उद्योग पर्व · अध्याय 40
मृत्यु के बाद केवल धर्म साथ जाता है
विदुर नीति, अध्याय 8 / 8
विदुर रात भर अपना उपदेश जारी रखते हैं: ब्रह्महत्या के समान पाप, विद्या के शत्रु, कभी तृप्त न होने वाली चीज़ें और घर में रखने योग्य मंगलकारी वस्तुएँ। वे धृतराष्ट्र से आग्रह करते हैं कि धर्म का त्याग कभी न करें, क्योंकि मृत्यु के समय धन और संबंधी यहीं छूट जाते हैं और केवल अपने कर्म साथ जाते हैं। फिर वे चारों वर्णों के धर्म बताकर राजा से पाण्डुपुत्र को उसके राजधर्म में फिर से स्थापित करने को कहते हैं। धृतराष्ट्र बात को सही मानते हैं, पर स्वीकार करते हैं कि दुर्योधन के पास पहुँचते ही उनकी बुद्धि पलट जाती है, और वे इसका दोष प्रारब्ध पर डालते हैं।
विदुर उवाच
श्लोक 1 (5.40.1)
योऽभ्यर्चितः सद्भिरसज्जमानः । करोत्यर्थं शक्तिमहापयित्वा । क्षिप्रं यशस्तं समुपैति सन्त- । मलं प्रसन्ना हि सुखाय सन्तः ॥
yo'bhyarcitaḥ sadbhirasajjamānaḥ | karotyarthaṃ śaktimahāpayitvā | kṣipraṃ yaśastaṃ samupaiti santa- | malaṃ prasannā hi sukhāya santaḥ
जो सज्जनों से सम्मान पाकर, आसक्ति रखे बिना और अपनी शक्ति में कोई कमी न करते हुए उनका काम करता है, उस सत्पुरुष को शीघ्र ही यश मिलता है; क्योंकि प्रसन्न हुए सज्जन सुख देने में पूरी तरह समर्थ होते हैं।
श्लोक 2 (5.40.2)
महान्तमप्यर्थमधर्मयुक्तं । यः सन्त्यजत्यनपाकृष्ट एव । सुखं सुदुःखान्यवमुच्य शेते । जीर्णां त्वचं सर्प इवावमुच्य ॥
mahāntamapyarthamadharmayuktaṃ | yaḥ santyajatyanapākṛṣṭa eva | sukhaṃ suduḥkhānyavamucya śete | jīrṇāṃ tvacaṃ sarpa ivāvamucya
जो अधर्म से जुड़े बड़े-से-बड़े धन को भी बिना किसी दबाव के त्याग देता है, वह अपने भारी दुःखों से छूटकर वैसे ही सुख से सोता है जैसे साँप पुरानी केंचुली उतारकर।
श्लोक 3 (5.40.3)
अनृते च समुत्कर्षो राजगामि च पैशुनम् । गुरोश्चालीकनिर्बन्धः समानि ब्रह्महत्यया ॥
anṛte ca samutkarṣo rājagāmi ca paiśunam | guroścālīkanirbandhaḥ samāni brahmahatyayā
झूठ के सहारे अपनी बड़ाई करना, राजा तक चुगली पहुँचाना और गुरु के साथ बार-बार कपट करना, ये तीनों ब्रह्महत्या के समान हैं।
श्लोक 4 (5.40.4)
असूयैकपदं मृत्युरतिवादः श्रियो वधः । अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा विद्यायाः शत्रवस्त्रयः ॥
asūyaikapadaṃ mṛtyurativādaḥ śriyo vadhaḥ | aśuśrūṣā tvarā ślāghā vidyāyāḥ śatravastrayaḥ
ईर्ष्या एक ही पग में मृत्यु है और बढ़-चढ़कर बोलना लक्ष्मी का वध है। सुनने और सेवा करने में अरुचि, उतावलापन और आत्मप्रशंसा, ये तीन विद्या के शत्रु हैं।
श्लोक 5 (5.40.5)
आलस्यं मदमोहौ च चापलं गोष्ठिरेव च । स्तब्धता चाभिमानित्वं तथा त्यागित्वमेव च । एते वै सप्त दोषाः स्युः सदा विद्यार्थिनां मताः ॥
ālasyaṃ madamohau ca cāpalaṃ goṣṭhireva ca | stabdhatā cābhimānitvaṃ tathā tyāgitvameva ca | ete vai sapta doṣāḥ syuḥ sadā vidyārthināṃ matāḥ
आलस्य, मद और मोह, चंचलता, गपशप की मंडली, जड़ता, अभिमान और त्याग न कर पाना, ये सात दोष विद्यार्थियों के लिए सदा माने गए हैं।
श्लोक 6 (5.40.6)
सुखार्थिनः कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखं । सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत्सुखम् ॥
sukhārthinaḥ kuto vidyā nāsti vidyārthinaḥ sukhaṃ | sukhārthī vā tyajedvidyāṃ vidyārthī vā tyajetsukham
सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ, और विद्या चाहने वाले को सुख कहाँ? सुख चाहने वाला विद्या छोड़ दे, या विद्या चाहने वाला सुख छोड़ दे।
श्लोक 7 (5.40.7)
नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः । नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ॥
nāgnistṛpyati kāṣṭhānāṃ nāpagānāṃ mahodadhiḥ | nāntakaḥ sarvabhūtānāṃ na puṃsāṃ vāmalocanā
अग्नि लकड़ियों से, महासागर नदियों से, यमराज समस्त प्राणियों से और सुंदर नेत्रों वाली स्त्री पुरुषों से कभी तृप्त नहीं होती।
श्लोक 8 (5.40.8)
आशा धृतिं हन्ति समृद्धिमन्तकः । क्रोधः श्रियं हन्ति यशः कदर्यता । अपालनं हन्ति पशूंश्च राज- । न्नेकः क्रुद्धो ब्राह्मणो हन्ति राष्ट्रम् ॥
āśā dhṛtiṃ hanti samṛddhimantakaḥ | krodhaḥ śriyaṃ hanti yaśaḥ kadaryatā | apālanaṃ hanti paśūṃśca rāja- | nnekaḥ kruddho brāhmaṇo hanti rāṣṭram
लालसा धैर्य को नष्ट करती है, यमराज समृद्धि को, क्रोध लक्ष्मी को, कंजूसी यश को, देखभाल का अभाव पशुओं को, और हे राजन्, एक क्रुद्ध ब्राह्मण पूरे राष्ट्र को नष्ट कर देता है।
श्लोक 9 (5.40.9)
अजाश्च कांस्यं रजतं च नित्यं । मध्वाकर्षः शकुनिः श्रोत्रियश्च । वृद्धो ज्ञातिरवसन्नः कुलीन । एतानि ते सन्तु गृहे सदैव ॥
ajāśca kāṃsyaṃ rajataṃ ca nityaṃ | madhvākarṣaḥ śakuniḥ śrotriyaśca | vṛddho jñātiravasannaḥ kulīna | etāni te santu gṛhe sadaiva
बकरियाँ, काँसा, चाँदी, मधु, विष खींचने वाली औषधि, पक्षी, वेदपाठी ब्राह्मण, वृद्ध संबंधी और विपत्ति में पड़ा कुलीन व्यक्ति, ये सदा तुम्हारे घर में रहें।
श्लोक 10 (5.40.10)
अजोक्षा चन्दनं वीणा आदर्शो मधुसर्पिषी । विषमौदुम्बरं शङ्खः स्वर्णनाभोऽथ रोचना ॥
ajokṣā candanaṃ vīṇā ādarśo madhusarpiṣī | viṣamaudumbaraṃ śaṅkhaḥ svarṇanābho'tha rocanā
बकरा, बैल, चन्दन, वीणा, दर्पण, मधु और घी, जल, ताँबे का पात्र, शंख, शालग्राम और गोरोचन,
श्लोक 11 (5.40.11)
गृहे स्थापयितव्यानि धन्यानि मनुरब्रवीत् । देवब्राह्मणपूजार्थमतिथीनां च भारत ॥
gṛhe sthāpayitavyāni dhanyāni manurabravīt | devabrāhmaṇapūjārthamatithīnāṃ ca bhārata
हे भारत, मनु ने कहा है कि देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा तथा अतिथियों के सत्कार के लिए ये मंगलकारी वस्तुएँ घर में रखनी चाहिए।
श्लोक 12 (5.40.12)
इदं च त्वां सर्वपरं ब्रवीमि । पुण्यं पदं तात महाविशिष्टम् । न जातु कामान्न भयान्न लोभा- । द्धर्मं जह्याज्जीवितस्यापि हेतोः ॥
idaṃ ca tvāṃ sarvaparaṃ bravīmi | puṇyaṃ padaṃ tāta mahāviśiṣṭam | na jātu kāmānna bhayānna lobhā- | ddharmaṃ jahyājjīvitasyāpi hetoḥ
तात, अब मैं तुम्हें सबसे श्रेष्ठ, पवित्र और अत्यंत उत्तम बात बताता हूँ: काम, भय या लोभ से, और प्राण बचाने के लिए भी, धर्म का त्याग कभी न करो।
श्लोक 13 (5.40.13)
नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये । जीवो नित्यो धातुरस्य त्वनित्यः । त्यक्त्वाऽनित्यं प्रतितिष्ठस्व नित्ये । संतुष्य सन्तोषपरा हि सन्तः ॥
nityo dharmaḥ sukhaduḥkhe tvanitye | jīvo nityo dhāturasya tvanityaḥ | tyaktvā'nityaṃ pratitiṣṭhasva nitye | saṃtuṣya santoṣaparā hi santaḥ
धर्म नित्य है, सुख-दुःख अनित्य हैं। जीव नित्य है, पर उसका शरीर अनित्य है। अनित्य को छोड़कर नित्य में स्थित हो जाओ और संतोष रखो, क्योंकि सज्जन संतोष को ही सर्वोपरि मानते हैं।
श्लोक 14 (5.40.14)
महाबलान्पश्य महानुभावान् । प्रशास्य भूमिं धनधान्यपूर्णाम् । राज्यानि हित्वा विपुलांश्च भोगान् । गतान्नरेन्द्रान्वशमन्तकस्य ॥
mahābalānpaśya mahānubhāvān | praśāsya bhūmiṃ dhanadhānyapūrṇām | rājyāni hitvā vipulāṃśca bhogān | gatānnarendrānvaśamantakasya
उन महाबली और प्रतापी राजाओं को देखो, जिन्होंने धन-धान्य से भरी पृथ्वी पर शासन किया और फिर अपने राज्य तथा विपुल भोग छोड़कर यमराज के वश में चले गए।
श्लोक 15 (5.40.15)
मृतं पुत्रं दुःखपुष्टं मनुष्या । उत्क्षिप्य राजन्स्वगृहान्निर्हरन्ति । तं मुक्तकेशाः करुणं रुदन्ति । चितामध्ये काष्ठमिव क्षिपन्ति ॥
mṛtaṃ putraṃ duḥkhapuṣṭaṃ manuṣyā | utkṣipya rājansvagṛhānnirharanti | taṃ muktakeśāḥ karuṇaṃ rudanti | citāmadhye kāṣṭhamiva kṣipanti
हे राजन्, बड़े कष्ट से पाले गए पुत्र के मर जाने पर लोग उसे उठाकर अपने घर से बाहर ले जाते हैं। बाल खोले वे करुण विलाप करते हैं और फिर उसे लकड़ी की तरह चिता के बीच डाल देते हैं।
श्लोक 16 (5.40.16)
अन्यो धनं प्रेतगतस्य भुङ्क्ते । वयांसि चाग्निश्च शरीरधातून् । द्वाभ्यामयं सह गच्छत्यमुत्र । पुण्येन पापेन च वेष्ट्यमानः ॥
anyo dhanaṃ pretagatasya bhuṅkte | vayāṃsi cāgniśca śarīradhātūn | dvābhyāmayaṃ saha gacchatyamutra | puṇyena pāpena ca veṣṭyamānaḥ
मरे हुए व्यक्ति के धन को कोई दूसरा भोगता है और उसके शरीर के तत्त्वों को पक्षी तथा अग्नि खा जाते हैं। वह परलोक में केवल दो के साथ जाता है, पुण्य और पाप के, जो उसे लिपटे रहते हैं।
श्लोक 17 (5.40.17)
उत्सृज्य विनिवर्तन्ते ज्ञातयः सुहृदः सुताः । अपुष्पानफलान्वृक्षान्यथा तात पतत्रिणः ॥
utsṛjya vinivartante jñātayaḥ suhṛdaḥ sutāḥ | apuṣpānaphalānvṛkṣānyathā tāta patatriṇaḥ
तात, संबंधी, मित्र और पुत्र उसे छोड़कर वैसे ही लौट जाते हैं, जैसे पक्षी फूल और फल से रहित वृक्षों को छोड़ देते हैं।
श्लोक 18 (5.40.18)
अग्नौ प्रास्तं तु पुरुषं कर्मान्वेति स्वयं कृतम् । तस्मात्तु पुरुषो यत्नाद्धर्मं सञ्चिनुयाच्छनैः ॥
agnau prāstaṃ tu puruṣaṃ karmānveti svayaṃ kṛtam | tasmāttu puruṣo yatnāddharmaṃ sañcinuyācchanaiḥ
अग्नि में रखे गए मनुष्य के पीछे केवल उसके अपने किए हुए कर्म जाते हैं। इसलिए मनुष्य को यत्नपूर्वक धीरे-धीरे धर्म का संचय करना चाहिए।
श्लोक 19 (5.40.19)
अस्माल्लोकादूर्ध्वममुष्य चाधो । महत्तमस्तिष्ठति ह्यन्धकारम् । तद्वै महामोहनमिन्द्रियाणां । बुध्यस्व मा त्वां प्रलभेत राजन् ॥
asmāllokādūrdhvamamuṣya cādho | mahattamastiṣṭhati hyandhakāram | tadvai mahāmohanamindriyāṇāṃ | budhyasva mā tvāṃ pralabheta rājan
इस लोक के ऊपर और परलोक के नीचे घना अंधकार फैला है। हे राजन्, उसे इन्द्रियों को मोह में डालने वाला महान अंधकार समझो, ताकि वह तुम्हें ग्रस न ले।
श्लोक 20 (5.40.20)
इदं वचः शक्ष्यसि चेद्यथाव- । न्निशम्य सर्वं प्रतिपत्तुमेव । यशः परं प्राप्स्यसि जीवलोके । भयं नचामुत्र नचेह तेऽस्ति ॥
idaṃ vacaḥ śakṣyasi cedyathāva- | nniśamya sarvaṃ pratipattumeva | yaśaḥ paraṃ prāpsyasi jīvaloke | bhayaṃ nacāmutra naceha te'sti
यदि तुम ये सब बातें सुनकर उन्हें ठीक-ठीक अपना सको, तो इस जीवलोक में तुम्हें परम यश मिलेगा और तुम्हें न यहाँ कोई भय रहेगा, न परलोक में।
श्लोक 21 (5.40.21)
आत्मा नदी भारत पुण्यतीर्था । सत्योदया धृतिकूला दयोर्मिः । तस्यां स्नातः पूयते पुण्यकर्मा । पुण्यो ह्यात्मा नित्यमलोभ एव ॥
ātmā nadī bhārata puṇyatīrthā | satyodayā dhṛtikūlā dayormiḥ | tasyāṃ snātaḥ pūyate puṇyakarmā | puṇyo hyātmā nityamalobha eva
हे भारत, आत्मा एक नदी है जिसमें पवित्र तीर्थ हैं; सत्य उसका उद्गम है, धैर्य उसके किनारे हैं और दया उसकी लहरें हैं। पुण्यकर्मा मनुष्य उसमें स्नान करके पवित्र हो जाता है, क्योंकि आत्मा पवित्र और सदा लोभरहित है।
श्लोक 22 (5.40.22)
कामक्रोधग्राहवतीं पञ्चेन्द्रियजलां नदीम् । नावं धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि संतर ॥
kāmakrodhagrāhavatīṃ pañcendriyajalāṃ nadīm | nāvaṃ dhṛtimayīṃ kṛtvā janmadurgāṇi saṃtara
यह नदी काम और क्रोध रूपी मगरों से भरी है और पाँच इन्द्रियाँ इसका जल हैं। धैर्य की नाव बनाकर जन्म-मरण के संकटों को पार करो।
श्लोक 23 (5.40.23)
प्रज्ञावृद्धं धर्मवृद्धं स्वबन्धुं । विद्यावृद्धं वयसा चापि वृद्धम् । कार्याकार्ये पूजयित्वा प्रसाद्य । यः संपृच्छेन्न स मुह्येत्कदाचित् ॥
prajñāvṛddhaṃ dharmavṛddhaṃ svabandhuṃ | vidyāvṛddhaṃ vayasā cāpi vṛddham | kāryākārye pūjayitvā prasādya | yaḥ saṃpṛcchenna sa muhyetkadācit
जो बुद्धि, धर्म, विद्या और आयु में बड़े अपने बंधु का आदर करके और उसे प्रसन्न करके कर्तव्य-अकर्तव्य के विषय में पूछता है, वह कभी मोह में नहीं पड़ता।
श्लोक 24 (5.40.24)
धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत्पाणिपादं च चक्षुषा । चक्षुःश्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च कर्मणा ॥
dhṛtyā śiśnodaraṃ rakṣetpāṇipādaṃ ca cakṣuṣā | cakṣuḥśrotre ca manasā mano vācaṃ ca karmaṇā
धैर्य से जननेन्द्रिय और पेट की रक्षा करे, आँखों से हाथ-पैरों की, मन से आँखों और कानों की, तथा सत्कर्म से मन और वाणी की।
श्लोक 25 (5.40.25)
नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती । नित्यस्वाध्यायी पतितान्नवर्जी । सत्यं ब्रुवन्गुरवे कर्म कुर्व- । न्न ब्राह्मणश्च्यवते ब्रह्मलोकात् ॥
nityodakī nityayajñopavītī | nityasvādhyāyī patitānnavarjī | satyaṃ bruvangurave karma kurva- | nna brāhmaṇaścyavate brahmalokāt
जो ब्राह्मण नित्य जल से तर्पण करता है, सदा यज्ञोपवीत धारण करता है, प्रतिदिन स्वाध्याय करता है, पतितों का अन्न नहीं खाता, सत्य बोलता है और गुरु की सेवा करता है, वह ब्रह्मलोक से च्युत नहीं होता।
श्लोक 26 (5.40.26)
अधीत्य वेदान्परिसंस्तीर्य चाग्नी- । निष्ट्वा यज्ञैः पालयित्वा प्रजाश्च । गोब्राह्मणार्थं शस्त्रपूतान्तरात्मा । हतः सङ्ग्रामे क्षत्रियः स्वर्गमेति ॥
adhītya vedānparisaṃstīrya cāgnī- | niṣṭvā yajñaiḥ pālayitvā prajāśca | gobrāhmaṇārthaṃ śastrapūtāntarātmā | hataḥ saṅgrāme kṣatriyaḥ svargameti
जो क्षत्रिय वेद पढ़कर, अग्नियों की उपासना करके, यज्ञ करके और प्रजा का पालन करके गौ और ब्राह्मणों के लिए युद्ध में मारा जाता है, शस्त्रों से पवित्र अंतःकरण वाला वह क्षत्रिय स्वर्ग को जाता है।
श्लोक 27 (5.40.27)
वैश्योऽधीत्य ब्राह्मणान्क्षत्रियांश्च । धनैः काले संविभज्याश्रितांश्च । त्रेतापूतं धूममाघ्राय पुण्यं । प्रेत्य स्वर्गे दिव्यसुखानि भुङ्क्ते ॥
vaiśyo'dhītya brāhmaṇānkṣatriyāṃśca | dhanaiḥ kāle saṃvibhajyāśritāṃśca | tretāpūtaṃ dhūmamāghrāya puṇyaṃ | pretya svarge divyasukhāni bhuṅkte
जो वैश्य अध्ययन करके, समय-समय पर ब्राह्मणों, क्षत्रियों और आश्रितों में अपना धन बाँटता है और तीनों अग्नियों से पवित्र यज्ञ-धूम को सूँघता है, वह मरने के बाद स्वर्ग में दिव्य सुख भोगता है।
श्लोक 28 (5.40.28)
ब्रह्म क्षत्रं वैश्यवर्णं च शूद्रः । क्रमेणैतान्न्यायतः पूजयानः । तुष्टेष्वेतेष्वव्यथो दग्धपाप- । स्त्यक्त्वा देहं स्वर्गसुखानि भुङ्क्ते ॥
brahma kṣatraṃ vaiśyavarṇaṃ ca śūdraḥ | krameṇaitānnyāyataḥ pūjayānaḥ | tuṣṭeṣveteṣvavyatho dagdhapāpa- | styaktvā dehaṃ svargasukhāni bhuṅkte
जो शूद्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण का क्रम से न्यायपूर्वक सम्मान करता है, उनके संतुष्ट रहने पर वह व्यथारहित और निष्पाप होकर देह त्यागने के बाद स्वर्ग का सुख भोगता है।
श्लोक 29 (5.40.29)
चातुर्वर्ण्यस्यैष धर्मस्तवोक्तो । हेतुं चानुब्रुवतो मे निबोध । क्षात्राद्धर्माद्धीयते पाण्डुपुत्र- । स्तं त्वं राजन्राजधर्मे नियुङ्क्ष्व ॥
cāturvarṇyasyaiṣa dharmastavokto | hetuṃ cānubruvato me nibodha | kṣātrāddharmāddhīyate pāṇḍuputra- | staṃ tvaṃ rājanrājadharme niyuṅkṣva
मैंने तुम्हें चारों वर्णों का यह धर्म बताया; अब इसका कारण भी मुझसे सुनो। पाण्डुपुत्र क्षत्रिय-धर्म से वंचित हो रहा है; हे राजन्, उसे राजधर्म में नियुक्त करो।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 30 (5.40.30)
एवमेतद्यथा त्वं मामनुशाससि नित्यदा । ममापि च मतिः सौम्य भवत्येवं यथात्थ माम् ॥
evametadyathā tvaṃ māmanuśāsasi nityadā | mamāpi ca matiḥ saumya bhavatyevaṃ yathāttha mām
तुम मुझे सदा जैसा उपदेश देते हो, बात ठीक वैसी ही है। हे सौम्य, मेरी बुद्धि भी वैसी ही होती है जैसी तुम मुझसे कहते हो।
श्लोक 31 (5.40.31)
सा तु बुद्धिः कृताप्येवं पाण्डवान्प्रति मे सदा । दुर्योधनं समासाद्य पुनर्विपरिवर्तते ॥
sā tu buddhiḥ kṛtāpyevaṃ pāṇḍavānprati me sadā | duryodhanaṃ samāsādya punarviparivartate
परंतु पाण्डवों के विषय में मेरी बुद्धि सदा ऐसी बन जाने पर भी दुर्योधन के पास पहुँचते ही फिर पलट जाती है।
श्लोक 32 (5.40.32)
न दिष्टमभ्यतिक्रान्तुं शक्यं भूतेन केनचित् । दिष्टमेव ध्रुवं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम् ॥
na diṣṭamabhyatikrāntuṃ śakyaṃ bhūtena kenacit | diṣṭameva dhruvaṃ manye pauruṣaṃ tu nirarthakam
कोई भी प्राणी प्रारब्ध का उल्लंघन नहीं कर सकता। मैं तो प्रारब्ध को ही अटल मानता हूँ; पुरुषार्थ व्यर्थ है।