उद्योग पर्व · अध्याय 48
दुर्योधन के लिए अर्जुन का संदेश
राजाओं की सभा में धृतराष्ट्र के पूछने पर संजय वह संदेश सुनाते हैं जो अर्जुन ने कृष्ण की उपस्थिति में उन्हें दिया था। एक-एक श्लोक में अर्जुन बताते हैं कि जब दुर्योधन युधिष्ठिर के क्रोध, भीम की गदा, नकुल-सहदेव, युवा राजकुमारों, विराट, द्रुपद, शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, सात्यकि और स्वयं अर्जुन के गाण्डीव का पराक्रम देखेगा, तब वह युद्ध के लिए पछताएगा। वे बताते हैं कि उन्होंने इन्द्र के स्थान पर कृष्ण को सहायक चुना, रुक्मिणी-हरण से लेकर नरकासुर-वध तक कृष्ण के पराक्रम गिनाते हैं, और कहते हैं कि सभी शकुन पाण्डवों की विजय बता रहे हैं। अंत में वे बड़ों की सलाह के अनुसार कौरवों के दीर्घायु होने की कामना करते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (5.48.1)
पृच्छामि त्वां सञ्जय राजमध्ये । किमब्रवीद्वाक्यमदीनसत्त्वः । धनञ्जयस्तात युधां प्रणेता । दुरात्मनां जीवितच्छिन्महात्मा ॥
pṛcchāmi tvāṃ sañjaya rājamadhye | kimabravīdvākyamadīnasattvaḥ | dhanañjayastāta yudhāṃ praṇetā | durātmanāṃ jīvitacchinmahātmā
"हे संजय, राजाओं के बीच मैं तुमसे पूछता हूँ — हे तात, अदीन पराक्रम वाले, योद्धाओं के नायक, दुष्टात्माओं के प्राण हरने वाले महात्मा धनंजय ने क्या कहा?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 2 (5.48.2)
दुर्योधनो वाचमिमां शृणोतु । यदब्रवीदर्जुनो योत्स्यमानः । युधिष्ठिरस्यानुमते महात्मा । धनञ्जयः शृण्वतः केशवस्य ॥
duryodhano vācamimāṃ śṛṇotu | yadabravīdarjuno yotsyamānaḥ | yudhiṣṭhirasyānumate mahātmā | dhanañjayaḥ śṛṇvataḥ keśavasya
"दुर्योधन वे वचन सुने जो युद्ध के लिए उद्यत अर्जुन ने कहे — युधिष्ठिर की अनुमति से महात्मा धनंजय ने केशव के सुनते हुए जो कहा।"
श्लोक 3 (5.48.3)
अवित्रस्तो बाहुवीर्यं विजान- । न्नुपह्वरे वासुदेवस्य धीरः । अवोचन्मां योत्स्यमानः किरीटी । मध्ये ब्रूया धार्तराष्ट्रं कुरूणाम् ॥
avitrasto bāhuvīryaṃ vijāna- | nnupahvare vāsudevasya dhīraḥ | avocanmāṃ yotsyamānaḥ kirīṭī | madhye brūyā dhārtarāṣṭraṃ kurūṇām
"अपनी भुजाओं के बल को जानते हुए, निर्भय और धीर किरीटी ने युद्ध के लिए उद्यत होकर वासुदेव के पास ही मुझसे कहा — 'कौरवों के बीच धृतराष्ट्र के पुत्र से यह कहना —'"
अर्जुन उवाच
श्लोक 4 (5.48.4)
संशृण्वतस्तस्य दुर्भाषिणो वै । दुरात्मनः सूतपुत्रस्य सूत । यो योद्धुमाशंसति मां सदैव । मन्दप्रज्ञः कालपक्वोऽतिमूढः ॥
saṃśṛṇvatastasya durbhāṣiṇo vai | durātmanaḥ sūtaputrasya sūta | yo yoddhumāśaṃsati māṃ sadaiva | mandaprajñaḥ kālapakvo'timūḍhaḥ
"— हे सूत, उस कटुभाषी दुष्टात्मा सूतपुत्र के सुनते हुए, जो मन्दबुद्धि, अत्यन्त मूढ़ और काल का पका हुआ है, और जो सदा मुझसे लड़ने की इच्छा रखता है,"
श्लोक 5 (5.48.5)
ये वै राजानः पाण्डवायोधनाय । समानीताः शृण्वतां चापि तेषाम् । यथा समग्रं वचनं मयोक्तं । सहामात्यं श्रावयेथा नृपं तत ॥
ye vai rājānaḥ pāṇḍavāyodhanāya | samānītāḥ śṛṇvatāṃ cāpi teṣām | yathā samagraṃ vacanaṃ mayoktaṃ | sahāmātyaṃ śrāvayethā nṛpaṃ tata
"और उन राजाओं के भी सुनते हुए, जो पाण्डवों से युद्ध करने के लिए एकत्र किए गए हैं — हे तात, मैंने जो वचन कहा है, उसे पूरा-का-पूरा, जैसा का तैसा, मन्त्रियों सहित राजा को सुना देना।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 6 (5.48.6)
यथा नूनं देवराजस्य देवाः । शुश्रूषन्ते वज्रहस्तस्य सर्वे । तथाऽशृण्वन्पाण्डवाः सृञ्जयाश्च । किरीटिना वाचमुक्तां समर्थाम् ॥
yathā nūnaṃ devarājasya devāḥ | śuśrūṣante vajrahastasya sarve | tathā'śṛṇvanpāṇḍavāḥ sṛñjayāśca | kirīṭinā vācamuktāṃ samarthām
"जैसे सब देवता वज्रधारी देवराज की बात ध्यान से सुनते हैं, वैसे ही पाण्डवों और सृंजयों ने किरीटी के कहे हुए सारगर्भित वचन सुने।"
श्लोक 7 (5.48.7)
इत्यब्रवीदर्जुनो योत्स्यमानो । गाण्डीवधन्वा लोहितपद्मनेत्रः । न चेद्राज्यं मुञ्चति धार्तराष्ट्रो । युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः ॥
ityabravīdarjuno yotsyamāno | gāṇḍīvadhanvā lohitapadmanetraḥ | na cedrājyaṃ muñcati dhārtarāṣṭro | yudhiṣṭhirasyājamīḍhasya rājñaḥ
"युद्ध के लिए उद्यत, गाण्डीवधारी, लाल कमल जैसे नेत्रों वाले अर्जुन ने यह कहा — 'यदि धृतराष्ट्र का पुत्र अजमीढवंशी राजा युधिष्ठिर का राज्य नहीं छोड़ता,'"
अर्जुन उवाच
श्लोक 8 (5.48.8)
अस्ति नूनं कर्म कृतं पुरस्ता- । दनिर्विष्टं पापकं धार्तराष्ट्रैः । येषां युद्धं भीमसेनार्जुनाभ्यां । तथाश्विभ्यां वासुदेवेन चैव ॥
asti nūnaṃ karma kṛtaṃ purastā- | danirviṣṭaṃ pāpakaṃ dhārtarāṣṭraiḥ | yeṣāṃ yuddhaṃ bhīmasenārjunābhyāṃ | tathāśvibhyāṃ vāsudevena caiva
"तो निश्चय ही धृतराष्ट्र के पुत्रों ने पहले कोई ऐसा पाप किया है जिसका फल अभी भोगा नहीं गया — क्योंकि उन्हें भीमसेन और अर्जुन से, अश्विनीकुमारों के दोनों पुत्रों से और वासुदेव से युद्ध करना है;"
श्लोक 9 (5.48.9)
शैनेयेन ध्रुवमात्तायुधेन । धृष्टद्युम्नेनाथ शिखण्डिना च । युधिष्ठिरेणेन्द्रकल्पेन चैव । योऽपध्यानान्निर्दहेद्गां दिवं च ॥
śaineyena dhruvamāttāyudhena | dhṛṣṭadyumnenātha śikhaṇḍinā ca | yudhiṣṭhireṇendrakalpena caiva | yo'padhyānānnirdahedgāṃ divaṃ ca
"निश्चय ही शस्त्र उठाए हुए शैनेय (सात्यकि) से, धृष्टद्युम्न और शिखण्डी से, और इन्द्र के समान उन युधिष्ठिर से, जो केवल अनिष्ट-चिन्तन से ही पृथ्वी और आकाश को भस्म कर सकते हैं।"
श्लोक 10 (5.48.10)
तैश्चेद्योद्धुं मन्यते धार्तराष्ट्रो । निर्वृत्तोऽर्थः सकलः पाण्डवानाम् । मा तत्कार्षीः पाण्डवस्यार्थहेतो- । रुपैहि युद्धं यदि मन्यसे त्वम् ॥
taiścedyoddhuṃ manyate dhārtarāṣṭro | nirvṛtto'rthaḥ sakalaḥ pāṇḍavānām | mā tatkārṣīḥ pāṇḍavasyārthaheto- | rupaihi yuddhaṃ yadi manyase tvam
"यदि धृतराष्ट्र का पुत्र इनसे युद्ध करने की सोचता है, तो पाण्डवों का सारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका। तब पाण्डव के हित के लिए वह (राज्य लौटाने का) काम मत करो; यदि तुम ठीक समझते हो तो युद्ध के लिए आ जाओ।"
श्लोक 11 (5.48.11)
यां तां वने दुःखशय्यामवात्सी- । त्प्रव्राजितः पाण्डवो धर्मचारी । आप्नोतु तां दुःखतरामनर्था- । मन्त्यां शय्यां धार्तराष्ट्रः परासुः ॥
yāṃ tāṃ vane duḥkhaśayyāmavātsī- | tpravrājitaḥ pāṇḍavo dharmacārī | āpnotu tāṃ duḥkhatarāmanarthā- | mantyāṃ śayyāṃ dhārtarāṣṭraḥ parāsuḥ
"धर्मात्मा पाण्डव ने वनवासी होकर वन में जिस दुःखभरी शय्या पर निवास किया, उससे भी अधिक दुःखदायी, अनर्थभरी, अन्तिम शय्या को धृतराष्ट्र का पुत्र प्राणहीन होकर प्राप्त करे।"
श्लोक 12 (5.48.12)
ह्रिया ज्ञानेन तपसा दमेन । शौर्येणाथो धर्मगुप्त्या धनेन । अन्यायवृत्तिः कुरु पाण्डवे या- । नध्यातिष्ठद्धार्तराष्ट्रो दुरात्मा ॥
hriyā jñānena tapasā damena | śauryeṇātho dharmaguptyā dhanena | anyāyavṛttiḥ kuru pāṇḍave yā- | nadhyātiṣṭhaddhārtarāṣṭro durātmā
"अन्यायपूर्ण आचरण वाले दुष्टात्मा धृतराष्ट्रपुत्र ने जिन लोगों पर अधिकार जमा रखा है, उन्हें लज्जा, ज्ञान, तप, संयम, शौर्य, धर्म-रक्षा और धन से सम्पन्न पाण्डव के प्रति अनुरक्त कर दो।"
श्लोक 13 (5.48.13)
मायोपधं प्रणिधानार्जवाभ्यां । तपोदमाभ्यां धर्मगुप्त्या बलेन । सत्यं ब्रुवन्प्रतिपन्नो नृपो न- । स्तितिक्षमाणः क्लिश्यमानोऽतिवेलम् ॥
māyopadhaṃ praṇidhānārjavābhyāṃ | tapodamābhyāṃ dharmaguptyā balena | satyaṃ bruvanpratipanno nṛpo na- | stitikṣamāṇaḥ kliśyamāno'tivelam
"हमारे राजा छल-कपट का सामना करके भी, संकल्प और सरलता, तप और संयम, धर्म-रक्षा और बल से युक्त रहकर, सत्य बोलते हुए, अत्यधिक क्लेश पाकर भी धैर्यपूर्वक सब सह रहे हैं।"
श्लोक 14 (5.48.14)
यदा ज्येष्ठः पाण्डवः संशितात्मा । क्रोधं यत्तं वर्षपूगान्सुघोरम् । अवस्रष्टा कुरुषूद्वृत्तचेता- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā jyeṣṭhaḥ pāṇḍavaḥ saṃśitātmā | krodhaṃ yattaṃ varṣapūgānsughoram | avasraṣṭā kuruṣūdvṛttacetā- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब संयमी आत्मा वाले ज्येष्ठ पाण्डव, उत्तेजित चित्त होकर, वर्षों से रोके हुए अपने भयंकर क्रोध को कौरवों पर छोड़ेंगे, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 15 (5.48.15)
कृष्णवर्त्मेव ज्वलितः समिद्धो । यथा दहेत्कक्षमग्निर्निदाघे । एवं दग्धा धार्तराष्ट्रस्य सेनां । युधिष्ठिरः क्रोधदीप्तोऽन्ववेक्ष्य ॥
kṛṣṇavartmeva jvalitaḥ samiddho | yathā dahetkakṣamagnirnidāghe | evaṃ dagdhā dhārtarāṣṭrasya senāṃ | yudhiṣṭhiraḥ krodhadīpto'nvavekṣya
"जैसे अपने मार्ग को काला कर देने वाली, धधकती, प्रज्वलित अग्नि ग्रीष्म में सूखी झाड़ियों को जला डालती है, वैसे ही क्रोध से दीप्त युधिष्ठिर धृतराष्ट्रपुत्र की सेना पर दृष्टि डालकर ही उसे भस्म कर देंगे।"
श्लोक 16 (5.48.16)
यदा द्रष्टा भीमसेनं रथस्थं । गदाहस्तं क्रोधविषं वमन्तम् । अमर्षणं पाण्डवं भीमवेगं । तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā draṣṭā bhīmasenaṃ rathasthaṃ | gadāhastaṃ krodhaviṣaṃ vamantam | amarṣaṇaṃ pāṇḍavaṃ bhīmavegaṃ | tadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वह रथ पर खड़े, हाथ में गदा लिए, क्रोध का विष उगलते हुए, असहिष्णु और भयंकर वेग वाले पाण्डव भीमसेन को देखेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 17 (5.48.17)
सेनाग्रगं दंशितं भीमसेनं । सुलक्षणं वीरहणं परेषाम् । घ्नन्तं चमूमन्तकसन्निकाशं । तदा स्मर्ता वचनस्यातिमानी ॥
senāgragaṃ daṃśitaṃ bhīmasenaṃ | sulakṣaṇaṃ vīrahaṇaṃ pareṣām | ghnantaṃ camūmantakasannikāśaṃ | tadā smartā vacanasyātimānī
"जब वह सेना के अग्रभाग में कवच धारण किए, शुभ लक्षणों वाले, शत्रु-वीरों के संहारक भीमसेन को यमराज के समान सेना का संहार करते देखेगा, तब वह अभिमानी इन वचनों को याद करेगा।"
श्लोक 18 (5.48.18)
यदा द्रष्टा भीमसेनेन नागा- । न्निपातितान्गिरिकूटप्रकाशान् । कुम्भैरिवासृग्वमतो भिन्नकुम्भां- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā draṣṭā bhīmasenena nāgā- | nnipātitāngirikūṭaprakāśān | kumbhairivāsṛgvamato bhinnakumbhāṃ- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वह भीमसेन द्वारा गिराए गए, पर्वत-शिखरों जैसे विशाल हाथियों को देखेगा, जिनके कुम्भस्थल फट गए हैं और जो घड़ों की तरह रक्त उँडेल रहे हैं, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 19 (5.48.19)
महासिंहो गा इव संप्रविश्य । गदापाणिर्धार्तराष्ट्रानुपेत्य । यदा भीमो भीमरूपो निहन्ता । तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
mahāsiṃho gā iva saṃpraviśya | gadāpāṇirdhārtarāṣṭrānupetya | yadā bhīmo bhīmarūpo nihantā | tadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब भयंकर रूप वाले भीम हाथ में गदा लेकर, गायों के बीच घुसे महान् सिंह की भाँति धृतराष्ट्र के पुत्रों पर टूट पड़ेंगे और उनका वध करेंगे, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 20 (5.48.20)
महाभये वीतभयः कृतास्त्रः । समागमे शत्रुबलावमर्दी । सकृद्रथेनाप्रतिमान्रथौघा- । न्पदातिसङ्घान्गदयाभिनिघ्नन् ॥
mahābhaye vītabhayaḥ kṛtāstraḥ | samāgame śatrubalāvamardī | sakṛdrathenāpratimānrathaughā- | npadātisaṅghāngadayābhinighnan
"महान् भय में भी निर्भय, अस्त्रविद्या में निपुण, संग्राम में शत्रु-सेना को कुचलने वाले भीम, एक ही बार रथ से धावा करके, अनुपम रथ-समूहों और पैदल सैनिकों के झुंडों को गदा से मारते हुए,"
श्लोक 21 (5.48.21)
सैन्याननेकांस्तरसा विगृह्ण- । न्यदा छेत्ता धार्तराष्ट्रस्य सैन्यम् । छिन्दन्वनं परशुनेव शूर- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
sainyānanekāṃstarasā vigṛhṇa- | nyadā chettā dhārtarāṣṭrasya sainyam | chindanvanaṃ paraśuneva śūra- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"अनेक सैन्य-दलों को बलपूर्वक दबोचते हुए, जब वह वीर कुल्हाड़ी से वन काटने की भाँति धृतराष्ट्रपुत्र की सेना को काट डालेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 22 (5.48.22)
तृणप्रायं ज्वलनेनेव दग्धं । ग्रामं यथा धार्तराष्ट्रान्समीक्ष्य । पक्वं सस्यं वैद्युतेनेव दग्धं । परासिक्तं विपुलं स्वं बलौघम् ॥
tṛṇaprāyaṃ jvalaneneva dagdhaṃ | grāmaṃ yathā dhārtarāṣṭrānsamīkṣya | pakvaṃ sasyaṃ vaidyuteneva dagdhaṃ | parāsiktaṃ vipulaṃ svaṃ balaugham
"धृतराष्ट्र के पुत्रों को आग से जले फूस के घरों वाले गाँव की तरह, और अपनी विशाल सेना को बिजली से जली पकी फसल की तरह दूर-दूर बिखरी हुई देखकर —"
श्लोक 23 (5.48.23)
हतप्रवीरं विमुखं भयार्तं । पराङ्मुखं प्रायशोऽनष्टयोधम् । शस्त्रार्चिषा भीमसेनेन दग्धं । तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
hatapravīraṃ vimukhaṃ bhayārtaṃ | parāṅmukhaṃ prāyaśo'naṣṭayodham | śastrārciṣā bhīmasenena dagdhaṃ | tadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जिसके प्रमुख वीर मारे गए हैं, जो विमुख और भय से पीड़ित होकर पीठ दिखा रही है, यद्यपि उसके अधिकांश योद्धा अभी नष्ट नहीं हुए, और जो भीमसेन के शस्त्रों की ज्वाला से जल रही है — तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 24 (5.48.24)
उपासङ्गानाचरेद्दक्षिणेन । वराङ्गानां नकुलश्चित्रयोधी । यदा रथाग्र्यो रथिनः प्रचेता । तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
upāsaṅgānācareddakṣiṇena | varāṅgānāṃ nakulaścitrayodhī | yadā rathāgryo rathinaḥ pracetā | tadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब विचित्र रीति से युद्ध करने वाले, रथियों में श्रेष्ठ नकुल सहज ही सिरों के ढेर लगा देंगे और रथियों को ढेर कर देंगे, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 25 (5.48.25)
सुखोचितो दुःखशय्यां वनेषु । दीर्घं कालं नकुलो यामशेत । आशीविषः क्रुद्ध इवोद्वमन्विषं । तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
sukhocito duḥkhaśayyāṃ vaneṣu | dīrghaṃ kālaṃ nakulo yāmaśeta | āśīviṣaḥ kruddha ivodvamanviṣaṃ | tadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"सुख के योग्य नकुल ने वनों में बहुत समय तक जिस दुःखभरी शय्या पर शयन किया, जब वे उसे याद करके क्रुद्ध सर्प की भाँति विष उगलेंगे, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 26 (5.48.26)
त्यक्तात्मानः पार्थिवायोधनाय । समादिष्टा धर्मराजेन सूत । रथैः शुभ्रैः सैन्यमभिद्रवन्तो । दृष्ट्वा पश्चात्तप्स्यते धार्तराष्ट्रः ॥
tyaktātmānaḥ pārthivāyodhanāya | samādiṣṭā dharmarājena sūta | rathaiḥ śubhraiḥ sainyamabhidravanto | dṛṣṭvā paścāttapsyate dhārtarāṣṭraḥ
"हे सूत, राजाओं के इस युद्ध के लिए प्राणों का मोह छोड़ चुके वीरों को धर्मराज की आज्ञा से उज्ज्वल रथों पर अपनी सेना पर धावा करते देखकर धृतराष्ट्र का पुत्र बाद में पछताएगा।"
श्लोक 27 (5.48.27)
शिशून्कृतास्त्रानशिशुप्रकाशान् । यदा द्रष्टा कौरवः पञ्च शूरान् । त्यक्त्वा प्राणान्कौरवानाद्रवन्त- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
śiśūnkṛtāstrānaśiśuprakāśān | yadā draṣṭā kauravaḥ pañca śūrān | tyaktvā prāṇānkauravānādravanta- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वह कौरव उन पाँच शूरवीरों को, जो आयु में बालक हैं पर बालकों जैसे नहीं और अस्त्रविद्या में निपुण हैं, प्राणों का मोह छोड़कर कौरवों पर टूटते देखेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 28 (5.48.28)
यथा शक्रो दानवनाशनार्थं । सुवर्णतारं रथमुत्तमाश्वैः । दान्तैर्युक्तं सहदेवोऽधिरूढः । शिरांसि राज्ञां क्षेप्स्यते मार्गणौघैः ॥
yathā śakro dānavanāśanārthaṃ | suvarṇatāraṃ rathamuttamāśvaiḥ | dāntairyuktaṃ sahadevo'dhirūḍhaḥ | śirāṃsi rājñāṃ kṣepsyate mārgaṇaughaiḥ
"जब सहदेव दानवों के विनाश के लिए निकले इन्द्र की भाँति, उत्तम और सधे हुए घोड़ों से जुते, सुनहरी रेखा-सी चमक वाले रथ पर आरूढ़ होकर बाणों की बौछार से राजाओं के सिर गिराएँगे,"
श्लोक 29 (5.48.29)
महाभये संप्रवृत्ते रथस्थं । विवर्तमानं समरे कृतास्त्रम् । सर्वा दिशः संपतन्तं समीक्ष्य । तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
mahābhaye saṃpravṛtte rathasthaṃ | vivartamānaṃ samare kṛtāstram | sarvā diśaḥ saṃpatantaṃ samīkṣya | tadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब महाभय छिड़ जाने पर वह रथ पर बैठे, रणभूमि में चक्कर काटते, सब दिशाओं में झपटते उस अस्त्रविद् को देखेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 30 (5.48.30)
ह्रीनिषेवो निपुणः सत्यवादी । महाबलः सर्वधर्मोपपन्नः । गान्धारिमार्छंस्तुमुले क्षिप्रकारी । क्षेप्ता जनान्सहदेवस्तरस्वी ॥
hrīniṣevo nipuṇaḥ satyavādī | mahābalaḥ sarvadharmopapannaḥ | gāndhārimārchaṃstumule kṣiprakārī | kṣeptā janānsahadevastarasvī
"लज्जाशील, निपुण, सत्यवादी, महाबली, सब धर्मों से सम्पन्न, फुर्ती से काम करने वाले और वेगवान् सहदेव घमासान युद्ध में गान्धारी के पुत्र पर टूटकर उसके लोगों को तितर-बितर कर देंगे।"
श्लोक 31 (5.48.31)
यदा द्रष्टा द्रौपदेयान्महेषून् । शूरान्कृतास्त्रान्रथयुद्धकोविदान् । आशीविषान्घोरविषानिवायत- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā draṣṭā draupadeyānmaheṣūn | śūrānkṛtāstrānrathayuddhakovidān | āśīviṣānghoraviṣānivāyata- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वह महाधनुर्धर, शूरवीर, अस्त्रविद्या में निपुण और रथयुद्ध के ज्ञाता द्रौपदी-पुत्रों को घोर विषैले सर्पों की भाँति आते देखेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 32 (5.48.32)
यदाभिमन्युः परवीरघाती । शरैः परान्मेघ इवाभिवर्षन् । विगाहिता कृष्णसमः कृतास्त्र- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadābhimanyuḥ paravīraghātī | śaraiḥ parānmegha ivābhivarṣan | vigāhitā kṛṣṇasamaḥ kṛtāstra- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब शत्रुवीरों का संहार करने वाले, कृष्ण के समान अस्त्रविद् अभिमन्यु मेघ की भाँति शत्रुओं पर बाण बरसाते हुए उनकी सेना में घुसेंगे, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 33 (5.48.33)
यदा द्रष्टा बालमबालवीर्यं । द्विषच्चमूं मृत्युमिवोत्पतन्तम् । सौभद्रमिन्द्रप्रतिमं कृतास्त्रं । तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā draṣṭā bālamabālavīryaṃ | dviṣaccamūṃ mṛtyumivotpatantam | saubhadramindrapratimaṃ kṛtāstraṃ | tadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वह सुभद्रा के पुत्र को — जो बालक होकर भी बालकों जैसे पराक्रम वाला नहीं, इन्द्र के समान और अस्त्रविद्या में निपुण है — शत्रु-सेना पर मृत्यु की भाँति टूटते देखेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 34 (5.48.34)
प्रभद्रकाः शीघ्रतरा युवानो । विशारदाः सिंहसमानवीर्याः । यदा क्षेप्तारो धार्तराष्ट्रान्ससैन्यां- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
prabhadrakāḥ śīghratarā yuvāno | viśāradāḥ siṃhasamānavīryāḥ | yadā kṣeptāro dhārtarāṣṭrānsasainyāṃ- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब शीघ्रगामी, कुशल, सिंह के समान पराक्रमी युवा प्रभद्रक सेनाओं सहित धृतराष्ट्र के पुत्रों को खदेड़ देंगे, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 35 (5.48.35)
वृद्धौ विराटद्रुपदौ महारथौ । पृथक्चमूभ्यामभिवर्तमानौ । यदा द्रष्टारौ धार्तराष्ट्रान्ससैन्यां- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
vṛddhau virāṭadrupadau mahārathau | pṛthakcamūbhyāmabhivartamānau | yadā draṣṭārau dhārtarāṣṭrānsasainyāṃ- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वृद्ध महारथी विराट और द्रुपद अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आगे बढ़ते हुए सेनाओं सहित धृतराष्ट्र के पुत्रों का सामना करेंगे, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 36 (5.48.36)
यदा कृतास्त्रो द्रुपदः प्रचिन्वन् । शिरांसि यूनां समरे रथस्थः । क्रुद्धः शरैश्छेत्स्यति चापमुक्तै- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā kṛtāstro drupadaḥ pracinvan | śirāṃsi yūnāṃ samare rathasthaḥ | kruddhaḥ śaraiśchetsyati cāpamuktai- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब अस्त्रविद् द्रुपद रथ पर खड़े होकर, युद्ध में युवा योद्धाओं के सिरों को चुन-चुनकर, क्रोध से धनुष से छोड़े बाणों द्वारा काटेंगे, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 37 (5.48.37)
यदा विराटः परवीरघाती । रथान्तरे शत्रुचमूं प्रवेष्टा । मात्स्यैः सार्धमनृशंसरूपै- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā virāṭaḥ paravīraghātī | rathāntare śatrucamūṃ praveṣṭā | mātsyaiḥ sārdhamanṛśaṃsarūpai- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब शत्रुवीरों का संहार करने वाले विराट सौम्य स्वभाव वाले मत्स्य योद्धाओं के साथ रथों के बीच से शत्रु-सेना में घुसेंगे, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 38 (5.48.38)
ज्येष्ठं मात्स्यमनृशंसार्यरूपं । विराटपुत्रं रथिनं पुरस्तात् । यदा द्रष्टा दंशितं पाण्डवार्थे । तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
jyeṣṭhaṃ mātsyamanṛśaṃsāryarūpaṃ | virāṭaputraṃ rathinaṃ purastāt | yadā draṣṭā daṃśitaṃ pāṇḍavārthe | tadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वह मत्स्यों के ज्येष्ठ राजकुमार, विराट के पुत्र, सौम्य और श्रेष्ठ स्वभाव वाले रथी को पाण्डवों के लिए कवच धारण किए सबसे आगे देखेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 39 (5.48.39)
रणे हते कौरवाणां प्रवीरे । शिखण्डिना शन्तनोर्वै तनूजे । न जातु नः शत्रवो धारयेयु- । रसंशयं सत्यमेतद्ब्रवीमि ॥
raṇe hate kauravāṇāṃ pravīre | śikhaṇḍinā śantanorvai tanūje | na jātu naḥ śatravo dhārayeyu- | rasaṃśayaṃ satyametadbravīmi
"जब युद्ध में कौरवों के प्रमुख वीर शान्तनुनन्दन शिखण्डी द्वारा मारे जाएँगे, तब हमारे शत्रु किसी प्रकार जीवित नहीं रहेंगे। मैं यह निःसंदेह सत्य कहता हूँ।"
श्लोक 40 (5.48.40)
यदा शिखण्डी रथिनः प्रचिन्वन् । भीष्मं रथेनाभियाता वरूथी । दिव्यैर्हयैरवमृद्गन् रथौघां- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā śikhaṇḍī rathinaḥ pracinvan | bhīṣmaṃ rathenābhiyātā varūthī | divyairhayairavamṛdgan rathaughāṃ- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब रक्षा-आवरण वाले रथ पर सवार शिखण्डी रथियों को चुन-चुनकर मारते हुए, अपने दिव्य घोड़ों से रथ-समूहों को रौंदते हुए भीष्म पर धावा करेंगे, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 41 (5.48.41)
यदा द्रष्टा सृञ्जयानामनीके । धृष्टद्युम्नं प्रमुखे रोचमानम् । अस्त्रं यस्मै गुह्यमुवाच धीमा- । न्द्रोणस्तदा तप्स्यति धार्तराष्ट्रः ॥
yadā draṣṭā sṛñjayānāmanīke | dhṛṣṭadyumnaṃ pramukhe rocamānam | astraṃ yasmai guhyamuvāca dhīmā- | ndroṇastadā tapsyati dhārtarāṣṭraḥ
"जब वह सृंजयों की सेना के अग्रभाग में शोभायमान धृष्टद्युम्न को देखेगा, जिसे बुद्धिमान द्रोण ने गुप्त अस्त्र सिखाया था, तब धृतराष्ट्र का पुत्र पछताएगा।"
श्लोक 42 (5.48.42)
यदा स सेनापतिरप्रमेयः । परामृद्गन्निषुभिर्धार्तराष्ट्रान् । द्रोणं रणे शत्रुसहोऽभियाता । तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā sa senāpatiraprameyaḥ | parāmṛdganniṣubhirdhārtarāṣṭrān | droṇaṃ raṇe śatrusaho'bhiyātā | tadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वह अप्रमेय सेनापति, जो हर शत्रु का वेग सह सकता है, अपने बाणों से धृतराष्ट्र के पुत्रों को कुचलते हुए युद्ध में द्रोण पर आक्रमण करेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 43 (5.48.43)
ह्रीमान्मनीषी बलवान्मनस्वी । स लक्ष्मीवान्सोमकानां प्रबर्हः । न जातु तं शत्रवोऽन्ये सहेर- । न्येषां स स्यादग्रणीर्वृष्णिसिंहः ॥
hrīmānmanīṣī balavānmanasvī | sa lakṣmīvānsomakānāṃ prabarhaḥ | na jātu taṃ śatravo'nye sahera- | nyeṣāṃ sa syādagraṇīrvṛṣṇisiṃhaḥ
"वह लज्जाशील, मनीषी, बलवान्, मनस्वी, लक्ष्मीवान् और सोमकों में श्रेष्ठ है। जिनके अगुआ वृष्णिसिंह (कृष्ण) हैं, उनके सिवा दूसरे शत्रु उसका सामना कभी नहीं कर सकते।"
श्लोक 44 (5.48.44)
इदं च ब्रूया मा वृणीष्वेति लोके । युद्धेऽद्वितीयं सचिवं रथस्थम् । शिनेर्नप्तारं प्रवृणीम सात्यकिं । महाबलं वीतभयं कृतास्त्रम् ॥
idaṃ ca brūyā mā vṛṇīṣveti loke | yuddhe'dvitīyaṃ sacivaṃ rathastham | śinernaptāraṃ pravṛṇīma sātyakiṃ | mahābalaṃ vītabhayaṃ kṛtāstram
"और (दुर्योधन से) यह भी कहना — 'संसार में (राज्य की) कामना मत करो', क्योंकि हमने युद्ध में अद्वितीय, रथ पर आरूढ़, महाबली, निर्भय और अस्त्रविद् शिनि के पौत्र सात्यकि को अपना सहायक चुना है।"
श्लोक 45 (5.48.45)
महोरस्को दीर्घबाहुः प्रमाथी । युद्धेऽद्वितीयः परमास्त्रवेदी । शिनेर्नप्ता तालमात्रायुधोऽयं । महारथो वीतभयः कृतास्त्रः ॥
mahorasko dīrghabāhuḥ pramāthī | yuddhe'dvitīyaḥ paramāstravedī | śinernaptā tālamātrāyudho'yaṃ | mahāratho vītabhayaḥ kṛtāstraḥ
"चौड़ी छाती और लंबी भुजाओं वाला, शत्रुओं का मर्दन करने वाला, युद्ध में अद्वितीय, श्रेष्ठ अस्त्रों का ज्ञाता यह शिनि का पौत्र ताड़ के पेड़ जितने लंबे धनुष वाला, निर्भय, अस्त्रविद् महारथी है।"
श्लोक 46 (5.48.46)
यदा शिनीनामधिपो मयोक्तः । शरैः परान्मेघ इव प्रवर्षन् । प्रच्छादयिष्यत्यरिहा योधमुख्यां- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā śinīnāmadhipo mayoktaḥ | śaraiḥ parānmegha iva pravarṣan | pracchādayiṣyatyarihā yodhamukhyāṃ- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब शत्रुओं का संहार करने वाले शिनिवंशियों के अधिपति मेरे कहने पर मेघ की भाँति शत्रुओं पर बाण बरसाते हुए उनके प्रमुख योद्धाओं को ढक देंगे, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 47 (5.48.47)
यदा धृतिं कुरुते योत्स्यमानः । स दीर्घबाहुर्दृढधन्वा महात्मा । सिंहस्येव गन्धमाघ्राय गावः । संचेष्टन्ते शत्रवोऽस्माद्रणाग्रे ॥
yadā dhṛtiṃ kurute yotsyamānaḥ | sa dīrghabāhurdṛḍhadhanvā mahātmā | siṃhasyeva gandhamāghrāya gāvaḥ | saṃceṣṭante śatravo'smādraṇāgre
"जब वह लंबी भुजाओं वाला, दृढ़ धनुष वाला महात्मा युद्ध का निश्चय करता है, तब रणभूमि के अग्रभाग में शत्रु उससे वैसे ही छटपटाने लगते हैं जैसे सिंह की गंध पाकर गायें।"
श्लोक 48 (5.48.48)
स दीर्घबाहुर्दृढधन्वा महात्मा । भिन्द्याद्गिरीन्संहरेत्सर्वलोकान् । अस्त्रे कृती निपुणः क्षिप्रहस्तो । दिवि स्थितः सूर्य इवाभिभाति ॥
sa dīrghabāhurdṛḍhadhanvā mahātmā | bhindyādgirīnsaṃharetsarvalokān | astre kṛtī nipuṇaḥ kṣiprahasto | divi sthitaḥ sūrya ivābhibhāti
"वह लंबी भुजाओं वाला, दृढ़ धनुष वाला महात्मा पर्वतों को तोड़ सकता है और सब लोकों का संहार कर सकता है। अस्त्रविद्या में सिद्ध, निपुण और फुर्तीले हाथों वाला वह आकाश में स्थित सूर्य की भाँति चमकता है।"
श्लोक 49 (5.48.49)
चित्रः सूक्ष्मः सुकृतो यादवस्य । अस्त्रे योगो वृष्णिसिंहस्य भूयान् । यथाविधं योगमाहुः प्रशस्तं । सर्वैर्गुणैः सात्यकिस्तैरुपेतः ॥
citraḥ sūkṣmaḥ sukṛto yādavasya | astre yogo vṛṣṇisiṃhasya bhūyān | yathāvidhaṃ yogamāhuḥ praśastaṃ | sarvairguṇaiḥ sātyakistairupetaḥ
"उस यादव (सात्यकि) का अस्त्र-कौशल अद्भुत, सूक्ष्म और सुगठित है। वृष्णिसिंह (कृष्ण) के जिस विपुल कौशल की प्रशंसा की जाती है, सात्यकि उन सभी गुणों से सम्पन्न है।"
श्लोक 50 (5.48.50)
हिरण्मयं श्वेतहयैश्चतुर्भि- । र्यदा युक्तं स्यन्दनं माधवस्य । द्रष्टा युद्धे सात्यकेर्धार्तराष्ट्र- । स्तदा तप्स्यत्यकृतात्मा स मन्दः ॥
hiraṇmayaṃ śvetahayaiścaturbhi- | ryadā yuktaṃ syandanaṃ mādhavasya | draṣṭā yuddhe sātyakerdhārtarāṣṭra- | stadā tapsyatyakṛtātmā sa mandaḥ
"जब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध में चार श्वेत घोड़ों से जुते माधव सात्यकि के स्वर्णमय रथ को देखेगा, तब वह असंयमी मन्दबुद्धि पछताएगा।"
श्लोक 51 (5.48.51)
यदा रथं हेममणिप्रकाशं । श्वेताश्वयुक्तं वानरकेतुमुग्रम् । दृष्ट्वा ममाप्यास्थितं केशवेन । तदा तप्स्यत्यकृतात्मा स मन्दः ॥
yadā rathaṃ hemamaṇiprakāśaṃ | śvetāśvayuktaṃ vānaraketumugram | dṛṣṭvā mamāpyāsthitaṃ keśavena | tadā tapsyatyakṛtātmā sa mandaḥ
"जब वह सोने और मणियों से चमकते, श्वेत घोड़ों से जुते, भयंकर वानर-ध्वज वाले मेरे रथ को केशव से अधिष्ठित देखेगा, तब वह असंयमी मन्दबुद्धि पछताएगा।"
श्लोक 52 (5.48.52)
यदा मौर्व्यास्तलनिष्पेषमुग्रं । महाशब्दं वज्रनिष्पेषतुल्यम् । विधूयमानस्य महारणे मया । स गाण्डिवस्य श्रोष्यति मन्दबुद्धिः ॥
yadā maurvyāstalaniṣpeṣamugraṃ | mahāśabdaṃ vajraniṣpeṣatulyam | vidhūyamānasya mahāraṇe mayā | sa gāṇḍivasya śroṣyati mandabuddhiḥ
"जब वह मन्दबुद्धि महायुद्ध में मेरे द्वारा झटके जाते गाण्डीव की प्रत्यंचा का हथेली पर पड़ने वाला भयंकर, वज्रपात के समान महाशब्द सुनेगा,"
श्लोक 53 (5.48.53)
तदा मूढो धृतराष्ट्रस्य पुत्र- । स्तप्ता युद्धे दुर्मतिर्दुःसहायः । दृष्ट्वा सैन्यं बाणवर्षान्धकारे । प्रभज्यन्तं गोकुलवद्रणाग्रे ॥
tadā mūḍho dhṛtarāṣṭrasya putra- | staptā yuddhe durmatirduḥsahāyaḥ | dṛṣṭvā sainyaṃ bāṇavarṣāndhakāre | prabhajyantaṃ gokulavadraṇāgre
"तब धृतराष्ट्र का वह मूढ़, दुर्बुद्धि और बुरे साथियों वाला पुत्र युद्ध में बाण-वर्षा के अंधकार में रणभूमि के अग्रभाग पर अपनी सेना को गायों के झुंड की तरह टूटते-बिखरते देखकर संतप्त होगा।"
श्लोक 54 (5.48.54)
बलाहकादुच्चरतः सुभीमा- । न्विद्युत्स्फुलिङ्गानिव घोररूपान् । सहस्रघ्नान्द्विषतां सङ्गरेषु । अस्थिच्छिदो मर्मभिदः सुपुङ्खान् ॥
balāhakāduccarataḥ subhīmā- | nvidyutsphuliṅgāniva ghorarūpān | sahasraghnāndviṣatāṃ saṅgareṣu | asthicchido marmabhidaḥ supuṅkhān
"बादल से निकलती बिजली की चिनगारियों जैसे भयंकर रूप वाले, अत्यन्त भीषण, संग्रामों में सहस्रों शत्रुओं का वध करने वाले, हड्डियाँ तोड़ने वाले, मर्म भेदने वाले, सुन्दर पंखों वाले बाणों को —"
श्लोक 55 (5.48.55)
यदा द्रष्टा ज्यामुखाद्बाणसङ्घान् । गाण्डीवमुक्तानापततः शिताग्रान् । हयान्गजान्वर्मिणश्चाददानां- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā draṣṭā jyāmukhādbāṇasaṅghān | gāṇḍīvamuktānāpatataḥ śitāgrān | hayāngajānvarmiṇaścādadānāṃ- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वह गाण्डीव से छूटे, प्रत्यंचा के मुख से निकलकर गिरते, तीखी नोकों वाले उन बाण-समूहों को घोड़ों, हाथियों और कवचधारी योद्धाओं को निगलते देखेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 56 (5.48.56)
यदा मन्दः परबाणान्विमुक्ता- । न्ममेषुभिर्ह्रियमाणान्प्रतीपम् । तिर्यग्विध्य च्छिद्यमानान्पृषत्कै- । स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā mandaḥ parabāṇānvimuktā- | nmameṣubhirhriyamāṇānpratīpam | tiryagvidhya cchidyamānānpṛṣatkai- | stadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वह मन्दबुद्धि शत्रुओं के छोड़े बाणों को मेरे बाणों से उलटा लौटाए जाते और मेरे तीरों से तिरछे बिंधकर कटते देखेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 57 (5.48.57)
यदा विपाठा मद्भुजविप्रमुक्ता । द्विजाः फलानीव महीरुहाग्रात् । प्रचेतार उत्तमाङ्गानि यूनां । तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā vipāṭhā madbhujavipramuktā | dvijāḥ phalānīva mahīruhāgrāt | pracetāra uttamāṅgāni yūnāṃ | tadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब मेरी भुजाओं से छूटे विपाठ बाण युवा योद्धाओं के सिरों के ढेर लगा देंगे, जैसे पक्षी वृक्षों की चोटियों से फल गिरा देते हैं, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 58 (5.48.58)
यदा द्रष्टा पततः स्यन्दनेभ्यो । महागजेभ्योऽश्वगतान्सुयोधनान् । शरैर्हतान्पातितांश्चैव रङ्गे । तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā draṣṭā patataḥ syandanebhyo | mahāgajebhyo'śvagatānsuyodhanān | śarairhatānpātitāṃścaiva raṅge | tadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वह श्रेष्ठ योद्धाओं को रथों से, बड़े-बड़े हाथियों से और घोड़ों से बाणों द्वारा मारे जाकर रणभूमि में गिरते देखेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 59 (5.48.59)
असंप्राप्तानस्त्रपथं परस्य । यदा द्रष्टा नश्यतो धार्तराष्ट्रान् । अकुर्वतः कर्म युद्धे समन्ता- । त्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
asaṃprāptānastrapathaṃ parasya | yadā draṣṭā naśyato dhārtarāṣṭrān | akurvataḥ karma yuddhe samantā- | ttadā yuddhaṃ dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वह धृतराष्ट्र के पुत्रों को शत्रु के अस्त्रों की पहुँच में आने से पहले ही, युद्ध में कुछ भी किए बिना, चारों ओर नष्ट होते देखेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 60 (5.48.60)
पदातिसङ्घान्रथसङ्घान्समन्ता- । द्व्यात्ताननः काल इवाततेषुः । प्रणोत्स्यामि ज्वलितैर्बाणवर्षैः । शत्रूंस्तदा तप्स्यति मन्दबुद्धिः ॥
padātisaṅghānrathasaṅghānsamantā- | dvyāttānanaḥ kāla ivātateṣuḥ | praṇotsyāmi jvalitairbāṇavarṣaiḥ | śatrūṃstadā tapsyati mandabuddhiḥ
"जब मैं मुँह फैलाए काल की भाँति बाण ताने हुए, चारों ओर पैदल सैनिकों और रथों के समूहों को — अपने शत्रुओं को — प्रज्वलित बाण-वर्षा से खदेड़ दूँगा, तब वह मन्दबुद्धि पछताएगा।"
श्लोक 61 (5.48.61)
सर्वा दिशः संपतता रथेन । रजोध्वस्तं गाण्डिवेन प्रकृत्तम् । यदा द्रष्टा स्वबलं संप्रमूढं । तदा पश्चात्तप्स्यति मन्दबुद्धिः ॥
sarvā diśaḥ saṃpatatā rathena | rajodhvastaṃ gāṇḍivena prakṛttam | yadā draṣṭā svabalaṃ saṃpramūḍhaṃ | tadā paścāttapsyati mandabuddhiḥ
"जब वह सब दिशाओं में दौड़ते मेरे रथ की धूल से ढकी और गाण्डीव से कटी-छँटी अपनी सेना को किंकर्तव्यविमूढ़ देखेगा, तब वह मन्दबुद्धि बाद में पछताएगा।"
श्लोक 62 (5.48.62)
कान्दिग्भूतं छिन्नगात्रं विसंज्ञं । दुर्योधनो द्रक्ष्यति सर्वसैन्यम् । हताश्ववीराग्र्यनरेन्द्रनागं । पिपासितं श्रान्तपत्रं भयार्तम् ॥
kāndigbhūtaṃ chinnagātraṃ visaṃjñaṃ | duryodhano drakṣyati sarvasainyam | hatāśvavīrāgryanarendranāgaṃ | pipāsitaṃ śrāntapatraṃ bhayārtam
"दुर्योधन अपनी सारी सेना को भय से इधर-उधर भागती, कटे अंगों वाली, अचेत, जिसके घोड़े, वीर, श्रेष्ठ राजा और हाथी मारे गए हैं, प्यासी, थके वाहनों वाली और भय से पीड़ित देखेगा;"
श्लोक 63 (5.48.63)
आर्तस्वरं हन्यमानं हतं च । विकीर्णकेशास्थिकपालसङ्घम् । प्रजापतेः कर्म यथार्थनिष्ठितं । तदा दृष्ट्वा तप्स्यति मन्दबुद्धिः ॥
ārtasvaraṃ hanyamānaṃ hataṃ ca | vikīrṇakeśāsthikapālasaṅgham | prajāpateḥ karma yathārthaniṣṭhitaṃ | tadā dṛṣṭvā tapsyati mandabuddhiḥ
"आर्तनाद करती, मारी जाती और मारी जा चुकी, बिखरे केशों, हड्डियों और खोपड़ियों के ढेरों वाली — प्रजापति के यज्ञ की भाँति पूरे किए गए उस संहार को देखकर तब वह मन्दबुद्धि पछताएगा।"
श्लोक 64 (5.48.64)
यदा रथे गाण्डिवं वासुदेवं । दिव्यं शङ्खं पाञ्चजन्यं हयांश्च । तूणावक्षय्यौ देवदत्तं च मां च । दृष्ट्वा युद्धे धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥
yadā rathe gāṇḍivaṃ vāsudevaṃ | divyaṃ śaṅkhaṃ pāñcajanyaṃ hayāṃśca | tūṇāvakṣayyau devadattaṃ ca māṃ ca | dṛṣṭvā yuddhe dhārtarāṣṭro'nvatapsyat
"जब वह युद्ध में रथ पर गाण्डीव और वासुदेव को, दिव्य पाञ्चजन्य शंख और घोड़ों को, दोनों अक्षय तूणीरों को, देवदत्त शंख को और मुझको देखेगा, तब धृतराष्ट्र का पुत्र युद्ध के लिए पछताएगा।"
श्लोक 65 (5.48.65)
उद्वर्तयन्दस्युसङ्घान्समेतान् । प्रवर्तयन्युगमन्यद्युगान्ते । यदा धक्ष्याम्यग्निवत्कौरवेयां- । स्तदा तप्ता धृतराष्ट्रः सपुत्रः ॥
udvartayandasyusaṅghānsametān | pravartayanyugamanyadyugānte | yadā dhakṣyāmyagnivatkauraveyāṃ- | stadā taptā dhṛtarāṣṭraḥ saputraḥ
"जब मैं एकत्र हुए दस्यु-समूहों को उखाड़ते हुए, युग के अन्त में दूसरे युग का प्रवर्तन करते हुए, अग्नि की भाँति कौरवों को जला डालूँगा, तब पुत्रों सहित धृतराष्ट्र पछताएँगे।"
श्लोक 66 (5.48.66)
सभ्राता वै सहसैन्यः सभृत्यो । भ्रष्टैश्वर्यः क्रोधवशोऽल्पचेताः । दर्पस्यान्ते निहतो वेपमानः । पश्चान्मन्दस्तप्स्यति धार्तराष्ट्रः ॥
sabhrātā vai sahasainyaḥ sabhṛtyo | bhraṣṭaiśvaryaḥ krodhavaśo'lpacetāḥ | darpasyānte nihato vepamānaḥ | paścānmandastapsyati dhārtarāṣṭraḥ
"भाइयों, सेना और सेवकों सहित, ऐश्वर्य से भ्रष्ट, क्रोध के वश में पड़ा, अल्पबुद्धि, अहंकार के अन्त में मारा जाकर काँपता हुआ वह मन्दबुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र बाद में पछताएगा।"
श्लोक 67 (5.48.67)
पूर्वाह्णे मां कृतजप्यं कदाचि- । द्विप्रः प्रोवाचोदकान्ते मनोज्ञम् । कर्तव्यं ते दुष्करं कर्म पार्थ । योद्धव्यं ते शत्रुभिः सव्यसाचिन् ॥
pūrvāhṇe māṃ kṛtajapyaṃ kadāci- | dvipraḥ provācodakānte manojñam | kartavyaṃ te duṣkaraṃ karma pārtha | yoddhavyaṃ te śatrubhiḥ savyasācin
"एक बार पूर्वाह्न में, जब मैं जप कर चुका था, जल के किनारे एक ब्राह्मण ने मुझसे मनोहर वचन कहे — 'हे पार्थ, तुम्हें एक कठिन कार्य करना है; हे सव्यसाची, तुम्हें शत्रुओं से युद्ध करना होगा।'"
श्लोक 68 (5.48.68)
इन्द्रो वा ते हरिवान्वज्रहस्तः । पुरस्ताद्यातु समरेऽरीन्विनिघ्नन् । सुग्रीवयुक्तेन रथेन वा ते । पश्चात्कृष्णो रक्षतु वासुदेवः ॥
indro vā te harivānvajrahastaḥ | purastādyātu samare'rīnvinighnan | sugrīvayuktena rathena vā te | paścātkṛṣṇo rakṣatu vāsudevaḥ
"'या तो हरे घोड़ों वाले वज्रधारी इन्द्र युद्ध में शत्रुओं का संहार करते हुए तुम्हारे आगे चलें, या सुग्रीव नामक घोड़े से जुते रथ पर वासुदेव कृष्ण पीछे से तुम्हारी रक्षा करें।'"
श्लोक 69 (5.48.69)
वव्रे चाहं वज्रहस्तान्महेन्द्रा- । दस्मिन्युद्धे वासुदेवं सहायम् । स मे लब्धो दस्युवधाय कृष्णो । मन्ये चैतद्विहितं दैवतैर्मे ॥
vavre cāhaṃ vajrahastānmahendrā- | dasminyuddhe vāsudevaṃ sahāyam | sa me labdho dasyuvadhāya kṛṣṇo | manye caitadvihitaṃ daivatairme
"और मैंने वज्रधारी महेन्द्र के स्थान पर वासुदेव को इस युद्ध में अपना सहायक चुना। दस्युओं के वध के लिए मुझे कृष्ण मिल गए हैं; मैं मानता हूँ कि यह देवताओं ने ही मेरे लिए विधान किया है।"
श्लोक 70 (5.48.70)
अयुद्ध्यमानो मनसापि यस्य । जयं कृष्णः पुरुषस्याभिनन्देत् । एवं सर्वान्स व्यतीयादमित्रान् । सेन्द्रान्देवान्मानुषे नास्ति चिन्ता ॥
ayuddhyamāno manasāpi yasya | jayaṃ kṛṣṇaḥ puruṣasyābhinandet | evaṃ sarvānsa vyatīyādamitrān | sendrāndevānmānuṣe nāsti cintā
"कृष्ण बिना युद्ध किए भी जिस पुरुष की विजय की मन से कामना कर दें, वह इसी प्रकार सब शत्रुओं को — इन्द्र सहित देवताओं तक को — पार कर जाएगा; मनुष्यों की तो चिंता ही क्या।"
श्लोक 71 (5.48.71)
स बाहुभ्यां सागरमुत्तितीर्षे- । न्महोदधिं सलिलस्याप्रमेयम् । तेजस्विनं कृष्णमत्यन्तशूरं । युद्धेन यो वासुदेवं जिगीषेत् ॥
sa bāhubhyāṃ sāgaramuttitīrṣe- | nmahodadhiṃ salilasyāprameyam | tejasvinaṃ kṛṣṇamatyantaśūraṃ | yuddhena yo vāsudevaṃ jigīṣet
"जो तेजस्वी, अत्यन्त शूरवीर वासुदेव कृष्ण को युद्ध में जीतना चाहे, वह मानो अपनी दोनों भुजाओं से अथाह जल वाले महासागर को पार करना चाहता है।"
श्लोक 72 (5.48.72)
गिरिं य इच्छेत्तु तलेन भेत्तुं । शिलोच्चयं श्वेतमतिप्रमाणम् । तस्यैव पाणिः सनखो विशीर्ये- । न्न चापि किञ्चित्स गिरेस्तु कुर्यात् ॥
giriṃ ya icchettu talena bhettuṃ | śiloccayaṃ śvetamatipramāṇam | tasyaiva pāṇiḥ sanakho viśīrye- | nna cāpi kiñcitsa girestu kuryāt
"जो कोई अत्यन्त विशाल श्वेत शिलाओं वाले पर्वत को हथेली से तोड़ना चाहे, उसका नाखूनों सहित हाथ ही चूर-चूर हो जाएगा, पर्वत का वह कुछ भी न बिगाड़ सकेगा।"
श्लोक 73 (5.48.73)
अग्निं समिद्धं शमयेद्भुजाभ्यां । चन्द्रं च सूर्यं च निवारयेत । हरेद्देवानाममृतं प्रसह्य । युद्धेन यो वासुदेवं जिगीषेत् ॥
agniṃ samiddhaṃ śamayedbhujābhyāṃ | candraṃ ca sūryaṃ ca nivārayeta | hareddevānāmamṛtaṃ prasahya | yuddhena yo vāsudevaṃ jigīṣet
"जो युद्ध में वासुदेव को जीतना चाहे, वह मानो दोनों भुजाओं से प्रज्वलित अग्नि को बुझाना, चन्द्रमा और सूर्य को रोकना, और देवताओं का अमृत बलपूर्वक छीन लेना चाहता है।"
श्लोक 74 (5.48.74)
यो रुक्मिणीमेकरथेन भोजा- । नुत्साद्य राज्ञः समरे प्रसह्य । उवाह भार्यां यशसा ज्वलन्तीं । यस्यां जज्ञे रौक्मिणेयो महात्मा ॥
yo rukmiṇīmekarathena bhojā- | nutsādya rājñaḥ samare prasahya | uvāha bhāryāṃ yaśasā jvalantīṃ | yasyāṃ jajñe raukmiṇeyo mahātmā
"इन्होंने ही एक ही रथ से भोजों और राजाओं को युद्ध में बलपूर्वक परास्त करके यश से दीप्त रुक्मिणी को पत्नी के रूप में हर लिया, जिनसे महात्मा रौक्मिणेय (प्रद्युम्न) का जन्म हुआ।"
श्लोक 75 (5.48.75)
अयं गान्धारांस्तरसा संप्रमथ्य । जित्वा पुत्रान्नग्नजितः समग्रान् । बद्धं मुमोच विनदन्तं प्रसह्य । सुदर्शनं वै देवतानां ललामम् ॥
ayaṃ gāndhārāṃstarasā saṃpramathya | jitvā putrānnagnajitaḥ samagrān | baddhaṃ mumoca vinadantaṃ prasahya | sudarśanaṃ vai devatānāṃ lalāmam
"देवताओं के भूषणरूप इन्हीं (कृष्ण) ने वेग से गान्धारों को मथकर, नग्नजित् के सब पुत्रों को जीतकर, बँधे हुए और चिल्लाते हुए राजा सुदर्शन को बलपूर्वक छुड़ाया।"
श्लोक 76 (5.48.76)
अयं कवाटे निजघान पाण्ड्यं । तथा कलिङ्गान्दन्तवक्रं ममर्द । अनेन दग्धा वर्षपूगान्विनाथा । वाराणसी नगरी संबभूव ॥
ayaṃ kavāṭe nijaghāna pāṇḍyaṃ | tathā kaliṅgāndantavakraṃ mamarda | anena dagdhā varṣapūgānvināthā | vārāṇasī nagarī saṃbabhūva
"इन्होंने कवाट नगर में पाण्ड्य राजा को मारा, और इसी प्रकार कलिंगों तथा दन्तवक्र को कुचल डाला। इन्हीं के द्वारा जलाई गई वाराणसी नगरी वर्षों तक अनाथ पड़ी रही।"
श्लोक 77 (5.48.77)
अयं स्म युद्धे मन्यतेऽन्यैरजेयं । तमेकलव्यं नाम निषादराजम् । वेगेनैव शैलमभिहत्य जम्भः । शेते स कृष्णेन हतः परासुः ॥
ayaṃ sma yuddhe manyate'nyairajeyaṃ | tamekalavyaṃ nāma niṣādarājam | vegenaiva śailamabhihatya jambhaḥ | śete sa kṛṣṇena hataḥ parāsuḥ
"यह (दुर्योधन) जिस निषादराज एकलव्य को युद्ध में दूसरों से अजेय मानता था, वह कृष्ण के हाथों मारा जाकर प्राणहीन पड़ा है, जैसे वेग से पर्वत से टकराकर जम्भ दैत्य मारा गया था।"
श्लोक 78 (5.48.78)
तथोग्रसेनस्य सुतं सुदुष्टं । वृष्ण्यन्धकानां मध्यगतं सभास्थम् । अपातयद्बलदेवद्वितीयो । हत्वा ददौ चोग्रसेनाय राज्यम् ॥
tathograsenasya sutaṃ suduṣṭaṃ | vṛṣṇyandhakānāṃ madhyagataṃ sabhāstham | apātayadbaladevadvitīyo | hatvā dadau cograsenāya rājyam
"इसी प्रकार बलदेव को साथ लेकर उन्होंने वृष्णियों और अन्धकों के बीच सभा में बैठे उग्रसेन के अत्यन्त दुष्ट पुत्र (कंस) को मार गिराया, और उसे मारकर उग्रसेन को राज्य दे दिया।"
श्लोक 79 (5.48.79)
अयं सौभं योधयामास खस्थं । विभीषणं मायया साल्वराजम् । सौभद्वारि प्रत्यगृह्णाच्छतघ्नीं । दोर्भ्यां क एनं विषहेत मर्त्यः ॥
ayaṃ saubhaṃ yodhayāmāsa khasthaṃ | vibhīṣaṇaṃ māyayā sālvarājam | saubhadvāri pratyagṛhṇācchataghnīṃ | dorbhyāṃ ka enaṃ viṣaheta martyaḥ
"इन्होंने आकाश में स्थित सौभ पर माया से भयंकर बने साल्वराज से युद्ध किया, और सौभ के द्वार पर अपनी दोनों भुजाओं से शतघ्नी को थाम लिया। कौन मनुष्य इनका सामना कर सकता है?"
श्लोक 80 (5.48.80)
प्राग्ज्योतिषं नाम बभूव दुर्गं । पुरं घोरमसुराणामसह्यम् । महाबलो नरकस्तत्र भौमो । जहारादित्या मणिकुण्डले शुभे ॥
prāgjyotiṣaṃ nāma babhūva durgaṃ | puraṃ ghoramasurāṇāmasahyam | mahābalo narakastatra bhaumo | jahārādityā maṇikuṇḍale śubhe
"प्राग्ज्योतिष नाम का एक दुर्ग था — असुरों का भयंकर, दुर्जेय नगर। वहाँ पृथ्वी के पुत्र महाबली नरक ने अदिति के सुन्दर मणिमय कुण्डल हर लिए थे।"
श्लोक 81 (5.48.81)
न तं देवाः सह शक्रेण शेकुः । समागता युधि मृत्योरभीताः । दृष्ट्वा च तं विक्रमं केशवस्य । बलं तथैवास्त्रमवारणीयम् ॥
na taṃ devāḥ saha śakreṇa śekuḥ | samāgatā yudhi mṛtyorabhītāḥ | dṛṣṭvā ca taṃ vikramaṃ keśavasya | balaṃ tathaivāstramavāraṇīyam
"इन्द्र सहित एकत्र हुए देवता मृत्यु से निर्भय होकर भी युद्ध में उसे पराजित न कर सके। केशव का पराक्रम, बल और उनका अनिवार्य अस्त्र देखकर,"
श्लोक 82 (5.48.82)
जानन्तोऽस्य प्रकृतिं केशवस्य । न्ययोजयन्दस्युवधाय कृष्णम् । स तत्कर्म प्रतिशुश्राव दुष्कर- । मैश्वर्यवान्सिद्धिषु वासुदेवः ॥
jānanto'sya prakṛtiṃ keśavasya | nyayojayandasyuvadhāya kṛṣṇam | sa tatkarma pratiśuśrāva duṣkara- | maiśvaryavānsiddhiṣu vāsudevaḥ
"और केशव के स्वभाव को जानकर उन्होंने कृष्ण को उस दस्यु के वध के लिए नियुक्त किया। सिद्धियों के ऐश्वर्य से सम्पन्न वासुदेव ने वह कठिन कार्य करने की प्रतिज्ञा की।"
श्लोक 83 (5.48.83)
निर्मोचने षट्सहस्राणि हत्वा । संच्छिद्य पाशान्सहसा क्षुरान्तान् । मुरं हत्वा विनिहत्यौघरक्षो । निर्मोचनं चापि जगाम वीरः ॥
nirmocane ṣaṭsahasrāṇi hatvā | saṃcchidya pāśānsahasā kṣurāntān | muraṃ hatvā vinihatyaugharakṣo | nirmocanaṃ cāpi jagāma vīraḥ
"निर्मोचन में छः हजार (असुरों) को मारकर, छुरे जैसी धार वाले पाशों को झटके से काटकर, मुर को मारकर और राक्षसों के समूह का संहार करके वह वीर निर्मोचन नगर में जा पहुँचे।"
श्लोक 84 (5.48.84)
तत्रैव तेनास्य बभूव युद्धं । महाबलेनातिबलस्य विष्णोः । शेते स कृष्णेन हतः परासु- । र्वातेनेव मथितः कर्णिकारः ॥
tatraiva tenāsya babhūva yuddhaṃ | mahābalenātibalasya viṣṇoḥ | śete sa kṛṣṇena hataḥ parāsu- | rvāteneva mathitaḥ karṇikāraḥ
"वहीं उस महाबली (नरक) का अतिबली विष्णु से युद्ध हुआ। कृष्ण के हाथों मारा जाकर वह प्राणहीन होकर ऐसे पड़ा है जैसे आँधी से उखड़ा कर्णिकार का वृक्ष।"
श्लोक 85 (5.48.85)
आहृत्य कृष्णो मणिकुण्डले ते । हत्वा च भौमं नरकं मुरं च । श्रिया वृतो यशसा चैव विद्वा- । न्प्रत्याजगामाप्रतिमप्रभावः ॥
āhṛtya kṛṣṇo maṇikuṇḍale te | hatvā ca bhaumaṃ narakaṃ muraṃ ca | śriyā vṛto yaśasā caiva vidvā- | npratyājagāmāpratimaprabhāvaḥ
"उन मणिमय कुण्डलों को लाकर, भूमिपुत्र नरक और मुर को मारकर, अनुपम प्रभाव वाले ज्ञानी कृष्ण श्री और यश से सम्पन्न होकर लौट आए।"
श्लोक 86 (5.48.86)
अस्मै वराण्यददंस्तत्र देवा । दृष्ट्वा भीमं कर्म कृतं रणे तत् । श्रमश्च ते युध्यमानस्य न स्या- । दाकाशे चाप्सु च ते क्रमः स्यात् ॥
asmai varāṇyadadaṃstatra devā | dṛṣṭvā bhīmaṃ karma kṛtaṃ raṇe tat | śramaśca te yudhyamānasya na syā- | dākāśe cāpsu ca te kramaḥ syāt
"उस युद्ध में किया गया वह भयंकर कर्म देखकर वहाँ देवताओं ने उन्हें वर दिए — 'युद्ध करते समय तुम्हें थकान न हो; आकाश और जल में तुम्हारी गति हो;'"
श्लोक 87 (5.48.87)
शस्त्राणि गात्रे न च ते क्रमेर- । न्नित्येव कृष्णश्च ततः कृतार्थः । एवं रूपे वासुदेवेऽप्रमेये । महाबले गुणसंपत्सदैव ॥
śastrāṇi gātre na ca te kramera- | nnityeva kṛṣṇaśca tataḥ kṛtārthaḥ | evaṃ rūpe vāsudeve'prameye | mahābale guṇasaṃpatsadaiva
"'और शस्त्र तुम्हारे शरीर में प्रवेश न करें।' इस प्रकार कृष्ण कृतार्थ हुए। ऐसे स्वरूप वाले, अप्रमेय, महाबली वासुदेव में गुणों की सम्पदा सदा बनी रहती है।"
श्लोक 88 (5.48.88)
तमसह्यं विष्णुमनन्तवीर्य- । माशंसते धार्तराष्ट्रो विजेतुम् । सदा ह्येनं तर्कयते दुरात्मा । तच्चाप्ययं सहतेऽस्मान्समीक्ष्य ॥
tamasahyaṃ viṣṇumanantavīrya- | māśaṃsate dhārtarāṣṭro vijetum | sadā hyenaṃ tarkayate durātmā | taccāpyayaṃ sahate'smānsamīkṣya
"ऐसे असह्य, अनन्त पराक्रमी विष्णु को धृतराष्ट्र का पुत्र जीतने की आशा करता है! वह दुष्टात्मा सदा इनके विरुद्ध कुचक्र सोचता रहता है, और ये हमारी ओर देखकर उसे भी सह लेते हैं।"
श्लोक 89 (5.48.89)
पर्यागतं मम कृष्णस्य चैव । यो मन्यते कलहं संप्रसह्य । शक्यं हर्तुं पाण्डवानां ममत्वं । तद्वेदिता संयुगं तत्र गत्वा ॥
paryāgataṃ mama kṛṣṇasya caiva | yo manyate kalahaṃ saṃprasahya | śakyaṃ hartuṃ pāṇḍavānāṃ mamatvaṃ | tadveditā saṃyugaṃ tatra gatvā
"जो यह समझता है कि झगड़ा ठानकर वह मेरे और कृष्ण के बीच चले आ रहे सम्बन्ध को तोड़ सकता है और पाण्डवों का अपनापन छीन सकता है, वह युद्धभूमि में जाकर (सत्य) जान लेगा।"
श्लोक 90 (5.48.90)
नमस्कृत्वा शान्तनवाय राज्ञे । द्रोणायाथो सहपुत्राय चैव । शारद्वतायाप्रतिद्वन्द्विने च । योत्स्याम्यहं राज्यमभीप्समानः ॥
namaskṛtvā śāntanavāya rājñe | droṇāyātho sahaputrāya caiva | śāradvatāyāpratidvandvine ca | yotsyāmyahaṃ rājyamabhīpsamānaḥ
"शान्तनुनन्दन राजा (भीष्म) को, पुत्र सहित द्रोण को और अप्रतिद्वन्द्वी शारद्वत (कृपाचार्य) को नमस्कार करके मैं राज्य पाने की इच्छा से युद्ध करूँगा।"
श्लोक 91 (5.48.91)
धर्मेणाप्तं निधनं तस्य मन्ये । यो योत्स्यते पाण्डवैर्धर्मचारी । मिथ्या ग्लहे निर्जिता वै नृशंसैः । संवत्सरान्वै द्वादश राजपुत्राः ॥
dharmeṇāptaṃ nidhanaṃ tasya manye | yo yotsyate pāṇḍavairdharmacārī | mithyā glahe nirjitā vai nṛśaṃsaiḥ | saṃvatsarānvai dvādaśa rājaputrāḥ
"मैं मानता हूँ कि जो धर्माचारी होकर भी पाण्डवों से लड़ेगा, उसकी मृत्यु धर्म के अनुसार ही उचित है। क्रूर लोगों ने कपटपूर्ण जुए में राजपुत्रों को हराया, और बारह वर्ष तक"
श्लोक 92 (5.48.92)
वासः कृच्छ्रो विहितश्चाप्यरण्ये । दीर्घं कालं चैकमज्ञातवर्षम् । ते हि कस्माज्जीवतां पाण्डवानां । नन्दिष्यन्ते धार्तराष्ट्राः पदस्थाः ॥
vāsaḥ kṛcchro vihitaścāpyaraṇye | dīrghaṃ kālaṃ caikamajñātavarṣam | te hi kasmājjīvatāṃ pāṇḍavānāṃ | nandiṣyante dhārtarāṣṭrāḥ padasthāḥ
"उनके लिए लंबे समय तक वन में कष्टमय निवास निश्चित किया गया, और एक वर्ष का अज्ञातवास भी। फिर पाण्डवों के जीते-जी धृतराष्ट्र के पुत्र अपने पद पर बैठकर किस कारण आनन्द मनाएँगे?"
श्लोक 93 (5.48.93)
ते चेदस्मान्युध्यमानाञ्जयेयु- । र्देवैर्महेन्द्रप्रमुखैः सहायैः । धर्मादधर्मश्चरितो गरीयां- । स्ततो ध्रुवं नास्ति कृतं च साधु ॥
te cedasmānyudhyamānāñjayeyu- | rdevairmahendrapramukhaiḥ sahāyaiḥ | dharmādadharmaścarito garīyāṃ- | stato dhruvaṃ nāsti kṛtaṃ ca sādhu
"यदि वे महेन्द्र आदि देवताओं को सहायक बनाकर भी युद्ध करते हुए हमें जीत लें, तो धर्म से अधर्म का आचरण बड़ा ठहरेगा, और निश्चय ही संसार में कोई सत्कर्म (सार्थक) नहीं रह जाएगा।"
श्लोक 94 (5.48.94)
न चेदिदं पौरुषं कर्मबद्धं । न चेदस्मान्मन्यतेऽसौ विशिष्टान् । आशंसेऽहं वासुदेवद्वितीयो । दुर्योधनं सानुबन्धं निहन्तुम् ॥
na cedidaṃ pauruṣaṃ karmabaddhaṃ | na cedasmānmanyate'sau viśiṣṭān | āśaṃse'haṃ vāsudevadvitīyo | duryodhanaṃ sānubandhaṃ nihantum
"यदि वह यह नहीं मानता कि यह पुरुषार्थ अपने फल से बँधा है, यदि वह हमें अपने से श्रेष्ठ नहीं मानता, तो मैं वासुदेव को साथ लेकर दुर्योधन को उसके बन्धु-बान्धवों सहित मारने की आशा करता हूँ।"
श्लोक 95 (5.48.95)
न चेदिदं कर्म नरेन्द्र वन्ध्यं । न चेद्भवेत्सुकृतं निष्फलं वा । इदं च तच्चाभिसमीक्ष्य नूनं । पराजयो धार्तराष्ट्रस्य साधुः ॥
na cedidaṃ karma narendra vandhyaṃ | na cedbhavetsukṛtaṃ niṣphalaṃ vā | idaṃ ca taccābhisamīkṣya nūnaṃ | parājayo dhārtarāṣṭrasya sādhuḥ
"हे नरेन्द्र, यदि यह कर्म निष्फल नहीं है, यदि किया गया पुण्य व्यर्थ नहीं जाता, तो आज के इस और पहले के उस अन्याय को देखते हुए निश्चय ही धृतराष्ट्रपुत्र की पराजय उचित है।"
श्लोक 96 (5.48.96)
प्रत्यक्षं वः कुरवो यद्ब्रवीमि । युद्ध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति । अन्यत्र युद्धात्कुरवो यदि स्यु- । र्न युद्धे वै शेष इहास्ति कश्चित् ॥
pratyakṣaṃ vaḥ kuravo yadbravīmi | yuddhyamānā dhārtarāṣṭrā na santi | anyatra yuddhātkuravo yadi syu- | rna yuddhe vai śeṣa ihāsti kaścit
"हे कौरवो, मैं तुम्हारे सामने स्पष्ट कहता हूँ — युद्ध करने पर धृतराष्ट्र के पुत्र नहीं बचेंगे। यदि कौरव युद्ध से अलग रहें तो बच सकते हैं; युद्ध में यहाँ कोई शेष नहीं रहेगा।"
श्लोक 97 (5.48.97)
हत्वा त्वहं धार्तराष्ट्रान्सकर्णा- । न्राज्यं कुरूणामवजेता समग्रम् । यद्वः कार्यं तत्कुरुध्वं यथास्व- । मिष्टान्दारानात्मभोगान्भजध्वम् ॥
hatvā tvahaṃ dhārtarāṣṭrānsakarṇā- | nrājyaṃ kurūṇāmavajetā samagram | yadvaḥ kāryaṃ tatkurudhvaṃ yathāsva- | miṣṭāndārānātmabhogānbhajadhvam
"कर्ण सहित धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर मैं कौरवों का सम्पूर्ण राज्य जीत लूँगा। तुम्हें जो करना हो, अपनी-अपनी इच्छा से कर लो; अपनी प्रिय पत्नियों और अपने भोगों का सुख (अभी) ले लो।"
श्लोक 98 (5.48.98)
अप्येवं नो ब्राह्मणाः सन्ति वृद्धा । बहुश्रुताः शीलवन्तः कुलीनाः । सांवत्सरा ज्योतिषि चाभियुक्ता । नक्षत्रयोगेषु च निश्चयज्ञाः ॥
apyevaṃ no brāhmaṇāḥ santi vṛddhā | bahuśrutāḥ śīlavantaḥ kulīnāḥ | sāṃvatsarā jyotiṣi cābhiyuktā | nakṣatrayogeṣu ca niścayajñāḥ
"हमारे पास भी ऐसे वृद्ध ब्राह्मण हैं जो बहुश्रुत, शीलवान् और कुलीन हैं, ज्योतिष में पारंगत कालज्ञ हैं, और नक्षत्रों के योगों का निश्चित ज्ञान रखते हैं।"
श्लोक 99 (5.48.99)
उच्चावचं दैवयुक्तं रहस्यं । दिव्याः प्रश्ना मृगचक्रा मुहूर्ताः । क्षयं महान्तं कुरुसृञ्जयानां । निवेदयन्ते पाण्डवानां जयं च ॥
uccāvacaṃ daivayuktaṃ rahasyaṃ | divyāḥ praśnā mṛgacakrā muhūrtāḥ | kṣayaṃ mahāntaṃ kurusṛñjayānāṃ | nivedayante pāṇḍavānāṃ jayaṃ ca
"दैव से जुड़े ऊँच-नीच रहस्य, आकाश के दिव्य संकेत, पशुओं के झुंडों की गतियाँ और मुहूर्त — सभी कौरवों और सृंजयों के महान् विनाश और पाण्डवों की विजय की सूचना दे रहे हैं।"
श्लोक 100 (5.48.100)
यथा हि नो मन्यतेऽजातशत्रुः । संसिद्धार्थो द्विषतां निग्रहाय । जनार्दनश्चाप्यपरोक्षविद्यो । न संशयं पश्यति वृष्णिसिंहः ॥
yathā hi no manyate'jātaśatruḥ | saṃsiddhārtho dviṣatāṃ nigrahāya | janārdanaścāpyaparokṣavidyo | na saṃśayaṃ paśyati vṛṣṇisiṃhaḥ
"क्योंकि अजातशत्रु मानते हैं कि शत्रुओं के दमन का उनका प्रयोजन सिद्ध हो चुका है; और प्रत्यक्ष ज्ञान वाले वृष्णिसिंह जनार्दन भी इसमें कोई संशय नहीं देखते।"
श्लोक 101 (5.48.101)
अहं तथैनं खलु भाविरूपं । पश्यामि बुद्ध्या स्वयमप्रमत्तः । दृष्टिश्च मे न व्यथते पुराणी । संयुध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति ॥
ahaṃ tathainaṃ khalu bhāvirūpaṃ | paśyāmi buddhyā svayamapramattaḥ | dṛṣṭiśca me na vyathate purāṇī | saṃyudhyamānā dhārtarāṣṭrā na santi
"मैं भी स्वयं सावधान रहकर अपनी बुद्धि से होनहार का स्वरूप इसी प्रकार देखता हूँ; और मेरी पुरानी, परखी हुई दृष्टि डगमगाती नहीं — युद्ध करने वाले धृतराष्ट्र-पुत्र नहीं बचेंगे।"
श्लोक 102 (5.48.102)
अनालब्धं जृम्भति गाण्डिवं धनु- । रनाहता कम्पति मे धनुर्ज्या । बाणाश्च मे तूणमुखाद्विसृत्य । मुहुर्मुहुर्गन्तुमुशन्ति चैव ॥
anālabdhaṃ jṛmbhati gāṇḍivaṃ dhanu- | ranāhatā kampati me dhanurjyā | bāṇāśca me tūṇamukhādvisṛtya | muhurmuhurgantumuśanti caiva
"बिना छुए ही मेरा गाण्डीव धनुष अंगड़ाई लेता है, बिना चोट किए मेरी प्रत्यंचा काँपती है, और मेरे बाण तरकश के मुख से निकल-निकलकर बार-बार उड़ जाने को उत्सुक होते हैं।"
श्लोक 103 (5.48.103)
खड्गः कोशान्निःसरति प्रसन्नो । हित्वेव जीर्णामुरगस्त्वचं स्वाम् । ध्वजे वाचो रौद्ररूपा भवन्ति । कदा रथो योक्ष्यते ते किरीटिन् ॥
khaḍgaḥ kośānniḥsarati prasanno | hitveva jīrṇāmuragastvacaṃ svām | dhvaje vāco raudrarūpā bhavanti | kadā ratho yokṣyate te kirīṭin
"मेरी तलवार चमकती हुई म्यान से बाहर निकल आती है, जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुली छोड़ देता है; और मेरी ध्वजा पर भयंकर वाणियाँ उठती हैं — 'हे किरीटी, तुम्हारा रथ कब जोता जाएगा?'"
श्लोक 104 (5.48.104)
गोमायुसङ्घाश्च नदन्ति रात्रौ । रक्षांस्यथो निष्पतन्त्यन्तरिक्षात् । मृगाः शृगालाः शितिकण्ठाश्च काका । गृध्रा बकाश्चैव तरक्षवश्च ॥
gomāyusaṅghāśca nadanti rātrau | rakṣāṃsyatho niṣpatantyantarikṣāt | mṛgāḥ śṛgālāḥ śitikaṇṭhāśca kākā | gṛdhrā bakāścaiva tarakṣavaśca
"रात में गीदड़ों के झुंड हुआँ-हुआँ करते हैं, आकाश से राक्षस नीचे उतर आते हैं; मृग, सियार, मोर, कौए, गिद्ध, बगुले और लकड़बग्घे —"
श्लोक 105 (5.48.105)
सुवर्णपत्राश्च पतन्ति पश्चा- । द्दृष्ट्वा रथं श्वेतहयप्रयुक्तम् । अहं ह्येकः पार्थिवान्सर्वयोधान् । शरान्वर्षन्मृत्युलोकं नयेयम् ॥
suvarṇapatrāśca patanti paścā- | ddṛṣṭvā rathaṃ śvetahayaprayuktam | ahaṃ hyekaḥ pārthivānsarvayodhān | śarānvarṣanmṛtyulokaṃ nayeyam
"और सुनहरे पंखों वाले पक्षी श्वेत घोड़ों से जुते मेरे रथ को देखकर उसके पीछे-पीछे उड़ते हैं। मैं अकेला ही बाणों की वर्षा करके सब योद्धा राजाओं को मृत्युलोक पहुँचा सकता हूँ।"
श्लोक 106 (5.48.106)
समाददानः पृथगस्त्रमार्गा- । न्यथाग्निरिद्धो गहनं निदाघे । स्थूणाकर्णं पाशुपतं महास्त्रं । ब्राह्मं चास्त्रं यच्च शक्रोऽप्यदान्मे ॥
samādadānaḥ pṛthagastramārgā- | nyathāgniriddho gahanaṃ nidāghe | sthūṇākarṇaṃ pāśupataṃ mahāstraṃ | brāhmaṃ cāstraṃ yacca śakro'pyadānme
"ग्रीष्म में घने वन में धधकती अग्नि की भाँति, एक-एक अस्त्र के प्रयोग-मार्ग को ग्रहण करते हुए — स्थूणाकर्ण, महान् पाशुपत अस्त्र, ब्रह्मास्त्र, और वह अस्त्र जो इन्द्र ने भी मुझे दिया है —"
श्लोक 107 (5.48.107)
वधे धृतो वेगवतः प्रमुञ्च- । न्नाहं प्रजाः किञ्चिदिहावशिष्ये । शान्तिं लप्स्ये परमो ह्येष भावः । स्थिरो मम ब्रूहि गावल्गणे तान् ॥
vadhe dhṛto vegavataḥ pramuñca- | nnāhaṃ prajāḥ kiñcidihāvaśiṣye | śāntiṃ lapsye paramo hyeṣa bhāvaḥ | sthiro mama brūhi gāvalgaṇe tān
"वध का निश्चय करके उन वेगवान् अस्त्रों को छोड़ते हुए मैं यहाँ किसी भी प्राणी को शेष नहीं छोड़ूँगा। तभी मुझे शान्ति मिलेगी — यही मेरा परम और अटल संकल्प है। हे गावल्गणि, उनसे यह कह देना।"
श्लोक 108 (5.48.108)
ये वैजय्याः समरे सूत लब्ध्वा । देवानपीन्द्रप्रमुखान्समेतान् । तैर्मन्यते कलहं संप्रसह्य । स धार्तराष्ट्रः पश्यत मोहमस्य ॥
ye vaijayyāḥ samare sūta labdhvā | devānapīndrapramukhānsametān | tairmanyate kalahaṃ saṃprasahya | sa dhārtarāṣṭraḥ paśyata mohamasya
"हे सूत, जो युद्ध में इन्द्र आदि एकत्र देवताओं से भिड़कर भी विजयी ही होते हैं, उन्हीं से वह धृतराष्ट्रपुत्र बलपूर्वक कलह ठानना चाहता है। उसकी मूर्खता तो देखो!"
श्लोक 109 (5.48.109)
वृद्धो भीष्मः शान्तनवः कृपश्च । द्रोणः सपुत्रो विदुरश्च धीमान् । एते सर्वे यद्वदन्ते तदस्तु । आयुष्मन्तः कुरवः सन्तु सर्वे ॥
vṛddho bhīṣmaḥ śāntanavaḥ kṛpaśca | droṇaḥ saputro viduraśca dhīmān | ete sarve yadvadante tadastu | āyuṣmantaḥ kuravaḥ santu sarve
"वृद्ध शान्तनुनन्दन भीष्म, कृप, पुत्र सहित द्रोण और बुद्धिमान् विदुर — ये सब जो कहते हैं, वही हो; सभी कौरव दीर्घायु हों!"