उद्योग पर्व · अध्याय 47
सञ्जय का कौरव-सभा में लौटना
विदुर और सनत्सुजात के उपदेश वाली रात के बाद सवेरा होने पर धृतराष्ट्र और कौरव राजकुमार सभा में एकत्र होते हैं, और सञ्जय पाण्डवों के पास से लौटकर उनकी ओर से सबका अभिवादन करते हैं। धृतराष्ट्र के पूछने पर कि श्रीकृष्ण ने क्या कहा, सञ्जय बताते हैं कि वे उस अन्तःपुर में कैसे गए जहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुन द्रौपदी और सत्यभामा के साथ विश्राम कर रहे थे, और नर-नारायण को एक साथ देखकर उन्हें कैसा विस्मय और भय हुआ। फिर वे कौरवों के लिए श्रीकृष्ण की चेतावनी सुनाते हैं — जब तक हो सके धन और परिवार का सुख भोग लो, क्योंकि द्रौपदी की पुकार का ऋण अब भी उनके हृदय पर है और अब तुम्हारा वैर उस अर्जुन से है जिसके साथ स्वयं श्रीकृष्ण हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.47.1)
एवं सनत्सुजातेन विदुरेण च धीमता । सार्धं कथयतो राज्ञः सा व्यतीयाय शर्वरी ॥
evaṃ sanatsujātena vidureṇa ca dhīmatā | sārdhaṃ kathayato rājñaḥ sā vyatīyāya śarvarī
इस प्रकार सनत्सुजात और बुद्धिमान् विदुर के साथ बातचीत करते-करते राजा की वह रात बीत गई।
श्लोक 2 (5.47.2)
तस्यां रजन्यां व्युष्टायां राजानः सर्व एव ते । सभामाविविशुर्हृष्टाः सूतस्योपदिदृक्षया ॥
tasyāṃ rajanyāṃ vyuṣṭāyāṃ rājānaḥ sarva eva te | sabhāmāviviśurhṛṣṭāḥ sūtasyopadidṛkṣayā
जब वह रात बीतकर सवेरा हुआ, तो सब राजा प्रसन्न मन से सूत सञ्जय को देखने की इच्छा से सभा में आ पहुँचे।
श्लोक 3 (5.47.3)
शुश्रूषमाणाः पार्थानां वाचो धर्मार्थसंहिताः । धृतराष्ट्रमुखाः सर्वे ययू राजन्सभां शुभाम् ॥
śuśrūṣamāṇāḥ pārthānāṃ vāco dharmārthasaṃhitāḥ | dhṛtarāṣṭramukhāḥ sarve yayū rājansabhāṃ śubhām
पाण्डवों के धर्म और अर्थ से भरे वचन सुनने की इच्छा से, हे राजन्, धृतराष्ट्र को आगे करके वे सब उस सुन्दर सभा में गए।
श्लोक 4 (5.47.4)
सुधावदातां विस्तीर्णां कनकाजिरभूषिताम् । चन्द्रप्रभां सुरुचिरां सिक्तां चन्दनवारिणा ॥
sudhāvadātāṃ vistīrṇāṃ kanakājirabhūṣitām | candraprabhāṃ surucirāṃ siktāṃ candanavāriṇā
वह सभा चूने के समान उजली और विशाल थी, उसका आँगन सोने से सजा था; वह चाँदनी-सी चमकती, अत्यन्त मनोहर थी और उस पर चन्दन-जल छिड़का हुआ था।
श्लोक 5 (5.47.5)
रुचिरैरासनैः स्तीर्णां काञ्चनैर्दारवैरपि । अश्मसारमयैर्दान्तैः स्वास्तीर्णैः सोत्तरच्छदैः ॥
rucirairāsanaiḥ stīrṇāṃ kāñcanairdāravairapi | aśmasāramayairdāntaiḥ svāstīrṇaiḥ sottaracchadaiḥ
उसमें सोने, लकड़ी, लोहे और हाथीदाँत के सुन्दर आसन रखे थे, जिन पर अच्छे बिछौने बिछे थे और ऊपर से चादरें डाली गई थीं।
श्लोक 6 (5.47.6)
भीष्मो द्रोणः कृपः शल्यः कृतवर्मा जयद्रथः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तश्च बाह्लिकः ॥
bhīṣmo droṇaḥ kṛpaḥ śalyaḥ kṛtavarmā jayadrathaḥ | aśvatthāmā vikarṇaśca somadattaśca bāhlikaḥ
भीष्म, द्रोण, कृप, शल्य, कृतवर्मा, जयद्रथ, अश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त और बाह्लीक,
श्लोक 7 (5.47.7)
विदुरश्च महाप्राज्ञो युयुत्सुश्च महारथः । सर्वे च सहिताः शूराः पार्थिवा भरतर्षभ । धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य विविशुस्तां सभां शुभाम् ॥
viduraśca mahāprājño yuyutsuśca mahārathaḥ | sarve ca sahitāḥ śūrāḥ pārthivā bharatarṣabha | dhṛtarāṣṭraṃ puraskṛtya viviśustāṃ sabhāṃ śubhām
महाबुद्धिमान् विदुर और महारथी युयुत्सु — हे भरतश्रेष्ठ, ये सब शूरवीर राजा एक साथ धृतराष्ट्र को आगे करके उस सुन्दर सभा में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 8 (5.47.8)
दुःशासनश्चित्रसेनः शकुनिश्चापि सौबलः । दुर्मुखो दुःसहः कर्ण उलूकोऽथ विविंशतिः ॥
duḥśāsanaścitrasenaḥ śakuniścāpi saubalaḥ | durmukho duḥsahaḥ karṇa ulūko'tha viviṃśatiḥ
दुःशासन, चित्रसेन, सुबलपुत्र शकुनि, दुर्मुख, दुःसह, कर्ण, उलूक और विविंशति —
श्लोक 9 (5.47.9)
कुरुराजं पुरस्कृत्य दुर्योधनममर्षणम् । विविशुस्तां सभां राजन्सुराः शक्रसदो यथा ॥
kururājaṃ puraskṛtya duryodhanamamarṣaṇam | viviśustāṃ sabhāṃ rājansurāḥ śakrasado yathā
हे राजन्, ये सब असहनशील कुरुराज दुर्योधन को आगे करके उस सभा में वैसे ही प्रविष्ट हुए, जैसे देवता इन्द्र के भवन में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 10 (5.47.10)
आविशद्भिस्तदा राजञ्शूरैः परिघबाहुभिः । शुशुभे सा सभा राजन्सिंहैरिव गिरेर्गुहा ॥
āviśadbhistadā rājañśūraiḥ parighabāhubhiḥ | śuśubhe sā sabhā rājansiṃhairiva girerguhā
हे राजन्, परिघ जैसी भुजाओं वाले उन शूरवीरों के प्रवेश करने पर वह सभा सिंहों से भरी पर्वत की गुफा के समान शोभा पाने लगी।
श्लोक 11 (5.47.11)
ते प्रविश्य महेष्वासाः सभां सर्वे महौजसः । आसनानि विचित्राणि भेजिरे सूर्यवर्चसः ॥
te praviśya maheṣvāsāḥ sabhāṃ sarve mahaujasaḥ | āsanāni vicitrāṇi bhejire sūryavarcasaḥ
सभा में प्रवेश करके वे सब महातेजस्वी, सूर्य के समान कान्तिमान् महाधनुर्धर रंग-बिरंगे आसनों पर बैठ गए।
श्लोक 12 (5.47.12)
आसनस्थेषु सर्वेषु तेषु राजसु भारत । द्वाःस्थो निवेदयामास सूतपुत्रमुपस्थितम् ॥
āsanastheṣu sarveṣu teṣu rājasu bhārata | dvāḥstho nivedayāmāsa sūtaputramupasthitam
हे भारत, जब वे सब राजा अपने-अपने आसनों पर बैठ गए, तब द्वारपाल ने सूचना दी कि सूतपुत्र सञ्जय आ पहुँचे हैं —
द्वाःस्थ उवाच
श्लोक 13 (5.47.13)
अयं सरथ आयाति योऽयासीत्पाण्डवान्प्रति । दूतो नस्तूर्णमायाति सैन्धवैः साधुवाहिभिः ॥
ayaṃ saratha āyāti yo'yāsītpāṇḍavānprati | dūto nastūrṇamāyāti saindhavaiḥ sādhuvāhibhiḥ
"यह वे रथ सहित आ रहे हैं, जो पाण्डवों के पास गए थे; हमारे दूत उत्तम सिन्धी घोड़ों से खिंचे रथ पर शीघ्रता से आ रहे हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (5.47.14)
उपेयाय स तु क्षिप्रं रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली । प्रविवेश सभां पूर्णां महीपालैर्महात्मभिः ॥
upeyāya sa tu kṣipraṃ rathātpraskandya kuṇḍalī | praviveśa sabhāṃ pūrṇāṃ mahīpālairmahātmabhiḥ
वे शीघ्रता से पास आए, रथ से कूदकर उतरे और कुण्डल धारण किए हुए महात्मा राजाओं से भरी उस सभा में प्रविष्ट हुए।
सञ्जय उवाच
श्लोक 15 (5.47.15)
प्राप्तोऽस्मि पाण्डवान्गत्वा तद्विजानीत कौरवाः । यथावयः कुरून्सर्वान्प्रतिनन्दन्ति पाण्डवाः ॥
prāpto'smi pāṇḍavāngatvā tadvijānīta kauravāḥ | yathāvayaḥ kurūnsarvānpratinandanti pāṇḍavāḥ
"हे कौरवो, जान लीजिए कि मैं पाण्डवों के पास जाकर लौट आया हूँ। पाण्डव सब कुरुवंशियों का उनकी आयु के अनुसार अभिनन्दन करते हैं।
श्लोक 16 (5.47.16)
अभिवादयन्ति वृद्धांश्च वयस्यांश्च वयस्यवत् । पुनश्चाभ्यवदन्पार्थाः प्रतिपूज्य यथावयः ॥
abhivādayanti vṛddhāṃśca vayasyāṃśca vayasyavat | punaścābhyavadanpārthāḥ pratipūjya yathāvayaḥ
वे बड़ों को प्रणाम करते हैं और समवयस्कों से मित्र की भाँति मिलते हैं; और फिर पार्थों ने आयु के अनुसार सबका सम्मान करते हुए उन्हें सन्देश कहा।
श्लोक 17 (5.47.17)
यथाहं धृतराष्ट्रेण शिष्टः पूर्वमितो गतः । अब्रवं पाण्डवान्गत्वा नात्र किञ्चन हापितम् ॥
yathāhaṃ dhṛtarāṣṭreṇa śiṣṭaḥ pūrvamito gataḥ | abravaṃ pāṇḍavāngatvā nātra kiñcana hāpitam
यहाँ से जाने से पहले धृतराष्ट्र ने मुझे जैसा सिखाया था, पाण्डवों के पास पहुँचकर मैंने वैसा ही कहा; उसमें कुछ भी छूटा नहीं।"
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 18 (5.47.18)
पृच्छामि त्वां सञ्जय राजमध्ये । यदब्रवीद्वाक्यमदीनसत्त्वः । जनार्दनस्तात युधां प्रणेता । दुरात्मनां जीवितच्छिन्महात्मा ॥
pṛcchāmi tvāṃ sañjaya rājamadhye | yadabravīdvākyamadīnasattvaḥ | janārdanastāta yudhāṃ praṇetā | durātmanāṃ jīvitacchinmahātmā
"हे सञ्जय, राजाओं के बीच मैं तुमसे पूछता हूँ — तात, कभी दीन न होने वाले, युद्धों के नायक, दुष्टों के प्राण हरने वाले महात्मा जनार्दन ने क्या कहा?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 19 (5.47.19)
आगुल्फेभ्योऽभिसंवीतः प्रयतोऽहं कृताञ्जलिः । शुद्धान्तं प्राविशं राजन्नाख्यातो नरसिंहयोः ॥
āgulphebhyo'bhisaṃvītaḥ prayato'haṃ kṛtāñjaliḥ | śuddhāntaṃ prāviśaṃ rājannākhyāto narasiṃhayoḥ
"हे राजन्, टखनों तक वस्त्र से ढका हुआ, संयत भाव से हाथ जोड़े, उन दोनों नरसिंहों को सूचना दिए जाने के बाद मैं अन्तःपुर में गया।
श्लोक 20 (5.47.20)
न चाभिमन्युर्न यमौ तं देशमभिजग्मतुः । यत्र कृष्णौ च कृष्णा च सत्यभामा च भामिनी ॥
na cābhimanyurna yamau taṃ deśamabhijagmatuḥ | yatra kṛṣṇau ca kṛṣṇā ca satyabhāmā ca bhāminī
जहाँ दोनों कृष्ण (श्रीकृष्ण और अर्जुन), कृष्णा (द्रौपदी) और मनस्विनी सत्यभामा थीं, उस स्थान पर न अभिमन्यु जाता था, न नकुल-सहदेव।
श्लोक 21 (5.47.21)
उभौ मध्वासवक्षीबौ वरचन्दनरूषितौ । स्रग्विणौ वरवस्त्राङ्गौ वराभरणभूषितौ ॥
ubhau madhvāsavakṣībau varacandanarūṣitau | sragviṇau varavastrāṅgau varābharaṇabhūṣitau
दोनों मधु से बनी मदिरा से मत्त थे, उत्तम चन्दन से चर्चित थे; दोनों मालाएँ और सुन्दर वस्त्र धारण किए थे और श्रेष्ठ आभूषणों से विभूषित थे।
श्लोक 22 (5.47.22)
नैकरत्नविचित्रं च काञ्चनं च वरासनम् । नानास्तरणसंस्तीर्णं यत्रासाते नरर्षभौ ॥
naikaratnavicitraṃ ca kāñcanaṃ ca varāsanam | nānāstaraṇasaṃstīrṇaṃ yatrāsāte nararṣabhau
वहाँ अनेक प्रकार के रत्नों से जड़ा, भाँति-भाँति के बिछौनों से ढका एक सुन्दर सोने का आसन था, जिस पर वे दोनों नरश्रेष्ठ बैठे थे।
श्लोक 23 (5.47.23)
सत्याङ्कमुपधानं तु कृत्वा शेते जनार्दनः । अर्जुनाङ्कगतौ पादौ केशवस्योपलक्षये । अर्जुनस्य च कृष्णायाः शुभायाश्चाङ्कगावुभौ ॥
satyāṅkamupadhānaṃ tu kṛtvā śete janārdanaḥ | arjunāṅkagatau pādau keśavasyopalakṣaye | arjunasya ca kṛṣṇāyāḥ śubhāyāścāṅkagāvubhau
जनार्दन सत्यभामा की गोद को तकिया बनाकर लेटे थे। मैंने देखा कि केशव के चरण अर्जुन की गोद में थे, और अर्जुन के दोनों चरण कृष्णा तथा सुन्दरी सत्यभामा की गोद में थे।
श्लोक 24 (5.47.24)
काञ्चनं पादपीठं तु पार्थो वै प्रादिशन्मुदा । दासीभ्यामाहृतं मह्यं स्पृष्ट्वा भूमावुपाविशम् ॥
kāñcanaṃ pādapīṭhaṃ tu pārtho vai prādiśanmudā | dāsībhyāmāhṛtaṃ mahyaṃ spṛṣṭvā bhūmāvupāviśam
पार्थ ने प्रसन्न होकर मुझे सोने की एक पादपीठ दिखाई, जिसे दो दासियाँ मेरे लिए लाई थीं; मैं उसे हाथ से छूकर भूमि पर ही बैठ गया।
श्लोक 25 (5.47.25)
ऊर्ध्वरेखाङ्कितौ पादौ पार्थस्य शुभलक्षणौ । पादपीठादपहृतौ धारयेतां वरस्त्रियौ ॥
ūrdhvarekhāṅkitau pādau pārthasya śubhalakṣaṇau | pādapīṭhādapahṛtau dhārayetāṃ varastriyau
पार्थ के ऊर्ध्वरेखाओं से अंकित, शुभ लक्षणों वाले चरण पादपीठ से हटाए गए थे, और उन्हें वे दोनों श्रेष्ठ नारियाँ थामे हुए थीं।
श्लोक 26 (5.47.26)
न नूनं कल्मषं किञ्चिन्मम कर्मसु विद्यते । स्त्रीरत्नाभ्यां समेतौ यन्मिथो मामभ्यभाषताम् ॥
na nūnaṃ kalmaṣaṃ kiñcinmama karmasu vidyate | strīratnābhyāṃ sametau yanmitho māmabhyabhāṣatām
निश्चय ही मेरे कर्मों में कोई दोष नहीं है, क्योंकि उन दो स्त्रीरत्नों के साथ बैठे उन दोनों ने मिलकर मुझसे बात की।
श्लोक 27 (5.47.27)
विस्मयो मे महानासीदास्त्रं मे बहुसङ्गतम् । हृष्टानि चैव रोमाणि दृष्ट्वा तौ सहितावुभौ ॥
vismayo me mahānāsīdāstraṃ me bahusaṅgatam | hṛṣṭāni caiva romāṇi dṛṣṭvā tau sahitāvubhau
मुझे बड़ा विस्मय हुआ, अनेक भाव एक साथ उमड़ आए; उन दोनों को एक साथ देखकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
श्लोक 28 (5.47.28)
श्यामौ बृहन्तौ तरुणौ नागाविव समुच्छ्रितौ । एकशय्यागतौ दृष्ट्वा भयं मे महदाविशत् ॥
śyāmau bṛhantau taruṇau nāgāviva samucchritau | ekaśayyāgatau dṛṣṭvā bhayaṃ me mahadāviśat
साँवले, विशालकाय, तरुण और हाथियों के समान ऊँचे उन दोनों को एक ही शय्या पर देखकर मेरे मन में बड़ा भय समा गया।
श्लोक 29 (5.47.29)
ततोऽभ्यचिन्तयं तत्र दृष्ट्वा तौ पुरुषर्षभौ । सङ्कल्पो धर्मराजस्य नानवाप्योऽस्ति कश्चन । निदेशगाविमौ यस्य नरनारायणावुभौ ॥
tato'bhyacintayaṃ tatra dṛṣṭvā tau puruṣarṣabhau | saṅkalpo dharmarājasya nānavāpyo'sti kaścana | nideśagāvimau yasya naranārāyaṇāvubhau
तब वहाँ उन दोनों पुरुषश्रेष्ठों को देखकर मैंने सोचा — धर्मराज का ऐसा कोई संकल्प नहीं जो पूरा न हो सके, क्योंकि ये दोनों नर और नारायण उनकी आज्ञा में चलते हैं।
श्लोक 30 (5.47.30)
सत्कृतश्चान्नपानाभ्यामाच्छन्नो लब्धसत्क्रियः । अञ्जलिं मूर्ध्नि सन्धाय सन्देशं चाभ्यचोदयम् ॥
satkṛtaścānnapānābhyāmācchanno labdhasatkriyaḥ | añjaliṃ mūrdhni sandhāya sandeśaṃ cābhyacodayam
अन्न और पान से सत्कार पाकर, वस्त्रों से सम्मानित होकर और उचित आदर पाकर, मैंने सिर पर हाथ जोड़कर अपना सन्देश सुनाया।
श्लोक 31 (5.47.31)
धनुर्धरोचितेनाथ पाणिनैकं सलक्षणम् । पादमानाययत्पार्थः केशवस्य यशस्विनः ॥
dhanurdharocitenātha pāṇinaikaṃ salakṣaṇam | pādamānāyayatpārthaḥ keśavasya yaśasvinaḥ
तब पार्थ ने धनुष धारण करने के अभ्यस्त अपने हाथ से यशस्वी केशव का शुभ लक्षणों वाला एक चरण अपनी ओर खींचा।
श्लोक 32 (5.47.32)
इन्द्रकेतुरिवोत्थाय दिव्याभरणभूषितः । इन्द्रवीर्योपमः कृष्णः संविष्टो माऽभ्यभाषत ॥
indraketurivotthāya divyābharaṇabhūṣitaḥ | indravīryopamaḥ kṛṣṇaḥ saṃviṣṭo mā'bhyabhāṣata
इन्द्रध्वज की भाँति उठकर, दिव्य आभूषणों से विभूषित, इन्द्र के समान पराक्रमी श्रीकृष्ण बैठ गए और मुझसे बोले।
श्लोक 33 (5.47.33)
स वाचं वदतां श्रेष्ठ आददे वचनक्षमाम् । दीपनीं धार्तराष्ट्राणां मृदुपूर्वां सुदारुणाम् ॥
sa vācaṃ vadatāṃ śreṣṭha ādade vacanakṣamām | dīpanīṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ mṛdupūrvāṃ sudāruṇām
बोलने वालों में श्रेष्ठ उन्होंने ऐसी वाणी कही जो कहने योग्य थी — धृतराष्ट्र के पुत्रों को उद्दीप्त करने वाली, आरम्भ में कोमल पर वास्तव में अत्यन्त कठोर।
श्लोक 34 (5.47.34)
बहिश्चरस्य प्राणस्य प्रियस्य प्रियकारिणः । मतिमान्मतिमास्थाय केशवः सन्दधे वचः ॥
bahiścarasya prāṇasya priyasya priyakāriṇaḥ | matimānmatimāsthāya keśavaḥ sandadhe vacaḥ
अपने प्रिय और प्रिय करने वाले अर्जुन के लिए, जो मानो उनके शरीर के बाहर विचरने वाले प्राण हैं, बुद्धिमान् केशव ने सोच-विचारकर अपने वचन रचे।
श्लोक 35 (5.47.35)
वचनं वचनज्ञस्य शिक्षाक्षरसमन्वितम् । मनःप्रह्लादनं श्रेष्ठं पश्चाद्धृदयतापनम् ॥
vacanaṃ vacanajñasya śikṣākṣarasamanvitam | manaḥprahlādanaṃ śreṣṭhaṃ paścāddhṛdayatāpanam
वे वाणी के मर्मज्ञ के वचन थे — शिक्षा के अनुसार शुद्ध अक्षरों से युक्त, उत्तम, पहले मन को आनन्दित करने वाले, पर बाद में हृदय को जलाने वाले।"
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 36 (5.47.36)
सञ्जयैतद्वचो ब्रूयाः प्राप्य क्षत्रियसंसदम् । शृण्वतः कुरुवृद्धस्य आचार्यस्य च धीमतः ॥
sañjayaitadvaco brūyāḥ prāpya kṣatriyasaṃsadam | śṛṇvataḥ kuruvṛddhasya ācāryasya ca dhīmataḥ
"सञ्जय, क्षत्रियों की सभा में पहुँचकर कुरुकुल के वृद्ध (भीष्म) और बुद्धिमान् आचार्य (द्रोण) के सुनते हुए यह बात कहना —
श्लोक 37 (5.47.37)
अर्थांस्त्यजत पार्थेषु सुखमाप्नुत कामजम् । प्रियं प्रियेभ्यश्चरत राजा हि त्वरते जये ॥
arthāṃstyajata pārtheṣu sukhamāpnuta kāmajam | priyaṃ priyebhyaścarata rājā hi tvarate jaye
अपना धन पार्थों के लिए छोड़ दो और कामनाओं से मिलने वाला सुख भोग लो; अपने प्रियजनों का प्रिय कर लो, क्योंकि राजा युधिष्ठिर विजय के लिए उतावले हैं।
श्लोक 38 (5.47.38)
यजध्वं विविधैर्यज्ञैर्दक्षिणाश्च प्रयच्छत । पुत्रैर्दारैश्च मोदध्वमागतं वो महद्भयम् ॥
yajadhvaṃ vividhairyajñairdakṣiṇāśca prayacchata | putrairdāraiśca modadhvamāgataṃ vo mahadbhayam
अनेक प्रकार के यज्ञ करो और दक्षिणाएँ दो; पुत्रों और पत्नियों के साथ आनन्द मना लो, क्योंकि तुम पर बड़ा भय आ पहुँचा है।
श्लोक 39 (5.47.39)
ऋणं प्रवृद्धमिव मे हृदयान्नापसर्पति । गोविन्देति यदाक्रन्दत्कृष्णा मां दूरवासिनम् ॥
ṛṇaṃ pravṛddhamiva me hṛdayānnāpasarpati | govindeti yadākrandatkṛṣṇā māṃ dūravāsinam
बढ़े हुए ऋण की तरह यह बात मेरे हृदय से नहीं हटती कि जब मैं दूर था, तब कृष्णा ने 'गोविन्द!' कहकर मुझे पुकारा था।
श्लोक 40 (5.47.40)
तेजोमयं दुराधर्षं बिभ्रता गाण्डिवं धनुः । मद्द्वितीयेन पार्थेन वैरं वः प्रत्युपस्थितम् ॥
tejomayaṃ durādharṣaṃ bibhratā gāṇḍivaṃ dhanuḥ | maddvitīyena pārthena vairaṃ vaḥ pratyupasthitam
तेजोमय, दुर्जय गाण्डीव धनुष धारण करने वाले और मुझे अपना साथी बनाए हुए पार्थ से तुम्हारा वैर अब सामने आ खड़ा हुआ है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 41 (5.47.41)
कृष्णस्यैतद्वचः श्रुत्वा महन्मे भयमाविशत् । तव पुत्रस्य लोभं च वर्धमानं प्रपश्यतः ॥
kṛṣṇasyaitadvacaḥ śrutvā mahanme bhayamāviśat | tava putrasya lobhaṃ ca vardhamānaṃ prapaśyataḥ
"श्रीकृष्ण के ये वचन सुनकर और आपके पुत्र का लोभ बढ़ता हुआ देखकर मेरे मन में बड़ा भय समा गया।
श्लोक 42 (5.47.42)
सोमेन्द्रसदृशौ वीरौ तौ मन्दो नावबुध्यते । भीष्मद्रोणाश्रयाच्चैव कर्णस्य च विकत्थनात् ॥
somendrasadṛśau vīrau tau mando nāvabudhyate | bhīṣmadroṇāśrayāccaiva karṇasya ca vikatthanāt
ये दोनों वीर सोम और इन्द्र के समान हैं, पर वह मन्दबुद्धि भीष्म और द्रोण के आश्रय तथा कर्ण की डींगों के भरोसे यह नहीं समझता।"