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उद्योग पर्व · अध्याय 42

प्रमाद ही मृत्यु है

सनत्सुजातीय, अध्याय 2 / 6

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि जब देवताओं और असुरों ने मृत्यु से बचने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन किया, तो सनत्सुजात यह कैसे कहते हैं कि मृत्यु नहीं है। ऋषि उत्तर देते हैं कि प्रमाद और मोह ही मृत्यु हैं और अप्रमाद ही अमृतत्व है; मृत्यु बाघ की तरह कोई रूप नहीं रखती, बल्कि भीतर ही विषय-चिंतन, क्रोध और लोभ के रूप में रहती है, और ज्ञान में स्थित पुरुष उसे नष्ट कर देता है। आगे के प्रश्नों पर वे बताते हैं कि कर्मकांड के फल नहीं, ज्ञान ही परम पद तक ले जाता है, धर्म पाप पर विजय पाता है, और सच्चा ब्राह्मण अज्ञात रहकर, मान-अपमान से अविचलित रहते हुए, सत्य, सरलता, लज्जा, संयम, पवित्रता और विद्या से सुरक्षित जीवन जीता है।

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.42.1)

ततो राजा धृतराष्ट्रो मनीषी । संपूज्य वाक्यं विदुरेरितं तत् । सनत्सुजातं रहिते महात्मा । पप्रच्छ बुद्धिं परमां बुभूषन् ॥

tato rājā dhṛtarāṣṭro manīṣī | saṃpūjya vākyaṃ vidureritaṃ tat | sanatsujātaṃ rahite mahātmā | papraccha buddhiṃ paramāṃ bubhūṣan

तब मनीषी राजा धृतराष्ट्र ने विदुर के कहे वचनों का आदर करते हुए, परम ज्ञान की इच्छा से एकांत में महात्मा सनत्सुजात से प्रश्न किया।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 2 (5.42.2)

सनत्सुजात यदिमं शृणोमि । न मृत्युरस्तीति तवोपदेशम् । देवासुरा ह्याचरन्ब्रह्मचर्य- । ममृत्यवे तत्कतरन्नु सत्यम् ॥

sanatsujāta yadimaṃ śṛṇomi | na mṛtyurastīti tavopadeśam | devāsurā hyācaranbrahmacarya- | mamṛtyave tatkatarannu satyam

हे सनत्सुजात, मैं सुनता हूँ कि आपका उपदेश है कि मृत्यु नहीं है। फिर भी देवताओं और असुरों ने मृत्यु से बचने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन किया। इन दोनों में सत्य क्या है?

सनत्सुजात उवाच

श्लोक 3 (5.42.3)

अमृत्युं कर्मणा केचिन्मृत्युर्नास्तीति चापरे । शृणु मे ब्रुवतो राजन्यथैतन्मा विशङ्किथाः ॥

amṛtyuṃ karmaṇā kecinmṛtyurnāstīti cāpare | śṛṇu me bruvato rājanyathaitanmā viśaṅkithāḥ

कुछ कहते हैं कि कर्म से अमरत्व मिलता है, और कुछ कहते हैं कि मृत्यु है ही नहीं। हे राजन्, मेरी बात सुनो, ताकि इस विषय में तुम्हें कोई संदेह न रहे।

श्लोक 4 (5.42.4)

उभे सत्ये क्षत्रियाद्य प्रवृत्ते । मोहो मृत्युः संमतोऽयं कवीनाम् । प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि । तथाऽप्रमादममृतत्वं ब्रवीमि ॥

ubhe satye kṣatriyādya pravṛtte | moho mṛtyuḥ saṃmato'yaṃ kavīnām | pramādaṃ vai mṛtyumahaṃ bravīmi | tathā'pramādamamṛtatvaṃ bravīmi

हे क्षत्रिय, दोनों ही बातें सत्य हैं और आदि से चली आ रही हैं। ज्ञानीजन मोह को ही मृत्यु मानते हैं। मैं प्रमाद को मृत्यु कहता हूँ और उसी प्रकार अप्रमाद को अमृतत्व।

श्लोक 5 (5.42.5)

प्रमादाद्वै असुराः पराभव- । न्नप्रमादाद्ब्रह्मभूताः सुराश्च । नैव मृत्युर्व्याघ्र इवात्ति जन्तू- । न्न ह्यस्य रूपमुपलभ्यते हि ॥

pramādādvai asurāḥ parābhava- | nnapramādādbrahmabhūtāḥ surāśca | naiva mṛtyurvyāghra ivātti jantū- | nna hyasya rūpamupalabhyate hi

प्रमाद के कारण असुर पराजित हुए, और अप्रमाद से देवता ब्रह्मभाव को प्राप्त हुए। मृत्यु बाघ की तरह प्राणियों को नहीं खाती; उसका तो कोई रूप ही दिखाई नहीं देता।

श्लोक 6 (5.42.6)

यमं त्वेके मृत्युमतोऽन्यमाहु- । रात्मावासममृतं ब्रह्मचर्यम् । पितृलोके राज्यमनुशास्ति देवः । शिवः शिवानामशिवोऽशिवानाम् ॥

yamaṃ tveke mṛtyumato'nyamāhu- | rātmāvāsamamṛtaṃ brahmacaryam | pitṛloke rājyamanuśāsti devaḥ | śivaḥ śivānāmaśivo'śivānām

कुछ लोग इससे भिन्न यम को मृत्यु कहते हैं, और आत्मा में निवास करने वाले ब्रह्मचर्य को अमृत। वह देव पितृलोक में राज्य करता है; वह शुभ लोगों के लिए कल्याणकारी और अशुभ लोगों के लिए अकल्याणकारी है।

श्लोक 7 (5.42.7)

अस्यादेशान्निःसरते नराणां । क्रोधः प्रमादो लोभरूपश्च मृत्युः । अहं गतेनैव चरन्विमार्गा- । न्न चात्मनो योगमुपैति कश्चित् ॥

asyādeśānniḥsarate narāṇāṃ | krodhaḥ pramādo lobharūpaśca mṛtyuḥ | ahaṃ gatenaiva caranvimārgā- | nna cātmano yogamupaiti kaścit

उसी के आदेश से मनुष्यों में क्रोध, प्रमाद और लोभ के रूप में मृत्यु प्रकट होती है। अहंकार के वश में चलता और कुमार्गों में भटकता कोई भी आत्मा के योग को प्राप्त नहीं करता।

श्लोक 8 (5.42.8)

ते मोहितास्तद्वशे वर्तमाना । इतः प्रेतास्तत्र पुनः पतन्ति । ततस्तान्देवा अनुविप्लवन्ते । अतो मृत्युर्मरणादभ्युपैति ॥

te mohitāstadvaśe vartamānā | itaḥ pretāstatra punaḥ patanti | tatastāndevā anuviplavante | ato mṛtyurmaraṇādabhyupaiti

मोहग्रस्त होकर और उसी के वश में रहते हुए वे यहाँ से जाकर वहाँ बार-बार गिरते हैं। तब इंद्रियाँ उनके पीछे-पीछे बह चलती हैं, और इस प्रकार मृत्यु मरण के रूप में उन्हें आ घेरती है।

श्लोक 9 (5.42.9)

कर्मोदये कर्मफलानुरागा- । स्तत्रानु ते यान्ति न तरन्ति मृत्युम् । सदर्थयोगानवगमात्समन्ता- । त्प्रवर्तते भोगभोगेन देही ॥

karmodaye karmaphalānurāgā- | statrānu te yānti na taranti mṛtyum | sadarthayogānavagamātsamantā- | tpravartate bhogabhogena dehī

कर्मों का फल उदय होने पर कर्मफल में आसक्त लोग उसी के पीछे चलते हैं और मृत्यु को पार नहीं कर पाते। सत्य वस्तु से अपने योग को न समझ पाने के कारण देहधारी जीव चारों ओर एक भोग से दूसरे भोग में ही भटकता रहता है।

श्लोक 10 (5.42.10)

तद्वै महामोहनमिन्द्रियाणां । मिथ्यार्थयोगस्य गतिर्हि नित्या । मिथ्यार्थयोगाभिहतान्तरात्मा । स्मरन्नुपास्ते विषयान्समन्तात् ॥

tadvai mahāmohanamindriyāṇāṃ | mithyārthayogasya gatirhi nityā | mithyārthayogābhihatāntarātmā | smarannupāste viṣayānsamantāt

यही इंद्रियों का महामोह है, क्योंकि मिथ्या विषयों से जुड़ने की गति निरंतर बनी रहती है। मिथ्या विषयों के संग से जिसकी अंतरात्मा आहत हो चुकी है, वह विषयों का ही स्मरण करता हुआ चारों ओर उन्हीं की सेवा में लगा रहता है।

श्लोक 11 (5.42.11)

अभिध्या वै प्रथमं हन्ति लोकान् । कामक्रोधावनुगृह्याशु पश्चात् । एते बालान्मृत्यवे प्रापयन्ति । धीरास्तु धैर्येण तरन्ति मृत्युम् ॥

abhidhyā vai prathamaṃ hanti lokān | kāmakrodhāvanugṛhyāśu paścāt | ete bālānmṛtyave prāpayanti | dhīrāstu dhairyeṇa taranti mṛtyum

विषयों का चिंतन पहले लोगों को मारता है; उसके बाद काम और क्रोध शीघ्र ही उन्हें जकड़ लेते हैं। ये मूर्खों को मृत्यु तक पहुँचा देते हैं, परंतु धीर पुरुष धैर्य से मृत्यु को पार कर जाते हैं।

श्लोक 12 (5.42.12)

सोऽभिध्यायन्नुत्पतिष्णून्निहन्या- । दनादरेणाप्रतिबुध्यमानः । नैनं मृत्युर्मृत्युरिवात्ति भूत्वा । एवं विद्वान्यो विनिहन्ति कामान् ॥

so'bhidhyāyannutpatiṣṇūnnihanyā- | danādareṇāpratibudhyamānaḥ | nainaṃ mṛtyurmṛtyurivātti bhūtvā | evaṃ vidvānyo vinihanti kāmān

जो चिंतन के द्वारा उठती हुई कामनाओं को, उनकी उपेक्षा करते हुए और उन पर ध्यान न देते हुए, नष्ट कर देता है, उसे मृत्यु, स्वयं मृत्यु बनकर आने पर भी, नहीं खा पाती। ऐसा ही होता है वह ज्ञानी जो कामनाओं का नाश करता है।

श्लोक 13 (5.42.13)

कामानुसारी पुरुषः कामाननु विनश्यति । कामान्व्युदस्य धुनुते यत्किञ्चित्पुरुषो रजः ॥

kāmānusārī puruṣaḥ kāmānanu vinaśyati | kāmānvyudasya dhunute yatkiñcitpuruṣo rajaḥ

कामनाओं के पीछे दौड़ने वाला मनुष्य कामनाओं के साथ ही नष्ट हो जाता है। कामनाओं को त्यागकर मनुष्य अपने भीतर की सारी रज रूपी धूल झाड़ देता है।

श्लोक 14 (5.42.14)

तमोप्रकाशो भूतानां नरकोऽयं प्रदृश्यते । मुह्यन्त इव धावन्ति गच्छन्तः श्वभ्रमुन्मुखाः ॥

tamoprakāśo bhūtānāṃ narako'yaṃ pradṛśyate | muhyanta iva dhāvanti gacchantaḥ śvabhramunmukhāḥ

प्रकाशहीन यह अंधकार ही प्राणियों का नरक दिखाई देता है। मानो मोहित होकर वे दौड़ते हैं और उत्सुकता से गड्ढे की ओर बढ़ते चले जाते हैं।

श्लोक 15 (5.42.15)

अमूढवृत्तेः पुरुषस्येह कुर्या- । त्किं वै मृत्युस्तार्ण इवास्य व्याघ्रः । अमन्यमानः क्षत्रिय किञ्चिदन्य- । न्नाधीयते तार्ण इवास्य सर्पः ॥

amūḍhavṛtteḥ puruṣasyeha kuryā- | tkiṃ vai mṛtyustārṇa ivāsya vyāghraḥ | amanyamānaḥ kṣatriya kiñcidanya- | nnādhīyate tārṇa ivāsya sarpaḥ

जिसका आचरण मोह से रहित है, उस पुरुष का मृत्यु यहाँ क्या बिगाड़ सकती है? उसके लिए वह तिनकों से बने बाघ के समान है। हे क्षत्रिय, जो किसी और वस्तु को महत्व नहीं देता, उस पर उसका वैसे ही कोई असर नहीं होता जैसे तिनकों से बने साँप का।

श्लोक 16 (5.42.16)

क्रोधाल्लोभान्मोहभयान्तरात्मा । स वै मृत्युस्त्वच्छरीरे य एषः । एवं मृत्युं जायमानं विदित्वा । ज्ञाने तिष्ठन्न बिभेतीह मृत्योः । विनश्यते विषये तस्य मृत्यु- । र्मृत्योर्यथा विषयं प्राप्य मर्त्यः ॥

krodhāllobhānmohabhayāntarātmā | sa vai mṛtyustvaccharīre ya eṣaḥ | evaṃ mṛtyuṃ jāyamānaṃ viditvā | jñāne tiṣṭhanna bibhetīha mṛtyoḥ | vinaśyate viṣaye tasya mṛtyu- | rmṛtyoryathā viṣayaṃ prāpya martyaḥ

क्रोध और लोभ से उपजे मोह और भय से भरी जिसकी अंतरात्मा है, वही तुम्हारे शरीर में रहने वाली मृत्यु है। मृत्यु इस प्रकार उत्पन्न होती है, यह जानकर ज्ञान में स्थित पुरुष यहाँ मृत्यु से नहीं डरता। उसके क्षेत्र में पहुँचकर मृत्यु स्वयं वैसे ही नष्ट हो जाती है जैसे मृत्यु के क्षेत्र में पहुँचकर मनुष्य।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 17 (5.42.17)

यानेवाहुरिज्यया साधुलोकान् । द्विजातीनां पुण्यतमान्सनातनात् । तेषां परार्थं कथयन्तीह वेदा । एतद्विद्वान्नैति कथं नु कर्म ॥

yānevāhurijyayā sādhulokān | dvijātīnāṃ puṇyatamānsanātanāt | teṣāṃ parārthaṃ kathayantīha vedā | etadvidvānnaiti kathaṃ nu karma

द्विजों के लिए यज्ञ के द्वारा जिन पुण्यतम और सनातन शुभ लोकों की बात कही जाती है, वेद उन्हें यहाँ परम लक्ष्य बताते हैं। यह जानते हुए भी ज्ञानी पुरुष कर्म का आश्रय क्यों नहीं लेता?

सनत्सुजात उवाच

श्लोक 18 (5.42.18)

एवं ह्यविद्वानुपयाति तत्र । तत्रार्थजातं च वदन्ति वेदाः । सवेह आयाति परं परात्मा । प्रयाति मार्गेण निहत्य मार्गान् ॥

evaṃ hyavidvānupayāti tatra | tatrārthajātaṃ ca vadanti vedāḥ | saveha āyāti paraṃ parātmā | prayāti mārgeṇa nihatya mārgān

अज्ञानी ही इस प्रकार वहाँ जाता है, और उसी के लिए वेद वहाँ मिलने वाले अनेक प्रकार के फलों का वर्णन करते हैं। परंतु ज्ञानी यहीं परमात्मा के रूप में परम पद को प्राप्त होता है; वह अन्य सब मार्गों को त्यागकर सत्य मार्ग से जाता है।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 19 (5.42.19)

कोऽसौ नियुङ्क्ते तमजं पुराणं । स चेदिदं सर्वमनुक्रमेण । किं वास्य कार्यमथवा सुखं च । तन्मे विद्वन्ब्रूहि सर्वं यथावत् ॥

ko'sau niyuṅkte tamajaṃ purāṇaṃ | sa cedidaṃ sarvamanukrameṇa | kiṃ vāsya kāryamathavā sukhaṃ ca | tanme vidvanbrūhi sarvaṃ yathāvat

उस अजन्मा, पुरातन को कौन कर्म में लगाता है? और यदि वही क्रम से यह सब कुछ है, तो उसका क्या कार्य है, या क्या सुख? हे विद्वान्, यह सब मुझे ठीक-ठीक बताइए।

सनत्सुजात उवाच

श्लोक 20 (5.42.20)

दोषो महानत्र विभेदयोगे । ह्यनादियोगेन भवन्ति नित्याः । तथास्य नाधिक्यमपैति किञ्चि- । दनादियोगेन भवन्ति पुंसः ॥

doṣo mahānatra vibhedayoge | hyanādiyogena bhavanti nityāḥ | tathāsya nādhikyamapaiti kiñci- | danādiyogena bhavanti puṃsaḥ

उन्हें अलग मानने में बड़ा दोष है, क्योंकि अनादि संबंध के कारण जीव नित्य हैं। इस प्रकार उसकी महिमा में कुछ भी कमी नहीं आती; उसी अनादि संबंध से जीव अस्तित्व में आते हैं।

श्लोक 21 (5.42.21)

य एतद्वा भगवान्स नित्यो । विकारयोगेन करोति विश्वम् । तथाच तच्छक्तिरिति स्म मन्यते । तथार्थयोगेन भवन्ति वेदाः ॥

ya etadvā bhagavānsa nityo | vikārayogena karoti viśvam | tathāca tacchaktiriti sma manyate | tathārthayogena bhavanti vedāḥ

वही नित्य भगवान, जो यह सब है, विकार के संयोग से विश्व की रचना करता है। इसी कारण इसे उसकी शक्ति माना जाता है; और इसी प्रकार अर्थ के संयोग से वेद अस्तित्व में आते हैं।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 22 (5.42.22)

यस्माद्धर्मान्नाचरन्तीह केचि- । त्तथा धर्मान्केचिदिहाचरन्ति । धर्मः पापेन प्रतिहन्यते स्वि- । दुताहो धर्मः प्रतिहन्ति पापम् ॥

yasmāddharmānnācarantīha keci- | ttathā dharmānkecidihācaranti | dharmaḥ pāpena pratihanyate svi- | dutāho dharmaḥ pratihanti pāpam

क्योंकि यहाँ कुछ लोग धर्म का पालन नहीं करते और कुछ लोग करते हैं, तो बताइए, क्या धर्म पाप से नष्ट होता है, या धर्म पाप को नष्ट करता है?

सनत्सुजात उवाच

श्लोक 23 (5.42.23)

तस्मिन्स्थितौ वाप्युभयं हि नित्यं । ज्ञानेन विद्वान्प्रतिहन्ति सिद्धम् । तथान्यथा पुण्यमुपैति देही । तथागतं पापमुपैति सिद्धम् ॥

tasminsthitau vāpyubhayaṃ hi nityaṃ | jñānena vidvānpratihanti siddham | tathānyathā puṇyamupaiti dehī | tathāgataṃ pāpamupaiti siddham

उस स्थिति में दोनों सदा विद्यमान रहते हैं, और ज्ञानी पुरुष ज्ञान के द्वारा दोनों का नाश कर देता है; यह निश्चित है। अन्यथा देहधारी जीव पुण्य को प्राप्त करता है, और उसी प्रकार निश्चय ही पाप को भी।

श्लोक 24 (5.42.24)

गत्वोभयं कर्मणा युज्यते स्थिरं । शुभस्य पापस्य स चापि कर्मणा । धर्मेण पापं प्रणुदतीह विद्वान् । धर्मो बलीयानिति तत्र विद्धि ॥

gatvobhayaṃ karmaṇā yujyate sthiraṃ | śubhasya pāpasya sa cāpi karmaṇā | dharmeṇa pāpaṃ praṇudatīha vidvān | dharmo balīyāniti tatra viddhi

यहाँ से जाकर वह अपने कर्म के कारण शुभ और अशुभ दोनों के फल से दृढ़ता से बँधा रहता है। परंतु ज्ञानी पुरुष यहीं धर्म से पाप को दूर कर देता है; इसलिए जान लो कि धर्म अधिक बलवान है।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 25 (5.42.25)

यानिहाहुः स्वस्य धर्मस्य लोका- । न्द्विजातीनां पुण्यकृतां सनातनान् । तेषां क्रमान्कथय ततोऽपि चान्या- । न्नैतद्विद्वन्वेत्तुमिच्छामि कर्म ॥

yānihāhuḥ svasya dharmasya lokā- | ndvijātīnāṃ puṇyakṛtāṃ sanātanān | teṣāṃ kramānkathaya tato'pi cānyā- | nnaitadvidvanvettumicchāmi karma

हे विद्वान्, अपने धर्म का पालन करने वाले पुण्यात्मा द्विजों के जिन सनातन लोकों की यहाँ चर्चा होती है, उनका क्रम मुझे बताइए, और उनके अतिरिक्त अन्य लोकों का भी। मैं कर्मकांड के विषय में नहीं पूछ रहा।

सनत्सुजात उवाच

श्लोक 26 (5.42.26)

येषां व्रतेऽथ विस्पर्धा बले बलवतामिव । ते ब्राह्मणा इतः प्रेत्य स्वर्गे यान्ति प्रकाशताम् ॥

yeṣāṃ vrate'tha vispardhā bale balavatāmiva | te brāhmaṇā itaḥ pretya svarge yānti prakāśatām

जैसे बलवान बल में होड़ करते हैं, वैसे ही जो ब्राह्मण व्रतों में परस्पर होड़ करते हैं, वे यहाँ से जाकर स्वर्ग में प्रकाशमान होते हैं।

श्लोक 27 (5.42.27)

येषां धर्मे च विस्पर्धा तेषां तज्ज्ञानसाधनम् । ते ब्राह्मणा इतो मुक्ताः स्वर्गं यान्ति त्रिविष्टपम् ॥

yeṣāṃ dharme ca vispardhā teṣāṃ tajjñānasādhanam | te brāhmaṇā ito muktāḥ svargaṃ yānti triviṣṭapam

जो धर्म में परस्पर होड़ करते हैं, उनके लिए वही ज्ञान का साधन बन जाती है; ऐसे ब्राह्मण यहाँ से मुक्त होकर त्रिविष्टप नामक स्वर्ग को जाते हैं।

श्लोक 28 (5.42.28)

तस्य सम्यक्समाचारमाहुर्वेदविदो जनाः । नैनं मन्येत भूयिष्ठं बाह्यमाभ्यन्तरं जनम् ॥

tasya samyaksamācāramāhurvedavido janāḥ | nainaṃ manyeta bhūyiṣṭhaṃ bāhyamābhyantaraṃ janam

वेदों के ज्ञाता लोग उसके आचरण को उचित बताते हैं; फिर भी उसे बाहरी या निकट के लोगों को अधिक महत्व नहीं देना चाहिए।

श्लोक 29 (5.42.29)

यत्र मन्येत भूयिष्ठं प्रावृषीव तृणोदकम् । अन्नं पानं ब्राह्मणस्य तज्जीवन्नानुसंज्वरेत् ॥

yatra manyeta bhūyiṣṭhaṃ prāvṛṣīva tṛṇodakam | annaṃ pānaṃ brāhmaṇasya tajjīvannānusaṃjvaret

जहाँ ब्राह्मण को वर्षा ऋतु की घास और जल की तरह भरपूर अन्न और पान मिलता हो, वहाँ उसी पर जीवन चलाते हुए उसे चिंता नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 30 (5.42.30)

यत्राकथयमानस्य प्रयच्छत्यशिवं भयम् । अतिरिक्तमिवाकुर्वन्स श्रेयान्नेतरो जनः ॥

yatrākathayamānasya prayacchatyaśivaṃ bhayam | atiriktamivākurvansa śreyānnetaro janaḥ

जहाँ अपनी महिमा का बखान न करने वाले को अशुभ भय दिया जाता है, वहाँ जो बदले में कोई अति नहीं करता, वही श्रेष्ठ है, दूसरा नहीं।

श्लोक 31 (5.42.31)

यो वा कथयमानस्य ह्यात्मानं नानुसंज्वरेत् । ब्रह्मस्वं नोपभुञ्जीत तदन्नं संमतं सताम् । कुशवल्कलचेलाद्यं ब्रह्मस्वं योगिनो विदुः ॥

yo vā kathayamānasya hyātmānaṃ nānusaṃjvaret | brahmasvaṃ nopabhuñjīta tadannaṃ saṃmataṃ satām | kuśavalkalacelādyaṃ brahmasvaṃ yogino viduḥ

अथवा जो दूसरों के कुछ कहने पर अपने मन को संतप्त नहीं करता और ब्राह्मण के धन का उपभोग नहीं करता, उसका अन्न सज्जनों द्वारा मान्य है। योगीजन कुश, वल्कल-वस्त्र आदि को ही ब्राह्मण का धन मानते हैं।

श्लोक 32 (5.42.32)

यथा स्वं वान्तमश्नाति श्वा वै नित्यमभूतये । एवं ते वान्तमश्नन्ति स्ववीर्यस्योपसेवनात् ॥

yathā svaṃ vāntamaśnāti śvā vai nityamabhūtaye | evaṃ te vāntamaśnanti svavīryasyopasevanāt

जैसे कुत्ता अपने ही अहित के लिए सदा अपना वमन खाता है, वैसे ही वे लोग वमन खाते हैं जो अपनी ही शक्ति को भुनाकर जीते हैं।

श्लोक 33 (5.42.33)

नित्यमज्ञातचर्या मे इति मन्येत ब्राह्मणः । ज्ञातीनां तु वसन्मध्ये नैवं विन्देत किञ्चन ॥

nityamajñātacaryā me iti manyeta brāhmaṇaḥ | jñātīnāṃ tu vasanmadhye naivaṃ vindeta kiñcana

ब्राह्मण यह सोचे कि 'मेरा आचरण सदा दूसरों से अज्ञात रहे।' अपने संबंधियों के बीच रहते हुए भी उसे इस प्रकार उनसे कुछ भी पाने की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 34 (5.42.34)

कोह्येवमन्तरात्मानं ब्राह्मणो हन्तुमर्हति । निर्लिङ्गमचलं शुद्धं सर्वद्वन्द्वविवर्जितम् ॥

kohyevamantarātmānaṃ brāhmaṇo hantumarhati | nirliṅgamacalaṃ śuddhaṃ sarvadvandvavivarjitam

कौन ब्राह्मण इस प्रकार उस अंतरात्मा का हनन करना चाहेगा, जो चिह्नरहित, अचल, शुद्ध और सभी द्वंद्वों से मुक्त है?

श्लोक 35 (5.42.35)

योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । किं तेन न कृतं पापं चोरेणात्मापहारिणा ॥

yo'nyathā santamātmānamanyathā pratipadyate | kiṃ tena na kṛtaṃ pāpaṃ coreṇātmāpahāriṇā

जो आत्मा को, जो वास्तव में कुछ और है, कुछ और ही मान बैठता है, आत्मा का अपहरण करने वाले उस चोर ने कौन-सा पाप नहीं किया?

श्लोक 36 (5.42.36)

अश्रान्तः स्यादनादाता संमतो निरुपद्रवः । शिष्टो न शिष्टवत्स स्याद्ब्राह्मणो ब्रह्मवित्कविः ॥

aśrāntaḥ syādanādātā saṃmato nirupadravaḥ | śiṣṭo na śiṣṭavatsa syādbrāhmaṇo brahmavitkaviḥ

वह अथक हो, दान न लेने वाला हो, सज्जनों द्वारा सम्मानित हो और उपद्रव से रहित हो; शिष्ट होते हुए भी शिष्टता का दिखावा न करे। ऐसा ब्राह्मण ब्रह्मज्ञानी और क्रांतदर्शी होता है।

श्लोक 37 (5.42.37)

अनाढ्या मानुषे वित्ते आढ्या दैवे तथा क्रतौ । ते दुर्धर्षा दुष्प्रकम्प्यास्तान्विद्याद्ब्रह्मणस्तनुम् ॥

anāḍhyā mānuṣe vitte āḍhyā daive tathā kratau | te durdharṣā duṣprakampyāstānvidyādbrahmaṇastanum

जो मानवीय धन में दरिद्र, पर दैवी संपदा और यज्ञ में धनी हैं, वे अजेय और अडिग होते हैं; उन्हें ब्रह्म का ही शरीर जानना चाहिए।

श्लोक 38 (5.42.38)

सर्वान्स्विष्टकृतो देवान्विद्याद्य इह कश्चन । न स मानो ब्राह्मणस्य तस्मिन्प्रयतते स्वयम् ॥

sarvānsviṣṭakṛto devānvidyādya iha kaścana | na sa māno brāhmaṇasya tasminprayatate svayam

जो यहाँ यज्ञ को सफल बनाने वाले सभी देवताओं को जानता है, वह भी सच्चे ब्राह्मण की प्रतिष्ठा नहीं पाता, क्योंकि वह स्वयं उन्हीं के लिए प्रयत्न करता रहता है।

श्लोक 39 (5.42.39)

यमप्रयतमानं तु मानयन्ति समाहिताः । न मान्यमानो मन्येत नावमानेऽतिसंज्वरेत् ॥

yamaprayatamānaṃ tu mānayanti samāhitāḥ | na mānyamāno manyeta nāvamāne'tisaṃjvaret

जिसे बिना प्रयत्न किए ही संयमी पुरुष सम्मान देते हैं, उसे सम्मान पाकर अभिमान नहीं करना चाहिए और अपमान होने पर बहुत दुःखी नहीं होना चाहिए।

श्लोक 40 (5.42.40)

लोकः स्वभाववृत्तिर्हि निमेषोन्मेषवत्सदा । विद्वांसो मानयन्तीह इति मन्येत मानितः ॥

lokaḥ svabhāvavṛttirhi nimeṣonmeṣavatsadā | vidvāṃso mānayantīha iti manyeta mānitaḥ

संसार का स्वभाव ही ऐसा है, जो पलकों के झपकने और खुलने की तरह सदा चलता रहता है। सम्मान मिलने पर वह यह सोचे कि 'यहाँ ज्ञानी लोग ही सम्मान करते हैं।'

श्लोक 41 (5.42.41)

अधर्मनिपुणा मूढा लोके मायाविशारदाः । न मान्यं मानयिष्यन्ति एवं मन्येतामानितः ॥

adharmanipuṇā mūḍhā loke māyāviśāradāḥ | na mānyaṃ mānayiṣyanti evaṃ manyetāmānitaḥ

'अधर्म में निपुण और संसार में छल-कपट में कुशल मूढ़ लोग सम्माननीय का सम्मान नहीं करेंगे', सम्मान न मिलने पर उसे ऐसा सोचना चाहिए।

श्लोक 42 (5.42.42)

न वै मानं च मौनं च सहितौ वसतः सदा । अयं हि लोको मानस्य असौ मौनस्य तद्विदुः ॥

na vai mānaṃ ca maunaṃ ca sahitau vasataḥ sadā | ayaṃ hi loko mānasya asau maunasya tadviduḥ

मान और मौन कभी एक साथ नहीं रहते। यह लोक मान का है और परलोक मौन का; ज्ञानी ऐसा ही जानते हैं।

श्लोक 43 (5.42.43)

श्रीर्हि मानार्थसंवासा सा चापि परिपन्थिनी । ब्राह्मी सुदुर्लभा श्रीर्हि प्रज्ञाहीनेन क्षत्रिय ॥

śrīrhi mānārthasaṃvāsā sā cāpi paripanthinī | brāhmī sudurlabhā śrīrhi prajñāhīnena kṣatriya

लक्ष्मी मान और धन के साथ रहती है, फिर भी वह भी मार्ग में बाधक है। हे क्षत्रिय, प्रज्ञाहीन के लिए ब्रह्म-संबंधी लक्ष्मी अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 44 (5.42.44)

द्वाराणि तस्येह वदन्ति सन्तो । बहुप्रकाराणि दुराधराणि । सत्यार्जवे ह्रीर्दमशौचविद्या । षण्मानमोहप्रतिबन्धनानि ॥

dvārāṇi tasyeha vadanti santo | bahuprakārāṇi durādharāṇi | satyārjave hrīrdamaśaucavidyā | ṣaṇmānamohapratibandhanāni

सज्जन उस तक पहुँचने के अनेक द्वार बताते हैं, जिन्हें धारण किए रहना कठिन है: सत्य, सरलता, लज्जा, इंद्रिय-संयम, पवित्रता और विद्या। ये छह मान और मोह को रोकते हैं।

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