजागराः ॥
abhiyuktaṃ balavatā durbalaṃ hīnasādhanam | hṛtasvaṃ kāminaṃ coramāviśanti prajāgarāḥ
"जिस दुर्बल और साधनहीन व्यक्ति पर किसी बलवान ने आक्रमण किया हो, जिसका धन छिन गया हो, जो कामी हो और जो चोर हो — इन्हीं को अनिद्रा घेरती है।"
श्लोक 15 (5.33.15)
कच्चिदेतैर्महादोषैर्न स्पृष्टोऽसि नराधिप । कच्चिच्च परवित्तेषु गृद्ध्यन्न परितप्यसे ॥
kaccidetairmahādoṣairna spṛṣṭo'si narādhipa | kaccicca paravitteṣu gṛddhyanna paritapyase
"हे नरेश, आशा है इन बड़े दोषों में से किसी ने आपको नहीं छुआ है, और आप दूसरों के धन का लोभ करते हुए संताप में नहीं जल रहे।"
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 16 (5.33.16)
श्रोतुमिच्छामि ते धर्म्यं परं नैश्रेयसं वचः । अस्मिन्राजर्षिवंशे हि त्वमेकः प्राज्ञसंमतः ॥
śrotumicchāmi te dharmyaṃ paraṃ naiśreyasaṃ vacaḥ | asminrājarṣivaṃśe hi tvamekaḥ prājñasaṃmataḥ
"मैं तुमसे धर्मसम्मत और परम कल्याणकारी वचन सुनना चाहता हूँ। राजर्षियों के इस वंश में केवल तुम्हीं को ज्ञानीजन बुद्धिमान मानते हैं।"
विदुर उवाच
श्लोक 17 (5.33.17)
राजा लक्षणसंपन्नस्त्रैलोक्यस्याधिपो भवेत् । प्रेष्यस्ते प्रेषितश्चैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिरः ॥
rājā lakṣaṇasaṃpannastrailokyasyādhipo bhavet | preṣyaste preṣitaścaiva dhṛtarāṣṭra yudhiṣṭhiraḥ
"हे धृतराष्ट्र, राजा के सभी लक्षणों से युक्त युधिष्ठिर तीनों लोकों के स्वामी बनने योग्य हैं। वे आपके आज्ञाकारी सेवक हैं, फिर भी आपने उन्हें दूर भेज दिया।"
श्लोक 18 (5.33.18)
विपरीततरश्च त्वं भागधेये न संमतः । अर्चिषां प्रक्षयाच्चैव धर्मात्मा धर्मकोविदः ॥
viparītataraśca tvaṃ bhāgadheye na saṃmataḥ | arciṣāṃ prakṣayāccaiva dharmātmā dharmakovidaḥ
"आप उनसे बिल्कुल विपरीत हैं। धर्मात्मा और धर्म के ज्ञाता होते हुए भी, नेत्रों की ज्योति न होने के कारण आप राज्य के उत्तराधिकारी नहीं माने गए।"
श्लोक 19 (5.33.19)
आनृशंस्यादनुक्रोशाद्धर्मात्सत्यात्पराक्रमात् । गुरुत्वात्त्वयि संप्रेक्ष्य बहून्क्लेशांस्तितिक्षते ॥
ānṛśaṃsyādanukrośāddharmātsatyātparākramāt | gurutvāttvayi saṃprekṣya bahūnkleśāṃstitikṣate
"अपनी कोमलता, करुणा, धर्म, सत्य और पराक्रम के कारण, तथा आपको बड़ा मानकर आपकी ओर देखते हुए, वे बहुत-से कष्ट सहते आ रहे हैं।"
श्लोक 20 (5.33.20)
दुर्योधने सौबले च कर्णे दुःशासने तथा । एतेष्वैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि ॥
duryodhane saubale ca karṇe duḥśāsane tathā | eteṣvaiśvaryamādhāya kathaṃ tvaṃ bhūtimicchasi
"दुर्योधन, सुबलपुत्र शकुनि, कर्ण और दुःशासन — इनके हाथों में ऐश्वर्य सौंपकर आप कल्याण की आशा कैसे करते हैं?"
श्लोक 21 (5.33.21)
आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता । यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥
ātmajñānaṃ samārambhastitikṣā dharmanityatā | yamarthānnāpakarṣanti sa vai paṇḍita ucyate
"जिसके पास आत्मज्ञान, कार्य आरम्भ करने का उत्साह, सहनशीलता और धर्म में निरंतर निष्ठा है, और जो अपने सच्चे लक्ष्यों से कभी विचलित नहीं होता, वही पण्डित कहलाता है।"
श्लोक 22 (5.33.22)
एकस्माद्वृक्षाद्यज्ञपात्राणि राज- । न्स्रुक्च द्रोणी पेठनीपीडने च । एतस्माद्राजन्ब्रुवतो मे निबोध । एकस्माद्वै जायतेऽसच्च सच्च ॥
ekasmādvṛkṣādyajñapātrāṇi rāja- | nsrukca droṇī peṭhanīpīḍane ca | etasmādrājanbruvato me nibodha | ekasmādvai jāyate'sacca sacca
"हे राजन्, एक ही वृक्ष से यज्ञ के पात्र, जैसे स्रुक्, भी बनते हैं और कठौती तथा कूटने-पीसने के साधन भी। हे राजन्, मेरी बात समझिए: एक ही स्रोत से बुरा और भला दोनों उत्पन्न होते हैं।"
श्लोक 23 (5.33.23)
निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते । अनास्तिकः श्रद्दधान एतत्पण्डितलक्षणम् ॥
niṣevate praśastāni ninditāni na sevate | anāstikaḥ śraddadhāna etatpaṇḍitalakṣaṇam
"जो प्रशंसनीय कर्मों का आचरण करता है, निंदनीय कर्मों से दूर रहता है, नास्तिक नहीं है और श्रद्धावान है — ये पण्डित के लक्षण हैं।"
श्लोक 24 (5.33.24)
क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता । यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥
krodho harṣaśca darpaśca hrīḥ stambho mānyamānitā | yamarthānnāpakarṣanti sa vai paṇḍita ucyate
"क्रोध, हर्ष, दर्प, लज्जा, अकड़ और अपने को बड़ा मानने का अभिमान — ये जिसे अपने लक्ष्यों से विचलित नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है।"
श्लोक 25 (5.33.25)
यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे । कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥
yasya kṛtyaṃ na jānanti mantraṃ vā mantritaṃ pare | kṛtamevāsya jānanti sa vai paṇḍita ucyate
"जिसके करने योग्य कार्य, उसकी मंत्रणा या उसके निश्चय को दूसरे नहीं जान पाते, बल्कि काम पूरा हो जाने पर ही जानते हैं, वही पण्डित कहलाता है।"
श्लोक 26 (5.33.26)
यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः । समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते ॥
yasya kṛtyaṃ na vighnanti śītamuṣṇaṃ bhayaṃ ratiḥ | samṛddhirasamṛddhirvā sa vai paṇḍita ucyate
"सर्दी या गर्मी, भय या आसक्ति, समृद्धि या अभाव — ये जिसके कार्य में बाधा नहीं डालते, वही पण्डित कहलाता है।"
श्लोक 27 (5.33.27)
यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्तते । कामादर्थं वृणीते यः स वै पण्डित उच्यते ॥
yasya saṃsāriṇī prajñā dharmārthāvanuvartate | kāmādarthaṃ vṛṇīte yaḥ sa vai paṇḍita ucyate
"जिसकी बुद्धि संसार के व्यवहार में धर्म और अर्थ का अनुसरण करती है, और जो भोग की अपेक्षा सार्थक प्रयोजन को चुनता है, वही पण्डित कहलाता है।"
श्लोक 28 (5.33.28)
यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते । न किंचिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः ॥
yathāśakti cikīrṣanti yathāśakti ca kurvate | na kiṃcidavamanyante narāḥ paṇḍitabuddhayaḥ
"बुद्धिमान लोग अपनी शक्ति के अनुसार ही करने की इच्छा रखते हैं और शक्ति के अनुसार ही करते हैं; वे किसी को भी तुच्छ नहीं समझते।"
श्लोक 29 (5.33.29)
क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति । विज्ञाय चार्थं भजते न कामात् । नासंपृष्टो ह्युपयुङ्क्ते परार्थे । तत्प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य ॥
kṣipraṃ vijānāti ciraṃ śṛṇoti | vijñāya cārthaṃ bhajate na kāmāt | nāsaṃpṛṣṭo hyupayuṅkte parārthe | tatprajñānaṃ prathamaṃ paṇḍitasya
"वह बात शीघ्र समझ लेता है, देर तक धैर्य से सुनता है, विषय को समझकर ही उस पर चलता है, कामना से नहीं, और बिना पूछे दूसरों के मामलों में नहीं पड़ता। यही पण्डित की बुद्धि का प्रथम लक्षण है।"
श्लोक 30 (5.33.30)
नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम् । आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः ॥
nāprāpyamabhivāñchanti naṣṭaṃ necchanti śocitum | āpatsu ca na muhyanti narāḥ paṇḍitabuddhayaḥ
"बुद्धिमान लोग अप्राप्य वस्तु की कामना नहीं करते, खोई हुई वस्तु पर शोक नहीं करना चाहते और विपत्ति में मोहित नहीं होते।"
श्लोक 31 (5.33.31)
निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः । अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते ॥
niścitya yaḥ prakramate nāntarvasati karmaṇaḥ | avandhyakālo vaśyātmā sa vai paṇḍita ucyate
"जो निश्चय करके ही कार्य आरम्भ करता है, काम को बीच में नहीं छोड़ता, समय व्यर्थ नहीं जाने देता और मन को वश में रखता है, वही पण्डित कहलाता है।"
श्लोक 32 (5.33.32)
आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते । हितं च नाभ्यसूयन्ति पण्डिता भरतर्षभ ॥
āryakarmaṇi rajyante bhūtikarmāṇi kurvate | hitaṃ ca nābhyasūyanti paṇḍitā bharatarṣabha
"हे भरतश्रेष्ठ, पण्डित श्रेष्ठ कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति देने वाले कार्य करते हैं और हितकारी बातों में दोष नहीं ढूँढते।"
श्लोक 33 (5.33.33)
न हृष्यत्यात्मसंमाने नावमानेन तप्यते । गाङ्गो ह्रद इवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ॥
na hṛṣyatyātmasaṃmāne nāvamānena tapyate | gāṅgo hrada ivākṣobhyo yaḥ sa paṇḍita ucyate
"जो सम्मान पाकर फूलता नहीं और अपमान से दुखी नहीं होता, जो गंगा के गहरे कुंड की भाँति अक्षुब्ध रहता है, वही पण्डित कहलाता है।"
श्लोक 34 (5.33.34)
तत्त्वज्ञः सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम् । उपायज्ञो मनुष्याणां नरः पण्डित उच्यते ॥
tattvajñaḥ sarvabhūtānāṃ yogajñaḥ sarvakarmaṇām | upāyajño manuṣyāṇāṃ naraḥ paṇḍita ucyate
"जो सभी प्राणियों के तत्त्व को जानता है, सब कर्मों की युक्ति जानता है और मनुष्यों से व्यवहार के उपाय जानता है, वही पण्डित कहलाता है।"
श्लोक 35 (5.33.35)
प्रवृत्तवाक् चित्रकथ ऊहवान्प्रतिभानवान् । आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पण्डित उच्यते ॥
pravṛttavāk citrakatha ūhavānpratibhānavān | āśu granthasya vaktā ca yaḥ sa paṇḍita ucyate
"जो धाराप्रवाह बोलता है, विविध विषयों पर रोचक चर्चा कर सकता है, तर्क में कुशल और प्रत्युत्पन्नमति है, और ग्रन्थ का अर्थ शीघ्र बता सकता है, वही पण्डित कहलाता है।"
श्लोक 36 (5.33.36)
श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा । असंभिन्नार्यमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः ॥
śrutaṃ prajñānugaṃ yasya prajñā caiva śrutānugā | asaṃbhinnāryamaryādaḥ paṇḍitākhyāṃ labheta saḥ
"जिसकी विद्या बुद्धि के अनुसार चलती है और बुद्धि विद्या के अनुसार, और जो श्रेष्ठ जनों की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, वही पण्डित की उपाधि पाता है।"
श्लोक 37 (5.33.37)
अर्थं महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव च । विचरत्यसमुन्नद्धो यः स पण्डित उच्यते ॥
arthaṃ mahāntamāsādya vidyāmaiśvaryameva ca | vicaratyasamunnaddho yaḥ sa paṇḍita ucyate
"जो बड़ा धन, विद्या और ऐश्वर्य पाकर भी अहंकार के बिना विचरता है, वही पण्डित कहलाता है।"
श्लोक 38 (5.33.38)
अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः । अर्थांश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः ॥
aśrutaśca samunnaddho daridraśca mahāmanāḥ | arthāṃścākarmaṇā prepsurmūḍha ityucyate budhaiḥ
"जो विद्याहीन होकर भी घमंड करता है, दरिद्र होकर भी ऊँचे मनसूबे बाँधता है और बिना कर्म किए धन पाना चाहता है, उसे बुद्धिमान लोग मूर्ख कहते हैं।"
श्लोक 39 (5.33.39)
स्वमर्थं यः परित्यज्य परार्थमनुतिष्ठति । मिथ्या चरति मित्रार्थे यश्च मूढः स उच्यते ॥
svamarthaṃ yaḥ parityajya parārthamanutiṣṭhati | mithyā carati mitrārthe yaśca mūḍhaḥ sa ucyate
"जो अपना काम छोड़कर दूसरों के काम में लगा रहता है और मित्रों के मामले में झूठा आचरण करता है, वह मूर्ख कहलाता है।"
श्लोक 40 (5.33.40)
अकामान्कामयति यः कामयानान्परित्यजेत् । बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मूढचेतसम् ॥
akāmānkāmayati yaḥ kāmayānānparityajet | balavantaṃ ca yo dveṣṭi tamāhurmūḍhacetasam
"जो न चाहने वालों को चाहता है, चाहने वालों को त्याग देता है और बलवान से बैर रखता है, उसे मूढ़ बुद्धि वाला कहते हैं।"
श्लोक 41 (5.33.41)
अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च । कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम् ॥
amitraṃ kurute mitraṃ mitraṃ dveṣṭi hinasti ca | karma cārabhate duṣṭaṃ tamāhurmūḍhacetasam
"जो शत्रु को मित्र बनाता है, मित्र से द्वेष करता और उसे हानि पहुँचाता है, तथा बुरे कर्म आरम्भ करता है, उसे मूढ़ बुद्धि वाला कहते हैं।"
श्लोक 42 (5.33.42)
संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते । चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ ॥
saṃsārayati kṛtyāni sarvatra vicikitsate | ciraṃ karoti kṣiprārthe sa mūḍho bharatarṣabha
"हे भरतश्रेष्ठ, जो अपने कामों को टालता और फैलाता रहता है, हर बात में संदेह करता है और शीघ्र करने योग्य काम में देर लगाता है, वह मूर्ख है।"
श्लोक 43 (5.33.43)
श्राद्धं पितृभ्यो न ददाति दैवतानि न चार्चति । सुहृन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूढचेतसम् ॥
śrāddhaṃ pitṛbhyo na dadāti daivatāni na cārcati | suhṛnmitraṃ na labhate tamāhurmūḍhacetasam
"जो पितरों का श्राद्ध नहीं करता, देवताओं की पूजा नहीं करता और जिसे कोई हितैषी मित्र नहीं मिलता, उसे मूढ़ बुद्धि वाला कहते हैं।"
श्लोक 44 (5.33.44)
अनाहूतः प्रविशति ह्यपृष्टो बहु भाषते । अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥
anāhūtaḥ praviśati hyapṛṣṭo bahu bhāṣate | aviśvaste viśvasiti mūḍhacetā narādhamaḥ
"जो बिना बुलाए भीतर चला आता है, बिना पूछे बहुत बोलता है और अविश्वसनीय पर विश्वास कर लेता है, वह मूढ़ बुद्धि वाला मनुष्य अधम है।"
श्लोक 45 (5.33.45)
परं क्षिपति दोषेण वर्तमानः स्वयं तथा । यश्च क्रुध्यत्यनीशानः स च मूढतमो नरः ॥
paraṃ kṣipati doṣeṇa vartamānaḥ svayaṃ tathā | yaśca krudhyatyanīśānaḥ sa ca mūḍhatamo naraḥ
"जो स्वयं वही दोष करते हुए दूसरों पर उसका आरोप लगाता है, और असमर्थ होकर भी क्रोध करता है, वह सबसे बड़ा मूर्ख है।"
श्लोक 46 (5.33.46)
आत्मनो बलमाज्ञाय धर्मार्थपरिवर्जितम् । अलभ्यमिच्छन्नैष्कर्म्यान्मूढबुद्धिरिहोच्यते ॥
ātmano balamājñāya dharmārthaparivarjitam | alabhyamicchannaiṣkarmyānmūḍhabuddhirihocyate
"जो अपनी शक्ति को परखे बिना, धर्म और अर्थ के विरुद्ध अप्राप्य वस्तु को बिना परिश्रम के पाना चाहता है, वह इस संसार में मूढ़ बुद्धि कहलाता है।"
श्लोक 47 (5.33.47)
अशिष्यं शास्ति यो राजन्यश्च शिष्यं न शास्ति च । कदर्यं भजते यश्च तमाहुर्मूढचेतसम् ॥
aśiṣyaṃ śāsti yo rājanyaśca śiṣyaṃ na śāsti ca | kadaryaṃ bhajate yaśca tamāhurmūḍhacetasam
"हे राजन्, जो अयोग्य को उपदेश देता है, सिखाने योग्य को नहीं सिखाता, और कंजूस की सेवा करता है, उसे मूढ़ बुद्धि वाला कहते हैं।"
श्लोक 48 (5.33.48)
एकः संपन्नमाश्नाति वस्ते वासश्च शोभनम् । योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसतरस्ततः ॥
ekaḥ saṃpannamāśnāti vaste vāsaśca śobhanam | yo'saṃvibhajya bhṛtyebhyaḥ ko nṛśaṃsatarastataḥ
"जो अपने आश्रितों में बाँटे बिना अकेले ही उत्तम भोजन करता है और सुंदर वस्त्र पहनता है, उससे बढ़कर क्रूर कौन है?"
श्लोक 49 (5.33.49)
एकः पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजनः । भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते ॥
ekaḥ pāpāni kurute phalaṃ bhuṅkte mahājanaḥ | bhoktāro vipramucyante kartā doṣeṇa lipyate
"एक व्यक्ति पाप करता है और उसका फल बहुत-से लोग भोगते हैं; भोगने वाले तो छूट जाते हैं, पर दोष केवल करने वाले को लगता है।"
श्लोक 50 (5.33.50)
एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता । बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद्राष्ट्रं सराजकम् ॥
ekaṃ hanyānna vā hanyādiṣurmukto dhanuṣmatā | buddhirbuddhimatotsṛṣṭā hanyādrāṣṭraṃ sarājakam
"धनुर्धर का छोड़ा हुआ बाण एक व्यक्ति को मारे या न भी मारे, पर बुद्धिमान की चलाई हुई बुद्धि राजा सहित पूरे राष्ट्र का नाश कर सकती है।"
श्लोक 51 (5.33.51)
एकया द्वे विनिश्चित्य त्रींश्चतुर्भिर्वशे कुरु । पञ्च जित्वा विदित्वा षट् सप्त हित्वा सुखी भव ॥
ekayā dve viniścitya trīṃścaturbhirvaśe kuru | pañca jitvā viditvā ṣaṭ sapta hitvā sukhī bhava
"एक (बुद्धि) से दो (कर्तव्य और अकर्तव्य) का निश्चय करो, चार (साम, दान, भेद और दंड) से तीन (मित्र, उदासीन और शत्रु) को वश में करो; पाँच (इन्द्रियों) को जीतकर, छः (राजनीति के गुणों) को जानकर और सात (व्यसनों) को त्यागकर सुखी हो जाओ।"
श्लोक 52 (5.33.52)
एकं विषरसो हन्ति शस्त्रेणैकश्च वध्यते । सराष्ट्रं सप्रजं हन्ति राजानं मन्त्रविस्रवः ॥
ekaṃ viṣaraso hanti śastreṇaikaśca vadhyate | sarāṣṭraṃ saprajaṃ hanti rājānaṃ mantravisravaḥ
"विष का रस एक को मारता है, शस्त्र से एक ही व्यक्ति मारा जाता है, पर गुप्त मंत्रणा का भेद खुल जाना राजा को राष्ट्र और प्रजा सहित नष्ट कर देता है।"
श्लोक 53 (5.33.53)
एकः स्वादु न भुञ्जीत एकश्चार्थान्न चिन्तयेत् । एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जागृयात् ॥
ekaḥ svādu na bhuñjīta ekaścārthānna cintayet | eko na gacchedadhvānaṃ naikaḥ supteṣu jāgṛyāt
"स्वादिष्ट भोजन अकेले न करे, अकेले किसी विषय पर निर्णय न करे, अकेले मार्ग पर न चले और सोए हुए लोगों के बीच अकेला न जागे।"
श्लोक 54 (5.33.54)
एकमेवाद्वितीयं तद्यद्राजन्नावबुध्यसे । सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव ॥
ekamevādvitīyaṃ tadyadrājannāvabudhyase | satyaṃ svargasya sopānaṃ pārāvārasya nauriva
"हे राजन्, जिसे आप नहीं समझ रहे, वह एक ही है, उसका कोई दूसरा नहीं — सत्य स्वर्ग की सीढ़ी है, जैसे समुद्र पार करने के लिए नाव।"
श्लोक 55 (5.33.55)
एकः क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते । यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः ॥
ekaḥ kṣamāvatāṃ doṣo dvitīyo nopapadyate | yadenaṃ kṣamayā yuktamaśaktaṃ manyate janaḥ
"क्षमाशील लोगों में एक ही दोष है, दूसरा कोई नहीं — कि लोग क्षमाशील व्यक्ति को असमर्थ समझ लेते हैं।"
श्लोक 56 (5.33.56)
सोऽस्य दोषो न मन्तव्यः क्षमा हि परमं बलम् । क्षमा गुणो ह्यशक्तानां शक्तानां भूषणं क्षमा ॥
so'sya doṣo na mantavyaḥ kṣamā hi paramaṃ balam | kṣamā guṇo hyaśaktānāṃ śaktānāṃ bhūṣaṇaṃ kṣamā
"इसे उसका दोष नहीं मानना चाहिए, क्योंकि क्षमा ही सबसे बड़ा बल है। असमर्थों के लिए क्षमा गुण है और समर्थों के लिए आभूषण।"
श्लोक 57 (5.33.57)
क्षमा वशीकृतिर्लोके क्षमया किं न साध्यते । शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः ॥
kṣamā vaśīkṛtirloke kṣamayā kiṃ na sādhyate | śāntikhaḍgaḥ kare yasya kiṃ kariṣyati durjanaḥ
"क्षमा संसार को वश में कर लेती है; क्षमा से क्या सिद्ध नहीं होता? जिसके हाथ में शांति की तलवार है, दुष्ट उसका क्या बिगाड़ लेगा?"
श्लोक 58 (5.33.58)
अतृणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति । अक्षमावान्परं दोषैरात्मानं चैव योजयेत् ॥
atṛṇe patito vahniḥ svayamevopaśāmyati | akṣamāvānparaṃ doṣairātmānaṃ caiva yojayet
"घास रहित भूमि पर गिरी आग अपने-आप बुझ जाती है। क्षमाहीन व्यक्ति दूसरों को और स्वयं को भी दोषों में फँसा देता है।"
श्लोक 59 (5.33.59)
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा । विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा ॥
eko dharmaḥ paraṃ śreyaḥ kṣamaikā śāntiruttamā | vidyaikā paramā tṛptirahiṃsaikā sukhāvahā
"एकमात्र धर्म ही परम कल्याण है, एकमात्र क्षमा ही उत्तम शांति है, एकमात्र विद्या ही परम तृप्ति है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देने वाली है।"
श्लोक 60 (5.33.60)
द्वाविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलशयानिव । राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥
dvāvimau grasate bhūmiḥ sarpo bilaśayāniva | rājānaṃ cāviroddhāraṃ brāhmaṇaṃ cāpravāsinam
"जैसे साँप बिल में रहने वाले जीवों को निगल जाता है, वैसे ही पृथ्वी इन दो को निगल जाती है — युद्ध न करने वाले राजा को और घर से बाहर न निकलने वाले ब्राह्मण को।"
श्लोक 61 (5.33.61)
द्वे कर्मणी नरः कुर्वन्नस्मिँल्लोके विरोचते । अब्रुवन्परुषं किंचिदसतोऽनर्चयंस्तथा ॥
dve karmaṇī naraḥ kurvannasmim̐lloke virocate | abruvanparuṣaṃ kiṃcidasato'narcayaṃstathā
"दो काम करने वाला मनुष्य इस संसार में शोभा पाता है — कोई कठोर वचन न बोलना और दुष्टों का आदर न करना।"
श्लोक 62 (5.33.62)
द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र परप्रत्ययकारिणौ । स्त्रियः कामितकामिन्यो मूर्खाः पूजितपूजकाः ॥
dvāvimau puruṣavyāghra parapratyayakāriṇau | striyaḥ kāmitakāminyo mūrkhāḥ pūjitapūjakāḥ
"हे पुरुषसिंह, ये दो दूसरों के भरोसे चलते हैं — दूसरों द्वारा चाहे गए को चाहने वाली स्त्रियाँ, और दूसरों द्वारा पूजे गए को पूजने वाले मूर्ख।"
श्लोक 63 (5.33.63)
द्वाविमौ कण्टकौ तीक्ष्णौ शरीरपरिशोषिणौ । यश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यत्यनीश्वरः ॥
dvāvimau kaṇṭakau tīkṣṇau śarīrapariśoṣiṇau | yaścādhanaḥ kāmayate yaśca kupyatyanīśvaraḥ
"ये दो तीखे काँटे शरीर को सुखा डालते हैं — निर्धन होकर कामनाएँ करने वाला और असमर्थ होकर क्रोध करने वाला।"
श्लोक 64 (5.33.64)
द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा । गृहस्थश्च निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः ॥
dvāveva na virājete viparītena karmaṇā | gṛhasthaśca nirārambhaḥ kāryavāṃścaiva bhikṣukaḥ
"दो अपने विपरीत आचरण के कारण शोभा नहीं पाते — कोई काम न करने वाला गृहस्थ और सांसारिक कामों में उलझा संन्यासी।"
श्लोक 65 (5.33.65)
द्वाविमौ पुरुषौ राजन्स्वर्गस्योपरि तिष्ठतः । प्रभुश्च क्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान् ॥
dvāvimau puruṣau rājansvargasyopari tiṣṭhataḥ | prabhuśca kṣamayā yukto daridraśca pradānavān
"हे राजन्, ये दो पुरुष स्वर्ग से भी ऊपर स्थान पाते हैं — क्षमाशील समर्थ व्यक्ति और दान देने वाला निर्धन।"
श्लोक 66 (5.33.66)
न्यायागतस्य द्रव्यस्य बोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ । अपात्रे प्रतिपत्तिश्च पात्रे चाप्रतिपादनम् ॥
nyāyāgatasya dravyasya boddhavyau dvāvatikramau | apātre pratipattiśca pātre cāpratipādanam
"न्याय से अर्जित धन के दो दुरुपयोग समझने चाहिए — अपात्र को देना और सुपात्र को न देना।"
श्लोक 67 (5.33.67)
द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् । धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम् ॥
dvāvambhasi niveṣṭavyau gale baddhvā dṛḍhāṃ śilām | dhanavantamadātāraṃ daridraṃ cātapasvinam
"इन दो को गले में भारी पत्थर कसकर बाँधकर पानी में डुबो देना चाहिए — दान न देने वाला धनवान और तप न करने वाला निर्धन।"
श्लोक 68 (5.33.68)
द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र सूर्यमण्डलभेदिनौ । परिव्राड्योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः ॥
dvāvimau puruṣavyāghra sūryamaṇḍalabhedinau | parivrāḍyogayuktaśca raṇe cābhimukho hataḥ
"हे पुरुषसिंह, ये दो सूर्यमण्डल को भेदकर ऊपर जाते हैं — योग में लीन संन्यासी और युद्ध में सामने लड़ते हुए मारा गया वीर।"
श्लोक 69 (5.33.69)
त्रयो न्याया मनुष्याणां श्रूयन्ते भरतर्षभ । कनीयान्मध्यमः श्रेष्ठ इति वेदविदो विदुः ॥
trayo nyāyā manuṣyāṇāṃ śrūyante bharatarṣabha | kanīyānmadhyamaḥ śreṣṭha iti vedavido viduḥ
"हे भरतश्रेष्ठ, मनुष्यों के लिए तीन प्रकार के उपाय बताए गए हैं — निम्न, मध्यम और श्रेष्ठ; वेदों के ज्ञाता ऐसा कहते हैं।"
श्लोक 70 (5.33.70)
त्रिविधाः पुरुषा राजन्नुत्तमाधममध्यमाः । नियोजयेद्यथावत्तांस्त्रिविधेष्वेव कर्मसु ॥
trividhāḥ puruṣā rājannuttamādhamamadhyamāḥ | niyojayedyathāvattāṃstrividheṣveva karmasu
"हे राजन्, पुरुष तीन प्रकार के होते हैं — उत्तम, अधम और मध्यम। उन्हें उनके योग्य तीन प्रकार के कामों में ही लगाना चाहिए।"
श्लोक 71 (5.33.71)
त्रय एवाधना राजन्भार्या दासस्तथा सुतः । यत्ते समधिगच्छन्ति यस्यैते तस्य तद्धनम् ॥
traya evādhanā rājanbhāryā dāsastathā sutaḥ | yatte samadhigacchanti yasyaite tasya taddhanam
"हे राजन्, ये तीन धन के स्वामी नहीं होते — पत्नी, दास और पुत्र। वे जो कुछ कमाते हैं, वह उसी का होता है जिसके वे अधीन हैं।"
श्लोक 72 (5.33.72)
हरणं च परस्वानां परदाराभिमर्शनम् । सुहृदश्च परित्यागस्त्रयो दोषाः क्षयावहाः ॥
haraṇaṃ ca parasvānāṃ paradārābhimarśanam | suhṛdaśca parityāgastrayo doṣāḥ kṣayāvahāḥ
"पराया धन हरना, पराई स्त्री का स्पर्श करना और मित्र का साथ छोड़ना — ये तीन दोष विनाश लाते हैं।"
श्लोक 73 (5.33.73)
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥
trividhaṃ narakasyedaṃ dvāraṃ nāśanamātmanaḥ | kāmaḥ krodhastathā lobhastasmādetattrayaṃ tyajet
"काम, क्रोध और लोभ — यह आत्मा का नाश करने वाला नरक का तीन प्रकार का द्वार है; इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।"
श्लोक 74 (5.33.74)
वरप्रदानं राज्यं च पुत्रजन्म च भारत । शत्रोश्च मोक्षणं कृच्छ्रात्त्रीणि चैकं च तत्समम् ॥
varapradānaṃ rājyaṃ ca putrajanma ca bhārata | śatrośca mokṣaṇaṃ kṛcchrāttrīṇi caikaṃ ca tatsamam
"हे भारत, वरदान पाना, राज्य मिलना और पुत्र का जन्म — ये तीन एक ओर, और शत्रु को संकट से छुड़ाना अकेला ही इन तीनों के बराबर है।"
श्लोक 75 (5.33.75)
भक्तं च भजमानं च तवास्मीति च वादिनम् । त्रीनेताञ्छरणं प्राप्तान्विषमेऽपि न सन्त्यजेत् ॥
bhaktaṃ ca bhajamānaṃ ca tavāsmīti ca vādinam | trīnetāñcharaṇaṃ prāptānviṣame'pi na santyajet
"भक्त, सेवा करने वाला और 'मैं आपका हूँ' कहने वाला — ये तीन जब शरण में आएँ, तो संकट में भी इन्हें नहीं त्यागना चाहिए।"
श्लोक 76 (5.33.76)
चत्वारि राज्ञा तु महाबलेन । वर्ज्यान्याहुः पण्डितस्तानि विद्यात् । अल्पप्रज्ञैः सह मन्त्रं न कुर्या- । न्न दीर्घसूत्रैरलसैश्चारणैश्च ॥
catvāri rājñā tu mahābalena | varjyānyāhuḥ paṇḍitastāni vidyāt | alpaprajñaiḥ saha mantraṃ na kuryā- | nna dīrghasūtrairalasaiścāraṇaiśca
"कहा गया है कि महाबली राजा को चार बातों से बचना चाहिए, और बुद्धिमान को इन्हें जानना चाहिए — अल्पबुद्धि, काम टालने वाले, आलसी और चाटुकार लोगों के साथ मंत्रणा नहीं करनी चाहिए।"
श्लोक 77 (5.33.77)
चत्वारि ते तात गृहे वसन्तु । श्रियाऽभिजुष्टस्य गृहस्थधर्मे । वृद्धो ज्ञातिरवसन्नः कुलीनः । सखा दरिद्रो भगिनी चानपत्या ॥
catvāri te tāta gṛhe vasantu | śriyā'bhijuṣṭasya gṛhasthadharme | vṛddho jñātiravasannaḥ kulīnaḥ | sakhā daridro bhaginī cānapatyā
"हे तात, लक्ष्मी से सम्पन्न होकर गृहस्थ-धर्म निभाते हुए आपके घर में ये चार रहें — वृद्ध कुटुम्बी, विपत्ति में पड़ा कुलीन व्यक्ति, निर्धन मित्र और संतानहीन बहन।"
श्लोक 78 (5.33.78)
चत्वार्याह महाराज साद्यस्कानि बृहस्पतिः । पृच्छते त्रिदशेन्द्राय तानीमानि निबोध मे ॥
catvāryāha mahārāja sādyaskāni bṛhaspatiḥ | pṛcchate tridaśendrāya tānīmāni nibodha me
"हे महाराज, देवराज इन्द्र के पूछने पर बृहस्पति ने चार बातें बताई थीं जो तुरंत फल देती हैं; उन्हें मुझसे सुनिए।"
श्लोक 79 (5.33.79)
देवतानां च सङ्कल्पमनुभावं च धीमताम् । विनयं कृतविद्यानां विनाशं पापकर्मणाम् ॥
devatānāṃ ca saṅkalpamanubhāvaṃ ca dhīmatām | vinayaṃ kṛtavidyānāṃ vināśaṃ pāpakarmaṇām
"देवताओं का संकल्प, बुद्धिमानों का प्रभाव, विद्वानों की विनम्रता और पापियों का विनाश।"
श्लोक 80 (5.33.80)
चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि । भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि । मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं । मानेनाधीतमुत मानयज्ञः ॥
catvāri karmāṇyabhayaṃkarāṇi | bhayaṃ prayacchantyayathākṛtāni | mānāgnihotramuta mānamaunaṃ | mānenādhītamuta mānayajñaḥ
"चार कर्म जो भय दूर करते हैं, गलत ढंग से किए जाएँ तो भय देते हैं — अभिमान से किया अग्निहोत्र, अभिमान से रखा मौन, अभिमान से किया अध्ययन और अभिमान से किया यज्ञ।"
श्लोक 81 (5.33.81)
पञ्चाग्नयो मनुष्येण परिचर्याः प्रयत्नतः । पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ ॥
pañcāgnayo manuṣyeṇa paricaryāḥ prayatnataḥ | pitā mātāgnirātmā ca guruśca bharatarṣabha
"हे भरतश्रेष्ठ, मनुष्य को पाँच अग्नियों की यत्नपूर्वक सेवा करनी चाहिए — पिता, माता, अग्नि, आत्मा और गुरु।"
श्लोक 82 (5.33.82)
पञ्चैव पूजयँल्लोके यशः प्राप्नोति केवलम् । देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च भिक्षूनतिथिपञ्चमान् ॥
pañcaiva pūjayam̐lloke yaśaḥ prāpnoti kevalam | devānpitṝnmanuṣyāṃśca bhikṣūnatithipañcamān
"इस संसार में पाँच का सम्मान करके मनुष्य निर्मल यश पाता है — देवता, पितर, मनुष्य, भिक्षु और पाँचवें अतिथि।"
श्लोक 83 (5.33.83)
पञ्च त्वाऽनुगमिष्यन्ति यत्र यत्र गमिष्यसि । मित्राण्यमित्रा मध्यस्था उपजीव्योपजीविनः ॥
pañca tvā'nugamiṣyanti yatra yatra gamiṣyasi | mitrāṇyamitrā madhyasthā upajīvyopajīvinaḥ
"आप जहाँ-जहाँ जाएँगे, ये पाँच आपके पीछे चलेंगे — मित्र, शत्रु, उदासीन, जिन पर आप आश्रित हैं और जो आप पर आश्रित हैं।"
श्लोक 84 (5.33.84)
पञ्चेन्द्रियस्य मर्त्यस्य छिद्रं चेदेकमिन्द्रियम् । ततोऽस्य स्रवति प्रज्ञा दृतेः पात्रादिवोदकम् ॥
pañcendriyasya martyasya chidraṃ cedekamindriyam | tato'sya sravati prajñā dṛteḥ pātrādivodakam
"पाँच इन्द्रियों वाले मनुष्य की यदि एक भी इन्द्रिय में छेद हो जाए, तो उसकी बुद्धि उसी से ऐसे बह जाती है जैसे चमड़े की मशक से पानी।"
श्लोक 85 (5.33.85)
षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता । निद्रा तन्द्री भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥
ṣaḍdoṣāḥ puruṣeṇeha hātavyā bhūtimicchatā | nidrā tandrī bhayaṃ krodha ālasyaṃ dīrghasūtratā
"इस संसार में उन्नति चाहने वाले पुरुष को छः दोष त्याग देने चाहिए — नींद, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य और काम को टालने की आदत।"
श्लोक 86 (5.33.86)
षडिमान्पुरुषो जह्याद्भिन्नां नावमिवार्णवे । अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम् ॥
ṣaḍimānpuruṣo jahyādbhinnāṃ nāvamivārṇave | apravaktāramācāryamanadhīyānamṛtvijam
"जैसे समुद्र में टूटी नाव को छोड़ दिया जाता है, वैसे ही मनुष्य को इन छः को छोड़ देना चाहिए — न समझाने वाला आचार्य, बिना पढ़ा ऋत्विज्,
श्लोक 87 (5.33.87)
अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रियवादिनीम् । ग्रामकामं च गोपालं वनकामं च नापितम् ॥
arakṣitāraṃ rājānaṃ bhāryāṃ cāpriyavādinīm | grāmakāmaṃ ca gopālaṃ vanakāmaṃ ca nāpitam
रक्षा न करने वाला राजा, कटु बोलने वाली पत्नी, गाँव में रहना चाहने वाला ग्वाला और वन में रहना चाहने वाला नाई।"
श्लोक 88 (5.33.88)
षडेव तु गुणाः पुंसा न हातव्याः कदाचन । सत्यं दानमनालस्यमनसूया क्षमा धृतिः ॥
ṣaḍeva tu guṇāḥ puṃsā na hātavyāḥ kadācana | satyaṃ dānamanālasyamanasūyā kṣamā dhṛtiḥ
"मनुष्य को ये छः गुण कभी नहीं छोड़ने चाहिए — सत्य, दान, आलस्य का अभाव, ईर्ष्या का अभाव, क्षमा और धैर्य।"
श्लोक 89 (5.33.89)
अर्थागमो नित्यमरोगिता च । प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च । वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या । षड्जीवलोकस्य सुखानि राजन् ॥
arthāgamo nityamarogitā ca | priyā ca bhāryā priyavādinī ca | vaśyaśca putro'rthakarī ca vidyā | ṣaḍjīvalokasya sukhāni rājan
"हे राजन्, नित्य धन का आना, निरोगी शरीर, प्रिय पत्नी, मधुर बोलने वाली पत्नी, आज्ञाकारी पुत्र और धन देने वाली विद्या — ये छः संसार के सुख हैं।"
श्लोक 90 (5.33.90)
षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति । न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रियः ॥
ṣaṇṇāmātmani nityānāmaiśvaryaṃ yo'dhigacchati | na sa pāpaiḥ kuto'narthairyujyate vijitendriyaḥ
"जो अपने भीतर सदा रहने वाले छः पर अधिकार पा लेता है, वह जितेन्द्रिय पापों से भी लिप्त नहीं होता, फिर अनर्थों की तो बात ही क्या।"
श्लोक 91 (5.33.91)
षडिमे षट्सु जीवन्ति सप्तमो नोपलभ्यते । चोराः प्रमत्ते जीवन्ति व्याधितेषु चिकित्सकाः ॥
ṣaḍime ṣaṭsu jīvanti saptamo nopalabhyate | corāḥ pramatte jīvanti vyādhiteṣu cikitsakāḥ
"ये छः दूसरे छः के सहारे जीते हैं, सातवाँ नहीं मिलता — चोर असावधान लोगों के सहारे जीते हैं, वैद्य रोगियों के सहारे,
श्लोक 92 (5.33.92)
प्रमदाः कामयानेषु यजमानेषु याजकाः । राजा विवदमानेषु नित्यं मूर्खेषु पण्डिताः ॥
pramadāḥ kāmayāneṣu yajamāneṣu yājakāḥ | rājā vivadamāneṣu nityaṃ mūrkheṣu paṇḍitāḥ
कामिनियाँ कामी पुरुषों के सहारे, याजक यजमानों के सहारे, राजा आपस में झगड़ने वालों के सहारे और विद्वान सदा मूर्खों के सहारे।"
श्लोक 93 (5.33.93)
षडिमानि विनश्यन्ति मुहूर्तमनवेक्षणात् । गावः सेवा कृषिर्भार्या विद्या वृषलसङ्गतिः ॥
ṣaḍimāni vinaśyanti muhūrtamanavekṣaṇāt | gāvaḥ sevā kṛṣirbhāryā vidyā vṛṣalasaṅgatiḥ
"छः चीज़ें थोड़ी देर की उपेक्षा से भी नष्ट हो जाती हैं — गौएँ, सेवा, खेती, पत्नी, विद्या और शूद्र से मेल-जोल।"
श्लोक 94 (5.33.94)
षडेते ह्यवमन्यन्ते नित्यं पूर्वोपकारिणम् । आचार्यं शिक्षिताः शिष्याः कृतदाराश्च मातरं ॥
ṣaḍete hyavamanyante nityaṃ pūrvopakāriṇam | ācāryaṃ śikṣitāḥ śiṣyāḥ kṛtadārāśca mātaraṃ
"ये छः अपने पहले के उपकारी का सदा अनादर करते हैं — शिक्षा पा चुके शिष्य आचार्य का, विवाहित पुत्र माता का,
श्लोक 95 (5.33.95)
नारीं विगतकामास्तु कृतार्थाश्च प्रयोजकम् । नावं निस्तीर्णकान्तारा नातुराश्च चिकित्सकं ॥
nārīṃ vigatakāmāstu kṛtārthāśca prayojakam | nāvaṃ nistīrṇakāntārā nāturāśca cikitsakaṃ
कामना शांत हो चुके पुरुष स्त्री का, काम सिद्ध हो जाने पर लोग अपने सहायक का, दुर्गम जल पार कर चुके लोग नाव का और रोगमुक्त लोग वैद्य का।"
श्लोक 96 (5.33.96)
आरोग्यमानृण्यमविप्रवासः । सद्भिर्मनुष्यैः सह संप्रयोगः । स्वप्रत्यया वृत्तिरभीतवासः । षट् जीवलोकस्य सुखानि राजन् ॥
ārogyamānṛṇyamavipravāsaḥ | sadbhirmanuṣyaiḥ saha saṃprayogaḥ | svapratyayā vṛttirabhītavāsaḥ | ṣaṭ jīvalokasya sukhāni rājan
"हे राजन्, आरोग्य, ऋण से मुक्ति, परदेस में न रहना, सज्जनों का संग, अपने बल पर चलने वाली जीविका और निर्भय होकर रहना — ये छः संसार के सुख हैं।"
श्लोक 97 (5.33.97)
ईर्षुर्घृणी नसन्तुष्टः क्रोधनो नित्यशङ्कितः । परभाग्योपजीवी च षडेते नित्यदुःखिताः ॥
īrṣurghṛṇī nasantuṣṭaḥ krodhano nityaśaṅkitaḥ | parabhāgyopajīvī ca ṣaḍete nityaduḥkhitāḥ
"ईर्ष्यालु, हर बात से घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, सदा शंका करने वाला और दूसरों के भाग्य पर जीने वाला — ये छः सदा दुखी रहते हैं।"
श्लोक 98 (5.33.98)
सप्त दोषाः सदा राज्ञा हातव्या व्यसनोदयाः । प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृतमूला अपीश्वराः ॥
sapta doṣāḥ sadā rājñā hātavyā vyasanodayāḥ | prāyaśo yairvinaśyanti kṛtamūlā apīśvarāḥ
"राजा को विपत्ति उत्पन्न करने वाले सात दोष सदा त्याग देने चाहिए; इन्हीं के कारण जड़ जमा चुके शासक भी प्रायः नष्ट हो जाते हैं।"
श्लोक 99 (5.33.99)
स्त्रियोऽक्षा मृगया पानं वाक्पारुष्यं च पञ्चमम् । महच्च दण्डपारुष्यमर्थदूषणमेव च ॥
striyo'kṣā mṛgayā pānaṃ vākpāruṣyaṃ ca pañcamam | mahacca daṇḍapāruṣyamarthadūṣaṇameva ca
"स्त्री-व्यसन, जुआ, शिकार, मद्यपान, पाँचवाँ वाणी की कठोरता, दंड की अत्यधिक कठोरता और धन का दुरुपयोग।"
श्लोक 100 (5.33.100)
अष्टौ पूर्वनिमित्तानि नरस्य विनशिष्यतः । ब्राह्मणान्प्रथमं द्वेष्टि ब्राह्मणैश्च विरुध्यते ॥
aṣṭau pūrvanimittāni narasya vinaśiṣyataḥ | brāhmaṇānprathamaṃ dveṣṭi brāhmaṇaiśca virudhyate
"विनाश की ओर जा रहे मनुष्य के आठ पूर्व-लक्षण होते हैं — पहले वह ब्राह्मणों से द्वेष करता है, फिर ब्राह्मणों से विरोध करता है,
श्लोक 101 (5.33.101)
ब्राह्मणस्वानि चादत्ते ब्राह्मणांश्च जिघांसति । रमते निन्दया चैषां प्रशंसां नाभिनन्दति ॥
brāhmaṇasvāni cādatte brāhmaṇāṃśca jighāṃsati | ramate nindayā caiṣāṃ praśaṃsāṃ nābhinandati
ब्राह्मणों का धन छीन लेता है, ब्राह्मणों को मारना चाहता है, उनकी निंदा में आनंद लेता है, उनकी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न नहीं होता,
श्लोक 102 (5.33.102)
नैनान्स्मरति कृत्येषु याचितश्चाभ्यसूयति । एतान्दोषान्नरः प्राज्ञो बुद्ध्या बुद्ध्वा विसर्जयेत् ॥
nainānsmarati kṛtyeṣu yācitaścābhyasūyati | etāndoṣānnaraḥ prājño buddhyā buddhvā visarjayet
शुभ कार्यों में उन्हें याद नहीं करता और उनके कुछ माँगने पर चिढ़ता है। बुद्धिमान मनुष्य इन दोषों को बुद्धि से पहचानकर त्याग दे।"
श्लोक 103 (5.33.103)
अष्टाविमानि हर्षस्य नवनीतानि भारत । वर्तमानानि दृश्यन्ते तान्येव स्वसुखान्यपि ॥
aṣṭāvimāni harṣasya navanītāni bhārata | vartamānāni dṛśyante tānyeva svasukhānyapi
"हे भारत, ये आठ आनंद के नवनीत हैं; ये इसी जीवन में घटित होते दिखाई देते हैं और अपने लिए सुख भी लाते हैं।"
श्लोक 104 (5.33.104)
समागमश्च सखिभिर्महांश्चैव धनागमः । पुत्रेण च परिष्वङ्गः सन्निपातश्च मैथुने ॥
samāgamaśca sakhibhirmahāṃścaiva dhanāgamaḥ | putreṇa ca pariṣvaṅgaḥ sannipātaśca maithune
"मित्रों से मिलना, बड़ा धन-लाभ, पुत्र का आलिंगन, प्रेम में मिलन,
श्लोक 105 (5.33.105)
समये च प्रियालापः स्वयूथ्येषु समुन्नतिः । अभिप्रेतस्य लाभश्च पूजा च जनसंसदि ॥
samaye ca priyālāpaḥ svayūthyeṣu samunnatiḥ | abhipretasya lābhaśca pūjā ca janasaṃsadi
उचित समय पर प्रिय वार्तालाप, अपने लोगों में उन्नति, मनचाही वस्तु की प्राप्ति और जनसभा में सम्मान।"
श्लोक 106 (5.33.106)
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति । प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च । पराक्रमश्चाबहुभाषिता च । दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥
aṣṭau guṇāḥ puruṣaṃ dīpayanti | prajñā ca kaulyaṃ ca damaḥ śrutaṃ ca | parākramaścābahubhāṣitā ca | dānaṃ yathāśakti kṛtajñatā ca
"आठ गुण पुरुष को प्रकाशित करते हैं — बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रिय-संयम, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, कम बोलना, यथाशक्ति दान और कृतज्ञता।"
श्लोक 107 (5.33.107)
नवद्वारमिदं वेश्म त्रिस्थूणं पञ्चसाक्षिकम् । क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं विद्वान्यो वेद स परः कविः ॥
navadvāramidaṃ veśma tristhūṇaṃ pañcasākṣikam | kṣetrajñādhiṣṭhitaṃ vidvānyo veda sa paraḥ kaviḥ
"यह घर नौ द्वारों, तीन खंभों और पाँच साक्षियों वाला है, और क्षेत्रज्ञ इसमें अधिष्ठित है। जो विद्वान इसे जानता है, वही परम ज्ञानी है।"
श्लोक 108 (5.33.108)
दश धर्मं न जानन्ति धृतराष्ट्र निबोध तान् । मत्तः प्रमत्त उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धो बुभुक्षितः ॥
daśa dharmaṃ na jānanti dhṛtarāṣṭra nibodha tān | mattaḥ pramatta unmattaḥ śrāntaḥ kruddho bubhukṣitaḥ
"हे धृतराष्ट्र, दस लोग धर्म को नहीं जानते, उन्हें सुनिए — नशे में चूर, असावधान, उन्मत्त, थका हुआ, क्रोधी, भूखा,
श्लोक 109 (5.33.109)
त्वरमाणश्च लुब्धश्च भीतः कामी च ते दश । तस्मादेतेषु भावेषु न प्रसञ्जेत पण्डितः ॥
tvaramāṇaśca lubdhaśca bhītaḥ kāmī ca te daśa | tasmādeteṣu bhāveṣu na prasañjeta paṇḍitaḥ
जल्दबाज़, लोभी, भयभीत और कामी — ये दस हैं। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति इन अवस्थाओं में न फँसे।"
श्लोक 110 (5.33.110)
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । पुत्रार्थमसुरेन्द्रेण गीतं चैव सुधन्वना ॥
atraivodāharantīmamitihāsaṃ purātanam | putrārthamasurendreṇa gītaṃ caiva sudhanvanā
"इस विषय में एक प्राचीन इतिहास कहा जाता है, जिसे असुरराज ने अपने पुत्र के लिए गाया था, और सुधन्वा ने भी।"
श्लोक 111 (5.33.111)
यः काममन्यू प्रजहाति राजा । पात्रे प्रतिष्ठापयते धनं च । विशेषविच्छ्रुतवान्क्षिप्रकारी । तं सर्वलोकः कुरुते प्रमाणम् ॥
yaḥ kāmamanyū prajahāti rājā | pātre pratiṣṭhāpayate dhanaṃ ca | viśeṣavicchrutavānkṣiprakārī | taṃ sarvalokaḥ kurute pramāṇam
"जो राजा काम और क्रोध को त्याग देता है, सुपात्र को धन देता है, भेद पहचानता है, विद्वान है और शीघ्र कार्य करता है, उसे सब लोग अपना आदर्श मानते हैं।"
श्लोक 112 (5.33.112)
जानाति विश्वासयितुं मनुष्यान् । विज्ञातदोषेषु दधाति दण्डम् । जानाति मात्रां च तथा क्षमां च । तं तादृशं श्रीर्जुषते समग्रा ॥
jānāti viśvāsayituṃ manuṣyān | vijñātadoṣeṣu dadhāti daṇḍam | jānāti mātrāṃ ca tathā kṣamāṃ ca | taṃ tādṛśaṃ śrīrjuṣate samagrā
"जो लोगों का विश्वास जीतना जानता है, जिनका दोष जान लिया गया हो उन्हीं को दंड देता है, और दंड की मात्रा तथा क्षमा दोनों को जानता है, ऐसे व्यक्ति की सम्पूर्ण लक्ष्मी सेवा करती है।"
श्लोक 113 (5.33.113)
सुदुर्बलं नावजानाति कंचि- । द्युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम् । न विग्रहं रोचयते बलस्थैः । काले च यो विक्रमते स धीरः ॥
sudurbalaṃ nāvajānāti kaṃci- | dyukto ripuṃ sevate buddhipūrvam | na vigrahaṃ rocayate balasthaiḥ | kāle ca yo vikramate sa dhīraḥ
"जो किसी अत्यंत दुर्बल का भी अनादर नहीं करता, सावधान रहकर सोच-समझकर शत्रु से व्यवहार करता है, बलवानों से झगड़ा मोल नहीं लेता और उचित समय पर पराक्रम दिखाता है, वही धीर है।"
श्लोक 114 (5.33.114)
प्राप्यापदं न व्यथते कदाचि- । दुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः । दुःखं च काले सहते महात्मा । धुरन्धरस्तस्य जिताः सपत्नाः ॥
prāpyāpadaṃ na vyathate kadāci- | dudyogamanvicchati cāpramattaḥ | duḥkhaṃ ca kāle sahate mahātmā | dhurandharastasya jitāḥ sapatnāḥ
"जो महात्मा विपत्ति आने पर कभी व्यथित नहीं होता, सावधान रहकर उद्यम में लगा रहता है और समय आने पर दुःख सह लेता है, वह धुरंधर है; उसके शत्रु पराजित ही हैं।"
श्लोक 115 (5.33.115)
अनर्थकं विप्रवासं गृहेभ्यः । पापैः सन्धिं परदाराभिमर्शम् । दम्भं स्तैन्यं पैशुनं मद्यपानं । न सेवते यः स सुखी सदैव ॥
anarthakaṃ vipravāsaṃ gṛhebhyaḥ | pāpaiḥ sandhiṃ paradārābhimarśam | dambhaṃ stainyaṃ paiśunaṃ madyapānaṃ | na sevate yaḥ sa sukhī sadaiva
"जो बिना प्रयोजन घर से दूर रहना, पापियों से मेल, पराई स्त्री का स्पर्श, दंभ, चोरी, चुगली और मद्यपान — इनका सेवन नहीं करता, वह सदा सुखी रहता है।"
श्लोक 116 (5.33.116)
न संरम्भेणारभते त्रिवर्ग- । माकारितः शंसति तत्त्वमेव । न मित्रार्थे रोचयते विवादं । नापूजितः कुप्यति चाप्यमूढः ॥
na saṃrambheṇārabhate trivarga- | mākāritaḥ śaṃsati tattvameva | na mitrārthe rocayate vivādaṃ | nāpūjitaḥ kupyati cāpyamūḍhaḥ
"जो आवेश में आकर धर्म, अर्थ और काम का आरम्भ नहीं करता, पूछे जाने पर केवल सत्य बताता है, मित्र के लिए भी विवाद पसंद नहीं करता, और सम्मान न मिलने पर क्रोध नहीं करता — ऐसा व्यक्ति मूढ़ नहीं है।"
श्लोक 117 (5.33.117)
न योऽभ्यसूयत्यनुकम्पते च । न दुर्बलः प्रातिभाव्यं करोति । नात्याह किंचित्क्षमते विवादं । सर्वत्र तादृग्लभते प्रशंसाम् ॥
na yo'bhyasūyatyanukampate ca | na durbalaḥ prātibhāvyaṃ karoti | nātyāha kiṃcitkṣamate vivādaṃ | sarvatra tādṛglabhate praśaṃsām
"जो दूसरों में दोष नहीं देखता, दया करता है, दुर्बल होने पर किसी की ज़मानत नहीं लेता, बढ़-चढ़कर नहीं बोलता और विवाद को सह लेता है, वह सर्वत्र प्रशंसा पाता है।"
श्लोक 118 (5.33.118)
यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं । न पौरुषेणापि विकत्थतेऽन्यान् । न मूर्च्छितः कटुकान्याह किंचि- । त्प्रियं सदा तं कुरुते जनो हि ॥
yo noddhataṃ kurute jātu veṣaṃ | na pauruṣeṇāpi vikatthate'nyān | na mūrcchitaḥ kaṭukānyāha kiṃci- | tpriyaṃ sadā taṃ kurute jano hi
"जो कभी उद्धत वेश धारण नहीं करता, अपने पराक्रम की भी दूसरों के सामने डींग नहीं मारता, और उत्तेजित होने पर भी कटु वचन नहीं बोलता, उसे लोग सदा प्रिय मानते हैं।"
श्लोक 119 (5.33.119)
न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं । न दर्पमारोहति शान्तिमेति । न दुर्गतोऽस्मीति करोत्यकार्यं । तमार्यशीलं परमाहुरार्याः ॥
na vairamuddīpayati praśāntaṃ | na darpamārohati śāntimeti | na durgato'smīti karotyakāryaṃ | tamāryaśīlaṃ paramāhurāryāḥ
"जो शांत हो चुके बैर को फिर से नहीं भड़काता, अहंकार पर सवार नहीं होता बल्कि शांत रहता है, और 'मैं विपत्ति में हूँ' कहकर अनुचित कार्य नहीं करता, उसे आर्यजन श्रेष्ठ आचरण वाला कहते हैं।"
श्लोक 120 (5.33.120)
न स्वे सुखे वै कुरुते प्रहर्षं । नान्यस्य दुःखे भवति प्रहृष्टः । दत्त्वा न पश्चात्कुरुतेऽनुतापं । स कथ्यते सत्पुरुषार्यशीलः ॥
na sve sukhe vai kurute praharṣaṃ | nānyasya duḥkhe bhavati prahṛṣṭaḥ | dattvā na paścātkurute'nutāpaṃ | sa kathyate satpuruṣāryaśīlaḥ
"जो अपने सुख में फूला नहीं समाता, दूसरे के दुःख में प्रसन्न नहीं होता, और दान देकर बाद में पछताता नहीं, वह आर्य आचरण वाला सत्पुरुष कहलाता है।"
श्लोक 121 (5.33.121)
देशाचारान्समयाञ्जातिधर्मान् । बुभूषते यः स परावरज्ञः । स यत्र तत्राभिगतः सदैव । महाजनस्याधिपत्यं करोति ॥
deśācārānsamayāñjātidharmān | bubhūṣate yaḥ sa parāvarajñaḥ | sa yatra tatrābhigataḥ sadaiva | mahājanasyādhipatyaṃ karoti
"जो विभिन्न देशों के आचार, समाजों के नियम और जातियों के धर्म जानना चाहता है, वह ऊँच-नीच को समझने वाला है; वह जहाँ भी जाता है, सदा जनसमूह का नेतृत्व पाता है।"
श्लोक 122 (5.33.122)
दम्भं मोहं मत्सरं पापकृत्यं । राजद्विष्टं पैशुनं पूगवैरम् । मत्तोन्मत्तैर्दुर्जनैश्चापि वादं । यः प्रज्ञावान्वर्जयेत्स प्रधानः ॥
dambhaṃ mohaṃ matsaraṃ pāpakṛtyaṃ | rājadviṣṭaṃ paiśunaṃ pūgavairam | mattonmattairdurjanaiścāpi vādaṃ | yaḥ prajñāvānvarjayetsa pradhānaḥ
"दंभ, मोह, ईर्ष्या, पापकर्म, राजा से द्रोह, चुगली, समूहों से बैर, और नशेड़ी, पागल तथा दुष्टों से विवाद — जो बुद्धिमान इनसे बचता है, वही श्रेष्ठ है।"
श्लोक 123 (5.33.123)
दमं शौचं दैविकं मङ्गलानि । प्रायश्चित्तान्विविधाँल्लोकवादान् । एतानि यः कुरुते नैत्यकानि । तस्योत्थानं देवता राधयन्ति ॥
damaṃ śaucaṃ daivikaṃ maṅgalāni | prāyaścittānvividhām̐llokavādān | etāni yaḥ kurute naityakāni | tasyotthānaṃ devatā rādhayanti
"इन्द्रिय-संयम, पवित्रता, देवकार्य, मांगलिक कर्म, विविध प्रायश्चित्त और लोकाचार — जो इन नित्य कर्मों को करता है, देवता उसकी उन्नति में सहायक होते हैं।"
श्लोक 124 (5.33.124)
समैर्विवाहं कुरुते न हीनैः । समैः सख्यं व्यवहारं कथां च । गुणैर्विशिष्टांश्च पुरो दधाति । विपश्चितस्तस्य नयाः सुनीताः ॥
samairvivāhaṃ kurute na hīnaiḥ | samaiḥ sakhyaṃ vyavahāraṃ kathāṃ ca | guṇairviśiṣṭāṃśca puro dadhāti | vipaścitastasya nayāḥ sunītāḥ
"जो बराबर वालों से विवाह-सम्बन्ध करता है, हीनों से नहीं, बराबर वालों से ही मित्रता, व्यवहार और बातचीत रखता है, और गुणों में श्रेष्ठ लोगों को आगे रखता है, उस विद्वान की नीतियाँ भली-भाँति सफल होती हैं।"
श्लोक 125 (5.33.125)
मितं भुङ्क्ते संविभज्याश्रितेभ्यो । मितं स्वपित्यमितं कर्म कृत्वा । ददात्यमित्रेष्वपि याचितः सं- । स्तमात्मवन्तं प्रजहत्यनर्थाः ॥
mitaṃ bhuṅkte saṃvibhajyāśritebhyo | mitaṃ svapityamitaṃ karma kṛtvā | dadātyamitreṣvapi yācitaḥ saṃ- | stamātmavantaṃ prajahatyanarthāḥ
"जो आश्रितों में बाँटकर थोड़ा खाता है, बहुत काम करके थोड़ा सोता है और माँगे जाने पर शत्रुओं को भी देता है, ऐसे आत्मसंयमी को अनर्थ छोड़ देते हैं।"
श्लोक 126 (5.33.126)
चिकीर्षितं विप्रकृतं च यस्य । नान्ये जनाः कर्म जानन्ति किंचित् । मन्त्रे गुप्ते सम्यगनुष्ठिते च । नाल्पोऽप्यस्य च्यवते कश्चिदर्थः ॥
cikīrṣitaṃ viprakṛtaṃ ca yasya | nānye janāḥ karma jānanti kiṃcit | mantre gupte samyaganuṣṭhite ca | nālpo'pyasya cyavate kaścidarthaḥ
"जिसके मनचाहे और आरम्भ किए हुए कार्य को दूसरे लोग तनिक भी नहीं जानते, और जिसकी मंत्रणा गुप्त रहकर ठीक से पूरी होती है, उसका कोई छोटा-सा प्रयोजन भी विफल नहीं होता।"
श्लोक 127 (5.33.127)
यः सर्वभूतप्रशमे निविष्टः । सत्यो मृदुर्मानकृच्छुद्धभावः । अतीव स ज्ञायते ज्ञातिमध्ये । महामणिर्जात्य इव प्रसन्नः ॥
yaḥ sarvabhūtapraśame niviṣṭaḥ | satyo mṛdurmānakṛcchuddhabhāvaḥ | atīva sa jñāyate jñātimadhye | mahāmaṇirjātya iva prasannaḥ
"जो सब प्राणियों की शांति में लगा रहता है, सत्यवादी, कोमल, दूसरों का सम्मान करने वाला और शुद्ध भाव वाला है, वह अपने सम्बन्धियों के बीच उत्तम खान से निकली निर्मल महामणि की तरह अलग चमकता है।"
श्लोक 128 (5.33.128)
य आत्मनाऽपत्रपते भृशं नरः । स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत । अनन्ततेजाः सुमनाः समाहितः । स तेजसा सूर्य इवावभासते ॥
ya ātmanā'patrapate bhṛśaṃ naraḥ | sa sarvalokasya gururbhavatyuta | anantatejāḥ sumanāḥ samāhitaḥ | sa tejasā sūrya ivāvabhāsate
"जो मनुष्य अपने भीतर ही बुरे कर्म से अत्यंत लज्जा करता है, वह समस्त लोक का गुरु बन जाता है। अनंत तेजस्वी, प्रसन्नचित्त और एकाग्र वह अपने तेज से सूर्य की भाँति चमकता है।"
श्लोक 129 (5.33.129)
वने जाताः शापदग्धस्य राज्ञः । पाण्डोः पुत्राः पञ्च पञ्चेन्द्रकल्पाः । त्वयैव बाला वर्धिताः शिक्षिताश्च । तवादेशं पालयन्त्याम्बिकेय ॥
vane jātāḥ śāpadagdhasya rājñaḥ | pāṇḍoḥ putrāḥ pañca pañcendrakalpāḥ | tvayaiva bālā vardhitāḥ śikṣitāśca | tavādeśaṃ pālayantyāmbikeya
"शाप से दग्ध राजा पाण्डु के वन में जन्मे पाँचों पुत्र पाँच इन्द्रों के समान हैं। आपने ही बचपन में उन्हें पाला और शिक्षा दी, और हे अम्बिकानन्दन, वे आपकी आज्ञा का पालन करते हैं।"
श्लोक 130 (5.33.130)
प्रदायैषामुचितं तातराज्यं । सुखी पुत्रैः सहितो मोदमानः । न देवानां नापि च मानुषाणां । भविष्यसि त्वं गर्हणीयो नरेन्द्र ॥
pradāyaiṣāmucitaṃ tātarājyaṃ | sukhī putraiḥ sahito modamānaḥ | na devānāṃ nāpi ca mānuṣāṇāṃ | bhaviṣyasi tvaṃ garhaṇīyo narendra
"उन्हें उनके पिता के राज्य का उचित भाग देकर अपने पुत्रों के साथ सुखी और प्रसन्न रहिए। तब हे नरेन्द्र, न देवता और न मनुष्य आपकी निंदा करेंगे।"