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उद्योग पर्व · अध्याय 38

अतिथि-सत्कार और मंत्रणा की रक्षा

विदुर नीति, अध्याय 6 / 8

विदुर गृहस्थ और राजा के कर्तव्यों की ओर मुड़ते हैं। वे बताते हैं कि वृद्धों और अतिथियों का सत्कार कैसे करें, कौन-से अतिथि पैर धोने के जल के भी अधिकारी नहीं, क्या नहीं बेचना चाहिए, और सच्चे भिक्षु तथा सच्चे तपस्वी के लक्षण क्या हैं; फिर वे मंत्रणा को गुप्त रखने, मंत्रियों को परखने, सेवकों में धन बाँटने और शत्रुओं से निपटने पर विस्तार से बोलते हैं। अन्त में वे धृतराष्ट्र को चेताते हैं कि पाण्डवों को छोड़कर दुर्योधन को ऐश्वर्य सौंपने के कारण वे शीघ्र ही अपने पुत्र को सत्ता से वैसे ही गिरता देखेंगे, जैसे बलि तीनों लोकों से गिरे थे।

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

विदुर उवाच

श्लोक 1 (5.38.1)

ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति । प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्प्रतिपद्यते ॥

ūrdhvaṃ prāṇā hyutkrāmanti yūnaḥ sthavira āyati | pratyutthānābhivādābhyāṃ punastānpratipadyate

जब कोई वृद्ध पास आता है, तो युवक के प्राण ऊपर की ओर उठकर मानो निकलने लगते हैं; उठकर उनका स्वागत करने और प्रणाम करने से वह उन्हें फिर से पा लेता है।

श्लोक 2 (5.38.2)

पीठं दत्त्वा साधवेऽभ्यागताय । आनीयापः परिनिर्णिज्य पादौ । सुखं पृष्ट्वा प्रतिवेद्यात्मसंस्थां । ततो दद्यादन्नमवेक्ष्य धीरः ॥

pīṭhaṃ dattvā sādhave'bhyāgatāya | ānīyāpaḥ parinirṇijya pādau | sukhaṃ pṛṣṭvā prativedyātmasaṃsthāṃ | tato dadyādannamavekṣya dhīraḥ

सज्जन अतिथि के आने पर धीर पुरुष उसे आसन दे, जल लाकर उसके पैर धोए, कुशल-क्षेम पूछे, अपनी स्थिति बताए, और फिर सोच-समझकर उसे भोजन कराए।

श्लोक 3 (5.38.3)

यस्योदकं मधुपर्कं च गां च । न मन्त्रवित्प्रतिगृह्णाति गेहे । लोभाद्भयादथ कार्पण्यतो वा । तस्यानर्थं जीवितमाहुरार्याः ॥

yasyodakaṃ madhuparkaṃ ca gāṃ ca | na mantravitpratigṛhṇāti gehe | lobhādbhayādatha kārpaṇyato vā | tasyānarthaṃ jīvitamāhurāryāḥ

श्रेष्ठ पुरुष कहते हैं कि उस मनुष्य का जीवन व्यर्थ है, जिसके घर में मन्त्रों का ज्ञाता ब्राह्मण उसके लोभ, भय या कृपणता के कारण जल, मधुपर्क और गौ स्वीकार नहीं करता।

श्लोक 4 (5.38.4)

चिकित्सकः शल्यकर्तावकीर्णी । स्तेनः क्रूरो मद्यपो भ्रूणहा च । सेनाजीवी श्रुतिविक्रायकश्च । भृशं प्रियोऽप्यतिथिर्नोदकार्हः ॥

cikitsakaḥ śalyakartāvakīrṇī | stenaḥ krūro madyapo bhrūṇahā ca | senājīvī śrutivikrāyakaśca | bhṛśaṃ priyo'pyatithirnodakārhaḥ

वैद्य, बाण बनाने वाला, ब्रह्मचर्य-व्रत तोड़ने वाला, चोर, क्रूर, मद्यपी, भ्रूण-हत्यारा, सेना से जीविका चलाने वाला और वेद बेचने वाला — ऐसा अतिथि कितना ही प्रिय क्यों न हो, पैर धोने के जल का भी अधिकारी नहीं है।

श्लोक 5 (5.38.5)

अविक्रेयं लवणं पक्वमन्नं । दधि क्षीरं मधु तैलं घृतं च । तिला मांसं फलमूलानि शाकं । रक्तं वासः सर्वगन्धा गुडाश्च ॥

avikreyaṃ lavaṇaṃ pakvamannaṃ | dadhi kṣīraṃ madhu tailaṃ ghṛtaṃ ca | tilā māṃsaṃ phalamūlāni śākaṃ | raktaṃ vāsaḥ sarvagandhā guḍāśca

नमक, पका हुआ अन्न, दही, दूध, मधु, तेल, घी, तिल, मांस, फल-मूल, साग, लाल वस्त्र, सब प्रकार की सुगन्धित वस्तुएँ और गुड़ — इन्हें नहीं बेचना चाहिए।

श्लोक 6 (5.38.6)

अरोषणो यः समलोष्ठाश्मकाञ्चनः । प्रहीणशोको गतसन्धिविग्रहः । निन्दाप्रशंसोपरतः प्रियाप्रिये । त्यजन्नुदासीनवदेष भिक्षुकः ॥

aroṣaṇo yaḥ samaloṣṭhāśmakāñcanaḥ | prahīṇaśoko gatasandhivigrahaḥ | nindāpraśaṃsoparataḥ priyāpriye | tyajannudāsīnavadeṣa bhikṣukaḥ

जो क्रोध-रहित है, जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना एक समान हैं, जिसका शोक मिट चुका है, जो सन्धि और विग्रह दोनों से परे है, जो निन्दा और प्रशंसा से विरक्त है, और प्रिय-अप्रिय को छोड़कर उदासीन की भाँति रहता है — वही सच्चा भिक्षु है।

श्लोक 7 (5.38.7)

नीवारमूलेङ्गुदशाकवृत्तिः । सुसंयतात्माग्निकार्येषु चोद्यः । वने वसन्नतिथिष्वप्रमत्तो । धुरन्धरः पुण्यकृदेष तापसः ॥

nīvāramūleṅgudaśākavṛttiḥ | susaṃyatātmāgnikāryeṣu codyaḥ | vane vasannatithiṣvapramatto | dhurandharaḥ puṇyakṛdeṣa tāpasaḥ

जो जंगली धान, कंद-मूल, इंगुदी के फल और साग पर जीवन चलाता है, जिसका मन भली-भाँति संयमित है, जो अग्निहोत्र में तत्पर रहता है, और वन में रहते हुए भी अतिथियों के प्रति सजग रहता है — वह धर्म का भार उठाने वाला पुण्यात्मा ही सच्चा तपस्वी है।

श्लोक 8 (5.38.8)

अपकृत्य बुद्धिमतो दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् । दीर्घौ बुद्धिमतो बाहू याभ्यां हिंसति हिंसितः ॥

apakṛtya buddhimato dūrastho'smīti nāśvaset | dīrghau buddhimato bāhū yābhyāṃ hiṃsati hiṃsitaḥ

किसी बुद्धिमान का अपकार करके यह सोचकर निश्चिन्त न हो कि 'मैं दूर हूँ'। बुद्धिमान की भुजाएँ लम्बी होती हैं; चोट खाने पर वह उन्हीं से प्रहार करता है।

श्लोक 9 (5.38.9)

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥

na viśvasedaviśvaste viśvaste nātiviśvaset | viśvāsādbhayamutpannaṃ mūlānyapi nikṛntati

जो विश्वास के योग्य नहीं, उस पर विश्वास न करे, और जो विश्वसनीय है, उस पर भी अति-विश्वास न करे। विश्वास से उत्पन्न भय जड़ों तक को काट डालता है।

श्लोक 10 (5.38.10)

अनीर्ष्युर्गुप्तदारश्च संविभागी प्रियंवदः । श्लक्ष्णो मधुरवाक्स्त्रीणां न चासां वशगो भवेत् ॥

anīrṣyurguptadāraśca saṃvibhāgī priyaṃvadaḥ | ślakṣṇo madhuravākstrīṇāṃ na cāsāṃ vaśago bhavet

मनुष्य ईर्ष्या-रहित हो और अपनी पत्नी की रक्षा करे; दूसरों को बाँटकर उपभोग करे और प्रिय बोले। स्त्रियों से कोमल और मधुर वचन बोले, किन्तु उनके वश में न हो।

श्लोक 11 (5.38.11)

पूजनीया महाभागाः पुण्याश्च गृहदीप्तयः । स्त्रियः श्रियो गृहस्योक्तास्तस्माद्रक्ष्या विशेषतः ॥

pūjanīyā mahābhāgāḥ puṇyāśca gṛhadīptayaḥ | striyaḥ śriyo gṛhasyoktāstasmādrakṣyā viśeṣataḥ

स्त्रियाँ पूजनीय, महाभाग्यशाली और पवित्र हैं; वे घर की ज्योति हैं। उन्हें घर की लक्ष्मी कहा गया है, इसलिए उनकी विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 12 (5.38.12)

पितुरन्तःपुरं दद्यान्मातुर्दद्यान्महानसम् । गोषु चात्मसमं दद्यात्स्वयमेव कृषिं व्रजेत् । भृत्यैर्वाणिज्यचारं च पुत्रैः सेवेत च द्विजान् ॥

piturantaḥpuraṃ dadyānmāturdadyānmahānasam | goṣu cātmasamaṃ dadyātsvayameva kṛṣiṃ vrajet | bhṛtyairvāṇijyacāraṃ ca putraiḥ seveta ca dvijān

अन्तःपुर का भार पिता को और रसोई का भार माता को सौंपे; गौओं की देखभाल पर अपने समान व्यक्ति को लगाए, और खेती स्वयं देखे। व्यापार सेवकों के द्वारा चलाए और पुत्रों के द्वारा द्विजों की सेवा करे।

श्लोक 13 (5.38.13)

अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् । तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ॥

adbhyo'gnirbrahmataḥ kṣatramaśmano lohamutthitam | teṣāṃ sarvatragaṃ tejaḥ svāsu yoniṣu śāmyati

जल से अग्नि, ब्राह्मण से क्षत्रिय और पत्थर से लोहा उत्पन्न हुआ है। इनका तेज सर्वत्र पहुँचता है, किन्तु अपने ही उत्पत्ति-स्थान के सामने शान्त हो जाता है।

श्लोक 14 (5.38.14)

नित्यं सन्तः कुले जाताः पावकोपमतेजसः । क्षमावन्तो निराकाराः काष्ठेऽग्निरिव शेरते ॥

nityaṃ santaḥ kule jātāḥ pāvakopamatejasaḥ | kṣamāvanto nirākārāḥ kāṣṭhe'gniriva śerate

उत्तम कुल में जन्मे सज्जन, जिनका तेज अग्नि के समान है, सदा क्षमाशील रहते हैं और कोई बाहरी विकार नहीं दिखाते; वे लकड़ी में अग्नि की भाँति शान्त पड़े रहते हैं।

श्लोक 15 (5.38.15)

यस्य मन्त्रं न जानन्ति बाह्याश्चाभ्यन्तराश्च ये । स राजा सर्वतश्चक्षुश्चिरमैश्वर्यमश्नुते ॥

yasya mantraṃ na jānanti bāhyāścābhyantarāśca ye | sa rājā sarvataścakṣuściramaiśvaryamaśnute

जिस राजा की मंत्रणा को न बाहर के लोग जानते हैं, न भीतर के, और जिसकी दृष्टि सब ओर रहती है, वह दीर्घकाल तक ऐश्वर्य भोगता है।

श्लोक 16 (5.38.16)

करिष्यन्न प्रभाषेत कृतान्येव तु दर्शयेत् । धर्मकामार्थकार्याणि तथा मन्त्रो न भिद्यते ॥

kariṣyanna prabhāṣeta kṛtānyeva tu darśayet | dharmakāmārthakāryāṇi tathā mantro na bhidyate

धर्म, काम और अर्थ से जुड़े जो कार्य करने हों, उनके बारे में पहले से न कहे, बल्कि पूरे होने पर ही उन्हें दिखाए। इससे मंत्रणा भंग नहीं होती।

श्लोक 17 (5.38.17)

गिरिपृष्ठमुपारुह्य प्रासादं वा रहोगतः । अरण्ये निःशलाके वा तत्र मन्त्रोऽभिधीयते ॥

giripṛṣṭhamupāruhya prāsādaṃ vā rahogataḥ | araṇye niḥśalāke vā tatra mantro'bhidhīyate

पर्वत के शिखर पर या महल की छत पर चढ़कर, अथवा वन में ऐसे एकान्त स्थान में जाकर जहाँ घास-फूस की ओट न हो — वहीं मंत्रणा करनी चाहिए।

श्लोक 18 (5.38.18)

नासुहृत्परमं मन्त्रं भारतार्हति वेदितुम् । अपण्डितो वापि सुहृत्पण्डितो वाप्यनात्मवान् ॥

nāsuhṛtparamaṃ mantraṃ bhāratārhati veditum | apaṇḍito vāpi suhṛtpaṇḍito vāpyanātmavān

हे भारत! जो मित्र नहीं है, वह गूढ़ मंत्रणा जानने का अधिकारी नहीं है; न वह मित्र जो विद्वान न हो, और न वह विद्वान जो संयमी न हो।

श्लोक 19 (5.38.19)

नापरीक्ष्य महीपालः कुर्यात्सचिवमात्मनः । अमात्ये ह्यर्थलिप्सा च मन्त्ररक्षणमेव च ॥

nāparīkṣya mahīpālaḥ kuryātsacivamātmanaḥ | amātye hyarthalipsā ca mantrarakṣaṇameva ca

राजा बिना परखे किसी को अपना मंत्री न बनाए, क्योंकि धन का अर्जन और मंत्रणा की रक्षा — दोनों मंत्री पर ही निर्भर हैं।

श्लोक 20 (5.38.20)

कृतानि सर्वकार्याणि यस्य पारिषदा विदुः । धर्मे चार्थे च कामे च स राजा राजसत्तमः ॥

kṛtāni sarvakāryāṇi yasya pāriṣadā viduḥ | dharme cārthe ca kāme ca sa rājā rājasattamaḥ

जिस राजा के धर्म, अर्थ और काम से जुड़े सभी कार्यों को उसके सभासद तभी जान पाते हैं जब वे पूरे हो चुके हों, वह राजा राजाओं में श्रेष्ठ है।

श्लोक 21 (5.38.21)

गूढमन्त्रस्य नृपतेस्तस्य सिद्धिरसंशयम् । अप्रशस्तानि कार्याणि यो मोहादनुतिष्ठति ॥

gūḍhamantrasya nṛpatestasya siddhirasaṃśayam | apraśastāni kāryāṇi yo mohādanutiṣṭhati

गुप्त मंत्रणा रखने वाले ऐसे राजा की सफलता निःसन्देह है। किन्तु जो मोहवश निन्दनीय कार्य करता है,

श्लोक 22 (5.38.22)

स तेषां विपरिभ्रंशाद्भ्रश्यते जीवितादपि । कर्मणां तु प्रशस्तानामनुष्ठानं सुखावहम् ॥

sa teṣāṃ viparibhraṃśādbhraśyate jīvitādapi | karmaṇāṃ tu praśastānāmanuṣṭhānaṃ sukhāvaham

वह उन कार्यों के बिगड़ने पर अपने प्राणों से भी हाथ धो बैठता है। प्रशंसनीय कर्मों का आचरण सुख देने वाला है,

श्लोक 23 (5.38.23)

तेषामेवाननुष्ठानं पश्चात्तापकरं मतम् । अनधीत्य यथा वेदान्न विप्रः श्राद्धमर्हति ॥

teṣāmevānanuṣṭhānaṃ paścāttāpakaraṃ matam | anadhītya yathā vedānna vipraḥ śrāddhamarhati

और उन्हें न करना पश्चात्ताप का कारण माना गया है। जैसे वेदों का अध्ययन न करने वाला ब्राह्मण श्राद्ध में भोजन का अधिकारी नहीं होता,

श्लोक 24 (5.38.24)

एवमश्रुतषाड्गुण्यो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति । स्थानवृद्धिक्षयज्ञस्य षाड्गुण्यविदितात्मनः ॥

evamaśrutaṣāḍguṇyo na mantraṃ śrotumarhati | sthānavṛddhikṣayajñasya ṣāḍguṇyaviditātmanaḥ

वैसे ही जिसने राजनीति के छह गुणों (सन्धि, विग्रह आदि) को नहीं सीखा, वह मंत्रणा सुनने योग्य नहीं है। जो राजा स्थिरता, वृद्धि और क्षय को जानता है, जिसकी बुद्धि इन छह गुणों में पारंगत है,

श्लोक 25 (5.38.25)

अनवज्ञातशीलस्य स्वाधीना पृथिवी नृप । अमोघक्रोधहर्षस्य स्वयं कृत्वान्ववेक्षिणः ॥

anavajñātaśīlasya svādhīnā pṛthivī nṛpa | amoghakrodhaharṣasya svayaṃ kṛtvānvavekṣiṇaḥ

और जिसके आचरण की कोई अवहेलना नहीं करता, हे राजन्, पृथ्वी उसके अधीन रहती है। जिसका क्रोध और हर्ष कभी निष्फल नहीं होते, जो स्वयं कार्य करके फिर उसकी देखरेख करता है,

श्लोक 26 (5.38.26)

आत्मप्रत्ययकोशस्य वसुदैव वसुन्धरा । नाममात्रेण तुष्येत छत्रेण च महीपतिः ॥

ātmapratyayakośasya vasudaiva vasundharā | nāmamātreṇa tuṣyeta chatreṇa ca mahīpatiḥ

और जो अपने कोष को अपनी ही देखरेख में रखता है, उसके लिए यह पृथ्वी धन देने वाली बन जाती है। राजा को केवल 'राजा' नाम और छत्र से ही संतुष्ट रहना चाहिए;

श्लोक 27 (5.38.27)

भृत्येभ्यो विसृजेदर्थान्नैकः सर्वहरो भवेत् । ब्राह्मणं ब्राह्मणो वेद भर्ता वेद स्त्रियं तथा ॥

bhṛtyebhyo visṛjedarthānnaikaḥ sarvaharo bhavet | brāhmaṇaṃ brāhmaṇo veda bhartā veda striyaṃ tathā

उसे सेवकों में धन बाँटना चाहिए और अकेले सब कुछ न हड़पे। ब्राह्मण को ब्राह्मण जानता है, और पति पत्नी को जानता है;

श्लोक 28 (5.38.28)

अमात्यं नृपतिर्वेद राजा राजानमेव च । न शत्रुर्वशमापन्नो मोक्तव्यो वध्यतां गतः ॥

amātyaṃ nṛpatirveda rājā rājānameva ca | na śatrurvaśamāpanno moktavyo vadhyatāṃ gataḥ

राजा अपने मंत्री को जानता है, और राजा ही राजा को जानता है। जो शत्रु वश में आ गया हो और वध के योग्य हो, उसे छोड़ना नहीं चाहिए।

श्लोक 29 (5.38.29)

न्यग्भूत्वा पर्युपासीत वध्यं हन्याद्बले सति । अहताद्धि भयं तस्माज्जायते नचिरादिव ॥

nyagbhūtvā paryupāsīta vadhyaṃ hanyādbale sati | ahatāddhi bhayaṃ tasmājjāyate nacirādiva

निर्बल रहते हुए ऐसे शत्रु के आगे झुककर उसकी सेवा करे, और बल होने पर वध-योग्य शत्रु को मार डाले; क्योंकि न मारे गए शत्रु से शीघ्र ही भय उत्पन्न होता है।

श्लोक 30 (5.38.30)

दैवतेषु प्रयत्नेन राजसु ब्राह्मणेषु च । नियन्तव्यः सदा क्रोधो वृद्धबालातुरेषु च ॥

daivateṣu prayatnena rājasu brāhmaṇeṣu ca | niyantavyaḥ sadā krodho vṛddhabālātureṣu ca

देवताओं, राजाओं, ब्राह्मणों, वृद्धों, बालकों और रोगियों के प्रति सदा प्रयत्नपूर्वक क्रोध को रोकना चाहिए।

श्लोक 31 (5.38.31)

निरर्थं कलहं प्राज्ञो वर्जयेन्मूढसेवितम् । कीर्तिं च लभते लोके न चानर्थेन युज्यते ॥

nirarthaṃ kalahaṃ prājño varjayenmūḍhasevitam | kīrtiṃ ca labhate loke na cānarthena yujyate

बुद्धिमान व्यक्ति मूर्खों द्वारा किए जाने वाले निरर्थक कलह से बचे। इससे उसे संसार में कीर्ति मिलती है और वह अनर्थ में नहीं पड़ता।

श्लोक 32 (5.38.32)

प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थकः । न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्ढं पतिमिव स्त्रियः ॥

prasādo niṣphalo yasya krodhaścāpi nirarthakaḥ | na taṃ bhartāramicchanti ṣaṇḍhaṃ patimiva striyaḥ

जिसकी प्रसन्नता का कोई फल नहीं और जिसका क्रोध भी व्यर्थ है, ऐसे स्वामी को लोग नहीं चाहते, जैसे स्त्रियाँ नपुंसक पति को नहीं चाहतीं।

श्लोक 33 (5.38.33)

न बुद्धिर्धनलाभाय न जाड्यमसमृद्धये । लोकपर्यायवृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतरः ॥

na buddhirdhanalābhāya na jāḍyamasamṛddhaye | lokaparyāyavṛttāntaṃ prājño jānāti netaraḥ

बुद्धि से ही धन नहीं मिल जाता और न जड़ता से ही दरिद्रता आती है। संसार के इस उलट-फेर के क्रम को ज्ञानी ही समझता है, दूसरा नहीं।

श्लोक 34 (5.38.34)

विद्याशीलवयोवृद्धान्बुद्धिवृद्धांश्च भारत । धनाभिजातवृद्धांश्च नित्यं मूढोऽवमन्यते ॥

vidyāśīlavayovṛddhānbuddhivṛddhāṃśca bhārata | dhanābhijātavṛddhāṃśca nityaṃ mūḍho'vamanyate

हे भारत! मूर्ख सदा विद्या, शील, आयु और बुद्धि में बड़े लोगों का, तथा धन और कुल में बड़े लोगों का अपमान करता है।

श्लोक 35 (5.38.35)

अनार्यवृत्तमप्राज्ञमसूयकमधार्मिकम् । अनर्थाः क्षिप्रमायान्ति वाग्दुष्टं क्रोधनं तथा ॥

anāryavṛttamaprājñamasūyakamadhārmikam | anarthāḥ kṣipramāyānti vāgduṣṭaṃ krodhanaṃ tathā

अनार्य आचरण वाले, मूर्ख, ईर्ष्यालु, अधर्मी, कटुभाषी और क्रोधी व्यक्ति पर अनर्थ शीघ्र आ पड़ते हैं।

श्लोक 36 (5.38.36)

अविसंवादनं दानं समयस्याव्यतिक्रमः । आवर्तयन्ति भूतानि सम्यक्प्रणिहिता च वाक् ॥

avisaṃvādanaṃ dānaṃ samayasyāvyatikramaḥ | āvartayanti bhūtāni samyakpraṇihitā ca vāk

वचन से न मुकरना, दान देना, मर्यादा का उल्लंघन न करना और सोच-समझकर कही गई वाणी — ये सब प्राणियों को अपनी ओर खींच लेते हैं।

श्लोक 37 (5.38.37)

अविसंवादको दक्षः कृतज्ञो मतिमानृजुः । अपि संक्षीणकोशोऽपि लभते परिवारणम् ॥

avisaṃvādako dakṣaḥ kṛtajño matimānṛjuḥ | api saṃkṣīṇakośo'pi labhate parivāraṇam

जो अपनी बात से नहीं फिरता, और कुशल, कृतज्ञ, बुद्धिमान तथा सरल है, उसका कोष खाली हो जाने पर भी उसे अनुयायी मिल जाते हैं।

श्लोक 38 (5.38.38)

धृतिः शमो दमः शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा । मित्राणां चानभिद्रोहः सप्तैताः समिधः श्रियः ॥

dhṛtiḥ śamo damaḥ śaucaṃ kāruṇyaṃ vāganiṣṭhurā | mitrāṇāṃ cānabhidrohaḥ saptaitāḥ samidhaḥ śriyaḥ

धैर्य, शान्ति, इन्द्रिय-संयम, पवित्रता, करुणा, कोमल वाणी और मित्रों से द्रोह न करना — ये सात लक्ष्मी को प्रज्वलित रखने वाली समिधाएँ हैं।

श्लोक 39 (5.38.39)

असंविभागी दुष्टात्मा कृतघ्नो निरपत्रपः । तादृङ्नराधमो लोके वर्जनीयो नराधिप ॥

asaṃvibhāgī duṣṭātmā kṛtaghno nirapatrapaḥ | tādṛṅnarādhamo loke varjanīyo narādhipa

जो दूसरों को बाँटकर नहीं देता, जो दुष्ट, कृतघ्न और निर्लज्ज है — हे नराधिप, ऐसे अधम मनुष्य को संसार में त्याग देना चाहिए।

श्लोक 40 (5.38.40)

न च रात्रौ सुखं शेते ससर्प इव वेश्मनि । यः कोपयति निर्दोषं सदोषोऽभ्यन्तरं जनम् ॥

na ca rātrau sukhaṃ śete sasarpa iva veśmani | yaḥ kopayati nirdoṣaṃ sadoṣo'bhyantaraṃ janam

जो स्वयं दोषी होकर अपने निर्दोष निकटवर्ती लोगों को क्रुद्ध करता है, वह रात को चैन से नहीं सोता, जैसे साँप वाले घर में रहने वाला।

श्लोक 41 (5.38.41)

येषु दुष्टेषु दोषः स्याद्योगक्षेमस्य भारत । सदा प्रसादनं तेषां देवतानामिवाचरेत् ॥

yeṣu duṣṭeṣu doṣaḥ syādyogakṣemasya bhārata | sadā prasādanaṃ teṣāṃ devatānāmivācaret

हे भारत! जिनके रुष्ट होने से योगक्षेम में बाधा आ सकती है, उन्हें देवताओं की भाँति सदा प्रसन्न रखना चाहिए।

श्लोक 42 (5.38.42)

येऽर्थाः स्त्रीषु समायुक्ताः प्रमत्तपतितेषु च । ये चानार्ये समासक्ताः सर्वे ते संशयं गताः ॥

ye'rthāḥ strīṣu samāyuktāḥ pramattapatiteṣu ca | ye cānārye samāsaktāḥ sarve te saṃśayaṃ gatāḥ

जो धन स्त्रियों, प्रमादियों और पतित लोगों के हाथ में सौंपा गया है, तथा जो अनार्य व्यक्ति से जुड़ा है — वह सब संकट में है।

श्लोक 43 (5.38.43)

यत्र स्त्री यत्र कितवो बालो यत्रानुशासिता । मज्जन्ति तेऽवशा राजन्नद्यामश्मप्लवा इव ॥

yatra strī yatra kitavo bālo yatrānuśāsitā | majjanti te'vaśā rājannadyāmaśmaplavā iva

हे राजन्! जहाँ स्त्री, जुआरी या बालक शासन करता है, वहाँ के लोग नदी में पत्थर की नाव की तरह विवश होकर डूब जाते हैं।

श्लोक 44 (5.38.44)

प्रयोजनेषु ये सक्ता न विशेषेषु भारत । तानहं पण्डितान्मन्ये विशेषा हि प्रसङ्गिनः ॥

prayojaneṣu ye saktā na viśeṣeṣu bhārata | tānahaṃ paṇḍitānmanye viśeṣā hi prasaṅginaḥ

हे भारत! जो मुख्य प्रयोजन में लगे रहते हैं, छोटी-छोटी बातों में नहीं, उन्हें मैं पण्डित मानता हूँ, क्योंकि छोटी बातें उलझाने वाली होती हैं।

श्लोक 45 (5.38.45)

यं प्रशंसन्ति कितवा यं प्रशंसन्ति चारणाः । यं प्रशंसन्ति बन्धक्यो न स जीवति मानवः ॥

yaṃ praśaṃsanti kitavā yaṃ praśaṃsanti cāraṇāḥ | yaṃ praśaṃsanti bandhakyo na sa jīvati mānavaḥ

जिसकी जुआरी प्रशंसा करते हैं, चारण प्रशंसा करते हैं और वेश्याएँ प्रशंसा करती हैं, वह मनुष्य जीते हुए भी जीवित नहीं है।

श्लोक 46 (5.38.46)

हित्वा तान्परमेष्वासान्पाण्डवानमितौजसः । आहितं भारतैश्वर्यं त्वया दुर्योधने महत् ॥

hitvā tānparameṣvāsānpāṇḍavānamitaujasaḥ | āhitaṃ bhārataiśvaryaṃ tvayā duryodhane mahat

उन महान धनुर्धर, अपार पराक्रमी पाण्डवों को छोड़कर आपने भरतवंश का विशाल ऐश्वर्य दुर्योधन को सौंप दिया है।

श्लोक 47 (5.38.47)

तं द्रक्ष्यसि परिभ्रष्टं तस्मात्त्वमचिरादिव । ऐश्वर्यमदसंमूढं बलिं लोकत्रयादिव ॥

taṃ drakṣyasi paribhraṣṭaṃ tasmāttvamacirādiva | aiśvaryamadasaṃmūḍhaṃ baliṃ lokatrayādiva

शीघ्र ही आप देखेंगे कि ऐश्वर्य के मद में मोहित वह उससे वैसे ही गिर पड़ा है, जैसे बलि तीनों लोकों से गिरे थे।

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