Skip to main content

उद्योग पर्व · अध्याय 49

भीष्म द्वारा कृष्ण और अर्जुन का नर-नारायण रूप में परिचय

एकत्र राजाओं के सामने भीष्म दुर्योधन को बताते हैं कि किस प्रकार देवताओं ने ऋषि नर और नारायण को ब्रह्मा को प्रणाम किए बिना निकलते देखा, उनका परिचय जाना और असुरों के विरुद्ध उनकी सहायता पाई; वे कहते हैं कि कृष्ण और अर्जुन ही वे दोनों हैं, जिन्हें मनुष्य-लोक में कोई नहीं जीत सकता। वे दुर्योधन को चेताते हैं कि वह केवल कर्ण, शकुनि और दुःशासन के मत पर चलता है। कर्ण अपनी निष्ठा का दावा करता है, तो भीष्म विराटनगर और गन्धर्वों वाले प्रसंग में पाण्डवों के सामने उसकी विफलताएँ याद दिलाते हैं। द्रोण भीष्म का समर्थन करके संधि का आग्रह करते हैं, पर धृतराष्ट्र उनकी उपेक्षा करके संजय से प्रश्न करने लगते हैं, और कौरव जीवन की आशा छोड़ देते हैं।

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.49.1)

समवेतेषु सर्वेषु तेषु राजसु भारत । दुर्योधनमिदं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥

samaveteṣu sarveṣu teṣu rājasu bhārata | duryodhanamidaṃ vākyaṃ bhīṣmaḥ śāntanavo'bravīt

हे भारत, जब वे सब राजा एकत्र हो गए, तब शान्तनुनन्दन भीष्म ने दुर्योधन से यह बात कही—

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (5.49.2)

बृहस्पतिश्चोशना च ब्रह्माणं पर्युपस्थितौ । मरुतश्च सहेन्द्रेण वसवश्चाग्निना सह ॥

bṛhaspatiścośanā ca brahmāṇaṃ paryupasthitau | marutaśca sahendreṇa vasavaścāgninā saha

"एक समय बृहस्पति और शुक्राचार्य ब्रह्मा जी की सेवा में उपस्थित हुए; उनके साथ इन्द्र सहित मरुद्गण और अग्नि सहित वसु भी आए,

श्लोक 3 (5.49.3)

आदित्याश्चैव साध्याश्च ये च सप्तर्षयो दिवि । विश्वावसुश्च गन्धर्वः शुभाश्चाप्सरसां गणाः ॥

ādityāścaiva sādhyāśca ye ca saptarṣayo divi | viśvāvasuśca gandharvaḥ śubhāścāpsarasāṃ gaṇāḥ

आदित्य, साध्य, स्वर्ग में रहने वाले सप्तर्षि, गन्धर्व विश्वावसु और अप्सराओं के सुन्दर समूह भी।

श्लोक 4 (5.49.4)

नमस्कृत्योपजग्मुस्ते लोकवृद्धं पितामहम् । परिवार्य च विश्वेशं पर्यासत दिवौकसः ॥

namaskṛtyopajagmuste lokavṛddhaṃ pitāmaham | parivārya ca viśveśaṃ paryāsata divaukasaḥ

उन स्वर्गवासियों ने लोकों में सबसे वृद्ध पितामह को प्रणाम किया और उन विश्वेश्वर को घेरकर बैठ गए।

श्लोक 5 (5.49.5)

तेषां मनश्च तेजश्चाप्याददानाविवौजसा । पूर्वदेवौ व्यतिक्रान्तौ नरनारायणावृषी ॥

teṣāṃ manaśca tejaścāpyādadānāvivaujasā | pūrvadevau vyatikrāntau naranārāyaṇāvṛṣī

तभी दो प्राचीन देव, ऋषि नर और नारायण, मानो अपने ओज से सबके मन और तेज को हरते हुए, उनके पास से आगे निकल गए।

श्लोक 6 (5.49.6)

बृहस्पतिस्तु पप्रच्छ ब्रह्माणं काविमाविति । भवन्तं नोपतिष्ठेते तौ नः शंस पितामह ॥

bṛhaspatistu papraccha brahmāṇaṃ kāvimāviti | bhavantaṃ nopatiṣṭhete tau naḥ śaṃsa pitāmaha

बृहस्पति ने ब्रह्मा से पूछा—'ये दोनों कौन हैं, जो आपकी सेवा में उपस्थित नहीं होते? पितामह, हमें इनके विषय में बताइए।'

ब्रह्मोवाच

श्लोक 7 (5.49.7)

यावेतौ पृथिवीं द्यां च भासयन्तौ तपस्विनौ । ज्वलन्तौ रोचमानौ च व्याप्यातीतौ महाबलौ ॥

yāvetau pṛthivīṃ dyāṃ ca bhāsayantau tapasvinau | jvalantau rocamānau ca vyāpyātītau mahābalau

'ये जो दोनों तपस्वी पृथ्वी और आकाश को प्रकाशित कर रहे हैं, जो दीप्तिमान और तेजस्वी हैं, जो सबमें व्याप्त होकर उससे भी परे चले गए हैं, वे महाबली

श्लोक 8 (5.49.8)

नरनारायणावेतौ लोकाल्लोकं समास्थितौ । ऊर्जितौ स्वेन तपसा महासत्वपराक्रमौ ॥

naranārāyaṇāvetau lokāllokaṃ samāsthitau | ūrjitau svena tapasā mahāsatvaparākramau

नर और नारायण हैं, जो एक लोक से दूसरे लोक में विचरते हैं; वे अपनी तपस्या से बलशाली हैं और महान् सत्त्व तथा पराक्रम से युक्त हैं।

श्लोक 9 (5.49.9)

एतौ हि कर्मणा लोकं नन्दयामासतुर्ध्रुवम् । द्विधाभूतौ महाप्राज्ञौ विद्धि ब्रह्मन्परन्तपौ । असुराणां विनाशाय देवगन्धर्वपूजितौ ॥

etau hi karmaṇā lokaṃ nandayāmāsaturdhruvam | dvidhābhūtau mahāprājñau viddhi brahmanparantapau | asurāṇāṃ vināśāya devagandharvapūjitau

अपने कर्मों से इन दोनों ने सदा संसार को आनन्दित किया है। हे ब्रह्मन्, इन्हें एक ही सत्ता के दो रूप, परम ज्ञानी और शत्रुओं को तपाने वाले जानो; देवता और गन्धर्व इनकी पूजा करते हैं, और ये असुरों के विनाश के लिए हैं।'

भीष्म उवाच

श्लोक 10 (5.49.10)

जगाम शक्रस्तच्छ्रुत्वा यत्र तौ तेपतुस्तपः । सार्धं देवगणैः सर्वैर्बृहस्पतिपुरोगमैः ॥

jagāma śakrastacchrutvā yatra tau tepatustapaḥ | sārdhaṃ devagaṇaiḥ sarvairbṛhaspatipurogamaiḥ

यह सुनकर इन्द्र बृहस्पति आदि सब देवगणों के साथ वहाँ गए जहाँ वे दोनों तप कर रहे थे।

श्लोक 11 (5.49.11)

तदा देवासुरे युद्धे भये जाते दिवौकसाम् । अयाचत महात्मानौ नरनारायणौ वरम् ॥

tadā devāsure yuddhe bhaye jāte divaukasām | ayācata mahātmānau naranārāyaṇau varam

उस समय देवासुर-संग्राम छिड़ने से स्वर्गवासियों में भय उत्पन्न हो गया था; तब इन्द्र ने महात्मा नर-नारायण से वर माँगा।

श्लोक 12 (5.49.12)

तावब्रूतां वृणीष्वेति तदा भरतसत्तम । अथैतावब्रवीच्छक्रः साह्यं नः क्रियतामिति ॥

tāvabrūtāṃ vṛṇīṣveti tadā bharatasattama | athaitāvabravīcchakraḥ sāhyaṃ naḥ kriyatāmiti

हे भरतश्रेष्ठ, तब उन दोनों ने कहा—'वर माँगो।' इस पर इन्द्र ने उनसे कहा—'हमारी सहायता कीजिए।'

श्लोक 13 (5.49.13)

ततस्तौ शक्रमब्रूतां करिष्यावो यदिच्छसि । ताभ्यां च सहितः शक्रो विजिग्ये दैत्यदानवान् ॥

tatastau śakramabrūtāṃ kariṣyāvo yadicchasi | tābhyāṃ ca sahitaḥ śakro vijigye daityadānavān

तब उन दोनों ने इन्द्र से कहा—'तुम जो चाहते हो, वही करेंगे।' और उनके साथ मिलकर इन्द्र ने दैत्यों और दानवों को जीत लिया।

श्लोक 14 (5.49.14)

नर इन्द्रस्य संग्रामे हत्वा शत्रून्परन्तपः । पौलोमान्कालखञ्जांश्च सहस्राणि शतानि च ॥

nara indrasya saṃgrāme hatvā śatrūnparantapaḥ | paulomānkālakhañjāṃśca sahasrāṇi śatāni ca

इन्द्र के संग्राम में शत्रुओं को तपाने वाले नर ने शत्रुओं का संहार किया—पौलोमों और कालखञ्जों को, सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में।

श्लोक 15 (5.49.15)

एष भ्रान्ते रथे तिष्ठन्भल्लेनापाहरच्छिरः । जम्भस्य ग्रसमानस्य तदा ह्यर्जुन आहवे ॥

eṣa bhrānte rathe tiṣṭhanbhallenāpāharacchiraḥ | jambhasya grasamānasya tadā hyarjuna āhave

घूमते हुए रथ पर खड़े इसी अर्जुन ने तब युद्ध में भल्ल बाण से जम्भ का सिर काट डाला था, जब वह निगल जाने को उद्यत था।

श्लोक 16 (5.49.16)

एष पारे समुद्रस्य हिरण्यपुरमारुजत् । हत्वा षष्टिं सहस्राणि निवातकवचान्रणे ॥

eṣa pāre samudrasya hiraṇyapuramārujat | hatvā ṣaṣṭiṃ sahasrāṇi nivātakavacānraṇe

इसी ने समुद्र के उस पार हिरण्यपुर को ध्वस्त किया, युद्ध में साठ हज़ार निवातकवचों को मारकर।

श्लोक 17 (5.49.17)

एष देवान्सहेन्द्रेण जित्वा परपुरञ्जयः । अतर्पयन्महाबाहुरर्जुनो जातवेदसम् ॥

eṣa devānsahendreṇa jitvā parapurañjayaḥ | atarpayanmahābāhurarjuno jātavedasam

शत्रुओं के नगर जीतने वाले इसी महाबाहु अर्जुन ने इन्द्र सहित देवताओं को जीतकर अग्नि (जातवेदा) को तृप्त किया था।

श्लोक 18 (5.49.18)

नारायणस्तथैवात्र भूयसोऽन्याञ्जघान ह । एवमेतौ महावीर्यौ तौ पश्यत समागतौ ॥

nārāyaṇastathaivātra bhūyaso'nyāñjaghāna ha | evametau mahāvīryau tau paśyata samāgatau

उसी प्रकार नारायण ने भी वहाँ और बहुत-से शत्रुओं का वध किया। इस प्रकार इन दोनों महापराक्रमी वीरों को एक साथ आया हुआ देखो—

श्लोक 19 (5.49.19)

वासुदेवार्जुनौ वीरौ समवेतौ महारथौ । नरनारायणौ देवौ पूर्वदेवाविति श्रुतिः ॥

vāsudevārjunau vīrau samavetau mahārathau | naranārāyaṇau devau pūrvadevāviti śrutiḥ

वीर वासुदेव और अर्जुन, जो दोनों महारथी एक साथ हैं। परम्परा कहती है कि ये ही प्राचीन देव नर और नारायण हैं।

श्लोक 20 (5.49.20)

अजेयौ मानुषे लोके सेन्द्रैरपि सुरासुरैः । एष नारायणः कृष्णः फाल्गुनश्च नरः स्मृतः । नारायणो नरश्चैव सत्त्वमेकं द्विधा कृतम् ॥

ajeyau mānuṣe loke sendrairapi surāsuraiḥ | eṣa nārāyaṇaḥ kṛṣṇaḥ phālgunaśca naraḥ smṛtaḥ | nārāyaṇo naraścaiva sattvamekaṃ dvidhā kṛtam

मनुष्य-लोक में इन्द्र सहित देवता और असुर भी इन्हें नहीं जीत सकते। ये कृष्ण नारायण हैं और फाल्गुन (अर्जुन) नर माने गए हैं; नारायण और नर एक ही सत्ता हैं, जो दो रूपों में बँट गई है।

श्लोक 21 (5.49.21)

एतौ हि कर्मणा लोकानश्नुवातेऽक्षयान्ध्रुवान् । तत्रतत्रैव जायेते युद्धकाले पुनःपुनः ॥

etau hi karmaṇā lokānaśnuvāte'kṣayāndhruvān | tatratatraiva jāyete yuddhakāle punaḥpunaḥ

अपने कर्मों से ये दोनों अक्षय और शाश्वत लोकों को प्राप्त करते हैं, और जब-जब युद्ध का समय आता है, तब-तब वहाँ-वहाँ बार-बार जन्म लेते हैं।

श्लोक 22 (5.49.22)

तस्मात्कर्मैव कर्तव्यमिति होवाच नारदः । एतद्धि सर्वमाचष्ट वृष्णिचक्रस्य वेदवित् ॥

tasmātkarmaiva kartavyamiti hovāca nāradaḥ | etaddhi sarvamācaṣṭa vṛṣṇicakrasya vedavit

'इसलिए कर्म ही करना चाहिए'—ऐसा नारद ने कहा था। वेदों के ज्ञाता नारद ने वृष्णि-मण्डल के विषय में यह सब बताया था।

श्लोक 23 (5.49.23)

शङ्खचक्रगदाहस्तं यदा द्रक्ष्यसि केशवम् । पर्याददानं चास्त्राणि भीमधन्वानमर्जुनम् ॥

śaṅkhacakragadāhastaṃ yadā drakṣyasi keśavam | paryādadānaṃ cāstrāṇi bhīmadhanvānamarjunam

जब तुम शंख, चक्र और गदा हाथ में लिए केशव को, और अस्त्र धारण करते हुए भयंकर धनुष वाले अर्जुन को देखोगे,

श्लोक 24 (5.49.24)

सनातनौ महात्मानौ कृष्णावेकरथे स्थितौ । दुर्योधन तदा तात स्मर्तासि वचनं मम ॥

sanātanau mahātmānau kṛṣṇāvekarathe sthitau | duryodhana tadā tāta smartāsi vacanaṃ mama

जब वे दोनों सनातन महात्मा कृष्ण एक ही रथ पर खड़े होंगे, तब, बेटा दुर्योधन, तुम्हें मेरी बात याद आएगी।

श्लोक 25 (5.49.25)

नोचेदयमभावः स्यात्कुरूणां प्रत्युपस्थितः । अर्थाच्च तात धर्माच्च तव बुद्धिरुपप्लुता ॥

nocedayamabhāvaḥ syātkurūṇāṃ pratyupasthitaḥ | arthācca tāta dharmācca tava buddhirupaplutā

नहीं तो कुरुओं का यह विनाश सामने ही खड़ा है; बेटा, तुम्हारी बुद्धि अर्थ और धर्म दोनों से भटक गई है।

श्लोक 26 (5.49.26)

न चेद्ग्रहीष्यसे वाक्यं श्रोतासि सुबहून्हतान् । तवैव हि मतं सर्वे कुरवः पर्युपासते ॥

na cedgrahīṣyase vākyaṃ śrotāsi subahūnhatān | tavaiva hi mataṃ sarve kuravaḥ paryupāsate

यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे, तो बहुत-से लोगों के मारे जाने का समाचार सुनोगे; क्योंकि सब कौरव तुम्हारे ही मत पर चलते हैं।

श्लोक 27 (5.49.27)

त्रयाणामेव च मतं तत्त्वमेकोऽनुमन्यसे । रामेण चैव शप्तस्य कर्णस्य भरतर्षभ ॥

trayāṇāmeva ca mataṃ tattvameko'numanyase | rāmeṇa caiva śaptasya karṇasya bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, और तुम अकेले केवल तीन लोगों के मत को ही सत्य मानते हो—परशुराम द्वारा शापित कर्ण के,

श्लोक 28 (5.49.28)

दुर्जातेः सूतपुत्रस्य शकुनेः सौबलस्य च । तथा क्षुद्रस्य पापस्य भ्रातुर्दुःशासनस्य च ॥

durjāteḥ sūtaputrasya śakuneḥ saubalasya ca | tathā kṣudrasya pāpasya bhrāturduḥśāsanasya ca

उस नीच कुल में जन्मे सूतपुत्र के, सुबलपुत्र शकुनि के, और अपने क्षुद्र तथा पापी भाई दुःशासन के।"

कर्ण उवाच

श्लोक 29 (5.49.29)

नैवमायुष्मता वाच्यं यन्मामात्थ पितामह । क्षत्रधर्मे स्थितो ह्यस्मि स्वधर्मादनपेयिवान् ॥

naivamāyuṣmatā vācyaṃ yanmāmāttha pitāmaha | kṣatradharme sthito hyasmi svadharmādanapeyivān

"पितामह, आपने मुझसे जो कहा, वैसा आप जैसे आयुष्मान् पुरुष को नहीं कहना चाहिए। मैं क्षत्रिय-धर्म में स्थित हूँ और अपने धर्म से कभी विचलित नहीं हुआ।

श्लोक 30 (5.49.30)

किञ्चान्यन्मयि दुर्वृत्तं येन मां परिगर्हसे । न हि मे वृजिनं किञ्चिद्धार्तराष्ट्रा विदुः क्वचित् ॥

kiñcānyanmayi durvṛttaṃ yena māṃ parigarhase | na hi me vṛjinaṃ kiñciddhārtarāṣṭrā viduḥ kvacit

मुझमें और कौन-सा दुराचार है, जिसके लिए आप मेरी निन्दा करते हैं? धृतराष्ट्र के पुत्र कहीं भी मेरा कोई पाप नहीं जानते।

श्लोक 31 (5.49.31)

नाचरं वृजिनं किञ्चिद्धार्तराष्ट्रस्य नित्यशः । अहं हि पाण्डवान्सर्वान्हनिष्यामि रणे स्थितान् ॥

nācaraṃ vṛjinaṃ kiñciddhārtarāṣṭrasya nityaśaḥ | ahaṃ hi pāṇḍavānsarvānhaniṣyāmi raṇe sthitān

मैंने धृतराष्ट्र-पुत्र का कभी कोई अहित नहीं किया। रणभूमि में खड़े सब पाण्डवों को मैं मार डालूँगा।

श्लोक 32 (5.49.32)

प्राग्विरुद्धैः शमं सद्भिः कथं वा क्रियते पुनः । राज्ञो हि धृतराष्ट्रस्य सर्वं कार्यं प्रियं मया । तथा दुर्योधनस्यापि स हि राज्ये समाहितः ॥

prāgviruddhaiḥ śamaṃ sadbhiḥ kathaṃ vā kriyate punaḥ | rājño hi dhṛtarāṣṭrasya sarvaṃ kāryaṃ priyaṃ mayā | tathā duryodhanasyāpi sa hi rājye samāhitaḥ

जो पहले से विरोधी हैं, उनसे सज्जन फिर संधि कैसे कर सकते हैं? मैं जो कुछ करता हूँ, वह राजा धृतराष्ट्र का प्रिय करने के लिए करता हूँ, और दुर्योधन का भी, क्योंकि वही राज्य पर प्रतिष्ठित है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 33 (5.49.33)

कर्णस्य तु वचः श्रुत्वा भीष्मः शान्तनवः पुनः । धृतराष्ट्रं महाराजमाभाष्येदं वचोऽब्रवीत् ॥

karṇasya tu vacaḥ śrutvā bhīṣmaḥ śāntanavaḥ punaḥ | dhṛtarāṣṭraṃ mahārājamābhāṣyedaṃ vaco'bravīt

कर्ण की बात सुनकर शान्तनुनन्दन भीष्म ने फिर महाराज धृतराष्ट्र को सम्बोधित करके यह कहा—

भीष्म उवाच

श्लोक 34 (5.49.34)

यदयं कत्थते नित्यं हन्ताहं पाण्डवानिति । नायं कलापि संपूर्णा पाण्डवानां महात्मनाम् ॥

yadayaṃ katthate nityaṃ hantāhaṃ pāṇḍavāniti | nāyaṃ kalāpi saṃpūrṇā pāṇḍavānāṃ mahātmanām

"यह सदा डींग मारता है कि 'मैं पाण्डवों को मार डालूँगा', पर यह महात्मा पाण्डवों की एक कला के बराबर भी नहीं है।

श्लोक 35 (5.49.35)

अनयो योऽयमागन्ता पुत्राणां ते दुरात्मनाम् । तदस्य कर्म जानीहि सूतपुत्रस्य दुर्मतेः ॥

anayo yo'yamāgantā putrāṇāṃ te durātmanām | tadasya karma jānīhi sūtaputrasya durmateḥ

तुम्हारे दुष्ट पुत्रों पर जो यह अनर्थ आने वाला है, उसे इसी दुर्बुद्धि सूतपुत्र का काम समझो।

श्लोक 36 (5.49.36)

एतमाश्रित्य पुत्रस्ते मन्दबुद्धिः सुयोधनः । अवामन्यत तान्वीरान्देवपुत्रानरिन्दमान् ॥

etamāśritya putraste mandabuddhiḥ suyodhanaḥ | avāmanyata tānvīrāndevaputrānarindamān

इसी का आश्रय लेकर तुम्हारे मन्दबुद्धि पुत्र सुयोधन ने उन देवपुत्र, शत्रुदमन वीरों का अपमान किया है।

श्लोक 37 (5.49.37)

किञ्चाप्येतेन तत्कर्म कृतपूर्वं सुदुष्करम् । तैर्यथा पाण्डवैः सर्वैरेकैकेन कृतं पुरा ॥

kiñcāpyetena tatkarma kṛtapūrvaṃ suduṣkaram | tairyathā pāṇḍavaiḥ sarvairekaikena kṛtaṃ purā

इसने ऐसा कौन-सा अत्यन्त कठिन काम पहले कभी किया है, जैसा पाण्डवों में से प्रत्येक ने पहले किया है?

श्लोक 38 (5.49.38)

दृष्ट्वा विराटनगरे भ्रातरं निहतं प्रियम् । धनञ्जयेन विक्रम्य किमनेन तदा कृतम् ॥

dṛṣṭvā virāṭanagare bhrātaraṃ nihataṃ priyam | dhanañjayena vikramya kimanena tadā kṛtam

विराटनगर में जब इसने धनञ्जय के पराक्रम से अपने प्रिय भाई को मारा गया देखा, तब इसने क्या किया?

श्लोक 39 (5.49.39)

सर्वे ह्यस्त्रविदः शूराः सर्वे प्राप्ता महद्यशः । अपि सर्वामरैश्वर्यं त्यजेयुर्न पुनर्जयम् ॥

sarve hyastravidaḥ śūrāḥ sarve prāptā mahadyaśaḥ | api sarvāmaraiśvaryaṃ tyajeyurna punarjayam

वे सब अस्त्रविद्या में निपुण शूरवीर हैं, सबने महान् यश पाया है; वे समस्त देवताओं का ऐश्वर्य भले छोड़ दें, पर विजय कभी नहीं छोड़ेंगे।

श्लोक 40 (5.49.40)

सहितान्हि कुरून्सर्वानभियातो धनञ्जयः । प्रमथ्य चाच्छिनद्वासः किमयं प्रोषितस्तदा ॥

sahitānhi kurūnsarvānabhiyāto dhanañjayaḥ | pramathya cācchinadvāsaḥ kimayaṃ proṣitastadā

जब धनञ्जय ने इकट्ठे सब कौरवों पर चढ़ाई की और उन्हें मथकर उनके वस्त्र छीन लिए, तब क्या यह कहीं परदेश गया हुआ था?

श्लोक 41 (5.49.41)

गन्धर्वैर्घोषयात्रायां ह्रियते यत्सुतस्तव । क्व तदा सूतपुत्रोऽभूद्य इदानीं वृषायते ॥

gandharvairghoṣayātrāyāṃ hriyate yatsutastava | kva tadā sūtaputro'bhūdya idānīṃ vṛṣāyate

घोषयात्रा के समय जब गन्धर्व तुम्हारे पुत्र को हरकर ले जा रहे थे, तब यह सूतपुत्र कहाँ था, जो अब साँड़ की तरह गरज रहा है?

श्लोक 42 (5.49.42)

ननु तत्रापि भीमेन पार्थेन च महात्मना । यमाभ्यामेव संगम्य गन्धर्वास्ते पराजिताः ॥

nanu tatrāpi bhīmena pārthena ca mahātmanā | yamābhyāmeva saṃgamya gandharvāste parājitāḥ

क्या वहाँ भी भीम, महात्मा पार्थ और नकुल-सहदेव ने मिलकर ही उन गन्धर्वों को पराजित नहीं किया था?

श्लोक 43 (5.49.43)

एतान्यस्य मृषोक्तानि बहूनि भरतर्षभ । विकत्थनस्य भद्रं ते सदा धर्मार्थलोपिनः ॥

etānyasya mṛṣoktāni bahūni bharatarṣabha | vikatthanasya bhadraṃ te sadā dharmārthalopinaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, आपका कल्याण हो; सदा धर्म और अर्थ का नाश करने वाले इस डींगबाज़ की ऐसी बहुत-सी झूठी बातें हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 44 (5.49.44)

भीष्मस्य तु वचः श्रुत्वा भारद्वाजो महामनाः । धृतराष्ट्रमुवाचेदं राजमध्येऽभिपूजयन् ॥

bhīṣmasya tu vacaḥ śrutvā bhāradvājo mahāmanāḥ | dhṛtarāṣṭramuvācedaṃ rājamadhye'bhipūjayan

भीष्म की बात सुनकर महामना भरद्वाजपुत्र द्रोण ने राजाओं के बीच भीष्म का आदर करते हुए धृतराष्ट्र से यह कहा—

द्रोण उवाच

श्लोक 45 (5.49.45)

यदाह भरतश्रेष्ठो भीष्मस्तत्क्रियतां नृप । न काममवलिप्तानां वचनं कर्तुमर्हसि ॥

yadāha bharataśreṣṭho bhīṣmastatkriyatāṃ nṛpa | na kāmamavaliptānāṃ vacanaṃ kartumarhasi

"हे राजन्, भरतश्रेष्ठ भीष्म ने जो कहा है, वही कीजिए। घमंडी लोगों की बात पर चलना आपको उचित नहीं।

श्लोक 46 (5.49.46)

पुरा युद्धात्साधु मन्ये पाण्डवैः सह सङ्गतम् । यद्वाक्यमर्जुनेनोक्तं सञ्जयेन निवेदितम् ॥

purā yuddhātsādhu manye pāṇḍavaiḥ saha saṅgatam | yadvākyamarjunenoktaṃ sañjayena niveditam

मैं युद्ध से पहले ही पाण्डवों के साथ मेल कर लेना अच्छा समझता हूँ। अर्जुन ने जो वचन कहा है और संजय ने जिसे सुनाया है,

श्लोक 47 (5.49.47)

सर्वं तदभिजानामि करिष्यति च पाण्डवः । न ह्यस्य त्रिषु लोकेषु सदृशोऽस्ति धनुर्धरः ॥

sarvaṃ tadabhijānāmi kariṣyati ca pāṇḍavaḥ | na hyasya triṣu lokeṣu sadṛśo'sti dhanurdharaḥ

वह सब मैं जानता हूँ; पाण्डुपुत्र उसे पूरा करके रहेगा, क्योंकि तीनों लोकों में उसके समान कोई धनुर्धर नहीं है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 48 (5.49.48)

अनादृत्य तु तद्वाक्यमर्थवद्द्रोणभीष्मयोः । ततः स सञ्जयं राजा पर्यपृच्छत पाण्डवान् ॥

anādṛtya tu tadvākyamarthavaddroṇabhīṣmayoḥ | tataḥ sa sañjayaṃ rājā paryapṛcchata pāṇḍavān

परन्तु राजा ने द्रोण और भीष्म की उस सार्थक बात का अनादर करके संजय से पाण्डवों के विषय में पूछा।

श्लोक 49 (5.49.49)

तदैव कुरवः सर्वे निराशा जीवितेऽभवन् । भीष्मद्रोणौ यदा राजा न सम्यगनुभाषते ॥

tadaiva kuravaḥ sarve nirāśā jīvite'bhavan | bhīṣmadroṇau yadā rājā na samyaganubhāṣate

जब राजा ने भीष्म और द्रोण को ठीक से उत्तर नहीं दिया, उसी समय सब कौरव अपने जीवन से निराश हो गए।

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50