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उद्योग पर्व · अध्याय 44

ब्रह्मचर्य और निराकार ब्रह्म

सनत्सुजातीय, अध्याय 4 / 6

धृतराष्ट्र सनत्सुजात से ब्रह्म के विषय में परम उपदेश माँगते हैं। सनत्सुजात कहते हैं कि वह उतावली से नहीं मिलता, बल्कि ब्रह्मचर्य — गुरु के पास अनुशासित शिष्य-जीवन — से प्राप्त होता है; वे उसके चार चरणों का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि इसी से देवता और ऋषि अपनी स्थिति तक पहुँचे। अमृत ब्रह्म के रूप के विषय में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि वह किसी रंग, स्थान, ग्रह-नक्षत्र या वैदिक गान में नहीं मिलता — वह अन्धकार से परे, छुरे की धार से सूक्ष्म और पर्वतों से महान् है, वह आधार जिससे सब प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसमें लौट जाते हैं।

अध्याय 43अध्याय-सूचीअध्याय 45

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (5.44.1)

सनत्सुजात यामिमां परां त्वं । ब्राह्मीं वाचं वदसे विश्वरूपाम् । परां हि कामेन सुदुर्लभां कथां । प्रब्रूहि मे वाक्यमिदं कुमार ॥

sanatsujāta yāmimāṃ parāṃ tvaṃ | brāhmīṃ vācaṃ vadase viśvarūpām | parāṃ hi kāmena sudurlabhāṃ kathāṃ | prabrūhi me vākyamidaṃ kumāra

हे सनत्सुजात, आप जो यह ब्रह्म-सम्बन्धी, सर्वरूप, परम वाणी कह रहे हैं, वह कामना से प्रेरित व्यक्ति के लिए अत्यन्त दुर्लभ कथा है। हे कुमार, यह वचन मुझे बताइए।

सनत्सुजात उवाच

श्लोक 2 (5.44.2)

नैतद्ब्रह्म त्वरमाणेन लभ्यं । यन्मां पृच्छन्नतिहृष्यस्यतीव । बुद्धौ विलीने मनसि प्रचिन्त्य । विद्या हि सा ब्रह्मचर्येण लभ्या ॥

naitadbrahma tvaramāṇena labhyaṃ | yanmāṃ pṛcchannatihṛṣyasyatīva | buddhau vilīne manasi pracintya | vidyā hi sā brahmacaryeṇa labhyā

यह ब्रह्म उतावली करने वाले को प्राप्त नहीं होता, और पूछते हुए तुम अत्यधिक हर्षित हो रहे हो। जब मन बुद्धि में लीन हो जाए, तब उसका चिन्तन करो; वह विद्या ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 3 (5.44.3)

अत्यन्तविद्यामिति यत्सनातनीं । ब्रवीषि त्वं ब्रह्मचर्येण सिद्धाम् । अनारभ्यां वसतीह कार्यकाले । कथं ब्राह्मण्यममृतत्वं लभेत ॥

atyantavidyāmiti yatsanātanīṃ | bravīṣi tvaṃ brahmacaryeṇa siddhām | anārabhyāṃ vasatīha kāryakāle | kathaṃ brāhmaṇyamamṛtatvaṃ labheta

आप कहते हैं कि यह सनातन, परम विद्या ब्रह्मचर्य से सिद्ध होती है — जो प्रयत्न से आरम्भ नहीं की जा सकती, फिर भी उचित समय आने पर भीतर ही निवास करती है। तब ब्रह्मभाव, जो अमृतत्व है, कैसे प्राप्त होता है?

सनत्सुजात उवाच

श्लोक 4 (5.44.4)

अव्यक्तविद्यामभिधास्ये पुराणीं । बुद्ध्या च तेषां ब्रह्मचर्येण सिद्धाम् । यां प्राप्यैनं मर्त्यलोकं त्यजन्ति । या वै विद्या गुरुवृद्धेषु नित्या ॥

avyaktavidyāmabhidhāsye purāṇīṃ | buddhyā ca teṣāṃ brahmacaryeṇa siddhām | yāṃ prāpyainaṃ martyalokaṃ tyajanti | yā vai vidyā guruvṛddheṣu nityā

मैं उस प्राचीन अव्यक्त-विद्या का वर्णन करूँगा, जो ज्ञानियों की बुद्धि और ब्रह्मचर्य से सिद्ध हुई है; जिसे पाकर लोग इस मर्त्यलोक को छोड़ देते हैं, और जो गुरुजनों और वृद्धों में सदा बनी रहती है।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 5 (5.44.5)

ब्रह्मचर्येण या विद्या शक्या वेदितुमञ्चसा । तत्कथं ब्रह्मचर्यं स्यादेतद्ब्रह्मन्ब्रवीहि मे ॥

brahmacaryeṇa yā vidyā śakyā veditumañcasā | tatkathaṃ brahmacaryaṃ syādetadbrahmanbravīhi me

यदि वह विद्या ब्रह्मचर्य के द्वारा शीघ्र जानी जा सकती है, तो ब्रह्मचर्य क्या है? हे ब्रह्मन्, यह मुझे बताइए।

सनत्सुजात उवाच

श्लोक 6 (5.44.6)

आचार्ययोनिमिह ये प्रविश्य । भूत्वा गर्भे ब्रह्मचर्यं चरन्ति । इहैव ते शास्त्रकारा भवन्ति । प्रहाय देहं परमं यान्ति योगम् ॥

ācāryayonimiha ye praviśya | bhūtvā garbhe brahmacaryaṃ caranti | ihaiva te śāstrakārā bhavanti | prahāya dehaṃ paramaṃ yānti yogam

जो आचार्य में मानो गर्भ में प्रवेश करके, वहाँ गर्भस्थ शिशु के समान होकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वे इसी जीवन में शास्त्रों के रचयिता बन जाते हैं, और देह त्यागकर परम योग को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 7 (5.44.7)

अस्मिँल्लोके वै जयन्तीह कामा- । न्ब्राह्मीं स्थितिं ह्यनुतितिक्षमाणाः । त आत्मानं निर्हरन्तीह देहा- । न्मुञ्जादिषीकामिव सत्त्वसंस्थाः ॥

asmim̐lloke vai jayantīha kāmā- | nbrāhmīṃ sthitiṃ hyanutitikṣamāṇāḥ | ta ātmānaṃ nirharantīha dehā- | nmuñjādiṣīkāmiva sattvasaṃsthāḥ

इस लोक में वे ब्राह्मी स्थिति के लिए सहनशील रहते हुए कामनाओं को जीत लेते हैं। सत्त्व में स्थित होकर वे यहीं आत्मा को देह से वैसे ही अलग कर लेते हैं, जैसे मूँज से सींक निकाली जाती है।

श्लोक 8 (5.44.8)

शरीरमेतौ कुरुतः पिता माता च भारत । आचार्यशास्ता या जातिः सा पुण्या साऽऽजराऽमरा ॥

śarīrametau kurutaḥ pitā mātā ca bhārata | ācāryaśāstā yā jātiḥ sā puṇyā sā''jarā'marā

हे भारत, पिता और माता — ये दोनों केवल शरीर बनाते हैं। परन्तु आचार्य के उपदेश से जो जन्म मिलता है, वह पवित्र, अजर और अमर है।

श्लोक 9 (5.44.9)

यः प्रावृणोत्यवितथेन वर्णा- । नृतं कुर्वन्नमृतं संप्रयच्छन् । तं मन्येत पितरं मातरं च । तस्मै न द्रुह्येत्कतमस्य जानन् ॥

yaḥ prāvṛṇotyavitathena varṇā- | nṛtaṃ kurvannamṛtaṃ saṃprayacchan | taṃ manyeta pitaraṃ mātaraṃ ca | tasmai na druhyetkatamasya jānan

जो अमोघ वचनों से शिष्य को पवित्र अक्षरों से आवृत करता है, सत्य सिखाता है और अमृत प्रदान करता है, उसी को पिता और माता मानना चाहिए। उसके किए उपकार को जानते हुए उससे कभी द्रोह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 10 (5.44.10)

गुरुं शिष्यो नित्यमभिवादयीत । स्वाध्यायमिच्छेच्छुचिरप्रमत्तः । मानं न कुर्यान्नादधीत रोष- । मेष प्रथमो ब्रह्मचर्यस्य पादः ॥

guruṃ śiṣyo nityamabhivādayīta | svādhyāyamicchecchucirapramattaḥ | mānaṃ na kuryānnādadhīta roṣa- | meṣa prathamo brahmacaryasya pādaḥ

शिष्य को सदा गुरु को प्रणाम करना चाहिए, और पवित्र तथा सावधान रहकर स्वाध्याय में रुचि रखनी चाहिए। वह अभिमान न करे और क्रोध न रखे। यह ब्रह्मचर्य का पहला चरण है।

श्लोक 11 (5.44.11)

शिष्यवृत्तिक्रमेणैव विद्यामाप्नोति यः शुचिः । ब्रह्मचर्यव्रतस्यास्य प्रथमः पाद उच्यते ॥

śiṣyavṛttikrameṇaiva vidyāmāpnoti yaḥ śuciḥ | brahmacaryavratasyāsya prathamaḥ pāda ucyate

जब पवित्र शिष्य शिष्य-वृत्ति के क्रम का पालन करते हुए विद्या प्राप्त करता है, तो उसे इस ब्रह्मचर्य-व्रत का पहला चरण कहा जाता है।

श्लोक 12 (5.44.12)

आचार्यस्य प्रियं कुर्यात्प्राणैरपि धनैरपि । कर्मणा मनसा वाचा द्वितीयः पाद उच्यते ॥

ācāryasya priyaṃ kuryātprāṇairapi dhanairapi | karmaṇā manasā vācā dvitīyaḥ pāda ucyate

प्राणों और धन से भी, कर्म, मन और वाणी से आचार्य का प्रिय करना चाहिए। यह दूसरा चरण कहा जाता है।

श्लोक 13 (5.44.13)

समा गुरौ यथा वृत्तिर्गुरुपत्न्यां तथा चरेत् । तत्पुत्रे च तथा कुर्वन्द्वितीयः पाद उच्यते ॥

samā gurau yathā vṛttirgurupatnyāṃ tathā caret | tatputre ca tathā kurvandvitīyaḥ pāda ucyate

जैसा व्यवहार गुरु के प्रति हो, वैसा ही गुरुपत्नी के प्रति करना चाहिए, और गुरु-पुत्र के प्रति भी वैसा ही आचरण करना चाहिए। इसे भी दूसरा चरण कहा जाता है।

श्लोक 14 (5.44.14)

आचार्येणात्मकृतं विजानन् । ज्ञात्वा चार्थं भावितोऽस्मीत्यनेन । यन्मन्यते तं प्रति हृष्टबुद्धिः । स वै तृतीयो ब्रह्मचर्यस्य पादः ॥

ācāryeṇātmakṛtaṃ vijānan | jñātvā cārthaṃ bhāvito'smītyanena | yanmanyate taṃ prati hṛṣṭabuddhiḥ | sa vai tṛtīyo brahmacaryasya pādaḥ

आचार्य ने उसके लिए जो किया है उसे पहचानकर और उसका प्रयोजन समझकर, यह मानते हुए कि 'इन्हीं के कारण मैं योग्य बना हूँ', वह प्रसन्न मन से उनका आदर करता है। यह ब्रह्मचर्य का तीसरा चरण है।

श्लोक 15 (5.44.15)

नाचार्यस्यानपाकृत्य प्रवासं । प्राज्ञः कुर्वीत नैतदहं करोमि । इतीव मन्येत न भाषयेत । स वै चतुर्थो ब्रह्मचर्यस्य पादः ॥

nācāryasyānapākṛtya pravāsaṃ | prājñaḥ kurvīta naitadahaṃ karomi | itīva manyeta na bhāṣayeta | sa vai caturtho brahmacaryasya pādaḥ

बुद्धिमान् शिष्य को आचार्य का ऋण चुकाए बिना दूर नहीं जाना चाहिए। 'यह मैं कर रहा हूँ' — ऐसा न वह मन में सोचे, न कहे। यह ब्रह्मचर्य का चौथा चरण है।

श्लोक 16 (5.44.16)

कालेन पादं लभते तथार्थं । ततश्च पादं गुरुयोगतश्च । उत्साहयोगेन च पादमृच्छे- । च्छास्त्रेण पादं च ततोऽभियाति ॥

kālena pādaṃ labhate tathārthaṃ | tataśca pādaṃ guruyogataśca | utsāhayogena ca pādamṛcche- | cchāstreṇa pādaṃ ca tato'bhiyāti

उसके फल का एक चौथाई भाग वह समय के साथ पाता है, एक चौथाई गुरु के संग से, एक चौथाई अपने उत्साह और प्रयत्न से, और फिर अन्तिम चौथाई शास्त्रों से।

श्लोक 17 (5.44.17)

धर्मादयो द्वादश यस्य रूप- । मन्यानि चाङ्गानि तथा बलं च । आचार्ययोगे फलतीति चाहु- । र्ब्रह्मार्थयोगेन च ब्रह्मचर्यम् ॥

dharmādayo dvādaśa yasya rūpa- | manyāni cāṅgāni tathā balaṃ ca | ācāryayoge phalatīti cāhu- | rbrahmārthayogena ca brahmacaryam

धर्म आदि बारह गुण जिसका स्वरूप हैं, और जिसके अन्य अंग तथा बल भी हैं — ऐसा ब्रह्मचर्य, कहते हैं, आचार्य के संग से और ब्रह्म के लक्ष्य से जुड़कर फल देता है।

श्लोक 18 (5.44.18)

एवं प्रवृत्तो यदुपालभेत वै । धनमाचार्याय तदनुप्रयच्छेत् । स तां वृत्तिं बहुगुणामेवमेति । गुरोः पुत्रे भवति च वृत्तिरेषा ॥

evaṃ pravṛtto yadupālabheta vai | dhanamācāryāya tadanuprayacchet | sa tāṃ vṛttiṃ bahuguṇāmevameti | guroḥ putre bhavati ca vṛttireṣā

इस प्रकार रहते हुए उसे जो भी धन मिले, वह आचार्य को अर्पित कर दे। इस प्रकार वह अनेक गुणों से युक्त जीवन-पद्धति को प्राप्त करता है; और गुरु-पुत्र के प्रति भी यही आचरण होना चाहिए।

श्लोक 19 (5.44.19)

एवं वसन्सर्वतो वर्धतीह । बहून्पुत्रांल्लभते च प्रतिष्ठाम् । वर्षन्ति चास्मै प्रदिशो दिशश्च । वसत्यस्मिन्ब्रह्मचर्ये जनाश्च ॥

evaṃ vasansarvato vardhatīha | bahūnputrāṃllabhate ca pratiṣṭhām | varṣanti cāsmai pradiśo diśaśca | vasatyasminbrahmacarye janāśca

इस प्रकार रहने वाला यहाँ हर प्रकार से बढ़ता है; वह अनेक पुत्र और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। दिशाएँ और उपदिशाएँ उस पर वर्षा करती हैं, और लोग उसके ब्रह्मचर्य के आश्रय में आकर रहते हैं।

श्लोक 20 (5.44.20)

एतेन ब्रह्मचर्येण देवा देवत्वमाप्नुवन् । ऋषयश्च महाभागा ब्रह्मलोकं मनीषिणः ॥

etena brahmacaryeṇa devā devatvamāpnuvan | ṛṣayaśca mahābhāgā brahmalokaṃ manīṣiṇaḥ

इसी ब्रह्मचर्य से देवताओं ने देवत्व प्राप्त किया, और महाभाग मनीषी ऋषियों ने ब्रह्मलोक प्राप्त किया।

श्लोक 21 (5.44.21)

गन्धर्वाणामनेनैव रूपमप्सरसामभूत् । एतेन ब्रह्मचर्येण सूर्योऽप्यह्नाय जायते ॥

gandharvāṇāmanenaiva rūpamapsarasāmabhūt | etena brahmacaryeṇa sūryo'pyahnāya jāyate

इसी से गन्धर्वों और अप्सराओं को उनका रूप मिला। इसी ब्रह्मचर्य से सूर्य भी दिन लाने के लिए उदित होता है।

श्लोक 22 (5.44.22)

आकाङ्क्ष्यार्थस्य संयोगाद्रसभेदार्थिनामिव । एवं ह्येते समाज्ञाय तादृग्भावं गता इमे ॥

ākāṅkṣyārthasya saṃyogādrasabhedārthināmiva | evaṃ hyete samājñāya tādṛgbhāvaṃ gatā ime

जैसे विभिन्न रसों के इच्छुक अपनी वांछित वस्तु पाकर उन्हें प्राप्त करते हैं, वैसे ही ये सब इसे भली-भाँति जानकर उस अवस्था को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 23 (5.44.23)

य आश्रयेत्पावयेच्चापि राज- । न्सर्वं शरीरं तपसा तप्यमानः । एतेन वै बाल्यमभ्येति विद्वान् । मृत्युं तथा स जयत्यन्तकाले ॥

ya āśrayetpāvayeccāpi rāja- | nsarvaṃ śarīraṃ tapasā tapyamānaḥ | etena vai bālyamabhyeti vidvān | mṛtyuṃ tathā sa jayatyantakāle

हे राजन्, जो इसका आश्रय लेकर अपने सम्पूर्ण शरीर को तप से तपाता हुआ स्वयं को पवित्र करता है, वह विद्वान् इसी से बालक जैसी निर्मलता प्राप्त करता है और अन्तकाल में मृत्यु को भी जीत लेता है।

श्लोक 24 (5.44.24)

अन्तवतः क्षत्रिय ते जयन्ति । लोकाञ्जनाः कर्मणा निर्मलेन । ब्रह्मैव विद्वांस्तेन चाभ्येति सर्वं । नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ॥

antavataḥ kṣatriya te jayanti | lokāñjanāḥ karmaṇā nirmalena | brahmaiva vidvāṃstena cābhyeti sarvaṃ | nānyaḥ panthā ayanāya vidyate

हे क्षत्रिय, लोग निर्मल कर्मों से नश्वर लोकों को जीतते हैं। परन्तु ब्रह्मज्ञानी उस ज्ञान से सर्वस्व को प्राप्त कर लेता है। वहाँ पहुँचने का दूसरा कोई मार्ग नहीं है।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 25 (5.44.25)

आभाति शुक्लमिव लोहितमि- । वाथो कृष्णमथाञ्जनं काद्रवं वा । सद्ब्रह्मणः पश्यति योऽत्र विद्वा- । न्कथं रूपं तदमृतमक्षरं पदम् ॥

ābhāti śuklamiva lohitami- | vātho kṛṣṇamathāñjanaṃ kādravaṃ vā | sadbrahmaṇaḥ paśyati yo'tra vidvā- | nkathaṃ rūpaṃ tadamṛtamakṣaraṃ padam

वह श्वेत-सा, लाल-सा, फिर काला, या अंजन के समान श्याम, या भूरा-सा प्रतीत होता है। जो विद्वान् यहाँ सत्य ब्रह्म का दर्शन करता है, वह उस अमृत, अक्षर पद का कैसा रूप देखता है?

सनत्सुजात उवाच

श्लोक 26 (5.44.26)

आभाति शुक्लमिव लोहितमि- । वाथो कृष्णमायसमर्कवर्णम् । न पृथिव्यां तिष्ठति नान्तरिक्षे । नैतत्समुद्रे सलिलं बिभर्ति ॥

ābhāti śuklamiva lohitami- | vātho kṛṣṇamāyasamarkavarṇam | na pṛthivyāṃ tiṣṭhati nāntarikṣe | naitatsamudre salilaṃ bibharti

वह श्वेत-सा, लाल-सा, काला, लोहे के रंग का या सूर्य के रंग का प्रतीत होता है; फिर भी वह न पृथ्वी पर स्थित है, न अन्तरिक्ष में, और न समुद्र उसे जल के रूप में धारण करता है।

श्लोक 27 (5.44.27)

न तारकासु न च विद्युदाश्रितं । न चाभ्रेषु दृश्यते रूपमस्य । न चापि वायौ न च देवतासु । नैतच्चन्द्रे दृश्यते नोत सूर्ये ॥

na tārakāsu na ca vidyudāśritaṃ | na cābhreṣu dṛśyate rūpamasya | na cāpi vāyau na ca devatāsu | naitaccandre dṛśyate nota sūrye

वह न तारों में है, न बिजली में स्थित है; उसका रूप न बादलों में दिखता है, न वायु में, न देवताओं में; न वह चन्द्रमा में दिखता है, न सूर्य में।

श्लोक 28 (5.44.28)

नैवर्क्षु तन्न यजुष्षु नाप्यथर्वसु । न दृश्यते वै विमलेषु सामसु । रथन्तरे बार्हद्रथे वापि राज- । न्महाव्रते नैव दृश्येद्ध्रुवं तत् ॥

naivarkṣu tanna yajuṣṣu nāpyatharvasu | na dṛśyate vai vimaleṣu sāmasu | rathantare bārhadrathe vāpi rāja- | nmahāvrate naiva dṛśyeddhruvaṃ tat

वह न ऋचाओं में दिखता है, न यजुषों में, न अथर्व-मन्त्रों में, न निर्मल सामों में। हे राजन्, न रथन्तर और बार्हद्रथ सामों में, न महाव्रत में — वह ध्रुव तत्त्व कहीं दिखाई नहीं देता।

श्लोक 29 (5.44.29)

अपारणीयं तमसः परस्ता- । त्तदन्तकोऽप्येति विनाशकाले । अणीयो रूपं क्षुरधारया समं । महच्च रूपं तद्वै पर्वतेभ्यः ॥

apāraṇīyaṃ tamasaḥ parastā- | ttadantako'pyeti vināśakāle | aṇīyo rūpaṃ kṣuradhārayā samaṃ | mahacca rūpaṃ tadvai parvatebhyaḥ

वह अन्धकार से परे है और उसका पार नहीं पाया जा सकता; प्रलय के समय अन्तक (मृत्यु) भी उसी में चला जाता है। उसका रूप छुरे की धार से भी सूक्ष्म है, और वही रूप पर्वतों से भी महान् है।

श्लोक 30 (5.44.30)

सा प्रतिष्ठा तदमृतं लोकास्तद्ब्रह्म तद्यशः । भूतानि जज्ञिरे तस्मात्प्रलयं यान्ति तत्र हि ॥

sā pratiṣṭhā tadamṛtaṃ lokāstadbrahma tadyaśaḥ | bhūtāni jajñire tasmātpralayaṃ yānti tatra hi

वही आधार है, वही अमृत है; वही लोक है, वही ब्रह्म है, वही यश है। उसी से प्राणी उत्पन्न हुए और प्रलय में उसी में लीन होते हैं।

श्लोक 31 (5.44.31)

अनामयं तन्महदुद्यतं यशो । वाचो विकारं कवयो वदन्ति । यस्मिञ्जगत्सर्वमिदं प्रतिष्ठितं । ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥

anāmayaṃ tanmahadudyataṃ yaśo | vāco vikāraṃ kavayo vadanti | yasmiñjagatsarvamidaṃ pratiṣṭhitaṃ | ye tadviduramṛtāste bhavanti

वह निरामय, महान्, उन्नत यश है; ज्ञानी उसका वर्णन वाणी के विकारों द्वारा ही करते हैं। उसी में यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है; जो उसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं।

श्लोक 32 (5.44.32)

तदेतदह्ना संस्थितं भाति सर्वं । तदात्मवित्पश्यति ज्ञानयोगात् । तस्मिञ्जगत्सर्वमिदं प्रतिष्ठितं । ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥

tadetadahnā saṃsthitaṃ bhāti sarvaṃ | tadātmavitpaśyati jñānayogāt | tasmiñjagatsarvamidaṃ pratiṣṭhitaṃ | ye tadviduramṛtāste bhavanti

यह सब उसी प्रकाश में स्थित होकर प्रकाशित होता है; आत्मज्ञानी ज्ञानयोग के द्वारा उसे देखता है। उसी में यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है; जो उसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं।

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