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उद्योग पर्व · अध्याय 46

वह सनातन भगवान जिसे योगी देखते हैं

सनत्सुजातीय, अध्याय 6 / 6

"योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं" — इस टेक पर समाप्त होने वाले श्लोकों में सनत्सुजात उस शुद्ध, देदीप्यमान ज्योति का वर्णन करते हैं जिससे सूर्य प्रकाशित होता है और जो पृथ्वी और आकाश को धारण करती है; उस पूर्ण का, जिससे पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है; और हृदय में अदृश्य रूप से रहने वाले अंगुष्ठमात्र पुरुष का। वे सिखाते हैं कि यह आत्मा आँख से नहीं, केवल शुद्ध अन्तःकरण वालों को दिखाई देता है। अंत में वे उसी आत्मा के रूप में बोलते हैं — माता, पिता और पुत्र, जो है और जो नहीं है उस सबका आत्मा, जो हर प्राणी में जाग्रत् है।

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

सनत्सुजात उवाच

श्लोक 1 (5.46.1)

यत्तच्छुक्रं महञ्ज्योतिर्दीप्यमानं महद्यशः । तद्वै देवा उपासते तस्मात्सूर्यो विराजते । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

yattacchukraṃ mahañjyotirdīpyamānaṃ mahadyaśaḥ | tadvai devā upāsate tasmātsūryo virājate | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

वह शुद्ध, महान् ज्योति, जो देदीप्यमान और महान् यश वाली है — देवता उसी की उपासना करते हैं, और उसी से सूर्य प्रकाशित होता है। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 2 (5.46.2)

शुक्राद्ब्रह्म प्रभवति ब्रह्म शुक्रेण वर्धते । तच्छुक्रं ज्योतिषां मध्येऽतप्तं तपति तापनम् । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

śukrādbrahma prabhavati brahma śukreṇa vardhate | tacchukraṃ jyotiṣāṃ madhye'taptaṃ tapati tāpanam | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

उस शुद्ध (शुक्र) से ब्रह्म उत्पन्न होता है, और शुक्र से ही ब्रह्म बढ़ता है। ज्योतियों के बीच वह शुक्र स्वयं बिना तपे सब तपाने वालों को तपाता है। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 3 (5.46.3)

आपोऽथाद्भ्यः सलिलस्य मध्ये । उभौ देवौ शिश्रियातेऽन्तरिक्षे । अतन्द्रितः सवितुर्विवस्वा- । नुभौ बिभर्ति पृथिवीं दिवं च । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

āpo'thādbhyaḥ salilasya madhye | ubhau devau śiśriyāte'ntarikṣe | atandritaḥ saviturvivasvā- | nubhau bibharti pṛthivīṃ divaṃ ca | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

फिर जलों से, जलराशि के बीच, लोक उत्पन्न हुए, और दो देव अन्तरिक्ष में आश्रित हुए। वह अथक, प्रकाशमान सूर्य पृथ्वी और आकाश — दोनों को धारण करता है। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 4 (5.46.4)

उभौ च देवौ पृथिवीं दिवं च । दिशः शुक्रो भुवनं बिभर्ति । तस्माद्दिशः सरितश्च स्रवन्ति । तस्मात्समुद्रा विहिता महान्तः । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

ubhau ca devau pṛthivīṃ divaṃ ca | diśaḥ śukro bhuvanaṃ bibharti | tasmāddiśaḥ saritaśca sravanti | tasmātsamudrā vihitā mahāntaḥ | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

वही शुक्र दोनों देवों — पृथ्वी और आकाश — को, दिशाओं को और सम्पूर्ण भुवन को धारण करता है। उसी से दिशाएँ और नदियाँ प्रवाहित होती हैं; उसी से महान् समुद्र बने हैं। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 5 (5.46.5)

चक्रे रथस्य तिष्ठन्तोऽध्रुवस्याव्ययकर्मणः । केतुमन्तं वहन्त्यश्वास्तं दिव्यमजरं दिवि । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

cakre rathasya tiṣṭhanto'dhruvasyāvyayakarmaṇaḥ | ketumantaṃ vahantyaśvāstaṃ divyamajaraṃ divi | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

अविनाशी कर्मों वाले उस पुरुष के नश्वर रथ के चक्र पर स्थित होकर अश्व उस ध्वजा वाले, दिव्य और अजर देव को आकाश में ले जाते हैं। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 6 (5.46.6)

न सादृश्ये तिष्ठति रूपमस्य । न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् । मनीषयाथो मनसा हृदा च । य एनं विदुरमृतास्ते भवन्ति । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

na sādṛśye tiṣṭhati rūpamasya | na cakṣuṣā paśyati kaścidenam | manīṣayātho manasā hṛdā ca | ya enaṃ viduramṛtāste bhavanti | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

उसका रूप किसी उपमा में नहीं ठहरता; कोई भी उसे आँख से नहीं देखता। जो उसे प्रज्ञा, मन और हृदय से जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 7 (5.46.7)

द्वादशपूगां सरितं पिबन्तो देवरक्षिताम् । मध्वीक्षन्तश्च ते तस्याः संचरन्तीह घोराम् । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

dvādaśapūgāṃ saritaṃ pibanto devarakṣitām | madhvīkṣantaśca te tasyāḥ saṃcarantīha ghorām | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

देवताओं द्वारा रक्षित बारह धाराओं वाली नदी का पान करते हुए और उसके मधु को देखते हुए, वे यहाँ उस भयंकर नदी में विचरते हैं। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 8 (5.46.8)

तदर्धमासं पिबति संचितं भ्रमरो मधु । ईशानः सर्वभूतेषु हविर्भूतमकल्पयत् । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

tadardhamāsaṃ pibati saṃcitaṃ bhramaro madhu | īśānaḥ sarvabhūteṣu havirbhūtamakalpayat | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

भ्रमर आधे महीने तक संचित मधु का पान करता है। ईश्वर ने उसे सब प्राणियों में हवि के रूप में स्थापित किया। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 9 (5.46.9)

हिरण्यपर्णमश्वत्थमभिपद्य ह्यपक्षकाः । ते तत्र पक्षिणो भूत्वा प्रपतन्ति यथादिशम् । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

hiraṇyaparṇamaśvatthamabhipadya hyapakṣakāḥ | te tatra pakṣiṇo bhūtvā prapatanti yathādiśam | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

पंखहीन जीव सुनहरे पत्तों वाले अश्वत्थ वृक्ष पर पहुँचकर वहाँ पक्षी बन जाते हैं और सब दिशाओं में उड़ जाते हैं। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 10 (5.46.10)

पूर्णात्पूर्णान्युद्धरन्ति पूर्णात्पूर्णानि चक्रिरे । हरन्ति पूर्णात्पूर्णानि पूर्णमेवावशिष्यते । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

pūrṇātpūrṇānyuddharanti pūrṇātpūrṇāni cakrire | haranti pūrṇātpūrṇāni pūrṇamevāvaśiṣyate | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

पूर्ण से वे पूर्ण निकालते हैं, पूर्ण से ही उन्होंने पूर्ण रचे। पूर्ण से पूर्ण को ले लेते हैं, फिर भी पूर्ण ही शेष रहता है। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 11 (5.46.11)

तस्माद्वै वायुरायातस्तस्मिंश्च प्रयतः सदा । तस्मादग्निश्च सोमश्च तस्मिंश्च प्राण आततः ॥

tasmādvai vāyurāyātastasmiṃśca prayataḥ sadā | tasmādagniśca somaśca tasmiṃśca prāṇa ātataḥ

उसी से वायु आया है और उसी में वह सदा नियन्त्रित रहता है। उसी से अग्नि और सोम उत्पन्न हुए, और उसी में प्राण व्याप्त है।

श्लोक 12 (5.46.12)

सर्वमेव ततो विद्यात्तत्तद्वक्तुं न शक्नुमः । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

sarvameva tato vidyāttattadvaktuṃ na śaknumaḥ | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

जानो कि सब कुछ उसी से है; हम एक-एक वस्तु का वर्णन नहीं कर सकते। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 13 (5.46.13)

अपानं गिरति प्राणः प्राणं गिरति चन्द्रमाः । आदित्यो गिरते चन्द्रमादित्यं गिरते परः । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

apānaṃ girati prāṇaḥ prāṇaṃ girati candramāḥ | ādityo girate candramādityaṃ girate paraḥ | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

प्राण अपान को निगल लेता है, चन्द्रमा प्राण को निगलता है, सूर्य चन्द्रमा को निगलता है, और परम पुरुष सूर्य को निगल लेता है। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 14 (5.46.14)

एकं पादं नोत्क्षिपति सलिलाद्धंस उच्चरन् । तं चेत्सन्ततमूर्ध्वाय न मृत्युर्नामृतं भवेत् । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

ekaṃ pādaṃ notkṣipati salilāddhaṃsa uccaran | taṃ cetsantatamūrdhvāya na mṛtyurnāmṛtaṃ bhavet | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

जल से ऊपर उठता हुआ हंस अपना एक पैर नहीं उठाता। यदि वह उस पैर को सदा के लिए ऊपर उठा ले, तो न मृत्यु रहे, न अमृत। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 15 (5.46.15)

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा । लिङ्गस्य योगेन स याति नित्यम् । तमीशमीड्यमनुकल्पमाद्यं । पश्यन्ति मूढा न विराजमानम् । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

aṅguṣṭhamātraḥ puruṣo'ntarātmā | liṅgasya yogena sa yāti nityam | tamīśamīḍyamanukalpamādyaṃ | paśyanti mūḍhā na virājamānam | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

अंगूठे के बराबर वह पुरुष, अन्तरात्मा, सूक्ष्म शरीर के योग से निरन्तर गति करता है। मूढ़ लोग उस स्तुत्य, आदि, देदीप्यमान ईश्वर को नहीं देखते। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 16 (5.46.16)

असाधना वापि ससाधना वा । समानमेतद्दृश्यते मानुषेषु । समानमेतदमृतस्येतरस्य । मुक्तास्तत्र मध्व उत्सं समापुः । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

asādhanā vāpi sasādhanā vā | samānametaddṛśyate mānuṣeṣu | samānametadamṛtasyetarasya | muktāstatra madhva utsaṃ samāpuḥ | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

मनुष्य साधनहीन हों या साधनयुक्त, उनमें यह समान ही दिखाई देता है; अमृत (मुक्त) और दूसरे के लिए भी यह समान है। वहाँ मुक्त पुरुषों ने मधु के स्रोत को प्राप्त किया। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 17 (5.46.17)

उभौ लोकौ विद्यया व्याप्य याति । तदा हुतं चाहुतमग्निहोत्रम् । मा ते ब्राह्मी लघुतामादधीत । प्रज्ञानं स्यान्नाम धीरा लभन्ते । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

ubhau lokau vidyayā vyāpya yāti | tadā hutaṃ cāhutamagnihotram | mā te brāhmī laghutāmādadhīta | prajñānaṃ syānnāma dhīrā labhante | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

विद्या से दोनों लोकों को व्याप्त करके वह आगे बढ़ता है; तब बिना किया अग्निहोत्र भी किया हुआ माना जाता है। ब्रह्मविद्या तुम्हें हल्केपन की ओर न ले जाए; उसी को प्रज्ञान कहते हैं, जिसे धीर पुरुष प्राप्त करते हैं। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 18 (5.46.18)

एवंरूपो महात्मा स पावकं पुरुषो गिरन् । यो वै तं पुरुषं वेद तस्येहार्थो न रिष्यते । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

evaṃrūpo mahātmā sa pāvakaṃ puruṣo giran | yo vai taṃ puruṣaṃ veda tasyehārtho na riṣyate | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

ऐसे रूप वाला वह महात्मा पुरुष अग्नि को भी निगल जाता है। जो उस पुरुष को जानता है, उसका प्रयोजन यहाँ कभी नष्ट नहीं होता। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 19 (5.46.19)

यः सहस्रं सहस्राणां पक्षान्संतत्य संपतेत् । मध्यमे मध्य आगच्छेदपिचेत्स्यान्मनोजवः । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

yaḥ sahasraṃ sahasrāṇāṃ pakṣānsaṃtatya saṃpatet | madhyame madhya āgacchedapicetsyānmanojavaḥ | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

यदि कोई हजारों-हजार पंख फैलाकर मन के वेग से भी उड़े, तो भी वह मध्य के ही मध्य में पहुँचेगा। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 20 (5.46.20)

न दर्शने तिष्ठति रूपमस्य । पश्यन्ति चैनं सुविशुद्धसत्त्वाः । हितो मनीषी मनसा न तप्यते । ये प्रव्रजेयुरमृतास्ते भवन्ति । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

na darśane tiṣṭhati rūpamasya | paśyanti cainaṃ suviśuddhasattvāḥ | hito manīṣī manasā na tapyate | ye pravrajeyuramṛtāste bhavanti | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

उसका रूप दृष्टि में नहीं आता; जिनका अन्तःकरण पूर्णतः शुद्ध है, वे ही उसे देखते हैं। सबका हित चाहने वाला मनीषी मन से संतप्त नहीं होता। जो संन्यास ग्रहण करते हैं, वे अमर हो जाते हैं। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 21 (5.46.21)

गूहन्ति सर्पा इव गह्वराणि । स्वशिक्षया स्वेन वृत्तेन मर्त्याः । तेषु प्रमुह्यन्ति जना विमूढा । यथाध्वानं मोहयन्ते भयाय । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

gūhanti sarpā iva gahvarāṇi | svaśikṣayā svena vṛttena martyāḥ | teṣu pramuhyanti janā vimūḍhā | yathādhvānaṃ mohayante bhayāya | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

जैसे साँप बिलों में छिपे रहते हैं, वैसे ही मनुष्य अपनी शिक्षा और आचरण की आड़ में छिपे रहते हैं। मूढ़ लोग उनसे भ्रमित हो जाते हैं, और वे उन्हें मार्ग से भटकाकर संकट में डाल देते हैं। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 22 (5.46.22)

नाहं सदाऽसत्कृतः स्यां न मृत्यु- । र्न चामृत्युरमृतं मे कुतः स्यात् । सत्यानृते सत्यसमानबन्धे । सतश्च योनिरसतश्चैक एव । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

nāhaṃ sadā'satkṛtaḥ syāṃ na mṛtyu- | rna cāmṛtyuramṛtaṃ me kutaḥ syāt | satyānṛte satyasamānabandhe | sataśca yonirasataścaika eva | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

मेरा कभी अनादर नहीं होता; मेरे लिए न मृत्यु है, न अमृत्यु — फिर अमृत मेरा कैसे हो? सत्य और असत्य दोनों एक ही सत्य से बँधे हैं; जो है और जो नहीं है, उन दोनों का उद्गम एक ही है। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 23 (5.46.23)

न साधुना नोत असाधुना वा- । ऽसमानमेतद्दृश्यते मानुषेषु । समानमेतदमृतस्य विद्या- । देवं युक्तो मधु तद्वै परीप्सेत् । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

na sādhunā nota asādhunā vā- | 'samānametaddṛśyate mānuṣeṣu | samānametadamṛtasya vidyā- | devaṃ yukto madhu tadvai parīpset | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

न सज्जनों के कारण, न दुर्जनों के कारण यह मनुष्यों में भिन्न दिखाई देता है। इसे सबमें समान, अमृत का मधु जानो; इस प्रकार उससे युक्त होकर मनुष्य उस मधु को पाने की इच्छा करे। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 24 (5.46.24)

नास्यातिवादा हृदयं तापयन्ति । नानधीतं नाहुतमग्निहोत्रम् । मनो ब्राह्मी लघुतामादधीत । प्रज्ञां चास्मै नाम धीरा लभन्ते । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

nāsyātivādā hṛdayaṃ tāpayanti | nānadhītaṃ nāhutamagnihotram | mano brāhmī laghutāmādadhīta | prajñāṃ cāsmai nāma dhīrā labhante | yoginastaṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam

कटु वचन उसके हृदय को नहीं तपाते, न बिना किया अध्ययन और न बिना किया अग्निहोत्र। मन ब्रह्म की निर्भार लघुता को धारण करे; ऐसे व्यक्ति के लिए धीर पुरुष प्रज्ञा नाम की वस्तु प्राप्त करते हैं। योगी उस सनातन भगवान का दर्शन करते हैं।

श्लोक 25 (5.46.25)

एवं यः सर्वभूतेषु आत्मानमनुपश्यति । अन्यत्रान्यत्र युक्तेषु किं स शोचेत्ततः परम् ॥

evaṃ yaḥ sarvabhūteṣu ātmānamanupaśyati | anyatrānyatra yukteṣu kiṃ sa śocettataḥ param

जो इस प्रकार सब प्राणियों में, जो भिन्न-भिन्न स्थानों और कार्यों में लगे हैं, आत्मा को देखता है, उसके लिए फिर शोक करने को क्या रह जाता है?

श्लोक 26 (5.46.26)

यथोदपाने महति सर्वतः संप्लुतोदके । एवं सर्वेषु वेदेषु आत्मानमनुजानतः ॥

yathodapāne mahati sarvataḥ saṃplutodake | evaṃ sarveṣu vedeṣu ātmānamanujānataḥ

जब चारों ओर जल ही जल भरा हो, तब बड़े कुएँ का जितना प्रयोजन रह जाता है, आत्मा को जानने वाले के लिए सब वेदों का भी उतना ही प्रयोजन है।

श्लोक 27 (5.46.27)

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो महात्मा । न दृश्यतेऽसौ हृदि संनिविष्टः । अजश्चरो दिवारात्रमतन्द्रितश्च । स तं मत्वा कविरास्ते प्रसन्नः ॥

aṅguṣṭhamātraḥ puruṣo mahātmā | na dṛśyate'sau hṛdi saṃniviṣṭaḥ | ajaścaro divārātramatandritaśca | sa taṃ matvā kavirāste prasannaḥ

अंगूठे के बराबर वह महात्मा पुरुष हृदय में स्थित है, पर दिखाई नहीं देता। वह अजन्मा, गतिशील और दिन-रात अथक है; उसे जानकर ज्ञानी प्रसन्न और शान्त रहता है।

श्लोक 28 (5.46.28)

अहमेव स्मृतो माता पिता पुत्रोऽस्म्यहं पुनः । आत्माहमपि सर्वस्य यच्च नास्ति यदस्ति च ॥

ahameva smṛto mātā pitā putro'smyahaṃ punaḥ | ātmāhamapi sarvasya yacca nāsti yadasti ca

मैं ही माता और पिता कहा जाता हूँ, और मैं ही पुत्र भी हूँ। जो नहीं है और जो है — उस सबका आत्मा मैं ही हूँ।

श्लोक 29 (5.46.29)

पितामहोऽस्मि स्थविरः पिता पुत्रश्च भारत । ममैव यूयमात्मस्था न मे यूयं न वो ह्यहम् ॥

pitāmaho'smi sthaviraḥ pitā putraśca bhārata | mamaiva yūyamātmasthā na me yūyaṃ na vo hyaham

हे भारत, मैं ही वृद्ध पितामह, पिता और पुत्र हूँ। तुम सब मेरे ही आत्मा में स्थित हो; फिर भी न तुम मेरे हो, न मैं तुम्हारा।

श्लोक 30 (5.46.30)

आत्मैव स्थानं मम जन्म चात्मा । ओतप्रोतोऽहमजरप्रतिष्ठः । अजश्चरो दिवारात्रमतन्द्रितोऽहं । मां विज्ञाय कविरास्ते प्रसन्नः ॥

ātmaiva sthānaṃ mama janma cātmā | otaproto'hamajarapratiṣṭhaḥ | ajaścaro divārātramatandrito'haṃ | māṃ vijñāya kavirāste prasannaḥ

आत्मा ही मेरा स्थान है, और आत्मा ही मेरा जन्म। मैं सबमें ओतप्रोत हूँ और अजर में प्रतिष्ठित हूँ। मैं अजन्मा, गतिशील और दिन-रात अथक हूँ; मुझे जानकर ज्ञानी प्रसन्न और शान्त रहता है।

श्लोक 31 (5.46.31)

अणोरणीयान्सुमनाः सर्वभूतेषु जाग्रति । पितरं सर्वभूतेषु पुष्करे निहितं विदुः ॥

aṇoraṇīyānsumanāḥ sarvabhūteṣu jāgrati | pitaraṃ sarvabhūteṣu puṣkare nihitaṃ viduḥ

वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और शुभ मन वाला है, और सब प्राणियों में जाग्रत् रहता है। ज्ञानी उसे सब प्राणियों का पिता जानते हैं, जो हृदय-कमल में स्थित है।

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