उद्योग पर्व · अध्याय 41
विदुर द्वारा सनत्सुजात का आवाहन
सनत्सुजातीय, अध्याय 1 / 6
धृतराष्ट्र विदुर से पूछते हैं कि क्या कुछ कहना शेष रह गया है। विदुर बताते हैं कि मृत्यु के न होने का उपदेश देने वाले सनातन कुमार सनत्सुजात राजा के हृदय के संशयों का उत्तर दे सकते हैं, क्योंकि शूद्र माता से जन्मे विदुर स्वयं गूढ़तम विषयों पर नहीं बोलेंगे। राजा के कहने पर विदुर ऋषि का स्मरण करते हैं; सनत्सुजात प्रकट होते हैं, उनका यथोचित सत्कार होता है, और विदुर उनसे धृतराष्ट्र को संशय तथा द्वंद्वों से मुक्त करने की प्रार्थना करते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (5.41.1)
अनुक्तं यदि ते किञ्चिद्वाचा विदुर विद्यते । तन्मे शुश्रूषतो ब्रूहि विचित्राणि हि भाषसे ॥
anuktaṃ yadi te kiñcidvācā vidura vidyate | tanme śuśrūṣato brūhi vicitrāṇi hi bhāṣase
हे विदुर, यदि तुम्हारी वाणी में कुछ अनकहा रह गया हो, तो मुझे बताओ; मैं सुनने को उत्सुक हूँ, क्योंकि तुम अद्भुत बातें कहते हो।
विदुर उवाच
श्लोक 2 (5.41.2)
धृतराष्ट्र कुमारो वै यः पुराणः सनातनः । सनत्सुजातः प्रोवाच मृत्युर्नास्तीति भारत ॥
dhṛtarāṣṭra kumāro vai yaḥ purāṇaḥ sanātanaḥ | sanatsujātaḥ provāca mṛtyurnāstīti bhārata
हे धृतराष्ट्र, हे भारत, जो पुरातन और सनातन कुमार सनत्सुजात हैं, उन्होंने कहा है कि मृत्यु है ही नहीं।
श्लोक 3 (5.41.3)
स ते गुह्यान्प्रकाशांश्च सर्वान्हृदयसंश्रयान् । प्रवक्ष्यति महाराज सर्वबुद्धिमतां वरः ॥
sa te guhyānprakāśāṃśca sarvānhṛdayasaṃśrayān | pravakṣyati mahārāja sarvabuddhimatāṃ varaḥ
हे महाराज, सब बुद्धिमानों में श्रेष्ठ वे तुम्हारे हृदय में बसे सभी गुप्त और प्रकट प्रश्नों का उत्तर देंगे।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 4 (5.41.4)
किं त्वं न वेद तद्भूयो यन्मे ब्रूयात्सनातनः । त्वमेव विदुर ब्रूहि प्रज्ञाशेषोऽस्ति चेत्तव ॥
kiṃ tvaṃ na veda tadbhūyo yanme brūyātsanātanaḥ | tvameva vidura brūhi prajñāśeṣo'sti cettava
क्या तुम वह नहीं जानते जो वह सनातन ऋषि मुझे और बताएँगे? हे विदुर, यदि तुम्हारी प्रज्ञा में कुछ शेष हो, तो तुम्हीं बताओ।
विदुर उवाच
श्लोक 5 (5.41.5)
शूद्रयोनावहं जातो नातोऽन्यद्वक्तुमुत्सहे । कुमारस्य तु याबुद्धिर्वेद तां शाश्वतीमहम् ॥
śūdrayonāvahaṃ jāto nāto'nyadvaktumutsahe | kumārasya tu yābuddhirveda tāṃ śāśvatīmaham
मैं शूद्र योनि में जन्मा हूँ, इसलिए इससे आगे कहने का साहस नहीं करता। परंतु उस कुमार की जो बुद्धि है, उसे मैं शाश्वत जानता हूँ।
श्लोक 6 (5.41.6)
ब्राह्मीं हि योनिमापन्नः सगुह्यमपि यो वदेत् । न तेन गर्ह्यो देवानां तस्मादेतद्ब्रवीमि ते ॥
brāhmīṃ hi yonimāpannaḥ saguhyamapi yo vadet | na tena garhyo devānāṃ tasmādetadbravīmi te
जो ब्राह्मण योनि में जन्मा है, वह यदि गूढ़ से गूढ़ विषय भी कहे तो देवता उसकी निंदा नहीं करते; इसीलिए मैं तुमसे यह कह रहा हूँ।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 7 (5.41.7)
ब्रवीहि विदुर त्वं मे पुराणं तं सनातनम् । कथमेतेन देहेन स्यादिहैव समागमः ॥
bravīhi vidura tvaṃ me purāṇaṃ taṃ sanātanam | kathametena dehena syādihaiva samāgamaḥ
हे विदुर, मुझे बताओ कि इसी शरीर से, यहीं, उस पुरातन और सनातन ऋषि से मेरा मिलना कैसे हो सकता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (5.41.8)
चिन्तयामास विदुरस्तमृषिं शंसितव्रतम् । स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा दर्शयामास भारत ॥
cintayāmāsa vidurastamṛṣiṃ śaṃsitavratam | sa ca taccintitaṃ jñātvā darśayāmāsa bhārata
तब विदुर ने कठोर व्रत वाले उन ऋषि का स्मरण किया; और हे भारत, वे यह जानकर कि उनका स्मरण हो रहा है, वहाँ प्रकट हो गए।
श्लोक 9 (5.41.9)
स चैनं प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा । सुखोपविष्टं विश्रान्तमथैनं विदुरोऽब्रवीत् ॥
sa cainaṃ pratijagrāha vidhidṛṣṭena karmaṇā | sukhopaviṣṭaṃ viśrāntamathainaṃ viduro'bravīt
विदुर ने शास्त्रोक्त विधि से उनका स्वागत किया, और जब वे सुखपूर्वक बैठकर विश्राम कर चुके, तब विदुर ने उनसे कहा।
विदुर उवाच
श्लोक 10 (5.41.10)
भगवन्संशयः कश्चिद्धृतराष्ट्रस्य मानसः । यो न शक्यो मया वक्तुं त्वमस्मै वक्तुमर्हसि ॥
bhagavansaṃśayaḥ kaściddhṛtarāṣṭrasya mānasaḥ | yo na śakyo mayā vaktuṃ tvamasmai vaktumarhasi
भगवन्, धृतराष्ट्र के मन में एक संशय है, जिसका समाधान मैं अपनी वाणी से नहीं कर सकता; आप ही उन्हें समझाने योग्य हैं,
श्लोक 11 (5.41.11)
यं श्रुत्वाऽयं मनुष्येन्द्रः सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥
yaṃ śrutvā'yaṃ manuṣyendraḥ sarvaduḥkhātigo bhavet
जिसे सुनकर ये नरेश सब दुःखों से पार हो जाएँ,
श्लोक 12 (5.41.12)
लाभालाभौ प्रियद्वेष्यौ यथैनं न जरान्तकौ । विषहेरन्भयामर्षौ क्षुत्पिपासे मदोद्भवौ । अरतिश्चैव तन्द्री च कामक्रोधौ क्षयोदयौ ॥
lābhālābhau priyadveṣyau yathainaṃ na jarāntakau | viṣaheranbhayāmarṣau kṣutpipāse madodbhavau | aratiścaiva tandrī ca kāmakrodhau kṣayodayau
और जिससे लाभ-हानि, प्रिय-अप्रिय, जरा-मृत्यु, भय-क्रोध, भूख-प्यास, मद और उत्कर्ष, अरुचि और आलस्य, काम-क्रोध तथा क्षय-उदय उन्हें कभी विचलित न कर सकें।