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उद्योग पर्व · अध्याय 50

संजय की मूर्च्छा और पाण्डवों के सहायकों का वर्णन

धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि युधिष्ठिर युद्ध की तैयारी कैसे कर रहे हैं, और संजय बताते हैं कि पाञ्चाल, केकय और मत्स्य किस प्रकार हर्ष से उनके चारों ओर जुटे हैं। जब राजा पूछते हैं कि पाण्डव किनकी सहायता से लड़ेंगे, तो संजय लम्बी साँस लेकर मूर्च्छित हो जाते हैं, और विदुर सभा को इसकी सूचना देते हैं। होश में आकर संजय एक-एक करके पाण्डवों के योद्धाओं के नाम गिनाते हैं: युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, शिखण्डी, पाँचों केकय भाई, सात्यकि, विराट, काशिराज, द्रौपदी के पुत्र, अभिमन्यु, धृष्टकेतु, श्रीकृष्ण, द्रुपद और अन्य बहुत-से राजा।

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (5.50.1)

किमसौ पाण्डवो राजा धर्मपुत्रोऽभ्यभाषत । श्रुत्वेह बहुलाः सेनाः प्रीत्यर्थं नः समागताः ॥

kimasau pāṇḍavo rājā dharmaputro'bhyabhāṣata | śrutveha bahulāḥ senāḥ prītyarthaṃ naḥ samāgatāḥ

"यह सुनकर कि हमारे हित के लिए यहाँ इतनी बड़ी-बड़ी सेनाएँ इकट्ठी हुई हैं, धर्मपुत्र पाण्डव राजा ने क्या कहा?

श्लोक 2 (5.50.2)

किमसौ चेष्टते सूत योत्स्यमानो युधिष्ठिरः । के वास्य भ्रातृपुत्राणां पश्यन्त्याज्ञेप्सवो मुखम् ॥

kimasau ceṣṭate sūta yotsyamāno yudhiṣṭhiraḥ | ke vāsya bhrātṛputrāṇāṃ paśyantyājñepsavo mukham

हे सूत, युद्ध के लिए उद्यत युधिष्ठिर क्या कर रहे हैं? उनके भाइयों और पुत्रों में से कौन-कौन उनकी आज्ञा पाने की इच्छा से उनके मुख की ओर देखते हैं?

श्लोक 3 (5.50.3)

के स्विदेनं वारयन्ति युद्धाच्छाम्येति वा पुनः । निकृत्या कोपितं मन्दैर्धर्मज्ञं धर्मचारिणम् ॥

ke svidenaṃ vārayanti yuddhācchāmyeti vā punaḥ | nikṛtyā kopitaṃ mandairdharmajñaṃ dharmacāriṇam

कौन उन्हें युद्ध से रोकते हैं या फिर शान्ति करने को कहते हैं—उन धर्मज्ञ, धर्मपरायण युधिष्ठिर को, जिन्हें मूर्खों ने छल से क्रुद्ध कर दिया है?"

सञ्जय उवाच

श्लोक 4 (5.50.4)

राज्ञो मुखमुदीक्षन्ते पाञ्चालाः पाण्डवैः सह । युधिष्ठिरस्य भद्रं ते स सर्वाननुशास्ति च ॥

rājño mukhamudīkṣante pāñcālāḥ pāṇḍavaiḥ saha | yudhiṣṭhirasya bhadraṃ te sa sarvānanuśāsti ca

"आपका कल्याण हो; पाण्डवों के साथ पाञ्चाल राजा युधिष्ठिर के मुख की ओर देखते हैं, और वे सबको आदेश देते हैं।

श्लोक 5 (5.50.5)

पृथग्भूताः पाण्डवानां पाञ्चालानां रथव्रजाः । आयान्तमभिनन्दन्ति कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥

pṛthagbhūtāḥ pāṇḍavānāṃ pāñcālānāṃ rathavrajāḥ | āyāntamabhinandanti kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram

पाण्डवों और पाञ्चालों के रथ-समूह अलग-अलग दलों में खड़े होकर आते हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर का अभिनन्दन करते हैं।

श्लोक 6 (5.50.6)

नभः सूर्यमिवोद्यन्तं कौन्तेयं दीप्ततेजसम् । पाञ्चालाः प्रतिनन्दन्ति तेजोराशिमिवोदितम् ॥

nabhaḥ sūryamivodyantaṃ kaunteyaṃ dīptatejasam | pāñcālāḥ pratinandanti tejorāśimivoditam

जैसे आकाश उगते सूर्य का स्वागत करता है, वैसे ही पाञ्चाल उदित तेजपुंज के समान दीप्तिमान कुन्तीपुत्र का अभिनन्दन करते हैं।

श्लोक 7 (5.50.7)

आगोपालाविपालाश्च नन्दमाना युधिष्ठिरम् । पाञ्चालाः केकया मत्स्याः प्रतिनन्दन्ति पाण्डवम् ॥

āgopālāvipālāśca nandamānā yudhiṣṭhiram | pāñcālāḥ kekayā matsyāḥ pratinandanti pāṇḍavam

ग्वालों और गड़रियों तक सब युधिष्ठिर को देखकर आनन्दित होते हैं; पाञ्चाल, केकय और मत्स्य पाण्डुपुत्र का अभिनन्दन करते हैं।

श्लोक 8 (5.50.8)

ब्राह्मण्यो राजपुत्र्यश्च विशां दुहितरश्च याः । क्रीडन्त्योऽभिसमायान्ति पार्थं सन्नद्धमीक्षितुम् ॥

brāhmaṇyo rājaputryaśca viśāṃ duhitaraśca yāḥ | krīḍantyo'bhisamāyānti pārthaṃ sannaddhamīkṣitum

ब्राह्मणियाँ, राजकुमारियाँ और वैश्यों की कन्याएँ क्रीड़ा करती हुई कवच धारण किए पार्थ को देखने के लिए आती हैं।"

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 9 (5.50.9)

सञ्जयाचक्ष्व येनास्मान्पाण्डवा अभ्ययुञ्जत । धृष्टद्युम्नस्य सैन्येन सोमकानां बलेन च ॥

sañjayācakṣva yenāsmānpāṇḍavā abhyayuñjata | dhṛṣṭadyumnasya sainyena somakānāṃ balena ca

"संजय, बताओ कि पाण्डवों ने किनकी सहायता से हम पर चढ़ाई की है—धृष्टद्युम्न की सेना और सोमकों के बल के साथ?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (5.50.10)

गावल्गणिस्तु तत्पृष्टः सभायां कुरुसंसदि । निःश्वस्य सुभृशं दीर्घं मुहुः सञ्चिन्तयन्निव ॥

gāvalgaṇistu tatpṛṣṭaḥ sabhāyāṃ kurusaṃsadi | niḥśvasya subhṛśaṃ dīrghaṃ muhuḥ sañcintayanniva

कौरवों की सभा में ऐसा पूछे जाने पर गवल्गणपुत्र संजय ने बहुत लम्बी और गहरी साँस ली, मानो बार-बार कुछ सोच रहा हो।

श्लोक 11 (5.50.11)

तत्रानिमित्ततो दैवात्सूतं कश्मलमाविशत् । तदाचचक्षे विदुरः सभायां राजसंसदि ॥

tatrānimittato daivātsūtaṃ kaśmalamāviśat | tadācacakṣe viduraḥ sabhāyāṃ rājasaṃsadi

तब बिना किसी कारण, दैववश, उस सूत को मूर्च्छा आ गई; और विदुर ने राजसभा में यह सूचना दी—

विदुर उवाच

श्लोक 12 (5.50.12)

सञ्जयोऽयं महाराज मूर्छितः पतितो भुवि । वाचं न सृजते कांचिद्धीनप्रज्ञोऽल्पचेतनः ॥

sañjayo'yaṃ mahārāja mūrchitaḥ patito bhuvi | vācaṃ na sṛjate kāṃciddhīnaprajño'lpacetanaḥ

"महाराज, यह संजय मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा है। यह कुछ भी नहीं बोल रहा; इसकी बुद्धि लुप्त है और चेतना क्षीण है।"

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 13 (5.50.13)

अपश्यत्सञ्जयो नूनं कुन्तीपुत्रान्महारथान् । तैरस्य पुरुषव्याघ्रैर्भृशमुद्वेजितं मनः ॥

apaśyatsañjayo nūnaṃ kuntīputrānmahārathān | tairasya puruṣavyāghrairbhṛśamudvejitaṃ manaḥ

"निश्चय ही संजय ने कुन्ती के महारथी पुत्रों को देखा है; उन पुरुषसिंहों ने इसके मन को अत्यन्त व्याकुल कर दिया है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (5.50.14)

सञ्जयश्चेतनां लब्ध्वा प्रत्याश्वस्येदमब्रवीत् । धृतराष्ट्रं महाराज सभायां कुरुसंसदि ॥

sañjayaścetanāṃ labdhvā pratyāśvasyedamabravīt | dhṛtarāṣṭraṃ mahārāja sabhāyāṃ kurusaṃsadi

हे महाराज, संजय ने चेतना पाकर और सँभलकर कौरवों की सभा में धृतराष्ट्र से यह कहा—

सञ्जय उवाच

श्लोक 15 (5.50.15)

दृष्टवानस्मि राजेन्द्र कुन्तीपुत्रान्महारथान् । मत्स्यराजगृहावासनिरोधेनावकर्शितान् ॥

dṛṣṭavānasmi rājendra kuntīputrānmahārathān | matsyarājagṛhāvāsanirodhenāvakarśitān

"राजेन्द्र, मैंने कुन्ती के महारथी पुत्रों को देखा है, जो मत्स्यराज के घर में छिपकर रहने के बन्धन से दुर्बल हो गए हैं।

श्लोक 16 (5.50.16)

शृणु यैर्हि महाराज पाण्डवा अभ्ययुञ्जत । धृष्टद्युम्नेन वीरेण युद्धे वस्तेऽभ्ययुञ्जत ॥

śṛṇu yairhi mahārāja pāṇḍavā abhyayuñjata | dhṛṣṭadyumnena vīreṇa yuddhe vaste'bhyayuñjata

महाराज, सुनिए कि किनके साथ पाण्डवों ने आप पर चढ़ाई की है। वीर धृष्टद्युम्न के साथ उन्होंने युद्ध के लिए आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 17 (5.50.17)

यो नैव रोषान्न भयान्न लोभान्नार्थकारणात् । न हेतुवादाद्धर्मात्मा सत्यं जह्यात्कदाचन ॥

yo naiva roṣānna bhayānna lobhānnārthakāraṇāt | na hetuvādāddharmātmā satyaṃ jahyātkadācana

जो धर्मात्मा न क्रोध से, न भय से, न लोभ से, न धन के कारण, न तर्क-वितर्क से कभी सत्य को छोड़ते हैं;

श्लोक 18 (5.50.18)

यः प्रमाणं महाराज धर्मे धर्मभृतां वरः । अजातशत्रुणा तेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥

yaḥ pramāṇaṃ mahārāja dharme dharmabhṛtāṃ varaḥ | ajātaśatruṇā tena pāṇḍavā abhyayuñjata

महाराज, जो धर्म के विषय में प्रमाण हैं और धर्मधारियों में श्रेष्ठ हैं—उन अजातशत्रु के साथ पाण्डवों ने आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 19 (5.50.19)

यस्य बाहुबले तुल्यः पृथिव्यां नास्ति कश्चन । यो वै सर्वान्महीपालान्वशे चक्रे धनुर्धरः । यः काशीनङ्गमगधान्कलिङ्गांश्च युधाजयत् ॥

yasya bāhubale tulyaḥ pṛthivyāṃ nāsti kaścana | yo vai sarvānmahīpālānvaśe cakre dhanurdharaḥ | yaḥ kāśīnaṅgamagadhānkaliṅgāṃśca yudhājayat

जिनके बाहुबल की बराबरी करने वाला पृथ्वी पर कोई नहीं है, जिस धनुर्धर ने सब राजाओं को वश में कर लिया, जिसने युद्ध में काशी, अङ्ग, मगध और कलिङ्ग देशों को जीता—

श्लोक 20 (5.50.20)

तेन वो भीमसेनेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत । यस्य वीर्येण सहसा चत्वारो भुवि पाण्डवाः ॥

tena vo bhīmasenena pāṇḍavā abhyayuñjata | yasya vīryeṇa sahasā catvāro bhuvi pāṇḍavāḥ

उन भीमसेन के साथ पाण्डवों ने आप पर चढ़ाई की है; जिनके पराक्रम से पृथ्वी पर चारों पाण्डव शीघ्र ही

श्लोक 21 (5.50.21)

निःसृत्य जतुगेहाद्वै हिडिम्बात्पुरुषादकात् । यश्चैषामभवद्द्वीपः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ॥

niḥsṛtya jatugehādvai hiḍimbātpuruṣādakāt | yaścaiṣāmabhavaddvīpaḥ kuntīputro vṛkodaraḥ

लाक्षागृह से और नरभक्षी हिडिम्ब से बच निकले; जो उनके लिए द्वीप के समान आश्रय बने, वे कुन्तीपुत्र वृकोदर;

श्लोक 22 (5.50.22)

याज्ञसेनीमथो यत्र सिन्धुराजोऽपकृष्टवान् । तत्रैषामभवद्द्वीपः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ॥

yājñasenīmatho yatra sindhurājo'pakṛṣṭavān | tatraiṣāmabhavaddvīpaḥ kuntīputro vṛkodaraḥ

और जब सिन्धुराज ने याज्ञसेनी (द्रौपदी) का हरण किया, तब भी कुन्तीपुत्र वृकोदर ही उनके आश्रय बने;

श्लोक 23 (5.50.23)

यश्च तान्सङ्गतान्सर्वान्पाण्डवान्वारणावते । दह्यतो मोचयामास तेन वस्तेऽभ्ययुञ्जत ॥

yaśca tānsaṅgatānsarvānpāṇḍavānvāraṇāvate | dahyato mocayāmāsa tena vaste'bhyayuñjata

जिन्होंने वारणावत में एक साथ जलते हुए सब पाण्डवों को बचाया—उन्हीं के साथ उन्होंने आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 24 (5.50.24)

कृष्णायां चरता प्रीतिं येन क्रोधवशा हताः । प्रविश्य विषयं घोरं पर्वतं गन्धमादनम् ॥

kṛṣṇāyāṃ caratā prītiṃ yena krodhavaśā hatāḥ | praviśya viṣayaṃ ghoraṃ parvataṃ gandhamādanam

जिन्होंने कृष्णा (द्रौपदी) को प्रसन्न करने के लिए भयंकर गन्धमादन पर्वत-प्रदेश में प्रवेश करके क्रोधवश नामक राक्षसों का वध किया;

श्लोक 25 (5.50.25)

यस्य नागायुतैर्वीर्यं भुजयोः सारमर्पितम् । तेन वो भीमसेनेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥

yasya nāgāyutairvīryaṃ bhujayoḥ sāramarpitam | tena vo bhīmasenena pāṇḍavā abhyayuñjata

जिनकी भुजाओं में दस हज़ार हाथियों का बल भरा है—उन भीमसेन के साथ पाण्डवों ने आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 26 (5.50.26)

कृष्णद्वितीयो विक्रम्य तुष्ट्यर्थं जातवेदसः । अजयद्यः पुरा वीरो युध्यमानं पुरन्दरम् ॥

kṛṣṇadvitīyo vikramya tuṣṭyarthaṃ jātavedasaḥ | ajayadyaḥ purā vīro yudhyamānaṃ purandaram

जिस वीर ने पूर्वकाल में अग्नि (जातवेदा) की तृप्ति के लिए श्रीकृष्ण को साथ लेकर पराक्रमपूर्वक युद्ध करते हुए इन्द्र को जीत लिया था;

श्लोक 27 (5.50.27)

यः स साक्षान्महादेवं गिरिशं शूलपाणिनम् । तोषयामास युद्धेन देवदेवमुमापतिम् ॥

yaḥ sa sākṣānmahādevaṃ giriśaṃ śūlapāṇinam | toṣayāmāsa yuddhena devadevamumāpatim

जिसने युद्ध के द्वारा साक्षात् महादेव—त्रिशूलधारी गिरीश, देवों के देव, उमापति—को प्रसन्न किया;

श्लोक 28 (5.50.28)

यश्च सर्वान्वशे चक्रे लोकपालान्धनुर्धरः । तेन वो विजयेनाजौ पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥

yaśca sarvānvaśe cakre lokapālāndhanurdharaḥ | tena vo vijayenājau pāṇḍavā abhyayuñjata

जिस धनुर्धर ने सब लोकपालों को वश में कर लिया—उन विजय (अर्जुन) के साथ पाण्डवों ने युद्ध में आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 29 (5.50.29)

यः प्रतीचीं दिशं चक्रे वशे म्लेच्छगणायुताम् । स तत्र नकुलो योद्धा चित्रयोधी व्यवस्थितः ॥

yaḥ pratīcīṃ diśaṃ cakre vaśe mlecchagaṇāyutām | sa tatra nakulo yoddhā citrayodhī vyavasthitaḥ

जिसने म्लेच्छ-समूहों से भरी पश्चिम दिशा को वश में किया, वह विचित्र युद्ध-कौशल वाला योद्धा नकुल वहाँ डटा हुआ है।

श्लोक 30 (5.50.30)

तेन वो दर्शनीयेन वीरेणातिधनुर्भृता । माद्रीपुत्रेण कौरव्य पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥

tena vo darśanīyena vīreṇātidhanurbhṛtā | mādrīputreṇa kauravya pāṇḍavā abhyayuñjata

हे कौरव्य, उस दर्शनीय, श्रेष्ठ धनुर्धर वीर माद्रीपुत्र के साथ पाण्डवों ने आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 31 (5.50.31)

यः काशीनङ्गमगधान्कलिङ्गांश्च युधाजयत् । तेन वः सहदेवेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥

yaḥ kāśīnaṅgamagadhānkaliṅgāṃśca yudhājayat | tena vaḥ sahadevena pāṇḍavā abhyayuñjata

जिसने युद्ध में काशी, अङ्ग, मगध और कलिङ्ग देशों को जीता—उन सहदेव के साथ पाण्डवों ने आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 32 (5.50.32)

यस्य वीर्येण सदृशाश्चत्वारो भुवि मानवाः । अश्वत्थामा धृष्टकेतू रुक्मी प्रद्युम्न एव च ॥

yasya vīryeṇa sadṛśāścatvāro bhuvi mānavāḥ | aśvatthāmā dhṛṣṭaketū rukmī pradyumna eva ca

जिसके पराक्रम की बराबरी करने वाले पृथ्वी पर केवल चार मनुष्य हैं—अश्वत्थामा, धृष्टकेतु, रुक्मी और प्रद्युम्न—

श्लोक 33 (5.50.33)

तेन वः सहदेवेन युद्धं राजन्महात्ययम् । यवीयसा नृवीरेण माद्रीनन्दिकरेण च ॥

tena vaḥ sahadevena yuddhaṃ rājanmahātyayam | yavīyasā nṛvīreṇa mādrīnandikareṇa ca

हे राजन्, उन सबसे छोटे, नरवीर, माद्री को आनन्द देने वाले सहदेव के साथ आपका युद्ध महाविनाशकारी होगा।

श्लोक 34 (5.50.34)

तपश्चचार या घोरं काशिकन्या पुरा सती । भीष्मस्य वधमिच्छन्ती प्रेत्यापि भरतर्षभ ॥

tapaścacāra yā ghoraṃ kāśikanyā purā satī | bhīṣmasya vadhamicchantī pretyāpi bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, जिस सती काशिराज-कन्या ने पूर्वकाल में भीष्म का वध चाहते हुए, मृत्यु के बाद के लिए भी, घोर तप किया था,

श्लोक 35 (5.50.35)

पाञ्चालस्य सुता जज्ञे दैवाच्च स पुनः पुमान् । स्त्रीपुंसोः पुरुषव्याघ्र यः स वेद गुणागुणान् ॥

pāñcālasya sutā jajñe daivācca sa punaḥ pumān | strīpuṃsoḥ puruṣavyāghra yaḥ sa veda guṇāguṇān

वह पाञ्चालराज की पुत्री के रूप में जन्मी और दैववश फिर पुरुष बन गई; हे पुरुषसिंह, वह स्त्री और पुरुष दोनों के गुण-दोष जानता है;

श्लोक 36 (5.50.36)

यः कलिङ्गान्समापेदे पाञ्चाल्यो युद्धदुर्मदः । शिखण्डिना वः कुरवः कृतास्त्रेणाभ्ययुञ्जत ॥

yaḥ kaliṅgānsamāpede pāñcālyo yuddhadurmadaḥ | śikhaṇḍinā vaḥ kuravaḥ kṛtāstreṇābhyayuñjata

युद्ध में उन्मत्त होकर लड़ने वाले जिस पाञ्चालकुमार ने कलिङ्गों को जीता—उन अस्त्रविद् शिखण्डी के साथ, हे कौरवो, पाण्डवों ने तुम पर चढ़ाई की है।

श्लोक 37 (5.50.37)

यं यक्षः पुरुषं चक्रे भीष्मस्य निधनेच्छया । महेष्वासेन रौद्रेण पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥

yaṃ yakṣaḥ puruṣaṃ cakre bhīṣmasya nidhanecchayā | maheṣvāsena raudreṇa pāṇḍavā abhyayuñjata

जिसे भीष्म की मृत्यु की इच्छा से एक यक्ष ने पुरुष बना दिया—उस भयंकर महाधनुर्धर के साथ पाण्डवों ने आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 38 (5.50.38)

महेष्वासा राजपुत्रा भ्रातरः पञ्च केकयाः । आमुक्तकवचाः शूरास्तैश्च वस्तेऽभ्ययुञ्जत ॥

maheṣvāsā rājaputrā bhrātaraḥ pañca kekayāḥ | āmuktakavacāḥ śūrāstaiśca vaste'bhyayuñjata

पाँचों केकय भाई—महाधनुर्धर राजकुमार, कवच धारण किए शूरवीर—उनके साथ भी उन्होंने आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 39 (5.50.39)

यो दीर्घबाहुः क्षिप्रास्त्रो धृतिमान्सत्यविक्रमः । तेन वो वृष्णिवीरेण युयुधानेन सङ्गरः ॥

yo dīrghabāhuḥ kṣiprāstro dhṛtimānsatyavikramaḥ | tena vo vṛṣṇivīreṇa yuyudhānena saṅgaraḥ

जो लम्बी भुजाओं वाले, शीघ्र अस्त्र चलाने वाले, धैर्यवान और सत्यपराक्रमी हैं—उन वृष्णिवीर युयुधान (सात्यकि) से आपकी भिड़न्त होगी।

श्लोक 40 (5.50.40)

य आसीच्छरणं काले पाण्डवानां महात्मनाम् । रणे तेन विराटेन भविता वः समागमः ॥

ya āsīccharaṇaṃ kāle pāṇḍavānāṃ mahātmanām | raṇe tena virāṭena bhavitā vaḥ samāgamaḥ

जो संकट के समय महात्मा पाण्डवों के आश्रय बने—उन विराट से रण में आपका सामना होगा।

श्लोक 41 (5.50.41)

यः स काशिपती राजा वाराणस्यां महारथः । स तेषामभवद्योद्धा तेन वस्तेऽभ्ययुञ्जत ॥

yaḥ sa kāśipatī rājā vārāṇasyāṃ mahārathaḥ | sa teṣāmabhavadyoddhā tena vaste'bhyayuñjata

वाराणसी के महारथी काशिराज उनके योद्धा बने हैं—उनके साथ भी उन्होंने आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 42 (5.50.42)

शिशुभिर्दुर्जयैः सङ्ख्ये द्रौपदेयैर्महात्मभिः । आशीविषसमस्पर्शैः पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥

śiśubhirdurjayaiḥ saṅkhye draupadeyairmahātmabhiḥ | āśīviṣasamasparśaiḥ pāṇḍavā abhyayuñjata

युद्ध में दुर्जय, महामना, विषधर सर्प के समान स्पर्श वाले बालक द्रौपदीपुत्रों के साथ पाण्डवों ने आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 43 (5.50.43)

यः कृष्णसदृशो वीर्ये युधिष्ठिरसमो दमे । तेनाभिमन्युना सङ्ख्ये पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥

yaḥ kṛṣṇasadṛśo vīrye yudhiṣṭhirasamo dame | tenābhimanyunā saṅkhye pāṇḍavā abhyayuñjata

जो पराक्रम में श्रीकृष्ण के समान और इन्द्रिय-संयम में युधिष्ठिर के समान है—उस अभिमन्यु के साथ पाण्डवों ने युद्ध में आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 44 (5.50.44)

यश्चैवाप्रतिमो वीर्ये धृष्टकेतुर्महायशाः । दुःसहः समरे क्रुद्धः शैशुपालिर्महारथः ॥

yaścaivāpratimo vīrye dhṛṣṭaketurmahāyaśāḥ | duḥsahaḥ samare kruddhaḥ śaiśupālirmahārathaḥ

और जो पराक्रम में अनुपम, महायशस्वी, युद्ध में कुपित होने पर असह्य, शिशुपालपुत्र महारथी धृष्टकेतु हैं—

श्लोक 45 (5.50.45)

तेन वश्चेदिराजेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत । अक्षौहिण्या परिवृतः पाण्डवान्योऽभिसंश्रितः ॥

tena vaścedirājena pāṇḍavā abhyayuñjata | akṣauhiṇyā parivṛtaḥ pāṇḍavānyo'bhisaṃśritaḥ

उन चेदिराज के साथ पाण्डवों ने आप पर चढ़ाई की है; वे एक अक्षौहिणी सेना के साथ पाण्डवों के पक्ष में आ गए हैं।

श्लोक 46 (5.50.46)

यः संश्रयः पाण्डवानां देवानामिव वासवः । तेन वो वासुदेवेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥

yaḥ saṃśrayaḥ pāṇḍavānāṃ devānāmiva vāsavaḥ | tena vo vāsudevena pāṇḍavā abhyayuñjata

जो पाण्डवों के वैसे ही आश्रय हैं जैसे देवताओं के इन्द्र—उन वासुदेव के साथ पाण्डवों ने आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 47 (5.50.47)

तथा चेदिपतेर्भ्राता शरभो भरतर्षभ । करकर्षेण सहितस्ताभ्यां वस्तेऽभ्ययुञ्जत ॥

tathā cedipaterbhrātā śarabho bharatarṣabha | karakarṣeṇa sahitastābhyāṃ vaste'bhyayuñjata

हे भरतश्रेष्ठ, इसी प्रकार चेदिराज के भाई शरभ, करकर्ष के साथ—उन दोनों के साथ भी उन्होंने आप पर चढ़ाई की है।

श्लोक 48 (5.50.48)

जारासन्धिः सहदेवो जयत्सेनश्च तावुभौ । युद्धेऽप्रतिरथौ वीरौ पाण्डवार्थे व्यवस्थितौ ॥

jārāsandhiḥ sahadevo jayatsenaśca tāvubhau | yuddhe'pratirathau vīrau pāṇḍavārthe vyavasthitau

जरासन्धपुत्र सहदेव और जयत्सेन—ये दोनों अप्रतिम वीर युद्ध में पाण्डवों के लिए डटे हुए हैं।

श्लोक 49 (5.50.49)

द्रुपदश्च महातेजा बलेन महता वृतः । त्यक्तात्मा पाण्डवार्थाय योत्स्यमानो व्यवस्थितः ॥

drupadaśca mahātejā balena mahatā vṛtaḥ | tyaktātmā pāṇḍavārthāya yotsyamāno vyavasthitaḥ

और महातेजस्वी द्रुपद विशाल सेना से घिरे, पाण्डवों के लिए प्राण न्योछावर करने को तत्पर, युद्ध के लिए डटे हुए हैं।

श्लोक 50 (5.50.50)

एते चान्ये च बहवः प्राच्योदीच्या महीक्षितः । शतशो यानुपाश्रित्य धर्मराजो व्यवस्थितः ॥

ete cānye ca bahavaḥ prācyodīcyā mahīkṣitaḥ | śataśo yānupāśritya dharmarājo vyavasthitaḥ

ये और पूर्व तथा उत्तर के और भी बहुत-से सैकड़ों राजा हैं, जिनका आश्रय लेकर धर्मराज युद्ध के लिए डटे हुए हैं।"

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