उद्योग पर्व · अध्याय 39
बंधु, मित्र और लक्ष्मी पर विदुर का उपदेश
विदुर नीति, अध्याय 7 / 8
धृतराष्ट्र स्वीकार करते हैं कि मनुष्य प्रारब्ध के हाथ की कठपुतली है और विदुर से आगे कहने को कहते हैं। विदुर याद दिलाते हैं कि उन्होंने दुर्योधन के जन्म के समय ही उसे त्यागने की सलाह दी थी, और आग्रह करते हैं कि राजा अपने संबंधियों की रक्षा करें तथा पाण्डवों को जीविका के लिए कुछ गाँव दे दें। फिर वे मंत्रणा के भेद खुलने के द्वार, मित्रों के चुनाव, क्षमा, उन्नति के मूल और मलिनता तथा बुढ़ापा लाने वाली बातों का वर्णन करते हैं, और अंत में राजा से अपने और पाण्डु के पुत्रों के प्रति समान व्यवहार करने का अनुरोध करते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (5.39.1)
अनीश्वरोऽयं पुरुषो भवाभवे । सूत्रप्रोता दारुमयीव योषा । धात्रा तु दिष्टस्य वशे कृतोऽयं । तस्माद्वद त्वं श्रवणे धृतोऽहम् ॥
anīśvaro'yaṃ puruṣo bhavābhave | sūtraprotā dārumayīva yoṣā | dhātrā tu diṣṭasya vaśe kṛto'yaṃ | tasmādvada tvaṃ śravaṇe dhṛto'ham
मनुष्य अपनी उन्नति और अवनति का स्वामी नहीं है। डोरी से नचाई जाने वाली काठ की पुतली की तरह विधाता ने उसे प्रारब्ध के अधीन कर रखा है। इसलिए तुम कहते रहो, मैं ध्यान से सुन रहा हूँ।
विदुर उवाच
श्लोक 2 (5.39.2)
अप्राप्तकालं वचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन् । लभते बुद्ध्यवज्ञानमवमानं च भारत ॥
aprāptakālaṃ vacanaṃ bṛhaspatirapi bruvan | labhate buddhyavajñānamavamānaṃ ca bhārata
हे भारत, असमय बात कहने पर बृहस्पति की बुद्धि का भी तिरस्कार होता है और उन्हें भी अपमान सहना पड़ता है।
श्लोक 3 (5.39.3)
प्रियो भवति दानेन प्रियवादेन चापरः । मन्त्रमूलबलेनान्यो यः प्रियः प्रिय एव सः ॥
priyo bhavati dānena priyavādena cāparaḥ | mantramūlabalenānyo yaḥ priyaḥ priya eva saḥ
कोई दान से प्रिय बनता है, कोई मधुर वाणी से, और कोई मन्त्र तथा जड़ी-बूटियों के बल से; किंतु जो सचमुच प्रिय है, वह तो प्रिय ही रहता है।
श्लोक 4 (5.39.4)
द्वेष्यो न साधुर्भवति न मेधावी न पण्डितः । प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेष्ये पापानि चैव ह ॥
dveṣyo na sādhurbhavati na medhāvī na paṇḍitaḥ | priye śubhāni kāryāṇi dveṣye pāpāni caiva ha
जिससे द्वेष हो, उसे न साधु माना जाता है, न बुद्धिमान, न विद्वान। प्रिय व्यक्ति के सब काम शुभ दिखते हैं और अप्रिय के सब पापपूर्ण।
श्लोक 5 (5.39.5)
उक्तं मया जातमात्रेऽपि राजन् । दुर्योधनं त्यज पुत्रं त्वमेकम् । तस्य त्यागात्पुत्रशतस्य वृद्धि- । रस्यात्यागात्पुत्रशतस्य नाशः ॥
uktaṃ mayā jātamātre'pi rājan | duryodhanaṃ tyaja putraṃ tvamekam | tasya tyāgātputraśatasya vṛddhi- | rasyātyāgātputraśatasya nāśaḥ
हे राजन्, उसके जन्म लेते ही मैंने कहा था, "इस एक पुत्र दुर्योधन को त्याग दो। इसके त्याग से तुम्हारे सौ पुत्रों की वृद्धि होगी और इसे न त्यागने से सौ पुत्रों का नाश होगा।"
श्लोक 6 (5.39.6)
न वृद्धिर्बहुमन्तव्या या वृद्धिः क्षयमावहेत् । क्षयोऽपि बहुमन्तव्यो यः क्षयो वृद्धिमावहेत् ॥
na vṛddhirbahumantavyā yā vṛddhiḥ kṣayamāvahet | kṣayo'pi bahumantavyo yaḥ kṣayo vṛddhimāvahet
जो वृद्धि आगे चलकर क्षय लाए, उसे अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए; और जो हानि आगे चलकर वृद्धि लाए, उसे बहुत महत्त्व देना चाहिए।
श्लोक 7 (5.39.7)
न स क्षयो महाराज यः क्षयो वृद्धिमावहेत् । क्षयः स त्विह मन्तव्यो यं लब्ध्वा बहु नाशयेत् ॥
na sa kṣayo mahārāja yaḥ kṣayo vṛddhimāvahet | kṣayaḥ sa tviha mantavyo yaṃ labdhvā bahu nāśayet
हे महाराज, जो क्षय वृद्धि लाए, वह वास्तव में क्षय नहीं है। क्षय तो उसी को समझना चाहिए जिसके होने से बहुत कुछ नष्ट हो जाए।
श्लोक 8 (5.39.8)
समृद्धा गुणतः केचिद्भवन्ति धनतोऽपरे । धनवृद्धान्गुणैर्हीनान्धृतराष्ट्र विवर्जय ॥
samṛddhā guṇataḥ kecidbhavanti dhanato'pare | dhanavṛddhānguṇairhīnāndhṛtarāṣṭra vivarjaya
कुछ लोग गुणों से समृद्ध होते हैं और कुछ धन से। हे धृतराष्ट्र, जो धन में बढ़े-चढ़े हों पर गुणों से हीन हों, उनका त्याग करो।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 9 (5.39.9)
सर्वं त्वमायतीयुक्तं भाषसे प्राज्ञसंमतम् । न चोत्सहे सुतं त्यक्तुं यतो धर्मस्ततो जयः ॥
sarvaṃ tvamāyatīyuktaṃ bhāṣase prājñasaṃmatam | na cotsahe sutaṃ tyaktuṃ yato dharmastato jayaḥ
तुम जो कुछ कहते हो, वह सब भविष्य के लिए हितकर है और बुद्धिमानों को मान्य है। फिर भी मैं अपने पुत्र को त्याग नहीं पाता। जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
विदुर उवाच
श्लोक 10 (5.39.10)
अतीव गुणसंपन्नो न जातु विनयान्वितः । सुसूक्ष्ममपि भूतानामुपमर्दमुपेक्षते ॥
atīva guṇasaṃpanno na jātu vinayānvitaḥ | susūkṣmamapi bhūtānāmupamardamupekṣate
जो अत्यंत गुणवान और विनयशील है, वह प्राणियों को पहुँचने वाली छोटी-से-छोटी पीड़ा की भी कभी उपेक्षा नहीं करता।
श्लोक 11 (5.39.11)
परापवादनिरताः परदुःखोदयेषु च । परस्परविरोधे च यतन्ते सततोत्थिताः ॥
parāpavādaniratāḥ paraduḥkhodayeṣu ca | parasparavirodhe ca yatante satatotthitāḥ
कुछ लोग दूसरों की निंदा और दूसरों को दुःख पहुँचाने में ही लगे रहते हैं, और सदा कमर कसकर लोगों में परस्पर वैर कराने का यत्न करते हैं।
श्लोक 12 (5.39.12)
सदोषं दर्शनं येषां संवासे सुमहद्भयम् । अर्थादाने महान्दोषः प्रदाने च महद्भयम् ॥
sadoṣaṃ darśanaṃ yeṣāṃ saṃvāse sumahadbhayam | arthādāne mahāndoṣaḥ pradāne ca mahadbhayam
ऐसे लोगों का दर्शन भी दोषपूर्ण है, उनके साथ रहने में बड़ा भय है, उनसे धन लेने में बड़ा दोष है और उन्हें देने में भी बड़ा भय है।
श्लोक 13 (5.39.13)
ये वै भेदनशीलास्तु सकामा निस्त्रपाः शठाः । ये पापा इति विख्याताः संवासे परिगर्हिताः ॥
ye vai bhedanaśīlāstu sakāmā nistrapāḥ śaṭhāḥ | ye pāpā iti vikhyātāḥ saṃvāse parigarhitāḥ
जो फूट डालने के स्वभाव वाले, कामी, निर्लज्ज और धूर्त हैं, जो पापी के रूप में प्रसिद्ध हैं और जिनका संग निंदित है,
श्लोक 14 (5.39.14)
युक्ताश्चान्यैर्महादोषैर्ये नरास्तान्विवर्जयेत् । निवर्तमाने सौहार्दे प्रीतिर्नीचे प्रणश्यति ॥
yuktāścānyairmahādoṣairye narāstānvivarjayet | nivartamāne sauhārde prītirnīce praṇaśyati
और जो अन्य बड़े दोषों से भी युक्त हैं, ऐसे मनुष्यों का त्याग कर देना चाहिए। नीच व्यक्ति से मित्रता टूटते ही उसका प्रेम नष्ट हो जाता है,
श्लोक 15 (5.39.15)
या चैव फलनिर्वृतिः सौहृदे चैव यत्सुखम् । यतते चापवादाय यत्नमारभते क्षये ॥
yā caiva phalanirvṛtiḥ sauhṛde caiva yatsukham | yatate cāpavādāya yatnamārabhate kṣaye
और उसके साथ ही मित्रता से मिलने वाला संतोष और सुख भी। फिर वह निंदा करने का प्रयत्न करता है और विनाश के लिए उद्योग करने लगता है।
श्लोक 16 (5.39.16)
अल्पेऽप्यपकृते मोहान्न शान्तिमधिगच्छति । तादृशैः सङ्गतं नीचैर्नृशंसैरकृतात्मभिः । निशाम्य निपुणं बुद्ध्या विद्वान्दूराद्विवर्जयेत् ॥
alpe'pyapakṛte mohānna śāntimadhigacchati | tādṛśaiḥ saṅgataṃ nīcairnṛśaṃsairakṛtātmabhiḥ | niśāmya nipuṇaṃ buddhyā vidvāndūrādvivarjayet
थोड़ा-सा अपकार होने पर भी वह मोहवश शांत नहीं होता। विद्वान व्यक्ति बुद्धि से भली-भाँति विचार करके ऐसे नीच, क्रूर और असंयमी लोगों के संग को दूर से ही त्याग दे।
श्लोक 17 (5.39.17)
यो ज्ञातिमनुगृह्णाति दरिद्रं दीनमातुरम् । स पुत्रपशुभिर्वृद्धिं श्रेयश्चानन्त्यमश्नुते ॥
yo jñātimanugṛhṇāti daridraṃ dīnamāturam | sa putrapaśubhirvṛddhiṃ śreyaścānantyamaśnute
जो अपने दरिद्र, दीन और रोगी संबंधी पर अनुग्रह करता है, वह पुत्रों और पशुओं से समृद्ध होता है और अनंत कल्याण प्राप्त करता है।
श्लोक 18 (5.39.18)
ज्ञातयो वर्धनीयास्तैर्य इच्छन्त्यात्मनः शुभम् ॥
jñātayo vardhanīyāstairya icchantyātmanaḥ śubham
जो अपना हित चाहते हैं, उन्हें अपने संबंधियों की उन्नति करनी चाहिए,
श्लोक 19 (5.39.19)
कुलवृद्धिं च राजेन्द्र तस्मात्साधु समाचर । श्रेयसा योक्ष्यते राजन्कुर्वाणो ज्ञातिसत्क्रियां ॥
kulavṛddhiṃ ca rājendra tasmātsādhu samācara | śreyasā yokṣyate rājankurvāṇo jñātisatkriyāṃ
और कुल की वृद्धि भी करनी चाहिए। इसलिए हे राजेन्द्र, उचित आचरण करो। हे राजन्, जो अपने संबंधियों का सत्कार करता है, वह कल्याण का भागी होता है।
श्लोक 20 (5.39.20)
विगुणा ह्यपि संरक्ष्या ज्ञातयो भरतर्षभ । किंपुनर्गुणवन्तस्ते त्वत्प्रसादाभिकाङ्क्षिणः ॥
viguṇā hyapi saṃrakṣyā jñātayo bharatarṣabha | kiṃpunarguṇavantaste tvatprasādābhikāṅkṣiṇaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, गुणहीन संबंधियों की भी रक्षा करनी चाहिए; फिर जो गुणवान हैं और तुम्हारी कृपा की आशा रखते हैं, उनका तो कहना ही क्या?
श्लोक 21 (5.39.21)
प्रसादं कुरु वीराणां पाण्डवानां विशांपते । दीयन्तां ग्रामकाः केचित्तेषां वृत्त्यर्थमीश्वर ॥
prasādaṃ kuru vīrāṇāṃ pāṇḍavānāṃ viśāṃpate | dīyantāṃ grāmakāḥ kecitteṣāṃ vṛttyarthamīśvara
हे प्रजापालक, वीर पाण्डवों पर कृपा करो। हे स्वामी, उनकी जीविका के लिए उन्हें कुछ गाँव दे दिए जाएँ।
श्लोक 22 (5.39.22)
एवं लोके यशः प्राप्तं भविष्यति नराधिप । वृद्धेन हि त्वया कार्यं पुत्राणां तात शासनम् ॥
evaṃ loke yaśaḥ prāptaṃ bhaviṣyati narādhipa | vṛddhena hi tvayā kāryaṃ putrāṇāṃ tāta śāsanam
हे नरेश, ऐसा करने से संसार में तुम्हें यश प्राप्त होगा। तात, तुम वृद्ध हो, इसलिए अपने पुत्रों पर अंकुश रखना तुम्हारा ही कर्तव्य है।
श्लोक 23 (5.39.23)
मया चापि हितं वाच्यं विद्धि मां त्वद्धितैषिणम् । ज्ञातिभिर्विग्रहस्तात न कर्तव्यः शुभार्थिना । सुखानि सह भोज्यानि ज्ञातिभिर्भरतर्षभ ॥
mayā cāpi hitaṃ vācyaṃ viddhi māṃ tvaddhitaiṣiṇam | jñātibhirvigrahastāta na kartavyaḥ śubhārthinā | sukhāni saha bhojyāni jñātibhirbharatarṣabha
मुझे भी तुम्हारे हित की बात कहनी ही चाहिए; मुझे अपना हितैषी समझो। तात, कल्याण चाहने वाले को अपने संबंधियों से कलह नहीं करना चाहिए। हे भरतश्रेष्ठ, सुखों का उपभोग संबंधियों के साथ मिलकर करना चाहिए।
श्लोक 24 (5.39.24)
संभोजनं संकथनं संप्रीतिश्च परस्परम् । ज्ञातिभिः सह कार्याणि न विरोधः कदाचन ॥
saṃbhojanaṃ saṃkathanaṃ saṃprītiśca parasparam | jñātibhiḥ saha kāryāṇi na virodhaḥ kadācana
संबंधियों के साथ मिलकर भोजन करना, बातचीत करना और परस्पर प्रेम रखना चाहिए; उनसे कभी विरोध नहीं करना चाहिए।
श्लोक 25 (5.39.25)
ज्ञातयस्तारयन्तीह ज्ञातयो मज्जयन्ति च । सुवृत्तास्तारयन्तीह दुर्वृत्ता मज्जयन्ति च ॥
jñātayastārayantīha jñātayo majjayanti ca | suvṛttāstārayantīha durvṛttā majjayanti ca
इस संसार में संबंधी ही पार लगाते हैं और संबंधी ही डुबोते भी हैं। सदाचारी पार लगाते हैं और दुराचारी डुबो देते हैं।
श्लोक 26 (5.39.26)
सुवृत्तो भव राजेन्द्र पाण्डवान्प्रति मानद । अधर्षणीयः शत्रूणां तैर्वृतस्त्वं भविष्यसि ॥
suvṛtto bhava rājendra pāṇḍavānprati mānada | adharṣaṇīyaḥ śatrūṇāṃ tairvṛtastvaṃ bhaviṣyasi
हे मान देने वाले राजेन्द्र, पाण्डवों के प्रति सद्व्यवहार करो। उनसे घिरे रहकर तुम शत्रुओं के लिए अजेय हो जाओगे।
श्लोक 27 (5.39.27)
श्रीमन्तं ज्ञातिमासाद्य यो ज्ञातिरवसीदति । दिग्धहस्तं मृग इव स एनस्तस्य विन्दति ॥
śrīmantaṃ jñātimāsādya yo jñātiravasīdati | digdhahastaṃ mṛga iva sa enastasya vindati
जो संबंधी किसी धनवान संबंधी के पास पहुँचकर भी कष्ट पाता है, वह उसका पाप उसी धनवान पर डाल देता है, जैसे घायल मृग का पाप विषबुझा बाण चलाने वाले शिकारी पर पड़ता है।
श्लोक 28 (5.39.28)
पश्चादपि नरश्रेष्ठ तव तापो भविष्यति । तान्वा हतान्सुतान्वापि श्रुत्वा तदनुचिन्तय ॥
paścādapi naraśreṣṭha tava tāpo bhaviṣyati | tānvā hatānsutānvāpi śrutvā tadanucintaya
हे नरश्रेष्ठ, आगे चलकर जब तुम उनके या अपने पुत्रों के मारे जाने का समाचार सुनोगे, तब तुम्हें पछतावा होगा। इस पर अभी विचार कर लो।
श्लोक 29 (5.39.29)
येन खट्वां समारूढः परितप्येत कर्मणा । आदावेव न तत्कुर्यादध्रुवे जीविते सति ॥
yena khaṭvāṃ samārūḍhaḥ paritapyeta karmaṇā | ādāveva na tatkuryādadhruve jīvite sati
जीवन अनिश्चित है, इसलिए आरंभ से ही ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिसके कारण अंत समय में खाट पर पड़े-पड़े पछताना पड़े।
श्लोक 30 (5.39.30)
न कश्चिन्नापनयते पुमानन्यत्र भार्गवात् । शेषसंप्रतिपत्तिस्तु बुद्धिमत्स्वेव तिष्ठति ॥
na kaścinnāpanayate pumānanyatra bhārgavāt | śeṣasaṃpratipattistu buddhimatsveva tiṣṭhati
भृगुवंशी शुक्राचार्य को छोड़कर ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो कभी नीति में भूल न करे। परंतु भूल के बाद शेष बात को सँभालना बुद्धिमानों के ही वश में होता है।
श्लोक 31 (5.39.31)
दुर्योधनेन यद्येतत्पापं तेषु पुरा कृतम् । त्वया तत्कुलवृद्धेन प्रत्यानेयं नरेश्वर ॥
duryodhanena yadyetatpāpaṃ teṣu purā kṛtam | tvayā tatkulavṛddhena pratyāneyaṃ nareśvara
हे नरेश्वर, यदि दुर्योधन ने पहले उनके साथ यह पाप किया है, तो कुल के वृद्ध होने के नाते तुम्हें उसका निवारण करना चाहिए।
श्लोक 32 (5.39.32)
तांस्त्वं पदे प्रतिष्ठाप्य लोके विगतकल्मषः । भविष्यसि नरश्रेष्ठ पूजनीयो मनीषिणाम् ॥
tāṃstvaṃ pade pratiṣṭhāpya loke vigatakalmaṣaḥ | bhaviṣyasi naraśreṣṭha pūjanīyo manīṣiṇām
हे नरश्रेष्ठ, उन्हें उनके पद पर फिर से प्रतिष्ठित करके तुम लोक में निष्कलंक हो जाओगे और मनीषियों के पूज्य बनोगे।
श्लोक 33 (5.39.33)
सुव्याहृतानि धीराणां फलतः परिचिन्त्य यः । अध्यवस्यति कार्येषु चिरं यशसि तिष्ठति ॥
suvyāhṛtāni dhīrāṇāṃ phalataḥ paricintya yaḥ | adhyavasyati kāryeṣu ciraṃ yaśasi tiṣṭhati
जो धीर पुरुषों के सुभाषित वचनों पर उनके परिणाम की दृष्टि से विचार करके ही कार्य का निश्चय करता है, वह दीर्घकाल तक यशस्वी बना रहता है।
श्लोक 34 (5.39.34)
असम्यगुपयुक्तं हि ज्ञानं सुकुशलैरपि । उपलभ्यं चाविदितं विदितं चाननुष्ठितम् ॥
asamyagupayuktaṃ hi jñānaṃ sukuśalairapi | upalabhyaṃ cāviditaṃ viditaṃ cānanuṣṭhitam
ठीक से प्रयोग न किया गया ज्ञान, चाहे बड़े कुशल लोगों का ही क्यों न हो, व्यर्थ जाता है; वैसे ही वह भी जो प्राप्त किया जा सकता है पर जाना नहीं गया, और वह भी जो जाना गया पर आचरण में नहीं लाया गया।
श्लोक 35 (5.39.35)
पापोदयफलं विद्वान्यो नारभति वर्धते ॥
pāpodayaphalaṃ vidvānyo nārabhati vardhate
जो विद्वान ऐसा कर्म आरंभ नहीं करता जिसका फल पाप की वृद्धि हो, वह उन्नति करता है।
श्लोक 36 (5.39.36)
यस्तु पूर्वकृतं पापमविमृश्यानुवर्तते । अगाधपङ्के दुर्मेधा विषमे विनिपात्यते ॥
yastu pūrvakṛtaṃ pāpamavimṛśyānuvartate | agādhapaṅke durmedhā viṣame vinipātyate
परंतु जो दुर्बुद्धि पहले किए हुए पाप को बिना विचारे दोहराता रहता है, वह अथाह और विषम कीचड़ में गिरा दिया जाता है।
श्लोक 37 (5.39.37)
मन्त्रभेदस्य षट् प्राज्ञो द्वाराणीमानि लक्षयेत् । अर्थसन्ततिकामश्च रक्षेदेतानि नित्यशः ॥
mantrabhedasya ṣaṭ prājño dvārāṇīmāni lakṣayet | arthasantatikāmaśca rakṣedetāni nityaśaḥ
जो बुद्धिमान अपनी समृद्धि को स्थिर रखना चाहता है, उसे मंत्रणा के भेद खुलने के इन छह द्वारों को पहचानकर सदा उनकी रक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 38 (5.39.38)
मदं स्वप्नमविज्ञानमाकारं चात्मसंभवम् । दुष्टामात्येषु विश्रम्भं दूताच्चाकुशलादपि ॥
madaṃ svapnamavijñānamākāraṃ cātmasaṃbhavam | duṣṭāmātyeṣu viśrambhaṃ dūtāccākuśalādapi
वे छह द्वार हैं: मद, नींद, असावधानी, अपने ही चेहरे के बदलते भाव, दुष्ट मंत्रियों पर विश्वास और अकुशल दूत।
श्लोक 39 (5.39.39)
द्वाराण्येतानि यो ज्ञात्वा संवृणोति सदा नृप । त्रिवर्गाचरणे युक्तः स शत्रूनधितिष्ठति ॥
dvārāṇyetāni yo jñātvā saṃvṛṇoti sadā nṛpa | trivargācaraṇe yuktaḥ sa śatrūnadhitiṣṭhati
हे राजन्, जो इन द्वारों को जानकर उन्हें सदा बंद रखता है और धर्म, अर्थ तथा काम, इन तीनों के पालन में लगा रहता है, वह शत्रुओं पर अधिकार कर लेता है।
श्लोक 40 (5.39.40)
न वै श्रुतमविज्ञाय वृद्धाननुपसेव्य वा । धर्मार्थौ वेदितुं शक्यौ बृहस्पतिसमैरपि ॥
na vai śrutamavijñāya vṛddhānanupasevya vā | dharmārthau vedituṃ śakyau bṛhaspatisamairapi
सुने हुए शास्त्र को समझे बिना और वृद्धों की सेवा किए बिना बृहस्पति के समान लोग भी धर्म और अर्थ को नहीं जान सकते।
श्लोक 41 (5.39.41)
नष्टं समुद्रे पतितं नष्टं वाक्यमशृण्वति । अनात्मनि श्रुतं नष्टं नष्टं हुतमनग्निकम् ॥
naṣṭaṃ samudre patitaṃ naṣṭaṃ vākyamaśṛṇvati | anātmani śrutaṃ naṣṭaṃ naṣṭaṃ hutamanagnikam
समुद्र में गिरी वस्तु नष्ट हो जाती है, न सुनने वाले से कही बात नष्ट हो जाती है, असंयमी को दिया गया शास्त्र-ज्ञान नष्ट हो जाता है और अग्नि के बिना किया गया हवन नष्ट हो जाता है।
श्लोक 42 (5.39.42)
मत्या परीक्ष्य मेधावी बुद्ध्या संपाद्य चासकृत् । श्रुत्वा दृष्ट्वाथ विज्ञाय प्राज्ञैर्मैत्रीं समाचरेत् ॥
matyā parīkṣya medhāvī buddhyā saṃpādya cāsakṛt | śrutvā dṛṣṭvātha vijñāya prājñairmaitrīṃ samācaret
मेधावी पुरुष बुद्धि से परखकर, बार-बार विचार करके, सुनकर, देखकर और भली-भाँति जानकर ही बुद्धिमानों से मित्रता करे।
श्लोक 43 (5.39.43)
अकीर्तिं विनयो हन्ति हन्त्यनर्थं पराक्रमः । हन्ति नित्यं क्षमा क्रोधमाचारो हन्त्यलक्षणम् ॥
akīrtiṃ vinayo hanti hantyanarthaṃ parākramaḥ | hanti nityaṃ kṣamā krodhamācāro hantyalakṣaṇam
विनय अपयश को नष्ट करता है, पराक्रम अनर्थ को नष्ट करता है, क्षमा सदा क्रोध को नष्ट करती है और सदाचार अशुभ लक्षणों को नष्ट कर देता है।
श्लोक 44 (5.39.44)
परिच्छदेन क्षेत्रेण वेश्मना परिचर्यया । परीक्षेत कुलं राजन्भोजनाच्छादनेन च ॥
paricchadena kṣetreṇa veśmanā paricaryayā | parīkṣeta kulaṃ rājanbhojanācchādanena ca
हे राजन्, किसी कुल की परख उसके साज-सामान, भूमि, घर, सेवा-सत्कार तथा भोजन और वस्त्र से करनी चाहिए।
श्लोक 45 (5.39.45)
उपस्थितस्य कामस्य प्रतिवादो न विद्यते । अपि निर्मुक्तदेहस्य कामरक्तस्य किं पुनः ॥
upasthitasya kāmasya prativādo na vidyate | api nirmuktadehasya kāmaraktasya kiṃ punaḥ
जब कोई काम्य वस्तु स्वयं सामने आ जाए, तो देह के बंधन से मुक्त व्यक्ति भी उसे ठुकरा नहीं पाता; फिर कामासक्त व्यक्ति का तो कहना ही क्या?
श्लोक 46 (5.39.46)
प्राज्ञोपसेविनं वैद्यं धार्मिकं प्रियदर्शनम् । मित्रवन्तं सुवाक्यं च सुहृदं परिपालयेत् ॥
prājñopasevinaṃ vaidyaṃ dhārmikaṃ priyadarśanam | mitravantaṃ suvākyaṃ ca suhṛdaṃ paripālayet
जो बुद्धिमानों की सेवा करने वाला, विद्वान, धर्मात्मा, देखने में प्रिय, मित्रों से युक्त, मधुरभाषी और सहृदय हो, ऐसे मित्र को सँजोकर रखना चाहिए।
श्लोक 47 (5.39.47)
दुष्कुलीनः कुलीनो वा मर्यादां यो न लङ्घयेत् । धर्मापेक्षी मृदुर्ह्रीमान्स कुलीनशताद्वरः ॥
duṣkulīnaḥ kulīno vā maryādāṃ yo na laṅghayet | dharmāpekṣī mṛdurhrīmānsa kulīnaśatādvaraḥ
चाहे कोई नीच कुल का हो या ऊँचे कुल का, जो मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, धर्म पर दृष्टि रखता है, कोमल स्वभाव का और लज्जाशील है, वह सौ कुलीनों से भी श्रेष्ठ है।
श्लोक 48 (5.39.48)
ययोश्चित्तेन वा चित्तं निभृतं निभृतेन वा । समेति प्रज्ञया प्रज्ञा तयोर्मैत्री न जीर्यति ॥
yayościttena vā cittaṃ nibhṛtaṃ nibhṛtena vā | sameti prajñayā prajñā tayormaitrī na jīryati
जिन दो व्यक्तियों का चित्त चित्त से, गुप्त भाव गुप्त भाव से और बुद्धि बुद्धि से मिल जाती है, उनकी मित्रता कभी पुरानी नहीं पड़ती।
श्लोक 49 (5.39.49)
दुर्बुद्धिमकृतप्रज्ञं छन्नं कूपं तृणैरिव । विवर्जयीत मेधावी तस्मिन्मैत्री प्रणश्यति ॥
durbuddhimakṛtaprajñaṃ channaṃ kūpaṃ tṛṇairiva | vivarjayīta medhāvī tasminmaitrī praṇaśyati
मेधावी पुरुष को दुर्बुद्धि और अविवेकी व्यक्ति से वैसे ही बचना चाहिए जैसे घास से ढके कुएँ से, क्योंकि ऐसे व्यक्ति से मित्रता नष्ट हो जाती है।
श्लोक 50 (5.39.50)
अवलिप्तेषु मूर्खेषु रौद्रसाहसिकेषु च । तथैवापेतधर्मेषु न मैत्रीमाचरेद्बुधः ॥
avalipteṣu mūrkheṣu raudrasāhasikeṣu ca | tathaivāpetadharmeṣu na maitrīmācaredbudhaḥ
बुद्धिमान व्यक्ति घमंडी, मूर्ख, क्रूर और दुस्साहसी लोगों से तथा धर्म से भटके हुए लोगों से मित्रता न करे।
श्लोक 51 (5.39.51)
कृतज्ञं धार्मिकं सत्यमक्षुद्रं दृढभक्तिकम् । जितेन्द्रियं स्थितं स्थित्यां मित्रमित्यभिवाञ्छति ॥
kṛtajñaṃ dhārmikaṃ satyamakṣudraṃ dṛḍhabhaktikam | jitendriyaṃ sthitaṃ sthityāṃ mitramityabhivāñchati
जो कृतज्ञ, धर्मात्मा, सत्यवादी, उदार और दृढ़ निष्ठा वाला हो, जिसने इन्द्रियों को जीत लिया हो और जो मर्यादा में स्थित रहे, उसी को लोग मित्र बनाना चाहते हैं।
श्लोक 52 (5.39.52)
इन्द्रियाणामनुत्सर्गो मृत्युनापि विशिष्यते । अत्यर्थं पुनरुत्सर्गः सादयेद्दैवतानपि ॥
indriyāṇāmanutsargo mṛtyunāpi viśiṣyate | atyarthaṃ punarutsargaḥ sādayeddaivatānapi
इन्द्रियों को पूरी तरह रोक रखना मृत्यु से भी कठिन है, और उन्हें अत्यधिक खुला छोड़ देना तो देवताओं का भी नाश कर दे।
श्लोक 53 (5.39.53)
मार्दवं सर्वभूतानामनसूया क्षमा धृतिः । आयुष्याणि बुधाः प्राहुर्मित्राणां चाविमानना ॥
mārdavaṃ sarvabhūtānāmanasūyā kṣamā dhṛtiḥ | āyuṣyāṇi budhāḥ prāhurmitrāṇāṃ cāvimānanā
सब प्राणियों के प्रति कोमलता, ईर्ष्या का अभाव, क्षमा, धैर्य और मित्रों का अपमान न करना, इन पाँचों को ज्ञानी लोग आयु बढ़ाने वाला बताते हैं।
श्लोक 54 (5.39.54)
अपनीतं सुनीतेन योऽर्थं प्रत्यानिनीषते । मतिमास्थाय सुदृढां तदकापुरुषव्रतम् ॥
apanītaṃ sunītena yo'rthaṃ pratyāninīṣate | matimāsthāya sudṛḍhāṃ tadakāpuruṣavratam
जो दृढ़ बुद्धि का सहारा लेकर कुनीति से गँवाए हुए धन को सुनीति से फिर पाना चाहता है, उसका यह आचरण कायर का नहीं, वीर पुरुष का व्रत है।
श्लोक 55 (5.39.55)
आयत्यां प्रतिकारज्ञस्तदात्वे दृढनिश्चयः । अतीते कार्यशेषज्ञो नरोऽर्थैर्न प्रहीयते ॥
āyatyāṃ pratikārajñastadātve dṛḍhaniścayaḥ | atīte kāryaśeṣajño naro'rthairna prahīyate
जो भविष्य की विपत्ति का उपाय जानता है, वर्तमान में दृढ़ निश्चय वाला है और बीते हुए काम में से शेष कर्तव्य को समझता है, वह मनुष्य धन से कभी वंचित नहीं होता।
श्लोक 56 (5.39.56)
कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते । तदेवापहरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत् ॥
karmaṇā manasā vācā yadabhīkṣṇaṃ niṣevate | tadevāpaharatyenaṃ tasmātkalyāṇamācaret
मनुष्य कर्म, मन और वाणी से जिसका बार-बार सेवन करता है, वही उसे अपनी ओर खींच ले जाता है। इसलिए सदा कल्याणकारी आचरण ही करना चाहिए।
श्लोक 57 (5.39.57)
मङ्गलालम्भनं योगः श्रुतमुत्थानमार्जवम् । भूतिमेतानि कुर्वन्ति सतां चाभीक्ष्णदर्शनम् ॥
maṅgalālambhanaṃ yogaḥ śrutamutthānamārjavam | bhūtimetāni kurvanti satāṃ cābhīkṣṇadarśanam
मंगलकारी वस्तुओं का स्पर्श, चित्त का संयम, शास्त्र-ज्ञान, उद्यम, सरलता और सज्जनों का बार-बार दर्शन, ये सब ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।
श्लोक 58 (5.39.58)
अनिर्वेदः श्रियो मूलं लाभस्य च शुभस्य च । महान्भवत्यनिर्विण्णः सुखं चानन्त्यमश्नुते ॥
anirvedaḥ śriyo mūlaṃ lābhasya ca śubhasya ca | mahānbhavatyanirviṇṇaḥ sukhaṃ cānantyamaśnute
हिम्मत न हारना ही लक्ष्मी, लाभ और कल्याण की जड़ है। जो हिम्मत नहीं हारता, वह महान बनता है और अनंत सुख भोगता है।
श्लोक 59 (5.39.59)
नातः श्रीमत्तरं किंचिदन्यत्पथ्यतमं मतम् । प्रभविष्णोर्यथा तात क्षमा सर्वत्र सर्वदा ॥
nātaḥ śrīmattaraṃ kiṃcidanyatpathyatamaṃ matam | prabhaviṣṇoryathā tāta kṣamā sarvatra sarvadā
तात, समर्थ पुरुष के लिए सब जगह और सब समय क्षमा से बढ़कर न कुछ अधिक कल्याणकारी है और न कुछ अधिक हितकर माना गया है।
श्लोक 60 (5.39.60)
क्षमेदशक्तः सर्वस्य शक्तिमान्धर्मकारणात् । अर्थानर्थौ समौ यस्य तस्य नित्यं क्षमा हिता ॥
kṣamedaśaktaḥ sarvasya śaktimāndharmakāraṇāt | arthānarthau samau yasya tasya nityaṃ kṣamā hitā
असमर्थ व्यक्ति सबको क्षमा करे और समर्थ व्यक्ति धर्म के लिए क्षमा करे। जिसके लिए लाभ और हानि समान हैं, उसके लिए क्षमा सदा हितकारी है।
श्लोक 61 (5.39.61)
यत्सुखं सेवमानोऽपि धर्मार्थाभ्यां न हीयते । कामं तदुपसेवेत न मूढव्रतमाचरेत् ॥
yatsukhaṃ sevamāno'pi dharmārthābhyāṃ na hīyate | kāmaṃ tadupaseveta na mūḍhavratamācaret
जिस सुख का सेवन करते हुए धर्म और अर्थ की हानि न हो, उसे इच्छानुसार भोगना चाहिए; परंतु मूर्खों जैसा आचरण नहीं करना चाहिए।
श्लोक 62 (5.39.62)
दुःखार्तेषु प्रमत्तेषु नास्तिकेष्वलसेषु च । न श्रीर्वसत्यदान्तेषु ये चोत्साहविवर्जिताः ॥
duḥkhārteṣu pramatteṣu nāstikeṣvalaseṣu ca | na śrīrvasatyadānteṣu ye cotsāhavivarjitāḥ
दुःख से व्याकुल, प्रमादी, नास्तिक, आलसी, असंयमी और उत्साहहीन लोगों के पास लक्ष्मी नहीं ठहरती।
श्लोक 63 (5.39.63)
आर्जवेन नरं युक्तमार्जवात्सव्यपत्रपम् । अशक्तं मन्यमानास्तु धर्षयन्ति कुबुद्धयः ॥
ārjavena naraṃ yuktamārjavātsavyapatrapam | aśaktaṃ manyamānāstu dharṣayanti kubuddhayaḥ
जो व्यक्ति सरल है और सरलता के कारण संकोची है, उसे दुर्बुद्धि लोग असमर्थ समझकर दबाने लगते हैं।
श्लोक 64 (5.39.64)
अत्यार्यमतिदातारमतिशूरमतिव्रतम् । प्रज्ञाभिमानिनं चैव श्रीर्भयान्नोपसर्पति ॥
atyāryamatidātāramatiśūramativratam | prajñābhimāninaṃ caiva śrīrbhayānnopasarpati
जो अत्यधिक सज्जन, अत्यधिक दानी, अत्यधिक शूरवीर, अत्यधिक व्रतनिष्ठ और अपनी बुद्धि का अभिमानी हो, उसके पास लक्ष्मी भय के कारण नहीं जाती।
श्लोक 65 (5.39.65)
न चातिगुणवत्स्वेषा नात्यन्तं निर्गुणेषु च । नेषा गुणान्कामयते नैर्गुण्यान्नानुरज्यते । उन्मत्ता गौरिवान्धा श्रीः क्वचिदेवावतिष्ठते ॥
na cātiguṇavatsveṣā nātyantaṃ nirguṇeṣu ca | neṣā guṇānkāmayate nairguṇyānnānurajyate | unmattā gaurivāndhā śrīḥ kvacidevāvatiṣṭhate
वह न अत्यधिक गुणवानों के पास रहती है और न पूरी तरह गुणहीनों के पास। वह न गुणों की चाह रखती है और न गुणहीनता से प्रसन्न होती है। पागल और अंधी गाय की तरह लक्ष्मी कहीं-कहीं ही टिकती है।
श्लोक 66 (5.39.66)
अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवृत्तफलं श्रुतम् । रतिपुत्रफला नारी दत्तभुक्तफलं धनम् ॥
agnihotraphalā vedāḥ śīlavṛttaphalaṃ śrutam | ratiputraphalā nārī dattabhuktaphalaṃ dhanam
वेदों का फल अग्निहोत्र है, शास्त्र-ज्ञान का फल शील और सदाचार है, पत्नी का फल प्रेम और संतान है, और धन का फल दान और उपभोग है।
श्लोक 67 (5.39.67)
अधर्मोपार्जितैरर्थैर्यः करोत्यौर्ध्वदेहिकम् । न स तस्य फलं प्रेत्य भुङ्क्तेऽर्थस्य दुरागमात् ॥
adharmopārjitairarthairyaḥ karotyaurdhvadehikam | na sa tasya phalaṃ pretya bhuṅkte'rthasya durāgamāt
जो अधर्म से कमाए धन से परलोक के लिए कर्म करता है, वह मरने के बाद उनका फल नहीं पाता, क्योंकि वह धन बुरे मार्ग से आया होता है।
श्लोक 68 (5.39.68)
कान्तारे वनदुर्गेषु कृच्छ्रास्वापत्सु संभ्रमे । उद्यतेषु च शस्त्रेषु नास्ति सत्ववतां भयम् ॥
kāntāre vanadurgeṣu kṛcchrāsvāpatsu saṃbhrame | udyateṣu ca śastreṣu nāsti satvavatāṃ bhayam
बीहड़ों में, घने वनों और दुर्गम स्थानों में, कठिन विपत्तियों में, घबराहट के समय और शस्त्र उठे होने पर भी साहसी लोगों को भय नहीं होता।
श्लोक 69 (5.39.69)
उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादो धृतिः स्मृतिः । समीक्ष्य च समारम्भो विद्धि मूलं भवस्य तु ॥
utthānaṃ saṃyamo dākṣyamapramādo dhṛtiḥ smṛtiḥ | samīkṣya ca samārambho viddhi mūlaṃ bhavasya tu
उद्यम, संयम, दक्षता, सावधानी, धैर्य, स्मरण-शक्ति और सोच-विचार कर कार्य आरंभ करना, इन्हें उन्नति का मूल समझो।
श्लोक 70 (5.39.70)
तपो बलं तापसानां ब्रह्म ब्रह्मविदां बलम् । हिंसा बलमसाधूनां क्षमा गुणवतां बलम् ॥
tapo balaṃ tāpasānāṃ brahma brahmavidāṃ balam | hiṃsā balamasādhūnāṃ kṣamā guṇavatāṃ balam
तपस्वियों का बल तप है, ब्रह्मवेत्ताओं का बल वेद है, दुष्टों का बल हिंसा है और गुणवानों का बल क्षमा है।
श्लोक 71 (5.39.71)
अष्टौ तान्यव्रतघ्नानि आपो मूलं फलं पयः । हविर्ब्राह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमौषधम् ॥
aṣṭau tānyavrataghnāni āpo mūlaṃ phalaṃ payaḥ | havirbrāhmaṇakāmyā ca gurorvacanamauṣadham
ये आठ व्रत को भंग नहीं करते: जल, कंद-मूल, फल, दूध, घी, ब्राह्मण की इच्छा, गुरु का वचन और औषधि।
श्लोक 72 (5.39.72)
न तत्परस्य सन्दध्यात्प्रतिकूलं यदात्मनः । सङ्ग्रहेणैव धर्मः स्यात्कामादन्यः प्रवर्तते ॥
na tatparasya sandadhyātpratikūlaṃ yadātmanaḥ | saṅgraheṇaiva dharmaḥ syātkāmādanyaḥ pravartate
जो बात अपने को प्रतिकूल लगे, वह दूसरे के साथ नहीं करनी चाहिए। संक्षेप में यही धर्म है; इसके अतिरिक्त जो कुछ है, वह कामना से प्रेरित होता है।
श्लोक 73 (5.39.73)
अक्रोधेन जयेत्क्रोधमसाधुं साधुना जयेत् । जयेत्कदर्यं दानेन जयेत्सत्येन चानृतम् ॥
akrodhena jayetkrodhamasādhuṃ sādhunā jayet | jayetkadaryaṃ dānena jayetsatyena cānṛtam
क्रोध को शांति से, दुष्ट को सज्जनता से, कंजूस को दान से और असत्य को सत्य से जीतना चाहिए।
श्लोक 74 (5.39.74)
स्त्रीधूर्तकेऽलसे भीरौ चण्डे पुरुषमानिनि । चोरे कृतघ्ने विश्वासो न कार्यो न च नास्तिके ॥
strīdhūrtake'lase bhīrau caṇḍe puruṣamānini | core kṛtaghne viśvāso na kāryo na ca nāstike
स्त्रियों से छल करने वाले, आलसी, डरपोक, क्रोधी, अपने पुरुषत्व का अभिमान करने वाले, चोर, कृतघ्न और नास्तिक पर विश्वास नहीं करना चाहिए।
श्लोक 75 (5.39.75)
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि संप्रवर्धन्ते कीर्तिरायुर्यशो बलम् ॥
abhivādanaśīlasya nityaṃ vṛddhopasevinaḥ | catvāri saṃpravardhante kīrtirāyuryaśo balam
जो सदा बड़ों को प्रणाम करता है और वृद्धों की सेवा करता है, उसकी चार चीज़ें बढ़ती हैं: कीर्ति, आयु, यश और बल।
श्लोक 76 (5.39.76)
अतिक्लेशेन येऽर्थाः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण वा । अरेर्वा प्रणिपातेन मा स्म तेषु मनः कृथाः ॥
atikleśena ye'rthāḥ syurdharmasyātikrameṇa vā | arervā praṇipātena mā sma teṣu manaḥ kṛthāḥ
जो धन अत्यधिक क्लेश से, धर्म का उल्लंघन करके या शत्रु के आगे झुककर मिलता हो, उसमें मन मत लगाओ।
श्लोक 77 (5.39.77)
अविद्यः पुरुषः शोच्यः शोच्यं मैथुनमप्रजम् । निराहाराः प्रजाः शोच्याः शोच्यं राष्ट्रमराजकं ॥
avidyaḥ puruṣaḥ śocyaḥ śocyaṃ maithunamaprajam | nirāhārāḥ prajāḥ śocyāḥ śocyaṃ rāṣṭramarājakaṃ
विद्याहीन मनुष्य शोचनीय है, संतानहीन मैथुन शोचनीय है, भोजन से वंचित प्रजा शोचनीय है और राजा से रहित राष्ट्र शोचनीय है।
श्लोक 78 (5.39.78)
अध्वा जरा देहवतां पर्वतानां जलं जरा । असंभोगो जरा स्त्रीणां वाक्छल्यं मनसो जरा ॥
adhvā jarā dehavatāṃ parvatānāṃ jalaṃ jarā | asaṃbhogo jarā strīṇāṃ vākchalyaṃ manaso jarā
देहधारियों के लिए निरंतर यात्रा बुढ़ापा है, पर्वतों के लिए जल बुढ़ापा है, स्त्रियों के लिए संग का अभाव बुढ़ापा है और मन के लिए वाणी के बाण बुढ़ापा हैं।
श्लोक 79 (5.39.79)
अनाम्नायमला वेदा ब्राह्मणस्याव्रतं मलम् । मलं पृथिव्या वाह्लीकाः पुरुषस्यानृतं मलम् ॥
anāmnāyamalā vedā brāhmaṇasyāvrataṃ malam | malaṃ pṛthivyā vāhlīkāḥ puruṣasyānṛtaṃ malam
पाठ न होना वेदों का मल है, व्रत का पालन न करना ब्राह्मण का मल है, बाह्लीक पृथ्वी के मल हैं और असत्य पुरुष का मल है।
श्लोक 80 (5.39.80)
कौतूहलमला साध्वी विप्रवासमलाः स्त्रियः ॥
kautūhalamalā sādhvī vipravāsamalāḥ striyaḥ
व्यर्थ का कौतूहल साध्वी स्त्री का मल है और घर से दूर रहना स्त्रियों का मल है।
श्लोक 81 (5.39.81)
सुवर्णस्य मलं रूप्यं रूप्यस्यापि मलं त्रपु । ज्ञेयं त्रपुमलं सीसं सीसस्यापि मलं मलम् ॥
suvarṇasya malaṃ rūpyaṃ rūpyasyāpi malaṃ trapu | jñeyaṃ trapumalaṃ sīsaṃ sīsasyāpi malaṃ malam
सोने का मल चाँदी है, चाँदी का मल राँगा है, राँगे का मल सीसा जानो, और सीसे का मल तो केवल मैल है।
श्लोक 82 (5.39.82)
न स्वप्नेन जयेन्निद्रां न कामेन जयेत्स्त्रियः । नेन्धनेन जयेदग्निं न पानेन सुरां जयेत् ॥
na svapnena jayennidrāṃ na kāmena jayetstriyaḥ | nendhanena jayedagniṃ na pānena surāṃ jayet
सोकर नींद को नहीं जीता जा सकता, कामभाव से स्त्रियों को नहीं, ईंधन से अग्नि को नहीं और पीकर मदिरा को नहीं जीता जा सकता।
श्लोक 83 (5.39.83)
यस्य दानजितं मित्रं शत्रवो युधि निर्जिताः । अन्नपानजिता दाराः सफलं तस्य जीवितम् ॥
yasya dānajitaṃ mitraṃ śatravo yudhi nirjitāḥ | annapānajitā dārāḥ saphalaṃ tasya jīvitam
जिसने दान से मित्रों को, युद्ध में शत्रुओं को और अन्न-पान से पत्नी को जीत लिया है, उसका जीवन सफल है।
श्लोक 84 (5.39.84)
सहस्रिणोऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनस्तथा । धृतराष्ट्र विमुञ्चेच्छां न कथञ्चिन्न जीव्यते ॥
sahasriṇo'pi jīvanti jīvanti śatinastathā | dhṛtarāṣṭra vimuñcecchāṃ na kathañcinna jīvyate
हजार वाले भी जीते हैं और सौ वाले भी जीते हैं। हे धृतराष्ट्र, लालसा छोड़ दो; ऐसा नहीं कि किसी तरह जिया ही न जा सके।
श्लोक 85 (5.39.85)
यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः । नालमेकस्य तत्सर्वमिति पश्यन्न मुह्यति ॥
yatpṛthivyāṃ vrīhiyavaṃ hiraṇyaṃ paśavaḥ striyaḥ | nālamekasya tatsarvamiti paśyanna muhyati
पृथ्वी पर जितने धान और जौ, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब एक व्यक्ति के लिए भी पर्याप्त नहीं हैं; जो यह देख लेता है, वह मोह में नहीं पड़ता।
श्लोक 86 (5.39.86)
राजन्भूयो ब्रवीमि त्वां पुत्रेषु सममाचर । समता यदि ते राजन्स्वेषु पाण्डुसुतेषु वा ॥
rājanbhūyo bravīmi tvāṃ putreṣu samamācara | samatā yadi te rājansveṣu pāṇḍusuteṣu vā
हे राजन्, मैं तुमसे फिर कहता हूँ: पुत्रों के प्रति समान व्यवहार करो। हे राजन्, अपने पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों पर तुम्हारी दृष्टि एक-सी हो।