उद्योग पर्व · अध्याय 43
तप, उसके दोष और सच्चा ब्राह्मण
सनत्सुजातीय, अध्याय 3 / 6
धृतराष्ट्र सनत्सुजात से पूछते हैं कि सच्चा मौन क्या है और क्या वेद का ज्ञान पाप करने वाले को बचा सकता है। सनत्सुजात उत्तर देते हैं कि वेद छल करने वाले की रक्षा नहीं करते, और बताते हैं कि तप को क्या कलंकित करता है और क्या उसे शुद्ध बनाता है — बारह दोष, तेरह प्रकार की क्रूरता, ब्राह्मण के बारह व्रत, दम के विरोधी अठारह दोष, छह प्रकार का त्याग और प्रमाद के आठ दोष। अंत में वे सिखाते हैं कि सच्चा ब्राह्मण वेदों की गिनती से नहीं, सत्य में दृढ़ता से पहचाना जाता है, और परमात्मा भीतर, मौन में, प्राप्त होता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (5.43.1)
कस्यैष मौनः कतरन्नु मौनं । प्रब्रूहि विद्वन्निह मौनभावम् । मौनेन विद्वानुत याति मौनं । कथं मुने मौनमिहाचरन्ति ॥
kasyaiṣa maunaḥ katarannu maunaṃ | prabrūhi vidvanniha maunabhāvam | maunena vidvānuta yāti maunaṃ | kathaṃ mune maunamihācaranti
यह मौन किसका है, और सच्चा मौन कौन-सा है? हे विद्वान्, मुझे यहाँ समझाइए कि मौन वास्तव में क्या है। क्या ज्ञानी केवल चुप रहकर मौन को प्राप्त हो जाता है? हे मुनि, इस संसार में लोग मौन का आचरण कैसे करते हैं?
सनत्सुजात उवाच
श्लोक 2 (5.43.2)
यतो न वेदा मनसा सहैन- । मनुप्रविशन्ति ततोऽथ मौनम् । यत्रोत्थितो वेदशब्दस्तथायं । स तन्मयत्वेन विभाति राजन् ॥
yato na vedā manasā sahaina- | manupraviśanti tato'tha maunam | yatrotthito vedaśabdastathāyaṃ | sa tanmayatvena vibhāti rājan
जिसमें वेद मन के साथ भी प्रवेश नहीं कर पाते, वही मौन है। उसी से वेद का शब्द उत्पन्न हुआ और यह जगत् भी; हे राजन्, वही उनमें तन्मय होकर प्रकाशित होता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 3 (5.43.3)
ऋचो यजूंषि यो वेद सामवेदं च वेद यः । पापानि कुर्वन्पापेन लिप्यते किं न लिप्यते ॥
ṛco yajūṃṣi yo veda sāmavedaṃ ca veda yaḥ | pāpāni kurvanpāpena lipyate kiṃ na lipyate
जो ऋग्वेद और यजुर्वेद को जानता है, और सामवेद को भी जानता है, वह यदि पाप करे तो क्या पाप से लिप्त होता है या नहीं?
सनत्सुजात उवाच
श्लोक 4 (5.43.4)
नैनं सामान्यृचो वापि न यजूंष्यविचक्षणम् । त्रायन्ते कर्मणः पापान्न ते मिथ्या ब्रवीम्यहम् ॥
nainaṃ sāmānyṛco vāpi na yajūṃṣyavicakṣaṇam | trāyante karmaṇaḥ pāpānna te mithyā bravīmyaham
विवेकहीन मनुष्य को न साम, न ऋचाएँ और न यजुष् उसके पाप-कर्मों से बचाते हैं। मैं तुमसे झूठ नहीं कह रहा।
श्लोक 5 (5.43.5)
न च्छन्दांसि वृजिनात्तारयन्ति । मायाविनं मायया सर्वमानम् । नीडं शकुन्ता इव जातपक्षा- । श्छन्दांस्येनं प्रजहत्यन्तकाले ॥
na cchandāṃsi vṛjināttārayanti | māyāvinaṃ māyayā sarvamānam | nīḍaṃ śakuntā iva jātapakṣā- | śchandāṃsyenaṃ prajahatyantakāle
जो मायावी हर काम छल से करता है, उसे वैदिक छन्द पाप से पार नहीं लगाते। जैसे पंख निकल आने पर पक्षी घोंसला छोड़ देते हैं, वैसे ही मृत्यु के समय छन्द उसे छोड़ देते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 6 (5.43.6)
न चेद्वेदा वेदविदं त्रातुं शक्ता विचक्षण । अथ कस्मात्प्रलापोऽयं ब्राह्मणानां सनातनः ॥
na cedvedā vedavidaṃ trātuṃ śaktā vicakṣaṇa | atha kasmātpralāpo'yaṃ brāhmaṇānāṃ sanātanaḥ
हे विद्वान्, यदि वेद वेदज्ञ की भी रक्षा नहीं कर सकते, तो ब्राह्मणों का यह सनातन वेद-पाठ किसलिए चलता आया है?
सनत्सुजात उवाच
श्लोक 7 (5.43.7)
तस्यैव नामादिविशेषरूपै- । रिदं जगद्भाति महानुभाव । निर्दिश्य सम्यक्प्रवदन्ति वेदा- । स्तद्विश्ववैरूप्यमुदाहरन्ति ॥
tasyaiva nāmādiviśeṣarūpai- | ridaṃ jagadbhāti mahānubhāva | nirdiśya samyakpravadanti vedā- | stadviśvavairūpyamudāharanti
हे महानुभाव, उसी एक के नाम आदि विशेष रूपों से यह जगत् प्रकाशित होता है। वेद उसी का भली-भाँति निर्देश करके वर्णन करते हैं और विश्व की इस विविधता को उसी का रूप बताते हैं।
श्लोक 8 (5.43.8)
तदर्थयुक्तं तप एतदिज्या । ताभ्यामसौ पुण्यमुपैति विद्वान् । पुण्येन पापं विनिहत्य पश्चा- । त्संजायते ज्ञानविदीपितात्मा ॥
tadarthayuktaṃ tapa etadijyā | tābhyāmasau puṇyamupaiti vidvān | puṇyena pāpaṃ vinihatya paścā- | tsaṃjāyate jñānavidīpitātmā
उसी उद्देश्य से युक्त तप और यज्ञ — इन दोनों से विद्वान् पुण्य प्राप्त करता है। पुण्य से पाप का नाश करके वह फिर ज्ञान से प्रकाशित आत्मा वाला होकर जन्म लेता है।
श्लोक 9 (5.43.9)
ज्ञानेन चात्मानमुपैति विद्वा- । नथान्यथा वर्गफलानुकाङ्क्षी । अस्मिन्कृतं तत्परिगृह्य सर्व- । ममुत्र भुङ्क्ते पुनरेति मार्गम् ॥
jñānena cātmānamupaiti vidvā- | nathānyathā vargaphalānukāṅkṣī | asminkṛtaṃ tatparigṛhya sarva- | mamutra bhuṅkte punareti mārgam
विद्वान् ज्ञान के द्वारा आत्मा को प्राप्त करता है। अन्यथा, जो सांसारिक पुरुषार्थों के फल चाहता है, वह यहाँ किए गए सब कर्मों को साथ ले जाकर परलोक में उनका भोग करता है और फिर उसी मार्ग पर लौट आता है।
श्लोक 10 (5.43.10)
अस्मिँल्लोके तपस्तप्तं फलमन्यत्र भुज्यते । ब्राह्मणानामिमे लोका वृद्धे तपसि संयताः ॥
asmim̐lloke tapastaptaṃ phalamanyatra bhujyate | brāhmaṇānāmime lokā vṛddhe tapasi saṃyatāḥ
इस लोक में किए गए तप का फल अन्यत्र भोगा जाता है। ये लोक उन ब्राह्मणों के हैं जो समृद्ध तप में संयमित रहते हैं।
श्लोक 11 (5.43.11)
ब्राह्मणानां तपः स्वृद्धमन्येषां तावदेव तत् । एतत्समृद्धमत्यृद्धं तपो भवति केवलम् ॥
brāhmaṇānāṃ tapaḥ svṛddhamanyeṣāṃ tāvadeva tat | etatsamṛddhamatyṛddhaṃ tapo bhavati kevalam
ब्राह्मणों का तप भली-भाँति समृद्ध होता है; दूसरों का उतना ही रह जाता है। यही तप समृद्ध, अत्यन्त समृद्ध और केवल (शुद्ध) होता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 12 (5.43.12)
कथं समृद्धमप्यृद्धं तपो भवति केवलम् । सनत्सुजात तद्ब्रूहि यथा विद्याम तद्वयम् ॥
kathaṃ samṛddhamapyṛddhaṃ tapo bhavati kevalam | sanatsujāta tadbrūhi yathā vidyāma tadvayam
तप समृद्ध, ऋद्ध और केवल (शुद्ध) कैसे होता है? हे सनत्सुजात, यह बताइए, जिससे हम इसे समझ सकें।
सनत्सुजात उवाच
श्लोक 13 (5.43.13)
निष्कल्मषं तपस्त्वेतत्केवलं परिचक्षते । एतत्समृद्धमप्यृद्धं तपो भवति केवलम् ॥
niṣkalmaṣaṃ tapastvetatkevalaṃ paricakṣate | etatsamṛddhamapyṛddhaṃ tapo bhavati kevalam
निष्कलंक तप को ही केवल (शुद्ध) तप कहा जाता है। यही तप समृद्ध, ऋद्ध और केवल होता है।
श्लोक 14 (5.43.14)
तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां पृच्छसि क्षत्रिय । तपसा वेदविद्वांसः परं त्वमृतमाप्नुयुः ॥
tapomūlamidaṃ sarvaṃ yanmāṃ pṛcchasi kṣatriya | tapasā vedavidvāṃsaḥ paraṃ tvamṛtamāpnuyuḥ
हे क्षत्रिय, तुम जो कुछ मुझसे पूछ रहे हो, उस सबका मूल तप है। तप के द्वारा ही वेदज्ञ परम अमृतत्व को प्राप्त करते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 15 (5.43.15)
कल्मषं तपसो ब्रूहि श्रुतं निष्कल्मषं तपः । सनत्सुजात येनेदं विद्यां गुह्यं सनातनम् ॥
kalmaṣaṃ tapaso brūhi śrutaṃ niṣkalmaṣaṃ tapaḥ | sanatsujāta yenedaṃ vidyāṃ guhyaṃ sanātanam
मुझे बताइए कि तप को क्या कलंकित करता है; निष्कलंक तप के विषय में मैंने सुना है। हे सनत्सुजात, बताइए, जिससे मैं इस सनातन रहस्य को जान सकूँ।
सनत्सुजात उवाच
श्लोक 16 (5.43.16)
क्रोधादयो द्वादश यस्य दोषा- । स्तथा नृशंसानि दश त्रि राजन् । धर्मादयो द्वादशैते पितॄणां । शास्त्रे गुणा ये विदिता द्विजानाम् ॥
krodhādayo dvādaśa yasya doṣā- | stathā nṛśaṃsāni daśa tri rājan | dharmādayo dvādaśaite pitṝṇāṃ | śāstre guṇā ye viditā dvijānām
क्रोध आदि बारह तप के दोष हैं, और हे राजन्, इसी प्रकार क्रूरता के तेरह प्रकार हैं। धर्म आदि बारह उसके गुण हैं, जिन्हें द्विज पितरों के शास्त्र से जानते हैं।
श्लोक 17 (5.43.17)
क्रोधः कामो लोभमोहौ विधित्सा- । ऽकृपाऽसूये मानशोकौ स्पृहा च । ईर्ष्या जुगुप्सा च मनुष्यदोषा । वर्ज्याः सदा द्वादशैते नराणाम् ॥
krodhaḥ kāmo lobhamohau vidhitsā- | 'kṛpā'sūye mānaśokau spṛhā ca | īrṣyā jugupsā ca manuṣyadoṣā | varjyāḥ sadā dvādaśaite narāṇām
क्रोध, काम, लोभ, मोह, भोग की लालसा, निर्दयता, असूया, मान, शोक, स्पृहा, ईर्ष्या और घृणा — मनुष्यों के ये बारह दोष सदा त्यागने योग्य हैं।
श्लोक 18 (5.43.18)
एकैकमेते राजेन्द्र मनुष्यान्पर्युपासते । लिप्समानोन्तरं तेषां मृगाणामिव लुब्धकः ॥
ekaikamete rājendra manuṣyānparyupāsate | lipsamānontaraṃ teṣāṃ mṛgāṇāmiva lubdhakaḥ
हे राजेन्द्र, इनमें से प्रत्येक दोष मनुष्यों की घात में रहता है और उनमें अवसर ढूँढता है, जैसे शिकारी हिरणों की घात में रहता है।
श्लोक 19 (5.43.19)
विकत्थनः स्पृहयालुर्मनस्वी । बिभ्रत्कोषं चपलो रोषणश्च । एतान्पापाः षण्णराः पापधर्मान् । प्रकुर्वते नो त्रसन्तः सुदुर्गे ॥
vikatthanaḥ spṛhayālurmanasvī | bibhratkoṣaṃ capalo roṣaṇaśca | etānpāpāḥ ṣaṇṇarāḥ pāpadharmān | prakurvate no trasantaḥ sudurge
डींग मारने वाला, लालची, अहंकारी, धन-संचय से चिपका रहने वाला, चंचल और क्रोधी — ये छह पापी मनुष्य घोर संकट में भी बिना डरे पापकर्म करते हैं।
श्लोक 20 (5.43.20)
संभोगसंविद्विषमोऽतिमानी । दत्तानुतापी कृपणो बलीयान् । वर्गप्रशंसी वनितासु द्वेष्टा । एते परे सप्त नृशंसवर्गाः ॥
saṃbhogasaṃvidviṣamo'timānī | dattānutāpī kṛpaṇo balīyān | vargapraśaṃsī vanitāsu dveṣṭā | ete pare sapta nṛśaṃsavargāḥ
भोग और संगति में पक्षपात करने वाला, अत्यन्त अभिमानी, दान देकर पछताने वाला, कृपण, अपने बल का दम्भ करने वाला, केवल अपने वर्ग की प्रशंसा करने वाला और स्त्रियों से द्वेष करने वाला — ये क्रूर प्रकार के दूसरे सात लोग हैं।
श्लोक 21 (5.43.21)
धर्मश्च सत्यं च दमस्तपश्च । आमात्सर्यं ह्रीस्तितिक्षानसूया । यज्ञश्च दानं च धृतिः श्रुतं च । व्रतानि वै द्वादश ब्राह्मणस्य ॥
dharmaśca satyaṃ ca damastapaśca | āmātsaryaṃ hrīstitikṣānasūyā | yajñaśca dānaṃ ca dhṛtiḥ śrutaṃ ca | vratāni vai dvādaśa brāhmaṇasya
धर्म, सत्य, दम, तप, मत्सर का अभाव, लज्जा, सहनशीलता, असूया का अभाव, यज्ञ, दान, धैर्य और शास्त्र-ज्ञान — ये बारह ब्राह्मण के व्रत हैं।
श्लोक 22 (5.43.22)
यस्त्वेतेभ्यः प्रभवेद्द्वादशभ्यः । सर्वामपीमां पृथिवीं स शिष्यात् । त्रिभिर्द्वाभ्यामेकतो वार्थितो य- । स्तस्य स्वमस्तीति स वेदितव्यः ॥
yastvetebhyaḥ prabhaveddvādaśabhyaḥ | sarvāmapīmāṃ pṛthivīṃ sa śiṣyāt | tribhirdvābhyāmekato vārthito ya- | stasya svamastīti sa veditavyaḥ
जिसने इन बारहों पर अधिकार कर लिया है, वह इस सम्पूर्ण पृथ्वी पर भी शासन कर सकता है। और जो इनमें से तीन, दो या एक से भी युक्त हो, उसे भी ऐसा जानना चाहिए कि उसके पास सचमुच अपना कुछ है।
श्लोक 23 (5.43.23)
दमस्त्यागोऽप्रमादश्च एतेष्वमृतमाहितम् । तानि सत्यमुखान्याहुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ॥
damastyāgo'pramādaśca eteṣvamṛtamāhitam | tāni satyamukhānyāhurbrāhmaṇā ye manīṣiṇaḥ
दम, त्याग और अप्रमाद — इन्हीं में अमृत निहित है। मनीषी ब्राह्मण कहते हैं कि इन तीनों में सत्य ही प्रधान है।
श्लोक 24 (5.43.24)
दमोऽष्टादशदोषः स्यात्प्रातिकूल्यं कृते भवेत् । अनृतं चाभ्यसूया च कामार्थौ च तथा स्पृहा ॥
damo'ṣṭādaśadoṣaḥ syātprātikūlyaṃ kṛte bhavet | anṛtaṃ cābhyasūyā ca kāmārthau ca tathā spṛhā
दम के अठारह दोष हैं — कर्म में प्रतिकूलता, असत्य, दोष-दृष्टि, काम, अर्थ का लोभ और स्पृहा;
श्लोक 25 (5.43.25)
क्रोधः शोकस्तथा तृष्णा लोभः पैशून्यमेव च । मत्सरश्च विहिंसा च परितापस्तथाऽरतिः ॥
krodhaḥ śokastathā tṛṣṇā lobhaḥ paiśūnyameva ca | matsaraśca vihiṃsā ca paritāpastathā'ratiḥ
क्रोध, शोक, तृष्णा, लोभ, चुगली, मत्सर, हिंसा, संताप और असंतोष;
श्लोक 26 (5.43.26)
अपस्मारश्चातिवादस्तथा संभावनात्मनि । एतैर्विमुक्तो दोषैर्यः स दान्तः सद्भिरुच्यते ॥
apasmāraścātivādastathā saṃbhāvanātmani | etairvimukto doṣairyaḥ sa dāntaḥ sadbhirucyate
विस्मृति, बढ़-चढ़कर बोलना और अपने विषय में अहंकार। जो इन दोषों से मुक्त है, उसे सज्जन दान्त (संयमी) कहते हैं।
श्लोक 27 (5.43.27)
मदोऽष्टादशदोषः स्यात्त्यागो भवति षड्विधः । विपर्ययाः स्मृता एते मददोषा उदाहृताः । दोषा दमस्य ये प्रोक्तास्तान्दोषान्परिवर्जयेत् ॥
mado'ṣṭādaśadoṣaḥ syāttyāgo bhavati ṣaḍvidhaḥ | viparyayāḥ smṛtā ete madadoṣā udāhṛtāḥ | doṣā damasya ye proktāstāndoṣānparivarjayet
मद के अठारह दोष हैं और त्याग छह प्रकार का है। मद के दोष गुणों के विपरीत बताए गए हैं। दम के जो दोष कहे गए हैं, उन दोषों का त्याग करना चाहिए।
श्लोक 28 (5.43.28)
श्रेयांस्तु षड्विधस्त्यागस्तृतीयो दुष्करो भवेत् । तेन दुःखं तरत्येव भिन्नं तस्मिञ्जितं कृते ॥
śreyāṃstu ṣaḍvidhastyāgastṛtīyo duṣkaro bhavet | tena duḥkhaṃ taratyeva bhinnaṃ tasmiñjitaṃ kṛte
छह प्रकार का त्याग श्रेष्ठ है, और उसका तीसरा प्रकार कठिन है। उससे मनुष्य निश्चय ही दुःख से पार हो जाता है; उसके सिद्ध होने पर सब बन्धन टूट जाते हैं और सब कुछ जीत लिया जाता है।
श्लोक 29 (5.43.29)
श्रेयांस्तु षड्विधस्त्यागः श्रियं प्राप्य न हृष्यति । इष्टापूर्ते द्वितीयं स्यान्नित्यवैराग्ययोगतः ॥
śreyāṃstu ṣaḍvidhastyāgaḥ śriyaṃ prāpya na hṛṣyati | iṣṭāpūrte dvitīyaṃ syānnityavairāgyayogataḥ
इस श्रेष्ठ छह प्रकार के त्याग में पहला यह है कि मनुष्य सम्पत्ति पाकर हर्षित न हो। दूसरा है निरन्तर वैराग्य के द्वारा यज्ञ और लोकहित के कार्यों का त्याग।
श्लोक 30 (5.43.30)
कामत्यागश्च राजेन्द्र स तृतीय इति स्मृतः । अप्यवाच्यं वदन्त्येतं स तृतीयो गुणः स्मृतः ॥
kāmatyāgaśca rājendra sa tṛtīya iti smṛtaḥ | apyavācyaṃ vadantyetaṃ sa tṛtīyo guṇaḥ smṛtaḥ
हे राजेन्द्र, कामना का त्याग तीसरा कहा गया है। उसे वाणी से परे बताया जाता है; यही तीसरा गुण माना गया है।
श्लोक 31 (5.43.31)
त्यक्तैर्द्रव्यैर्यद्भवति नोपयुक्तैश्च कामतः । न च द्रव्यैस्तद्भवति नोपयुक्तैश्च कामतः ॥
tyaktairdravyairyadbhavati nopayuktaiśca kāmataḥ | na ca dravyaistadbhavati nopayuktaiśca kāmataḥ
जो त्याग वस्तुओं को छोड़ने और उन्हें कामना से न भोगने से होता है, वह वस्तुओं को रखने से या इच्छानुसार उनका भोग करने से नहीं होता।
श्लोक 32 (5.43.32)
न च कर्मस्वसिद्धेषु दुःखं ते न च न ग्लपेत् । सर्वैरेव गुणैर्युक्तो द्रव्यवानपि यो भवेत् ॥
na ca karmasvasiddheṣu duḥkhaṃ te na ca na glapet | sarvaireva guṇairyukto dravyavānapi yo bhavet
ऐसा मनुष्य कर्मों के सफल न होने पर दुःखी नहीं होता और न ही खिन्न होता है, भले ही वह धनवान् हो और सब गुणों से युक्त हो।
श्लोक 33 (5.43.33)
अप्रिये च समुत्पन्ने व्यथां जातु न गच्छति । इष्टान्पुत्रांश्च दारांश्च न याचेत कदाचन ॥
apriye ca samutpanne vyathāṃ jātu na gacchati | iṣṭānputrāṃśca dārāṃśca na yāceta kadācana
अप्रिय घटना होने पर भी वह कभी व्यथित नहीं होता। उसे प्रिय पुत्रों या पत्नी की याचना कभी नहीं करनी चाहिए।
श्लोक 34 (5.43.34)
अर्हते याचमानाय प्रदेयं तच्छुभं भवेत् । अप्रमादी भवेदेतैः स चाप्यष्टगुणो भवेत् ॥
arhate yācamānāya pradeyaṃ tacchubhaṃ bhavet | apramādī bhavedetaiḥ sa cāpyaṣṭaguṇo bhavet
योग्य याचक को देना चाहिए; वही शुभ है। इनसे मनुष्य अप्रमादी होता है, और अप्रमाद के भी आठ गुण होते हैं —
श्लोक 35 (5.43.35)
सत्यं ध्यानं समाधानं चोद्यं वैराग्यमेव च । अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च तथाऽसंग्रहमेव च ॥
satyaṃ dhyānaṃ samādhānaṃ codyaṃ vairāgyameva ca | asteyaṃ brahmacaryaṃ ca tathā'saṃgrahameva ca
सत्य, ध्यान, एकाग्रता, जिज्ञासा, वैराग्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।
श्लोक 36 (5.43.36)
एवं दोषा मदस्योक्तास्तान्दोषान्परिवर्जयेत् । तथा त्यागोऽप्रमादश्च स चाप्यष्टगुणो मतः ॥
evaṃ doṣā madasyoktāstāndoṣānparivarjayet | tathā tyāgo'pramādaśca sa cāpyaṣṭaguṇo mataḥ
इस प्रकार मद के दोष बताए गए; उनका त्याग करना चाहिए। इसी प्रकार त्याग और अप्रमाद भी बताए गए, और अप्रमाद आठ गुणों वाला माना गया है।
श्लोक 37 (5.43.37)
अष्टौ दोषाः प्रमादस्य तान्दोषान्परिवर्जयेत् । इन्द्रियेभ्यश्च पञ्चभ्यो मनसश्चैव भारत । अतीतानागतेभ्यश्च मुक्त्युपेतः सुखी भवेत् ॥
aṣṭau doṣāḥ pramādasya tāndoṣānparivarjayet | indriyebhyaśca pañcabhyo manasaścaiva bhārata | atītānāgatebhyaśca muktyupetaḥ sukhī bhavet
प्रमाद के आठ दोष हैं; उनका त्याग करना चाहिए। हे भारत, वे पाँच इन्द्रियों और मन से, तथा भूत और भविष्य से उत्पन्न होते हैं। इनसे मुक्त मनुष्य सुखी होता है।
श्लोक 38 (5.43.38)
सत्यात्मा भव राजेन्द्र सत्ये लोकाः प्रतिष्ठिताः । तांस्तु सत्यमुखानाहुः सत्ये ह्यमृतमाहितम् ॥
satyātmā bhava rājendra satye lokāḥ pratiṣṭhitāḥ | tāṃstu satyamukhānāhuḥ satye hyamṛtamāhitam
हे राजेन्द्र, सत्यनिष्ठ बनो; सत्य पर ही लोक टिके हैं। दम आदि गुणों में सत्य को ही प्रधान कहा गया है, और सत्य में ही अमृत निहित है।
श्लोक 39 (5.43.39)
निवृत्तेनैव दोषेण तपो व्रतमिहाचरेत् । एतद्धातृकृतं वृत्तं सत्यमेव सतां व्रतम् ॥
nivṛttenaiva doṣeṇa tapo vratamihācaret | etaddhātṛkṛtaṃ vṛttaṃ satyameva satāṃ vratam
दोषों से निवृत्त होकर ही यहाँ तप और व्रत का आचरण करना चाहिए। यह विधाता का बनाया हुआ आचरण है; सत्य ही सज्जनों का व्रत है।
श्लोक 40 (5.43.40)
दोषैरेतैर्वियुक्तस्तु गुणैरेतैः समन्वितः । एतत्समृद्धमत्यर्थं तपो भवति केवलम् ॥
doṣairetairviyuktastu guṇairetaiḥ samanvitaḥ | etatsamṛddhamatyarthaṃ tapo bhavati kevalam
इन दोषों से रहित और इन गुणों से युक्त तप अत्यन्त समृद्ध और केवल (शुद्ध) होता है।
श्लोक 41 (5.43.41)
यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र संक्षेपात्प्रब्रवीमि ते । एतत्पापहरं पुण्यं जन्ममृत्युजरापहम् ॥
yanmāṃ pṛcchasi rājendra saṃkṣepātprabravīmi te | etatpāpaharaṃ puṇyaṃ janmamṛtyujarāpaham
हे राजेन्द्र, तुमने जो पूछा, वह मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ। यह उपदेश पवित्र है, पाप को हरता है और जन्म, मृत्यु तथा जरा से मुक्त करता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 42 (5.43.42)
आख्यानपञ्चमैर्वेदैर्भूयिष्ठं कथ्यते जनः । तथा चान्ये चतुर्वेदास्त्रिवेदाश्च तथा परे ॥
ākhyānapañcamairvedairbhūyiṣṭhaṃ kathyate janaḥ | tathā cānye caturvedāstrivedāśca tathā pare
अधिकांश लोग आख्यानों को पाँचवाँ वेद मानकर (पाँच) वेदों के ज्ञाता कहे जाते हैं; कुछ दूसरे चार वेदों के, और कुछ तीन वेदों के ज्ञाता कहलाते हैं।
श्लोक 43 (5.43.43)
द्विवेदाश्चैकवेदाश्चाप्यनृचश्च तथा परे । तेषां तु कतरः स स्याद्यमहं वेद वै द्विजम् ॥
dvivedāścaikavedāścāpyanṛcaśca tathā pare | teṣāṃ tu kataraḥ sa syādyamahaṃ veda vai dvijam
कुछ दो वेदों के, कुछ एक वेद के ज्ञाता हैं, और कुछ ऋग्वेद की एक ऋचा भी नहीं जानते। इनमें से वह कौन है जिसे मैं सच्चा ब्राह्मण जानूँ?
सनत्सुजात उवाच
श्लोक 44 (5.43.44)
एकस्य वेदस्याज्ञानाद्वेदास्ते बहवः कृताः । सत्यस्यैकस्य राजेन्द्र सत्ये कश्चिदवस्थितः ॥
ekasya vedasyājñānādvedāste bahavaḥ kṛtāḥ | satyasyaikasya rājendra satye kaścidavasthitaḥ
एक वेद के अज्ञान से ही वेद अनेक बन गए। हे राजेन्द्र, उस एक सत्य में कोई विरला ही स्थित होता है।
श्लोक 45 (5.43.45)
एवं वेदमविज्ञाय प्राज्ञोऽहमिति मन्यते । दानमध्ययनं यज्ञो लोभादेतत्प्रवर्तते ॥
evaṃ vedamavijñāya prājño'hamiti manyate | dānamadhyayanaṃ yajño lobhādetatpravartate
इस प्रकार वेद को जाने बिना ही मनुष्य मान बैठता है कि 'मैं ज्ञानी हूँ'। तब दान, अध्ययन और यज्ञ लोभ से किए जाने लगते हैं।
श्लोक 46 (5.43.46)
सत्यात्प्रच्यवमानानां सङ्कल्पो वितथो भवेत् । ततो यज्ञः प्रतायेत सत्यस्यानवधारणात् ॥
satyātpracyavamānānāṃ saṅkalpo vitatho bhavet | tato yajñaḥ pratāyeta satyasyānavadhāraṇāt
जो सत्य से च्युत हो जाते हैं, उनका संकल्प मिथ्या हो जाता है। तब सत्य का निश्चय न होने के कारण यज्ञ का विस्तार किया जाता है।
श्लोक 47 (5.43.47)
मनसान्यस्य भवति वाचान्यस्याथ कर्मणा । सङ्कल्पसिद्धः पुरुषः सङ्कल्पानधितिष्ठति ॥
manasānyasya bhavati vācānyasyātha karmaṇā | saṅkalpasiddhaḥ puruṣaḥ saṅkalpānadhitiṣṭhati
किसी का यज्ञ मन से होता है, किसी का वाणी से और किसी का कर्म से। जिसका संकल्प सिद्ध हो चुका है, वह पुरुष अपने संकल्पों का स्वामी होता है।
श्लोक 48 (5.43.48)
अनैभृत्येन चैतस्य दीक्षितव्रतमाचरेत् । नामैतद्धातुनिर्वृत्तं सत्यमेव सतां परम् ॥
anaibhṛtyena caitasya dīkṣitavratamācaret | nāmaitaddhātunirvṛttaṃ satyameva satāṃ param
उस संकल्प की अस्थिरता के कारण मनुष्य को दीक्षित व्यक्ति के व्रत का पालन करना चाहिए। 'सत्य' नाम 'होने' के अर्थ वाली धातु से बना है; सज्जनों के लिए सत्य ही परम है।
श्लोक 49 (5.43.49)
ज्ञानं वै नाम प्रत्यक्षं परोक्षं जायते तपः । विद्याद्बहु पठन्तं तु द्विजं वै बहुपाठिनम् ॥
jñānaṃ vai nāma pratyakṣaṃ parokṣaṃ jāyate tapaḥ | vidyādbahu paṭhantaṃ tu dvijaṃ vai bahupāṭhinam
ज्ञान प्रत्यक्ष होता है, जबकि तप का फल परोक्ष में उत्पन्न होता है। जो द्विज केवल बहुत पढ़ता है, उसे बहुपाठी ही समझना चाहिए।
श्लोक 50 (5.43.50)
तस्मात्क्षत्रिय मा मंस्था जल्पितेनैव वै द्विजम् । य एव सत्यान्नापैति स ज्ञेयो ब्राह्मणस्त्वया ॥
tasmātkṣatriya mā maṃsthā jalpitenaiva vai dvijam | ya eva satyānnāpaiti sa jñeyo brāhmaṇastvayā
इसलिए, हे क्षत्रिय, केवल बातों से किसी द्विज को ब्राह्मण मत मान लेना। जो सत्य से कभी विचलित नहीं होता, उसी को तुम ब्राह्मण जानो।
श्लोक 51 (5.43.51)
छन्दांसि नाम क्षत्रिय तान्यथर्वा । पुरा जगौ महर्षिसङ्घ एषः । छन्दोविदस्ते य उत नाधीतवेदा । न वेदवेद्यस्य विदुर्हि तत्त्वम् ॥
chandāṃsi nāma kṣatriya tānyatharvā | purā jagau maharṣisaṅgha eṣaḥ | chandovidaste ya uta nādhītavedā | na vedavedyasya vidurhi tattvam
हे क्षत्रिय, छन्दों को प्राचीन काल में अथर्वा ने और इस महर्षि-समुदाय ने गाया था। जो छन्दों को तो जानते हैं पर जिन्होंने वेदों का अध्ययन नहीं किया, वे वेदों से जानने योग्य तत्त्व को नहीं जानते।
श्लोक 52 (5.43.52)
छन्दांसि नाम द्विपदां वरिष्ठ । स्वच्छन्दयोगेन भवन्ति तत्र । छन्दोविदस्ते न च तानधीत्य । गता न वेदस्य न वेद्यमार्याः ॥
chandāṃsi nāma dvipadāṃ variṣṭha | svacchandayogena bhavanti tatra | chandovidaste na ca tānadhītya | gatā na vedasya na vedyamāryāḥ
हे मनुष्यों में श्रेष्ठ, छन्द वहाँ स्वच्छन्द योग से उत्पन्न होते हैं। छन्दों के ज्ञाता, आर्य कहलाते हुए भी, केवल उनके अध्ययन से न वेद तक पहुँचे हैं, न वेद्य तत्त्व तक।
श्लोक 53 (5.43.53)
न वेदानां वेदिता कश्चिदस्ति । कश्चित्त्वेतान्बुद्ध्यते वापि राजन् । यो वेद वेदान्न स वेद वेद्यं । सत्ये स्थितो यस्तु स वेद वेद्यम् ॥
na vedānāṃ veditā kaścidasti | kaścittvetānbuddhyate vāpi rājan | yo veda vedānna sa veda vedyaṃ | satye sthito yastu sa veda vedyam
हे राजन्, वेदों को पूर्णतः जानने वाला कोई नहीं है, यद्यपि कोई-कोई उन्हें समझ लेता है। जो केवल वेदों को जानता है, वह जानने योग्य तत्त्व को नहीं जानता; किन्तु जो सत्य में स्थित है, वही उसे जानता है।
श्लोक 54 (5.43.54)
न वेदानां वेदिता कश्चिदस्ति । वेद्येन वेदं न विदुर्न वेद्यम् । यो वेद वेदं स च वेद वेद्यं । यो वेद वेद्यं न स वेद सत्यम् ॥
na vedānāṃ veditā kaścidasti | vedyena vedaṃ na vidurna vedyam | yo veda vedaṃ sa ca veda vedyaṃ | yo veda vedyaṃ na sa veda satyam
वेदों को पूर्णतः जानने वाला कोई नहीं है। लोग वेद्य के द्वारा न वेद को जानते हैं, न वेद्य को। जो वेद को जानता है, वह वेद्य को भी जानता है; पर जो केवल वेद्य को जानता है, वह सत्य को नहीं जानता।
श्लोक 55 (5.43.55)
यो वेद वेदान्स च वेद वेद्यं । न तं विदुर्वेदविदो न वेदाः । तथापि वेदेन विदन्ति वेदं । ये ब्राह्मणा वेदविदो भवन्ति ॥
yo veda vedānsa ca veda vedyaṃ | na taṃ vidurvedavido na vedāḥ | tathāpi vedena vidanti vedaṃ | ye brāhmaṇā vedavido bhavanti
जो वेदों को जानता है, वह वेद्य को भी जानता है। उस परम तत्त्व को न वेदज्ञ जानते हैं, न वेद। फिर भी जो ब्राह्मण सच्चे वेदज्ञ बनते हैं, वे वेद के द्वारा ही वेद को जान लेते हैं।
श्लोक 56 (5.43.56)
धामांशभागस्य तथा हि वेदा । यथा च शाखा हि महीरुहस्य । संवेदने चैव यथामनन्ति । तस्मिन्हि सत्ये परमात्मनोऽर्थे ॥
dhāmāṃśabhāgasya tathā hi vedā | yathā ca śākhā hi mahīruhasya | saṃvedane caiva yathāmananti | tasminhi satye paramātmano'rthe
जिस परम तत्त्व के अंश से सब कुछ बना है, उससे वेदों का वैसा ही सम्बन्ध है जैसा शाखाओं का महावृक्ष से। इसलिए ऋषि उन्हें उसी सत्य, परमात्मा, के ज्ञान का साधन मानते हैं।
श्लोक 57 (5.43.57)
अभिजानामि ब्राह्मणं व्याख्यातारं विचक्षणम् । यश्छिन्नविचिकित्सः स व्याचष्टे सर्वसंशयान् ॥
abhijānāmi brāhmaṇaṃ vyākhyātāraṃ vicakṣaṇam | yaśchinnavicikitsaḥ sa vyācaṣṭe sarvasaṃśayān
मैं उसी विवेकी व्याख्याता को ब्राह्मण मानता हूँ जिसके अपने संशय कट चुके हैं और जो सबके संशयों का समाधान करता है।
श्लोक 58 (5.43.58)
नास्य पर्येषणं गच्छेत्प्राचीनं नोत दक्षिणम् । नार्वाचीनं कुतस्तिर्यङ्नादिशन्तु कथञ्चन ॥
nāsya paryeṣaṇaṃ gacchetprācīnaṃ nota dakṣiṇam | nārvācīnaṃ kutastiryaṅnādiśantu kathañcana
उसे न पूर्व में खोजना चाहिए, न दक्षिण में, न पास में, और न इधर-उधर; किसी भी दिशा में नहीं।
श्लोक 59 (5.43.59)
तस्य पर्येषणं गच्छेत्प्रत्यर्थिषु कथञ्चन । अविचिन्वन्निमं वेदे तपः पश्यति तं प्रभुम् ॥
tasya paryeṣaṇaṃ gacchetpratyarthiṣu kathañcana | avicinvannimaṃ vede tapaḥ paśyati taṃ prabhum
न ही उसे बाहरी विषयों में किसी प्रकार खोजना चाहिए। वेद में भी उसे खोजे बिना, मनुष्य तप के द्वारा उस प्रभु का दर्शन करता है।
श्लोक 60 (5.43.60)
तूष्णींभूत उपासीत न चेष्टेन्मनसापि च । उपावर्तस्व तद्ब्रह्म अन्तरात्मनि विश्रुतम् ॥
tūṣṇīṃbhūta upāsīta na ceṣṭenmanasāpi ca | upāvartasva tadbrahma antarātmani viśrutam
मौन होकर उपासना करनी चाहिए, मन से भी चंचल नहीं होना चाहिए। उस ब्रह्म की ओर मुड़ो, जो अन्तरात्मा में स्थित माना गया है।
श्लोक 61 (5.43.61)
मौनान्न स मुनिर्भवति नारण्यवसनान्मुनिः । स्वलक्षणं तु यो वेद स मुनिः श्रेष्ठ उच्यते ॥
maunānna sa munirbhavati nāraṇyavasanānmuniḥ | svalakṣaṇaṃ tu yo veda sa muniḥ śreṣṭha ucyate
केवल मौन रहने से कोई मुनि नहीं होता, न वन में रहने से। जो अपने स्वरूप को जानता है, वही श्रेष्ठ मुनि कहलाता है।
श्लोक 62 (5.43.62)
सर्वार्थानां व्याकरणाद्वैयाकरण उच्यते । तन्मूलतो व्याकरणं व्याकरोतीति तत्तथा ॥
sarvārthānāṃ vyākaraṇādvaiyākaraṇa ucyate | tanmūlato vyākaraṇaṃ vyākarotīti tattathā
जो सब अर्थों का व्याकरण (विश्लेषण) करता है, वह वैयाकरण कहलाता है। क्योंकि उसी मूल से सबका व्याकरण होता है, इसलिए उसे यथार्थ में यह नाम दिया जाता है।
श्लोक 63 (5.43.63)
प्रत्यक्षदर्शी लोकानां सर्वदर्शी भवेन्नरः । सत्ये वै ब्राह्मणस्तिष्ठंस्तद्विद्वान्सर्वविद्भवेत् ॥
pratyakṣadarśī lokānāṃ sarvadarśī bhavennaraḥ | satye vai brāhmaṇastiṣṭhaṃstadvidvānsarvavidbhavet
जो लोकों को प्रत्यक्ष देखता है, वह मनुष्य सर्वदर्शी हो जाता है। सत्य में स्थित ब्राह्मण उसे जानकर सर्वज्ञ हो जाता है।
श्लोक 64 (5.43.64)
धर्मादिषु स्थितोऽप्येवं क्षत्रिय ब्रह्म पश्यति । वेदानां चानुपूर्व्येण एतद्बुद्ध्या ब्रवीमि ते ॥
dharmādiṣu sthito'pyevaṃ kṣatriya brahma paśyati | vedānāṃ cānupūrvyeṇa etadbuddhyā bravīmi te
हे क्षत्रिय, इस प्रकार धर्म आदि गुणों में स्थित रहकर और वेदों का क्रम से अनुसरण करके मनुष्य ब्रह्म का दर्शन करता है। यह मैं तुम्हें अपनी समझ से बताता हूँ।