उद्योग पर्व · अध्याय 34
विवेक, न्यायपूर्ण शासन और इंद्रिय-संयम
विदुर नीति, अध्याय 2 / 8
चिंता से जागते धृतराष्ट्र विदुर से पूछते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और युधिष्ठिर के मन में क्या है। विदुर उन्हें हर कार्य के परिणाम पर विचार करने, भौंरे की तरह बिना हानि पहुँचाए कर लेने, धर्म से शासन करने और वाणी पर संयम रखने का उपदेश देते हैं, क्योंकि वाणी का घाव कभी नहीं भरता। सबसे बढ़कर वे इंद्रियों और मन पर विजय का आग्रह करते हैं, और अंत में चेताते हैं कि पांडवों से वैर ने धृतराष्ट्र के पुत्रों की बुद्धि मलिन कर दी है, जबकि युधिष्ठिर राजा के प्रति आदर के कारण सब कष्ट सह रहा है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (5.34.1)
जाग्रतो दह्यमानस्य यत्कार्यमनुपश्यसि । तद्ब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलः शुचिः ॥
jāgrato dahyamānasya yatkāryamanupaśyasi | tadbrūhi tvaṃ hi nastāta dharmārthakuśalaḥ śuciḥ
हे तात, जो जागता हुआ चिंता में जल रहा हो, उसके लिए जो करणीय तुम देखते हो, वह मुझे बताओ; क्योंकि तुम धर्म और अर्थ दोनों में निपुण हो और पवित्र हृदय वाले हो।
श्लोक 2 (5.34.2)
तस्माद्यथावद्विदुर प्रशाधि । प्रज्ञापूर्वं सर्वमजातशत्रोः । यन्मन्यसे पथ्यमदीनसत्व । श्रेयस्करं ब्रूहि तद्वै कुरूणाम् ॥
tasmādyathāvadvidura praśādhi | prajñāpūrvaṃ sarvamajātaśatroḥ | yanmanyase pathyamadīnasatva | śreyaskaraṃ brūhi tadvai kurūṇām
इसलिए हे विदुर, मुझे यथोचित उपदेश दो। अजातशत्रु से जुड़ी सारी बात बुद्धिपूर्वक कहो। हे अडिग हृदय वाले, जो तुम्हें हितकर लगे और कुरुवंश के लिए कल्याणकारी हो, वही मुझे बताओ।
श्लोक 3 (5.34.3)
पापाशङ्की पापमेवानुपश्यन् । पृच्छामि त्वां व्याकुलेनात्मनाहम् । कवे तन्मे ब्रूहि सर्वं यथाव- । न्मनीषितं सर्वमजातशत्रोः ॥
pāpāśaṅkī pāpamevānupaśyan | pṛcchāmi tvāṃ vyākulenātmanāham | kave tanme brūhi sarvaṃ yathāva- | nmanīṣitaṃ sarvamajātaśatroḥ
पाप की आशंका से भरा और केवल अनिष्ट ही देखता हुआ मैं व्याकुल मन से तुमसे पूछता हूँ। हे विद्वान्, अजातशत्रु के मन में जो कुछ है, वह सब मुझे ठीक-ठीक बताओ।
विदुर उवाच
श्लोक 4 (5.34.4)
शुभं वा यदि वा पापं द्वेष्यं वा यदि वा प्रियम् । नापृष्टः कस्यचिद्ब्रूयाद्यः स नेच्छेत्पराभवम् ॥
śubhaṃ vā yadi vā pāpaṃ dveṣyaṃ vā yadi vā priyam | nāpṛṣṭaḥ kasyacidbrūyādyaḥ sa necchetparābhavam
बात शुभ हो या अशुभ, अप्रिय हो या प्रिय, जो अपना अपमान नहीं चाहता उसे बिना पूछे किसी से कुछ नहीं कहना चाहिए।
श्लोक 5 (5.34.5)
तस्माद्वक्ष्यामि ते राजन्हितं यत्स्यान्कुरून्प्रति । वचः श्रेयस्करं धर्म्यं ब्रुवतस्तन्निबोध मे ॥
tasmādvakṣyāmi te rājanhitaṃ yatsyānkurūnprati | vacaḥ śreyaskaraṃ dharmyaṃ bruvatastannibodha me
इसलिए हे राजन्, कुरुओं के लिए जो हितकर हो, वह मैं तुम्हें बताऊँगा। मैं जो कल्याणकारी और धर्मसम्मत वचन कहता हूँ, उन्हें ध्यान से सुनो।
श्लोक 6 (5.34.6)
मिथ्योपेतानि कर्माणि सिध्येयुर्यानि भारत । अनुपायप्रयुक्तानि मा स्म तेषु मनः कृथाः ॥
mithyopetāni karmāṇi sidhyeyuryāni bhārata | anupāyaprayuktāni mā sma teṣu manaḥ kṛthāḥ
हे भारत, कपट पर टिके जो कर्म अनुचित उपायों से किए जाने पर सफल भी हो जाएँ, उनमें अपना मन मत लगाओ।
श्लोक 7 (5.34.7)
तथैव योगविहितं यत्तु कर्म न सिध्यति । उपाययुक्तं मेधावी न तत्र ग्लपयेन्मनः ॥
tathaiva yogavihitaṃ yattu karma na sidhyati | upāyayuktaṃ medhāvī na tatra glapayenmanaḥ
इसी प्रकार, कुशलता से सोचा गया और उचित उपायों से किया गया कर्म यदि सफल न हो, तो बुद्धिमान को उसके कारण मन को खिन्न नहीं करना चाहिए।
श्लोक 8 (5.34.8)
अनुबन्धानवेक्षेत सानुबन्धेषु कर्मसु । संप्रधार्य च कुर्वीत सहसा न समाचरेत् ॥
anubandhānavekṣeta sānubandheṣu karmasu | saṃpradhārya ca kurvīta sahasā na samācaret
जिन कर्मों के परिणाम आगे तक जाते हैं, उनमें उन परिणामों पर पहले विचार करना चाहिए। सोच-समझकर ही कर्म करना चाहिए, जल्दबाज़ी में कभी नहीं।
श्लोक 9 (5.34.9)
अनुबन्धं च संप्रेक्ष्य विपाकं चैव कर्मणाम् । उत्थानमात्मनश्चैव धीरः कुर्वीत वा न वा ॥
anubandhaṃ ca saṃprekṣya vipākaṃ caiva karmaṇām | utthānamātmanaścaiva dhīraḥ kurvīta vā na vā
कर्मों के परिणाम और उनके फल पर, तथा अपने सामर्थ्य पर भी भली-भाँति विचार करके धीर पुरुष तय करे कि कर्म करे या न करे।
श्लोक 10 (5.34.10)
यः प्रमाणं न जानाति स्थाने वृद्धौ तथा क्षये । कोशे जनपदे दण्डे न स राज्येऽवतिष्ठते ॥
yaḥ pramāṇaṃ na jānāti sthāne vṛddhau tathā kṣaye | kośe janapade daṇḍe na sa rājye'vatiṣṭhate
जो राजा स्थिरता, वृद्धि और क्षय में, तथा कोष, जनपद और दंड के विषय में उचित परिमाण नहीं जानता, वह राज्य पर टिका नहीं रह पाता।
श्लोक 11 (5.34.11)
यस्त्वेतानि प्रमाणानि यथोक्तान्यनुपश्यति । युक्तो धर्मार्थयोर्ज्ञाने स राज्यमधिगच्छति ॥
yastvetāni pramāṇāni yathoktānyanupaśyati | yukto dharmārthayorjñāne sa rājyamadhigacchati
परंतु जो इन बताए गए परिमाणों को ठीक से ध्यान में रखता है और धर्म तथा अर्थ के ज्ञान में लगा रहता है, वह राज्य प्राप्त करता है।
श्लोक 12 (5.34.12)
न राज्यं प्राप्तमित्येव वर्तितव्यमसांप्रतम् । श्रियं ह्यविनयो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम् ॥
na rājyaṃ prāptamityeva vartitavyamasāṃpratam | śriyaṃ hyavinayo hanti jarā rūpamivottamam
'राज्य तो मिल ही गया है', ऐसा सोचकर अनुचित आचरण नहीं करना चाहिए। उद्दंडता लक्ष्मी को वैसे ही नष्ट कर देती है जैसे बुढ़ापा उत्तम रूप को।
श्लोक 13 (5.34.13)
भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्नं मत्स्यो बडिशमायसम् । अन्नाभिलाषी ग्रसते नानुबन्धमवेक्षते ॥
bhakṣyottamapraticchannaṃ matsyo baḍiśamāyasam | annābhilāṣī grasate nānubandhamavekṣate
भोजन के लोभ में मछली उत्तम चारे में छिपे लोहे के काँटे को निगल जाती है और उसके परिणाम पर ध्यान नहीं देती।
श्लोक 14 (5.34.14)
यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत् । हितं च परिणामे यत्तदाद्यं भूतिमिच्छता ॥
yacchakyaṃ grasituṃ grasyaṃ grastaṃ pariṇamecca yat | hitaṃ ca pariṇāme yattadādyaṃ bhūtimicchatā
जो समृद्धि चाहता है, उसे वही खाना चाहिए जो निगला जा सके, निगलने योग्य हो, निगलने पर पच जाए और अंत में हितकारी हो।
श्लोक 15 (5.34.15)
वनस्पतेरपक्वानि फलानि प्रचिनोति यः । स नाप्नोति रसं तेभ्यो बीजं चास्य विनश्यति ॥
vanaspaterapakvāni phalāni pracinoti yaḥ | sa nāpnoti rasaṃ tebhyo bījaṃ cāsya vinaśyati
जो वृक्ष के कच्चे फल तोड़ता है, उसे उनसे रस नहीं मिलता और उनका बीज भी नष्ट हो जाता है।
श्लोक 16 (5.34.16)
यस्तु पक्वमुपादत्ते काले परिणतं फलम् । फलाद्रसं स लभते बीजाच्चैव फलं पुनः ॥
yastu pakvamupādatte kāle pariṇataṃ phalam | phalādrasaṃ sa labhate bījāccaiva phalaṃ punaḥ
परंतु जो समय पर पके हुए फल को लेता है, वह फल से रस पाता है और बीज से फिर फल पाता है।
श्लोक 17 (5.34.17)
यथा मधु समादत्ते रक्षन्पुष्पाणि षट्पदः । तद्वदर्थान्मनुष्येभ्य आदद्यादविहिंसया ॥
yathā madhu samādatte rakṣanpuṣpāṇi ṣaṭpadaḥ | tadvadarthānmanuṣyebhya ādadyādavihiṃsayā
जैसे भौंरा फूलों को बचाते हुए उनसे मधु लेता है, वैसे ही राजा को मनुष्यों से उन्हें पीड़ा दिए बिना धन लेना चाहिए।
श्लोक 18 (5.34.18)
पुष्पं पुष्पं विचिन्वीत मूलच्छेदं न कारयेत् । मालाकार इवारामे न यथाङ्गारकारकः ॥
puṣpaṃ puṣpaṃ vicinvīta mūlacchedaṃ na kārayet | mālākāra ivārāme na yathāṅgārakārakaḥ
बगीचे में माली की तरह फूल-फूल चुनना चाहिए, पर जड़ नहीं काटनी चाहिए; कोयला बनाने वाले की तरह नहीं।
श्लोक 19 (5.34.19)
किं नु मे स्यादिदं कृत्वा किं नु मे स्यादकुर्वतः । इति कर्माणि सञ्चिन्त्य कुर्याद्वा पुरुषो न वा ॥
kiṃ nu me syādidaṃ kṛtvā kiṃ nu me syādakurvataḥ | iti karmāṇi sañcintya kuryādvā puruṣo na vā
'यह करने से मेरा क्या होगा? न करने से क्या होगा?' इस प्रकार कर्मों पर विचार करके ही मनुष्य कर्म करे या न करे।
श्लोक 20 (5.34.20)
अनारभ्या भवन्त्यर्थाः केचिन्नित्यं यथाऽगताः । कृतः पुरुषकारोऽपि भवेद्येषु निरर्थकः ॥
anārabhyā bhavantyarthāḥ kecinnityaṃ yathā'gatāḥ | kṛtaḥ puruṣakāro'pi bhavedyeṣu nirarthakaḥ
कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन्हें आरंभ ही नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे सदा जैसे थे वैसे ही रहते हैं; उनमें किया गया पुरुषार्थ भी व्यर्थ जाता है।
श्लोक 21 (5.34.21)
अनर्थे चैव निरतमर्थे चैव पराङ्भुखम् । न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्ढं पतिमिव स्त्रियः ॥
anarthe caiva niratamarthe caiva parāṅbhukham | na taṃ bhartāramicchanti ṣaṇḍhaṃ patimiva striyaḥ
जो अनर्थ में लगा रहता है और अर्थ से मुँह मोड़ लेता है, ऐसे स्वामी को लोग वैसे ही नहीं चाहते जैसे स्त्रियाँ नपुंसक पति को नहीं चाहतीं।
श्लोक 22 (5.34.22)
प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थकः । न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्ढं पतिमिव स्त्रियः ॥
prasādo niṣphalo yasya krodhaścāpi nirarthakaḥ | na taṃ bhartāramicchanti ṣaṇḍhaṃ patimiva striyaḥ
जिसकी प्रसन्नता निष्फल हो और जिसका क्रोध भी निरर्थक हो, ऐसे स्वामी को लोग वैसे ही नहीं चाहते जैसे स्त्रियाँ नपुंसक पति को नहीं चाहतीं।
श्लोक 23 (5.34.23)
कांश्चिदर्थान्नरः प्राज्ञो लघुमूलान्महाफलान् । क्षिप्रमारभते कर्तुं न दीर्घयति तादृशान् ॥
kāṃścidarthānnaraḥ prājño laghumūlānmahāphalān | kṣipramārabhate kartuṃ na dīrghayati tādṛśān
बुद्धिमान मनुष्य थोड़े व्यय से आरंभ होने वाले और बड़ा फल देने वाले कार्यों को शीघ्र आरंभ कर देता है; ऐसे कार्यों को टालता नहीं।
श्लोक 24 (5.34.24)
ऋजु पश्यति यः सर्वं चक्षुषा नु पिबन्निव । आसीनमपि तूष्णीकमनुरज्यन्ति तं प्रजाः ॥
ṛju paśyati yaḥ sarvaṃ cakṣuṣā nu pibanniva | āsīnamapi tūṣṇīkamanurajyanti taṃ prajāḥ
जो राजा सबको निश्छल दृष्टि से, मानो आँखों से पीता हुआ-सा, देखता है, वह चुप बैठा हो तब भी प्रजा उससे प्रेम करती है।
श्लोक 25 (5.34.25)
सुपुष्पितः स्यादफलः फलितः स्याद्दुरारुहः । अपक्वः पक्वसङ्काशो न तु शीर्येत कर्हिचित् ॥
supuṣpitaḥ syādaphalaḥ phalitaḥ syāddurāruhaḥ | apakvaḥ pakvasaṅkāśo na tu śīryeta karhicit
राजा ऐसे वृक्ष के समान हो जो खूब फूला हो पर फल न दे, या फल से लदा हो पर जिस पर चढ़ना कठिन हो; जो कच्चा होकर भी पका-सा दिखे; पर वह कभी मुरझाए नहीं।
श्लोक 26 (5.34.26)
चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम् । प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति ॥
cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham | prasādayati yo lokaṃ taṃ loko'nuprasīdati
जो दृष्टि, मन, वाणी और कर्म, इन चार प्रकार से संसार को प्रसन्न रखता है, संसार भी उससे प्रसन्न रहता है।
श्लोक 27 (5.34.27)
यस्मात्त्रस्यन्ति भूतानि मृगव्याधान्मृगा इव । सागरान्तामपि महीं लब्ध्वा स परिहीयते ॥
yasmāttrasyanti bhūtāni mṛgavyādhānmṛgā iva | sāgarāntāmapi mahīṃ labdhvā sa parihīyate
जिससे प्राणी वैसे ही डरते हैं जैसे हिरन शिकारी से, वह समुद्र तक फैली पृथ्वी पाकर भी उसे खो बैठता है।
श्लोक 28 (5.34.28)
पितृपैतामहं राज्यं प्राप्यापि स्वेन कर्मणा । वायुरभ्रमिवासाद्य भ्रंशयत्यनये स्थितः ॥
pitṛpaitāmahaṃ rājyaṃ prāpyāpi svena karmaṇā | vāyurabhramivāsādya bhraṃśayatyanaye sthitaḥ
अपने कर्म से पिता-पितामहों का राज्य पाकर भी अनीति पर चलने वाला राजा उसे वैसे ही नष्ट कर देता है जैसे वायु बादल से टकराकर उसे छिन्न-भिन्न कर देती है।
श्लोक 29 (5.34.29)
धर्ममाचरतो राज्ञः सद्भिश्चरितमादितः । वसुधा वसुसंपूर्णा वर्धते भूतिवर्धनी ॥
dharmamācarato rājñaḥ sadbhiścaritamāditaḥ | vasudhā vasusaṃpūrṇā vardhate bhūtivardhanī
जो राजा धर्म का आचरण करता है और आरंभ से ही सज्जनों के चलाए मार्ग पर चलता है, उसके लिए धन से भरी पृथ्वी फलती-फूलती है और उसकी समृद्धि बढ़ाती है।
श्लोक 30 (5.34.30)
अथ संत्यजतो धर्ममधर्मं चानुतिष्ठतः । प्रतिसंवेष्टते भूमिरग्नौ चर्माहितं यथा ॥
atha saṃtyajato dharmamadharmaṃ cānutiṣṭhataḥ | pratisaṃveṣṭate bhūmiragnau carmāhitaṃ yathā
परंतु जो धर्म को छोड़कर अधर्म का आचरण करता है, उसके लिए पृथ्वी वैसे ही सिकुड़ जाती है जैसे आग पर रखा चमड़ा।
श्लोक 31 (5.34.31)
य एव यत्नः क्रियते परराष्ट्रविमर्दने । स एव यत्नः कर्तव्यः स्वराष्ट्रपरिपालने ॥
ya eva yatnaḥ kriyate pararāṣṭravimardane | sa eva yatnaḥ kartavyaḥ svarāṣṭraparipālane
दूसरे के राज्य को कुचलने में जितना प्रयत्न किया जाता है, उतना ही प्रयत्न अपने राज्य की रक्षा में करना चाहिए।
श्लोक 32 (5.34.32)
धर्मेण राज्यं विन्देत धर्मेण परिपालयेत् । धर्ममूलां श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते ॥
dharmeṇa rājyaṃ vindeta dharmeṇa paripālayet | dharmamūlāṃ śriyaṃ prāpya na jahāti na hīyate
धर्म से ही राज्य प्राप्त करना चाहिए और धर्म से ही उसकी रक्षा करनी चाहिए। धर्म पर आधारित लक्ष्मी पा लेने पर वह न उसे छोड़ती है, न वह उससे वंचित होता है।
श्लोक 33 (5.34.33)
अप्युन्मत्तात्प्रलपतो बालाच्च परिजल्पतः । सर्वतः सारमादद्यादश्मभ्य इव काञ्चनम् ॥
apyunmattātpralapato bālācca parijalpataḥ | sarvataḥ sāramādadyādaśmabhya iva kāñcanam
पागल के प्रलाप से और बालक की बकबक से भी, हर ओर से सार ग्रहण करना चाहिए, जैसे पत्थरों में से सोना निकाला जाता है।
श्लोक 34 (5.34.34)
सुव्याहृतानि महतां सुकृतानि ततस्ततः । सञ्चिन्वन्धीर आसीत शिलाहारी शिलं यथा ॥
suvyāhṛtāni mahatāṃ sukṛtāni tatastataḥ | sañcinvandhīra āsīta śilāhārī śilaṃ yathā
महापुरुषों के सुवचनों और सत्कर्मों को इधर-उधर से बटोरते हुए धीर पुरुष वैसे ही रहे जैसे खेतों में गिरे दाने चुनकर जीने वाला रहता है।
श्लोक 35 (5.34.35)
गन्धेन गावः पश्यन्ति वेदैः पश्यन्ति ब्राह्मणाः । चारैः पश्यन्ति राजानश्चक्षुर्भ्यामितरे जनाः ॥
gandhena gāvaḥ paśyanti vedaiḥ paśyanti brāhmaṇāḥ | cāraiḥ paśyanti rājānaścakṣurbhyāmitare janāḥ
गायें गंध से देखती हैं, ब्राह्मण वेदों से देखते हैं, राजा गुप्तचरों से देखते हैं और अन्य लोग अपनी दोनों आँखों से।
श्लोक 36 (5.34.36)
भूयांसं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा । अथ या सुदुघा राजन्नैव तां वितुदन्त्यपि ॥
bhūyāṃsaṃ labhate kleśaṃ yā gaurbhavati durduhā | atha yā sudughā rājannaiva tāṃ vitudantyapi
जो गाय कठिनाई से दूध देती है, वह बहुत कष्ट पाती है; परंतु हे राजन्, जो सरलता से दूध देती है, उसे कोई नहीं सताता।
श्लोक 37 (5.34.37)
यदतप्तं प्रणमति न तत्सन्तापमर्हति । यच्च स्वयं नतं दारु न तत्संनामयेद्बुधः ॥
yadataptaṃ praṇamati na tatsantāpamarhati | yacca svayaṃ nataṃ dāru na tatsaṃnāmayedbudhaḥ
जो बिना तपाए ही झुक जाता है, उसे तपाने की आवश्यकता नहीं; और जो लकड़ी स्वयं झुकी हुई है, बुद्धिमान उसे झुकाने का प्रयत्न नहीं करता।
श्लोक 38 (5.34.38)
एतयोपमया धीरः सन्नमेत बलीयसे । इन्द्राय स प्रणमते नमते यो बलीयसे ॥
etayopamayā dhīraḥ sannameta balīyase | indrāya sa praṇamate namate yo balīyase
इसी उदाहरण को ध्यान में रखकर धीर पुरुष को अपने से बलवान के सामने झुक जाना चाहिए। जो बलवान को नमन करता है, वह मानो इंद्र को ही नमन करता है।
श्लोक 39 (5.34.39)
पर्जन्यनाथाः पशवो राजानो मन्त्रिबान्धवाः । पतयो बान्धवाः स्त्रीणां ब्राह्मणा वेदबान्धवाः ॥
parjanyanāthāḥ paśavo rājāno mantribāndhavāḥ | patayo bāndhavāḥ strīṇāṃ brāhmaṇā vedabāndhavāḥ
पशुओं का रक्षक मेघ है, राजाओं के बंधु उनके मंत्री हैं, स्त्रियों के बंधु उनके पति हैं और ब्राह्मणों के बंधु वेद हैं।
श्लोक 40 (5.34.40)
सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते । मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते ॥
satyena rakṣyate dharmo vidyā yogena rakṣyate | mṛjayā rakṣyate rūpaṃ kulaṃ vṛttena rakṣyate
धर्म की रक्षा सत्य से होती है, विद्या की अभ्यास से, रूप की स्वच्छता से और कुल की सदाचार से।
श्लोक 41 (5.34.41)
मानेन रक्ष्यते धान्यमश्वान्रक्षेदनुक्रमात् । अभीक्ष्णदर्शनाद्गावः स्त्रियो रक्ष्याः कुचेलतः ॥
mānena rakṣyate dhānyamaśvānrakṣedanukramāt | abhīkṣṇadarśanādgāvaḥ striyo rakṣyāḥ kucelataḥ
अनाज की रक्षा नाप-तौल से होती है; घोड़ों की रक्षा नियमित अभ्यास से करनी चाहिए; गायों की बार-बार देखभाल से और स्त्रियों की सादे वस्त्रों से।
श्लोक 42 (5.34.42)
न कुलं वृत्तहीनस्य प्रमाणमिति मे मतिः । अन्तेष्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते ॥
na kulaṃ vṛttahīnasya pramāṇamiti me matiḥ | anteṣvapi hi jātānāṃ vṛttameva viśiṣyate
मेरा मत है कि आचरणहीन व्यक्ति के लिए उसका कुल कोई प्रमाण नहीं; क्योंकि निम्न स्थिति में जन्मे लोगों में भी आचरण ही किसी को श्रेष्ठ बनाता है।
श्लोक 43 (5.34.43)
य ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्ये कुलान्वये । सुखसौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिरनन्तकः ॥
ya īrṣuḥ paravitteṣu rūpe vīrye kulānvaye | sukhasaubhāgyasatkāre tasya vyādhiranantakaḥ
जो दूसरों के धन, रूप, पराक्रम, कुल-परंपरा, सुख, सौभाग्य और सम्मान से ईर्ष्या करता है, उसका रोग कभी समाप्त नहीं होता।
श्लोक 44 (5.34.44)
अकार्यकरणाद्भीतः कार्याणां च विवर्जनात् । अकाले मन्त्रभेदाच्च येन माद्येन्न तत्पिबेत् ॥
akāryakaraṇādbhītaḥ kāryāṇāṃ ca vivarjanāt | akāle mantrabhedācca yena mādyenna tatpibet
न करने योग्य कार्य कर बैठने, करने योग्य कार्य छोड़ देने और असमय गुप्त मंत्रणा प्रकट हो जाने के भय से, जिस वस्तु से नशा हो उसे नहीं पीना चाहिए।
श्लोक 45 (5.34.45)
विद्यामदो धनमदस्तृतीयोऽभिजनो मदः । मदा एतेऽवलिप्तानामेत एव सतां दमाः ॥
vidyāmado dhanamadastṛtīyo'bhijano madaḥ | madā ete'valiptānāmeta eva satāṃ damāḥ
विद्या का मद, धन का मद और तीसरा कुल का मद; ये तीनों घमंडी लोगों के लिए मद हैं, पर सज्जनों के लिए यही संयम के साधन हैं।
श्लोक 46 (5.34.46)
असन्तोऽभ्यर्थिताः सद्भिः क्वचित्कार्ये कदाचन । मन्यन्ते सन्तमात्मानमसन्तमपि विश्रुतम् ॥
asanto'bhyarthitāḥ sadbhiḥ kvacitkārye kadācana | manyante santamātmānamasantamapi viśrutam
जब कभी सज्जन किसी कार्य के लिए दुष्टों से अनुरोध करते हैं, तो वे दुष्ट, जिनकी दुष्टता जगजाहिर है, स्वयं को सज्जन मान बैठते हैं।
श्लोक 47 (5.34.47)
गतिरात्मवतां सन्तः सन्त एव सतां गतिः । असतां च गतिः सन्तो न त्वसन्तः सतां गतिः ॥
gatirātmavatāṃ santaḥ santa eva satāṃ gatiḥ | asatāṃ ca gatiḥ santo na tvasantaḥ satāṃ gatiḥ
सज्जन संयमी लोगों का आश्रय हैं, सज्जन ही सज्जनों का आश्रय हैं। दुष्टों का आश्रय भी सज्जन ही हैं, परंतु दुष्ट सज्जनों का आश्रय नहीं होते।
श्लोक 48 (5.34.48)
जिता सभा वस्त्रवता मिष्टाशा गोमता जिता । अध्वा जितो यानवता सर्वं शीलवता जितम् ॥
jitā sabhā vastravatā miṣṭāśā gomatā jitā | adhvā jito yānavatā sarvaṃ śīlavatā jitam
अच्छे वस्त्र वाला सभा को जीत लेता है, गायों वाला मीठे भोजन की चाह को जीत लेता है, वाहन वाला मार्ग को जीत लेता है, पर शीलवान सब कुछ जीत लेता है।
श्लोक 49 (5.34.49)
शीलं प्रधानं पुरुषे तद्यस्येह प्रणश्यति । न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः ॥
śīlaṃ pradhānaṃ puruṣe tadyasyeha praṇaśyati | na tasya jīvitenārtho na dhanena na bandhubhiḥ
मनुष्य में शील ही प्रधान है। जिसका शील नष्ट हो गया, उसके लिए न जीवन का कोई प्रयोजन है, न धन का, न बंधु-बांधवों का।
श्लोक 50 (5.34.50)
आढ्यानां मांसपरमं मध्यानां गोरसोत्तरम् । तैलोत्तरं दरिद्राणां भोजनं भरतर्षभ ॥
āḍhyānāṃ māṃsaparamaṃ madhyānāṃ gorasottaram | tailottaraṃ daridrāṇāṃ bhojanaṃ bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, धनवानों के भोजन में मांस प्रधान होता है, मध्यम वर्ग के भोजन में दूध-दही, और निर्धनों के भोजन में तेल।
श्लोक 51 (5.34.51)
संपन्नतरमेवान्नं दरिद्रा भुञ्जते सदा । क्षुत्स्वादुतां जनयति सा चाढ्येषु सुदुर्लभा ॥
saṃpannataramevānnaṃ daridrā bhuñjate sadā | kṣutsvādutāṃ janayati sā cāḍhyeṣu sudurlabhā
निर्धन सदा अधिक स्वादिष्ट भोजन करते हैं, क्योंकि भूख भोजन में स्वाद ला देती है, और वह धनवानों में अत्यंत दुर्लभ है।
श्लोक 52 (5.34.52)
प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते । जीर्यन्त्यपि हि काष्ठानि दरिद्राणां महीपते ॥
prāyeṇa śrīmatāṃ loke bhoktuṃ śaktirna vidyate | jīryantyapi hi kāṣṭhāni daridrāṇāṃ mahīpate
प्रायः संसार में धनवानों में भोजन का आनंद लेने की शक्ति नहीं होती, जबकि हे पृथ्वीपति, निर्धन तो लकड़ी तक पचा लेते हैं।
श्लोक 53 (5.34.53)
अवृत्तिर्भयमन्त्यानां मध्यानां मरणाद्भयम् । उत्तमानां तु मर्त्यानामवमानात्परं भयम् ॥
avṛttirbhayamantyānāṃ madhyānāṃ maraṇādbhayam | uttamānāṃ tu martyānāmavamānātparaṃ bhayam
अधम लोगों को आजीविका छिन जाने का भय होता है, मध्यम लोगों को मृत्यु का, परंतु उत्तम मनुष्यों को अपमान का भय सबसे बड़ा होता है।
श्लोक 54 (5.34.54)
ऐश्वर्यमदपापिष्ठा मदाः पानमदादयः । ऐश्वर्यमदमत्तो हि नो पतित्वाऽवबुध्यते ॥
aiśvaryamadapāpiṣṭhā madāḥ pānamadādayaḥ | aiśvaryamadamatto hi no patitvā'vabudhyate
मद्यपान आदि सब मदों में ऐश्वर्य का मद सबसे बुरा है, क्योंकि ऐश्वर्य के मद में चूर व्यक्ति गिरे बिना होश में नहीं आता।
श्लोक 55 (5.34.55)
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु वर्तमानैरनिग्रहैः । तैरयं ताप्यते लोको नक्षत्राणि ग्रहैरिव ॥
indriyairindriyārtheṣu vartamānairanigrahaiḥ | tairayaṃ tāpyate loko nakṣatrāṇi grahairiva
विषयों में बेलगाम विचरती इंद्रियों से यह संसार वैसे ही पीड़ित होता है जैसे ग्रहों से नक्षत्र।
श्लोक 56 (5.34.56)
यो जितः पञ्चवर्गेण सहजेनात्मकर्षिणा । आपदस्तस्य वर्धन्ते शुक्लपक्ष इवोडुराट् ॥
yo jitaḥ pañcavargeṇa sahajenātmakarṣiṇā | āpadastasya vardhante śuklapakṣa ivoḍurāṭ
जो अपने साथ ही जन्मे और आत्मा को नीचे खींचने वाले पाँच इंद्रियों के समूह से पराजित है, उसकी विपत्तियाँ शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की तरह बढ़ती जाती हैं।
श्लोक 57 (5.34.57)
अविजित्य य आत्मानममात्यान्विजिगीषते । अमित्रान्वा जितामात्यः सोऽवशः परिहीयते ॥
avijitya ya ātmānamamātyānvijigīṣate | amitrānvā jitāmātyaḥ so'vaśaḥ parihīyate
जो स्वयं को जीते बिना मंत्रियों को जीतना चाहता है, या मंत्रियों को अपना बनाए बिना शत्रुओं को, वह असहाय होकर नष्ट हो जाता है।
श्लोक 58 (5.34.58)
आत्मानमेव प्रथमं द्वेष्यरूपेण योजयेत् । ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते ॥
ātmānameva prathamaṃ dveṣyarūpeṇa yojayet | tato'mātyānamitrāṃśca na moghaṃ vijigīṣate
पहले अपने आप को ही शत्रु मानकर वश में करना चाहिए; उसके बाद मंत्रियों और शत्रुओं को जीतने का उसका प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाता।
श्लोक 59 (5.34.59)
वश्येन्द्रियं जितामात्यं धृतदण्डं विकारिषु । परीक्ष्यकारिणं धीरमत्यन्तं श्रीर्निषेवते ॥
vaśyendriyaṃ jitāmātyaṃ dhṛtadaṇḍaṃ vikāriṣu | parīkṣyakāriṇaṃ dhīramatyantaṃ śrīrniṣevate
जिसकी इंद्रियाँ वश में हैं, जिसने मंत्रियों को अपना बना लिया है, जो अपराधियों पर दंड का अंकुश रखता है और परखकर ही कार्य करता है, ऐसे धीर पुरुष की लक्ष्मी भरपूर सेवा करती है।
श्लोक 60 (5.34.60)
रथः शरीरं पुरुषस्य राज- । न्नात्मा नियन्तेन्द्रियाण्यस्य चाश्वाः । तैरप्रमत्तः कुशली सदश्वै- । र्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ॥
rathaḥ śarīraṃ puruṣasya rāja- | nnātmā niyantendriyāṇyasya cāśvāḥ | tairapramattaḥ kuśalī sadaśvai- | rdāntaiḥ sukhaṃ yāti rathīva dhīraḥ
हे राजन्, मनुष्य का शरीर रथ है, आत्मा सारथि है और इंद्रियाँ उसके घोड़े हैं। इन उत्तम घोड़ों को साधकर सावधान और कुशल धीर पुरुष रथी की भाँति सुखपूर्वक यात्रा करता है।
श्लोक 61 (5.34.61)
एतान्यनिगृहीतानि व्यापादयितुमप्यलम् । अविधेया इवादान्ताः सरथं सारथिं हयम् ॥
etānyanigṛhītāni vyāpādayitumapyalam | avidheyā ivādāntāḥ sarathaṃ sārathiṃ hayam
ये इंद्रियाँ वश में न हों तो विनाश तक कर सकती हैं, जैसे बिना सधे, बेकाबू घोड़े रथ सहित सारथि को और स्वयं घोड़ों को भी नष्ट कर देते हैं।
श्लोक 62 (5.34.62)
अनर्थमर्थतः पश्यन्नर्थं चैवाप्यनर्थतः । इन्द्रियैरजितैर्बालः सुदुःखं मन्यते सुखम् ॥
anarthamarthataḥ paśyannarthaṃ caivāpyanarthataḥ | indriyairajitairbālaḥ suduḥkhaṃ manyate sukham
अनर्थ को अर्थ और अर्थ को अनर्थ समझता हुआ, जिसने इंद्रियों को नहीं जीता वह मूर्ख घोर दुःख को सुख मान लेता है।
श्लोक 63 (5.34.63)
धर्मार्थौ यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानुगः । श्रीप्राणधनदारेभ्यः क्षिप्रं स परिहीयते ॥
dharmārthau yaḥ parityajya syādindriyavaśānugaḥ | śrīprāṇadhanadārebhyaḥ kṣipraṃ sa parihīyate
जो धर्म और अर्थ को छोड़कर इंद्रियों के वश में चलने लगता है, वह शीघ्र ही लक्ष्मी, प्राण, धन और पत्नी से वंचित हो जाता है।
श्लोक 64 (5.34.64)
अर्थानामीश्वरो यः स्यादिन्द्रियाणामनीश्वरः । इन्द्रियाणामनैश्वर्यादैश्वर्याद्भ्रश्यते हि सः ॥
arthānāmīśvaro yaḥ syādindriyāṇāmanīśvaraḥ | indriyāṇāmanaiśvaryādaiśvaryādbhraśyate hi saḥ
जो धन का स्वामी हो पर इंद्रियों का स्वामी न हो, वह इंद्रियों पर अधिकार न होने के कारण अपने ऐश्वर्य से गिर जाता है।
श्लोक 65 (5.34.65)
आत्मनात्मानमन्विच्छेन्मनोबुद्धीन्द्रियैर्यतैः । आत्मा ह्येवात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
ātmanātmānamanvicchenmanobuddhīndriyairyataiḥ | ātmā hyevātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ
मन, बुद्धि और इंद्रियों को संयमित करके आत्मा के द्वारा आत्मा को खोजना चाहिए; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का बंधु है और आत्मा ही आत्मा का शत्रु।
श्लोक 66 (5.34.66)
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनैवात्मात्मना जितः । स एव नियतो बन्धुः स एव नियतो रिपुः ॥
bandhurātmātmanastasya yenaivātmātmanā jitaḥ | sa eva niyato bandhuḥ sa eva niyato ripuḥ
जिसने अपने आप से अपने आप को जीत लिया है, उसका आत्मा ही उसका बंधु है। वही निश्चय ही बंधु है और वही निश्चय ही शत्रु।
श्लोक 67 (5.34.67)
क्षुद्राक्षेणेव जालेन झषावपिहितावुरू । कामश्च राजन्क्रोधश्च तौ प्रज्ञानं विलुम्पतः ॥
kṣudrākṣeṇeva jālena jhaṣāvapihitāvurū | kāmaśca rājankrodhaśca tau prajñānaṃ vilumpataḥ
जैसे बारीक जाल में फँसी दो बड़ी मछलियाँ जाल को फाड़ डालती हैं, वैसे ही हे राजन्, काम और क्रोध मनुष्य के ज्ञान को नष्ट कर देते हैं।
श्लोक 68 (5.34.68)
समवेक्ष्येह धर्मार्थौ संभारान्योऽधिगच्छति । स वै संभृतसंभारः सततं सुखमेधते ॥
samavekṣyeha dharmārthau saṃbhārānyo'dhigacchati | sa vai saṃbhṛtasaṃbhāraḥ satataṃ sukhamedhate
जो धर्म और अर्थ पर विचार करके उनके साधन जुटाता है, वह साधनों से संपन्न होकर सदा सुख से उन्नति करता है।
श्लोक 69 (5.34.69)
यः पञ्चाभ्यन्तराञ्शत्रूनविजित्य मनोमयान् । जिगीषति रिपूनन्यान्रिपवोऽभिभवन्ति तम् ॥
yaḥ pañcābhyantarāñśatrūnavijitya manomayān | jigīṣati ripūnanyānripavo'bhibhavanti tam
जो मन से उपजे पाँच भीतरी शत्रुओं को जीते बिना दूसरे शत्रुओं को जीतना चाहता है, उसे शत्रु पराजित कर देते हैं।
श्लोक 70 (5.34.70)
दृश्यन्ते हि महात्मानो बध्यमानाः स्वकर्मभिः । इन्द्रियाणामनीशत्वाद्राजानो राज्यविभ्रमैः ॥
dṛśyante hi mahātmāno badhyamānāḥ svakarmabhiḥ | indriyāṇāmanīśatvādrājāno rājyavibhramaiḥ
देखा जाता है कि इंद्रियों पर अधिकार न होने से महात्मा भी अपने ही कर्मों से बँध जाते हैं, और राजा राज्य के भ्रम में।
श्लोक 71 (5.34.71)
असंत्यागात्पापकृतामपापां- । स्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात् । शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावा- । त्तस्मात्पापैः सह सन्धिं न कुर्यात् ॥
asaṃtyāgātpāpakṛtāmapāpāṃ- | stulyo daṇḍaḥ spṛśate miśrabhāvāt | śuṣkeṇārdraṃ dahyate miśrabhāvā- | ttasmātpāpaiḥ saha sandhiṃ na kuryāt
पापियों का साथ न छोड़ने से, मिले-जुले रहने के कारण निर्दोषों को भी समान दंड भुगतना पड़ता है; मिल जाने पर सूखी लकड़ी के साथ गीली भी जल जाती है। इसलिए दुष्टों के साथ मेल नहीं करना चाहिए।
श्लोक 72 (5.34.72)
निजानुत्पततः शत्रून्पञ्च पञ्चप्रयोजनान् । यो मोहान्न निगृह्णाति तमापद्ग्रसते नरम् ॥
nijānutpatataḥ śatrūnpañca pañcaprayojanān | yo mohānna nigṛhṇāti tamāpadgrasate naram
जो मोहवश अपने भीतर उठने वाले, पाँच विषयों की ओर दौड़ने वाले पाँच शत्रुओं को वश में नहीं करता, उस मनुष्य को विपत्ति ग्रस लेती है।
श्लोक 73 (5.34.73)
अनसूयार्जवं शौचं सन्तोषः प्रियवादिता । दमः सत्यमनायासो न भवन्ति दुरात्मनाम् ॥
anasūyārjavaṃ śaucaṃ santoṣaḥ priyavāditā | damaḥ satyamanāyāso na bhavanti durātmanām
ईर्ष्या न करना, सरलता, पवित्रता, संतोष, प्रिय वाणी, इंद्रिय-संयम, सत्य और शांत भाव; ये आठ गुण दुष्टों में नहीं होते।
श्लोक 74 (5.34.74)
आत्मज्ञानमनायासस्तितिक्षा धर्मनित्यता । वाक्चैव गुप्ता दानं च नैतान्यन्त्येषु भारत ॥
ātmajñānamanāyāsastitikṣā dharmanityatā | vākcaiva guptā dānaṃ ca naitānyantyeṣu bhārata
आत्मज्ञान, उद्वेग से मुक्ति, सहनशीलता, धर्म में निष्ठा, संयत वाणी और दान; हे भारत, ये छह गुण अधम लोगों में नहीं होते।
श्लोक 75 (5.34.75)
आक्रोशपरिवादाभ्यां विहिंसन्त्यबुधा बुधान् । वक्ता पापमुपादत्ते क्षममाणो विमुच्यते ॥
ākrośaparivādābhyāṃ vihiṃsantyabudhā budhān | vaktā pāpamupādatte kṣamamāṇo vimucyate
मूर्ख लोग गाली और निंदा से बुद्धिमानों को चोट पहुँचाते हैं। कहने वाला पाप का भागी होता है और क्षमा करने वाला उससे मुक्त हो जाता है।
श्लोक 76 (5.34.76)
हिंसा बलमसाधूनां राज्ञां दण्डविधिर्बलम् । शुश्रूषा तु बलं स्त्रीणां क्षमा गुणवतां बलम् ॥
hiṃsā balamasādhūnāṃ rājñāṃ daṇḍavidhirbalam | śuśrūṣā tu balaṃ strīṇāṃ kṣamā guṇavatāṃ balam
हिंसा दुष्टों का बल है, दंड-विधान राजाओं का बल है, सेवा स्त्रियों का बल है और क्षमा गुणवानों का बल है।
श्लोक 77 (5.34.77)
वाक्संयमो हि नृपते सुदुष्करतमो मतः । अर्थवच्च विचित्रं च न शक्यं बहु भाषितुम् ॥
vāksaṃyamo hi nṛpate suduṣkaratamo mataḥ | arthavacca vicitraṃ ca na śakyaṃ bahu bhāṣitum
हे राजन्, वाणी का संयम सबसे कठिन माना गया है; बहुत बोलते हुए सार्थक और रोचक बोलना संभव नहीं होता।
श्लोक 78 (5.34.78)
अभ्यावहति कल्याणं विविधं वाक् सुभाषिता । सैव दुर्भाषिता राजन्ननर्थायोपपद्यते ॥
abhyāvahati kalyāṇaṃ vividhaṃ vāk subhāṣitā | saiva durbhāṣitā rājannanarthāyopapadyate
अच्छी तरह कही गई वाणी अनेक प्रकार का कल्याण लाती है; पर हे राजन्, वही वाणी बुरी तरह कही जाए तो अनर्थ का कारण बनती है।
श्लोक 79 (5.34.79)
रोहते सायकैर्विद्धं वनं परशुना हतम् । वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ॥
rohate sāyakairviddhaṃ vanaṃ paraśunā hatam | vācā duruktaṃ bībhatsaṃ na saṃrohati vākkṣatam
बाणों से बिंधा या कुल्हाड़ी से काटा गया वन फिर उग आता है, परंतु कटु वचनों से हुआ भद्दा घाव कभी नहीं भरता।
श्लोक 80 (5.34.80)
कर्णिनालीकनाराचान्निर्हरन्ति शरीरतः । वाक्शल्यस्तु न निर्हर्तुं शक्यो हृदिशयो हि सः ॥
karṇinālīkanārācānnirharanti śarīrataḥ | vākśalyastu na nirhartuṃ śakyo hṛdiśayo hi saḥ
कर्णी, नालीक और नाराच जैसे बाण शरीर से निकाले जा सकते हैं, परंतु वाणी का बाण नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि वह हृदय में धँस जाता है।
श्लोक 81 (5.34.81)
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति । यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य नामर्मसु ते पतन्ति । तान्पण्डितो नावसृजेत्परेभ्यः ॥
vāksāyakā vadanānniṣpatanti | yairāhataḥ śocati rātryahāni | parasya nāmarmasu te patanti | tānpaṇḍito nāvasṛjetparebhyaḥ
वचन रूपी बाण मुख से निकलते हैं, जिनसे आहत मनुष्य रात-दिन शोक करता है। वे दूसरे के मर्मस्थलों पर ही गिरते हैं; इसलिए बुद्धिमान दूसरों पर उन्हें न छोड़े।
श्लोक 82 (5.34.82)
यस्मै देवाः प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम् । बुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽवाचीनानि पश्यति ॥
yasmai devāḥ prayacchanti puruṣāya parābhavam | buddhiṃ tasyāpakarṣanti so'vācīnāni paśyati
देवता जिस मनुष्य को पराजय देना चाहते हैं, पहले उसकी बुद्धि हर लेते हैं; तब उसे सब कुछ उलटा दिखाई देता है।
श्लोक 83 (5.34.83)
बुद्धौ कलुषभूतायां विनाशे प्रत्युपस्थिते । अनयो नयसङ्काशो हृदयान्नापसर्पति ॥
buddhau kaluṣabhūtāyāṃ vināśe pratyupasthite | anayo nayasaṅkāśo hṛdayānnāpasarpati
जब बुद्धि मलिन हो जाती है और विनाश निकट आ पहुँचता है, तब नीति जैसी दिखने वाली अनीति हृदय से नहीं हटती।
श्लोक 84 (5.34.84)
सेयं बुद्धिः परीता ते पुत्राणां भरतर्षभ । पाण्डवानां विरोधेन न चैनानवबुध्यसे ॥
seyaṃ buddhiḥ parītā te putrāṇāṃ bharatarṣabha | pāṇḍavānāṃ virodhena na cainānavabudhyase
हे भरतश्रेष्ठ, पांडवों से वैर के कारण तुम्हारे पुत्रों की बुद्धि ऐसी ही मलिन हो गई है, और तुम उन्हें ठीक से पहचान नहीं पा रहे हो।
श्लोक 85 (5.34.85)
राजा लक्षणसंपन्नस्त्रैलोक्यस्यापि यो भवेत् । शिष्यस्ते शासिता सोऽस्तु धृतराष्ट्र युधिष्ठिरः ॥
rājā lakṣaṇasaṃpannastrailokyasyāpi yo bhavet | śiṣyaste śāsitā so'stu dhṛtarāṣṭra yudhiṣṭhiraḥ
हे धृतराष्ट्र, जो सभी राज-लक्षणों से संपन्न है और तीनों लोकों का भी राजा होने योग्य है, वह युधिष्ठिर तुम्हारा आज्ञाकारी रहते हुए शासक बने।
श्लोक 86 (5.34.86)
अतीव सर्वान्पुत्रांस्ते भागधेयपुरस्कृतः । तेजसा प्रज्ञया चैव युक्तो धर्मार्थतत्त्ववित् ॥
atīva sarvānputrāṃste bhāgadheyapuraskṛtaḥ | tejasā prajñayā caiva yukto dharmārthatattvavit
भाग्य जिसके साथ है, वह तुम्हारे सभी पुत्रों से कहीं बढ़कर है; वह तेज और बुद्धि से युक्त है तथा धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानता है।
श्लोक 87 (5.34.87)
अनुक्रोशादानृशंस्याद्योऽसौ धर्मभृतां वरः । गौरवात्तव राजेन्द्र बहून्क्लेशांस्तितिक्षति ॥
anukrośādānṛśaṃsyādyo'sau dharmabhṛtāṃ varaḥ | gauravāttava rājendra bahūnkleśāṃstitikṣati
धर्मात्माओं में श्रेष्ठ वह युधिष्ठिर करुणा और दयालुता के कारण, और हे राजेंद्र, तुम्हारे प्रति आदर के कारण बहुत से कष्ट सहता है।